अम्बिका खण्ड · अध्याय 147
भार्गवहरण
श्लोक 1 (skanda.8.147.1)
उत्थापितेषु दैत्येषु भार्गवेणोग्रकर्मणा । नेदुर्देवाः सगन्धर्वा दानवाश्च सहान्धकाः ।।
utthāpiteṣu daityeṣu bhārgaveṇograkarmaṇā | nedurdevāḥ sagandharvā dānavāśca sahāndhakāḥ ||
उग्रकर्मा भार्गव द्वारा दैत्यों के पुनर्जीवित किए जाने पर गन्धर्वों-सहित देवगण और अन्धक-सहित दानव, दोनों ही जय-घोष करने लगे।
श्लोक 2 (skanda.8.147.2)
ततः शंखरवोन्मिश्रा माडुकानकनिस्वनाः । बभूवुः सिंहनादाश्च रथहस्तिरवैस्सह ।।
tataḥ śaṁkharavonmiśrā māḍukānakanisvanāḥ | babhūvuḥ siṁhanādāśca rathahastiravaissaha ||
तब शंखों की ध्वनि से मिश्रित, मृदंगों और आनकों की गूँज, तथा रथों और हाथियों की ध्वनियों के साथ सिंहनाद भी होने लगे।
श्लोक 3 (skanda.8.147.3)
हुण्डस्तुहुण्डो जम्भश्च कुजम्भश्च महासुरः । शैलशूलशिलाघातैर्युयुधुर्देवतारयः ।।
huṇḍastuhuṇḍo jambhaśca kujambhaśca mahāsuraḥ | śailaśūlaśilāghātairyuyudhurdevatārayaḥ ||
हुण्ड, तुहुण्ड, जम्भ और महासुर कुजम्भ, ये देवों के शत्रु पर्वतों, शूलों और शिलाओं के प्रहारों से युद्ध करने लगे।
श्लोक 4 (skanda.8.147.4)
पाकेन्द्रदमनौ तौ च स च कार्तस्वनो बलिः । ममर्दुः प्रमथानीकं वैरं प्रतिचिकीर्षया ।।
pākendradamanau tau ca sa ca kārtasvano baliḥ | mamarduḥ pramathānīkaṁ vairaṁ praticikīrṣayā ||
पाक और इन्द्रदमन दोनों, कार्तस्वन तथा बलि, वैर का बदला लेने की इच्छा से प्रमथों की सेना को रौंदने लगे।
श्लोक 5 (skanda.8.147.5)
तेषां वेगं सन्निवार्य प्रमथा अपि दर्पिताः । शिलातरुकराः सर्वे दानवानभिदुद्रुवुः ।।
teṣāṁ vegaṁ sannivārya pramathā api darpitāḥ | śilātarukarāḥ sarve dānavānabhidudruvuḥ ||
उनके वेग को रोककर गर्वित प्रमथ भी शिलाओं और वृक्षों को हाथों में लिए हुए दानवों की ओर दौड़ पड़े।
श्लोक 6 (skanda.8.147.6)
गणेश्वराः सुराणां तु तस्मिन्युद्धे तु भैरवे । श्रूयन्ते धनुषां शब्दा रथशब्दाश्च भैरवाः ।।
gaṇeśvarāḥ surāṇāṁ tu tasminyuddhe tu bhairave | śrūyante dhanuṣāṁ śabdā rathaśabdāśca bhairavāḥ ||
उस भयंकर युद्ध में देवताओं के गणेश्वरों के धनुषों के शब्द तथा भयंकर रथ-शब्द सुनाई देने लगे।
श्लोक 7 (skanda.8.147.7)
प्रमथानां जये सक्ता दानवानां तथापरे । चक्रुः कोलाहलं घोरं पक्षवादांस्तथाम्बरे ।।
pramathānāṁ jaye saktā dānavānāṁ tathāpare | cakruḥ kolāhalaṁ ghoraṁ pakṣavādāṁstathāmbare ||
प्रमथों की विजय की कामना करने वाले और दानवों की विजय चाहने वाले, दोनों ही आकाश में घोर कोलाहल और पक्षपातपूर्ण विवाद करने लगे।
श्लोक 8 (skanda.8.147.8)
गर्जतां धावतां चैव बलानां समभूत्स्वनः । गर्जतां धावतां चैव समुद्राणामिवात्यये ।।
