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अम्बिका खण्ड · अध्याय 144

तुहुण्डहुण्डवध

अध्याय 143अध्याय-सूचीअध्याय 145

श्लोक 1 (skanda.8.144.1)

तेऽतिसंरम्भसंयुक्ता दर्पिताः प्रमथासुराः । संसक्तयुद्धं युयुधुः परस्परकृतागसः ।।

te'tisaṁrambhasaṁyuktā darpitāḥ pramathāsurāḥ | saṁsaktayuddhaṁ yuyudhuḥ parasparakṛtāgasaḥ ||

अत्यन्त वेग और गर्व से युक्त वे प्रमथ और असुर, एक-दूसरे का अपराध करते हुए, आमने-सामने के युद्ध में भिड़ गए।

श्लोक 2 (skanda.8.144.2)

शक्त्युल्लालितहस्तेन कुमारेणावनिञ्जयः । कालनेमिः कालकल्पो विशाखं समयोधयत् ।।

śaktyullālitahastena kumāreṇāvaniñjayaḥ | kālanemiḥ kālakalpo viśākhaṁ samayodhayat ||

शक्ति को हाथ में उठाए हुए कुमार विशाख के साथ, काल के समान कालनेमि नामक पृथ्वी-विजयी दानव युद्ध करने लगा।

श्लोक 3 (skanda.8.144.3)

यश्चादित्यरथाच्चक्रं जहार बलदर्पितः । स विप्रचित्तिः शाखेन संसक्तो युद्धलालसः ।।

yaścādityarathāccakraṁ jahāra baladarpitaḥ | sa vipracittiḥ śākhena saṁsakto yuddhalālasaḥ ||

जिसने बल के गर्व से सूर्य के रथ का चक्र हर लिया था, वह विप्रचित्ति युद्ध की लालसा से शाख के साथ भिड़ गया।

श्लोक 4 (skanda.8.144.4)

नैगमेषो हयग्रीवं सुग्रीवं दानवाधिपम् । योधयामास सोऽग्नेयो मधुं मधुनिहा यथा ।।

naigameṣo hayagrīvaṁ sugrīvaṁ dānavādhipam | yodhayāmāsa so'gneyo madhuṁ madhunihā yathā ||

अग्निपुत्र नैगमेष ने हयग्रीव और सुग्रीव नामक दानवाधिप से उसी प्रकार युद्ध किया, जैसे मधु के नाशक विष्णु ने मधु से युद्ध किया था।

श्लोक 5 (skanda.8.144.5)

प्रायुध्यन् नन्दिना जम्भस्तुहुण्डः सोमनन्दिना । हुण्डो विनायकं शूरमयोधयत दानवः ।।

prāyudhyan nandinā jambhastuhuṇḍaḥ somanandinā | huṇḍo vināyakaṁ śūramayodhayata dānavaḥ ||

जम्भ नन्दी के साथ, तुहुण्ड सोमनन्दी के साथ युद्ध करने लगे, और हुण्ड नामक दानव शूरवीर विनायक से युद्ध करने लगा।

श्लोक 6 (skanda.8.144.6)

महाकायस्तु कालेन घनेन नमुचिस्सह । पिङ्गलाभ्यां गणेशाभ्यामिल्वकः पिल्वकस्स च ।।

mahākāyastu kālena ghanena namucissaha | piṅgalābhyāṁ gaṇeśābhyāmilvakaḥ pilvakassa ca ||

महाकाय मेघ के समान गम्भीर काल के साथ, नमुचि दोनों पिंगल नामक गणेश्वरों के साथ, और इल्वक व पिल्वक उनके साथ युद्ध करने लगे।

श्लोक 7 (skanda.8.144.7)

शंकुकर्णेन ह्रादस्तु ह्यनुह्रादेन विट्पतिः । आदित्याप्यायनो रुद्रः संह्रादेन समागतः ।।

śaṁkukarṇena hrādastu hyanuhrādena viṭpatiḥ | ādityāpyāyano rudraḥ saṁhrādena samāgataḥ ||

ह्राद शंकुकर्ण के साथ, विट्पति अनुह्राद के साथ, और आदित्याप्यायन रुद्र संह्राद के साथ भिड़ गए।

श्लोक 8 (skanda.8.144.8)

कुण्डोदरश्च यक्षेन्द्रो घण्टाकर्णश्च पार्षदः । बलेल्वलाभ्यां संसक्तौ सिंहाभ्यामिव कुञ्जरौ ।।

kuṇḍodaraśca yakṣendro ghaṇṭākarṇaśca pārṣadaḥ | balelvalābhyāṁ saṁsaktau siṁhābhyāmiva kuñjarau ||

यक्षेन्द्र कुण्डोदर और पार्षद घण्टाकर्ण बल और इल्वल के साथ उसी प्रकार भिड़ गए, जैसे दो गजराज दो सिंहों से भिड़ जाते हैं।

श्लोक 9 (skanda.8.144.9)

