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अम्बिका खण्ड · अध्याय 132

व्यूह-रचना

अध्याय 131अध्याय-सूचीअध्याय 133

श्लोक 1 (skanda.8.132.1)

सनत्कुमार उवाच । मन्दरप्रस्थमासाद्य सोन्धको दानवाधिपः । प्राञ्जलिः शुक्रमाहेदं शक्रार्कसदृशद्युतिम्

sanatkumāra uvāca | mandaraprasthamāsādya sondhako dānavādhipaḥ | prāñjaliḥ śukramāhedaṁ śakrārkasadṛśadyutim

सनत्कुमार बोले - मन्दराचल की तलहटी में पहुँचकर उस दानवाधिपति अन्धक ने हाथ जोड़कर इन्द्र और सूर्य के समान तेजस्वी शुक्र से यह कहा।

श्लोक 2 (skanda.8.132.2)

अन्धक उवाच । प्राप्ताः स्म भगवञ्छैलं मन्दरं चारुकन्दरम् । प्रमथैर्भीमसंकाशैः सन्निरुद्धशिलातलम्

andhaka uvāca | prāptāḥ sma bhagavañchailaṁ mandaraṁ cārukandaram | pramathairbhīmasaṁkāśaiḥ sanniruddhaśilātalam

अन्धक बोला - हे भगवन्! हम सुन्दर कन्दराओंवाले मन्दराचल पर पहुँच गये हैं, जिसका शिलातल भयंकर प्रमथों से घिरा हुआ है।

श्लोक 3 (skanda.8.132.3)

खेचरा मायिनश्चैव योगिनश्च महाबलाः । प्रसभं दानवैर्जेतुं न शक्या गणनायकाः

khecarā māyinaścaiva yoginaśca mahābalāḥ | prasabhaṁ dānavairjetuṁ na śakyā gaṇanāyakāḥ

'आकाशचारी, मायावी, महाबली योगी - इन गणनायकों को दानव बलपूर्वक जीत नहीं सकते।'

श्लोक 4 (skanda.8.132.4)

प्रायेण बलवन्तोपि ह्युपायेनैव साधवः । कार्येष्वादौ प्रवर्तन्ते पश्चात्तु विपरीतवत्

prāyeṇa balavantopi hyupāyenaiva sādhavaḥ | kāryeṣvādau pravartante paścāttu viparītavat

'प्रायः बलवान् भी सज्जन उपाय से ही कार्यों में आरम्भ करते हैं; अन्यथा पीछे विपरीत परिणाम होता है।'

श्लोक 5 (skanda.8.132.5)

तदुपायं समास्थाय विशेषेण समाहिताः । प्रमथान् संप्रबाधाम यथा वा रुचितं तव

tadupāyaṁ samāsthāya viśeṣeṇa samāhitāḥ | pramathān saṁprabādhāma yathā vā rucitaṁ tava

'उस उपाय को अपनाकर, विशेष रूप से सावधान होकर, हम प्रमथों को पीड़ित करें, या जैसा आपको रुचे।'

श्लोक 6 (skanda.8.132.6)

स त्वमस्मज्जयप्रेप्सुर्दानवानां जयाय च । कुरु देव गिरिव्यूहं परव्यूहविदारणम्

sa tvamasmajjayaprepsurdānavānāṁ jayāya ca | kuru deva girivyūhaṁ paravyūhavidāraṇam

'हे देव! हमारी और दानवों की विजय चाहनेवाले आप, शत्रु के व्यूह को विदीर्ण करनेवाला पर्वत-व्यूह रचिये।'

श्लोक 7 (skanda.8.132.7)

के चेमे सूर्यकोटीनां प्रभावर्णवपुर्धराः । प्रमथानीकमध्येषु स्थिताः पश्यन्ति मां मुहुः

ke ceme sūryakoṭīnāṁ prabhāvarṇavapurdharāḥ | pramathānīkamadhyeṣu sthitāḥ paśyanti māṁ muhuḥ

'और करोड़ों सूर्यों की प्रभा और वर्णवाले, प्रमथ-सेना के बीच खड़े होकर बार-बार मुझे देखनेवाले ये कौन हैं?'

