अम्बिका खण्ड · अध्याय 131
मन्दर-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.8.131.1)
सनत्कुमार उवाच । अथापश्यत्तदायातान् भगवान् गणनायकान् । स्वैरनीकैस्सुबहुशः सन्नद्धान् युद्धलालसान्
sanatkumāra uvāca | athāpaśyattadāyātān bhagavān gaṇanāyakān | svairanīkaissubahuśaḥ sannaddhān yuddhalālasān
सनत्कुमार बोले - तब भगवान् ने अपनी-अपनी बड़ी सेनाओं सहित आये हुए, सुसज्जित, युद्धोत्सुक गणनायकों को देखा।
श्लोक 2 (skanda.8.131.2)
दिण्डिञ्च भारभूतिञ्च सोमशर्माणमेव च । करिकं मेघनादं च उदरेमणिमेव च
diṇḍiñca bhārabhūtiñca somaśarmāṇameva ca | karikaṁ meghanādaṁ ca udaremaṇimeva ca
दिण्डि, भारभूति, सोमशर्मा, करिक, मेघनाद, तथा उदरेमणि।
श्लोक 3 (skanda.8.131.3)
आसत्तिं धूतपापं च चन्द्रमौलिनमेव च । आदित्यमालं विक्रान्तं सुकेशं च महाबलम्
āsattiṁ dhūtapāpaṁ ca candramaulinameva ca | ādityamālaṁ vikrāntaṁ sukeśaṁ ca mahābalam
आसत्ति, धूतपाप, चन्द्रमौलि, पराक्रमी आदित्यमाल, तथा महाबली सुकेश।
श्लोक 4 (skanda.8.131.4)
तालकेतुं ज्वरञ्चैव दण्डपाणिनमूर्जितम् । एतांश्चान्यांश्च विख्यातान् गुह्याँश्च गणनायकान्
tālaketuṁ jvarañcaiva daṇḍapāṇinamūrjitam | etāṁścānyāṁśca vikhyātān guhyā~śca gaṇanāyakān
तालकेतु, ज्वर, तथा बलशाली दण्डपाणि - इन्हें तथा अन्य विख्यात और गुह्य गणनायकों को भी उन्होंने देखा।
श्लोक 5 (skanda.8.131.5)
महागणपतिञ्चैव खोठामुद्गरमेव च । संपूज्य भगवान् सर्वान् प्रसाद्य च पुनः पुनः
mahāgaṇapatiñcaiva khoṭhāmudgarameva ca | saṁpūjya bhagavān sarvān prasādya ca punaḥ punaḥ
और महागणपति और खोठामुद्गर को भी। भगवान् ने उन सबका सम्मान करके, बार-बार प्रसन्न करके,
श्लोक 6 (skanda.8.131.6)
उवाच मेघनिर्ह्रादः शतदुन्दुभिनिस्वनः । दानवैः सह यूयं मे योद्धुमर्हथ सत्तमाः
uvāca meghanirhrādaḥ śatadundubhinisvanaḥ | dānavaiḥ saha yūyaṁ me yoddhumarhatha sattamāḥ
मेघ के समान गर्जते और सौ नगाड़ों के समान गूँजते स्वर में कहा - हे सत्तमो! तुम मेरे लिये दानवों से युद्ध करने योग्य हो।
श्लोक 7 (skanda.8.131.7)
यूयमेव गणाध्यक्षाः पर्याप्तास्तान्प्रबाधने । तस्माद्यूयं महासत्वाः सगणाः सपदानुगाः । गच्छध्वं संविनाशाय पूजितोस्मि महाबलाः
yūyameva gaṇādhyakṣāḥ paryāptāstānprabādhane | tasmādyūyaṁ mahāsatvāḥ sagaṇāḥ sapadānugāḥ | gacchadhvaṁ saṁvināśāya pūjitosmi mahābalāḥ
'तुम गणाध्यक्ष ही उन्हें पराजित करने में समर्थ हो; अतः हे महाबलो! अपने गणों और अनुचरों सहित उनके संहार के लिये जाओ - मैं तुमसे पूजित हूँ।'
श्लोक 8 (skanda.8.131.8)
