अम्बिका खण्ड · अध्याय 142
कार्तस्वनवध
श्लोक 1 (skanda.8.142.1)
तस्मिन् वर्तति संग्रामे प्रमथासुरसैन्ययोः । धनुषां श्रूयते शब्दः प्रावृडम्बुधरोपमः ।।
tasmin vartati saṁgrāme pramathāsurasainyayoḥ | dhanuṣāṁ śrūyate śabdaḥ prāvṛḍambudharopamaḥ ||
प्रमथों और असुरों की सेनाओं के उस संग्राम में धनुषों का शब्द वर्षाकाल के मेघों की गर्जना के समान सुनाई देता था।
श्लोक 2 (skanda.8.142.2)
गर्जताञ्च गजेन्द्राणां ह्रेषताञ्चैव वाजिनाम् । युद्धगान्धर्वरक्तानां नादाश्चामररक्षसाम् ।।
garjatāñca gajendrāṇāṁ hreṣatāñcaiva vājinām | yuddhagāndharvaraktānāṁ nādāścāmararakṣasām ||
गरजते हुए गजराजों की, हिनहिनाते हुए घोड़ों की, युद्ध में लीन गन्धर्वों की, और देव-दानवों की ध्वनियाँ भी सुनाई पड़ रही थीं।
श्लोक 3 (skanda.8.142.3)
श्रोत्रायासकरा घोरा वज्राशनिरवा इव । श्रूयन्ते हि विवर्धन्ते ह्यर्था ह्यधर्मिणामिव ।।
śrotrāyāsakarā ghorā vajrāśaniravā iva | śrūyante hi vivardhante hyarthā hyadharmiṇāmiva ||
वज्र और अशनि की गर्जना के समान कान थका देने वाले वे भयंकर शब्द सुनाई देते थे, और वे उसी प्रकार बढ़ते जाते थे, जैसे अधर्मियों के अनुचित लाभ बढ़ते जाते हैं।
श्लोक 4 (skanda.8.142.4)
ततः कार्तस्वनो नाम दानवो मेघनिस्वनः । जघान प्रमथान् युद्धे कालो मर्त्यानिवागतः ।।
tataḥ kārtasvano nāma dānavo meghanisvanaḥ | jaghāna pramathān yuddhe kālo martyānivāgataḥ ||
तब मेघ के समान गर्जनवाला कार्तस्वन नामक दानव युद्ध में प्रमथों का उसी प्रकार वध करने लगा, जैसे काल आकर मनुष्यों का वध करता है।
श्लोक 5 (skanda.8.142.5)
स रथी कार्मुकी बाणी कवची कुण्डली तथा । प्रमथानीकमदहच्छुष्कं तृणमिवानलः ।।
sa rathī kārmukī bāṇī kavacī kuṇḍalī tathā | pramathānīkamadahacchuṣkaṁ tṛṇamivānalaḥ ||
रथी, धनुर्धर, बाणधारी, कवचधारी और कुण्डलधारी वह दानव प्रमथों की सेना को उसी प्रकार भस्म करने लगा, जैसे अग्नि सूखी घास को जला देती है।
श्लोक 6 (skanda.8.142.6)
कार्तस्वनधनुर्मुक्ताः कार्तस्वरमहाशराः । प्रमथान्दार्य निस्सङ्गं दारयन्ति रणावनिम् ।।
kārtasvanadhanurmuktāḥ kārtasvaramahāśarāḥ | pramathāndārya nissaṅgaṁ dārayanti raṇāvanim ||
कार्तस्वन के धनुष से छूटे हुए स्वर्ण-निर्मित महान बाण प्रमथों को निर्ममतापूर्वक विदीर्ण करते हुए रणभूमि को भी विदीर्ण कर देते थे।
श्लोक 7 (skanda.8.142.7)
शलभा इव केदाराननया इव मानवान् । खगा इव तरून् पक्वान गरुडः पन्नगानिव ।।
śalabhā iva kedārānanayā iva mānavān | khagā iva tarūn pakvāna garuḍaḥ pannagāniva ||
जैसे टिड्डियाँ खेत में, अकाल मनुष्यों में, पक्षी पके फलोंवाले वृक्षों में और गरुड़ सर्पों में प्रवेश करते हैं,
श्लोक 8 (skanda.8.142.8)
तथा ते पृथवो बाणाः कार्तस्वनधनुश्च्युताः । प्रमथान् व्याकुलीचक्रुर्वासवृक्षानिवाण्डजाः ।।
