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अम्बिका खण्ड · अध्याय 135

गण-युद्ध

अध्याय 134अध्याय-सूचीअध्याय 136

श्लोक 1 (skanda.8.135.1)

सनत्कुमार उवाच । विवर्धमाने संग्रामे तस्मिन् पारिषदासुरे । गिरिव्यूहप्रपातस्थाः क्रुद्धा दानवसत्तमाः

sanatkumāra uvāca | vivardhamāne saṁgrāme tasmin pāriṣadāsure | girivyūhaprapātasthāḥ kruddhā dānavasattamāḥ

सनत्कुमार बोले - उस पार्षदों और असुरों के युद्ध के बढ़ते जाने पर, पर्वत-व्यूह के प्रपातों पर स्थित श्रेष्ठ दानव क्रुद्ध हो उठे।

श्लोक 2 (skanda.8.135.2)

ते क्रोधाच्छूलशक्त्यृष्टिं गदावर्षमतन्द्रिताः । ववर्षुः प्रमथानीके वर्षं जलधरा इव

te krodhācchūlaśaktyṛṣṭiṁ gadāvarṣamatandritāḥ | vavarṣuḥ pramathānīke varṣaṁ jaladharā iva

वे क्रोध से, अथकरूप से, त्रिशूल, शक्ति, ऋष्टि और गदाओं की वर्षा प्रमथ-सेना पर उसी प्रकार करने लगे जैसे मेघ वर्षा करते हैं।

श्लोक 3 (skanda.8.135.3)

शस्त्रवर्षण पनतात्ताड्यमाना ह्यनेकशः । अचिन्तयित्वा तत्सर्वं युद्धायैव मनो दधुः

śastravarṣaṇa panatāttāḍyamānā hyanekaśaḥ | acintayitvā tatsarvaṁ yuddhāyaiva mano dadhuḥ

उस गिरते हुए अस्त्र-वर्षा से बार-बार आहत होते हुए भी, उस सबकी चिन्ता किये बिना, उन्होंने युद्ध में ही मन लगाया।

श्लोक 4 (skanda.8.135.4)

मेघाः सस्यानि हि यथा द्विरदाः पादपानिव । पृषतानिव शार्दूलाः शरभा इव वारणान्

meghāḥ sasyāni hi yathā dviradāḥ pādapāniva | pṛṣatāniva śārdūlāḥ śarabhā iva vāraṇān

जैसे मेघ फसलों को, हाथी वृक्षों को, बाघ मृगों को, और शरभ हाथियों को नष्ट करते हैं,

श्लोक 5 (skanda.8.135.5)

वज्रा इव यथा शैलान् कालदूता नरानिव । विध्नानिव च शान्त्यर्था नथानविनया इव

vajrā iva yathā śailān kāladūtā narāniva | vidhnāniva ca śāntyarthā nathānavinayā iva

जैसे वज्र पर्वतों को, कालदूत मनुष्यों को, विघ्न शान्तिकर्मों को, और अविनय सुनीति को नष्ट करते हैं,

श्लोक 6 (skanda.8.135.6)

भावानिव यथा भावा दोषा दोषान्यथापि च । तथा निवातकवचान् शूलशक्त्यृष्टिवृष्टिभिः निजघ्नुः प्रमथाः शूराः शतशोथ सहस्रशः

bhāvāniva yathā bhāvā doṣā doṣānyathāpi ca | tathā nivātakavacān śūlaśaktyṛṣṭivṛṣṭibhiḥ nijaghnuḥ pramathāḥ śūrāḥ śataśotha sahasraśaḥ

जैसे भाव भावों को और दोष दोषों को नष्ट करते हैं, वैसे ही शूर प्रमथों ने त्रिशूल, शक्ति और ऋष्टि की वर्षा से निवातकवचों को सैकड़ों-हजारों की संख्या में मार डाला।

श्लोक 7 (skanda.8.135.7)

शूलनिर्दारितोरस्का मुशलैर्भिन्नमस्तकाः । वज्रावघातम्लानाङ्गा दानवाः पतिता भुवि

śūlanirdāritoraskā muśalairbhinnamastakāḥ | vajrāvaghātamlānāṅgā dānavāḥ patitā bhuvi