सनत्कुमार उवाच । त एवमुक्ता देवेन प्रणम्य शिरसा हरम् । विप्रजग्मुर्महात्मानो देवोपि संप्रतिष्ठत
sanatkumāra uvāca | ta evamuktā devena praṇamya śirasā haram | viprajagmurmahātmāno devopi saṁpratiṣṭhata
सनत्कुमार बोले - देव द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वे महात्मा हर को सिर झुकाकर प्रणाम कर चल पड़े; देव भी अपने स्थान पर प्रतिष्ठित हो गये।
श्लोक 9 (skanda.8.131.9)
ततः समभवच्छब्द उदधेरिव भिद्यतः । अन्धकासुरसैन्यस्य मन्दरं समुपेयुषः
tataḥ samabhavacchabda udadheriva bhidyataḥ | andhakāsurasainyasya mandaraṁ samupeyuṣaḥ
तब समुद्र के मानो फटने जैसा शब्द उत्पन्न हुआ, जब अन्धकासुर की सेना मन्दराचल के पास पहुँची।
श्लोक 10 (skanda.8.131.10)
निशम्य दानवारावं श्रोत्रायासकरं भृशम् । प्रमथा रुरुधुर्घोरं युगान्ते जलदा इव
niśamya dānavārāvaṁ śrotrāyāsakaraṁ bhṛśam | pramathā rurudhurghoraṁ yugānte jaladā iva
कान को अत्यन्त पीड़ा देनेवाली दानवों की गर्जना सुनकर प्रमथों ने भी युगान्तकालीन मेघों की भाँति घोर गर्जना की।
श्लोक 11 (skanda.8.131.11)
तावन्योन्यबलोद्धूतावभूतां सैन्यसागरौ । प्रलयान्त इवोद्धूतौ भिद्यमानौ महार्णवौ
tāvanyonyabaloddhūtāvabhūtāṁ sainyasāgarau | pralayānta ivoddhūtau bhidyamānau mahārṇavau
वे दोनों परस्पर बल से उद्वेलित सेना-सागर, प्रलयकाल में उद्वेलित होकर टकराते हुए दो महासागरों के समान हो गये।
श्लोक 12 (skanda.8.131.12)
देवदेव उवाच । जुहुध्यरिविनाशाय ब्रह्मन्नस्मज्जयाय च । त्वं चापि नन्दिन् रक्षस्व सर्वैरेतैर्गणैर्वृतः
devadeva uvāca | juhudhyarivināśāya brahmannasmajjayāya ca | tvaṁ cāpi nandin rakṣasva sarvairetairgaṇairvṛtaḥ
देवदेव बोले - हे ब्रह्मन्! शत्रु के नाश और हमारी विजय के लिये हवन करो; और हे नन्दिन्! तुम भी इन सब गणों से घिरे होकर रक्षा करो।
श्लोक 13 (skanda.8.131.13)
आकाशस्थाश्च ये ह्येते नदन्त्यम्बुमुचो यथा । आकाशगानेव रिपूनेते बाधन्तु दानवान्
ākāśasthāśca ye hyete nadantyambumuco yathā | ākāśagāneva ripūnete bādhantu dānavān
'और जो ये आकाश में स्थित होकर मेघों के समान गर्जते हैं, वे आकाशचारी होकर ही इन दानव शत्रुओं को पीड़ित करें।'
श्लोक 14 (skanda.8.131.14)
सनत्कुमार उवाच । इत्युक्तौ तौ प्रारभेतां कर्तुं भगवतो वचः । बृहस्पतिर्जुहावाग्निं नन्दी चापि ररक्ष तम्
sanatkumāra uvāca | ityuktau tau prārabhetāṁ kartuṁ bhagavato vacaḥ | bṛhaspatirjuhāvāgniṁ nandī cāpi rarakṣa tam
सनत्कुमार बोले - इस प्रकार कहे जाने पर वे दोनों भगवान् के वचन का पालन करने लगे; बृहस्पति ने अग्नि में हवन किया, और नन्दी ने उसकी रक्षा की।
