Skip to main content

अम्बिका खण्ड · अध्याय 134

गण-युद्ध

अध्याय 133अध्याय-सूचीअध्याय 135

श्लोक 1 (skanda.8.134.1)

सनत्कुमार उवाच । संकुले वर्तमाने तु प्रमथासुरसैन्ययोः । श्रूयन्ते कार्मुकरवाः सिंहनादाश्च दारुणाः

sanatkumāra uvāca | saṁkule vartamāne tu pramathāsurasainyayoḥ | śrūyante kārmukaravāḥ siṁhanādāśca dāruṇāḥ

सनत्कुमार बोले - प्रमथ और असुर सेनाओं के बीच घमासान युद्ध होते समय धनुष की टंकार और भयंकर सिंहनाद सुनाई देने लगे।

श्लोक 2 (skanda.8.134.2)

व्याविद्धाङ्गुलयो देवश्चारणोरगगुह्यकाः । नेदुरुद्धूतवस्त्रान्ता युद्धोद्धवकृतस्वनाः

vyāviddhāṅgulayo devaścāraṇoragaguhyakāḥ | neduruddhūtavastrāntā yuddhoddhavakṛtasvanāḥ

अपनी अंगुलियाँ चटकाते हुए देव, चारण, नाग और गुह्यक, वस्त्रों के छोर फड़फड़ाते हुए, युद्ध के उत्साह से उत्पन्न ध्वनि के साथ चिल्लाने लगे।

श्लोक 3 (skanda.8.134.3)

शूरारसितशब्देन तेनोदीरितविक्रमाः । चक्रुः कर्माण्यसह्यानि दर्पिताः प्रमथासुराः

śūrārasitaśabdena tenodīritavikramāḥ | cakruḥ karmāṇyasahyāni darpitāḥ pramathāsurāḥ

वीरों के गर्जन की उस ध्वनि से पराक्रम में उत्तेजित होकर, उद्धत प्रमथ और असुर असहनीय कर्म करने लगे।

श्लोक 4 (skanda.8.134.4)

असिभिर्व्यायितैश्छिन्नाः पट्टिशैर्भिन्नवक्षसः । शरसंकृत्तमर्माणः पतन्ति प्रमथासुराः

asibhirvyāyitaiśchinnāḥ paṭṭiśairbhinnavakṣasaḥ | śarasaṁkṛttamarmāṇaḥ patanti pramathāsurāḥ

बल से चलायी गयी तलवारों से कटे, पट्टिशों से छाती छिन्न, बाणों से मर्मस्थल कटे हुए प्रमथ और असुर गिरने लगे।

श्लोक 5 (skanda.8.134.5)

शिरसां पात्यमानानां बहूनां चोरुभिः सह । राशयस्तत्र दृश्यन्ते प्रमथासुरसंयुगे

śirasāṁ pātyamānānāṁ bahūnāṁ corubhiḥ saha | rāśayastatra dṛśyante pramathāsurasaṁyuge

प्रमथ और असुरों के उस युद्ध में गिराये जाते हुए अनेक मस्तकों और जाँघों के ढेर वहाँ दिखाई देने लगे।

श्लोक 6 (skanda.8.134.6)

भग्नचक्रा विध्वजाश्च विवरूथा विकूबराः । दृश्यन्ते शतशो व्यश्वा हतसारथयो रथाः

bhagnacakrā vidhvajāśca vivarūthā vikūbarāḥ | dṛśyante śataśo vyaśvā hatasārathayo rathāḥ

टूटे पहियोंवाले, ध्वजाहीन, कवचरहित, धुरारहित, घोड़ों से रहित, तथा सारथियों के मारे जाने से रिक्त सैकड़ों रथ दिखाई देने लगे।

श्लोक 7 (skanda.8.134.7)

सपताकाः सकेयूराः सवर्मायुधकेतवः । निष्कृष्टदन्तमुशलाः पतन्ति गजपुङ्गवाः

sapatākāḥ sakeyūrāḥ savarmāyudhaketavaḥ | niṣkṛṣṭadantamuśalāḥ patanti gajapuṅgavāḥ

