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अम्बिका खण्ड · अध्याय 143

गणसमवाय

अध्याय 142अध्याय-सूचीअध्याय 144

श्लोक 1 (skanda.8.143.1)

कार्तस्वनमरिं हत्वा कार्तस्वरमहेषुणा । ददाह विट्पतिर्दैत्याननलः शलभानिव ।।

kārtasvanamariṁ hatvā kārtasvaramaheṣuṇā | dadāha viṭpatirdaityānanalaḥ śalabhāniva ||

शत्रु कार्तस्वन को स्वर्ण-निर्मित महान बाण से मारकर विट्पति ने दैत्यों को उसी प्रकार भस्म करना आरम्भ किया, जैसे अग्नि टिड्डियों को जला देती है।

श्लोक 2 (skanda.8.143.2)

स व्यायत धनुर्देवश्चारुकाञ्चनकुण्डलः । जगर्जेषून्दानवेषु सृजन्सूर्यः करानिव ।।

sa vyāyata dhanurdevaścārukāñcanakuṇḍalaḥ | jagarjeṣūndānaveṣu sṛjansūryaḥ karāniva ||

सुन्दर स्वर्ण-कुण्डलधारी वह देव अपना धनुष खींचकर, दानवों पर बाण चलाते हुए, सूर्य की किरणों के समान गर्जना करने लगे।

श्लोक 3 (skanda.8.143.3)

ते काञ्चनमयैः पुङ्खैर्गरुडाङ्गरुहच्छदैः । दैवसृष्टा इवानर्था दानवेष्वपतञ्छराः ।।

te kāñcanamayaiḥ puṅkhairgaruḍāṅgaruhacchadaiḥ | daivasṛṣṭā ivānarthā dānaveṣvapatañcharāḥ ||

स्वर्णमय पीछों और गरुड़ के पंखों से युक्त वे बाण दानवों पर उसी प्रकार गिरे, जैसे विधाता द्वारा भेजी गई विपत्तियाँ गिरती हैं।

श्लोक 4 (skanda.8.143.4)

छिन्नानना श्छिन्नकराश्छिन्नपादोदरोरवः । दानवाः शतशः पेतुः क्षितौ क्षितिधरा यथा ।।

chinnānanā śchinnakarāśchinnapādodaroravaḥ | dānavāḥ śataśaḥ petuḥ kṣitau kṣitidharā yathā ||

जिनके मुख, हाथ, पैर, पेट और जाँघें कट गई थीं, ऐसे दानव सैकड़ों की संख्या में उसी प्रकार पृथ्वी पर गिर पड़े, जैसे पर्वत गिर पड़ते हैं।

श्लोक 5 (skanda.8.143.5)

पृष्ठेष्वभिहताः केचित् केचित् पार्श्वेषु दारिताः । नयनेष्वपरे विद्धा भ्रमन्त्यन्धा इवापरे ।।

pṛṣṭheṣvabhihatāḥ kecit kecit pārśveṣu dāritāḥ | nayaneṣvapare viddhā bhramantyandhā ivāpare ||

कुछ पीठ में आहत हुए, कुछ पार्श्व में विदीर्ण हुए, कुछ नेत्रों में बिंधे हुए, और कुछ अंधों के समान इधर-उधर भटकने लगे।

श्लोक 6 (skanda.8.143.6)

मृगानिव च शार्दूलो गरुडः पन्नगानिव । कृतघ्नः सुकृतानीव तमांसीव दिवाकरः ।।

mṛgāniva ca śārdūlo garuḍaḥ pannagāniva | kṛtaghnaḥ sukṛtānīva tamāṁsīva divākaraḥ ||

जैसे व्याघ्र मृगों को, गरुड़ सर्पों को, कृतघ्नता पुण्यों को और सूर्य अंधकार को नष्ट कर देता है,

श्लोक 7 (skanda.8.143.7)

तथा तानसुरान्देवो विट्पतिः पावकार्दनः । अनाशयत तीक्ष्णाग्रैः शरैर्वज्रानलाननैः ।।

tathā tānasurāndevo viṭpatiḥ pāvakārdanaḥ | anāśayata tīkṣṇāgraiḥ śarairvajrānalānanaiḥ ||

वैसे ही अग्नि-सम तेजस्वी देव विट्पति ने उन असुरों को तीक्ष्ण अग्रभागवाले, वज्र और अग्नि के समान मुखवाले बाणों से नष्ट कर डाला।

श्लोक 8 (skanda.8.143.8)

विरथाः पातितगजाः शरातुरतुरङ्गमाः । धावन्ते दानवास्त्रस्ता विट्पतेः शरवेजिताः ।।

virathāḥ pātitagajāḥ śarāturaturaṅgamāḥ | dhāvante dānavāstrastā viṭpateḥ śaravejitāḥ ||