garjatāṁ dhāvatāṁ caiva balānāṁ samabhūtsvanaḥ | garjatāṁ dhāvatāṁ caiva samudrāṇāmivātyaye ||
गरजती और दौड़ती हुई उन सेनाओं का शब्द उसी प्रकार उत्पन्न हो रहा था, जैसे प्रलयकाल में गरजते और उमड़ते हुए समुद्रों का शब्द होता है।
श्लोक 9 (skanda.8.147.9)
युद्धातिशयमत्ताश्च सिद्धगन्धर्वचारणाः । नेदुश्चैवोत्ससर्जुश्च नानाकुसुमसञ्चयान् ।।
yuddhātiśayamattāśca siddhagandharvacāraṇāḥ | neduścaivotsasarjuśca nānākusumasañcayān ||
युद्ध की उत्कटता से मत्त हुए सिद्ध, गन्धर्व और चारण जय-घोष करते हुए नाना प्रकार के पुष्प-समूह बरसाने लगे।
श्लोक 10 (skanda.8.147.10)
नानाविधानि पुष्पाणि पतमानानि रेजिरे । सिद्धचारणमुक्तानि नक्षत्राणि यथात्यये ।।
nānāvidhāni puṣpāṇi patamānāni rejire | siddhacāraṇamuktāni nakṣatrāṇi yathātyaye ||
सिद्धों और चारणों द्वारा छोड़े गए नाना प्रकार के गिरते हुए पुष्प उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जैसे प्रलयकाल में नक्षत्र गिरते हैं।
श्लोक 11 (skanda.8.147.11)
देवगन्धर्वतूर्याणि प्रसस्वनुरनेकशः । युद्धसंसक्तभावानां विरेमुश्च पुनः पुनः ।।
devagandharvatūryāṇi prasasvanuranekaśaḥ | yuddhasaṁsaktabhāvānāṁ viremuśca punaḥ punaḥ ||
देवताओं और गन्धर्वों के वाद्य अनेक बार बजते और युद्ध में तल्लीन योद्धाओं के कारण बार-बार रुक भी जाते थे।
श्लोक 12 (skanda.8.147.12)
विनायकेन स्मृत्वा तु जम्भो युधि पराभवम् । तं सक्रोधोऽभिदुद्राव गजं गज इवापरः ।।
vināyakena smṛtvā tu jambho yudhi parābhavam | taṁ sakrodho'bhidudrāva gajaṁ gaja ivāparaḥ ||
विनायक द्वारा पूर्व में हुए अपने पराभव को स्मरण करके जम्भ क्रोधपूर्वक उस पर उसी प्रकार दौड़ा, जैसे एक गज दूसरे गज पर झपटता है।
श्लोक 13 (skanda.8.147.13)
तमापतन्तं दृष्ट्वा तु दानवं जम्भमाहवे । सिंहो गजमिव क्रुद्धो रुरुधे स विनायकः ।।
tamāpatantaṁ dṛṣṭvā tu dānavaṁ jambhamāhave | siṁho gajamiva kruddho rurudhe sa vināyakaḥ ||
युद्ध में इस प्रकार आते हुए दानव जम्भ को देखकर, सिंह के समान क्रुद्ध हुए विनायक ने उसे उसी प्रकार रोक दिया, जैसे सिंह गज को रोक देता है।
श्लोक 14 (skanda.8.147.14)
ऐरावतकरप्रख्यं करं करिनिभाननः । उत्क्षिप्य दानवं युद्धे तताड स विनायकः ।।
airāvatakaraprakhyaṁ karaṁ karinibhānanaḥ | utkṣipya dānavaṁ yuddhe tatāḍa sa vināyakaḥ ||
गजमुख विनायक ने ऐरावत की सूँड़ के समान अपनी सूँड़ ऊँची उठाकर युद्ध में उस दानव पर प्रहार किया।
श्लोक 15 (skanda.8.147.15)
कुम्भयोरन्तरे तं तु जम्भो दानवकुञ्जरः । बिभेद शरमुख्येन यथा सिद्धोऽर्कमण्डलम् ।।
kumbhayorantare taṁ tu jambho dānavakuñjaraḥ | bibheda śaramukhyena yathā siddho'rkamaṇḍalam ||
