अम्बिका खण्ड · अध्याय 141
रणान्तदुर्दिन
श्लोक 1 (skanda.8.141.1)
शंकुकर्णं भ्रामयित्वा वृत्रस्त्यक्त्वा च भूतले । ममर्द प्रमथानीकं वनं मत्तो यथा गजः ।।
śaṁkukarṇaṁ bhrāmayitvā vṛtrastyaktvā ca bhūtale | mamarda pramathānīkaṁ vanaṁ matto yathā gajaḥ ||
शंकुकर्ण को इस प्रकार घुमाकर और भूतल पर छोड़कर वृत्र ने प्रमथों की सेना को उसी प्रकार रौंद डाला, जैसे मदमत्त गज वन को रौंद डालता है।
श्लोक 2 (skanda.8.141.2)
स नन्दिनं नन्दिषेणं सोमनन्दिनमेव च । आहत्य द्रावयित्वा च ननर्द जलदो यथा ।।
sa nandinaṁ nandiṣeṇaṁ somanandinameva ca | āhatya drāvayitvā ca nanarda jalado yathā ||
उसने नन्दी, नन्दिषेण और सोमनन्दी को आहत करके भगा दिया, और मेघ के समान गर्जना की।
श्लोक 3 (skanda.8.141.3)
तस्याथ नर्दमानस्य विट्पती रुद्रसत्तमः । मुमोच वज्राग्निसमं रिपुक्षयकरं शरम् ।।
tasyātha nardamānasya viṭpatī rudrasattamaḥ | mumoca vajrāgnisamaṁ ripukṣayakaraṁ śaram ||
इस प्रकार गरजते हुए उस वृत्र पर रुद्रों में श्रेष्ठ विट्पति ने वज्राग्नि के समान, शत्रु का नाश करने वाला बाण छोड़ा।
श्लोक 4 (skanda.8.141.4)
स विट्पतिविनिर्मुक्तः शरो रविकरप्रभः । विवेश वृत्रं निर्दार्य सिद्धोऽम्बुदमिवाम्बरे ।।
sa viṭpativinirmuktaḥ śaro ravikaraprabhaḥ | viveśa vṛtraṁ nirdārya siddho'mbudamivāmbare ||
विट्पति द्वारा छोड़ा गया, सूर्य की किरणों के समान प्रभावाला वह बाण वृत्र को विदीर्ण करता हुआ उसी प्रकार उसमें घुस गया, जैसे आकाश में विद्युत् मेघ में प्रवेश करती है।
श्लोक 5 (skanda.8.141.5)
उच्छ्रित्य स्वकरं सोऽथ करं हस्तीव दानवः । विट्पतिं दुद्रुवे संख्ये पयोदमिव मारुतः ।।
ucchritya svakaraṁ so'tha karaṁ hastīva dānavaḥ | viṭpatiṁ dudruve saṁkhye payodamiva mārutaḥ ||
फिर वह दानव हाथी के समान अपना हाथ ऊपर उठाकर युद्ध में विट्पति की ओर उसी प्रकार दौड़ा, जैसे वायु मेघ की ओर दौड़ती है।
श्लोक 6 (skanda.8.141.6)
तं शूलेन महाकायो नन्दी वज्रेण दानवम् । सोमनन्दी कुठारेण नन्दिषेणस्तलेन च ।।
taṁ śūlena mahākāyo nandī vajreṇa dānavam | somanandī kuṭhāreṇa nandiṣeṇastalena ca ||
महाकाय नन्दी ने शूल और वज्र से, सोमनन्दी ने कुठार से और नन्दिषेण ने थप्पड़ से उस दानव पर प्रहार किया।
श्लोक 7 (skanda.8.141.7)
बाणानाञ्च सहस्रेण विट्पतिर्वृत्रमाहवे । बिभेद परमक्रुद्धः पुनश्चान्यैस्त्रिसप्तभिः ।।
bāṇānāñca sahasreṇa viṭpatirvṛtramāhave | bibheda paramakruddhaḥ punaścānyaistrisaptabhiḥ ||
विट्पति ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर युद्ध में सहस्र बाणों से और फिर अन्य इक्कीस बाणों से वृत्र को विदीर्ण कर दिया।
