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अम्बिका खण्ड · अध्याय 146

दैत्योज्जीवन

अध्याय 145अध्याय-सूचीअध्याय 147

श्लोक 1 (skanda.8.146.1)

अपसृत्य ततो युद्धादन्धकोऽसुरसत्तमः । शुक्रान्तिकमुपागम्य इदमाह नताननः ।।

apasṛtya tato yuddhādandhako'surasattamaḥ | śukrāntikamupāgamya idamāha natānanaḥ ||

युद्ध से हटकर असुरश्रेष्ठ अन्धक शुक्राचार्य के पास जाकर, मस्तक झुकाकर यह बोला -

श्लोक 2 (skanda.8.146.2)

भगवँस्त्वां समाश्रित्य वयं देवान् सहानुगान् । गणयामस्तृणैस्तुल्यान् सदा सत्यं ब्रवीम्यहम् ।।

bhagava~stvāṁ samāśritya vayaṁ devān sahānugān | gaṇayāmastṛṇaistulyān sadā satyaṁ bravīmyaham ||

'हे भगवन्! आपका आश्रय पाकर हम अनुचरों-सहित देवताओं को सदा तिनके के समान गिनते हैं; मैं सत्य कह रहा हूँ।'

श्लोक 3 (skanda.8.146.3)

कुञ्जरा इव सिंहानां गरुडानामिवाहयः । अस्माकं बिभ्यति सदा देवा युष्मत्प्रसादतः ।।

kuñjarā iva siṁhānāṁ garuḍānāmivāhayaḥ | asmākaṁ bibhyati sadā devā yuṣmatprasādataḥ ||

'जैसे गजराज सिंहों से और सर्प गरुड़ों से डरते हैं, वैसे ही आपकी कृपा से देवगण सदा हमसे डरते रहे हैं।'

श्लोक 4 (skanda.8.146.4)

दुर्गं देवगणव्यूहं भवता प्रतिपालिताः । विविशुर्निर्भयाः दैत्या ह्रदमुष्णार्दिता इव ।।

durgaṁ devagaṇavyūhaṁ bhavatā pratipālitāḥ | viviśurnirbhayāḥ daityā hradamuṣṇārditā iva ||

'आपके द्वारा रक्षित होकर दैत्यों ने देवगणों की दुर्गम व्यूह-रचना में उसी प्रकार निर्भय होकर प्रवेश किया, जैसे गर्मी से पीड़ित प्राणी सरोवर में प्रवेश करते हैं।'

श्लोक 5 (skanda.8.146.5)

वयं त्वच्छरणा भूत्वा पाषाणा इव निश्चलाः । स्थित्वा वधाम निःशंका ब्राह्मणेन्द्रेन्द्रमाहवे ।।

vayaṁ tvaccharaṇā bhūtvā pāṣāṇā iva niścalāḥ | sthitvā vadhāma niḥśaṁkā brāhmaṇendrendramāhave ||

'हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! आपकी शरण पाकर हम पत्थर के समान अचल होकर, निःशंक होकर युद्ध में इन्द्र का भी वध कर सकते हैं।'

श्लोक 6 (skanda.8.146.6)

आपद्भावेन च वयं पादौ तव सुखप्रदौ । सदाराः ससुताश्चैव शुश्रूषामो दिवानिशम् ।।

āpadbhāvena ca vayaṁ pādau tava sukhapradau | sadārāḥ sasutāścaiva śuśrūṣāmo divāniśam ||

'आपत्ति के समय हम पत्नी और पुत्रों सहित आपके सुखप्रद चरणों की दिन-रात सेवा करते हैं।'

श्लोक 7 (skanda.8.146.7)

अभिरक्षस्व सततं स नस्त्वच्छरणागतान् । भयेषु सततं देवान् नारायण इवापरः ।।

abhirakṣasva satataṁ sa nastvaccharaṇāgatān | bhayeṣu satataṁ devān nārāyaṇa ivāparaḥ ||

'आपकी शरण में आए हुए हम सबकी सतत रक्षा कीजिए, जैसे दूसरा नारायण संकटों में देवताओं की रक्षा करते हैं।'

श्लोक 8 (skanda.8.146.8)