tathā te pṛthavo bāṇāḥ kārtasvanadhanuścyutāḥ | pramathān vyākulīcakrurvāsavṛkṣānivāṇḍajāḥ ||
वैसे ही कार्तस्वन के धनुष से छूटे हुए वे विशाल बाण प्रमथों को उसी प्रकार व्याकुल करने लगे, जैसे पक्षी अपने वासवृक्षों को घेरकर व्याकुल कर देते हैं।
श्लोक 9 (skanda.8.142.9)
शरव्राता गणानीके निपतन्ति गिराविव ।।
śaravrātā gaṇānīke nipatanti girāviva ||
[इस स्थान पर मूल पाठ की एक पंक्ति खण्डित होकर लुप्त हो गई है] बाणों के समूह गणों की सेना पर उसी प्रकार गिरने लगे, जैसे पर्वतों पर वर्षा गिरती है।
श्लोक 10 (skanda.8.142.10)
प्रशान्तवाद्यनिनदं शरघातातिवेजितम् । गणेश्वरबलं जज्ञे बन्धुजीववनं यथा ।।
praśāntavādyaninadaṁ śaraghātātivejitam | gaṇeśvarabalaṁ jajñe bandhujīvavanaṁ yathā ||
बाणों की चोट से अत्यन्त वेगयुक्त होकर गणेश्वरों की सेना का वाद्य-घोष उसी प्रकार शान्त हो गया, जैसे बन्धुजीव वृक्षों का वन हवा के थम जाने पर शान्त हो जाता है।
श्लोक 11 (skanda.8.142.11)
घनानिव यथा वायुर्वैनतेय इवोरगान् । पृषतानिव शार्दूलस्तमौघानिव भास्करः ।।
ghanāniva yathā vāyurvainateya ivoragān | pṛṣatāniva śārdūlastamaughāniva bhāskaraḥ ||
जैसे वायु मेघों को, गरुड़ सर्पों को, व्याघ्र मृगों को और सूर्य अन्धकार-समूह को तितर-बितर कर देता है,
श्लोक 12 (skanda.8.142.12)
तथा कार्तस्वनः क्रुद्धः शरवज्रैः सुदारुणैः । निर्ददाह गणाध्यक्षान् लोकान् संवर्तको यथा ।।
tathā kārtasvanaḥ kruddhaḥ śaravajraiḥ sudāruṇaiḥ | nirdadāha gaṇādhyakṣān lokān saṁvartako yathā ||
वैसे ही क्रुद्ध कार्तस्वन ने अत्यन्त भयंकर वज्र-सदृश बाणों से गणाध्यक्षों को उसी प्रकार जला डाला, जैसे प्रलयकाल की अग्नि लोकों को जला डालती है।
श्लोक 13 (skanda.8.142.13)
गणेश्वरबलं दृष्ट्वा दग्धं जग्धं रुजातुरम् । विट्पतिः कुपितो देवः कार्तस्वनमथाब्रवीत् ।।
gaṇeśvarabalaṁ dṛṣṭvā dagdhaṁ jagdhaṁ rujāturam | viṭpatiḥ kupito devaḥ kārtasvanamathābravīt ||
गणेश्वरों की सेना को इस प्रकार जली हुई, कुचली हुई और पीड़ा से आतुर देखकर विट्पति देव क्रुद्ध होकर कार्तस्वन से यह बोले -
श्लोक 14 (skanda.8.142.14)
शरपातेथ संस्थित्या रुद्रो रुद्रपराक्रमः । दानवेन्द्रं प्रकुपितो निषङ्गादुद्धरञ्छरम् ।।
śarapātetha saṁsthityā rudro rudraparākramaḥ | dānavendraṁ prakupito niṣaṅgāduddharañcharam ||
बाण-वर्षा के बीच स्थिर खड़े हुए, रुद्र के समान पराक्रमी विट्पति ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर तरकश से बाण निकालते हुए दानवेन्द्र से कहा -
श्लोक 15 (skanda.8.142.15)
कार्तस्वन बलं वीर्यं प्रतापश्च तवोत्तमः । किमेतानबलान् हंसि दानवेन्द्र गणेश्वरान् ।।
kārtasvana balaṁ vīryaṁ pratāpaśca tavottamaḥ | kimetānabalān haṁsi dānavendra gaṇeśvarān ||
'हे कार्तस्वन! तेरा बल, पराक्रम और प्रताप उत्तम है; हे दानवेन्द्र! फिर तू इन असहाय गणेश्वरों को क्यों मार रहा है?'
