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अम्बिका खण्ड · अध्याय 137

गणदानवसंग्राम

अध्याय 136अध्याय-सूचीअध्याय 138

श्लोक 1 (skanda.8.137.1)

ततो व्यतिकरो भूयः पार्षदासुरसैन्ययोः । संबभूवोदधिक्षोभान्मकराणामिवाद्भुतः ।।

tato vyatikaro bhūyaḥ pārṣadāsurasainyayoḥ | saṁbabhūvodadhikṣobhānmakarāṇāmivādbhutaḥ ||

इसके पश्चात् गणों और असुरों की सेनाओं में पुनः वैसा ही अद्भुत संघर्ष हुआ, जैसा समुद्र के क्षोभ से मगरमच्छों में संघर्ष होता है।

श्लोक 2 (skanda.8.137.2)

पट्टिशासिधनुष्मन्तो विद्युत्वन्त इवाम्बुदाः । विबभुर्दानवास्तत्र प्रमथाश्च युयुत्सवः ।।

paṭṭiśāsidhanuṣmanto vidyutvanta ivāmbudāḥ | vibabhurdānavāstatra pramathāśca yuyutsavaḥ ||

पट्टिश, तलवार और धनुष धारण किए हुए वे दानव तथा युद्ध के इच्छुक प्रमथ वहाँ बिजली से युक्त बादलों के समान सुशोभित हुए।

श्लोक 3 (skanda.8.137.3)

सहस्व प्रहरस्वेति नश्य नष्टस्त्वमित्यपि । तेषामेवं प्रवदतामश्रूयन्त गिरो मुहुः ।।

sahasva praharasveti naśya naṣṭastvamityapi | teṣāmevaṁ pravadatāmaśrūyanta giro muhuḥ ||

'सहन कर!' 'प्रहार कर!' 'भाग जा!' 'तू तो नष्ट हो चुका है!' - इस प्रकार कहते हुए उनकी वाणियाँ बार-बार सुनाई पड़ती थीं।

श्लोक 4 (skanda.8.137.4)

शूलैस्त्रिशूलैश्चक्रैश्च हुण्डैर्लगुडकम्पनैः । भिन्दिपालैः करसमैः प्रसृतैर्निखरैरपि ।।

śūlaistriśūlaiścakraiśca huṇḍairlaguḍakampanaiḥ | bhindipālaiḥ karasamaiḥ prasṛtairnikharairapi ||

शूलों, त्रिशूलों, चक्रों, गदाओं, हिलती हुई लाठियों, हाथ के समान फैले हुए भिन्दिपालों (छोटे भालों) और नखों से भी -

श्लोक 5 (skanda.8.137.5)

टंकैः कटंकटैः प्रासैः पाशैः परशुपट्टिशैः । द्रुमोपलशिलाघातैर्गिरीणां शिखरैरपि ।।

ṭaṁkaiḥ kaṭaṁkaṭaiḥ prāsaiḥ pāśaiḥ paraśupaṭṭiśaiḥ | drumopalaśilāghātairgirīṇāṁ śikharairapi ||

टांकियों, कुल्हाड़ी-विशेषों, भालों, पाशों, परशुओं तथा पट्टिशों से, और वृक्षों, पत्थरों, शिलाओं तथा पर्वत-शिखरों के प्रहारों से भी -

श्लोक 6 (skanda.8.137.6)

एतैः प्रहरणैस्ते वै सूदयन्ति परस्परम् । घण्टाकर्णोऽहमसुर जम्भोऽहं प्रमथेश्वर ।।

etaiḥ praharaṇaiste vai sūdayanti parasparam | ghaṇṭākarṇo'hamasura jambho'haṁ pramatheśvara ||

इन्हीं आयुधों से वे परस्पर एक-दूसरे का वध कर रहे थे। 'हे असुर! मैं घण्टाकर्ण हूँ' - 'हे प्रमथेश्वर! मैं जम्भ हूँ' -

श्लोक 7 (skanda.8.137.7)

सोमनन्द्यहमिन्द्रारे कुजम्भोऽहं गणाधिप । बिल्वकोऽहमहं यक्ष पिङ्गलो नाम दानव ।।

somanandyahamindrāre kujambho'haṁ gaṇādhipa | bilvako'hamahaṁ yakṣa piṅgalo nāma dānava ||

'हे इन्द्रशत्रु! मैं सोमनन्दी हूँ' - 'हे गणाधिप! मैं कुजम्भ हूँ' - 'मैं बिल्वक हूँ' - 'हे यक्ष! मैं पिंगल नामक दानव हूँ' -

श्लोक 8 (skanda.8.137.8)