श्लोक 15 (skanda.8.131.15)
व्यायच्छद्भिर्महद्भिश्च प्रमथैर्मन्दरो गिरिः । विप्रस्थित इवाभाति स्रस्तकुञ्जरकेसरिः
vyāyacchadbhirmahadbhiśca pramathairmandaro giriḥ | viprasthita ivābhāti srastakuñjarakesariḥ
महान् प्रमथों के प्रयत्न करने से मन्दर पर्वत ऐसा दिखने लगा मानो उसके हाथी और सिंह छिटककर विचलित हो गये हों।
श्लोक 16 (skanda.8.131.16)
ततोन्धकबल दृप्तं दृष्ट्वा सिंहबलं यथा । आरोहमाणं तत्तूर्णं चालयत्तमिवाचलम्
tatondhakabala dṛptaṁ dṛṣṭvā siṁhabalaṁ yathā | ārohamāṇaṁ tattūrṇaṁ cālayattamivācalam
तब अन्धक की उद्धत सेना को, सिंहबल के समान शीघ्रता से पर्वत पर चढ़ते देखकर, वह पर्वत मानो स्वयं काँपने लगा।
श्लोक 17 (skanda.8.131.17)
ततो हलहलाशब्दः प्रमथानामजायत । दैत्यान् वारयतां युद्धं तरुपाषाणसायकैः
tato halahalāśabdaḥ pramathānāmajāyata | daityān vārayatāṁ yuddhaṁ tarupāṣāṇasāyakaiḥ
तब वृक्षों, पत्थरों और बाणों से दैत्यों को रोकते हुए प्रमथों का कोलाहलपूर्ण युद्ध-घोष उठा।
श्लोक 18 (skanda.8.131.18)
दानवा वार्यमाणास्तु प्रमथैर्जितकाशिभिः । विदार्य प्रमथानीकं शीघ्रमारुरुहुस्तदा
dānavā vāryamāṇāstu pramathairjitakāśibhiḥ | vidārya pramathānīkaṁ śīghramāruruhustadā
विजयी प्रमथों द्वारा रोके जाते हुए भी दानव प्रमथ-सेना को चीरकर तब शीघ्र ऊपर चढ़ गये।
श्लोक 19 (skanda.8.131.19)
प्रमथा ह्यपि निस्सङ्गं योद्धव्यमिति निश्चिताः । चिच्छिदुर्बिभिदुश्चैव पफलुश्च सुरेतरान्
pramathā hyapi nissaṅgaṁ yoddhavyamiti niścitāḥ | cicchidurbibhiduścaiva paphaluśca suretarān
'बिना किसी संकोच के लड़ना है' - यह निश्चय करके प्रमथों ने भी उन असुरों को काटा, बींधा, और चीर डाला।
श्लोक 20 (skanda.8.131.20)
गृह्णीष्व मुञ्च तिष्ठेति स्थितस्त्वं किं करिष्यसि । एवं वाचः समुत्तस्थुः प्रमथासुरसैन्ययोः
gṛhṇīṣva muñca tiṣṭheti sthitastvaṁ kiṁ kariṣyasi | evaṁ vācaḥ samuttasthuḥ pramathāsurasainyayoḥ
'पकड़ो! छोड़ो! ठहरो! खड़े होकर तुम क्या करोगे?' - इस प्रकार की पुकारें प्रमथ और असुर सेनाओं के बीच उठने लगीं।
श्लोक 21 (skanda.8.131.21)
समूलाग्रैस्तरुवरैः पर्वतैश्च सपादपैः । अन्योन्यं चूर्णयन्ति स्म निर्घृणाः प्रमथासुराः
samūlāgraistaruvaraiḥ parvataiśca sapādapaiḥ | anyonyaṁ cūrṇayanti sma nirghṛṇāḥ pramathāsurāḥ
जड़ और शिखर सहित श्रेष्ठ वृक्षों से, तथा वृक्षों सहित पर्वतों से, निर्दय प्रमथ और असुर एक-दूसरे को चूर-चूर करने लगे।
श्लोक 22 (skanda.8.131.22)
ततो दाक्षायणीपुत्रैर्दक्षाध्वरविनाशनाः । पराङ्मुखा न शकिताः कर्तुं भक्त्यपराङ्मुखाः