श्लोक 16 (skanda.8.142.16)
आगच्छ यदि ते शक्तिर्यदि वा विद्यते बलम् । मया कुरुष्व संमर्दं मानद पश्य मे बलम् ।।
āgaccha yadi te śaktiryadi vā vidyate balam | mayā kuruṣva saṁmardaṁ mānada paśya me balam ||
'यदि तुझमें शक्ति है, यदि तुझमें बल है, तो आ, मुझसे भिड़ जा, हे मानद! मेरा बल भी देख ले।'
श्लोक 17 (skanda.8.142.17)
कुण्डलालंकृतं तेऽद्य दंष्ट्रांकुरविभूषणम् । पातयामि शिरो दैत्य तालाद्वातः फलं यथा ।।
kuṇḍalālaṁkṛtaṁ te'dya daṁṣṭrāṁkuravibhūṣaṇam | pātayāmi śiro daitya tālādvātaḥ phalaṁ yathā ||
'हे दैत्य! कुण्डलों से अलंकृत और दाढ़ों के अंकुरों से विभूषित तेरे इस मस्तक को मैं आज उसी प्रकार गिरा दूँगा, जैसे वायु ताड़ के वृक्ष से फल गिरा देती है।'
श्लोक 18 (skanda.8.142.18)
यद्यपि त्वाद्य रक्षन्ति दानवाः सान्धका रणे । तथापि ते हरिष्यामि प्राणानसुरपांसन ।।
yadyapi tvādya rakṣanti dānavāḥ sāndhakā raṇe | tathāpi te hariṣyāmi prāṇānasurapāṁsana ||
'यद्यपि आज अन्धक-सहित दानव तेरी रक्षा कर रहे हैं, फिर भी हे असुर-अधम! मैं तेरे प्राण हर लूँगा।'
श्लोक 19 (skanda.8.142.19)
इत्येवं नर्दमानस्य विट्पतेर्दानवो नदन् । ससर्ज बाणं मुक्त्वा च जगर्ज जलदो यथा ।।
ityevaṁ nardamānasya viṭpaterdānavo nadan | sasarja bāṇaṁ muktvā ca jagarja jalado yathā ||
इस प्रकार गरजते हुए विट्पति के सामने वह दानव भी गरजते हुए बाण छोड़कर मेघ के समान गर्जना करने लगा।
श्लोक 20 (skanda.8.142.20)
ज्वलमानः स तु शरो घृतसिक्त इवानलः । घर्मार्कसदृशो भासा प्राधावद्विट्पतिं प्रति ।।
jvalamānaḥ sa tu śaro ghṛtasikta ivānalaḥ | gharmārkasadṛśo bhāsā prādhāvadviṭpatiṁ prati ||
घी से सींची गई अग्नि के समान प्रज्वलित, ग्रीष्म के सूर्य के समान कान्तिवाला वह बाण विट्पति की ओर दौड़ चला।
श्लोक 21 (skanda.8.142.21)
निष्प्रभोऽर्कोऽभवत्तत्र तस्य भासा पतत्रिणः । कार्तस्वननिनादेन पतन्ति विहगाः क्षितौ ।।
niṣprabho'rko'bhavattatra tasya bhāsā patatriṇaḥ | kārtasvananinādena patanti vihagāḥ kṣitau ||
उस उड़ते हुए बाण की कान्ति से सूर्य भी वहाँ निष्प्रभ हो गया, और कार्तस्वन की गर्जना से पक्षी भी पृथ्वी पर गिरने लगे।
श्लोक 22 (skanda.8.142.22)
सोऽपि भासायुतो वाणः संवर्तक इवानलः । विट्पतेः कंकणे मग्नो निरये दुष्कृती यथा ।।
