अम्बिका खण्ड · अध्याय 136
राहु द्वारा विनायक-बन्धन
श्लोक 1 (skanda.8.136.1)
विरोचनस्तु दैत्येन्द्रो विरोचन इवोदितः । विवेश प्रमथानीकं मेघानीकमिवांशुमान् ।।
virocanastu daityendro virocana ivoditaḥ | viveśa pramathānīkaṁ meghānīkamivāṁśumān ||
विरोचन नामक दैत्येन्द्र सूर्य के समान उदित होकर प्रमथों की सेना में उसी प्रकार प्रविष्ट हुआ, जैसे तेजस्वी सूर्य मेघों के समूह में प्रवेश करता है।
श्लोक 2 (skanda.8.136.2)
मन्दराग्रप्रतीकाशमीषादन्तं क्षरन्मदम् । चतुर्दन्तं समास्थाय दन्तिनं दन्तभूषितम् ।।
mandarāgrapratīkāśamīṣādantaṁ kṣaranmadam | caturdantaṁ samāsthāya dantinaṁ dantabhūṣitam ||
वह मन्दराचल के शिखर के समान, मद बहाते हुए, चार दाँतोंवाले तथा दाँतों से सुशोभित एक गजराज पर सवार होकर आया।
श्लोक 3 (skanda.8.136.3)
स नागस्कन्धगस्तत्र भ्राजतेऽसुरपुंगवः । उदयाग्रं समास्थाय सहस्रांशुज्वलन्निव ।।
sa nāgaskandhagastatra bhrājate'surapuṁgavaḥ | udayāgraṁ samāsthāya sahasrāṁśujvalanniva ||
वह असुरश्रेष्ठ उस गजराज के कंधे पर बैठकर वैसे ही सुशोभित हुआ, जैसे उदयाचल के शिखर पर बैठा हुआ प्रज्वलित सहस्रकिरण सूर्य।
श्लोक 4 (skanda.8.136.4)
तोमरैः सशरैश्चापि दिवाकरकरप्रभैः । प्रमथानभ्यपतत्तत्र शतशोऽथ सहस्रशः ।।
tomaraiḥ saśaraiścāpi divākarakaraprabhaiḥ | pramathānabhyapatattatra śataśo'tha sahasraśaḥ ||
वह सूर्य की किरणों के समान चमकते हुए भालों और बाणों से प्रमथों पर वहाँ सैकड़ों-हजारों की संख्या में टूट पड़ा।
श्लोक 5 (skanda.8.136.5)
वैनतेयो यथा नागान् सिंहो गोवृषभान् यथा । द्रावयामास प्रमथान् तथा शूरो विरोचनः ।।
vainateyo yathā nāgān siṁho govṛṣabhān yathā | drāvayāmāsa pramathān tathā śūro virocanaḥ ||
जैसे गरुड़ नागों को और सिंह वृषभों को भगा देता है, वैसे ही शूरवीर विरोचन ने प्रमथों को भगा दिया।
श्लोक 6 (skanda.8.136.6)
यान्तमायान्तमप्राप्तं प्राप्तं दूरस्थमेव च । प्रमथं पश्यते यं यं तं तं दारयतेऽसुरः ।।
yāntamāyāntamaprāptaṁ prāptaṁ dūrasthameva ca | pramathaṁ paśyate yaṁ yaṁ taṁ taṁ dārayate'suraḥ ||
जाते हुए, आते हुए, निकट के, दूर स्थित - जिस-जिस प्रमथ को वह देखता, उसी-उसी को वह असुर विदीर्ण कर देता था।
श्लोक 7 (skanda.8.136.7)
मृगाः सिंहं यथा दृष्ट्वा गरुडश्च यथोरगान् । विरोचनं तथा दृष्ट्वा प्रमथा दुद्रुवुर्भयात् ।।
mṛgāḥ siṁhaṁ yathā dṛṣṭvā garuḍaśca yathoragān | virocanaṁ tathā dṛṣṭvā pramathā dudruvurbhayāt ||
जैसे मृग सिंह को देखकर और सर्प गरुड़ को देखकर भाग जाते हैं, वैसे ही प्रमथ विरोचन को देखकर भय से भाग खड़े हुए।
श्लोक 8 (skanda.8.136.8)
गणेश्वरबलं दृष्ट्वा गणेश्वरवरो द्रुतम् । विनायकः सन्निवृत्तः प्रमथानीकनायकः ।।
gaṇeśvarabalaṁ dṛṣṭvā gaṇeśvaravaro drutam | vināyakaḥ sannivṛttaḥ pramathānīkanāyakaḥ ||
अपनी गणसेना को इस प्रकार भागते देखकर गणेश्वरों में श्रेष्ठ, प्रमथसेना के नायक विनायक तुरन्त लौट आए।