श्लोक 8 (skanda.8.132.8)

सनत्कुमार उवाच । ततोन्धकवचः श्रुत्वा क्रुद्धो दैत्यपुरोहितः । उवाच दैत्याधिपतिं गोपतिं दर्शयन्निव

sanatkumāra uvāca | tatondhakavacaḥ śrutvā kruddho daityapurohitaḥ | uvāca daityādhipatiṁ gopatiṁ darśayanniva

सनत्कुमार बोले - तब अन्धक का वचन सुनकर क्रुद्ध हुए दैत्यपुरोहित ने, मानो एक-एक करके दिखाते हुए, दैत्याधिपति से कहा।

श्लोक 9 (skanda.8.132.9)

शुक्र उवाच । य एष मधुपिङ्गाक्षस्त्र्यम्बकश्चन्द्रभूषणः । व्याघ्रचर्माम्बरधरो देव एष पिनाकधृक्

śukra uvāca | ya eṣa madhupiṅgākṣastryambakaścandrabhūṣaṇaḥ | vyāghracarmāmbaradharo deva eṣa pinākadhṛk

शुक्र बोले - यह जो मधु-सा भूरा नेत्रोंवाला, त्रिनेत्र, चन्द्र-भूषित, व्याघ्रचर्म धारण किये है, यह पिनाकधारी देव है।

श्लोक 10 (skanda.8.132.10)

यस्त्वेष कपिसिंहास्यो नीलवस्त्रश्चतुर्भुजः । तरुणार्कसमो भाति नन्द्येष गणनायकः

yastveṣa kapisiṁhāsyo nīlavastraścaturbhujaḥ | taruṇārkasamo bhāti nandyeṣa gaṇanāyakaḥ

'और यह जो वानर-सिंहमुखी, नीलवस्त्रधारी, चतुर्भुज, नवोदित सूर्य के समान शोभित है, यह गणनायक नन्दी है।'

श्लोक 11 (skanda.8.132.11)

तनुरुच्चोग्निसंकाशो य एषोग्निरिवोज्ज्वलः । ब्राह्मणाधिपतिर्ह्येष बृहद्बुद्धिर्बृहस्पतिः

tanuruccognisaṁkāśo ya eṣognirivojjvalaḥ | brāhmaṇādhipatirhyeṣa bṛhadbuddhirbṛhaspatiḥ

'ऊँचे कद, अग्नि-सदृश तेजस्वी, अग्नि की भाँति प्रज्वलित यह - ब्राह्मणों का स्वामी, विशाल बुद्धिवाला बृहस्पति है।'

श्लोक 12 (skanda.8.132.12)

य एष नातिदूरस्थो वृषकेतोस्त्रिशूलधृक् । एषोन्धक महाकायो महागणपतिर्वरः

ya eṣa nātidūrastho vṛṣaketostriśūladhṛk | eṣondhaka mahākāyo mahāgaṇapatirvaraḥ

'हे अन्धक! वृषभध्वज के निकट खड़ा त्रिशूलधारी यह - महाकाय, श्रेष्ठ महागणपति है।'

श्लोक 13 (skanda.8.132.13)

यैष आस्थाय कूजन्तं भाति चित्रकलापिनम् । मयूरं बालसूर्याभः शक्तिपाणिर्महाबलः

yaiṣa āsthāya kūjantaṁ bhāti citrakalāpinam | mayūraṁ bālasūryābhaḥ śaktipāṇirmahābalaḥ

'बोलते हुए विचित्र पंखवाले मयूर पर सवार, बालसूर्य के समान तेजस्वी, हाथ में शक्ति लिये यह महाबली।'

श्लोक 14 (skanda.8.132.14)

ब्रह्मण्यो ब्रह्मनिरतो ब्रह्मचारी यतव्रतः । स्कन्द एष हि देवानामग्रणीर्दानवा रणे

brahmaṇyo brahmanirato brahmacārī yatavrataḥ | skanda eṣa hi devānāmagraṇīrdānavā raṇe

'ब्राह्मणभक्त, ब्रह्म में लीन, ब्रह्मचारी, संयतव्रत - हे दानव! युद्ध में देवताओं में अग्रणी यही स्कन्द है।'

श्लोक 15 (skanda.8.132.15)

य एष ताम्रचूडस्थस्ताम्रचूडशिलाप्रभः । शक्तिमुल्लोलयन् भाति तोयदस्तडितं यथा

ya eṣa tāmracūḍasthastāmracūḍaśilāprabhaḥ | śaktimullolayan bhāti toyadastaḍitaṁ yathā

'ताम्रचूड़ पर बैठा, ताम्रचूड़ शिला के समान कान्तिवाला, शक्ति को हिलाता हुआ यह मेघ में बिजली के समान चमकता है।'

श्लोक 16 (skanda.8.132.16)