so'pi bhāsāyuto vāṇaḥ saṁvartaka ivānalaḥ | viṭpateḥ kaṁkaṇe magno niraye duṣkṛtī yathā ||
प्रलयाग्नि के समान तेजयुक्त वह बाण भी विट्पति के कंकण में उसी प्रकार डूब गया, जैसे कोई पापी नरक में डूब जाता है।
श्लोक 23 (skanda.8.142.23)
ततस्तमेव निष्कृष्य दानवप्रहितं शरम् । कार्तस्वनाय चिक्षेप विट्पतिर्विननाद च ।।
tatastameva niṣkṛṣya dānavaprahitaṁ śaram | kārtasvanāya cikṣepa viṭpatirvinanāda ca ||
तब उस दानव द्वारा भेजे गए उसी बाण को खींचकर विट्पति ने उसे कार्तस्वन पर फेंक दिया और गर्जना की।
श्लोक 24 (skanda.8.142.24)
स विट्पतिविनिर्मुक्तः शरो दानवनाशकृत् । दानवस्य शिरो यन्तुर्जहारेषुपथान् दश ।।
sa viṭpativinirmuktaḥ śaro dānavanāśakṛt | dānavasya śiro yanturjahāreṣupathān daśa ||
विट्पति द्वारा छोड़ा गया वह दानव-नाशक बाण दानव के सारथि के सिर को दस बाण-मार्गों की दूरी तक ले उड़ा।
श्लोक 25 (skanda.8.142.25)
हते यन्तरि तस्याश्वाश्चपलाः शबलाः रणे । उद्भ्रान्ता रथमादाय श्येना इव यथामिषम् ।।
hate yantari tasyāśvāścapalāḥ śabalāḥ raṇe | udbhrāntā rathamādāya śyenā iva yathāmiṣam ||
सारथि के मारे जाने पर उसके चंचल और विचित्र वर्णवाले घोड़े रथ को लेकर उसी प्रकार व्याकुल होकर भागने लगे, जैसे बाज मांस को लेकर उड़ जाता है।
श्लोक 26 (skanda.8.142.26)
कार्तस्वनरथं यात किमासत निगृह्णत । इत्येवं दानवेन्द्राणां बभूव निनदो महान् ।।
kārtasvanarathaṁ yāta kimāsata nigṛhṇata | ityevaṁ dānavendrāṇāṁ babhūva ninado mahān ||
'कार्तस्वन के रथ के पीछे जाओ, क्यों बैठे हो, इसे पकड़ो' - इस प्रकार दानवेन्द्रों का महान कोलाहल मच गया।
श्लोक 27 (skanda.8.142.27)
विस्तीर्णे मन्दरप्रस्थे भ्रमन् भाति रथोत्तमः । सादित्य इव सप्ताश्वो मेरौ रथवरो भ्रमन् ।।
vistīrṇe mandaraprasthe bhraman bhāti rathottamaḥ | sāditya iva saptāśvo merau rathavaro bhraman ||
विस्तृत मन्दराचल के प्रस्थ पर भटकता हुआ वह श्रेष्ठ रथ उसी प्रकार शोभित हो रहा था, जैसे मेरु पर्वत पर सूर्य का सात घोड़ोंवाला श्रेष्ठ रथ भटकता हुआ शोभित होता है।
श्लोक 28 (skanda.8.142.28)
अवप्लुत्य ततस्तस्माद्द्रुताश्वाद्रथसत्तमात् । कार्तस्वनो धनुष्पाणिरभिदुद्राव विट्पतिम् ।।
avaplutya tatastasmāddrutāśvādrathasattamāt | kārtasvano dhanuṣpāṇirabhidudrāva viṭpatim ||
तब उस वेगवान् घोड़ोंवाले श्रेष्ठ रथ से कूदकर कार्तस्वन धनुष हाथ में लिए हुए विट्पति की ओर दौड़ पड़ा।