गजरूपी दानव जम्भ ने उन्हें दोनों गण्डस्थलों के बीच श्रेष्ठ बाण से उसी प्रकार बेध दिया, जैसे कोई सिद्ध सूर्य-मण्डल को भेद देता है।
श्लोक 16 (skanda.8.147.16)
कुम्भयोरन्तरे तस्य निममज्ज स वै शरः । शृङ्गयोरचलेन्द्रस्य तडित्वानिव चाम्बुदः ।।
kumbhayorantare tasya nimamajja sa vai śaraḥ | śṛṅgayoracalendrasya taḍitvāniva cāmbudaḥ ||
वह बाण उनके दोनों गण्डस्थलों के बीच उसी प्रकार धँस गया, जैसे बिजलीयुक्त मेघ पर्वतराज के दोनों शिखरों के बीच धँस जाता है।
श्लोक 17 (skanda.8.147.17)
स शरारोषितमना विधूय सशिरःकरम् । कराग्रेण महादैत्यमानम्य आहत्य सोनदत् ।।
sa śarāroṣitamanā vidhūya saśiraḥkaram | karāgreṇa mahādaityamānamya āhatya sonadat ||
उस बाण से क्रुद्ध चित्तवाले विनायक ने अपने सिर सहित सूँड़ को हिलाकर, सूँड़ के अगले भाग से उस महादैत्य को झुकाकर आघात किया और गर्जना की।
श्लोक 18 (skanda.8.147.18)
प्रस्पन्दमानो जम्भस्तु विनायककराहतः । विनायकं शरैरुग्रैरवतस्तार रोषितः ।।
praspandamāno jambhastu vināyakakarāhataḥ | vināyakaṁ śarairugrairavatastāra roṣitaḥ ||
विनायक की सूँड़ से आहत होकर तड़पता हुआ जम्भ भी क्रोधित होकर उग्र बाणों से विनायक को विदीर्ण करने लगा।
श्लोक 19 (skanda.8.147.19)
शलभा इव केदारं भ्रमरा इव पादपम् । जम्भेषवस्तदा देवं विविशुस्ते विनायकम् ।।
śalabhā iva kedāraṁ bhramarā iva pādapam | jambheṣavastadā devaṁ viviśuste vināyakam ||
जैसे टिड्डियाँ खेत में और भँवरे वृक्ष में प्रवेश करते हैं, वैसे ही जम्भ के बाण उस समय देव विनायक के शरीर में घुसने लगे।
श्लोक 20 (skanda.8.147.20)
रुधिरं क्षरमाणास्ते त्रिवृत्तैर्दारिताननाः । शरा विनायके रेजुः सर्पा मेरुमिवाश्रिताः ।।
rudhiraṁ kṣaramāṇāste trivṛttairdāritānanāḥ | śarā vināyake rejuḥ sarpā merumivāśritāḥ ||
रक्त बहाते हुए, तीन धाराओंवाले मुखों से विदीर्ण करने वाले वे बाण विनायक के शरीर में उसी प्रकार शोभित हुए, जैसे मेरु पर्वत का आश्रय लिए हुए सर्प शोभित होते हैं।
श्लोक 21 (skanda.8.147.21)
स जम्भबाणैरतिभिन्नगात्रः कुम्भास्रुतावाप्लुतरक्तनेत्रः । धुन्वन्कराग्रं च शिरश्च देवो दुद्राव जम्भं तृषितो यथाम्भः ।।
sa jambhabāṇairatibhinnagātraḥ kumbhāsrutāvāplutaraktanetraḥ | dhunvankarāgraṁ ca śiraśca devo dudrāva jambhaṁ tṛṣito yathāmbhaḥ ||
जम्भ के बाणों से बुरी तरह विदीर्ण अंगोंवाले, गण्डस्थलों से बहते रक्त में डूबे हुए नेत्रोंवाले वह देव अपने सूँड़ के अग्रभाग और सिर को हिलाते हुए जम्भ की ओर उसी प्रकार दौड़े, जैसे प्यासा व्यक्ति जल की ओर दौड़ता है।
श्लोक 22 (skanda.8.147.22)
स तं कराग्रेण दृढं दृढेन मुहुः समाहत्य मुहुर्विनद्य । रथं गृहीत्वा बलवाँस्तदाजौ चिक्षेप साश्वध्वजशस्त्रचक्रम् ।।
