अम्बिका खण्ड · अध्याय 139
जम्भ-परिघयुद्ध
श्लोक 1 (skanda.8.139.1)
कुजम्भं निहतं दृष्ट्वा नन्दिना देवनन्दिना । निनादं चक्रिरे देवाश्चारणाश्च महोरगाः ।।
kujambhaṁ nihataṁ dṛṣṭvā nandinā devanandinā | ninādaṁ cakrire devāścāraṇāśca mahoragāḥ ||
देवनन्दन नन्दी द्वारा कुजम्भ को मारा गया देखकर देवताओं, चारणों और महानागों ने जय-घोष किया।
श्लोक 2 (skanda.8.139.2)
तेन देवनिनादेन कुजम्भनिधनेन च । जम्भो दानवशार्दूलः क्रोधमाहारयन्महत् ।।
tena devaninādena kujambhanidhanena ca | jambho dānavaśārdūlaḥ krodhamāhārayanmahat ||
उस देव-जयघोष और कुजम्भ की मृत्यु से दानवश्रेष्ठ जम्भ महान क्रोध से भर गया।
श्लोक 3 (skanda.8.139.3)
तस्य क्रुद्धस्य गात्रेभ्यो निष्पेतुः पावकार्चिषः । मेरोर्वज्राहतस्येव विस्फुलिङ्गाः समन्ततः ।।
tasya kruddhasya gātrebhyo niṣpetuḥ pāvakārciṣaḥ | merorvajrāhatasyeva visphuliṅgāḥ samantataḥ ||
क्रुद्ध हुए उसके शरीर से चारों ओर अग्नि-ज्वालाएँ निकलने लगीं, जैसे वज्र से आहत मेरु पर्वत से चिंगारियाँ निकलती हैं।
श्लोक 4 (skanda.8.139.4)
सोल्काम्बुदनिभाभासो जम्भः क्रोधसमावृतः । द्रुद्राव नन्दिनं हन्तुं कुञ्जरं सिंहराडिव ।।
solkāmbudanibhābhāso jambhaḥ krodhasamāvṛtaḥ | drudrāva nandinaṁ hantuṁ kuñjaraṁ siṁharāḍiva ||
उल्का-सहित मेघ के समान तेजवाला, क्रोध से आवृत जम्भ नन्दी को मारने के लिए उसी प्रकार दौड़ा, जैसे सिंहराज गजराज पर झपटता है।
श्लोक 5 (skanda.8.139.5)
सोऽर्धभारसहस्रस्य कृतं सैक्यायसं महत् । उद्वहन् परिघं घोरं दैत्यो दुद्राव नन्दिनम् ।।
so'rdhabhārasahasrasya kṛtaṁ saikyāyasaṁ mahat | udvahan parighaṁ ghoraṁ daityo dudrāva nandinam ||
पाँच सौ भार लोहे से बना हुआ, विशाल और भयंकर परिघ (लौह-गदा) उठाए हुए वह दैत्य नन्दी की ओर दौड़ा।
श्लोक 6 (skanda.8.139.6)
तिष्ठेदानीं दुराचार मया दृष्टः क्व यास्यसि । एष त्वं वज्रसंकाशः परिघश्चूर्णयिष्यति ।।
tiṣṭhedānīṁ durācāra mayā dṛṣṭaḥ kva yāsyasi | eṣa tvaṁ vajrasaṁkāśaḥ parighaścūrṇayiṣyati ||
'हे दुराचारी! अब ठहर, तू मेरी दृष्टि में आ चुका है, अब कहाँ जाएगा? यह वज्र-सदृश परिघ तुझे चूर-चूर कर देगा।'
श्लोक 7 (skanda.8.139.7)
इत्युक्त्वा घोरया वाचा जंभो नन्दिनमग्रतः । परिघं तस्य चिक्षेप दण्डं यम इवापरः ।।
ityuktvā ghorayā vācā jaṁbho nandinamagrataḥ | parighaṁ tasya cikṣepa daṇḍaṁ yama ivāparaḥ ||
ऐसा भयंकर वाणी में कहकर जम्भ ने नन्दी के सामने उस पर परिघ फेंका, जैसे यमराज दूसरा दण्ड फेंकते हों।
श्लोक 8 (skanda.8.139.8)
स तस्य करनिर्मुक्तो निर्मुक्तोरगसन्निभः । परिघो नन्दिनं याति हन्तुं कालानलोपमः ।।
sa tasya karanirmukto nirmuktoragasannibhaḥ | parigho nandinaṁ yāti hantuṁ kālānalopamaḥ ||
उसके हाथ से छूटा हुआ, केंचुल छोड़े सर्प के समान वह परिघ प्रलयाग्नि के समान नन्दी को मारने के लिए दौड़ा।
श्लोक 9 (skanda.8.139.9)
तं वासुकिभुजङ्गाभं ब्रह्मदण्डनिभं महत् । वज्रेणाभ्यह्नन्नन्दी देवराजो यथा बलम् ।।
taṁ vāsukibhujaṅgābhaṁ brahmadaṇḍanibhaṁ mahat | vajreṇābhyahnannandī devarājo yathā balam ||
वासुकि सर्प के समान और ब्रह्मदण्ड के समान उस विशाल परिघ पर नन्दी ने वज्र से उसी प्रकार प्रहार किया, जैसे देवराज इन्द्र ने बल (वृत्रासुर) पर प्रहार किया था।
श्लोक 10 (skanda.8.139.10)