त्रिशूलों से छाती फटी हुई, मुशलों से सिर टूटे हुए, वज्र के प्रहार से अंग म्लान हुए दानव पृथ्वी पर गिर पड़े।

श्लोक 8 (skanda.8.135.8)

तेषां निनादाः श्रूयन्ते नदतामतिदारुणाः । संवर्त्तकानां मेघानां नदतामिव सर्वतः

teṣāṁ ninādāḥ śrūyante nadatāmatidāruṇāḥ | saṁvarttakānāṁ meghānāṁ nadatāmiva sarvataḥ

उनकी अत्यन्त भयंकर पुकारें उसी प्रकार सुनाई देती थीं जैसे प्रलयकालीन मेघों की गर्जना चारों ओर सुनाई देती है।

श्लोक 9 (skanda.8.135.9)

इषुभिर्बहुधा विद्धा भग्नत्रिककशेरवः । चेष्टन्ते ह्यसुरा भूमौ भग्नपृष्ठा इवोरगाः

iṣubhirbahudhā viddhā bhagnatrikakaśeravaḥ | ceṣṭante hyasurā bhūmau bhagnapṛṣṭhā ivoragāḥ

बाणों से बहुत प्रकार से बींधे गये, जिनकी कटि और मेरुदण्ड टूट गये थे, वे असुर पृथ्वी पर टूटी पीठवाले सर्पों की भाँति तड़पने लगे।

श्लोक 10 (skanda.8.135.10)

ततोतिकदनं वीक्ष्य शूरास्तत्र महासुराः । निवृत्ताः शतशस्तत्र क्रोधसंरक्तलोचनाः

tatotikadanaṁ vīkṣya śūrāstatra mahāsurāḥ | nivṛttāḥ śataśastatra krodhasaṁraktalocanāḥ

फिर उस अत्यन्त संहार को देखकर वहाँ के शूर महासुर क्रोध से रक्तवर्ण नेत्रोंवाले होकर सैकड़ों की संख्या में लौट पड़े।

श्लोक 11 (skanda.8.135.11)

तैर्भृशं प्रमथास्तेपि विद्धा व्यास त्रपान्विताः । संमीलिताक्षा वृषभा वर्षं निपतितं यथा

tairbhṛśaṁ pramathāstepi viddhā vyāsa trapānvitāḥ | saṁmīlitākṣā vṛṣabhā varṣaṁ nipatitaṁ yathā

हे व्यास! उनके द्वारा अत्यन्त बींधे गये वे प्रमथ भी लज्जा से युक्त होकर, वर्षा में भीगे बैलों की भाँति अपनी आँखें मूँदे रहे।

श्लोक 12 (skanda.8.135.12)

सहन्ते तत्तथा वर्षं प्रमथा दानवेरितम् । ते चापि युद्धं तुमुलं कृत्वान्ते पीडितास्तदा

sahante tattathā varṣaṁ pramathā dānaveritam | te cāpi yuddhaṁ tumulaṁ kṛtvānte pīḍitāstadā

प्रमथ उस दानव-प्रेरित वर्षा को उसी प्रकार सहते रहे; और वे भी तुमुल युद्ध करके अन्ततः पीड़ित हो गये।

श्लोक 13 (skanda.8.135.13)

भग्नाः पराङमुखा जाताश्छिन्नभिन्नांगसन्धयः । तस्मिन् भग्नेथ सैन्ये तु प्रामथे प्रमथोत्तमाः

bhagnāḥ parāṅamukhā jātāśchinnabhinnāṁgasandhayaḥ | tasmin bhagnetha sainye tu prāmathe pramathottamāḥ

टूटकर वे पीठ दिखाने लगे, उनके अंग-संधियाँ कट-छिद गयीं। उस प्रमथ-सेना के भग्न हो जाने पर श्रेष्ठ प्रमथों ने -

श्लोक 14 (skanda.8.135.14)

दश चक्रुर्महावेगं दशनागशतोपमाः । शंकुकर्णश्च बलवान् घण्टाकर्णश्च वीर्यवान्

daśa cakrurmahāvegaṁ daśanāgaśatopamāḥ | śaṁkukarṇaśca balavān ghaṇṭākarṇaśca vīryavān