श्लोक 8 (skanda.8.141.8)
सोऽर्दितो गणयूथेशैर्दानवः पर्वतोपमः । पात्यमानो ररासोच्चैस्सदैवत इव द्रुमः ।।
so'rdito gaṇayūtheśairdānavaḥ parvatopamaḥ | pātyamāno rarāsoccaissadaivata iva drumaḥ ||
गणयूथपतियों द्वारा इस प्रकार पीड़ित और गिराया जाता हुआ पर्वत के समान वह दानव उसी प्रकार ऊँचा गरजा, जैसे देवता-सहित कोई वृक्ष गिरते समय गरजता है।
श्लोक 9 (skanda.8.141.9)
अथ मयबलिमूकतारजम्भा नमुचिगणेल्वलबाणबाणपुत्राः । विविधशरवरायुधावतस्थुर्गणपतिवीरतमं निवारयन्तः ।।
atha mayabalimūkatārajambhā namucigaṇelvalabāṇabāṇaputrāḥ | vividhaśaravarāyudhāvatasthurgaṇapativīratamaṁ nivārayantaḥ ||
तब मय, बलि, मूक, तार, जम्भ, नमुचि, इल्वल, बाण और बाण-पुत्र - ये सब नाना प्रकार के श्रेष्ठ बाण और आयुध लेकर गणपतियों में वीरश्रेष्ठ को रोकते हुए खड़े हो गए।
श्लोक 10 (skanda.8.141.10)
रुचिरकनकचारुहारशोभाश्चलवलायाभरणा महेन्द्रकल्पाः । दितिवरतनयातिहृष्टरूपाः प्रमथबलेषु चरन्ति कालरूपाः ।।
rucirakanakacāruhāraśobhāścalavalāyābharaṇā mahendrakalpāḥ | ditivaratanayātihṛṣṭarūpāḥ pramathabaleṣu caranti kālarūpāḥ ||
सुन्दर सुवर्ण-हारों की शोभा से युक्त, चंचल कड़ों से अलंकृत, महेन्द्र के समान तेजस्वी, दिति के श्रेष्ठ पुत्र अत्यन्त हर्षित रूप धारण किए हुए काल के समान प्रमथों की सेना में विचरण करने लगे।
श्लोक 11 (skanda.8.141.11)
मुशलहलशरावदारितास्या गिरिशिखराशनिवज्रचूर्णिताङ्गाः । गिरय इव च वज्रताडिता गणपतयः क्षितिमापुरातुराः ।।
muśalahalaśarāvadāritāsyā giriśikharāśanivajracūrṇitāṅgāḥ | giraya iva ca vajratāḍitā gaṇapatayaḥ kṣitimāpurāturāḥ ||
उनके मूसलों, हलों और बाणों से जिनके मुख विदीर्ण हो गए थे, तथा पर्वत-शिखरों और अशनि-वज्रों से जिनके अंग चूर-चूर हो गए थे - [इस स्थान पर मूल पाठ की एक पंक्ति खण्डित होकर लुप्त हो गई है] - गणपति वज्र से आहत पर्वतों के समान पीड़ित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
श्लोक 12 (skanda.8.141.12)
व्रणजपृषतविप्रुषोक्षिताश्च्युतसितहारविभूषणस्रजः । भयचकितमुखाः प्रदुद्रुवुस्ते प्रमथगणा रिपुभिर्भृशार्दिताः ।।
vraṇajapṛṣatavipruṣokṣitāścyutasitahāravibhūṣaṇasrajaḥ | bhayacakitamukhāḥ pradudruvuste pramathagaṇā ripubhirbhṛśārditāḥ ||
घावों से बहती रक्त-बूँदों से सिंचित, गिरे हुए श्वेत हार और आभूषणों की मालाओंवाले, भयभीत मुखवाले वे प्रमथगण शत्रुओं द्वारा अत्यन्त पीड़ित होकर भाग खड़े हुए।
श्लोक 13 (skanda.8.141.13)
