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अम्बिका खण्ड · अध्याय 133

गण-युद्ध

अध्याय 132अध्याय-सूचीअध्याय 134

श्लोक 1 (skanda.8.133.1)

सनत्कुमार उवाच । तौ दृष्टवा निर्मितौ व्यूहौ प्रमथासुरयोः सुराः । विमानकोटिभिः शीघ्रं रुरुधुः सर्वतो नभः

sanatkumāra uvāca | tau dṛṣṭavā nirmitau vyūhau pramathāsurayoḥ surāḥ | vimānakoṭibhiḥ śīghraṁ rurudhuḥ sarvato nabhaḥ

सनत्कुमार बोले - प्रमथों और असुरों के उन दोनों रचे गये व्यूहों को देखकर देवताओं ने करोड़ों विमानों से शीघ्र सम्पूर्ण आकाश को घेर लिया।

श्लोक 2 (skanda.8.133.2)

सर्वं तेजोभिराकीर्णं तदम्बरतलं बभौ । मेरुकूटवनं रम्यं दह्यमानमिवाग्निना

sarvaṁ tejobhirākīrṇaṁ tadambaratalaṁ babhau | merukūṭavanaṁ ramyaṁ dahyamānamivāgninā

तेज से पूर्णतः व्याप्त वह आकाश-तल ऐसा शोभित हुआ मानो अग्नि से जलता हुआ मेरु के शिखर का रमणीय वन हो।

श्लोक 3 (skanda.8.133.3)

देवदुन्दुभिशब्दाढ्यं दिव्यस्त्रीशतसंकुलम् । तद्देवमण्डलं भाति यथैवादित्यमण्डलम्

devadundubhiśabdāḍhyaṁ divyastrīśatasaṁkulam | taddevamaṇḍalaṁ bhāti yathaivādityamaṇḍalam

देवताओं की दुंदुभियों की ध्वनि से भरा, सैकड़ों दिव्य स्त्रियों से व्याप्त वह देवमण्डल सूर्यमण्डल के समान शोभित हुआ।

श्लोक 4 (skanda.8.133.4)

दिव्यपुष्पसमाकीर्णं दिव्यगन्धाधिवासितम् । प्रेक्षकैः शतशः पूर्णं खतलं दिव्यमाबभौ

divyapuṣpasamākīrṇaṁ divyagandhādhivāsitam | prekṣakaiḥ śataśaḥ pūrṇaṁ khatalaṁ divyamābabhau

दिव्य पुष्पों से भरा, दिव्य सुगन्ध से सुवासित, सैकड़ों दर्शकों से पूर्ण, आकाश-तल दिव्यरूप में शोभित हुआ।

श्लोक 5 (skanda.8.133.5)

वादित्राण्यभ्यहन्यन्त जगुश्च सुरगायनाः । रम्भाद्या ननृतुश्चापि शुभापाङ्गाः सुराङ्गनाः

vāditrāṇyabhyahanyanta jaguśca suragāyanāḥ | rambhādyā nanṛtuścāpi śubhāpāṅgāḥ surāṅganāḥ

वाद्य बजने लगे, देव-गायक गाने लगे, और शुभ कटाक्षवाली रम्भा आदि देवांगनाएँ भी नाचने लगीं।

श्लोक 6 (skanda.8.133.6)

अथ वज्रगिरिव्यूहौ परस्परजयैषिणौ । समीयतुर्महानादैर्वातोद्धूतौ यथार्णवौ

atha vajragirivyūhau parasparajayaiṣiṇau | samīyaturmahānādairvātoddhūtau yathārṇavau

तब एक-दूसरे पर विजय चाहनेवाले वज्र-व्यूह और पर्वत-व्यूह, वायु से उद्वेलित दो समुद्रों के समान, महान् गर्जना के साथ मिले।

श्लोक 7 (skanda.8.133.7)

मा त्वरध्वमिति प्रोक्ताः शुक्रेण सुमहात्मना । योधा निवार्यमाणापि चक्रुर्युद्धमसंहतम्

mā tvaradhvamiti proktāḥ śukreṇa sumahātmanā | yodhā nivāryamāṇāpi cakruryuddhamasaṁhatam

'शीघ्रता मत करो' - ऐसा महात्मा शुक्र द्वारा कहे जाने पर भी, रोके जाने पर भी, योद्धाओं ने अव्यवस्थित युद्ध छेड़ दिया।

श्लोक 8 (skanda.8.133.8)

ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवा गोविषाणिकाः । आडम्बरा डिण्डिमाश्व मण्डूकाः पणवा ह्यपि

tataḥ śaṁkhāśca bheryaśca paṇavā goviṣāṇikāḥ | āḍambarā ḍiṇḍimāśva maṇḍūkāḥ paṇavā hyapi

तब शंख, भेरी, पणव, गोविषाणिका; आडम्बर, डिंडिम, मण्डूक, और पणव भी -

श्लोक 9 (skanda.8.133.9)

भेर्यो दुन्दुभयश्चापि मृदङ्गाः किंखरानकाः । उभयत्र बले गाढं प्रावाद्यन्त सहस्रशः

bheryo dundubhayaścāpi mṛdaṅgāḥ kiṁkharānakāḥ | ubhayatra bale gāḍhaṁ prāvādyanta sahasraśaḥ

- भेरी, दुंदुभि, मृदंग, किंखरानक भी - दोनों सेनाओं में सघनता से हजारों की संख्या में बजाये जाने लगे।

श्लोक 10 (skanda.8.133.10)

ततः सुरगणैर्नादाः सह गन्धर्वचारणैः । कृतास्तूर्यरवं श्रुत्वा प्रमथासुरसैन्ययोः

tataḥ suragaṇairnādāḥ saha gandharvacāraṇaiḥ | kṛtāstūryaravaṁ śrutvā pramathāsurasainyayoḥ

तब गन्धर्वों और चारणों सहित देवगणों द्वारा किये गये उन शब्दों को, तथा वाद्यों की ध्वनि को प्रमथ और असुर दोनों सेनाओं ने सुना।

श्लोक 11 (skanda.8.133.11)

बलयोस्तूर्यशब्देन देवसिंहरवेण च । मन्दरे रुरुवुर्घोरं सिंहशार्दूलकुञ्जराः

balayostūryaśabdena devasiṁharaveṇa ca | mandare ruruvurghoraṁ siṁhaśārdūlakuñjarāḥ

दोनों सेनाओं की वाद्य-ध्वनि से और देवताओं के सिंहनाद से मन्दराचल पर सिंह, बाघ और हाथी घोर गर्जना करने लगे।

श्लोक 12 (skanda.8.133.12)

तूर्यारसितब्देन तेन तेमितविक्रमाः । अभिन्दन्तः स्वकं व्यूहं युयुधुः प्रमथासुराः

tūryārasitabdena tena temitavikramāḥ | abhindantaḥ svakaṁ vyūhaṁ yuyudhuḥ pramathāsurāḥ

उस वाद्य और गर्जना के शब्द से पराक्रम में सिंचित होकर, अपने ही व्यूह को तोड़ते हुए प्रमथ और असुर युद्ध करने लगे।

श्लोक 13 (skanda.8.133.13)

प्रथमे सन्निपाते तु तेषां युद्धे कृतात्मनाम् । अभवद् दारुणो रावो हस्तिनामिव गर्जताम्

prathame sannipāte tu teṣāṁ yuddhe kṛtātmanām | abhavad dāruṇo rāvo hastināmiva garjatām

उन संयतचित्त योद्धाओं के प्रथम संघर्ष में गर्जते हुए हाथियों के समान भयंकर घोष उत्पन्न हुआ।

श्लोक 14 (skanda.8.133.14)

देवासुराः करस्थैस्तु आयुधैस्ते सहस्रशः । विशेषयन्ति युद्धे स्म परस्परजिघांसवः

devāsurāḥ karasthaistu āyudhaiste sahasraśaḥ | viśeṣayanti yuddhe sma parasparajighāṁsavaḥ

वे देव और असुर हाथों में लिये हजारों अस्त्रों से एक-दूसरे को मारने की इच्छा से युद्ध में विशेष रूप से जूझने लगे।

श्लोक 15 (skanda.8.133.15)

तच्छूलवज्रोपलवृक्षबाणदृढप्रहारातिशयातिहर्षम् । विवर्धते पारिषदासुराणां युद्धं युगं तिष्यमिवातिघोरम्

tacchūlavajropalavṛkṣabāṇadṛḍhaprahārātiśayātiharṣam | vivardhate pāriṣadāsurāṇāṁ yuddhaṁ yugaṁ tiṣyamivātighoram

त्रिशूल, वज्र, पत्थर, वृक्ष और बाणों के दृढ़ प्रहारों की अतिशय उमंग से युक्त, पार्षदों और असुरों का वह युद्ध, प्रलयकालीन तिष्य-युग के समान अत्यन्त भयंकर होकर बढ़ने लगा।

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