- दस हाथियों में से सौ के समान बलशाली दस वीरों ने महान् वेग से आक्रमण किया: बलवान् शंकुकर्ण, तथा वीर्यवान् घण्टाकर्ण,

श्लोक 15 (skanda.8.135.15)

महाकालश्च कालाभो नन्दिषेणश्च विश्रुतः । पिङ्गलो लोहिताक्षश्च सोमनन्दी च वीर्यवान्

mahākālaśca kālābho nandiṣeṇaśca viśrutaḥ | piṅgalo lohitākṣaśca somanandī ca vīryavān

काल के समान श्याम महाकाल, विख्यात नन्दिषेण, पिंगल, लोहिताक्ष, तथा वीर्यवान् सोमनन्दी।

श्लोक 16 (skanda.8.135.16)

विनायकश्च नन्दी च । छागः कुण्डोदरः स्कन्दो मयूरवरमास्थितः

vināyakaśca nandī ca | chāgaḥ kuṇḍodaraḥ skando mayūravaramāsthitaḥ

और विनायक, तथा नन्दी - (यहाँ मूल पाठ का एक अंश खण्डित है; इन दोनों के वर्णन का शेष भाग लुप्त है) - छाग, कुण्डोदर, तथा अपने श्रेष्ठ मयूर पर आरूढ़ स्कन्द।

श्लोक 17 (skanda.8.135.17)

एते सह समुन्नेदुः पयोदा इव साम्भसः । विविशुश्चासुरं सैन्यं समुद्रं मकरा इव

ete saha samunneduḥ payodā iva sāmbhasaḥ | viviśuścāsuraṁ sainyaṁ samudraṁ makarā iva

ये सब जल-भरे मेघों के समान एक साथ गरजे, और उस असुर-सेना में समुद्र में मगरमच्छों की भाँति घुस गये।

श्लोक 18 (skanda.8.135.18)

शंकुकर्णहता दैत्या घण्टाकर्णविदारिताः । नन्दिषेणशराभ्यस्ता महाकालप्रकालिताः

śaṁkukarṇahatā daityā ghaṇṭākarṇavidāritāḥ | nandiṣeṇaśarābhyastā mahākālaprakālitāḥ

शंकुकर्ण द्वारा मारे गये, घण्टाकर्ण द्वारा फाड़े गये, नन्दिषेण के बाणों से आहत, और महाकाल द्वारा भस्म किये गये दैत्य,

श्लोक 19 (skanda.8.135.19)

कुण्डोदरगदावेगैश्चूणितास्त्रविभूषणाः । पिङ्गलालोडिता नेशुः स्कन्दशक्तिविदारिताः

kuṇḍodaragadāvegaiścūṇitāstravibhūṣaṇāḥ | piṅgalāloḍitā neśuḥ skandaśaktividāritāḥ

कुण्डोदर की गदा के वेग से जिनके अस्त्र और आभूषण चूर्ण हो गये, पिंगल द्वारा मथे गये, स्कन्द की शक्ति से विदीर्ण होकर नष्ट हो गये।

श्लोक 20 (skanda.8.135.20)

मुष्टिप्रहारभिन्नास्यैस्तलताडितमस्तकैः । अपाहस्तप्रहारैश्च क्षिप्यमाणेरितस्ततः

muṣṭiprahārabhinnāsyaistalatāḍitamastakaiḥ | apāhastaprahāraiśca kṣipyamāṇeritastataḥ

मुक्कों के प्रहार से मुख फटे हुए, थप्पड़ों से सिर पर आहत, तथा हाथ की पीठ के प्रहारों से इधर-उधर फेंके जाते हुए,

श्लोक 21 (skanda.8.135.21)

विशस्त्रवस्त्रकवचैर्मुक्तमुर्द्धजबन्धनैः । प्रभग्नैर्दानवैस्तूर्णं व्यूहभेदो बभूव ह

viśastravastrakavacairmuktamurddhajabandhanaiḥ | prabhagnairdānavaistūrṇaṁ vyūhabhedo babhūva ha

शस्त्र, वस्त्र और कवच से रहित, केश-बन्धन खुले हुए, पूर्णतः भग्न दानवों के कारण शीघ्र ही व्यूह का भेदन हो गया।

श्लोक 22 (skanda.8.135.22)