दिवि सितविरजा यथोच्छ्रिता नवजलदा नवतोयवृष्टयः । विससृजुरुरुवेगदारुणा दितितनयाः शरवृष्टिमर्दनीम् ।।
divi sitavirajā yathocchritā navajaladā navatoyavṛṣṭayaḥ | visasṛjururuvegadāruṇā dititanayāḥ śaravṛṣṭimardanīm ||
जैसे आकाश में उठे हुए धवल और निर्मल नवीन मेघ नई जल-वृष्टि करते हैं, वैसे ही दिति-पुत्रों ने अत्यन्त वेगवाली भयंकर बाण-वृष्टि की, जो शत्रुओं को कुचल देने वाली थी।
श्लोक 14 (skanda.8.141.14)
अथ करिगिरिमेघसन्निभा ज्वलनदिवाकरतुल्यतेजसः । विमलशितविसृष्टबाणजालाः प्रमथगणान् प्रहरन्ति दैत्यमुख्याः ।।
atha karigirimeghasannibhā jvalanadivākaratulyatejasaḥ | vimalaśitavisṛṣṭabāṇajālāḥ pramathagaṇān praharanti daityamukhyāḥ ||
फिर हाथी, पर्वत और मेघ के समान विशाल, अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी वे दैत्यश्रेष्ठ निर्मल और तीक्ष्ण बाणों के जाल छोड़ते हुए प्रमथगणों पर प्रहार करने लगे।
श्लोक 15 (skanda.8.141.15)
अथ परिघशरासिपट्टिशैः करवरयन्त्रशतप्रनिःसृतैः । त्रिदशरिपुभयप्रदा रणे समरमुपेत्य विचक्रमुर्गणाः ।।
atha parighaśarāsipaṭṭiśaiḥ karavarayantraśatapraniḥsṛtaiḥ | tridaśaripubhayapradā raṇe samaramupetya vicakramurgaṇāḥ ||
फिर हाथों से तथा सैकड़ों यन्त्रों से छोड़े गए परिघों, बाणों, तलवारों और पट्टिशों से, देवशत्रुओं को भय देने वाले गणगण युद्धभूमि में आकर पराक्रम दिखाने लगे।
श्लोक 16 (skanda.8.141.16)
गिरिशिखरनिभाश्च दन्तिवर्या द्रुतगमना बहवश्च वाजिमुख्याः । सुरसदननिभा रथाश्च भीमाः समरमुखे निपतन्ति भग्नदग्धाः ।।
giriśikharanibhāśca dantivaryā drutagamanā bahavaśca vājimukhyāḥ | surasadananibhā rathāśca bhīmāḥ samaramukhe nipatanti bhagnadagdhāḥ ||
पर्वत-शिखरों के समान विशाल श्रेष्ठ हाथी, वेगवान अनेक श्रेष्ठ घोड़े, तथा देव-भवनों के समान भीषण रथ - युद्ध के मुहाने पर टूटकर और जलकर गिरने लगे।
श्लोक 17 (skanda.8.141.17)
इषुवदनदृढावतक्षिता व्रणजसमुक्षितसूक्ष्मवाससः । प्रसृतनयनसत्वजीविता दनुतनयाः शतशोवपोथिताः ।।
iṣuvadanadṛḍhāvatakṣitā vraṇajasamukṣitasūkṣmavāsasaḥ | prasṛtanayanasatvajīvitā danutanayāḥ śataśovapothitāḥ ||
बाणों की नोकों से दृढ़तापूर्वक विदीर्ण, घावों के रक्त से भीगे हुए महीन वस्त्रोंवाले, आँखें बाहर निकली हुईं और जीवन-शक्ति क्षीण हुए दनु-पुत्र सैकड़ों की संख्या में कुचले जाने लगे।
श्लोक 18 (skanda.8.141.18)
च्युतसितवरहारकुण्डलैर्मुकुटकिरीटमणिस्रगम्बरैः । समरमुखमही विराजते रुचिरवराभरणैरिवोर्वशी ।।
cyutasitavarahārakuṇḍalairmukuṭakirīṭamaṇisragambaraiḥ | samaramukhamahī virājate ruciravarābharaṇairivorvaśī ||