रथहीन, हाथियों को गिरा चुके, बाणों से पीड़ित घोड़ोंवाले वे दानव विट्पति के बाणों से वेगित होकर भयभीत होकर भागने लगे।

श्लोक 9 (skanda.8.143.9)

अथ दृष्ट्वासुरबलं मुक्तशस्त्रयशोम्बरम् । भग्नं विट्पतिना युद्धे गजेनेव यथा वनम् ।।

atha dṛṣṭvāsurabalaṁ muktaśastrayaśombaram | bhagnaṁ viṭpatinā yuddhe gajeneva yathā vanam ||

युद्ध में विट्पति द्वारा शस्त्र, यश और वस्त्र त्यागकर भागती हुई और उसी प्रकार छिन्न-भिन्न हुई असुरसेना को देखकर, जैसे गजराज वन को रौंद डालता है,

श्लोक 10 (skanda.8.143.10)

ये ये बलोत्कटास्तत्र प्रख्याताश्च सुरेतराः । अभिद्रुता विट्पतिना सिंहेनेवेतरे मृगाः ।।

ye ye balotkaṭāstatra prakhyātāśca suretarāḥ | abhidrutā viṭpatinā siṁhenevetare mṛgāḥ ||

वहाँ जो-जो बलशाली और विख्यात असुर थे, वे सब विट्पति द्वारा उसी प्रकार खदेड़े गए, जैसे सिंह द्वारा अन्य मृग खदेड़े जाते हैं।

श्लोक 11 (skanda.8.143.11)

प्रह्रादश्चानुह्रादश्च संह्रादः शिनिबाष्कलौ । जम्भो विरोचनो बाणो बलिश्चैव स दानवः ।।

prahrādaścānuhrādaśca saṁhrādaḥ śinibāṣkalau | jambho virocano bāṇo baliścaiva sa dānavaḥ ||

प्रह्लाद, अनुह्लाद, संह्लाद, शिनि और बाष्कल, जम्भ, विरोचन, बाण और वह दानव बलि -

श्लोक 12 (skanda.8.143.12)

अजको नमुचिर्व्यंसः इल्वको विल्वकस्तथा । विप्रचित्तिस्तुहुण्डश्च हुण्डो वक्रश्च दानवः ।।

ajako namucirvyaṁsaḥ ilvako vilvakastathā | vipracittistuhuṇḍaśca huṇḍo vakraśca dānavaḥ ||

अजक, नमुचि, व्यंस, इल्वक, विल्वक, विप्रचित्ति, तुहुण्ड, हुण्ड और वह दानव वक्र -

श्लोक 13 (skanda.8.143.13)

मयस्तारस्तारकाक्षो विद्युन्माली प्रभञ्जनः । अरिष्टश्चैव रिष्टश्च अञ्जनो रूशभः कुभः ।।

mayastārastārakākṣo vidyunmālī prabhañjanaḥ | ariṣṭaścaiva riṣṭaśca añjano rūśabhaḥ kubhaḥ ||

मय, तार, तारकाक्ष, विद्युन्माली, प्रभंजन, अरिष्ट, रिष्ट, अंजन, रूषभ और कुभ -

श्लोक 14 (skanda.8.143.14)

कालश्च कालनेमिश्च कालकावदनस्तथा । संपातिरिल्वलश्चापि बलो नरक एव च ।।

kālaśca kālanemiśca kālakāvadanastathā | saṁpātirilvalaścāpi balo naraka eva ca ||

काल, कालनेमि, कालकावदन, संपाति, इल्वल, बल और नरक -

श्लोक 15 (skanda.8.143.15)

मधुकैटभयोः पुत्रौ धुन्धुर्मूकश्च दानवः । हस्तिर्विपाकः पाकश्च विकर्णः शम्भुरेव च ।।

madhukaiṭabhayoḥ putrau dhundhurmūkaśca dānavaḥ | hastirvipākaḥ pākaśca vikarṇaḥ śambhureva ca ||

मधु और कैटभ के दो पुत्र, धुन्धु, मूक नामक दानव, हस्ती, विपाक, पाक, विकर्ण और शम्भु -

श्लोक 16 (skanda.8.143.16)

उद्यतैर्बहुभिः शस्त्रैरुल्कापातसमप्रभैः । विट्पतिं दुद्रुवुः क्रुद्धाः सिंहा इव विनेदुषः ।।

udyatairbahubhiḥ śastrairulkāpātasamaprabhaiḥ | viṭpatiṁ dudruvuḥ kruddhāḥ siṁhā iva vineduṣaḥ ||