वज्रप्रहारं तृणवद्विचिन्त्य परिघः स तु । शक्राग्निरिव दुर्दृश्यः प्रधावन्नन्दिनं प्रति ।।
vajraprahāraṁ tṛṇavadvicintya parighaḥ sa tu | śakrāgniriva durdṛśyaḥ pradhāvannandinaṁ prati ||
वज्र के प्रहार को तिनके के समान तुच्छ मानकर वह परिघ इन्द्र की अग्नि के समान दुर्दर्श होकर नन्दी की ओर दौड़ता रहा।
श्लोक 11 (skanda.8.139.11)
कृतो निनादः सुमहान् प्रमथेश्च सहस्रशः । श्रुत्वा निनादं देवानां परिघं वीक्ष्य चागतम् ।।
kṛto ninādaḥ sumahān pramatheśca sahasraśaḥ | śrutvā ninādaṁ devānāṁ parighaṁ vīkṣya cāgatam ||
प्रमथों ने सहस्रों की संख्या में महान घोष किया। देवताओं का वह घोष सुनकर और आते हुए परिघ को देखकर -
श्लोक 12 (skanda.8.139.12)
शंकुकर्णोऽभिदुद्राव परिघं प्रति वेगितः । स तं कर्कोटकप्रख्यं दुर्निवार्यं महास्त्रवत् ।।
śaṁkukarṇo'bhidudrāva parighaṁ prati vegitaḥ | sa taṁ karkoṭakaprakhyaṁ durnivāryaṁ mahāstravat ||
शंकुकर्ण उस परिघ की ओर वेगपूर्वक दौड़ पड़े, जो कर्कोटक नाग के समान और महान अस्त्र के समान अनिवार्य था।
श्लोक 13 (skanda.8.139.13)
शंकुकर्णेन परिघं गृह्णीतं वीक्ष्य तद्बलात् । विनेदुर्मुदिता देवाः शंकुकर्णश्च तुष्टुवुः ।।
śaṁkukarṇena parighaṁ gṛhṇītaṁ vīkṣya tadbalāt | vinedurmuditā devāḥ śaṁkukarṇaśca tuṣṭuvuḥ ||
शंकुकर्ण द्वारा उस परिघ को बलपूर्वक पकड़ लिया गया देखकर देवगण प्रसन्न होकर जय-घोष करने लगे और शंकुकर्ण की स्तुति करने लगे।
श्लोक 14 (skanda.8.139.14)
शंकुकर्णोऽपि परिघं गृहीत्वा बलवान् पुनः । ररास जम्भमुद्दिश्य ससार च रणप्रियः ।।
śaṁkukarṇo'pi parighaṁ gṛhītvā balavān punaḥ | rarāsa jambhamuddiśya sasāra ca raṇapriyaḥ ||
बलवान शंकुकर्ण भी उस परिघ को लेकर पुनः गर्जना करते हुए, युद्धप्रिय होकर जम्भ की ओर लक्ष्य करके दौड़ पड़े।
श्लोक 15 (skanda.8.139.15)
ततो दानवशार्दूलः ससार रणलालसः ।
tato dānavaśārdūlaḥ sasāra raṇalālasaḥ |
तब वह दानवश्रेष्ठ जम्भ भी युद्ध की लालसा से उसकी ओर दौड़ा।
श्लोक 16 (skanda.8.139.16)
ततो गणेश्वरबले दानवानां बले तथा । जज्ञे वादित्रनिनदः सिंहनादविमिश्रितः ।।
tato gaṇeśvarabale dānavānāṁ bale tathā | jajñe vāditraninadaḥ siṁhanādavimiśritaḥ ||
तब गणेश्वरों की सेना में और दानवों की सेना में भी सिंहनाद से मिश्रित वाद्यों का घोष उत्पन्न हुआ।
श्लोक 17 (skanda.8.139.17)
अथ गगनतले बभूव शब्दः क्षुभितसमुद्रपयोदनादकल्पः । दनुतनयगणाधिपेशयुद्धं तदुपनिशाम्य दिवौकसां तदानीम् ।।
atha gaganatale babhūva śabdaḥ kṣubhitasamudrapayodanādakalpaḥ | danutanayagaṇādhipeśayuddhaṁ tadupaniśāmya divaukasāṁ tadānīm ||
उस समय आकाश-तल में क्षुब्ध समुद्र और गरजते मेघों के समान शब्द उत्पन्न हुआ, क्योंकि उस समय देवगण दनुपुत्रों और गणाधिपों के उस युद्ध को उत्सुकतापूर्वक देख-सुन रहे थे।
श्लोक 18 (skanda.8.139.18)
प्रमथगणवरास्सनागरुद्रा ह्यसुरवराश्च सहान्धका रणस्थाः । व्युपरतकलहास्तदावतस्थुर्गणपतिदानवयुद्धमीक्षमाणाः ।।
pramathagaṇavarāssanāgarudrā hyasuravarāśca sahāndhakā raṇasthāḥ | vyuparatakalahāstadāvatasthurgaṇapatidānavayuddhamīkṣamāṇāḥ ||
श्रेष्ठ प्रमथगण नागों और रुद्रों सहित, तथा अन्धक सहित श्रेष्ठ असुरगण भी रणभूमि में उस समय अपना पारस्परिक कलह रोककर, गणपतियों और दानवों के युद्ध को देखते हुए वहीं ठहर गए।