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अम्बिका खण्ड · अध्याय 140

शंकुकर्ण-वृत्रयुद्ध

अध्याय 139अध्याय-सूचीअध्याय 141

श्लोक 1 (skanda.8.140.1)

शंकुकर्ण तु धावन्तं जम्भं प्रति महाबलः । वृत्रोऽभ्यधावत्तं हन्तुं पंचानन इव द्विपम् ।।

śaṁkukarṇa tu dhāvantaṁ jambhaṁ prati mahābalaḥ | vṛtro'bhyadhāvattaṁ hantuṁ paṁcānana iva dvipam ||

जम्भ की ओर दौड़ते हुए महाबली शंकुकर्ण की ओर वृत्र उसे मारने के लिए उसी प्रकार दौड़ा, जैसे सिंह गजराज की ओर दौड़ता है।

श्लोक 2 (skanda.8.140.2)

उत्सृज्य शंकुकर्णोऽपि जम्भं गणपपुंगवः । वृत्रमेवाभिदुद्राव विघातो वै दमं यथा ।।

utsṛjya śaṁkukarṇo'pi jambhaṁ gaṇapapuṁgavaḥ | vṛtramevābhidudrāva vighāto vai damaṁ yathā ||

गणपतियों में श्रेष्ठ शंकुकर्ण ने भी जम्भ को छोड़कर वृत्र की ओर ही उसी प्रकार धावा किया, जैसे कोई विघ्न संयम की ओर धावा करता है।

श्लोक 3 (skanda.8.140.3)

परिघेणाहनच्चैनं शंकुकर्णो गणेश्वरः । महागिरिं यथा शक्रो वज्रेण शतपर्वणा ।।

parigheṇāhanaccainaṁ śaṁkukarṇo gaṇeśvaraḥ | mahāgiriṁ yathā śakro vajreṇa śataparvaṇā ||

गणेश्वर शंकुकर्ण ने उस परिघ से वृत्र पर उसी प्रकार प्रहार किया, जैसे इन्द्र शतपर्वा वज्र से किसी महान पर्वत पर प्रहार करते हैं।

श्लोक 4 (skanda.8.140.4)

वृत्रोऽपि चाथ दैत्येन्द्रः परिघेणायसेन वै । ब्रभ्राम ताडितोऽत्यर्थं वायुनुन्न इव द्रुमः ।।

vṛtro'pi cātha daityendraḥ parigheṇāyasena vai | brabhrāma tāḍito'tyarthaṁ vāyununna iva drumaḥ ||

उस लौह-परिघ से अत्यन्त आहत हुआ दैत्येन्द्र वृत्र भी वायु से हिलाए गए वृक्ष के समान डगमगाने लगा।

श्लोक 5 (skanda.8.140.5)

स तेन सुप्रहारेण रुधिरस्रावचित्रितः । स्वर्णधातुरसोद्गारी नीलाचल इवाबभौ ।।

sa tena suprahāreṇa rudhirasrāvacitritaḥ | svarṇadhāturasodgārī nīlācala ivābabhau ||

उस भारी प्रहार से रक्तस्राव से चित्रित वह उसी प्रकार शोभित हुआ, जैसे स्वर्ण-धातु का रस उगलता हुआ कोई नीला पर्वत।

श्लोक 6 (skanda.8.140.6)

वृत्रे घूर्णति दैत्येन्द्रे परिघाभिहते भृशम् । विनेदुर्देवगन्धर्वाः पूजयन्तो गणेश्वरम् ।।

vṛtre ghūrṇati daityendre parighābhihate bhṛśam | vinedurdevagandharvāḥ pūjayanto gaṇeśvaram ||

परिघ के भारी प्रहार से पीड़ित होकर डगमगाते हुए दैत्येन्द्र वृत्र को देखकर देवता और गन्धर्व गणेश्वर की स्तुति करते हुए जय-जयकार करने लगे।

श्लोक 7 (skanda.8.140.7)

ततश्चिरात्समाश्वस्य वृत्रो दानवपुङ्गवः । गिरेः शृङ्गं समुत्पाट्य शंकुकर्णमधावत ।।

tataścirātsamāśvasya vṛtro dānavapuṅgavaḥ | gireḥ śṛṅgaṁ samutpāṭya śaṁkukarṇamadhāvata ||

इसके बाद बहुत देर में सचेत होकर दानवश्रेष्ठ वृत्र ने पर्वत का शिखर उखाड़कर शंकुकर्ण की ओर धावा किया।

श्लोक 8 (skanda.8.140.8)

स तस्य तत्सवृक्षर्क्षं सधातूपलपन्नगम् । गणेश्वरायाचलाग्रं चिक्षेप च ररास च ।।

sa tasya tatsavṛkṣarkṣaṁ sadhātūpalapannagam | gaṇeśvarāyācalāgraṁ cikṣepa ca rarāsa ca ||

