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अम्बिका खण्ड · अध्याय 138

कुजम्भवध

अध्याय 137अध्याय-सूचीअध्याय 139

श्लोक 1 (skanda.8.138.1)

ताम्यमानेषु दैत्येषु दैत्ययूथपयूथपाः । चक्रुर्वेगं महावेगा युगान्तेष्विव सागराः ।।

tāmyamāneṣu daityeṣu daityayūthapayūthapāḥ | cakrurvegaṁ mahāvegā yugānteṣviva sāgarāḥ ||

दैत्यों के इस प्रकार क्लान्त होने पर दैत्यसमूहों के महान वेगवान् नायकों ने प्रलयकाल के समुद्रों के समान वेग धारण किया।

श्लोक 2 (skanda.8.138.2)

प्रह्रादश्चानुह्रादश्च संह्रादः शिनिबाष्कलौ । प्रह्लादस्य च ये पुत्राश्चत्वारो भीमविक्रमाः ।।

prahrādaścānuhrādaśca saṁhrādaḥ śinibāṣkalau | prahlādasya ca ye putrāścatvāro bhīmavikramāḥ ||

प्रह्लाद, अनुह्लाद, संह्लाद तथा शिनि और बाष्कल - ये प्रह्लाद के चार भयंकर पराक्रमी पुत्र,

श्लोक 3 (skanda.8.138.3)

बलिर्बाणश्च वातश्च शम्भुः कार्तस्वनः कुभः । करभो नमुचिस्तारस्तारकश्चेन्द्रतापनः ।।

balirbāṇaśca vātaśca śambhuḥ kārtasvanaḥ kubhaḥ | karabho namucistārastārakaścendratāpanaḥ ||

बलि, बाण, वात, शम्भु, कार्तस्वन, कुभ, करभ, नमुचि, तार, तारक और इन्द्रतापन - ये सब भी (युद्ध में उठ खड़े हुए),

श्लोक 4 (skanda.8.138.4)

अञ्जनो रूषणो व्यंसो गविष्ठः पृथिवीञ्जयः । इल्वकः पिल्वकश्चैव धुन्धुर्मूकश्च दानवः ।।

añjano rūṣaṇo vyaṁso gaviṣṭhaḥ pṛthivīñjayaḥ | ilvakaḥ pilvakaścaiva dhundhurmūkaśca dānavaḥ ||

अंजन, रूषण, व्यंस, गविष्ठ, पृथिवीञ्जय, इल्वक, पिल्वक, धुन्धु और मूक नामक दानव,

श्लोक 5 (skanda.8.138.5)

खरो मुरोऽथ नरकः केशी धेनुक एव च । लम्बः प्रलम्बो ह्यजरो भावयव्योममार्दवाः ।।

kharo muro'tha narakaḥ keśī dhenuka eva ca | lambaḥ pralambo hyajaro bhāvayavyomamārdavāḥ ||

खर, मुर, नरक, केशी, धेनुक, लम्ब, प्रलम्ब, अजर, भावयव्य और ओममार्दव,

श्लोक 6 (skanda.8.138.6)

वृषपर्वा शतावतों गवाक्षो गोमुखस्तथा । सरो निसुन्दः सुन्दश्च महाबलपराक्रमाः ।।

vṛṣaparvā śatāvatoṁ gavākṣo gomukhastathā | saro nisundaḥ sundaśca mahābalaparākramāḥ ||

वृषपर्वा, शतावर्त, गवाक्ष, गोमुख, सर, निसुन्द और सुन्द - ये महान बल-पराक्रम से युक्त दानव,

श्लोक 7 (skanda.8.138.7)

पाको विपाकः सन्तापो हस्ती दुर्योधनस्तथा । मोहनो मथनश्चापि सचक्रश्चक्र एव च ।।

pāko vipākaḥ santāpo hastī duryodhanastathā | mohano mathanaścāpi sacakraścakra eva ca ||

पाक, विपाक, सन्ताप, हस्ती, दुर्योधन, मोहन, मथन, सचक्र और चक्र,

श्लोक 8 (skanda.8.138.8)