काकपक्षधरो ह्येष पूर्णचन्द्रनिभाननः । विशाखो नाम कौमारः कौमारब्रह्मचर्यवान्

kākapakṣadharo hyeṣa pūrṇacandranibhānanaḥ | viśākho nāma kaumāraḥ kaumārabrahmacaryavān

'काकपक्ष धारण किये, पूर्णचन्द्र के समान मुखवाला यह - बाल्यकाल से ब्रह्मचारी विशाख नामक कुमार है।'

श्लोक 17 (skanda.8.132.17)

तरुणस्तरुणप्रज्ञस्तरुः शाखायुतो यथा । स्वाहायास्तनयो ह्येष शाखो नाम महाद्युतिः

taruṇastaruṇaprajñastaruḥ śākhāyuto yathā | svāhāyāstanayo hyeṣa śākho nāma mahādyutiḥ

'युवा, युवा-बुद्धि, शाखाओंवाले वृक्ष के समान - यह स्वाहा का महातेजस्वी पुत्र, शाख नामक है।'

श्लोक 18 (skanda.8.132.18)

एतस्य यो ह्यसौ पार्श्वं सव्यमावृत्य तिष्ठति । दर्शयानः प्रदेशिन्या माञ्च त्वाञ्च पुनःपुनः

etasya yo hyasau pārśvaṁ savyamāvṛtya tiṣṭhati | darśayānaḥ pradeśinyā māñca tvāñca punaḥpunaḥ

'और इसके बायें पार्श्व की ओर मुड़कर खड़ा हुआ, अपनी तर्जनी उँगली से बार-बार मुझे और तुम्हें दिखलाता हुआ -'

श्लोक 19 (skanda.8.132.19)

मेषमास्थाय बलवान् बाल एव व्यवस्थितः । नैगमेष इति ख्यात एषोन्धक हरात्मजः

meṣamāsthāya balavān bāla eva vyavasthitaḥ | naigameṣa iti khyāta eṣondhaka harātmajaḥ

'- मेढ़े पर सवार, बलवान्, बालरूप में स्थित, हे अन्धक! यह हर का पुत्र नैगमेष नाम से विख्यात है।'

श्लोक 20 (skanda.8.132.20)

चतुर्भिरेष पुत्रैस्तु दृश्यतेसुरहा वृतः । देवैश्चतुर्भिः संपृक्तो यथैव हि पितामहः

caturbhireṣa putraistu dṛśyatesurahā vṛtaḥ | devaiścaturbhiḥ saṁpṛkto yathaiva hi pitāmahaḥ

'यह असुरसंहारक अपने चार पुत्रों से घिरा दिखाई देता है, ठीक वैसे ही जैसे पितामह (ब्रह्मा) चार [कुमारों] से युक्त।'

श्लोक 21 (skanda.8.132.21)

देवमीशं महेष्वासं नन्दिसूनुपुरस्सरम् । व्यतियुध्या सुरश्रेष्ठ मन्मन्त्रपरिपालितः

devamīśaṁ maheṣvāsaṁ nandisūnupurassaram | vyatiyudhyā suraśreṣṭha manmantraparipālitaḥ

'हे असुरश्रेष्ठ! नन्दि-पुत्र को आगे किये उस महाधनुर्धर ईश्वर देव से, मेरे मन्त्र से रक्षित होकर युद्ध करो।'

श्लोक 22 (skanda.8.132.22)

प्रमथैर्निहतान् दैत्यान् शतशोथ सहस्रशः । अहमुत्थापयिष्यामि शस्यानि जलदो यथा

pramathairnihatān daityān śataśotha sahasraśaḥ | ahamutthāpayiṣyāmi śasyāni jalado yathā

'प्रमथों द्वारा सैकड़ों-हजारों मारे गये दैत्यों को मैं उसी प्रकार पुनर्जीवित करूँगा जैसे मेघ फसलों को [पुनर्जीवित करते हैं]।'

श्लोक 23 (skanda.8.132.23)

सनत्कुमार उवाच । तं भार्गव इति प्रोच्य दानवान् दानवाधिपम् । गिरिव्यूहेन तत्सैन्यं प्राक्रमद् व्यूहितुं ततः

sanatkumāra uvāca | taṁ bhārgava iti procya dānavān dānavādhipam | girivyūhena tatsainyaṁ prākramad vyūhituṁ tataḥ

सनत्कुमार बोले - उस दानवाधिपति को 'भार्गव' कहकर सम्बोधित करके, उस दानव ने फिर उस सेना को पर्वत-व्यूह से सजाना आरम्भ किया।