गिरे हुए श्वेत श्रेष्ठ हारों, कुण्डलों, मुकुटों, किरीटों, मणियों, मालाओं और वस्त्रों से युद्धभूमि की धरती उसी प्रकार सुशोभित हो रही थी, जैसे सुन्दर श्रेष्ठ आभूषणों से सुसज्जित उर्वशी।
श्लोक 19 (skanda.8.141.19)
क्षुभित इव यथा महार्णवो जलसमये च यथा नभो महत् । असुरगणबलं तथाभवत् प्रजवितवारणवाजिदानवम् ।।
kṣubhita iva yathā mahārṇavo jalasamaye ca yathā nabho mahat | asuragaṇabalaṁ tathābhavat prajavitavāraṇavājidānavam ||
जैसे महासागर क्षुब्ध हो उठा हो, अथवा वर्षाकाल में विशाल आकाश मेघाच्छन्न हो, वैसी ही उस असुरसेना की दशा हो गई, जिसमें वेगवान गज, घोड़े और दानव भरे हुए थे।
श्लोक 20 (skanda.8.141.20)
यमवरुणधनेशवासवा भगवसुसूर्यशशाङ्कमारुताः । हृषितनयनवक्त्रपङ्कजा रुरुधू रणमित्रगणार्दनोद्धताः ।।
yamavaruṇadhaneśavāsavā bhagavasusūryaśaśāṅkamārutāḥ | hṛṣitanayanavaktrapaṅkajā rurudhū raṇamitragaṇārdanoddhatāḥ ||
यम, वरुण, कुबेर, इन्द्र, भग, वसु, सूर्य, चन्द्रमा और वायु - ये सब हर्ष से प्रफुल्लित नेत्र और कमल-मुखवाले होकर, युद्ध में मित्रों को कष्ट देने वालों के प्रति उद्धत होकर उन्हें रोकने लगे।
श्लोक 21 (skanda.8.141.21)
प्रविचरितगजेन्द्रतोयदं तुरगविधावितवायुसञ्चरम् । अशनिशरशतह्रदाविलं न तु विरराम रणान्तदुर्दिनम् ।।
pravicaritagajendratoyadaṁ turagavidhāvitavāyusañcaram | aśaniśaraśatahradāvilaṁ na tu virarāma raṇāntadurdinam ||
उस युद्ध का दुर्दिन गजराजों रूपी बादलों से घिरा हुआ, घोड़ों की दौड़ से उत्पन्न वायु-संचारवाला, तथा अशनि-सदृश सैकड़ों बाणों की धाराओं से आविल था, फिर भी वह समाप्त नहीं हो रहा था।
श्लोक 22 (skanda.8.141.22)
कमलदलनिकाशलोचनैः कमलदिवाकरचन्द्रसन्निभैः । दनुतनयवराननैर्मही प्रतिविबभौ कमलैरिवावृता ।।
kamaladalanikāśalocanaiḥ kamaladivākaracandrasannibhaiḥ | danutanayavarānanairmahī prativibabhau kamalairivāvṛtā ||
कमल-दल के समान नेत्रोंवाले, कमल, सूर्य और चन्द्रमा के समान कान्तिमान् दनु-पुत्रों के श्रेष्ठ मुखों से आच्छादित पृथ्वी उसी प्रकार सुशोभित हो रही थी, मानो कमलों से ढकी हुई हो।
श्लोक 23 (skanda.8.141.23)
विमथितगणदानवेश्वरं रुधिरवपामदसेकरूषितम् । समरमतिसुरौद्रदारुणं गरुडपिशाचबलावलोकितम् ।।
vimathitagaṇadānaveśvaraṁ rudhiravapāmadasekarūṣitam | samaramatisuraudradāruṇaṁ garuḍapiśācabalāvalokitam ||
गणों और दानवेश्वरों के परस्पर मथे जाने से रक्त, चर्बी तथा मद के छिड़काव से रंजित, अत्यन्त उग्र और भयंकर वह संग्राम गरुड़ों और पिशाचों की सेनाओं द्वारा देखा जा रहा था।