कालकावदनः कालः कालनेमी कलिद्रुमः । ह्यशीर्षश्चेन्द्रशिराश्च त्रिशिराः शंकुरेव च ।।

kālakāvadanaḥ kālaḥ kālanemī kalidrumaḥ | hyaśīrṣaścendraśirāśca triśirāḥ śaṁkureva ca ||

कालकावदन, काल, कालनेमि, कलिद्रुम, हयशीर्ष, इन्द्रशिरा, त्रिशिरा और शंकु,

श्लोक 9 (skanda.8.138.9)

तथा गगनमूर्धा च अविरोमा महामनः । असिलोमा तुहुण्डश्च हुण्डो वृत्रश्च दानवः ।।

tathā gaganamūrdhā ca aviromā mahāmanaḥ | asilomā tuhuṇḍaśca huṇḍo vṛtraśca dānavaḥ ||

गगनमूर्धा, अविरोमा, महामना, असिलोमा, तुहुण्ड, हुण्ड और वृत्र नामक दानव,

श्लोक 10 (skanda.8.138.10)

दशग्रीवश्च बालिश्च मेघनीलः प्रभाकरः । यश्चादित्यरथाच्चक्रं जहार बलदर्पितः ।।

daśagrīvaśca bāliśca meghanīlaḥ prabhākaraḥ | yaścādityarathāccakraṁ jahāra baladarpitaḥ ||

दशग्रीव, बालि, मेघनील, प्रभाकर, और वह बाण जिसने बल के मद में सूर्य के रथ का चक्र हर लिया था -

श्लोक 11 (skanda.8.138.11)

स विप्रचित्तिः सबलः सन्यवर्तत दंशितः । एते चान्ये च दितिजाः समदास्ते गजा इव ।।

sa vipracittiḥ sabalaḥ sanyavartata daṁśitaḥ | ete cānye ca ditijāḥ samadāste gajā iva ||

वही विप्रचित्ति भी अपनी सेना सहित कवच धारण कर लौट पड़ा। ये और अन्य भी दिति के पुत्र मदमत्त गजों के समान रणभूमि में उतर आए।

श्लोक 12 (skanda.8.138.12)

चक्रुरुत्साहमुत्सर्तुं प्रमथ्य प्रमथान् रणे । आमिषार्थे यथा सिंहा वासितार्थे यथा गजाः ।।

cakrurutsāhamutsartuṁ pramathya pramathān raṇe | āmiṣārthe yathā siṁhā vāsitārthe yathā gajāḥ ||

उन्होंने रणभूमि में प्रमथों को कुचलकर उखाड़ फेंकने का उत्साह वैसे ही धारण किया, जैसे सिंह मांस के लिए और गज मादा-गजी के लिए उत्साहित होते हैं।

श्लोक 13 (skanda.8.138.13)

दानवा विविशुस्तद्वत् प्रमथान् संजिघांसवः । तेषामापततो वेगो भीमोऽभूद्देवविद्विषाम् । सनक्रमकरो घोरो वेगः सिन्धुपतेरिव ।।

dānavā viviśustadvat pramathān saṁjighāṁsavaḥ | teṣāmāpatato vego bhīmo'bhūddevavidviṣām | sanakramakaro ghoro vegaḥ sindhupateriva ||

दानव उसी प्रकार प्रमथों का वध करने की इच्छा से घुस पड़े। उन देवद्वेषियों के आक्रमण का वेग वैसा ही भयंकर था, जैसा मगरमच्छों और नक्रों से युक्त समुद्र का घोर वेग होता है।

श्लोक 14 (skanda.8.138.14)

ते वै शस्त्रोपलशिलापादपाशनिपाणयः । प्रमथैरुद्धतै रुद्धा नदीवेगा इवार्णवैः ।।

te vai śastropalaśilāpādapāśanipāṇayaḥ | pramathairuddhatai ruddhā nadīvegā ivārṇavaiḥ ||