tato dākṣāyaṇīputrairdakṣādhvaravināśanāḥ | parāṅmukhā na śakitāḥ kartuṁ bhaktyaparāṅmukhāḥ
तब दाक्षायणी (पार्वती) के पुत्रों द्वारा, जो दक्ष के यज्ञ का विनाश करनेवाले थे, स्वयं भक्ति से अविचलित होने के कारण शत्रुओं को पीठ दिखाने पर बाध्य नहीं किया जा सका।
श्लोक 23 (skanda.8.131.23)
अरोहणेचलाग्रस्य अशक्तान् निर्जितान् रिपून् । देवोपलभ्य प्रमथानवारयदशेषतः
arohaṇecalāgrasya aśaktān nirjitān ripūn | devopalabhya pramathānavārayadaśeṣataḥ
पर्वतशिखर पर चढ़ने में असमर्थ, पराजित शत्रुओं को देखकर देव ने प्रमथों को पूर्णतः रोक दिया।
श्लोक 24 (skanda.8.131.24)
देवदेव उवाच । आरोहन्तु दनोः पुत्रा मन्दरं चारुकन्दरम् । क्रीडार्थं मम युध्यध्वमेभिस्सह गणाधिपाः
devadeva uvāca | ārohantu danoḥ putrā mandaraṁ cārukandaram | krīḍārthaṁ mama yudhyadhvamebhissaha gaṇādhipāḥ
देवदेव बोले - दनु के पुत्र सुन्दर कन्दराओंवाले मन्दराचल पर चढ़ने दो; हे गणाधिपो! मेरी क्रीड़ा के लिये अब इनके साथ युद्ध करो।
श्लोक 25 (skanda.8.131.25)
ददृशुरनेकचारुकुञ्जस्थितमृगराजविमुक्तभीमनादम् । प्रसृतगजकुलाभिघातरुग्णक्षितिरुहपुष्पसमाचितप्रदेशम् । भुजगपतिशिरोमणिप्रदीपप्रतिहतचारुशिलागृहान्धकारम् । शिशिरविमलनिर्झराम्बुवेगस्फुटितमहोपलजालदृष्टरन्ध्रम्
dadṛśuranekacārukuñjasthitamṛgarājavimuktabhīmanādam | prasṛtagajakulābhighātarugṇakṣitiruhapuṣpasamācitapradeśam | bhujagapatiśiromaṇipradīpapratihatacāruśilāgṛhāndhakāram | śiśiravimalanirjharāmbuvegasphuṭitamahopalajāladṛṣṭarandhram
उन्होंने मन्दराचल को देखा - जिसकी अनेक सुन्दर झाड़ियों में बसे सिंहों से भयंकर गर्जना गूँजती थी, जिसका प्रदेश विचरते हुए गजसमूहों की टक्कर से टूटे वृक्षों के पुष्पों से भरा था, जिसकी सुन्दर शिलागुफाओं का अंधकार नागराज के शिरोमणि के दीपक-सदृश प्रकाश से भी दूर नहीं होता था, तथा जो शीतल निर्मल झरनों के वेग से फूटी बड़ी शिलाओं के रन्ध्रों से युक्त था।
श्लोक 26 (skanda.8.131.26)
क्वचिदभिनवताम्रपल्लवाग्रप्रतिहतबालदिवाकराशुजालम् । क्वचिदमरविलासिनीमुखेन्दुप्रविरचितस्फुटचारुपत्रलेखम्
kvacidabhinavatāmrapallavāgrapratihatabāladivākarāśujālam | kvacidamaravilāsinīmukhendupraviracitasphuṭacārupatralekham
कहीं जिसके ताजे ताम्रवर्ण नवपल्लवों की नोक पर बालसूर्य की किरणें रुक जाती थीं, और कहीं देव-सुन्दरियों के मुखचन्द्र पर स्पष्ट सुन्दर पत्रलेखा (चित्रकारी) अंकित थी।
श्लोक 27 (skanda.8.131.27)
क्वचिदनिलविधूतचारुपुष्पस्तबकविचित्रितकाननप्रदेशम् । स्फटिकमणिशिलातलोपविष्टस्थितकपियूथविलोकितात्मदेहम्