श्लोक 24 (skanda.8.132.24)

मूलेन्धकरथं कृत्वा सान्धकं साश्वसारथिम् । पादातैर्बहुसाहस्रैः पादान् तस्य चकार ह

mūlendhakarathaṁ kṛtvā sāndhakaṁ sāśvasārathim | pādātairbahusāhasraiḥ pādān tasya cakāra ha

अन्धक के रथ को, अन्धक, घोड़ों और सारथि सहित, मूल बनाकर, हजारों पैदल सैनिकों से उसने उस [व्यूह] के पैर बनाये।

श्लोक 25 (skanda.8.132.25)

तेषु पादसहस्रेषु गिरिव्यूहस्य दानवैः । वृक्षशैलशिलासंघान् कारयमास भार्गवः

teṣu pādasahasreṣu girivyūhasya dānavaiḥ | vṛkṣaśailaśilāsaṁghān kārayamāsa bhārgavaḥ

उन हजारों पैरों में भार्गव ने पर्वत-व्यूह के लिये दानवों द्वारा वृक्षों, पर्वतों और शिलाओं के समूह बनवाये।

श्लोक 26 (skanda.8.132.26)

कोटिभिर्दशभिस्तस्य दानवानां महात्मनाम् । नितम्बाँस्ताम्रनयनान् प्रचकार ग्रहेश्वरः

koṭibhirdaśabhistasya dānavānāṁ mahātmanām | nitambā~stāmranayanān pracakāra graheśvaraḥ

उन महात्मा दानवों में से दस करोड़ ताम्रनेत्रधारियों से ग्रहेश्वर (शुक्र) ने [व्यूह की] घाटियाँ बनायीं।

श्लोक 27 (skanda.8.132.27)

धातुनिष्यन्दचित्रेषु नितम्बेष्वपि दानवान् । तृणवत् क्षुपवच्चापि स्थापयामास भार्गवः

dhātuniṣyandacitreṣu nitambeṣvapi dānavān | tṛṇavat kṣupavaccāpi sthāpayāmāsa bhārgavaḥ

धातु-प्रवाह से चित्रित उन घाटियों में भी भार्गव ने दानवों को घास और झाड़ियों के समान स्थापित किया।

श्लोक 28 (skanda.8.132.28)

त्रिंशता कोटिभिश्चापि त्रिदशाधिपविद्विषाम् । गिरिव्यूहस्य शृङ्गाणि चकारार्कसमप्रभः

triṁśatā koṭibhiścāpi tridaśādhipavidviṣām | girivyūhasya śṛṅgāṇi cakārārkasamaprabhaḥ

सूर्य के समान तेजस्वी शुक्र ने तीस करोड़ त्रिदशाधिप-शत्रुओं से पर्वत-व्यूह के शिखर बनाये।

श्लोक 29 (skanda.8.132.29)

तेषु शृङ्गेषु तुङ्गेषु दानवान्सायुधानथ । अमी प्रपाता इत्येवमाचख्यौ भृगुनन्दनः

teṣu śṛṅgeṣu tuṅgeṣu dānavānsāyudhānatha | amī prapātā ityevamācakhyau bhṛgunandanaḥ

उन ऊँचे शिखरों पर सशस्त्र दानवों को रखकर भृगुनन्दन ने कहा - ये प्रपात (खड़ी चट्टानें) हैं।

श्लोक 30 (skanda.8.132.30)

ते प्रपातस्थिता दैत्या नीलाम्बुधरवर्चसः । शस्त्रतोयानि मुदिताः क्षरन्त इव संस्थिताः

te prapātasthitā daityā nīlāmbudharavarcasaḥ | śastratoyāni muditāḥ kṣaranta iva saṁsthitāḥ

उन प्रपातों पर स्थित, नील मेघों के समान कान्तिवाले वे दैत्य, प्रसन्न होकर मानो अस्त्र-जल बरसाते हुए-से खड़े थे।

श्लोक 31 (skanda.8.132.31)

बलस्था ये जवोपेता दैत्या दैवतकण्टकाः । श्येनवत्ते भ्रमित्वा तु निलीनाः स्युर्गिरिव्रजे

balasthā ye javopetā daityā daivatakaṇṭakāḥ | śyenavatte bhramitvā tu nilīnāḥ syurgirivraje

देवताओं के कंटकस्वरूप जो वेगयुक्त बलशाली दैत्य थे, वे बाज पक्षी की भाँति चक्कर लगाकर पर्वत-घेरे में छिप जाते थे।

श्लोक 32 (skanda.8.132.32)