शस्त्र, पत्थर, शिलाएँ, वृक्ष और अशनि (वज्र) हाथों में लिए हुए वे दानव उद्धत प्रमथों द्वारा उसी प्रकार रोक दिए गए, जैसे नदियों के वेग समुद्रों द्वारा रोक दिए जाते हैं।

श्लोक 15 (skanda.8.138.15)

गणेश्वराधिपो नन्दी महाकायश्च वीर्यवान् । घण्टाकर्णः शंकुकर्णः कुण्डोदरमहोदरौ ।।

gaṇeśvarādhipo nandī mahākāyaśca vīryavān | ghaṇṭākarṇaḥ śaṁkukarṇaḥ kuṇḍodaramahodarau ||

गणेश्वरों के अधिपति नन्दी, महाकाय और पराक्रमी घण्टाकर्ण, शंकुकर्ण, कुण्डोदर और महोदर -

श्लोक 16 (skanda.8.138.16)

नन्दिषेणः सोमनन्दी करिकश्च गणेश्वरः । विघ्नो विनायकश्चैव स च सर्वविनायकः ।।

nandiṣeṇaḥ somanandī karikaśca gaṇeśvaraḥ | vighno vināyakaścaiva sa ca sarvavināyakaḥ ||

नन्दिषेण, सोमनन्दी, करिक नामक गणेश्वर, विघ्न, विनायक और सर्वविनायक -

श्लोक 17 (skanda.8.138.17)

पिङ्गलो लोहितश्चैव मयूरः कुक्कुटोऽपि च । पञ्चाक्षो वीरभद्रश्च विट्पतिः पावकार्दनः ।।

piṅgalo lohitaścaiva mayūraḥ kukkuṭo'pi ca | pañcākṣo vīrabhadraśca viṭpatiḥ pāvakārdanaḥ ||

पिंगल, लोहित, मयूर, कुक्कुट, पंचाक्ष, वीरभद्र, विट्पति और पावकार्दन -

श्लोक 18 (skanda.8.138.18)

अदित्याप्यायनश्चैव सोमाप्यायन एव च । समुद्राप्यायश्चान्यः पावकाप्यायनस्तथा ।।

adityāpyāyanaścaiva somāpyāyana eva ca | samudrāpyāyaścānyaḥ pāvakāpyāyanastathā ||

अदित्याप्यायन, सोमाप्यायन, समुद्राप्याय और पावकाप्यायन -

श्लोक 19 (skanda.8.138.19)

वरबर्हिध्वजश्चैव विशाखः शाख एव च । नैगमेषश्च बलवान् रुद्रवीर्यपराक्रमाः ।।

varabarhidhvajaścaiva viśākhaḥ śākha eva ca | naigameṣaśca balavān rudravīryaparākramāḥ ||

श्रेष्ठ मयूरध्वजधारी विशाख, शाख और बलवान नैगमेष - ये सब रुद्र के समान वीर्य और पराक्रम से युक्त थे,

श्लोक 20 (skanda.8.138.20)

बाहुलेयोद्भवा ये च प्रमथा भीमरूपिणः । तेभ्ययुर्दानवान् युद्धे वृषभा वृषभानिव ।।

bāhuleyodbhavā ye ca pramathā bhīmarūpiṇaḥ | tebhyayurdānavān yuddhe vṛṣabhā vṛṣabhāniva ||

और कार्तिकेय से उत्पन्न जो भीषण रूपधारी प्रमथ थे, वे वृषभों के समान युद्ध में दानवों की ओर उसी प्रकार झपटे, जैसे वृषभ दूसरे वृषभों पर झपटते हैं।

श्लोक 21 (skanda.8.138.21)

तेषां तेषांश्च संग्रामस्तुमुलः समपद्यत । अजने गन्धहस्तीनां शरभैरिव दारुणः ।।

teṣāṁ teṣāṁśca saṁgrāmastumulaḥ samapadyata | ajane gandhahastīnāṁ śarabhairiva dāruṇaḥ ||