पञ्चाक्षेण बलिस्सार्धं रुद्रेणादित्यवर्चसा । बलेर्जनयिता सक्तो वीरभद्रेण दानवः ।।

pañcākṣeṇa balissārdhaṁ rudreṇādityavarcasā | balerjanayitā sakto vīrabhadreṇa dānavaḥ ||

सूर्य के समान तेजस्वी रुद्र पंचाक्ष के साथ बलि भिड़ गया, और बलि के पिता वीरभद्र के साथ भिड़ गया।

श्लोक 10 (skanda.8.144.10)

सुमुखेन मयस्सार्धं तारो दुर्मुखमासरत् । मयूरो वज्ररोमाणं कुक्कुटो मुरमागमत् ।।

sumukhena mayassārdhaṁ tāro durmukhamāsarat | mayūro vajraromāṇaṁ kukkuṭo muramāgamat ||

मय सुमुख के साथ, तार दुर्मुख के साथ भिड़ गया, मयूर वज्ररोमा के साथ, और कुक्कुट मुर के साथ भिड़ गया।

श्लोक 11 (skanda.8.144.11)

शेषा ह्यपि गणाध्यक्षाः शेषैर्दैत्यैस्समागताः । परस्परेण संसक्ता गजाः सिंहैरिवाहवे ।।

śeṣā hyapi gaṇādhyakṣāḥ śeṣairdaityaissamāgatāḥ | paraspareṇa saṁsaktā gajāḥ siṁhairivāhave ||

शेष गणाध्यक्ष भी शेष दैत्यों के साथ भिड़ गए, और युद्ध में परस्पर उसी प्रकार गुँथ गए, जैसे गज सिंहों से गुँथ जाते हैं।

श्लोक 12 (skanda.8.144.12)

दह्यतामिव वेणूनां विजने कृष्णवर्त्मना । अभूत्तटतटाशब्दः शस्त्राणां विनिपात्यताम् ।।

dahyatāmiva veṇūnāṁ vijane kṛṣṇavartmanā | abhūttaṭataṭāśabdaḥ śastrāṇāṁ vinipātyatām ||

जैसे किसी सुनसान स्थान में अग्नि से बाँस जलते हैं, वैसा ही 'तट-तट' शब्द गिरते हुए शस्त्रों से उत्पन्न हो रहा था।

श्लोक 13 (skanda.8.144.13)

मा द्रवीर्द्रव तिष्ठेति पश्य पश्येतिवादिनः । अन्योन्यमभिजघ्नुस्ते संसक्ता गणदानवाः ।।

mā dravīrdrava tiṣṭheti paśya paśyetivādinaḥ | anyonyamabhijaghnuste saṁsaktā gaṇadānavāḥ ||

'भाग मत, भाग! ठहर! देख, देख!' - ऐसा कहते हुए वे परस्पर भिड़े हुए गण और दानव एक-दूसरे पर प्रहार करते रहे।

श्लोक 14 (skanda.8.144.14)

वपामेदोभिदिग्धाङ्गाश्छिन्नाननकरोरवः । दानवाः प्रमथाश्चैव ह्यधावन् शस्त्रमक्षिताः ।।

vapāmedobhidigdhāṅgāśchinnānanakaroravaḥ | dānavāḥ pramathāścaiva hyadhāvan śastramakṣitāḥ ||

चर्बी और मेदे से लिपटे अंगोंवाले, कटे मुख, हाथ और जाँघोंवाले दानव और प्रमथ शस्त्रों से घायल होकर इधर-उधर दौड़ते रहे।

श्लोक 15 (skanda.8.144.15)

आननैरुरुभिः पादैः करदन्तेक्षणैरपि । हारैर्विकीर्णैः केयूरैः स्रगम्बरविभूषणैः ।।

ānanairurubhiḥ pādaiḥ karadantekṣaṇairapi | hārairvikīrṇaiḥ keyūraiḥ sragambaravibhūṣaṇaiḥ ||

मुखों, जंघाओं, पैरों, हाथों, दाँतों और आँखों से, बिखरे हुए हारों, बाजूबन्दों, मालाओं, वस्त्रों और आभूषणों से -

श्लोक 16 (skanda.8.144.16)

गजेन्द्रास्तपरिस्तोमैः कम्बलैरायुधैरपि । रराज स रणोद्देशो नभस्ताराग्रहैरिव ।।

gajendrāstaparistomaiḥ kambalairāyudhairapi | rarāja sa raṇoddeśo nabhastārāgrahairiva ||

तथा गजराजों के झूलों, कम्बलों और आयुधों से वह युद्धस्थल उसी प्रकार शोभित हो रहा था, जैसे आकाश तारों और ग्रहों से सुशोभित होता है।

श्लोक 17 (skanda.8.144.17)

नखदन्ताग्रजनितैश्चित्रैः क्षतजबिन्दुभिः । रक्तचन्दनदिग्धाङ्गी भूमिः स्त्रीरिव निर्बभौ ।।

nakhadantāgrajanitaiścitraiḥ kṣatajabindubhiḥ | raktacandanadigdhāṅgī bhūmiḥ strīriva nirbabhau ||