kvacidanilavidhūtacārupuṣpastabakavicitritakānanapradeśam | sphaṭikamaṇiśilātalopaviṣṭasthitakapiyūthavilokitātmadeham
कहीं वायु से हिलते सुन्दर पुष्पगुच्छों से वर्णचित्रित वन-प्रदेश, तथा स्फटिकमणि शिलातल पर बैठे वानरसमूहों को अपना ही प्रतिबिम्ब देखते हुए दिखानेवाला।
श्लोक 28 (skanda.8.131.28)
सुरयुवतिनिकेतबर्हिकेकाश्रवणसुखप्रतिबुद्धसिद्धसार्थम् । कमलदलरजःसुगन्धितोयस्थितकलहंसकलप्रलापरम्यम्
surayuvatiniketabarhikekāśravaṇasukhapratibuddhasiddhasārtham | kamaladalarajaḥsugandhitoyasthitakalahaṁsakalapralāparamyam
देव-युवतियों के निवासों के निकट मयूरों की केका सुनकर सुखपूर्वक जगते सिद्धसमूहोंवाला, तथा कमलदल के पराग से सुगन्धित जल में स्थित हंसों के मधुर कलरव से मनोरम।
श्लोक 29 (skanda.8.131.29)
दिनकरकरतप्तसूर्यकान्तप्रविगलिताग्निविलीनहेमधातुम् । क्वचिदभिपतितांशुचन्द्रकान्तप्रविसृतशैलनदीविकीर्णतोयम्
dinakarakarataptasūryakāntapravigalitāgnivilīnahemadhātum | kvacidabhipatitāṁśucandrakāntapravisṛtaśailanadīvikīrṇatoyam
सूर्य की किरणों से तपे सूर्यकान्तमणि से गिरी अग्नि में गले हुए स्वर्णधातुवाला, और कहीं चन्द्रमा की किरणों से टकराये चन्द्रकान्तमणि से बहे जल से बिखरी हुई पर्वत-नदियोंवाला।
श्लोक 30 (skanda.8.131.30)
वरहरिकरवज्रसन्निपातस्फुटितमहागजकुम्भमौक्तिकौघैः । सितकुसुमचयैरिव प्रकीर्णैः क्वचिदुपशोभितविस्तृतोपकण्ठम्
varaharikaravajrasannipātasphuṭitamahāgajakumbhamauktikaughaiḥ | sitakusumacayairiva prakīrṇaiḥ kvacidupaśobhitavistṛtopakaṇṭham
श्रेष्ठ सिंहों के वज्र-सदृश पंजों के प्रहार से फटे बड़े गजों के कुम्भस्थलों से बिखरे मोतियों के समूह से, मानो श्वेत पुष्पों के ढेर से, कहीं-कहीं शोभित विस्तृत तटप्रदेशोंवाला।
श्लोक 31 (skanda.8.131.31)
प्रमुदितगणभैरवाट्टहासप्रसृतमहारवपूरितान्तरालम् । तरुगहनलतागृहान्तलीनप्रमुदितसिद्धवधूप्रनृत्तरम्यम्
pramuditagaṇabhairavāṭṭahāsaprasṛtamahāravapūritāntarālam | tarugahanalatāgṛhāntalīnapramuditasiddhavadhūpranṛttaramyam
प्रसन्न गणों के भयंकर अट्टहास से फैले महान् रव से भरे अन्तरालोंवाला, तथा वृक्षों के सघन लतागृहों में छिपी प्रसन्न सिद्ध-वधुओं के नृत्य से मनोरम।
श्लोक 32 (skanda.8.131.32)
बहुकटकविचारिमत्तनागं बहुमृगशाव निपीतनिर्झराम्बुम् । बहुविषमतटप्रपातकुञ्जं बहुविधगुल्मलतावतानवृक्षम्
bahukaṭakavicārimattanāgaṁ bahumṛgaśāva nipītanirjharāmbum | bahuviṣamataṭaprapātakuñjaṁ bahuvidhagulmalatāvatānavṛkṣam
अपने अनेक कटकों में विचरते मतवाले हाथियोंवाला, जिसके झरनों का जल अनेक मृगशावकों द्वारा पिया गया था, अनेक विषम तटों और खाइयोंवाले कुंजोंवाला, तथा अनेक प्रकार की झाड़ियों और लताओं से आच्छादित वृक्षोंवाला।