उन-उन दोनों दलों के बीच वैसा ही भयंकर तुमुल संग्राम हुआ, जैसा वन में गन्धहस्तियों और शरभों के बीच होता है।

श्लोक 22 (skanda.8.138.22)

महागजैरिव गजाः पर्वतैरिव पर्वताः । सागराः सागरैर्यद्वत् पावकैरिव पावकाः ।।

mahāgajairiva gajāḥ parvatairiva parvatāḥ | sāgarāḥ sāgarairyadvat pāvakairiva pāvakāḥ ||

गज महागजों से, पर्वत पर्वतों से, सागर सागरों से और अग्नि अग्नियों से भिड़ गए हों, ऐसा प्रतीत होता था।

श्लोक 23 (skanda.8.138.23)

तथा सुरा जातदर्पाः क्रोधवैश्वानरावृताः । धृताः पारिषदैः शूरैर्विघ्ना धर्मपरैरिव ।।

tathā surā jātadarpāḥ krodhavaiśvānarāvṛtāḥ | dhṛtāḥ pāriṣadaiḥ śūrairvighnā dharmaparairiva ||

उसी प्रकार गर्वोन्मत्त और क्रोधाग्नि से आवृत असुर भी शूर पार्षदों द्वारा उसी प्रकार रोक दिए गए, जैसे विघ्न धर्मपरायण पुरुषों के मार्ग को रोक देते हैं।

श्लोक 24 (skanda.8.138.24)

टङ्कैर्विदार्यमाणानि गिर्यग्राणि समन्ततः । गृध्रचक्रायमाणानि पतन्त्युर्व्यां सहस्रशः ।।

ṭaṅkairvidāryamāṇāni giryagrāṇi samantataḥ | gṛdhracakrāyamāṇāni patantyurvyāṁ sahasraśaḥ ||

टांकियों से चारों ओर विदीर्ण किए गए पर्वत-शिखर, गिद्धों के चक्करों से घिरकर सहस्रों की संख्या में पृथ्वी पर गिरने लगे।

श्लोक 25 (skanda.8.138.25)

चक्राणि चक्रैश्छिद्यन्ते शूलैः शूला विदारिताः । इषुभिश्चेषवो विद्धाः पतन्ति भुजगा इव ।।

cakrāṇi cakraiśchidyante śūlaiḥ śūlā vidāritāḥ | iṣubhiśceṣavo viddhāḥ patanti bhujagā iva ||

चक्र चक्रों से कट रहे थे, शूल शूलों से विदीर्ण हो रहे थे, और बाण बाणों से बिंधकर सर्पों के समान भूमि पर गिर रहे थे।

श्लोक 26 (skanda.8.138.26)

वदनैश्चन्द्रपद्माभैः करैश्च परिघोपमैः । आस्तृता मेदिनी भाति व्याघ्रचर्माम्बरैरिव ।।

vadanaiścandrapadmābhaiḥ karaiśca parighopamaiḥ | āstṛtā medinī bhāti vyāghracarmāmbarairiva ||

चन्द्रमा और कमल के समान कटे हुए मुखों और परिघ के समान कटी हुई भुजाओं से ढकी हुई पृथ्वी व्याघ्रचर्म के वस्त्रों से आच्छादित-सी प्रतीत हो रही थी।

श्लोक 27 (skanda.8.138.27)

मेदो मज्जास्थिपङ्काङ्कं केशकश्मलसंकुलम् । बभूवायोधनं घोरं श्मशानवनसन्निभम् ।।

medo majjāsthipaṅkāṅkaṁ keśakaśmalasaṁkulam | babhūvāyodhanaṁ ghoraṁ śmaśānavanasannibham ||

चर्बी, मज्जा और हड्डियों के कीचड़ से चिह्नित तथा बालों के मैल से भरा हुआ वह भयंकर युद्धस्थल श्मशान-वन के समान हो गया।

श्लोक 28 (skanda.8.138.28)