पश्य हुण्डं तुहुण्डं च कुजम्भं जम्भमेव च । पाकं कार्तस्वनं चैव विपाकं च महासुरम् ।।

paśya huṇḍaṁ tuhuṇḍaṁ ca kujambhaṁ jambhameva ca | pākaṁ kārtasvanaṁ caiva vipākaṁ ca mahāsuram ||

'देखिए, हुण्ड, तुहुण्ड, कुजम्भ, जम्भ, पाक, कार्तस्वन और महासुर विपाक को -

श्लोक 9 (skanda.8.146.9)

तं चेन्द्रदमनं शूरं शूरामरनिपातनम् । प्रमथैर्भीमविक्रान्तैः क्रान्तमृत्युव्यथादिभिः ।।

taṁ cendradamanaṁ śūraṁ śūrāmaranipātanam | pramathairbhīmavikrāntaiḥ krāntamṛtyuvyathādibhiḥ ||

'तथा इन्द्र का दमन करने वाले शूरवीरों तथा देवताओं का संहार करने वाले उन दानवों को भी - जो भीषण पराक्रमी प्रमथों द्वारा मृत्यु की पीड़ा प्राप्त कर चुके हैं -

श्लोक 10 (skanda.8.146.10)

सूदितान्पतितानेतान् हरिणैरिव चन्दनान् । या पीत्वा कणधूमं वै सहस्रं शरदां पुरा । विद्या हराद्वरा प्राप्ता तस्याः कालोऽयमागतः ।।

sūditānpatitānetān hariṇairiva candanān | yā pītvā kaṇadhūmaṁ vai sahasraṁ śaradāṁ purā | vidyā harādvarā prāptā tasyāḥ kālo'yamāgataḥ ||

'हरिणों द्वारा कुतरे गए चन्दन वृक्षों के समान मारे गए और गिरे हुए इन सबको देखिए। पूर्वकाल में सहस्र वर्षों तक कणों का धुआँ पीकर आपने भगवान शिव से जो श्रेष्ठ विद्या प्राप्त की थी, उसका प्रयोग करने का समय अब आ पहुँचा है।'

श्लोक 11 (skanda.8.146.11)

अथ विद्याफलं तत्ते जीवयानस्य दानवान् । पश्यन्तु प्रमथाः सर्वे लोकाश्चोत्फुल्ललोचनाः ।।

atha vidyāphalaṁ tatte jīvayānasya dānavān | paśyantu pramathāḥ sarve lokāścotphullalocanāḥ ||

'अब आप उस विद्या के फल से दानवों को जीवित कीजिए, जिसे सब प्रमथ और सारा संसार आश्चर्यचकित नेत्रों से देखे।'

श्लोक 12 (skanda.8.146.12)

त्वया सञ्जीवितान् दृष्ट्वा दानवा दानवान् युधि । सर्वे मृत्युभयं हित्वा योत्स्यन्ते प्रमथैः सह ।।

tvayā sañjīvitān dṛṣṭvā dānavā dānavān yudhi | sarve mṛtyubhayaṁ hitvā yotsyante pramathaiḥ saha ||

'आपके द्वारा दानवों को युद्ध में पुनर्जीवित हुआ देखकर, सभी दानव मृत्यु का भय त्यागकर प्रमथों से युद्ध करेंगे।'

श्लोक 13 (skanda.8.146.13)

विद्या किल त्वया सा वै दानवानां हितार्थिना ।।

vidyā kila tvayā sā vai dānavānāṁ hitārthinā ||

[इस स्थान पर मूल पाठ की एक पंक्ति खण्डित होकर लुप्त हो गई है] निश्चय ही दानवों के हितैषी आपके द्वारा वह विद्या -

श्लोक 14 (skanda.8.146.14)

आराध्य देवं संप्राप्ता तां दर्शय नमस्तव ।

ārādhya devaṁ saṁprāptā tāṁ darśaya namastava |

'भगवान शिव की आराधना करके प्राप्त की थी, उसे आज दिखाइए, आपको नमस्कार है' - अन्धक के इन वचनों को सुनकर स्थिरबुद्धि भार्गव मुनि (शुक्राचार्य) ने,

श्लोक 15 (skanda.8.146.15)