भिद्यमानो गिरिव्यूहो विबभौ घोरदर्शनः । इन्द्रवज्राहतः पूर्वं यथा विन्ध्यो महागिरिः

bhidyamāno girivyūho vibabhau ghoradarśanaḥ | indravajrāhataḥ pūrvaṁ yathā vindhyo mahāgiriḥ

भेदा जाता हुआ वह पर्वत-व्यूह भयंकर दिखाई देने लगा, मानो पहले इन्द्र के वज्र से आहत विन्ध्य महापर्वत हो।

श्लोक 23 (skanda.8.135.23)

भिन्नव्यूहाँस्ततो दैत्यान् प्रमथा जितकाशिनः । द्रुद्रुवुः शतशो वृक्षान् पक्वाञ्छकुनयो यथा

bhinnavyūhā~stato daityān pramathā jitakāśinaḥ | drudruvuḥ śataśo vṛkṣān pakvāñchakunayo yathā

तब विजयी प्रमथों ने टूटे व्यूहवाले दैत्यों का उसी प्रकार सैकड़ों की संख्या में पीछा किया जैसे पक्षी पके फलोंवाले वृक्षों का पीछा करते हैं।

श्लोक 24 (skanda.8.135.24)

ततः पुनरभूद्युद्धं कोलाहलसमाकुलम् । प्रमथानाञ्च शूराणामसुराणाञ्च दारुणम्

tataḥ punarabhūdyuddhaṁ kolāhalasamākulam | pramathānāñca śūrāṇāmasurāṇāñca dāruṇam

तब फिर से कोलाहल से भरा, शूर प्रमथों और असुरों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 25 (skanda.8.135.25)

सन्निपाते पुनस्तेषां गजानामिव दारुणे । नेदुर्देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च दिवि हर्षिताः

sannipāte punasteṣāṁ gajānāmiva dāruṇe | nedurdevāḥ sagandharvāḥ siddhāśca divi harṣitāḥ

हाथियों के भिड़ने के समान उस भयंकर पुनः-संघर्ष में गन्धर्वों सहित देवता और सिद्धगण आकाश में हर्षित होकर गर्जने लगे।

श्लोक 26 (skanda.8.135.26)

नानाविधास्तूर्यरवास्ततो दानवपार्षदैः । अश्रूयन्त कृता घोरा मेघानां नदतामिव

nānāvidhāstūryaravāstato dānavapārṣadaiḥ | aśrūyanta kṛtā ghorā meghānāṁ nadatāmiva

तब दानव-पार्षदों द्वारा बजाये गये विविध प्रकार के भयंकर वाद्य-स्वर मेघों की गर्जना के समान सुनाई देने लगे।

श्लोक 27 (skanda.8.135.27)

गजैश्च नीलाचलसन्निकाशै रथैश्च गन्धर्वविमानकल्पैः । हयैश्च वायुप्रतिमानवेगैश्चरन्ति दैत्याः समरे ह्यभीताः

gajaiśca nīlācalasannikāśai rathaiśca gandharvavimānakalpaiḥ | hayaiśca vāyupratimānavegaiścaranti daityāḥ samare hyabhītāḥ

नीले पर्वतों के समान हाथियों से, गन्धर्वों के विमानों के समान रथों से, तथा वायु के समान वेगवाले घोड़ों से दैत्य युद्ध में निर्भय होकर विचरने लगे।

श्लोक 28 (skanda.8.135.28)

ते शूलशक्त्यृष्टिभुशुण्डिबाणैः शैलोपलैश्चक्रसशूलवज्रैः । अन्योन्यमुत्सादयितुं प्रवृत्ता गणेश्वरा दानवपुंगवाश्च

te śūlaśaktyṛṣṭibhuśuṇḍibāṇaiḥ śailopalaiścakrasaśūlavajraiḥ | anyonyamutsādayituṁ pravṛttā gaṇeśvarā dānavapuṁgavāśca

त्रिशूल, शक्ति, ऋष्टि, भुशुण्डि, बाण, पर्वत-शिलाओं, चक्र, त्रिशूल और वज्रों से एक-दूसरे का विनाश करने में गणेश्वर और दानवश्रेष्ठ प्रवृत्त हो गये।

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