sa taṁ karāgreṇa dṛḍhaṁ dṛḍhena muhuḥ samāhatya muhurvinadya | rathaṁ gṛhītvā balavā~stadājau cikṣepa sāśvadhvajaśastracakram ||
उन्होंने अपनी दृढ़ सूँड़ के अग्रभाग से उसे बार-बार दृढ़तापूर्वक आहत करके, बार-बार गर्जना करते हुए, उस बलवान ने युद्ध में उसके रथ को घोड़ों, ध्वजा, शस्त्र और पहियों सहित पकड़कर फेंक दिया।
श्लोक 23 (skanda.8.147.23)
सोद्धूतभग्नातिपताककेतुश्च्युतासिशक्त्यृष्टिसहस्रबाणः । रथः पपातासुरनन्दनस्य मनोरथस्तीव्र इवाधनस्य ।।
soddhūtabhagnātipatākaketuścyutāsiśaktyṛṣṭisahasrabāṇaḥ | rathaḥ papātāsuranandanasya manorathastīvra ivādhanasya ||
जिसकी ध्वजा-पताका उखड़कर टूट गई थी, जिससे तलवार, शक्ति, ऋष्टि और सहस्रों बाण गिर पड़े थे, वह असुरपुत्र जम्भ का रथ उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे किसी निर्धन की तीव्र मनोकामना धराशायी हो जाती है।
श्लोक 24 (skanda.8.147.24)
पतीष्यमाणं तु रथं विहाय प्रह्रादिरिन्द्राम्बुधरप्रभावः । स्थितोऽम्बरे शक्तिधरो रराज स्थितोऽम्बरे शक्तिधरो यथैव ।।
patīṣyamāṇaṁ tu rathaṁ vihāya prahrādirindrāmbudharaprabhāvaḥ | sthito'mbare śaktidharo rarāja sthito'mbare śaktidharo yathaiva ||
गिरते हुए उस रथ को छोड़कर, इन्द्र के समान मेघ-सी गर्जनावाला प्रह्लाद-वंशज जम्भ आकाश में खड़े होकर शक्ति धारण किए हुए उसी प्रकार सुशोभित हुआ, जैसे आकाश में स्थित कोई शक्तिधारी सुशोभित होता है।
श्लोक 25 (skanda.8.147.25)
स तां सघण्टां कनकावदातां कृशानुलेखामिव दीप्यमानाम् । विनायकायासुरराजपुत्रश्चिक्षेप शक्तिं समुदीर्णशक्तिः ।।
sa tāṁ saghaṇṭāṁ kanakāvadātāṁ kṛśānulekhāmiva dīpyamānām | vināyakāyāsurarājaputraścikṣepa śaktiṁ samudīrṇaśaktiḥ ||
घण्टियों-सहित सुवर्ण-जैसे उज्ज्वल, अग्नि-रेखा के समान प्रज्वलित उस शक्ति को, प्रबल शक्तिशाली उस असुरराजपुत्र ने विनायक पर फेंका।
श्लोक 26 (skanda.8.147.26)
सा खात्पतन्ती भुजगाङ्गनेव शस्त्राङ्गना प्रज्वलमानवक्त्रा । शराहता विट्पतिना पपात शक्तिर्यथाग्र्या पुरुषे हताशे ।।
sā khātpatantī bhujagāṅganeva śastrāṅganā prajvalamānavaktrā | śarāhatā viṭpatinā papāta śaktiryathāgryā puruṣe hatāśe ||
आकाश से गिरती हुई, प्रज्वलित मुखवाली वह शस्त्र-नारी सर्पिणी के समान प्रतीत होती हुई शक्ति विट्पति के बाण से आहत होकर उसी प्रकार गिर पड़ी, जैसे किसी निराश पुरुष की सर्वोत्तम आशा गिर पड़ती है।
श्लोक 27 (skanda.8.147.27)
आश्चर्यभूते प्रमथासुराणां तस्मिन्तथा वर्तति युद्धयज्ञे । अमर्षितो भार्गवकर्म दृष्ट्वा शिलादपुत्रोऽभ्यगमन्महेशम् ।।
āścaryabhūte pramathāsurāṇāṁ tasmintathā vartati yuddhayajñe | amarṣito bhārgavakarma dṛṣṭvā śilādaputro'bhyagamanmaheśam ||