वृक्षों, रीछों, धातुओं, पत्थरों और सर्पों से युक्त उस पर्वतशिखर को उसने गणेश्वर पर फेंका और गर्जना की।

श्लोक 9 (skanda.8.140.9)

तद्वृत्रभुजनिर्मुक्तं गिर्यग्रशिखरं महत् । बिभेद नन्दी वज्रेण केशरीव मतङ्गजम् ।।

tadvṛtrabhujanirmuktaṁ giryagraśikharaṁ mahat | bibheda nandī vajreṇa keśarīva mataṅgajam ||

वृत्र की भुजा से छूटे हुए उस विशाल पर्वत-शिखर को नन्दी ने उसी प्रकार वज्र से विदीर्ण कर दिया, जैसे सिंह गजराज को चीर डालता है।

श्लोक 10 (skanda.8.140.10)

अथ तौ गणदैत्येन्द्रौ भुजैर्भुजगकोपनौ । समेतौ घोरसंह्रादौ नियुद्धकुशलावुभौ ।।

atha tau gaṇadaityendrau bhujairbhujagakopanau | sametau ghorasaṁhrādau niyuddhakuśalāvubhau ||

तत्पश्चात् सर्प के समान क्रुद्ध भुजाओंवाले, भयंकर गर्जना करते हुए, मल्लयुद्ध में कुशल वे दोनों - गणों के स्वामी और दैत्येन्द्र - आपस में भिड़ गए।

श्लोक 11 (skanda.8.140.11)

निष्टनन्ताविवादित्यौ दीप्यमानाविवानलौ । गर्जमानाविव घनौ बृहन्ताविव कुञ्जरौ ।।

niṣṭanantāvivādityau dīpyamānāvivānalau | garjamānāviva ghanau bṛhantāviva kuñjarau ||

मानो गरजते हुए दो सूर्य हों, मानो प्रज्वलित दो अग्नियाँ हों, मानो गरजते हुए दो मेघ हों, मानो दो विशाल गजराज हों -

श्लोक 12 (skanda.8.140.12)

मत्ताविव च शार्दूलौ निःश्वसन्ताविवोरगौ । नर्दमानौ यथा सिंहौ वल्गमानौ वृषाविव ।।

mattāviva ca śārdūlau niḥśvasantāvivoragau | nardamānau yathā siṁhau valgamānau vṛṣāviva ||

मानो दो मदमत्त व्याघ्र हों, मानो फुफकारते हुए दो सर्प हों, मानो गरजते हुए दो सिंह हों, मानो कूदते हुए दो वृषभ हों -

श्लोक 13 (skanda.8.140.13)

चलन्ताविव शैलेन्द्रौ घूर्णमानाविवार्णवौ । पूरयन्तौ यथा मेघौ स्पर्धन्तौ मकराविव ।।

calantāviva śailendrau ghūrṇamānāvivārṇavau | pūrayantau yathā meghau spardhantau makarāviva ||

मानो चलायमान दो महान पर्वत हों, मानो क्षुब्ध होते दो समुद्र हों, मानो जल से भरते हुए दो मेघ हों, मानो होड़ लगाते दो मगरमच्छ हों -

श्लोक 14 (skanda.8.140.14)

इत्येवं शंकुकर्णश्च वृत्रश्चासुरपुंगवः । प्रयुद्धौ युद्धकुशलौ परस्परजिघांसया ।।

ityevaṁ śaṁkukarṇaśca vṛtraścāsurapuṁgavaḥ | prayuddhau yuddhakuśalau parasparajighāṁsayā ||

इस प्रकार शंकुकर्ण और असुरश्रेष्ठ वृत्र, दोनों ही युद्ध में कुशल, एक-दूसरे को मारने की इच्छा से भिड़ गए।

श्लोक 15 (skanda.8.140.15)

मुष्टिभिर्वज्रकल्पैश्च तलैश्चाशनिसन्निभैः । पादप्रहारैर्घोरैश्च ऊर्ध्वमुत्क्षेपणैस्तथा ।।

muṣṭibhirvajrakalpaiśca talaiścāśanisannibhaiḥ | pādaprahārairghoraiśca ūrdhvamutkṣepaṇaistathā ||

वज्र के समान मुक्कों से, अशनि के समान थप्पड़ों से, भयंकर पद-प्रहारों से तथा ऊपर उठाकर पटकने से -

श्लोक 16 (skanda.8.140.16)

आक्षेपैरथ विक्षेपैः कर्षणैरपकर्षणैः । पौरुषाख्यापनैरुग्रैर्नामसंश्रावणैरपि ।।

ākṣepairatha vikṣepaiḥ karṣaṇairapakarṣaṇaiḥ | pauruṣākhyāpanairugrairnāmasaṁśrāvaṇairapi ||