पताकाओं, केयूरों, कवचों, अस्त्रों और ध्वजाओंसहित, दाँतरूपी मुशल उखड़ जाने से श्रेष्ठ हाथी गिरने लगे।

श्लोक 8 (skanda.8.134.8)

शरप्रहाररुग्णाङ्गाश्चामरापीडकोज्ज्वलाः । ससादिनो निपात्यन्ते हयाः सूर्यहयोपमाः

śaraprahārarugṇāṅgāścāmarāpīḍakojjvalāḥ | sasādino nipātyante hayāḥ sūryahayopamāḥ

बाणों के प्रहार से अंग टूटे हुए, चँवर के मुकुटों से देदीप्यमान, सूर्य के घोड़ों के समान वे अश्व सवारों सहित गिरने लगे।

श्लोक 9 (skanda.8.134.9)

उद्भ्रान्तैस्तुरगैस्त्रस्तैर्दानवैः सरथैरपि । तद्बलं प्रबभौ मत्तं भ्रान्तग्राहार्णवोपमम्

udbhrāntaisturagaistrastairdānavaiḥ sarathairapi | tadbalaṁ prababhau mattaṁ bhrāntagrāhārṇavopamam

भागते हुए घोड़ों और भयभीत दानवों से, रथों सहित, वह उन्मत्त सेना विक्षुब्ध जल-जन्तुओंवाले समुद्र के समान दिखाई देने लगी।

श्लोक 10 (skanda.8.134.10)

वासोभिरातपत्रैश्व मुकुटैर्मणिकुण्डलैः । हारार्धहारैः केयूरैरङ्गुलीयैः स्रगुत्तमैः

vāsobhirātapatraiśva mukuṭairmaṇikuṇḍalaiḥ | hārārdhahāraiḥ keyūrairaṅgulīyaiḥ sraguttamaiḥ

वस्त्रों, छत्रों, मुकुटों, मणिकुण्डलों, हारों, अर्धहारों, केयूरों, अँगूठियों, तथा उत्तम मालाओं से,

श्लोक 11 (skanda.8.134.11)

कराननैः प्रकृत्तैश्च चरणैश्च निपातितैः । युद्धभूमिर्वृता भाति द्यौर्नक्षत्रैरिवोदितैः

karānanaiḥ prakṛttaiśca caraṇaiśca nipātitaiḥ | yuddhabhūmirvṛtā bhāti dyaurnakṣatrairivoditaiḥ

- तथा कटे हुए हाथों, मुखों, और गिरे हुए पैरों से भरी वह युद्धभूमि उदित नक्षत्रों से भरे आकाश के समान शोभित हुई।

श्लोक 12 (skanda.8.134.12)

रुधिरास्राववसना नानाभरणभूषणाः । रक्तवस्त्रावृतैर्गात्रैर्मही मृत्युरिवाबभौ

rudhirāsrāvavasanā nānābharaṇabhūṣaṇāḥ | raktavastrāvṛtairgātrairmahī mṛtyurivābabhau

रक्त बहते वस्त्रोंवाली, नाना आभूषणों से सुसज्जित, रक्तवस्त्र से ढँके अंगोंवाली वह पृथ्वी मानो साक्षात् मृत्यु-सी दिखाई देने लगी।

श्लोक 13 (skanda.8.134.13)

अथ वाजिगजौघानां शोणितोदकवाहिनी । नदी प्रववृते घोरा यमसादनवाहिनी

atha vājigajaughānāṁ śoṇitodakavāhinī | nadī pravavṛte ghorā yamasādanavāhinī

फिर घोड़ों और हाथियों के समूहों के रक्त-जल को बहानेवाली, यमलोक ले जानेवाली भयंकर नदी बह चली।

श्लोक 14 (skanda.8.134.14)

मृगहस्तिखराश्वोष्ट्रमहाग्राहसमाकुला । मांसमेदोयकृत्पंका धनुर्ध्वजशतद्रुमा

mṛgahastikharāśvoṣṭramahāgrāhasamākulā | māṁsamedoyakṛtpaṁkā dhanurdhvajaśatadrumā