श्लोक 9 (skanda.8.136.9)
प्रसारयन् करं घोरं पूर्वमैरावतो यथा । विरोचनं सोऽभ्यधावच्छार्दूलो हरिणं यथा ।।
prasārayan karaṁ ghoraṁ pūrvamairāvato yathā | virocanaṁ so'bhyadhāvacchārdūlo hariṇaṁ yathā ||
पूर्वकाल के ऐरावत के समान अपनी भयंकर सूँड़ फैलाते हुए, वे विरोचन की ओर वैसे ही दौड़े जैसे व्याघ्र हिरण की ओर दौड़ता है।
श्लोक 10 (skanda.8.136.10)
तमापतन्तं संवीक्ष्य तीक्ष्णदन्तं गजाननम् । कुम्भान्तरे तोमरेण दारयामास दानवः ।।
tamāpatantaṁ saṁvīkṣya tīkṣṇadantaṁ gajānanam | kumbhāntare tomareṇa dārayāmāsa dānavaḥ ||
तीक्ष्ण दाँतोंवाले उस गजमुख को इस प्रकार आते देखकर दानव (विरोचन) ने उनके गण्डस्थलों के बीच भाले से आघात किया।
श्लोक 11 (skanda.8.136.11)
तं तोमरं कराग्रेण निष्कृष्य स विनायकः । हस्तात्क्षिप्तेन तेनैव विरोचनमदारयत् ।।
taṁ tomaraṁ karāgreṇa niṣkṛṣya sa vināyakaḥ | hastātkṣiptena tenaiva virocanamadārayat ||
विनायक ने उस भाले को अपनी सूँड़ के अग्रभाग से खींचकर, उसी को अपने हाथ से फेंककर विरोचन को विदीर्ण कर दिया।
श्लोक 12 (skanda.8.136.12)
स तोमरेण निर्भिन्नः करघातातुरश्च ह । चचाल विह्वलो रक्तं चक्षार च विरोचनः ।।
sa tomareṇa nirbhinnaḥ karaghātāturaśca ha | cacāla vihvalo raktaṁ cakṣāra ca virocanaḥ ||
भाले से बिंधा और सूँड़ की चोट से पीड़ित विरोचन विह्वल होकर डगमगाने लगा और रक्त उगलने लगा।
श्लोक 13 (skanda.8.136.13)
घूर्णमानं तदालक्ष्य दानवेन्द्रं विरोचनम् । दन्ताभ्यां चन्द्रशुभ्राभ्यां निर्बिभेद विनायकः ।।
ghūrṇamānaṁ tadālakṣya dānavendraṁ virocanam | dantābhyāṁ candraśubhrābhyāṁ nirbibheda vināyakaḥ ||
दानवेन्द्र विरोचन को इस प्रकार डगमगाते देखकर विनायक ने अपने चन्द्रमा-सदृश उज्ज्वल दाँतों से उसे विदीर्ण कर डाला।
श्लोक 14 (skanda.8.136.14)
वैनायकं तत्समीक्ष्य कर्म देवाः सशक्रा मुमुचुः प्रणादान् । तस्योत्तमाङ्गोपरि पुष्पमाला पपात देवस्य यथा त्रिमार्गा ।।
vaināyakaṁ tatsamīkṣya karma devāḥ saśakrā mumucuḥ praṇādān | tasyottamāṅgopari puṣpamālā papāta devasya yathā trimārgā ||
विनायक के इस पराक्रम को देखकर इन्द्र सहित देवगण जय-जयकार करने लगे, और उस देव के मस्तक पर आकाशगंगा के समान पुष्पमाला गिर पड़ी।
श्लोक 15 (skanda.8.136.15)
तया तु नानाविधपुष्पवत्या विभाति देवः स तदा स्रजा रणे । नक्षत्रमालावलिचारुशोभः समुन्नतो मेरुरिवापरः स्थितः ।।
tayā tu nānāvidhapuṣpavatyā vibhāti devaḥ sa tadā srajā raṇe | nakṣatramālāvalicāruśobhaḥ samunnato merurivāparaḥ sthitaḥ ||
नाना प्रकार के पुष्पों से युक्त उस माला से युद्धभूमि में सुशोभित होते हुए वे देव नक्षत्रमाला की सुन्दर शोभा से युक्त, दूसरे उन्नत मेरु पर्वत के समान प्रतीत हुए।
श्लोक 16 (skanda.8.136.16)
उद्भिन्नरक्तं तु विदार्यमाणं विरोचनं वीक्ष्य विनायकेन । जम्भोऽम्बुदाभीतुरमारसित्वा दुद्राव मा भैरिति भाषमाणः ।।