प्रह्रादोऽहमहं नन्दी शंकुकर्णो बलो ह्यहम् । त्वं कः कुण्डोदरोऽहं वै वृत्रोऽहं कुण्डकोदर ।।

prahrādo'hamahaṁ nandī śaṁkukarṇo balo hyaham | tvaṁ kaḥ kuṇḍodaro'haṁ vai vṛtro'haṁ kuṇḍakodara ||

'मैं प्रह्लाद हूँ' - 'मैं नन्दी हूँ' - 'मैं शंकुकर्ण हूँ' - 'मैं बल हूँ' - 'तू कौन है?' - 'मैं कुण्डोदर हूँ' - 'तो हे कुण्डोदर, मैं वृत्र हूँ' -

श्लोक 9 (skanda.8.137.9)

नन्दिषेणोऽस्म्यहं शंभुर्महाकालो मयो ह्यहम् । विशाखोऽहं बलिरहमहं बाणो गुहो ह्यहम् ।।

nandiṣeṇo'smyahaṁ śaṁbhurmahākālo mayo hyaham | viśākho'haṁ balirahamahaṁ bāṇo guho hyaham ||

'मैं नन्दिषेण हूँ' - 'मैं शम्भु हूँ' - 'मैं महाकाल हूँ' - 'मैं मय हूँ' - 'मैं विशाख हूँ' - 'मैं बलि हूँ' - 'मैं बाण हूँ' - 'मैं गुह हूँ' -

श्लोक 10 (skanda.8.137.10)

प्रह्रादोऽहमहं शाखो नैगमेषोऽहमन्धकः । इत्येवं दानवानां च प्रमथानां च भैरवाः ।।

prahrādo'hamahaṁ śākho naigameṣo'hamandhakaḥ | ityevaṁ dānavānāṁ ca pramathānāṁ ca bhairavāḥ ||

'मैं प्रह्लाद हूँ' - 'मैं शाख हूँ' - 'मैं नैगमेष हूँ' - 'मैं अन्धक हूँ' - इस प्रकार दानवों और प्रमथों के भयंकर ललकार-वचन सुनाई पड़ रहे थे।

श्लोक 11 (skanda.8.137.11)

दर्पोद्रेकादधिक्षेपाः श्रूयन्ते युध्यतां रणे । गजानामिव मत्तानां मेघानामिव चागमे ।।

darpodrekādadhikṣepāḥ śrūyante yudhyatāṁ raṇe | gajānāmiva mattānāṁ meghānāmiva cāgame ||

युद्ध करते हुए उनके अत्यधिक गर्व से उत्पन्न ललकारें उसी प्रकार सुनाई पड़ती थीं, जैसे मदमत्त गजों की चिंघाड़ अथवा वर्षा-ऋतु के आगमन पर मेघों की गर्जना।

श्लोक 12 (skanda.8.137.12)

भिद्यतामिव शैलानां समुद्राणां क्षयेष्विव । प्रलयान्तेषु महतां वायूनां जवतामिव ।।

bhidyatāmiva śailānāṁ samudrāṇāṁ kṣayeṣviva | pralayānteṣu mahatāṁ vāyūnāṁ javatāmiva ||

मानो टूटते हुए पर्वतों जैसी, मानो प्रलयकाल में क्षुब्ध होते समुद्रों जैसी, मानो प्रलय के अन्त में वेग से बहने वाली महान वायुओं जैसी वह ध्वनि थी।

श्लोक 13 (skanda.8.137.13)

तेषामासीन्महाञ्छब्दः परस्परनिजघ्नुषाम् । ब्रह्मदण्डप्रतीकाशैर्यमदण्डनिभैरपि । आयुधैस्सूदयन्ति स्म तेऽन्योन्यकुपिता भृशम् ।।

teṣāmāsīnmahāñchabdaḥ parasparanijaghnuṣām | brahmadaṇḍapratīkāśairyamadaṇḍanibhairapi | āyudhaissūdayanti sma te'nyonyakupitā bhṛśam ||

परस्पर वध करते हुए उनका महान शब्द उत्पन्न हो रहा था। ब्रह्मदण्ड के समान और यमदण्ड के समान आयुधों से वे अत्यन्त क्रुद्ध होकर एक-दूसरे का वध कर रहे थे।

श्लोक 14 (skanda.8.137.14)

वज्राणामिव शैलेषु वंशानामिव दह्यताम् । अभूच्चटचटाशब्दः शस्त्राणां पात्यतां तदा ।।

vajrāṇāmiva śaileṣu vaṁśānāmiva dahyatām | abhūccaṭacaṭāśabdaḥ śastrāṇāṁ pātyatāṁ tadā ||

जैसे पर्वतों पर वज्रों के गिरने से, अथवा जलते हुए बाँसों से शब्द होता है, वैसा ही 'चट-चट' शब्द उस समय गिरते हुए शस्त्रों से उत्पन्न हो रहा था।