हया गजा रथाश्चापि दानवानां गणेश्वरैः । संचूर्णिताः प्रदृश्यन्ते तत्र तत्र महीतले ।।

hayā gajā rathāścāpi dānavānāṁ gaṇeśvaraiḥ | saṁcūrṇitāḥ pradṛśyante tatra tatra mahītale ||

दानवों के घोड़े, हाथी और रथ गणेश्वरों द्वारा चूर-चूर किए गए इधर-उधर पृथ्वी पर पड़े दिखाई दे रहे थे।

श्लोक 29 (skanda.8.138.29)

परीक्षणीयस्त्वमद्य समितौ सुरेतराणां सुरराजशत्रो इत्येवं ब्रुवति नन्दिनि । इन्द्रकल्पः शक्रेन्दुवायुप्रतितुल्यवीर्यः बद्ध्वा त्रिशाखां भृकुटीं ललाटे स नन्दिनं प्राह तदा कुजम्भः ।।

parīkṣaṇīyastvamadya samitau suretarāṇāṁ surarājaśatro ityevaṁ bruvati nandini | indrakalpaḥ śakrenduvāyupratitulyavīryaḥ baddhvā triśākhāṁ bhṛkuṭīṁ lalāṭe sa nandinaṁ prāha tadā kujambhaḥ ||

'हे देवराज के शत्रु! आज इस असुर-सभा में तेरी परीक्षा होगी' - नन्दी के ऐसा कहने पर, इन्द्र के समान तेजस्वी तथा इन्द्र, चन्द्रमा और वायु के तुल्य बलशाली कुजम्भ ने अपने ललाट पर त्रिशाखा भृकुटी चढ़ाकर नन्दी से यह कहा -

श्लोक 30 (skanda.8.138.30)

वानरानन किं वाग्भिर्मां भीषयितुमिच्छसि । हिरण्यकशिपोः पौत्रो नाहं प्राकृतदानवः ।।

vānarānana kiṁ vāgbhirmāṁ bhīṣayitumicchasi | hiraṇyakaśipoḥ pautro nāhaṁ prākṛtadānavaḥ ||

'हे वानरमुख! क्या तू वचनों से मुझे भयभीत करना चाहता है? मैं हिरण्यकशिपु का पौत्र हूँ, कोई साधारण दानव नहीं।'

श्लोक 31 (skanda.8.138.31)

यमात्सदण्डाद्वरुणात्सपाशादिन्द्रात्सवज्रात्सगदाद्धनेशात् । नाहं रणस्थो भयमाहरामि भयं न दैत्येषु पलायितं वा ।।

yamātsadaṇḍādvaruṇātsapāśādindrātsavajrātsagadāddhaneśāt | nāhaṁ raṇastho bhayamāharāmi bhayaṁ na daityeṣu palāyitaṁ vā ||

'दण्डधारी यम से, पाशधारी वरुण से, वज्रधारी इन्द्र से अथवा गदाधारी कुबेर से भी मुझे रणभूमि में कोई भय नहीं है; दैत्यों में न तो भय है और न पलायन।'

श्लोक 32 (skanda.8.138.32)

अद्येह ते पिङ्गललोलनेत्रं मुखं त्वपात्रं विकृतं मनोज्ञम् । मद्बाणलूनं पततामवन्यां तालाद्यथा तालफलं सुपक्वम् ।।

adyeha te piṅgalalolanetraṁ mukhaṁ tvapātraṁ vikṛtaṁ manojñam | madbāṇalūnaṁ patatāmavanyāṁ tālādyathā tālaphalaṁ supakvam ||

'तेरे इस पीले चंचल नेत्रोंवाले, अयोग्य किन्तु तुझे मनोहर लगने वाले विकृत मुख को मैं आज अपने बाणों से काटकर उसी प्रकार भूमि पर गिरा दूँगा, जैसे ताड़ के वृक्ष से पका हुआ ताड़फल गिरता है।'

श्लोक 33 (skanda.8.138.33)

