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अम्बिका खण्ड · अध्याय 145

अन्धकशुक्रगमन

अध्याय 144अध्याय-सूचीअध्याय 146

श्लोक 1 (skanda.8.145.1)

विनायकेन हुण्डे च तुहुण्डे च प्रमापिते । गणेश्वरासुराणां तद्युद्धं संकुलमाबभौ ।।

vināyakena huṇḍe ca tuhuṇḍe ca pramāpite | gaṇeśvarāsurāṇāṁ tadyuddhaṁ saṁkulamābabhau ||

विनायक द्वारा हुण्ड और तुहुण्ड के मारे जाने पर गणेश्वरों और असुरों का वह युद्ध और भी सघन हो उठा।

श्लोक 2 (skanda.8.145.2)

ते नदित्वा यथा मेघा जलमत्ता जलागमे । संसाधयन्ते युध्यन्तस्त्वरयैव परस्परम् ।।

te naditvā yathā meghā jalamattā jalāgame | saṁsādhayante yudhyantastvarayaiva parasparam ||

जल-मत्त मेघों के समान गरजते हुए वे वर्षाकाल में जल की भाँति परस्पर अत्यन्त वेग से युद्ध करते रहे।

श्लोक 3 (skanda.8.145.3)

असृक्स्रवैस्सुरक्ताङ्गास्सन्दष्टदशनच्छदाः । अन्योन्यमभिसंजघ्नुः शूलशक्त्यृष्टिपट्टिशैः ।।

asṛksravaissuraktāṅgāssandaṣṭadaśanacchadāḥ | anyonyamabhisaṁjaghnuḥ śūlaśaktyṛṣṭipaṭṭiśaiḥ ||

रक्तस्राव से रंजित अंगोंवाले, दाँतों से होंठ दबाए हुए वे शूल, शक्ति, ऋष्टि और पट्टिश से परस्पर एक-दूसरे पर प्रहार करते रहे।

श्लोक 4 (skanda.8.145.4)

शक्तीनां क्षिप्यमाणानामसीनाञ्च निपात्यताम् । श्राव्यतां नामधेयानां धनुषां कूजतामपि ।।

śaktīnāṁ kṣipyamāṇānāmasīnāñca nipātyatām | śrāvyatāṁ nāmadheyānāṁ dhanuṣāṁ kūjatāmapi ||

फेंकी जाती हुई शक्तियों के, गिराई जाती हुई तलवारों के, पुकारे जाते हुए नामों के तथा टंकार करते हुए धनुषों के शब्द सुनाई पड़ रहे थे।

श्लोक 5 (skanda.8.145.5)

श्रोत्रायासकराञ्छब्दान् निशम्य बलिनां वरः । जम्भो भ्रातृवधामर्षी प्रविष्टः प्रामथं बलम् ।।

śrotrāyāsakarāñchabdān niśamya balināṁ varaḥ | jambho bhrātṛvadhāmarṣī praviṣṭaḥ prāmathaṁ balam ||

कान थका देने वाले उन शब्दों को सुनकर, बलवानों में श्रेष्ठ, अपने भाई की मृत्यु से क्रुद्ध जम्भ प्रमथों की सेना में घुस गया।

श्लोक 6 (skanda.8.145.6)

व्याघ्रपूर्वं त्रिशूलेन जम्भो भित्त्वा गणेश्वरम् । ननर्द महिषं हत्त्वा वने वनपतिर्यथा ।।

vyāghrapūrvaṁ triśūlena jambho bhittvā gaṇeśvaram | nanarda mahiṣaṁ hattvā vane vanapatiryathā ||

जम्भ ने व्याघ्रपूर्व नामक गणेश्वर को त्रिशूल से बेधकर उसी प्रकार गर्जना की, जैसे वन का स्वामी सिंह भैंसे को मारकर गर्जना करता है।

श्लोक 7 (skanda.8.145.7)

नर्दमानस्य तस्याथ प्रथमो गणपूर्वकः । शिरोऽभिहत्य शक्त्या तु शेषान्दैत्यान् प्रदुद्रुवे ।।

nardamānasya tasyātha prathamo gaṇapūrvakaḥ | śiro'bhihatya śaktyā tu śeṣāndaityān pradudruve ||

इस प्रकार गरजते हुए उस जम्भ का सिर एक अन्य श्रेष्ठ गणनायक ने शक्ति से आहत करके, फिर शेष दैत्यों की ओर दौड़ा।

श्लोक 8 (skanda.8.145.8)

गणपापि ततः ख्याताः ख्यातवीर्ययशःश्रुताः । प्रतीयुरसुरान् युद्धे शरभाः कुञ्जरानिव ।।

gaṇapāpi tataḥ khyātāḥ khyātavīryayaśaḥśrutāḥ | pratīyurasurān yuddhe śarabhāḥ kuñjarāniva ||