udbhinnaraktaṁ tu vidāryamāṇaṁ virocanaṁ vīkṣya vināyakena | jambho'mbudābhīturamārasitvā dudrāva mā bhairiti bhāṣamāṇaḥ ||
रक्तरंजित होकर विनायक द्वारा विदीर्ण किए जाते विरोचन को देखकर मेघ के समान गर्जन करने वाला जम्भ 'भयभीत मत हो' - ऐसा कहता हुआ (उसकी रक्षा के लिए) दौड़ पड़ा।
श्लोक 17 (skanda.8.136.17)
तमापतन्तं बहुधा नदन्तं जम्भं वियन्मेघमिवाप्रमेयम् । रुरोध नन्दी समताडयच्च वज्रेण वज्री कुपितो यथाद्रिम् ।।
tamāpatantaṁ bahudhā nadantaṁ jambhaṁ viyanmeghamivāprameyam | rurodha nandī samatāḍayacca vajreṇa vajrī kupito yathādrim ||
आकाश में अथाह मेघ के समान बार-बार गरजते हुए, इस प्रकार आते जम्भ को नन्दी ने रोक लिया और उसे उसी प्रकार प्रहार किया, जैसे क्रुद्ध इन्द्र वज्र से पर्वत पर प्रहार करता है।
श्लोक 18 (skanda.8.136.18)
स वज्रघाताच्छिथिलः क्रियासु व्यसुर्यथा दानवदेवपुत्रः । पपात भूमौ मुहुरुत्थितश्च घृतावसिक्तः सदसीव वह्निः ।।
sa vajraghātācchithilaḥ kriyāsu vyasuryathā dānavadevaputraḥ | papāta bhūmau muhurutthitaśca ghṛtāvasiktaḥ sadasīva vahniḥ ||
वज्र के समान उस प्रहार से शिथिल हो चुके उस दानवपुत्र के अंग निष्प्राणों के समान हो गए। वह भूमि पर गिरा और फिर बार-बार उठा, मानो यज्ञमण्डप में घी सींची गई अग्नि हो।
श्लोक 19 (skanda.8.136.19)
जम्भे वसन्ने रणबले प्रसन्ने षड्दानवाः षण्मुखपूर्वजं तम् । कुठारशूलासिपरश्वधैस्तु म्लेच्छा यथा क्रुद्धमुखास्ततक्षुः ।।
jambhe vasanne raṇabale prasanne ṣaḍdānavāḥ ṣaṇmukhapūrvajaṁ tam | kuṭhāraśūlāsiparaśvadhaistu mlecchā yathā kruddhamukhāstatakṣuḥ ||
जब जम्भ रणभूमि में इस प्रकार निढाल पड़ा, तब छः दानवों ने षण्मुख (कार्तिकेय) के अग्रज उस विनायक पर टूट पड़कर उन्हें कुल्हाड़ी, त्रिशूल, तलवार और परशुओं से उसी प्रकार क्षत-विक्षत किया, जैसे क्रोध से भरे म्लेच्छ किसी वृक्ष को काटते हैं।
श्लोक 20 (skanda.8.136.20)
विनायकस्तैरवतक्षितस्तु प्रह्लादिदेहात्प्रविकृष्य दन्तौ । मुमोच तं वै रुधिरावसिक्तं राहुर्विवस्वन्तमिवार्धभुक्तम् ।।
vināyakastairavatakṣitastu prahlādidehātpravikṛṣya dantau | mumoca taṁ vai rudhirāvasiktaṁ rāhurvivasvantamivārdhabhuktam ||
उनके द्वारा इस प्रकार आहत विनायक ने प्रह्लाद-पुत्र (विरोचन) के शरीर से अपने दाँत खींचकर, रक्त से लथपथ उसे उसी प्रकार छोड़ दिया, जैसे राहु आधे खाए हुए सूर्य को छोड़ देता है।
श्लोक 21 (skanda.8.136.21)
स तेन मुक्तोऽतिरुजावृतश्रीर्विरोचनो नातिबभौ मनोज्ञः । मेघाभिरुद्धो नवमेघकाले संपूर्णबिम्बो नभसीव चन्द्रः ।।
sa tena mukto'tirujāvṛtaśrīrvirocano nātibabhau manojñaḥ | meghābhiruddho navameghakāle saṁpūrṇabimbo nabhasīva candraḥ ||
उससे मुक्त हुआ विरोचन अत्यन्त पीड़ा से आच्छादित शोभावाला होकर वैसा मनोहर नहीं दिखा, जैसे नवीन वर्षाकाल में बादलों से घिरा हुआ पूर्ण चन्द्रमा आकाश में मनोहर नहीं दिखता।