खींचने और झटकने से, घसीटने और पीछे खींचने से, तथा भयंकर पौरुष-प्रदर्शनों और नाम पुकार-पुकारकर ललकारने से भी -

श्लोक 17 (skanda.8.140.17)

करजाग्रप्रतुदनैर्गलग्रहणनिग्रहैः । सिंहनादैः सवादित्रैर्वृक्षशैलशिलोपलैः ।।

karajāgrapratudanairgalagrahaṇanigrahaiḥ | siṁhanādaiḥ savāditrairvṛkṣaśailaśilopalaiḥ ||

नखों के अग्रभागों से चोट पहुँचाने से, गला पकड़कर दबाने से, सिंहनाद और वाद्यों के साथ, तथा वृक्षों, पर्वतों, शिलाओं और पत्थरों से भी वे युद्ध करते रहे।

श्लोक 18 (skanda.8.140.18)

शंकुकर्णो गणाध्यक्षः स च वृत्रो दनोस्सुतः । जघ्नतुस्तावथान्योन्यमन्योन्यस्यान्तरैषिणौ ।।

śaṁkukarṇo gaṇādhyakṣaḥ sa ca vṛtro danossutaḥ | jaghnatustāvathānyonyamanyonyasyāntaraiṣiṇau ||

गणाध्यक्ष शंकुकर्ण और दनु-पुत्र वृत्र, दोनों ही एक-दूसरे का छिद्र (दुर्बलता) ढूँढ़ते हुए परस्पर प्रहार करते रहे।

श्लोक 19 (skanda.8.140.19)

शंकुकर्णेन वृत्रस्तु दृढमूल इव द्रुमः । हस्तावबन्धनोत्क्षिप्तः सहसा पातितः क्षितौ ।।

śaṁkukarṇena vṛtrastu dṛḍhamūla iva drumaḥ | hastāvabandhanotkṣiptaḥ sahasā pātitaḥ kṣitau ||

शंकुकर्ण द्वारा वृत्र को दोनों हाथों से पकड़कर, दृढ़-जड़ वृक्ष के समान ऊपर उठाकर, अचानक भूमि पर पटक दिया गया।

श्लोक 20 (skanda.8.140.20)

ततो गणेश्वरबले दानवानां तथा बले । साधुशब्दो बभूवोच्चैर्वृत्रे तु विनिपातिते ।।

tato gaṇeśvarabale dānavānāṁ tathā bale | sādhuśabdo babhūvoccairvṛtre tu vinipātite ||

वृत्र के इस प्रकार गिर पड़ने पर गणेश्वरों की सेना में और दानवों की सेना में भी ऊँचे स्वर में 'साधु-साधु' का घोष होने लगा।

श्लोक 21 (skanda.8.140.21)

मुष्टिना तमथाहत्य वृत्रं भुवि निपात्य च । शंकुकर्णो ह्यपक्रान्तो देहाज्जीव इवाशुगः ।।

muṣṭinā tamathāhatya vṛtraṁ bhuvi nipātya ca | śaṁkukarṇo hyapakrānto dehājjīva ivāśugaḥ ||

मुष्टि से आघात करके और वृत्र को भूमि पर गिराकर शंकुकर्ण उसी प्रकार शीघ्र वहाँ से हट गए, जैसे शरीर से जीव तीव्रता से निकल जाता है।

श्लोक 22 (skanda.8.140.22)

वृत्रस्तु सुमहावीर्यो मुष्टिताडनविह्वलः । इन्द्रकेतुरिवोत्तस्थौ दुद्राव च गणेश्वरम् ।।

vṛtrastu sumahāvīryo muṣṭitāḍanavihvalaḥ | indraketurivottasthau dudrāva ca gaṇeśvaram ||

अत्यन्त बलवान वृत्र मुक्के की चोट से विह्वल होते हुए भी इन्द्रध्वज के समान उठ खड़ा हुआ और गणेश्वर की ओर दौड़ा।

श्लोक 23 (skanda.8.140.23)

तमापतन्तं वृक्षेण शंकुकर्णो गणेश्वरः । शालेन ताडयामास इत एहीति चाब्रवीत् ।।

tamāpatantaṁ vṛkṣeṇa śaṁkukarṇo gaṇeśvaraḥ | śālena tāḍayāmāsa ita ehīti cābravīt ||

इस प्रकार आते हुए उस वृत्र को गणेश्वर शंकुकर्ण ने शाल-वृक्ष से आघात किया और कहा - 'इधर आ!'