इत्येवमुक्त्वा शरजालवृष्टया नन्दीश्वरं दानवराजमेघः । सिंहो यथातीव विमुच्य नादं प्राच्छादयन्मेघ इवाचलेन्द्रम् ।।

ityevamuktvā śarajālavṛṣṭayā nandīśvaraṁ dānavarājameghaḥ | siṁho yathātīva vimucya nādaṁ prācchādayanmegha ivācalendram ||

ऐसा कहकर, मेघ के समान गम्भीर स्वरवाले उस दानवराज ने अत्यन्त सिंहनाद करते हुए बाणों के जाल की वृष्टि से नन्दीश्वर को उसी प्रकार ढक दिया, जैसे मेघ किसी महान पर्वत को ढक लेता है।

श्लोक 34 (skanda.8.138.34)

तरुं यथा पक्वफलं शकुन्ता वल्मीकमुच्चं भुजगा इवोग्राः । तथा शरा दानवराजमुक्ता नन्दीश्वरं दीप्तमुखा विशन्ति ।।

taruṁ yathā pakvaphalaṁ śakuntā valmīkamuccaṁ bhujagā ivogrāḥ | tathā śarā dānavarājamuktā nandīśvaraṁ dīptamukhā viśanti ||

जैसे पक्षी पके फलोंवाले वृक्ष में और भयंकर सर्प ऊँची बाँबी में प्रवेश करते हैं, वैसे ही उस दानवराज के छोड़े हुए, प्रज्वलित मुखवाले बाण नन्दीश्वर के शरीर में घुसने लगे।

श्लोक 35 (skanda.8.138.35)

वज्रेण वज्री स तु तांच्छरौघान् शैलः पयोधानिव सन्निवार्य । कुजम्भमुद्दिश्य मुमोच वज्रं ननाद चोच्चैर्नभसीव मेघः ।।

vajreṇa vajrī sa tu tāṁccharaughān śailaḥ payodhāniva sannivārya | kujambhamuddiśya mumoca vajraṁ nanāda coccairnabhasīva meghaḥ ||

वज्रधारी नन्दी ने उस बाण-समूह को उसी प्रकार वज्र से रोककर, जैसे पर्वत मेघों को रोक देता है, कुजम्भ को लक्ष्य करके वज्र छोड़ा और आकाश में मेघ के समान ऊँचा गर्जन किया।

श्लोक 36 (skanda.8.138.36)

तद्विस्फुलिङ्गोद्गतघोररूपं समाहतारावविमुक्तरावम् । वज्रं प्रधावत्यसुरं निहन्तुं गिरिं यथा देवतराजवज्रम् ।।

tadvisphuliṅgodgataghorarūpaṁ samāhatārāvavimuktarāvam | vajraṁ pradhāvatyasuraṁ nihantuṁ giriṁ yathā devatarājavajram ||

चिंगारियों से उठे भयंकर रूपवाले, आघात से गर्जन को छोड़ते हुए उस वज्र ने उस असुर के वध के लिए वैसे ही धावा किया, जैसे देवराज इन्द्र का वज्र किसी पर्वत पर धावा करता है।

श्लोक 37 (skanda.8.138.37)

तद्वत्सदन्तैः सुविपाटवस्तैः समीपगैर्दिग्धविकर्णिभिश्च । जघान वज्रं शतधा कुजम्भः संवर्त्तकाग्निं समयेव मेघः ।।

tadvatsadantaiḥ suvipāṭavastaiḥ samīpagairdigdhavikarṇibhiśca | jaghāna vajraṁ śatadhā kujambhaḥ saṁvarttakāgniṁ samayeva meghaḥ ||

उतने ही तीक्ष्ण, समीप आते, विष-लिप्त पंखवाले बाणों से कुजम्भ ने उस वज्र को सैकड़ों टुकड़ों में उसी प्रकार काट डाला, जैसे प्रलयकाल के मेघ प्रलयाग्नि को शान्त कर देते हैं।

श्लोक 38 (skanda.8.138.38)