श्लोक 33 (skanda.8.131.33)
मरकतमणिपद्मरागशृङ्गद्युतिशबलीकृतपादपादपाग्र्यम् । अलिकुलकलकोकिलाविनादप्रचुरविनादितचारुकाननान्तम्
marakatamaṇipadmarāgaśṛṅgadyutiśabalīkṛtapādapādapāgryam | alikulakalakokilāvinādapracuravināditacārukānanāntam
मरकतमणि और पद्मराग के शिखरों की कान्ति से चित्रित उत्तम वृक्ष-शिखरोंवाला, तथा भ्रमरसमूहों और कोकिलाओं के मधुर कूजन से गूँजते सुन्दर वनप्रान्तोंवाला।
श्लोक 34 (skanda.8.131.34)
यस्मिन् सदा प्रमुदिता जितमृत्युशोका गोरोचनाञ्जनशिलालनिधानसिद्धाः । सिद्धाः सदा प्रमुदिता वनितासहाया स्तिष्ठन्ति चन्द्रकिरणोपमचारुहाराः
yasmin sadā pramuditā jitamṛtyuśokā gorocanāñjanaśilālanidhānasiddhāḥ | siddhāḥ sadā pramuditā vanitāsahāyā stiṣṭhanti candrakiraṇopamacāruhārāḥ
जिस पर सदा प्रसन्न, मृत्यु और शोक को जीत चुके, गोरोचन-अंजन-शिलाजित के भण्डार सिद्धगण, अपनी वनितओं के साथ, चन्द्रकिरण के समान सुन्दर हारों से सुशोभित होकर सदा आनन्दित बने रहते हैं।
श्लोक 35 (skanda.8.131.35)
विद्याधराः प्रियतमाविनिबद्धरागाः पीनेषु तुङ्गतटवत्सु पयोधरेषु । धातूत्करैर्हरितरक्तपिशङ्गवर्णैर्यत्रालिखन्ति विविधान् कुसुमावतंसान्
vidyādharāḥ priyatamāvinibaddharāgāḥ pīneṣu tuṅgataṭavatsu payodhareṣu | dhātūtkarairharitaraktapiśaṅgavarṇairyatrālikhanti vividhān kusumāvataṁsān
जहाँ विद्याधर, अपनी प्रियतमाओं के प्रति अनुराग से बँधे हुए, उन्नत तटों के समान उनके पूर्ण स्तनों पर हरित, रक्त और पीत रंग के धातु-चूर्णों से विविध पुष्पालंकार चित्रित करते हैं।
श्लोक 36 (skanda.8.131.36)
यस्मिन सदा सुरतखेदितगात्रयष्टयः कान्ताग्रहस्तविनिवेशितहस्तपद्माः । सेवन्ति निर्झरजलप्रणयातिशीतमभ्यागतं पवनमप्सरसोतिहृष्टाः
yasmina sadā suratakheditagātrayaṣṭayaḥ kāntāgrahastaviniveśitahastapadmāḥ | sevanti nirjharajalapraṇayātiśītamabhyāgataṁ pavanamapsarasotihṛṣṭāḥ
जिस पर रतिक्रीड़ा से थके शरीरवाली, अपने कमल-हाथ प्रियतम के हाथों में रखे हुए, अत्यन्त प्रसन्न अप्सराएँ झरने के जल से आनेवाली अत्यन्त शीतल वायु का सेवन करती हैं।
श्लोक 37 (skanda.8.131.37)
नूपुररावविबोधितहंसं हसतनूरुहघट्टितपद्मम् । पद्मरजोरुणितामलतोयं तोयपरिष्कृतकाञ्चनशृङ्गम्
nūpurarāvavibodhitahaṁsaṁ hasatanūruhaghaṭṭitapadmam | padmarajoruṇitāmalatoyaṁ toyapariṣkṛtakāñcanaśṛṅgam
जिसके हंस नूपुरों की ध्वनि से जागते हैं, कमल हंसों के रोओं से छू जाते हैं, जिसका निर्मल जल कमल-पराग से लाल हो जाता है, और जिसके स्वर्ण-शिखर उसी जल से निखर जाते हैं।