तब विख्यात पराक्रम और यश से प्रसिद्ध वे गणपति भी युद्ध में असुरों की ओर उसी प्रकार बढ़े, जैसे शरभ गजों की ओर बढ़ते हैं।

श्लोक 9 (skanda.8.145.9)

ततोऽसुरगणेशानां सन्निपातोऽभवन्महान् । संघट्ट इव वज्राणां सह काञ्चनपर्वतैः ।।

tato'suragaṇeśānāṁ sannipāto'bhavanmahān | saṁghaṭṭa iva vajrāṇāṁ saha kāñcanaparvataiḥ ||

तब असुरों और गणेश्वरों का महान संघर्ष हुआ, मानो वज्रों का सुवर्ण-पर्वतों के साथ संघात हो रहा हो।

श्लोक 10 (skanda.8.145.10)

विरोचनश्चान्धकश्च ववर्षतुरमर्षणौ । शरवृष्टीस्सुसंरब्धौ जलवृष्टीरिवाम्बुदौ ।।

virocanaścāndhakaśca vavarṣaturamarṣaṇau | śaravṛṣṭīssusaṁrabdhau jalavṛṣṭīrivāmbudau ||

क्रोध से भरे विरोचन और अन्धक दोनों अत्यन्त क्षुब्ध होकर उसी प्रकार बाणों की वर्षा करने लगे, जैसे दो मेघ जल की वर्षा करते हैं।

श्लोक 11 (skanda.8.145.11)

स्वयंप्रभेण तौ दैत्यौ शरवर्षविसर्जनौ । विमुखौ संयुगमुखे कृतौ शरवरार्दितौ ।।

svayaṁprabheṇa tau daityau śaravarṣavisarjanau | vimukhau saṁyugamukhe kṛtau śaravarārditau ||

बाणों की वर्षा करते हुए वे दोनों दैत्य स्वयंप्रभ द्वारा युद्ध के मोर्चे पर श्रेष्ठ बाणों से पीड़ित होकर पराङ्मुख कर दिए गए।

श्लोक 12 (skanda.8.145.12)

स्वयंप्रभो दानवसैन्यसागरं शरैरनेकैर्धनुयन्त्रनिःसृतैः । सशोषयद्दीप्तमरीचिमण्डलो यथा विवस्वान् जगतः क्षयेऽर्णवम् ।।

svayaṁprabho dānavasainyasāgaraṁ śarairanekairdhanuyantraniḥsṛtaiḥ | saśoṣayaddīptamarīcimaṇḍalo yathā vivasvān jagataḥ kṣaye'rṇavam ||

स्वयंप्रभ ने धनुष-यन्त्र से छूटे हुए अनेक बाणों से दानव-सेना रूपी सागर को उसी प्रकार सुखा डाला, जैसे प्रलयकाल में प्रचण्ड किरण-मण्डलवाला सूर्य समुद्र को सुखा देता है।

श्लोक 13 (skanda.8.145.13)

ततोऽन्धको दानवलोकसारथिः स्वसारथिं प्राह विवृत्तलोचनः । शुक्रं प्रति प्रापय सारथे मां स नः सदा दुःखहरो गुरुश्च ।।

tato'ndhako dānavalokasārathiḥ svasārathiṁ prāha vivṛttalocanaḥ | śukraṁ prati prāpaya sārathe māṁ sa naḥ sadā duḥkhaharo guruśca ||

तब दानवलोक के सारथि (नेता) अन्धक ने आँखें फिराते हुए अपने सारथि से कहा - 'हे सारथे! मुझे शुक्राचार्य के पास ले चलो, क्योंकि वे ही सदा हमारे दुःखों को दूर करने वाले गुरु हैं।'

श्लोक 14 (skanda.8.145.14)

स तं रथं दानवयूथपास्थितं तथेति च प्रोच्य सदश्वसंयुतम् । सं प्रापयामास पयोदनिस्वनं स यत्र शुक्रो ग्रहसत्तमो द्विज ।।

sa taṁ rathaṁ dānavayūthapāsthitaṁ tatheti ca procya sadaśvasaṁyutam | saṁ prāpayāmāsa payodanisvanaṁ sa yatra śukro grahasattamo dvija ||

'ऐसा ही होगा' कहकर सारथि ने दानव-सेनापति के उस मेघ-गर्जना के समान घोड़ोंवाले रथ को, हे द्विज! उस स्थान पर पहुँचा दिया, जहाँ ग्रहों में श्रेष्ठ शुक्राचार्य थे।

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