ईषत्स्मितं तदा कृत्वा दानवाधिपमब्रवीत् । दानवाधिप तत्सत्यं यत्त्वया प्रेरितं वचः ।।

īṣatsmitaṁ tadā kṛtvā dānavādhipamabravīt | dānavādhipa tatsatyaṁ yattvayā preritaṁ vacaḥ ||

हल्की मुस्कान बिखेरते हुए दानवाधिप से कहा - 'हे दानवाधिप! तुमने जो वचन कहे हैं, वह सत्य है।'

श्लोक 16 (skanda.8.146.16)

विद्योपार्जनमेतद्धि दानवानां मया कृतम् । पीत्वा वर्षसहस्रं वै कणधूमं सुदुस्सहम् ।।

vidyopārjanametaddhi dānavānāṁ mayā kṛtam | pītvā varṣasahasraṁ vai kaṇadhūmaṁ sudussaham ||

'दानवों के हित के लिए मैंने ही सहस्र वर्षों तक अत्यन्त दुःसह कणों का धुआँ पीकर इस विद्या को अर्जित किया था।'

श्लोक 17 (skanda.8.146.17)

एषा प्राप्ता मया विद्या बान्धवानां सुखावहा । एतया विद्यया सोऽहमेतान् दैत्यान् परैर्हतान् ।।

eṣā prāptā mayā vidyā bāndhavānāṁ sukhāvahā | etayā vidyayā so'hametān daityān parairhatān ||

'बन्धुजनों को सुख देने वाली यह विद्या मैंने प्राप्त की है। इसी विद्या से मैं शत्रुओं द्वारा मारे गए इन दैत्यों को -

श्लोक 18 (skanda.8.146.18)

उत्थापयिष्ये सस्यानि म्लानान्यम्बुधरो यथा । निर्व्रणान्नीरुजान् स्वस्थान् सुप्त्वेव पुनरुत्थितान् ।।

utthāpayiṣye sasyāni mlānānyambudharo yathā | nirvraṇānnīrujān svasthān suptveva punarutthitān ||

'- उसी प्रकार उठा दूँगा, जैसे मेघ मुरझाई हुई फसलों को पुनर्जीवित कर देता है; वे बिना घाव, बिना रोग और स्वस्थ होकर, मानो सोकर पुनः उठे हों, वैसे उठ खड़े होंगे।'

श्लोक 19 (skanda.8.146.19)

अस्मिन् मुहूर्ते द्रष्टासि दानवान्दानवाधिप । उत्थितान्दानवान् दृष्ट्वा हतान् युद्धे गणेश्वरैः ।।

asmin muhūrte draṣṭāsi dānavāndānavādhipa | utthitāndānavān dṛṣṭvā hatān yuddhe gaṇeśvaraiḥ ||

'हे दानवाधिप! अभी इसी क्षण तुम गणेश्वरों द्वारा युद्ध में मारे गए दानवों को उठा हुआ देखोगे।'

श्लोक 20 (skanda.8.146.20)

विस्मयाच्च भयाच्चैव द्रविष्यन्ति गणेश्वराः । इत्येवमुक्त्वा स तदा भार्गवो दानवेश्वरम् ।।

vismayācca bhayāccaiva draviṣyanti gaṇeśvarāḥ | ityevamuktvā sa tadā bhārgavo dānaveśvaram ||

'आश्चर्य और भय से गणेश्वर भाग खड़े होंगे' - ऐसा कहकर भार्गव ने दानवेश्वर से यह कहा -

श्लोक 21 (skanda.8.146.21)

एकैकं दैत्यमुद्दिश्य विद्यामावर्तयत्कविः । आवर्तमानया तत्र विद्यया ब्राह्मणेन ह ।।

ekaikaṁ daityamuddiśya vidyāmāvartayatkaviḥ | āvartamānayā tatra vidyayā brāhmaṇena ha ||

उस विद्वान ने एक-एक दैत्य को लक्ष्य करके अपनी विद्या का आवर्तन किया। उस ब्राह्मण द्वारा जपी जाती हुई उस विद्या से -

श्लोक 22 (skanda.8.146.22)