श्लोक 29 (skanda.8.142.29)
बलयोस्तु ततो नादः साधुसाध्विति संबभौ । कार्तस्वने योद्धुकामे भूयो विट्पतिना सह ।।
balayostu tato nādaḥ sādhusādhviti saṁbabhau | kārtasvane yoddhukāme bhūyo viṭpatinā saha ||
कार्तस्वन के पुनः विट्पति से युद्ध करने की इच्छा प्रकट करने पर दोनों सेनाओं में 'साधु-साधु' का घोष गूँज उठा।
श्लोक 30 (skanda.8.142.30)
स विट्पतिं वज्रनिभैर्बहुभिर्निशितैः शरैः । दानवोऽवाकिरन्मेघो यथा धारोत्करैर्गिरिम् ।।
sa viṭpatiṁ vajranibhairbahubhirniśitaiḥ śaraiḥ | dānavo'vākiranmegho yathā dhārotkarairgirim ||
उस दानव ने वज्र के समान अनेक तीक्ष्ण बाणों से विट्पति को उसी प्रकार ढक दिया, जैसे मेघ जलधाराओं के समूह से किसी पर्वत को ढक देता है।
श्लोक 31 (skanda.8.142.31)
स कार्तस्वनबाणौघैर्घनौघैरिव सागरः । विट्पतिः पूर्यमाणोऽपि व्यथां नैव तदागमत् ।।
sa kārtasvanabāṇaughairghanaughairiva sāgaraḥ | viṭpatiḥ pūryamāṇo'pi vyathāṁ naiva tadāgamat ||
मेघों के समूह से भरते हुए समुद्र के समान कार्तस्वन के बाण-समूहों से भरा जाता हुआ भी विट्पति को कोई पीड़ा नहीं हुई।
श्लोक 32 (skanda.8.142.32)
आकर्णात्कार्मुकं सोऽथ विकृष्य बलवान् बलात् । चिच्छेद दैत्येन्द्रशरान् द्विधैकैकं त्रिधा तथा ।।
ākarṇātkārmukaṁ so'tha vikṛṣya balavān balāt | ciccheda daityendraśarān dvidhaikaikaṁ tridhā tathā ||
फिर बलवान विट्पति ने अपने धनुष को कान तक बलपूर्वक खींचकर दैत्येन्द्र के प्रत्येक बाण को दो-दो और तीन-तीन टुकड़ों में काट डाला।
श्लोक 33 (skanda.8.142.33)
तानिषून्शातयित्वा तु पत्रिभिः प्राणभोजनैः । कार्तस्वनं सहस्रेण बिभेद च ननाद च ।।
tāniṣūnśātayitvā tu patribhiḥ prāṇabhojanaiḥ | kārtasvanaṁ sahasreṇa bibheda ca nanāda ca ||
उन बाणों को इस प्रकार काटकर, प्राणों को भक्षण करने वाले पंखयुक्त सहस्र बाणों से उन्होंने कार्तस्वन को विदीर्ण कर दिया और गर्जना की।
श्लोक 34 (skanda.8.142.34)
पृष्ठतो दृश्यमानास्यैः शरैस्तैर्दानवो बभौ । यथाचलो नागवरैर्विवरार्धविनिर्गतैः ।।
pṛṣṭhato dṛśyamānāsyaiḥ śaraistairdānavo babhau | yathācalo nāgavarairvivarārdhavinirgataiḥ ||
पीठ की ओर से दिखाई देने वाले फलों (नोकों) वाले उन बाणों से बिंधा हुआ वह दानव उसी प्रकार शोभित हुआ, जैसे बिलों से आधे निकले हुए श्रेष्ठ सर्पों से युक्त पर्वत।