श्लोक 15 (skanda.8.137.15)

गणेश्वरविमुक्ताभिः शक्तिभिः सुदृढाहताः । निपेतुरारसन्तस्ते सोल्का इव यथा घनाः ।।

gaṇeśvaravimuktābhiḥ śaktibhiḥ sudṛḍhāhatāḥ | nipeturārasantaste solkā iva yathā ghanāḥ ||

गणेश्वरों द्वारा छोड़ी गई शक्तियों से दृढ़तापूर्वक आहत होकर वे दानव चिल्लाते हुए उसी प्रकार गिर पड़े, जैसे उल्काओं-सहित मेघ गिरते हैं।

श्लोक 16 (skanda.8.137.16)

द्रुमप्रहारभग्नाङ्गा गदाचूर्णितसन्धयः । दानवा निपतन्त्युर्व्यां वाजिनश्च्युतजीविताः ।।

drumaprahārabhagnāṅgā gadācūrṇitasandhayaḥ | dānavā nipatantyurvyāṁ vājinaścyutajīvitāḥ ||

वृक्षों के प्रहार से अंग-भंग हुए और गदा से जिनकी सन्धियाँ चूर-चूर हो चुकी थीं, ऐसे दानव भूमि पर गिरने लगे, और घोड़े भी प्राणहीन होकर गिरने लगे।

श्लोक 17 (skanda.8.137.17)

छिन्नध्वजपताकेषा भग्नाक्षयुगकूबराः । विध्वस्तास्तत्र दृश्यन्ते विमानप्रतिमा रथाः ।।

chinnadhvajapatākeṣā bhagnākṣayugakūbarāḥ | vidhvastāstatra dṛśyante vimānapratimā rathāḥ ||

जिनकी ध्वजाएँ-पताकाएँ कट चुकी थीं और जिनकी धुरी, जुआ तथा बल्लियाँ टूट चुकी थीं, ऐसे विमानों के समान सुन्दर रथ वहाँ ध्वस्त पड़े दिखाई देते थे।

श्लोक 18 (skanda.8.137.18)

मातङ्गैश्च तुरङ्गैश्च स्यन्दनैश्चावचूर्णितैः । विन्ध्याक्रान्तेव सा भूमिर्दुर्गमा समपद्यत ।।

mātaṅgaiśca turaṅgaiśca syandanaiścāvacūrṇitaiḥ | vindhyākrānteva sā bhūmirdurgamā samapadyata ||

टूटे-फूटे हाथियों, घोड़ों और रथों से भरी हुई वह भूमि विन्ध्याचल से आक्रान्त भूमि के समान दुर्गम हो गई।

श्लोक 19 (skanda.8.137.19)

तत्र देवाः स गन्धर्वाः सयक्षोरगकिन्नराः । उत्क्रुष्टवरशब्दाढ्यं चक्रुः सुबहुशोऽम्बरम् ।।

tatra devāḥ sa gandharvāḥ sayakṣoragakinnarāḥ | utkruṣṭavaraśabdāḍhyaṁ cakruḥ subahuśo'mbaram ||

वहाँ गन्धर्वों, यक्षों, नागों और किन्नरों सहित देवगण जय-जयकार के उत्तम शब्दों से आकाश को बार-बार गुँजायमान करने लगे।

श्लोक 20 (skanda.8.137.20)

दिव्यानां सुविचित्राणाममृतोपमगन्धिनाम् । वर्षं पपात पुष्पाणां युध्यन्ते यत्र ते रणे ।।

divyānāṁ suvicitrāṇāmamṛtopamagandhinām | varṣaṁ papāta puṣpāṇāṁ yudhyante yatra te raṇe ||

जहाँ वे युद्ध कर रहे थे, वहाँ अमृत के समान सुगन्धित तथा अत्यन्त विचित्र दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी।

श्लोक 21 (skanda.8.137.21)

तथा तु ते गजघननादगर्जनाः शरासिशक्त्यृष्टिगदाविसर्जनाः । परस्परं युयुधुरतीव संहता दितेः सुताः प्रमथगणाश्च दर्पिताः ।।

tathā tu te gajaghananādagarjanāḥ śarāsiśaktyṛṣṭigadāvisarjanāḥ | parasparaṁ yuyudhuratīva saṁhatā diteḥ sutāḥ pramathagaṇāśca darpitāḥ ||

इस प्रकार गजों और मेघों के समान गर्जन करते हुए, बाणों, तलवारों, शक्तियों, ऋष्टियों (भालों) और गदाओं को छोड़ते हुए, दिति के पुत्र और गर्वित प्रमथगण अत्यन्त संगठित होकर आपस में युद्ध करते रहे।

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