तद्बाणवेगप्रहतातिवेगं शैलादिनिर्मुक्तममोघवेगम् । वज्रं कुजम्भाभिहतं निवृत्तं दत्तं यथोन्मादविकारदत्तम् ।।

tadbāṇavegaprahatātivegaṁ śailādinirmuktamamoghavegam | vajraṁ kujambhābhihataṁ nivṛttaṁ dattaṁ yathonmādavikāradattam ||

उन बाणों के वेग से आहत होकर, पर्वत से छोड़े गए के समान अमोघ वेगवाला वह वज्र, कुजम्भ द्वारा प्रहार किए जाने पर उसी प्रकार लौट गया, जैसे उन्माद की अवस्था में दिया गया कोई दान लौटा दिया जाता है।

श्लोक 39 (skanda.8.138.39)

विष्टम्भितं वज्रवरं निशाम्य निशाम्य नादं च कुजम्भमुक्तम् । ससार नन्दी कुपितो रिपुं तं राहुर्यथा वे खतले तमोघ्नम् ।।

viṣṭambhitaṁ vajravaraṁ niśāmya niśāmya nādaṁ ca kujambhamuktam | sasāra nandī kupito ripuṁ taṁ rāhuryathā ve khatale tamoghnam ||

अपने श्रेष्ठ वज्र को इस प्रकार रोका गया देखकर और कुजम्भ का गर्जन सुनकर, क्रुद्ध नन्दी उस शत्रु की ओर उसी प्रकार दौड़े, जैसे राहु आकाश में अंधकार-नाशक (सूर्य) की ओर दौड़ता है।

श्लोक 40 (skanda.8.138.40)

बलात्स संगृह्य रथं करेण ईषावराग्रे प्रमथेशपालः । आक्षिप्य चिक्षेप ससूतवाहं क्षिप्त्वा च भूयस्स ररास घोरम् ।।

balātsa saṁgṛhya rathaṁ kareṇa īṣāvarāgre pramatheśapālaḥ | ākṣipya cikṣepa sasūtavāhaṁ kṣiptvā ca bhūyassa rarāsa ghoram ||

प्रमथेश्वरों के रक्षक नन्दी ने बलपूर्वक उस रथ को उसके ईषादण्ड के अगले भाग से हाथ से पकड़कर, सारथि और घोड़ों सहित उसे खींचकर फेंक दिया, और फेंककर पुनः भयंकर गर्जना की।

श्लोक 41 (skanda.8.138.41)

संभ्रान्तवक्रः सविसन्धिताश्वः प्रभ्रष्टसूतासिशिरोग्रनेमिः । कुजम्भवाहः खतलात्पपात गिरिर्यथा वज्रनिकृत्तपक्षः ।।

saṁbhrāntavakraḥ savisandhitāśvaḥ prabhraṣṭasūtāsiśirogranemiḥ | kujambhavāhaḥ khatalātpapāta giriryathā vajranikṛttapakṣaḥ ||

जिसका ढाँचा टूट गया था, जिसके घोड़े जोतों से उखड़ गए थे, जिसका सारथि, तलवार और अगला पहिया छूट गया था, ऐसा कुजम्भ का वह रथ आकाश से उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे वज्र से पंख कटा हुआ पर्वत गिर पड़ता है।

श्लोक 42 (skanda.8.138.42)

तस्माद्रथान्नन्दिगजप्रनुन्नोऽदपेत्य प्रह्रादिरदीनसत्वः । शक्तिं समादाय न दीनसत्वस्तस्थौ सविद्युत्सरवो यथाब्दः ।।

tasmādrathānnandigajapranunno'dapetya prahrādiradīnasatvaḥ | śaktiṁ samādāya na dīnasatvastasthau savidyutsaravo yathābdaḥ ||

नन्दी के आघात से उस रथ से गिराए गए प्रह्लाद-वंशज कुजम्भ ने अदीन साहस के साथ हटकर शक्ति उठा ली और, विद्युत तथा गर्जन से युक्त मेघ के समान, अपना साहस कम न होने देते हुए खड़ा रहा।

श्लोक 43 (skanda.8.138.43)