श्लोक 38 (skanda.8.131.38)
शृङ्गसमुत्थितचन्दनवृक्षं वृक्षसमास्थितकोकिलवृन्दम् । वृन्दविमुक्तगजेन्द्रनिनादं नादभयाकुलितर्क्षतरक्षुम्
śṛṅgasamutthitacandanavṛkṣaṁ vṛkṣasamāsthitakokilavṛndam | vṛndavimuktagajendraninādaṁ nādabhayākulitarkṣatarakṣum
जिसके शिखरों पर चन्दन के वृक्ष उगे हैं, जिन वृक्षों पर कोकिल-समूह बैठे हैं, जिनके समूहों के मध्य से गजेन्द्रों की गर्जना निकलती है, और उस गर्जना के भय से भालू-लकड़बग्घे व्याकुल हो जाते हैं।
श्लोक 39 (skanda.8.131.39)
ऋक्षतरक्षुनिलीननिकुञ्जं कुञ्जगुहामुखनिर्गतसिंहम् । सिंहविदारितनैकपकुम्भं कुम्भविनिर्गतमौक्तिकरत्नम्
ṛkṣatarakṣunilīnanikuñjaṁ kuñjaguhāmukhanirgatasiṁham | siṁhavidāritanaikapakumbhaṁ kumbhavinirgatamauktikaratnam
जिसके कुंजों में भालू-लकड़बग्घे छिपे रहते हैं, जिनके कुंज-गुहामुखों से सिंह निकलते हैं, जिन सिंहों द्वारा फाड़े गये अनेक गजकुम्भस्थलों से मोती और रत्न बाहर आते हैं।
श्लोक 40 (skanda.8.131.40)
रत्नमयूखविभासितपृष्ठं पृष्ठसमास्थितशङ्करपादम् । पादसमुत्थितपादपषण्डं षण्डलताकुसुमोत्करमार्गम्
ratnamayūkhavibhāsitapṛṣṭhaṁ pṛṣṭhasamāsthitaśaṅkarapādam | pādasamutthitapādapaṣaṇḍaṁ ṣaṇḍalatākusumotkaramārgam
जिसकी चोटी रत्नों की किरणों से प्रकाशित है, जिसकी चोटी पर शंकर के चरण विराजमान हैं, जिसकी तलहटी से वृक्षसमूह उगते हैं, और जिनके मार्ग लताओं के पुष्प-समूहों से पटे हैं।
श्लोक 41 (skanda.8.131.41)
मार्गमार्गमणितोरणचित्रं चित्रचित्रमणितोरणपट्टम् । पट्टपट्टविनिवेशितपुष्पं पुष्पपुष्पपरिचुम्बितभृङ्गम्
mārgamārgamaṇitoraṇacitraṁ citracitramaṇitoraṇapaṭṭam | paṭṭapaṭṭaviniveśitapuṣpaṁ puṣpapuṣpaparicumbitabhṛṅgam
जिसका हर मार्ग रत्नमय तोरणों से चित्रित है, जिनके तोरणों की पट्टिकाएँ विविध रत्नों से विचित्र हैं, जिनकी हर पट्टिका पर पुष्प सजे हैं, और जिनके हर पुष्प को भ्रमर चूमते हैं।
श्लोक 42 (skanda.8.131.42)
नानाधातुविचित्रनितम्बं नानापुष्पलतागृहरम्यम् । नानामत्तविहङ्गमघुष्टं नानाशृङ्गसमास्थितसिद्धम्
nānādhātuvicitranitambaṁ nānāpuṣpalatāgṛharamyam | nānāmattavihaṅgamaghuṣṭaṁ nānāśṛṅgasamāsthitasiddham
जिसकी घाटियाँ विविध धातुओं से चित्रित हैं, जो विविध पुष्पों की लता-कुटीरों से मनोहर है, जो विविध मत्त पक्षियों के कलरव से गूँजता है, और जिसके विविध शिखरों पर सिद्धगण विराजमान हैं।
श्लोक 43 (skanda.8.131.43)
तन्मन्दरं विविधचारणसिद्धसंघैरम्यं स्वयं त्रिनयनेन कृताधिवासम् । दैत्यास्तदा भगवतानुमतप्रवेशाः सर्वे समारुरुहुरात्मजयैषिणस्ते