श्लोक 22 (skanda.8.136.22)
विनायकाभान्स विनायकस्तु षड्दानवान्षण्मुखसन्निकाशः । विशालदन्ताशनिसंप्रहारैर्व्यर्थद्रावयत्सिंह इव द्विपेन्द्रान् ।।
vināyakābhānsa vināyakastu ṣaḍdānavānṣaṇmukhasannikāśaḥ | viśāladantāśanisaṁprahārairvyarthadrāvayatsiṁha iva dvipendrān ||
छः मुखवाले स्कन्द के समान तेजस्वी विनायक ने उन छः दानवों को, जो मानो विनायक के ही समान (बलशाली) थे, अपने विशाल दाँतों के वज्र-सदृश प्रहारों से उसी प्रकार तितर-बितर कर भगा दिया, जैसे सिंह गजराजों को भगा देता है।
श्लोक 23 (skanda.8.136.23)
करीन्द्रवक्त्रः करमुच्छ्रयित्वा करी सुराणामिव जातदर्पः । प्राकालयद्दानवपुङ्गवाँस्तान्यथा गजान्दर्पितसिंहपोतः ।।
karīndravaktraḥ karamucchrayitvā karī surāṇāmiva jātadarpaḥ | prākālayaddānavapuṅgavā~stānyathā gajāndarpitasiṁhapotaḥ ||
गजराज-मुखवाले और देवताओं के गजराज (ऐरावत) के समान महान गर्व से युक्त विनायक ने अपनी सूँड़ ऊँची उठाकर उन दानवश्रेष्ठों को उसी प्रकार तितर-बितर कर दिया, जैसे मदमत्त सिंहशावक गजों को भगा देता है।
श्लोक 24 (skanda.8.136.24)
सिंहेक्षितानामिव गोपतीनां कालेक्षितानामिव मानवानाम् । विनायकेनेक्षितकालितानां भयं तदासीन्मिषतां बलानाम् ।।
siṁhekṣitānāmiva gopatīnāṁ kālekṣitānāmiva mānavānām | vināyakenekṣitakālitānāṁ bhayaṁ tadāsīnmiṣatāṁ balānām ||
जैसे सिंह द्वारा देखे गए वृषभों को अथवा काल द्वारा देखे गए मनुष्यों को भय होता है, वैसा ही भय विनायक द्वारा देखी गई सेनाओं को, उनके देखते-देखते ही, उत्पन्न हो गया।
श्लोक 25 (skanda.8.136.25)
यतो यतः प्रेक्षति वै स देवो हस्तीव हस्तं स्वकमुच्छ्रयित्वा । ततस्ततो दैत्यबलं प्रभग्नं चण्डानिलेनेव वनं सपुष्पम् ।।
yato yataḥ prekṣati vai sa devo hastīva hastaṁ svakamucchrayitvā | tatastato daityabalaṁ prabhagnaṁ caṇḍānileneva vanaṁ sapuṣpam ||
वह देव जिस-जिस ओर देखते और गज की भाँति अपनी सूँड़ ऊँची उठाते, उसी-उसी ओर दैत्यसेना वैसे ही छिन्न-भिन्न हो जाती, जैसे प्रचण्ड आँधी से पुष्पित वन तितर-बितर हो जाता है।
श्लोक 26 (skanda.8.136.26)
दृष्ट्वा बलं तद्बलिनाभिभूतं बलेः सुतोऽसौ बलिनां वरिष्ठः । विनायकं हन्तुमनाः ससार मत्तं रणे मत्त इव द्विपेन्द्रः ।।
dṛṣṭvā balaṁ tadbalinābhibhūtaṁ baleḥ suto'sau balināṁ variṣṭhaḥ | vināyakaṁ hantumanāḥ sasāra mattaṁ raṇe matta iva dvipendraḥ ||
अपनी बलशाली सेना को इस प्रकार पराजित देखकर बलि का पुत्र, जो बलवानों में श्रेष्ठ था, मदमत्त विनायक को मारने की इच्छा से उसी प्रकार दौड़ा, जैसे रणभूमि में एक मत्त गजराज दूसरे पर झपटता है।
श्लोक 27 (skanda.8.136.27)
तमापतन्तं तपनप्रकाशं क्रुद्धं रणे कालमिवाभितप्तम् । ससार रोद्धुं समरे च योद्धुं कुण्डोदरः सिंह इवान्यसिंहम् ।।
tamāpatantaṁ tapanaprakāśaṁ kruddhaṁ raṇe kālamivābhitaptam | sasāra roddhuṁ samare ca yoddhuṁ kuṇḍodaraḥ siṁha ivānyasiṁham ||