निवातकवचान् सर्वान् विविधायुधधारिणः । अकरोद् भार्गवो देवो गिरिव्यूहस्य सानुवत्

nivātakavacān sarvān vividhāyudhadhāriṇaḥ | akarod bhārgavo devo girivyūhasya sānuvat

विविध अस्त्रधारी समस्त निवातकवचों को भार्गव देव ने पर्वत-व्यूह की चोटियों के रूप में बना दिया।

श्लोक 33 (skanda.8.132.33)

प्रह्रादमथ संह्रादमनुह्रादं शिनिं तथा । जम्भं कुजम्भं तारञ्च मयं नमुचिमेव च

prahrādamatha saṁhrādamanuhrādaṁ śiniṁ tathā | jambhaṁ kujambhaṁ tārañca mayaṁ namucimeva ca

प्रह्लाद, संह्लाद, अनुह्लाद, तथा शिनि; जम्भ, कुजम्भ, तार, मय, तथा नमुचि को भी -

श्लोक 34 (skanda.8.132.34)

विरोचनं बलिं बाणं वातं कार्तस्वनं कुशम् । शम्भुं च भावयत्यं च इल्वकं विल्वकं तथा

virocanaṁ baliṁ bāṇaṁ vātaṁ kārtasvanaṁ kuśam | śambhuṁ ca bhāvayatyaṁ ca ilvakaṁ vilvakaṁ tathā

विरोचन, बलि, बाण, वात, कार्तस्वन, कुश; शम्भु, भावयत्य, इल्वक, तथा विल्वक को -

श्लोक 35 (skanda.8.132.35)

वितं वृत्तं तुहुण्डं च हुण्डं दण्डं च दानवम् । अञ्जनं रुषणं राहुं स्वर्भानुमजकं गजम्

vitaṁ vṛttaṁ tuhuṇḍaṁ ca huṇḍaṁ daṇḍaṁ ca dānavam | añjanaṁ ruṣaṇaṁ rāhuṁ svarbhānumajakaṁ gajam

वित, वृत्त, तुहुण्ड, हुण्ड, दानव दण्ड; अंजन, रुषण, राहु, स्वर्भानु, अजक, गज को -

श्लोक 36 (skanda.8.132.36)

हस्तिदुर्योधनौ चैव पाकं धुन्धुञ्च दानवम् । एतांश्चान्यांश्च बलिनो दैत्यान्दैवतकण्टकान्

hastiduryodhanau caiva pākaṁ dhundhuñca dānavam | etāṁścānyāṁśca balino daityāndaivatakaṇṭakān

हस्ति और दुर्योधन को, पाक और दानव धुन्धु को - इन्हें और अन्य बलशाली, देवताओं के कंटकस्वरूप दैत्यों को -

श्लोक 37 (skanda.8.132.37)

व्यूहं रक्षत युध्यध्वमित्युवाचासुराधिपः । हिमवानिव शैलेन्द्रो विन्ध्यो वाद्भुतगह्वरः

vyūhaṁ rakṣata yudhyadhvamityuvācāsurādhipaḥ | himavāniva śailendro vindhyo vādbhutagahvaraḥ

- 'व्यूह की रक्षा करो, युद्ध करो' यह कहा उस असुराधिपति ने, जो पर्वतराज हिमालय या अद्भुत गुफाओंवाले विन्ध्य के समान था।

श्लोक 38 (skanda.8.132.38)

स गिरिव्यूह आभाति शस्त्रकण्टकितद्रुमः । अन्धकारमिवैकस्थं मेघानामिव संचयम्

sa girivyūha ābhāti śastrakaṇṭakitadrumaḥ | andhakāramivaikasthaṁ meghānāmiva saṁcayam

वह पर्वत-व्यूह, शस्त्रों से कंटकित वृक्षोंवाला, अंधकार के एक समूह के समान, या मेघों के संचय के समान दिखाई देता था।

श्लोक 39 (skanda.8.132.39)

दृष्ट्वा दृष्ट्वा गिरिव्यूहं प्रमथा विस्मयं ययुः । पर्वतव्यूहमालोक्य पर्वतव्यूहसंस्थिताः

dṛṣṭvā dṛṣṭvā girivyūhaṁ pramathā vismayaṁ yayuḥ | parvatavyūhamālokya parvatavyūhasaṁsthitāḥ

उस पर्वत-व्यूह को बार-बार देखकर, तथा उसके सामने पर्वत-व्यूह में ही स्थित होकर, प्रमथगण विस्मित हो गये।