मृग, हाथी, गधे, घोड़े, ऊँट और बड़े जल-जन्तुओं से भरी, मांस-मेद-यकृत के कीचड़वाली, धनुष और ध्वज ही जिसके सैकड़ों वृक्ष थे।

श्लोक 15 (skanda.8.134.15)

छिन्नशीर्षोपलशता हस्तपश्वाननोरगा । केशशैवालसंछन्ना धनुर्ज्याशततन्तुका

chinnaśīrṣopalaśatā hastapaśvānanoragā | keśaśaivālasaṁchannā dhanurjyāśatatantukā

कटे हुए सिर ही जिसके सैकड़ों पत्थर थे, हाथ, पशु-मुख और सर्प जिसमें थे, केशरूपी शैवाल से ढँकी, धनुष की डोरियाँ ही जिसके सैकड़ों तन्तु थे।

श्लोक 16 (skanda.8.134.16)

पाण्डराम्बरहर्षा वै मुकुटाटिकुलाकुला । भेरीकच्छपसंकीर्णा वराभरणदर्दुरा

pāṇḍarāmbaraharṣā vai mukuṭāṭikulākulā | bherīkacchapasaṁkīrṇā varābharaṇadardurā

श्वेत वस्त्रों का फेन, मुकुटों की भीड़ ही जिसका बहाव था, भेरियाँ ही जिसके कछुए थे, उत्तम आभूषण ही जिसके मेढक थे।

श्लोक 17 (skanda.8.134.17)

शरमीनसमाकीर्णा खड्गनक्रदुरासदा । रथचक्रमहानक्रा गदयादोविलोडिता

śaramīnasamākīrṇā khaḍganakradurāsadā | rathacakramahānakrā gadayādoviloḍitā

बाणरूपी मछलियों से भरी, तलवाररूपी मगरमच्छों से दुर्गम, रथ-चक्ररूपी बड़े मगरों वाली, गदारूपी जलजन्तुओं से क्षुब्ध।

श्लोक 18 (skanda.8.134.18)

विशीर्णहारसिकता कफसंजातफेनिनी । रक्तोत्पलानां मालेव कौङकुमी स्रगिबोज्झिता

viśīrṇahārasikatā kaphasaṁjātapheninī | raktotpalānāṁ māleva kauṅakumī sragibojjhitā

बिखरे हारों की रेत, कफ से उत्पन्न झाग - मानो केसर से रँगी लाल कमलों की माला हो, जो फेंक दी गयी हो।

श्लोक 19 (skanda.8.134.19)

जिह्वेवोरगराजस्य यमस्याज्ञा इवाद्भुता । भयदा भीरुयोधानां शूराणां हर्षवर्धिनी । प्रवृत्ता रुधिराम्भोभिः स्वर्गलोकवहा नदी

jihvevoragarājasya yamasyājñā ivādbhutā | bhayadā bhīruyodhānāṁ śūrāṇāṁ harṣavardhinī | pravṛttā rudhirāmbhobhiḥ svargalokavahā nadī

सर्पराज की जीभ के समान, यम की अद्भुत आज्ञा के समान वह नदी, कायर योद्धाओं को भयभीत करती और शूरों के हर्ष को बढ़ाती हुई, रक्त-जल से बहती हुई स्वर्गलोक ले जानेवाली बन गयी।

श्लोक 20 (skanda.8.134.20)

संरब्धदैत्येन्द्रविवृद्धधूमं नन्दीश्वराग्निज्वलितान्तरालम् । बभौ बलं सागरतुल्यनादं विनाशि यद्वज्जगदन्तकाले

saṁrabdhadaityendravivṛddhadhūmaṁ nandīśvarāgnijvalitāntarālam | babhau balaṁ sāgaratulyanādaṁ vināśi yadvajjagadantakāle

क्रुद्ध दैत्येन्द्रों से बढ़े धुएँवाली, नन्दीश्वर की अग्नि से भीतर तक प्रज्वलित वह सेना समुद्र के समान गर्जना करती हुई ऐसी शोभित हुई मानो प्रलयकाल में जगत् का विनाश हो रहा हो।

अध्याय 133अध्याय-सूचीअध्याय 135