ये सब क्रुद्ध होकर, उल्कापात के समान तेजवाले अनेक उठाए हुए शस्त्रों के साथ, गरजते हुए सिंहों के समान विट्पति की ओर दौड़ पड़े।

श्लोक 17 (skanda.8.143.17)

ते तं शूलोपलैर्हुण्डैः सायकैश्चाशनिस्वनैः । निजघ्नुर्भीमनिनदाः पयोदा इव पर्वतम् ।।

te taṁ śūlopalairhuṇḍaiḥ sāyakaiścāśanisvanaiḥ | nijaghnurbhīmaninadāḥ payodā iva parvatam ||

भयंकर गर्जना करते हुए वे शूलों, पत्थरों, हुण्डों (गदाओं) और अशनि के समान गर्जन करने वाले बाणों से उस पर उसी प्रकार प्रहार करने लगे, जैसे मेघ किसी पर्वत पर बरसते हैं।

श्लोक 18 (skanda.8.143.18)

तोयवृष्टिं यथा मेघा विसृजन्त्यनिलेरिताः । ससृजुर्दानवा देवे शरवृष्टिं तथैव ते ।।

toyavṛṣṭiṁ yathā meghā visṛjantyanileritāḥ | sasṛjurdānavā deve śaravṛṣṭiṁ tathaiva te ||

जैसे वायु से प्रेरित मेघ जल-वृष्टि करते हैं, वैसे ही उन दानवों ने उस देव पर बाणों की वृष्टि की।

श्लोक 19 (skanda.8.143.19)

तां शस्त्रवृष्टिमामित्रीममित्रगणमर्दनः । अच्छिनद्विट्पतिस्तूर्णं संप्रीतिं कलहो यथा ।।

tāṁ śastravṛṣṭimāmitrīmamitragaṇamardanaḥ | acchinadviṭpatistūrṇaṁ saṁprītiṁ kalaho yathā ||

शत्रुगणों का दमन करने वाले विट्पति ने उस शत्रुतापूर्ण शस्त्र-वृष्टि को उसी प्रकार तुरन्त छिन्न-भिन्न कर दिया, जैसे कलह मैत्री को नष्ट कर देता है।

श्लोक 20 (skanda.8.143.20)

ततस्ते दनुदैतेया वियत्स्था विटपतिं प्रति । नर्दमाना इवाम्भोदा गिरिवर्षं सृजन्त्युत ।।

tataste danudaiteyā viyatsthā viṭapatiṁ prati | nardamānā ivāmbhodā girivarṣaṁ sṛjantyuta ||

तब वे दनु-दैत्य आकाश में स्थित होकर विट्पति पर, गरजते हुए मेघों के समान, पर्वतों की वर्षा करने लगे।

श्लोक 21 (skanda.8.143.21)

अन्ये च मन्दराग्रस्था मन्दारस्रगिवास्थिताः । मुमुचुः सालसरलान् देवदारूँश्च विट्पतौ ।।

anye ca mandarāgrasthā mandārasragivāsthitāḥ | mumucuḥ sālasaralān devadārū~śca viṭpatau ||

मन्दराचल के शिखर पर मन्दार-माला के समान खड़े हुए अन्य दानवों ने विट्पति पर शाल, सरल और देवदारु वृक्ष फेंके।

श्लोक 22 (skanda.8.143.22)

साम्बरस्थैःक्षितिस्थैश्च दानवैर्दृढमर्दितः । विट्पतिर्विमुखो जज्ञे तोयसिक्त इवानलः ।।

sāmbarasthaiḥkṣitisthaiśca dānavairdṛḍhamarditaḥ | viṭpatirvimukho jajñe toyasikta ivānalaḥ ||

आकाश में स्थित और भूमि पर स्थित दानवों द्वारा इस प्रकार दृढ़तापूर्वक पीड़ित होकर विट्पति उसी प्रकार म्लान हो गए, जैसे जल से सींची गई अग्नि म्लान हो जाती है।

श्लोक 23 (skanda.8.143.23)

विट्पतिं विमुखं दृष्ट्वा दानवैः पर्वतैश्चितम् । नामर्षयन् भीमबलाः प्रख्याता ये गणेश्वराः ।।

viṭpatiṁ vimukhaṁ dṛṣṭvā dānavaiḥ parvataiścitam | nāmarṣayan bhīmabalāḥ prakhyātā ye gaṇeśvarāḥ ||

दानवों और पर्वतों से घिरे हुए विट्पति को इस प्रकार म्लान देखकर, विख्यात एवं भीमबलशाली गणेश्वरों ने इसे सहन नहीं किया।

श्लोक 24 (skanda.8.143.24)