सूर्य के समान तेजस्वी और रणभूमि में क्रुद्ध होकर आते उस दानव को, मानो जलता हुआ काल हो, कुण्डोदर ने रोकने और युद्ध करने के लिए उसी प्रकार सामना किया, जैसे एक सिंह दूसरे सिंह का सामना करता है।
श्लोक 28 (skanda.8.136.28)
तौ सिंहपोताविव जातदर्पौ प्रकीर्णहस्ताविव हस्तिपोतौ । समागतौ युद्धरसाभिमत्तौ कुण्डोदरो वै बलिनन्दनश्च ।।
tau siṁhapotāviva jātadarpau prakīrṇahastāviva hastipotau | samāgatau yuddharasābhimattau kuṇḍodaro vai balinandanaśca ||
गर्वोन्मत्त सिंहशावकों के समान, अथवा सूँड़ फैलाए गजशावकों के समान, कुण्डोदर और बलिपुत्र दोनों युद्ध के आनन्द में उन्मत्त होकर आपस में भिड़ गए।
श्लोक 29 (skanda.8.136.29)
शतानि पञ्चैव स कार्मुकाणां विकृष्य वज्राशनिनिस्वनानाम् । कुण्डोदरायेषुवरान्ससर्ज गर्जन्स बाणस्तु यथा पयोदः ।।
śatāni pañcaiva sa kārmukāṇāṁ vikṛṣya vajrāśaninisvanānām | kuṇḍodarāyeṣuvarānsasarja garjansa bāṇastu yathā payodaḥ ||
वज्र और अशनि के समान गर्जन करने वाले पाँच सौ धनुषों को खींचकर उसने (बलिपुत्र ने) कुण्डोदर पर श्रेष्ठ बाणों की वृष्टि की, और वह मेघ के समान गरजने लगा।
श्लोक 30 (skanda.8.136.30)
तानागतांस्तीक्ष्णमुखांस्तदानीं बाणस्य बाणान् कुपिताहिकल्पान् । कुण्डोदरः शैलरुहेण सर्वान् मनोरथान् विघ्न इवाजघान ।।
tānāgatāṁstīkṣṇamukhāṁstadānīṁ bāṇasya bāṇān kupitāhikalpān | kuṇḍodaraḥ śailaruheṇa sarvān manorathān vighna ivājaghāna ||
उस समय बलि-पुत्र के आते हुए उन तीक्ष्ण-अग्र बाणों को, जो क्रुद्ध सर्पों के समान थे, कुण्डोदर ने एक पर्वतोद्भव वृक्ष से उसी प्रकार नष्ट कर दिया, जैसे कोई विघ्न मनोरथों को नष्ट कर देता है।
श्लोक 31 (skanda.8.136.31)
तान्निष्फलान्प्रेक्ष्य शरान् सुरारिः सुरेतरारिप्रहतान् क्षितिस्थान् । शक्त्या स कुण्डोदरमाजघान शक्त्या गुहः क्रौञ्चमिवाचलेन्द्रम् ।।
tānniṣphalānprekṣya śarān surāriḥ suretarāriprahatān kṣitisthān | śaktyā sa kuṇḍodaramājaghāna śaktyā guhaḥ krauñcamivācalendram ||
उन बाणों को इस प्रकार निष्फल होकर भूमि पर पड़ा देखकर देवों के उस शत्रु ने कुण्डोदर पर शक्ति से प्रहार किया, जैसे कुमार ने अपनी शक्ति से महान क्रौंच पर्वत को भेद डाला था।
श्लोक 32 (skanda.8.136.32)
वक्षःप्रदेशात्तु गणेश्वरस्य बाणस्य शक्तिः क्षतजं पपौ सा । शक्रोपनीतं रुचिरं सुगन्धि यथामृतं वज्रधरस्य भार्या ।।
vakṣaḥpradeśāttu gaṇeśvarasya bāṇasya śaktiḥ kṣatajaṁ papau sā | śakropanītaṁ ruciraṁ sugandhi yathāmṛtaṁ vajradharasya bhāryā ||
बलिपुत्र की उस शक्ति ने गणेश्वर (कुण्डोदर) के वक्षःस्थल से रक्त इस प्रकार पिया, जैसे इन्द्र की पत्नी इन्द्र द्वारा लाए गए सुन्दर सुगन्धित अमृत का पान करती है।
श्लोक 33 (skanda.8.136.33)
शक्तिप्रहाराभिहतस्तु यक्षः कुण्डोदरो दर्दुरमन्दराभः । पपात संज्ञां विपुलां प्रहाय दावाग्निना दग्ध इवोच्चवृक्षः ।।