प्रमथों और असुरों के उस आश्चर्यजनक युद्धयज्ञ के इस प्रकार चलते रहने पर, भार्गव के कर्म को देखकर क्रुद्ध हुए शिलाद-पुत्र नन्दी महेश्वर के पास गए।
श्लोक 28 (skanda.8.147.28)
जयेति सोक्त्वा जययोनिमुग्रमुवाच नन्दी कनकावदातम् । गणेश्वराणां रणकर्म देव देवैः सहेन्द्रैरपि दुष्करं यत् ।।
jayeti soktvā jayayonimugramuvāca nandī kanakāvadātam | gaṇeśvarāṇāṁ raṇakarma deva devaiḥ sahendrairapi duṣkaraṁ yat ||
'जय हो' कहकर सुवर्ण-वर्ण, उग्र और विजय के मूल कारण महेश्वर से नन्दी ने कहा - 'हे देव! गणेश्वरों का जो युद्धकर्म इन्द्र-सहित देवताओं के लिए भी दुष्कर है,
श्लोक 29 (skanda.8.147.29)
तद्भार्गवेणाद्य कृतं वृथा न संजीवयानेन हि दानवेन्द्रान् । एते हि ते दानवयूथपाला यमालयादद्य पुनर्निवृत्ताः ।।
tadbhārgaveṇādya kṛtaṁ vṛthā na saṁjīvayānena hi dānavendrān | ete hi te dānavayūthapālā yamālayādadya punarnivṛttāḥ ||
वह आज भार्गव द्वारा दानवेन्द्रों को पुनर्जीवित करके व्यर्थ कर दिया गया है; ये दानव-सेनापति आज यमलोक से पुनः लौट आए हैं।'
श्लोक 30 (skanda.8.147.30)
विद्रावयन्तः प्रमथाँश्चरन्ति नागानिवाजौ शरभाः सदर्पाः । यदि ह्यसौ दैत्यवरान्निरस्तानुज्जीवयत्येव पुनः सदैव ।।
vidrāvayantaḥ pramathā~ścaranti nāgānivājau śarabhāḥ sadarpāḥ | yadi hyasau daityavarānnirastānujjīvayatyeva punaḥ sadaiva ||
'वे गर्वित होकर प्रमथों को उसी प्रकार भगाते हुए विचरण कर रहे हैं, जैसे शरभ युद्ध में गजों को भगा देते हैं। यदि यह भार्गव मारे गए श्रेष्ठ दैत्यों को इसी प्रकार बार-बार पुनर्जीवित करता रहेगा,'
श्लोक 31 (skanda.8.147.31)
जयः कुतो वै भविता महेश गणेश्वराणां कुत एव शान्तिः । वक्रस्थितश्चैष न चैष वध्यो अयुध्यमानो वृषवाह शुक्रः ।।
jayaḥ kuto vai bhavitā maheśa gaṇeśvarāṇāṁ kuta eva śāntiḥ | vakrasthitaścaiṣa na caiṣa vadhyo ayudhyamāno vṛṣavāha śukraḥ ||
'हे महेश! तो गणेश्वरों की विजय कहाँ से होगी, और उन्हें शान्ति कैसे मिलेगी? हे वृषभवाहन! यह शुक्राचार्य युद्ध में स्वयं भाग नहीं लेता, इसलिए वध्य भी नहीं ठहरता, फिर भी छिपकर यह अनर्थ करता रहता है।'
श्लोक 32 (skanda.8.147.32)
नैवाभिनाशोस्ति तव प्रसादाद्धतं च तं त्वं कुरुषे प्रसादम् । भवेत्तवेशान मतं स वध्यो यथा जयस्ते समरेनिशं स्यात् तथा कुरुष्वोत्तमबुद्धिबुद्ध न ते महेशान समोस्ति बुद्ध्या ।।
naivābhināśosti tava prasādāddhataṁ ca taṁ tvaṁ kuruṣe prasādam | bhavettaveśāna mataṁ sa vadhyo yathā jayaste samareniśaṁ syāt tathā kuruṣvottamabuddhibuddha na te maheśāna samosti buddhyā ||
'आपकी कृपा से हमारा कोई विनाश नहीं है, फिर भी आप उसके प्रति यह कृपा दिखा रहे हैं। हे ईशान! यदि आपको उचित लगे तो वह वध्य ठहराया जाए, जिससे समर में आपकी विजय निश्चित हो। हे उत्तम बुद्धि से युक्त! ऐसा ही कीजिए; हे महेश्वर! बुद्धि में आपके समान कोई नहीं है।'