श्लोक 40 (skanda.8.132.40)

नेदुस्तेसुरशार्दूला मेघा लोकात्यये यथा । ऊचुश्च न हि शक्योयं भेत्तुं देवैस्सवासवैः

nedustesuraśārdūlā meghā lokātyaye yathā | ūcuśca na hi śakyoyaṁ bhettuṁ devaissavāsavaiḥ

वे असुरशार्दूल प्रलयकालीन मेघों की भाँति गरजे और बोले - इसे वासव सहित देवता भी भेद नहीं सकते।

श्लोक 41 (skanda.8.132.41)

प्रमथाः किं करिष्यन्ति स्वल्पवीर्यपराक्रमाः । जीवयिष्यति नः शुक्रो मृतानपि न संशयः । युध्यध्वं दानवश्रेष्ठा निश्शङ्कैरन्तरात्मभिः

pramathāḥ kiṁ kariṣyanti svalpavīryaparākramāḥ | jīvayiṣyati naḥ śukro mṛtānapi na saṁśayaḥ | yudhyadhvaṁ dānavaśreṣṭhā niśśaṅkairantarātmabhiḥ

'अल्प बल-पराक्रमवाले प्रमथ क्या करेंगे? शुक्र हमें मरने पर भी निःसंदेह पुनर्जीवित कर देंगे। हे दानवश्रेष्ठो! निःशंक अंतःकरण से युद्ध करो।'

श्लोक 42 (skanda.8.132.42)

सनत्कुमार उवाच । गिरिव्यूहं ततो दृष्ट्वा भार्गवोत्तमनिर्मितम् । देवः कपर्दी प्राहेदं बृहद्बुद्धिं बृहस्पतिम्

sanatkumāra uvāca | girivyūhaṁ tato dṛṣṭvā bhārgavottamanirmitam | devaḥ kapardī prāhedaṁ bṛhadbuddhiṁ bṛhaspatim

सनत्कुमार बोले - उस भार्गवश्रेष्ठ द्वारा निर्मित पर्वत-व्यूह को देखकर देव कपर्दी ने विशाल बुद्धिवाले बृहस्पति से यह कहा।

श्लोक 43 (skanda.8.132.43)

देवदेव उवाच । वाचस्पते गिरिव्यूहं पश्य शुक्रेण निर्मितम् । शृङ्गवन्तं दरीवन्तं हिमवन्तं यथा गिरिम्

devadeva uvāca | vācaspate girivyūhaṁ paśya śukreṇa nirmitam | śṛṅgavantaṁ darīvantaṁ himavantaṁ yathā girim

देवदेव बोले - हे वाचस्पते! शुक्र द्वारा निर्मित इस पर्वत-व्यूह को देखो, जो हिमवान् पर्वत के समान शिखरों और गुफाओंवाला है।

श्लोक 44 (skanda.8.132.44)

लोकान् सजलपातालान् सविष्णून् सपितामहान् । ग्रसेदेष गिरिव्यूह उपेक्षा क्रियते यदि

lokān sajalapātālān saviṣṇūn sapitāmahān | grasedeṣa girivyūha upekṣā kriyate yadi

'यदि इसकी उपेक्षा की जाये, तो यह पर्वत-व्यूह जल-पाताल सहित, विष्णु सहित, ब्रह्मा सहित सम्पूर्ण लोकों को निगल जायेगा।'

श्लोक 45 (skanda.8.132.45)

नैनं देवा न गन्धर्वा न नागा न नगास्तथा । शक्नुयुर्भेत्तुमुद्युक्ता विनैतान् गणनायकान्

nainaṁ devā na gandharvā na nāgā na nagāstathā | śaknuyurbhettumudyuktā vinaitān gaṇanāyakān

'न देवता, न गन्धर्व, न नाग, न पर्वत भी - उद्यम करने पर भी इन गणनायकों के बिना इसे भेद नहीं सकते।'

श्लोक 46 (skanda.8.132.46)

गिरिव्यूहस्य विप्रेन्द्र नान्यं पश्यामि भेदनम् । वज्रव्यूहमृते धीमन् सर्वव्यूहभिदं महत्

girivyūhasya viprendra nānyaṁ paśyāmi bhedanam | vajravyūhamṛte dhīman sarvavyūhabhidaṁ mahat

'हे विप्रेन्द्र, हे बुद्धिमान्! सर्वव्यूह-भेदक महान् वज्रव्यूह के बिना मुझे इस पर्वत-व्यूह को भेदने का अन्य उपाय नहीं दिखता।'