नखों और दाँतों की नोकों से उत्पन्न विचित्र रक्त-बिन्दुओं से, रक्त-चन्दन में लिपटे अंगोंवाली भूमि किसी स्त्री के समान शोभित हो रही थी।

श्लोक 18 (skanda.8.144.18)

विनायकस्य स शरं तुहुण्डः सूर्यतेजसम् । प्रेषयित्वा जहासोच्चैः कोपं तस्य विवर्धयन् ।।

vināyakasya sa śaraṁ tuhuṇḍaḥ sūryatejasam | preṣayitvā jahāsoccaiḥ kopaṁ tasya vivardhayan ||

विनायक पर सूर्य के समान तेजस्वी बाण भेजकर तुहुण्ड उनके क्रोध को बढ़ाते हुए ऊँचे स्वर में हँस पड़ा।

श्लोक 19 (skanda.8.144.19)

तस्यापि हसतो वक्त्रं बृहत्कुण्डलमण्डितम् । असिना तीक्ष्णधारेण चिच्छेद स विनायकः ।।

tasyāpi hasato vaktraṁ bṛhatkuṇḍalamaṇḍitam | asinā tīkṣṇadhāreṇa ciccheda sa vināyakaḥ ||

हँसते हुए उस तुहुण्ड के बड़े-बड़े कुण्डलों से सुशोभित मुख को विनायक ने तीक्ष्णधार तलवार से काट डाला।

श्लोक 20 (skanda.8.144.20)

तुहुण्डं निहतं दृष्ट्वा हुण्डो भ्रातृवधातुरः । शक्तिं चिक्षेप नागास्ये शक्रोऽशनिमिवाचले ।।

tuhuṇḍaṁ nihataṁ dṛṣṭvā huṇḍo bhrātṛvadhāturaḥ | śaktiṁ cikṣepa nāgāsye śakro'śanimivācale ||

तुहुण्ड को मारा गया देखकर भाई की मृत्यु से आतुर हुए हुण्ड ने गजमुख विनायक पर शक्ति फेंकी, जैसे इन्द्र किसी पर्वत पर वज्र फेंकते हैं।

श्लोक 21 (skanda.8.144.21)

विनायकस्य सा शक्तिर्मणौ मणिशताचिता । पतितासृक् पपौ क्रोडाज्ज्वलदग्निशिखोपमा ।।

vināyakasya sā śaktirmaṇau maṇiśatācitā | patitāsṛk papau kroḍājjvaladagniśikhopamā ||

सैकड़ों मणियों से जड़ी वह शक्ति विनायक की मणि पर गिरकर, प्रज्वलित अग्निशिखा के समान, उनके वक्षःस्थल से बहते रक्त को पी गई।

श्लोक 22 (skanda.8.144.22)

विनायकस्य सा क्रोडे लग्ना शक्तिविनिर्बभौ । इन्द्रनीलं मणिं प्राप्य रेखा चामीकरी यथा ।।

vināyakasya sā kroḍe lagnā śaktivinirbabhau | indranīlaṁ maṇiṁ prāpya rekhā cāmīkarī yathā ||

विनायक के वक्षःस्थल में लगी हुई वह शक्ति उसी प्रकार शोभित हुई, जैसे इन्द्रनील मणि पर पड़ी हुई सुवर्ण की रेखा शोभित होती है।

श्लोक 23 (skanda.8.144.23)

स हुण्डशक्तिं करपुष्करेण निकृष्य देवो रविरस्मिकल्पाम् । तयैव हुण्डं सहसा जघान तस्यानुजः क्रौञ्चमिवावनीध्रम् ।।

sa huṇḍaśaktiṁ karapuṣkareṇa nikṛṣya devo ravirasmikalpām | tayaiva huṇḍaṁ sahasā jaghāna tasyānujaḥ krauñcamivāvanīdhram ||

सूर्य की किरण के समान उस हुण्ड की शक्ति को अपनी सूँड़ से खींचकर उस देव ने उसी शक्ति से तुरन्त हुण्ड पर उसी प्रकार प्रहार किया, जैसे कुमार ने क्रौंच पर्वत पर प्रहार किया था।

श्लोक 24 (skanda.8.144.24)

प्रमापितौ वीक्ष्य तुहुण्डहुण्डौ विनायकेनारिविनायकेन । बलं समस्तं गणनायकानामुन्मत्तगङ्गाप्रतिमं बभूव ।।

pramāpitau vīkṣya tuhuṇḍahuṇḍau vināyakenārivināyakena | balaṁ samastaṁ gaṇanāyakānāmunmattagaṅgāpratimaṁ babhūva ||

शत्रुओं का विनाश करने वाले विनायक द्वारा तुहुण्ड और हुण्ड दोनों को इस प्रकार मारा गया देखकर, गणनायकों की समस्त सेना उन्मत्त गंगा के प्रवाह के समान वेगवान् हो गई।

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