उत्तस्थुर्दानवाः सुप्ताः शयनादिव निद्रया । वेदार्था इव चाभ्यस्ताः समयेनेव चाम्बुदाः ।।

uttasthurdānavāḥ suptāḥ śayanādiva nidrayā | vedārthā iva cābhyastāḥ samayeneva cāmbudāḥ ||

सोए हुए दानव उसी प्रकार उठ खड़े हुए, जैसे नींद के बाद शय्या से कोई उठता है, जैसे बार-बार अभ्यास किए गए वेद-अर्थ स्मरण हो आते हैं, अथवा जैसे ऋतु आने पर मेघ उमड़ आते हैं।

श्लोक 23 (skanda.8.146.23)

कालेन प्रलयं प्राप्तौ यथा वा धूमकेतवः । तथा शुक्रेण ते दैत्याः प्रमथैः सन्निषूदिताः ।।

kālena pralayaṁ prāptau yathā vā dhūmaketavaḥ | tathā śukreṇa te daityāḥ pramathaiḥ sanniṣūditāḥ ||

जैसे प्रलयकाल में लीन हुए धूमकेतु समय आने पर पुनः प्रकट होते हैं, वैसे ही प्रमथों द्वारा मारे गए वे दैत्य शुक्राचार्य द्वारा पुनर्जीवित हो उठे।

श्लोक 24 (skanda.8.146.24)

उत्थाप्यमाना विबभुर्यथा स्वस्थाः पुरातनाः । शुक्रेणोज्जीवितान् दृष्ट्वा दानवान् तान् गणेश्वराः ।।

utthāpyamānā vibabhuryathā svasthāḥ purātanāḥ | śukreṇojjīvitān dṛṣṭvā dānavān tān gaṇeśvarāḥ ||

उठाए जाते हुए वे पहले के समान स्वस्थ होकर शोभित होने लगे। शुक्राचार्य द्वारा जीवित किए गए उन दानवों को देखकर गणेश्वरों ने -

श्लोक 25 (skanda.8.146.25)

आश्चर्यमेतद्देवेशा इति तेऽन्योन्यमब्रुवन् । उज्जीविताँस्तु तान्दृष्ट्वा तुहुण्डाद्यान् महासुरान् । विनेदुः पूर्वदेवास्ते जलमत्ता इवाम्बुदाः ।।

āścaryametaddeveśā iti te'nyonyamabruvan | ujjīvitā~stu tāndṛṣṭvā tuhuṇḍādyān mahāsurān | vineduḥ pūrvadevāste jalamattā ivāmbudāḥ ||

'हे देवेशो! यह तो आश्चर्य है' - ऐसा वे आपस में कहने लगे। तुहुण्ड आदि उन महासुरों को पुनर्जीवित देखकर वे पूर्वदेव (प्राचीन देवकल्प असुरगण) जल से मत्त मेघों के समान जय-घोष करने लगे।

श्लोक 26 (skanda.8.146.26)

तानुत्थितान्वीक्ष्य सहस्रशोऽन्ये कुठारवज्राशनिशूलहस्ताः । प्रदुद्रुवुः शङ्करकिङ्कराणां बलं समुद्धूतमहार्णवाभम् ।।

tānutthitānvīkṣya sahasraśo'nye kuṭhāravajrāśaniśūlahastāḥ | pradudruvuḥ śaṅkarakiṅkarāṇāṁ balaṁ samuddhūtamahārṇavābham ||

उन्हें सहस्रों की संख्या में उठा हुआ देखकर, कुठार, वज्र, अशनि और शूल हाथों में लिए हुए वे अन्य दानव क्षुब्ध महासागर के समान शंकर के सेवकों की सेना की ओर दौड़ पड़े।

श्लोक 27 (skanda.8.146.27)

समागमस्तत्र पुनर्बभूव गणासुराणामतिभीमनादः । युगात्यये मारुतवेजितानां यथा समुद्योग इवार्णवानाम् ।।

samāgamastatra punarbabhūva gaṇāsurāṇāmatibhīmanādaḥ | yugātyaye mārutavejitānāṁ yathā samudyoga ivārṇavānām ||

वहाँ गणों और असुरों का पुनः अत्यन्त भयंकर घोषवाला संग्राम छिड़ गया, जैसे युग के अन्त में वायु से प्रेरित सागरों का प्रचण्ड उद्वेग होता है।

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