श्लोक 47 (skanda.8.132.47)

स त्वं ब्रह्मविदां श्रेष्ठ गिरिव्यूहविदारणम् । वज्रव्यूदहं कुरुष्वाद्य प्रमथायुतसंवृतम्

sa tvaṁ brahmavidāṁ śreṣṭha girivyūhavidāraṇam | vajravyūdahaṁ kuruṣvādya pramathāyutasaṁvṛtam

'हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ! तुम आज दस हजार प्रमथों से घिरा, पर्वत-व्यूह को विदीर्ण करनेवाला वज्र-व्यूह रचो।'

श्लोक 48 (skanda.8.132.48)

सनत्कुमार उवाच । शम्भुना चैवमुक्तस्तु ब्राह्मणेन्द्रो बृहस्पतिः । वज्रव्यूहेन तं व्यूह प्रत्यव्यूहत्तदा नवम्

sanatkumāra uvāca | śambhunā caivamuktastu brāhmaṇendro bṛhaspatiḥ | vajravyūhena taṁ vyūha pratyavyūhattadā navam

सनत्कुमार बोले - शम्भु द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर ब्राह्मणेन्द्र बृहस्पति ने तब उस व्यूह के प्रत्युत्तर में नया वज्र-व्यूह रचा।

श्लोक 49 (skanda.8.132.49)

बाहुजान् बहुसाहस्रान् भक्ताँश्चैव गणाधिपान् । वज्रव्यूहस्य मध्ये वै स्थापयामास बुद्धिमान्

bāhujān bahusāhasrān bhaktā~ścaiva gaṇādhipān | vajravyūhasya madhye vai sthāpayāmāsa buddhimān

उस बुद्धिमान् ने भुजाओं से उत्पन्न, अनेक सहस्र भक्त गणाधिपों को वज्र-व्यूह के मध्य में स्थापित किया।

श्लोक 50 (skanda.8.132.50)

स्कन्दस्य पार्षदैः शूरैः सुरासुरनिघातिभिः । सहस्र पर्वणां तस्य वज्रव्यूहस्य निर्ममौ

skandasya pārṣadaiḥ śūraiḥ surāsuranighātibhiḥ | sahasra parvaṇāṁ tasya vajravyūhasya nirmamau

देव-असुरों के संहारक स्कन्द के शूर पार्षदों से उस वज्र-व्यूह के हजार पर्व बनाये।

श्लोक 51 (skanda.8.132.51)

कोटिं कोटिप्रवीराणां प्रमथानां प्रहारिणाम् । वज्रधारासु सर्वासु स्थापयामास स द्विजः

koṭiṁ koṭipravīrāṇāṁ pramathānāṁ prahāriṇām | vajradhārāsu sarvāsu sthāpayāmāsa sa dvijaḥ

उस द्विज ने करोड़ों प्रवीर, प्रहारक प्रमथों को वज्र की समस्त धाराओं पर स्थापित किया।

श्लोक 52 (skanda.8.132.52)

कुमारञ्च विशाखञ्च शाखं छागमुखं तथा । चकार सोङगिरा देवो वज्रव्यूहस्य कुड्मलम्

kumārañca viśākhañca śākhaṁ chāgamukhaṁ tathā | cakāra soṅagirā devo vajravyūhasya kuḍmalam

अंगिरा-पुत्र उस देव ने कुमार, विशाख, शाख, तथा छागमुख (नैगमेष) को वज्र-व्यूह की कली बनाया।

श्लोक 53 (skanda.8.132.53)

कुड्मलाग्रे चतुर्बाहुः कपीन्द्रवदनोरिहा । स्थितो वज्रोद्यतकरो नन्दी दिनकरप्रभः

kuḍmalāgre caturbāhuḥ kapīndravadanorihā | sthito vajrodyatakaro nandī dinakaraprabhaḥ

उस कली के अग्रभाग में चतुर्भुज, वानरराज-मुख, सूर्य के समान तेजस्वी नन्दी हाथ में वज्र उठाये खड़े थे।

श्लोक 54 (skanda.8.132.54)

कुण्डोदरं नन्दिषेणं घण्टाकर्णं महोदरम् । पश्चार्धे तस्य वज्रस्य कुड्मलं सन्न्यवेशयत्

kuṇḍodaraṁ nandiṣeṇaṁ ghaṇṭākarṇaṁ mahodaram | paścārdhe tasya vajrasya kuḍmalaṁ sannyaveśayat