śaktiprahārābhihatastu yakṣaḥ kuṇḍodaro darduramandarābhaḥ | papāta saṁjñāṁ vipulāṁ prahāya dāvāgninā dagdha ivoccavṛkṣaḥ ||
शक्ति के उस प्रहार से आहत यक्षराज कुण्डोदर, जो दर्दुर और मन्दराचल पर्वतों के समान विशाल थे, अपनी चेतना खोकर उसी प्रकार गिर पड़े, जैसे दावाग्नि से जला हुआ ऊँचा वृक्ष गिर पड़ता है।
श्लोक 34 (skanda.8.136.34)
कुण्डोदरं तन्निहतं समीक्ष्य विनायकोऽसौ च्युतपद्ममालः । द्रुद्राव बाणं प्रति हन्तुकामः करीव भृङ्गारकरोच्छ्रयेण ।।
kuṇḍodaraṁ tannihataṁ samīkṣya vināyako'sau cyutapadmamālaḥ | drudrāva bāṇaṁ prati hantukāmaḥ karīva bhṛṅgārakarocchrayeṇa ||
कुण्डोदर को इस प्रकार गिरा हुआ देखकर, अपनी माला गिरा चुके विनायक बलिपुत्र को मारने की इच्छा से उसी प्रकार दौड़े, जैसे कोई गज अपनी सूँड़ उठाकर झपटता है।
श्लोक 35 (skanda.8.136.35)
तमानने वज्रनिभाननैः शरैर्विनायकं ह्याततमेव बाणः । बिभेद भित्वा च ततो ररास ग्रीष्मव्यपाये नभसीव मेघः ।।
tamānane vajranibhānanaiḥ śarairvināyakaṁ hyātatameva bāṇaḥ | bibheda bhitvā ca tato rarāsa grīṣmavyapāye nabhasīva meghaḥ ||
बलिपुत्र ने विनायक के मुख पर वज्र के समान भयंकर बाणों से बेधकर, वेध करके, ग्रीष्म ऋतु के अन्त में गरजते मेघ के समान गर्जना की।
श्लोक 36 (skanda.8.136.36)
तृणाग्रपातानिव सेषुपातानचिन्तयित्वैव गजेन्द्रवक्त्रः । इषोश्च नेत्रं सवरूथचक्रं बभञ्ज बाणस्य रथं ससूतम् ।।
tṛṇāgrapātāniva seṣupātānacintayitvaiva gajendravaktraḥ | iṣośca netraṁ savarūthacakraṁ babhañja bāṇasya rathaṁ sasūtam ||
गजमुख विनायक ने उन बाणों के गिरने को तिनके के अग्रभाग के गिरने के समान कुछ भी परवाह न करते हुए, बाण को लक्ष्य करके सारथि सहित उसके रथ को, पहिये और वरूथ (रक्षा-आवरण) सहित तोड़ डाला।
श्लोक 37 (skanda.8.136.37)
बाणस्य वाहान्तु तमारुजन्तं विनायकं भूमिगतं यथेभम् । सिंहीसुतः सिंह इवाभिपत्य स बाहुपाशेन बबन्ध राहुः ।।
bāṇasya vāhāntu tamārujantaṁ vināyakaṁ bhūmigataṁ yathebham | siṁhīsutaḥ siṁha ivābhipatya sa bāhupāśena babandha rāhuḥ ||
बाण के घोड़ों को इस प्रकार तोड़ते हुए, भूमि पर पड़े गज के समान (प्रतीत होते) विनायक को देखकर सिंहनी का पुत्र राहु सिंह की भाँति झपटकर अपनी भुजाओं के पाश से बाँध लिया।
श्लोक 38 (skanda.8.136.38)
स राहुणा बहुयुगावबद्धो विनायकः सर्पसहस्रमालः । प्रस्पन्दमानो भ्रामितपुष्कराग्रो गजस्तरन् देवनदीं यथैव ।।
sa rāhuṇā bahuyugāvabaddho vināyakaḥ sarpasahasramālaḥ | praspandamāno bhrāmitapuṣkarāgro gajastaran devanadīṁ yathaiva ||
राहु द्वारा अनेक कुण्डलियों में बाँधे गए, सहस्रों सर्पों की माला धारण करने वाले विनायक तड़पते और अपनी सूँड़ का अगला भाग घुमाते हुए वैसे ही दिखाई दिए, जैसे देवनदी गंगा को तैरता हुआ कोई गजराज।
श्लोक 39 (skanda.8.136.39)
तं राहुबाहुप्रतिबद्धचेष्टं विनायकं वीक्ष्य तदा दिविस्थाः । देवाः सशक्राः सह यक्षसिद्धैर्हाहेति हाहेत्यसकृद्विनेदुः ।।