श्लोक 33 (skanda.8.147.33)
इत्येवमुक्तः प्रमथेश्वरेण नन्दीश्वरेणेश्वरदेवदेवः । उवाच देवः प्रहसस्तदानीं स नन्दिनम् सर्वगणेशनायकम् ।।
ityevamuktaḥ pramatheśvareṇa nandīśvareṇeśvaradevadevaḥ | uvāca devaḥ prahasastadānīṁ sa nandinam sarvagaṇeśanāyakam ||
प्रमथों के स्वामी नन्दीश्वर द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, देवों के देव ईश्वर उस समय सब गणेश्वरों के नायक नन्दी से हँसते हुए बोले -
श्लोक 34 (skanda.8.147.34)
नन्दिन् प्रयाहि त्वरितोतिमात्रं द्विजेन्द्रबन्धुं दितिनन्दनानाम् । मध्यात्समुत्पाट्य तमानयस्व यथोपहारं धनवान् मनुष्यः ।।
nandin prayāhi tvaritotimātraṁ dvijendrabandhuṁ ditinandanānām | madhyātsamutpāṭya tamānayasva yathopahāraṁ dhanavān manuṣyaḥ ||
'हे नन्दी! तुरन्त अत्यन्त वेग से जाओ, और दिति-पुत्रों के बीच में से उनके सुहृद ब्राह्मणश्रेष्ठ शुक्राचार्य को उखाड़कर उसी प्रकार ले आओ, जैसे धनवान मनुष्य उपहार लाता है।'
श्लोक 35 (skanda.8.147.35)
स एवमुक्तो वृषभध्वजेन वृषध्वजो वै वृषसिंहनादः । जगाम तूर्णं प्रविगाह्य सेनां यत्राभवद्भार्गववंशदीपः ।।
sa evamukto vṛṣabhadhvajena vṛṣadhvajo vai vṛṣasiṁhanādaḥ | jagāma tūrṇaṁ pravigāhya senāṁ yatrābhavadbhārgavavaṁśadīpaḥ ||
वृषभध्वजधारी शिव द्वारा इस प्रकार आदेश दिए जाने पर वृषभ के समान सिंहनाद करने वाले वृषभध्वजधारी नन्दी तुरन्त उस सेना को भेदते हुए वहाँ गए, जहाँ भार्गव-वंश के दीपक शुक्राचार्य थे।
श्लोक 36 (skanda.8.147.36)
तं रक्ष्यमाणं दितिनन्दनैस्तैः पाशासिवृक्षोपलशूलहस्तैः । विक्षोभ्य दैत्यान् वृषराड्जहार शुक्रं स नन्दी शरभो यथेभम् ।।
taṁ rakṣyamāṇaṁ ditinandanaistaiḥ pāśāsivṛkṣopalaśūlahastaiḥ | vikṣobhya daityān vṛṣarāḍjahāra śukraṁ sa nandī śarabho yathebham ||
पाश, तलवार, वृक्ष, पत्थर और शूल हाथों में लिए हुए उन दिति-पुत्रों द्वारा रक्षित उस शुक्राचार्य को, दैत्यों को क्षुब्ध करके वृषभराज नन्दी ने उसी प्रकार हर लिया, जैसे शरभ किसी गज को हर लेता है।
श्लोक 37 (skanda.8.147.37)
स्रस्ताम्बरं तं च्युतभूषणं च विमुक्तकेशं रिपुणा गृहीतम् । विमोक्षयिष्यन्त इवाभ्यधावन्सुरारयः सिंहरवान्सृजन्तः ।।
srastāmbaraṁ taṁ cyutabhūṣaṇaṁ ca vimuktakeśaṁ ripuṇā gṛhītam | vimokṣayiṣyanta ivābhyadhāvansurārayaḥ siṁharavānsṛjantaḥ ||
जिनके वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गए थे, आभूषण गिर गए थे, केश खुल गए थे, ऐसे शत्रु द्वारा पकड़े गए शुक्राचार्य को छुड़ाने के लिए ही मानो देवशत्रु सिंहनाद करते हुए दौड़ पड़े।
श्लोक 38 (skanda.8.147.38)