कुण्डोदर, नन्दिषेण, घण्टाकर्ण, और महोदर को उस वज्र के पिछले आधे भाग की कली में स्थापित किया।

श्लोक 55 (skanda.8.132.55)

सोमनन्दी तु तस्याग्रे व्याघ्रवक्त्रो गणेश्वरः । सार्कचन्द्रायुतप्रख्यः स्थितो वै पट्टिशायुधः

somanandī tu tasyāgre vyāghravaktro gaṇeśvaraḥ | sārkacandrāyutaprakhyaḥ sthito vai paṭṭiśāyudhaḥ

किन्तु व्याघ्रमुखी गणेश्वर सोमनन्दी, दस हजार सूर्य-चन्द्रों के समान तेजस्वी, पट्टिश शस्त्र लिये उसके अग्रभाग में खड़े थे।

श्लोक 56 (skanda.8.132.56)

रुद्राणां द्वारपालाश्च रुद्रा रुद्रसुताश्च ये । इतश्चेतश्च विन्यस्ता वज्रव्यूहाभिरक्षिणः

rudrāṇāṁ dvārapālāśca rudrā rudrasutāśca ye | itaścetaśca vinyastā vajravyūhābhirakṣiṇaḥ

रुद्रों के द्वारपाल, रुद्रगण, और रुद्रपुत्र भी इधर-उधर वज्र-व्यूह के रक्षक के रूप में तैनात थे।

श्लोक 57 (skanda.8.132.57)

वज्रव्यूहस्य मध्ये तु रथवर्ये प्रतिष्ठितः । तस्थावीशो भवः शर्वः कपर्दी नीललोहितः

vajravyūhasya madhye tu rathavarye pratiṣṭhitaḥ | tasthāvīśo bhavaḥ śarvaḥ kapardī nīlalohitaḥ

वज्र-व्यूह के मध्य में श्रेष्ठ रथ पर प्रतिष्ठित होकर वे ईश भव शर्व कपर्दी नीललोहित खड़े थे।

श्लोक 58 (skanda.8.132.58)

तस्य केतुर्महाञ्छ्वेतो विभातीन्द्रध्वजोपमः । मन्दरश्चन्द्रबिम्बेन जुष्टश्रृङ्ग इवाचलः

tasya keturmahāñchveto vibhātīndradhvajopamaḥ | mandaraścandrabimbena juṣṭaśrṛṅga ivācalaḥ

उनका महान् श्वेत ध्वज इन्द्रध्वज के समान चमकता था, मानो चन्द्रबिम्ब से युक्त शिखरवाला मन्दराचल हो।

श्लोक 59 (skanda.8.132.59)

शतधारो नैकपर्वा चारुशोभितकुड्मलः । वज्रव्यूहो गिरिव्यूहं भेत्तु काम इवाभवत्

śatadhāro naikaparvā cāruśobhitakuḍmalaḥ | vajravyūho girivyūhaṁ bhettu kāma ivābhavat

सौ धारोंवाला, अनेक पर्वोंवाला, सुन्दर सजी कलीवाला वह वज्र-व्यूह मानो पर्वत-व्यूह को भेदने की इच्छा से युक्त हो गया।

श्लोक 60 (skanda.8.132.60)

तं दृष्ट्वा निर्मितं व्यूहं देवगन्धर्वगुह्यकाः । साधुसाध्विति वै नेदुर्विस्मयोत्फुल्ललोचनाः

taṁ dṛṣṭvā nirmitaṁ vyūhaṁ devagandharvaguhyakāḥ | sādhusādhviti vai nedurvismayotphullalocanāḥ

उस रचे गये व्यूह को देखकर देव, गन्धर्व और गुह्यक विस्मय से फैली हुई आँखों के साथ 'साधु, साधु' की ध्वनि करने लगे।

श्लोक 61 (skanda.8.132.61)

अथ गणपबलेषु सिंहनादाः पणवमृदङ्गमशंखनादमिश्राः । दितितनयभयप्रदाः प्रवृत्ताः क्षुभितसमुद्रपयोदनादकल्पाः

atha gaṇapabaleṣu siṁhanādāḥ paṇavamṛdaṅgamaśaṁkhanādamiśrāḥ | dititanayabhayapradāḥ pravṛttāḥ kṣubhitasamudrapayodanādakalpāḥ

फिर गणपतियों की सेनाओं में पणव, मृदंग और शंख की ध्वनियों से मिश्रित सिंहनाद उठने लगे, जो दिति के पुत्रों को भय देनेवाले, क्षुब्ध समुद्र और मेघों की गर्जना के समान थे।

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