taṁ rāhubāhupratibaddhaceṣṭaṁ vināyakaṁ vīkṣya tadā divisthāḥ | devāḥ saśakrāḥ saha yakṣasiddhairhāheti hāhetyasakṛdvineduḥ ||
राहु की भुजाओं में इस प्रकार बंधी हुई चेष्टावाले विनायक को देखकर आकाश में स्थित इन्द्र सहित देवगण, यक्षों और सिद्धों के साथ बार-बार 'हा हा' पुकार उठे।
श्लोक 40 (skanda.8.136.40)
कुण्डोदरो यक्षवरस्तु सोऽथ आश्वस्य सस्यं हि यथाम्बुसिक्तम् । कुठारमादाय जघान राहुं जत्र्वन्तरे संहतमुष्टिना च ।।
kuṇḍodaro yakṣavarastu so'tha āśvasya sasyaṁ hi yathāmbusiktam | kuṭhāramādāya jaghāna rāhuṁ jatrvantare saṁhatamuṣṭinā ca ||
उधर यक्षश्रेष्ठ कुण्डोदर, जल से सींची गई फसल के समान (पुनः) स्वस्थ होकर, कुल्हाड़ी लेकर तथा साथ ही मुट्ठी बाँधकर राहु के कंधे और गले के बीच के स्थान पर प्रहार किया।
श्लोक 41 (skanda.8.136.41)
कुठारघातात्स तु मुष्टिना च दृढाहतो यक्षवरेण राहुः । विनायकं भीमबलो मुमोच शुभेतरं कर्म यथा कुलीनः ।।
kuṭhāraghātātsa tu muṣṭinā ca dṛḍhāhato yakṣavareṇa rāhuḥ | vināyakaṁ bhīmabalo mumoca śubhetaraṁ karma yathā kulīnaḥ ||
यक्षश्रेष्ठ के कुल्हाड़ी के प्रहार और मुट्ठी की गहरी चोट से पीड़ित महाबली राहु ने विनायक को उसी प्रकार छोड़ दिया, जैसे कोई कुलीन पुरुष अशुभ कर्म को त्याग देता है।
श्लोक 42 (skanda.8.136.42)
तं वै परावृत्य करीव मत्तो गजाननः काननषण्डवासी । पद्भिश्च दन्तैश्च जघान राहुं प्रकीर्णहस्तेन च भीमहस्तः ।।
taṁ vai parāvṛtya karīva matto gajānanaḥ kānanaṣaṇḍavāsī | padbhiśca dantaiśca jaghāna rāhuṁ prakīrṇahastena ca bhīmahastaḥ ||
मुक्त होते ही मदमत्त गजराज के समान, वनखण्ड में वास करने वाले गजमुख विनायक ने घूमकर पैरों, दाँतों और अपनी विशाल फैली हुई सूँड़ से राहु पर प्रहार किया।
श्लोक 43 (skanda.8.136.43)
विनायकेनाभिहतस्तु राहुर्दर्पं च गर्वं च बलं च हित्वा । निस्तोयमेघप्रतिमोऽमरारिः स्थितो यथा सिंहहतो गजेन्द्रः ।।
vināyakenābhihatastu rāhurdarpaṁ ca garvaṁ ca balaṁ ca hitvā | nistoyameghapratimo'marāriḥ sthito yathā siṁhahato gajendraḥ ||
विनायक द्वारा आहत राहु अपने दर्प, गर्व और बल को त्यागकर, जलहीन मेघ के समान निस्तेज होकर उसी प्रकार खड़ा रह गया, जैसे सिंह से आहत गजराज खड़ा रह जाता है।
श्लोक 44 (skanda.8.136.44)
राहौ तु कुण्डोदरमुष्टिघातैर्विनायकेनैव च पीड्यमाने । कुजम्भसंह्रादमयाः सतारा हुण्डस्तुहुण्डश्च तदा तमीयुः ।।
rāhau tu kuṇḍodaramuṣṭighātairvināyakenaiva ca pīḍyamāne | kujambhasaṁhrādamayāḥ satārā huṇḍastuhuṇḍaśca tadā tamīyuḥ ||
इस प्रकार कुण्डोदर की मुट्ठी के प्रहारों और विनायक के आघातों से पीड़ित राहु के पास कुजम्भ, संह्राद, तार, हुण्ड और तुहुण्ड (आदि दानव) उस समय आ पहुँचे।
श्लोक 45 (skanda.8.136.45)
मयस्तु कुण्डोदरमाजघान शूलेन तारो मुशलेन कुक्षौ । बलस्तु लम्बाम्बुदसन्निकाशं तं मुष्टिना वज्रनिभेन चापि ।।