श्लोक 35 (skanda.8.142.35)
अथास्य कार्मुकं खड्गं शरावापञ्च पञ्चकम् । चिच्छेद रुद्रः संक्रुद्धस्तं च सोऽभ्यर्दयद्बली ।।
athāsya kārmukaṁ khaḍgaṁ śarāvāpañca pañcakam | ciccheda rudraḥ saṁkruddhastaṁ ca so'bhyardayadbalī ||
अत्यन्त क्रुद्ध हुए बलवान विट्पति ने उसके धनुष, तलवार और पाँच तरकशों को काट डाला, और उसे अत्यन्त पीड़ित कर दिया।
श्लोक 36 (skanda.8.142.36)
अथ बाणमिन्द्रकुलिशेन समं कुपितं श्वसन्तमिव नागपतिम् । विससर्ज विट्पतिरुदारबलोदितिनन्दनार्दनमजिह्मगतिम् ।।
atha bāṇamindrakuliśena samaṁ kupitaṁ śvasantamiva nāgapatim | visasarja viṭpatirudārabaloditinandanārdanamajihmagatim ||
फिर उदार बलवाले विट्पति ने इन्द्र के वज्र के समान, क्रुद्ध होकर फुफकारते हुए सर्पराज के समान, दिति-पुत्रों को पीड़ा देने वाला, अचूक गतिवाला एक बाण छोड़ा।
श्लोक 37 (skanda.8.142.37)
शरराट् स रुद्रवरसंप्रहितः समराङ्गणे विसृतधूमलवः । असुराननं युधि जहार बलात् कमलं यथा मुनिरुदारमतिः ।।
śararāṭ sa rudravarasaṁprahitaḥ samarāṅgaṇe visṛtadhūmalavaḥ | asurānanaṁ yudhi jahāra balāt kamalaṁ yathā munirudāramatiḥ ||
श्रेष्ठ रुद्र द्वारा छोड़ा गया, युद्धभूमि में धुएँ की रेखाएँ छोड़ता हुआ वह बाणराज उदार बुद्धिवाले मुनि द्वारा कमल तोड़े जाने के समान, बलपूर्वक युद्ध में असुर के मुख को उड़ा ले गया।
श्लोक 38 (skanda.8.142.38)
अथ दैवतैर्मुनिवरैश्च कृतः प्रमथैश्च भीमनिनदैर्निनदः । तदरेर्मुखं हृतमुदीक्ष्य तदा वडवामुखाग्निदमनेन रणे ।।
atha daivatairmunivaraiśca kṛtaḥ pramathaiśca bhīmaninadairninadaḥ | tadarermukhaṁ hṛtamudīkṣya tadā vaḍavāmukhāgnidamanena raṇe ||
उस समय शत्रु के मुख को इस प्रकार वड़वानल-दमन विट्पति द्वारा युद्ध में हरा हुआ देखकर देवताओं, श्रेष्ठ मुनियों और प्रमथों ने भयंकर गर्जना के साथ महान घोष किया।
श्लोक 39 (skanda.8.142.39)
स तु विट्पतिः प्रमथसैन्यपतिस्त्वभिसृत्य भूतपतिना सुचिरम् । अभिपूजितः समरकर्मपटुस्त्रिदशारिसिंहदमनो दमनः ।।
sa tu viṭpatiḥ pramathasainyapatistvabhisṛtya bhūtapatinā suciram | abhipūjitaḥ samarakarmapaṭustridaśārisiṁhadamano damanaḥ ||
प्रमथसेना के स्वामी, युद्ध-कर्म में निपुण, देवशत्रुओं में सिंह के समान दुर्जय कार्तस्वन के उस दमनकर्ता विट्पति ने भूतपति के पास जाकर बहुत देर तक उनकी पूजा प्राप्त की।