तां सर्पजिह्वामिव लेलिहानो मृत्युं क्षुधार्तामिव भोक्तुकामाम् । शिखां महाग्नेरिव दीप्यमानां स नन्दिने संप्रमुमोच जम्भः ।।

tāṁ sarpajihvāmiva lelihāno mṛtyuṁ kṣudhārtāmiva bhoktukāmām | śikhāṁ mahāgneriva dīpyamānāṁ sa nandine saṁpramumoca jambhaḥ ||

सर्प की जिह्वा के समान लपलपाती, भूख से पीड़ित मृत्यु के समान भक्षण की इच्छुक, महाग्नि की शिखा के समान प्रज्वलित उस शक्ति को कुजम्भ ने नन्दी पर छोड़ दिया।

श्लोक 44 (skanda.8.138.44)

सा शक्तिरिन्द्रारिभुजप्रमुक्ता उग्रातिदीप्ताङ्गिरसीव कृत्या । अभ्याहता नन्दिमुखानलेन दग्धा पतङ्गीव यथानलेन ।।

sā śaktirindrāribhujapramuktā ugrātidīptāṅgirasīva kṛtyā | abhyāhatā nandimukhānalena dagdhā pataṅgīva yathānalena ||

इन्द्रशत्रु की भुजा से छूटी हुई, अंगिरा की उग्र और अत्यन्त तेजस्वी कृत्या के समान वह शक्ति नन्दी के मुखाग्नि से टकराकर उसी प्रकार भस्म हो गई, जैसे अग्नि में पतंगा जल जाता है।

श्लोक 45 (skanda.8.138.45)

शक्तिं स दग्ध्वा वदनानलेन कपीन्द्रवक्त्रस्तपनप्रभावः । वज्रेण तं सत्वरमाजघान वज्रेण मेरुं भगवानिवेन्द्रः ।।

śaktiṁ sa dagdhvā vadanānalena kapīndravaktrastapanaprabhāvaḥ | vajreṇa taṁ satvaramājaghāna vajreṇa meruṁ bhagavānivendraḥ ||

सूर्य के समान प्रभाववाले तथा वानरराज के समान मुखवाले नन्दी ने अपने मुख की अग्नि से उस शक्ति को भस्म करके, वज्र से तुरन्त उस पर उसी प्रकार प्रहार किया, जैसे भगवान इन्द्र वज्र से मेरु पर्वत पर प्रहार करते हैं।

श्लोक 46 (skanda.8.138.46)

स वज्रघातादवचूर्णितास्थिः संशीर्णदन्तेक्षणभग्नजानुः । कुब्जः कुजम्भो निपपात भूमौ शक्रेण वज्राभिहतो यथाद्रिः ।।

sa vajraghātādavacūrṇitāsthiḥ saṁśīrṇadantekṣaṇabhagnajānuḥ | kubjaḥ kujambho nipapāta bhūmau śakreṇa vajrābhihato yathādriḥ ||

वज्र के प्रहार से जिसकी हड्डियाँ चूर-चूर हो गई थीं, दाँत टूट गए थे, आँखें फूट गई थीं और घुटने टूट गए थे, वह कुबड़ा कुजम्भ भूमि पर उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे इन्द्र के वज्र से आहत पर्वत गिर पड़ता है।

श्लोक 47 (skanda.8.138.47)

तस्मिन् हते देवगणा विनेदुः सेदुः सुराणामरयश्च दैन्यात् । भूताधिपं भूतपतिश्च देवं प्रपूजयामास शाशाङ्कचिह्नम् ।।

tasmin hate devagaṇā vineduḥ seduḥ surāṇāmarayaśca dainyāt | bhūtādhipaṁ bhūtapatiśca devaṁ prapūjayāmāsa śāśāṅkacihnam ||

उसके मारे जाने पर देवगण जय-जयकार करने लगे और देवताओं के शत्रु दीनता के मारे खिन्न हो गए। तब भूतपति भगवान शिव ने चन्द्रकला-चिह्नधारी भूताधिप नन्दी का भलीभाँति पूजन किया।

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