mayastu kuṇḍodaramājaghāna śūlena tāro muśalena kukṣau | balastu lambāmbudasannikāśaṁ taṁ muṣṭinā vajranibhena cāpi ||
मय ने कुण्डोदर पर शूल से प्रहार किया, तार ने मूसल से उनके पेट पर आघात किया, और बल ने विशाल मेघ के समान उस कुण्डोदर को वज्र-सदृश मुट्ठी से मारा।
श्लोक 46 (skanda.8.136.46)
हिरण्यनेत्रावरजात्मजश्च विनायकं भीमबलं तलेन । तस्यात्मजश्चापि जघान रोषात् स चापि गत्वा बलवाँस्तुहुण्डः ।।
hiraṇyanetrāvarajātmajaśca vināyakaṁ bhīmabalaṁ talena | tasyātmajaścāpi jaghāna roṣāt sa cāpi gatvā balavā~stuhuṇḍaḥ ||
हिरण्याक्ष के छोटे भाई (हिरण्यकशिपु) के पुत्र प्रह्लाद ने, और उसके पुत्र (विरोचन) ने भी क्रोधपूर्वक महाबली विनायक को थप्पड़ से मारा, और बलवान तुहुण्ड भी वहाँ पहुँच गया।
श्लोक 47 (skanda.8.136.47)
विनायकस्तं तु तदा गृहीत्वा करेण विक्रम्य तुहुण्डमाजौ । आक्षिप्य चोत्क्षिप्य च भीमवेगश्चिक्षेप दूरं यमदूतकल्पम् ।।
vināyakastaṁ tu tadā gṛhītvā kareṇa vikramya tuhuṇḍamājau | ākṣipya cotkṣipya ca bhīmavegaścikṣepa dūraṁ yamadūtakalpam ||
विनायक ने युद्ध में उस तुहुण्ड को पराक्रमपूर्वक अपने हाथ से पकड़कर, खींचकर और ऊपर उठाकर, यमदूत के समान भयंकर उस दानव को अपने भीषण वेग से दूर फेंक दिया।
श्लोक 48 (skanda.8.136.48)
प्रह्रादमाहत्य ततः स देवो मयं च मत्ताञ्जनतुल्यवक्षाः । उत्पाट्य तं घोररवं ननाद शुभ्राम्बुपूर्णो नभसीव मेघः ।।
prahrādamāhatya tataḥ sa devo mayaṁ ca mattāñjanatulyavakṣāḥ | utpāṭya taṁ ghoraravaṁ nanāda śubhrāmbupūrṇo nabhasīva meghaḥ ||
फिर उस देव ने, मदमत्त गजराज के समान वक्षवाले प्रह्लाद और मय को आहत करके, उन्हें उखाड़ फेंका और उज्ज्वल जल से भरे मेघ के समान भीषण गर्जना की।
श्लोक 49 (skanda.8.136.49)
कुण्डोदरश्चापि बलं सतारं कुजम्भमाहत्य च यक्षवर्यः । उभौ रणस्थौ गजयूथपालौ व्याधूतमालौ भृशजातकोपौ ।।
kuṇḍodaraścāpi balaṁ satāraṁ kujambhamāhatya ca yakṣavaryaḥ | ubhau raṇasthau gajayūthapālau vyādhūtamālau bhṛśajātakopau ||
यक्षश्रेष्ठ कुण्डोदर ने भी बल, तार और कुजम्भ पर प्रहार किया; रणभूमि में खड़े वे दोनों (कुण्डोदर और विनायक), मालाएँ बिखराए हुए, अत्यन्त क्रोधित, गजयूथपतियों के समान शोभित हुए।
श्लोक 50 (skanda.8.136.50)
ससर्जतुस्तौ शरवृष्टिमुग्रां यथाम्बुवृष्टिं जलदौ सनादौ । ततः पुनश्चायुधसर्जनानि पयोदविस्फूर्जितगर्जितानि बलानि तान्यासुरपार्षदानां संसक्तभावं परमं गतानि ।।
sasarjatustau śaravṛṣṭimugrāṁ yathāmbuvṛṣṭiṁ jaladau sanādau | tataḥ punaścāyudhasarjanāni payodavisphūrjitagarjitāni balāni tānyāsurapārṣadānāṁ saṁsaktabhāvaṁ paramaṁ gatāni ||
वे दोनों गरजते हुए मेघों के समान भयंकर बाण-वृष्टि करने लगे। फिर दोनों सेनाओं में मेघों की गड़गड़ाहट के समान अस्त्रों के चलने का घोर शब्द होने लगा, और असुरों तथा गणों की सेनाएँ परस्पर घोर संघर्ष में उलझ गईं।