श्लोक 24 (skanda.8.140.24)

क्रुद्धेन शंकुकर्णेन वृत्रो वै शालताडितः । उपेत्य पादे जग्राह शंकुकर्णं बली बलात् ।।

kruddhena śaṁkukarṇena vṛtro vai śālatāḍitaḥ | upetya pāde jagrāha śaṁkukarṇaṁ balī balāt ||

क्रुद्ध शंकुकर्ण द्वारा शाल-वृक्ष से आहत हुआ बलवान वृत्र पास आकर शंकुकर्ण के पैर को बलपूर्वक पकड़ लिया।

श्लोक 25 (skanda.8.140.25)

शंकुकर्णं गृहीत्वा तु वृत्रो नाग इवाण्डजम् । भ्रामयामास विवशं लोकं मोह इवोद्यतः ।।

śaṁkukarṇaṁ gṛhītvā tu vṛtro nāga ivāṇḍajam | bhrāmayāmāsa vivaśaṁ lokaṁ moha ivodyataḥ ||

शंकुकर्ण को इस प्रकार पकड़कर वृत्र ने उन्हें उसी प्रकार असहाय होकर घुमाया, जैसे सर्प किसी पक्षी को पकड़कर घुमाता है, अथवा जैसे उठा हुआ मोह किसी को घुमा देता है।

श्लोक 26 (skanda.8.140.26)

शंकुकर्णस्य वृत्रेण भ्राम्यमाणस्य सर्वशः । शरीरात्समदीर्यन्त भूषणानि सहस्रशः ।।

śaṁkukarṇasya vṛtreṇa bhrāmyamāṇasya sarvaśaḥ | śarīrātsamadīryanta bhūṣaṇāni sahasraśaḥ ||

वृत्र द्वारा इस प्रकार सब ओर घुमाए जाते हुए शंकुकर्ण के शरीर से आभूषण सहस्रों की संख्या में बिखरने लगे।

श्लोक 27 (skanda.8.140.27)

तं भ्राम्यमाणं प्रसमीक्ष्य देवा वृत्रेण सर्वे च तदा गणेशाः । हाहेति कृत्वा धृतशस्त्रबाणाः प्रदुद्रुवुस्तस्य विमोक्षणार्थम् ।।

taṁ bhrāmyamāṇaṁ prasamīkṣya devā vṛtreṇa sarve ca tadā gaṇeśāḥ | hāheti kṛtvā dhṛtaśastrabāṇāḥ pradudruvustasya vimokṣaṇārtham ||

वृत्र द्वारा इस प्रकार घुमाए जाते हुए उन्हें देखकर देवगण और सभी गणेश्वर 'हा-हा' कहकर, शस्त्र और बाण धारण किए हुए उन्हें छुड़ाने के लिए दौड़ पड़े।

श्लोक 28 (skanda.8.140.28)

आगच्छतस्तान् प्रसमीक्ष्य वृत्रः सर्वान् गणेशान् शितशस्त्रहस्तान् । मुमोच तं संसदि शंकुकर्णं नागं गरुत्मानिव पक्षिराजः ।।

āgacchatastān prasamīkṣya vṛtraḥ sarvān gaṇeśān śitaśastrahastān | mumoca taṁ saṁsadi śaṁkukarṇaṁ nāgaṁ garutmāniva pakṣirājaḥ ||

तीक्ष्ण शस्त्र लिए हुए उन सब गणेश्वरों को आते देखकर वृत्र ने उस सभा में शंकुकर्ण को उसी प्रकार छोड़ दिया, जैसे पक्षिराज गरुड़ किसी सर्प को छोड़ देता है।

श्लोक 29 (skanda.8.140.29)

वृत्रमुक्तस्तु गणपः शंकुकर्णो महाबलः । योद्धुकामः पुनर्वृत्रं निवृत्तो हस्तिराडिव ।।

vṛtramuktastu gaṇapaḥ śaṁkukarṇo mahābalaḥ | yoddhukāmaḥ punarvṛtraṁ nivṛtto hastirāḍiva ||

वृत्र द्वारा छोड़े गए महाबली गणपति शंकुकर्ण पुनः वृत्र से युद्ध करने की इच्छा से उसी प्रकार लौट पड़े, जैसे गजराज लौट पड़ता है।

श्लोक 30 (skanda.8.140.30)

ततः पुनः सिंहरवाः समन्तात् तस्मिन्बले दुन्दुभिनिस्वनाश्च । हे शंकुकर्णेति च साधुवादो मनोहरस्तस्य रणे बभूव ।।

tataḥ punaḥ siṁharavāḥ samantāt tasminbale dundubhinisvanāśca | he śaṁkukarṇeti ca sādhuvādo manoharastasya raṇe babhūva ||

तब उस सेना में चारों ओर पुनः सिंहनाद और दुन्दुभियों की ध्वनियाँ गूँज उठीं, तथा 'हे शंकुकर्ण!' कहते हुए उनके लिए युद्धभूमि में मनोहर जय-जयकार होने लगा।

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