सोमनन्दी च नन्दी च नन्दिषेणश्च पार्षदः । प्रभामयो वीरभद्रश्च सूर्याप्यायन एव च ।।

somanandī ca nandī ca nandiṣeṇaśca pārṣadaḥ | prabhāmayo vīrabhadraśca sūryāpyāyana eva ca ||

सोमनन्दी, नन्दी, पार्षद नन्दिषेण, प्रभामय, वीरभद्र और सूर्याप्यायन -

श्लोक 25 (skanda.8.143.25)

पञ्चाक्षः कोपपालश्च त्रिनेत्रः पिङ्गलेक्षणः । राक्षसः पिङ्गलश्चैव श्मशाननिलयोन्नदः ।।

pañcākṣaḥ kopapālaśca trinetraḥ piṅgalekṣaṇaḥ | rākṣasaḥ piṅgalaścaiva śmaśānanilayonnadaḥ ||

पंचाक्ष, कोपपाल, त्रिनेत्र, पिंगलेक्षण, राक्षस, पिंगल और श्मशान-निवासी उन्नद -

श्लोक 26 (skanda.8.143.26)

घण्टाकर्णः शंकुकर्णः स च कुण्डोदरो बली । ऐरावतमुखश्चैव अन्नपालः कपालधृक् । प्रलम्बपीवरकरः स्वयमेव विनायकः ।।

ghaṇṭākarṇaḥ śaṁkukarṇaḥ sa ca kuṇḍodaro balī | airāvatamukhaścaiva annapālaḥ kapāladhṛk | pralambapīvarakaraḥ svayameva vināyakaḥ ||

घण्टाकर्ण, शंकुकर्ण, बलवान कुण्डोदर, ऐरावतमुख, अन्नपाल, कपालधारी, तथा लम्बी और स्थूल भुजाओंवाले स्वयं विनायक -

श्लोक 27 (skanda.8.143.27)

एते चान्ये च गणपाः शतशः शब्दिता गणैः । विविशुर्दानवान्दग्धुं द्रुमाञ्छुष्कानिवानलाः ।।

ete cānye ca gaṇapāḥ śataśaḥ śabditā gaṇaiḥ | viviśurdānavāndagdhuṁ drumāñchuṣkānivānalāḥ ||

ये और अन्य सैकड़ों गणपति, गणों द्वारा पुकारे जाने पर, दानवों को उसी प्रकार भस्म करने के लिए घुस पड़े, जैसे अग्नि सूखे वृक्षों को भस्म करने के लिए घुसती है।

श्लोक 28 (skanda.8.143.28)

ते विट्पतिं संपरिवार्य सर्वे गजेन्द्रपोता इव गर्जमानाः । त्रिशूलचक्रेषुभुशुण्डिहस्ता गणेश्वरा युद्धधियः प्रतीयुः ।।

te viṭpatiṁ saṁparivārya sarve gajendrapotā iva garjamānāḥ | triśūlacakreṣubhuśuṇḍihastā gaṇeśvarā yuddhadhiyaḥ pratīyuḥ ||

वे सब गणेश्वर विट्पति को चारों ओर से घेरकर, गजशावकों के समान गरजते हुए, त्रिशूल, चक्र, बाण और भुशुण्डि हाथों में लिए, युद्ध के लिए प्रतीक्षा करते हुए वहाँ आ डटे।

श्लोक 29 (skanda.8.143.29)

तेषां च तेषां च ततो बभूव संसक्तयुद्धं समरोद्धतानाम् । मदोद्धतानां सहवासितानां महागजानामिव काननेषु ।।

teṣāṁ ca teṣāṁ ca tato babhūva saṁsaktayuddhaṁ samaroddhatānām | madoddhatānāṁ sahavāsitānāṁ mahāgajānāmiva kānaneṣu ||

युद्ध में उद्धत हुए उन-उन दोनों दलों के बीच वैसा ही घोर संघर्ष हुआ, जैसा वन में साथ रहने वाले मदमत्त महागजों के बीच होता है।

श्लोक 30 (skanda.8.143.30)

तं दानवानां सगणेश्वराणां मुख्याहवं वीक्ष्य दिवौकसास्ते । चेरुर्नभो दिव्यविमानयानैः ससिंहनादाः सतलाभिघाताः ।।

taṁ dānavānāṁ sagaṇeśvarāṇāṁ mukhyāhavaṁ vīkṣya divaukasāste | cerurnabho divyavimānayānaiḥ sasiṁhanādāḥ satalābhighātāḥ ||

दानवों और गणेश्वरों के उस प्रमुख युद्ध को देखकर आकाशवासी देवगण दिव्य विमानों पर सवार होकर, सिंहनाद करते हुए और तालियाँ बजाते हुए, आकाश में विचरने लगे।

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