ते वज्रशूलेषुपरश्वधानां सचक्रदण्डोपलकम्पनानाम् । नन्दीश्वरस्योपरि दानवेन्द्रा वर्षं ववर्षुर्जलदा इवोग्राः ।।
te vajraśūleṣuparaśvadhānāṁ sacakradaṇḍopalakampanānām | nandīśvarasyopari dānavendrā varṣaṁ vavarṣurjaladā ivogrāḥ ||
उन दानवेन्द्रों ने वज्र, शूल, बाण, परशु, चक्र, दण्ड और पत्थरों की भयंकर वर्षा नन्दीश्वर पर उसी प्रकार की, जैसे मेघ भयंकर जल-वर्षा करते हैं।
श्लोक 39 (skanda.8.147.39)
स भार्गवं प्राप्य गणाधिपाग्र्यो वक्त्राग्निना शस्त्रशतानि दग्ध्वा । आयात्स शुक्रन्तु करे गृहीत्वा नन्दीश्वरो दानवयूथपालम् ।।
sa bhārgavaṁ prāpya gaṇādhipāgryo vaktrāgninā śastraśatāni dagdhvā | āyātsa śukrantu kare gṛhītvā nandīśvaro dānavayūthapālam ||
भार्गव को प्राप्त करके, गणाधिपों में अग्रणी नन्दीश्वर अपने मुख की अग्नि से सैकड़ों शस्त्रों को भस्म करते हुए, दानव-सेनापति शुक्राचार्य को हाथ में पकड़कर वहाँ से चले आए।
श्लोक 40 (skanda.8.147.40)
तेषां च तेषां च ततो बभूव प्रमुक्तशस्त्रास्त्रसुभीमपातः । जहीति गृह्णेति च वादिनां वै महाहवो देवमनःप्रतोषः ।।
teṣāṁ ca teṣāṁ ca tato babhūva pramuktaśastrāstrasubhīmapātaḥ | jahīti gṛhṇeti ca vādināṁ vai mahāhavo devamanaḥpratoṣaḥ ||
तब उन दोनों दलों के बीच छोड़े गए शस्त्रों और अस्त्रों के भयंकर प्रहार होने लगे, तथा 'मारो, पकड़ो' कहते हुए देवताओं के मन को प्रसन्न करने वाला महायुद्ध छिड़ गया।
श्लोक 41 (skanda.8.147.41)
तेनान्तरेणैत्य भवस्य पार्श्वं नन्दीश्वरः क्रोधविवर्णनेत्रः । अयं स शुक्रो भगवन्नितीशे निवेदयामास भवाय शीघ्रम् ।।
tenāntareṇaitya bhavasya pārśvaṁ nandīśvaraḥ krodhavivarṇanetraḥ | ayaṁ sa śukro bhagavannitīśe nivedayāmāsa bhavāya śīghram ||
इसी बीच क्रोध से रक्तवर्ण नेत्रोंवाले नन्दीश्वर शिव के पास पहुँचकर, 'हे भगवन्! यह वही शुक्राचार्य है' - ऐसा कहते हुए तुरन्त शिव को निवेदन करने लगे।
श्लोक 42 (skanda.8.147.42)
जग्राह शुक्रं स च देवदेवो यथोपहारं शुचिना प्रदत्तम् । वक्रस्थितं शुक्रमरिं जगार न किञ्चिदुक्त्वा स हि भूतगोप्ता ।।
jagrāha śukraṁ sa ca devadevo yathopahāraṁ śucinā pradattam | vakrasthitaṁ śukramariṁ jagāra na kiñciduktvā sa hi bhūtagoptā ||
उन देवाधिदेव शिव ने शुक्राचार्य को उसी प्रकार ग्रहण किया, जैसे कोई पवित्र भेंट प्राप्त की गई हो; और बिना कुछ कहे, समस्त प्राणियों के रक्षक शिव ने विमुख छिपे हुए शत्रु शुक्र को निगल लिया।
श्लोक 43 (skanda.8.147.43)
ततः पुनर्दानवदैत्यसैन्यं गणेश्वरास्तस्य तदा विजघ्नुः ।।
tataḥ punardānavadaityasainyaṁ gaṇeśvarāstasya tadā vijaghnuḥ ||
इसके बाद गणेश्वरों ने पुनः उस दानव और दैत्यों की सेना का उस समय संहार करना आरम्भ कर दिया।