tanmandaraṁ vividhacāraṇasiddhasaṁghairamyaṁ svayaṁ trinayanena kṛtādhivāsam | daityāstadā bhagavatānumatapraveśāḥ sarve samāruruhurātmajayaiṣiṇaste
वह मन्दराचल, विविध चारण-सिद्ध समूहों से मनोहर, स्वयं त्रिनयन द्वारा निवासस्थान बनाया गया - उस पर उस समय, भगवान् की अनुमति से प्रवेश पाकर, आत्म-विजय के इच्छुक वे दैत्य सब चढ़ गये।
श्लोक 44 (skanda.8.131.44)
ततो विसृष्टाः प्रमथैरारोहन्त दितेः सुताः । मन्वानाः प्रमथा भीता निवृत्ता इति सत्वरम्
tato visṛṣṭāḥ pramathairārohanta diteḥ sutāḥ | manvānāḥ pramathā bhītā nivṛttā iti satvaram
तब प्रमथों द्वारा छोड़ दिये जाने पर दिति के पुत्र चढ़ने लगे, यह मानते हुए कि प्रमथ भयभीत होकर शीघ्र लौट गये हैं।
श्लोक 45 (skanda.8.131.45)
मन्दरस्य ततः पृष्ठे नानाद्रुमसमाकुले । बद्धस्कन्धाः स्थिता दैत्या आदित्यसदृशप्रभाः
mandarasya tataḥ pṛṣṭhe nānādrumasamākule | baddhaskandhāḥ sthitā daityā ādityasadṛśaprabhāḥ
फिर विविध वृक्षों से भरे मन्दराचल की चोटी पर सूर्य के समान तेजस्वी दैत्य कन्धे से कन्धा मिलाये खड़े हो गये।
श्लोक 46 (skanda.8.131.46)
स मन्दरो भीमशिलोपलद्रुमो विवृद्धशार्दूलतरक्षुवारणः । महासुरैर्दर्पितवाजिवारणैर्विकीर्यते मेघ इवानिलैर्भृशम्
sa mandaro bhīmaśilopaladrumo vivṛddhaśārdūlatarakṣuvāraṇaḥ | mahāsurairdarpitavājivāraṇairvikīryate megha ivānilairbhṛśam
वह भयंकर शिलाओं, पत्थरों और वृक्षोंवाला, बढ़े हुए बाघों, लकड़बग्घों और हाथियोंवाला मन्दराचल, उद्धत घोड़ों और हाथियोंवाले महासुरों से इस प्रकार क्षुब्ध हो उठा जैसे मेघ प्रचंड वायु से।
श्लोक 47 (skanda.8.131.47)
क्षिपन्ति शुभ्राभ्रनिभाः शिलाः क्वचित् तरून्समुत्पाट्य नदन्ति मेघवत् । निवार्यमाणाः प्रमथान् समार्दयन् वनेषु सिंहा मृगयूथपानिव
kṣipanti śubhrābhranibhāḥ śilāḥ kvacit tarūnsamutpāṭya nadanti meghavat | nivāryamāṇāḥ pramathān samārdayan vaneṣu siṁhā mṛgayūthapāniva
श्वेत मेघों के समान वे कहीं शिलाएँ फेंकते, वृक्षों को उखाड़ते और मेघों की भाँति गरजते हैं; रोके जाने पर भी वे प्रमथों को उसी प्रकार कुचल देते हैं जैसे वनों में सिंह मृगसमूहों को।
श्लोक 48 (skanda.8.131.48)
ततस्तु तद् गजरथवाजिदानवैः समावृतं क्षुभितमहोदधिप्रभम् । विराजते दितिसुतबाहुपालितं वनं यथा मृगपतिबाहुपालितम्
tatastu tad gajarathavājidānavaiḥ samāvṛtaṁ kṣubhitamahodadhiprabham | virājate ditisutabāhupālitaṁ vanaṁ yathā mṛgapatibāhupālitam
फिर हाथियों, रथों, घोड़ों और दानवों से घिरा वह क्षुब्ध महासागर-सदृश पर्वत, दिति के पुत्रों की भुजाओं से रक्षित होकर उस प्रकार शोभित हुआ, जैसे सिंहराज की भुजाओं से रक्षित वन।