अम्बिका खण्ड · अध्याय 148
जम्भगजयुद्ध
श्लोक 1 (skanda.8.148.1)
शुक्रे त्वथ शुक्रपतिना गीर्णे नागेनेव भुजङ्गिना । बभूवुर्दानवाः सर्वे दरिद्रा इव निष्क्रियाः ।।
śukre tvatha śukrapatinā gīrṇe nāgeneva bhujaṅginā | babhūvurdānavāḥ sarve daridrā iva niṣkriyāḥ ||
जब सर्पों को धारण करने वाले महादेव द्वारा शुक्राचार्य को सर्प के ग्रास के समान निगल लिया गया, तब सभी दानव दरिद्र मनुष्यों के समान निष्क्रिय हो गए।
श्लोक 2 (skanda.8.148.2)
विशरीरा यथा जीवा गरुडा विरया इव । विहस्ता इव मातङ्गा विशृङ्गा इव गोवृषाः ।।
viśarīrā yathā jīvā garuḍā virayā iva | vihastā iva mātaṅgā viśṛṅgā iva govṛṣāḥ ||
जैसे शरीरहीन प्राणी, पंखहीन गरुड़, सूँड़हीन हाथी और सींगहीन बैल होते हैं,
श्लोक 3 (skanda.8.148.3)
निर्विषा इव नागेन्द्राः निर्विद्या इव च द्विजाः । सागरा इव निस्तोया विवेगा इव मारुताः ।।
nirviṣā iva nāgendrāḥ nirvidyā iva ca dvijāḥ | sāgarā iva nistoyā vivegā iva mārutāḥ ||
विषहीन सर्पराज, विद्याहीन ब्राह्मण, जलहीन सागर और वेगहीन वायु के समान,
श्लोक 4 (skanda.8.148.4)
पयोदा इव निश्शब्दा विशिखा इव चाग्नयः । गतोत्सवा इव दिवसा विपुष्पा इव पादपाः ।।
payodā iva niśśabdā viśikhā iva cāgnayaḥ | gatotsavā iva divasā vipuṣpā iva pādapāḥ ||
गर्जनहीन मेघ, ज्वालाहीन अग्नि, उत्सव-रहित दिन और पुष्पहीन वृक्षों के समान,
श्लोक 5 (skanda.8.148.5)
हरिणा इव संत्रस्ता विपक्षा इव पक्षिणः । ग्रहा इव प्रशान्ताभा ग्राहा इव जलोद्धृताः ।।
hariṇā iva saṁtrastā vipakṣā iva pakṣiṇaḥ | grahā iva praśāntābhā grāhā iva jaloddhṛtāḥ ||
भयभीत मृगों, पंखहीन पक्षियों, निस्तेज ग्रहों और जल से बाहर निकाले गए मगरमच्छों के समान,
श्लोक 6 (skanda.8.148.6)
नन्दिनापहृते शुक्रे गीर्णे चापि कपर्दिना । दानवा जज्ञिरे शूरा दीनमानपराक्रमाः ।।
nandināpahṛte śukre gīrṇe cāpi kapardinā | dānavā jajñire śūrā dīnamānaparākramāḥ ||
नन्दी द्वारा हरे गए और शिव द्वारा निगले गए शुक्राचार्य के कारण वे शूरवीर दानव भी दीन मान और पराक्रमवाले हो गए।
श्लोक 7 (skanda.8.148.7)
वैमनस्यं परं प्राप्तो दानवानां रणेन्धकः । उवाच मेघनिनदः संयुगस्थः स दानवः ।।
vaimanasyaṁ paraṁ prāpto dānavānāṁ raṇendhakaḥ | uvāca meghaninadaḥ saṁyugasthaḥ sa dānavaḥ ||
दानवों में अत्यन्त उदासीनता उत्पन्न होने पर, युद्ध में स्थित मेघ के समान गर्जनवाला वह दानव अन्धक बोला -
श्लोक 8 (skanda.8.148.8)
विक्रम्य नन्दिना शुक्रं नयता नयिनां वरम् । हृतानि नोऽद्य सर्वेषां जीवितानि न संशयः ।।
vikramya nandinā śukraṁ nayatā nayināṁ varam | hṛtāni no'dya sarveṣāṁ jīvitāni na saṁśayaḥ ||
'नीतिज्ञों में श्रेष्ठ शुक्राचार्य को पराक्रमपूर्वक हर ले जाने वाले नन्दी ने आज निःसन्देह हम सबके प्राण हर लिए हैं।'
श्लोक 9 (skanda.8.148.9)
प्रमथैर्निहतान्दैत्यान् कः पुनर्जीवयिष्यति । भार्गवं तमृते शुक्रं कोऽन्यो नो धारयिष्यति ।।
pramathairnihatāndaityān kaḥ punarjīvayiṣyati | bhārgavaṁ tamṛte śukraṁ ko'nyo no dhārayiṣyati ||
'प्रमथों द्वारा मारे गए दैत्यों को अब कौन पुनर्जीवित करेगा? उस भार्गव शुक्राचार्य के अतिरिक्त हमें अन्य कौन सहारा देगा?'
श्लोक 10 (skanda.8.148.10)
धैर्यञ्च विक्रमस्तेजः सत्वं वीर्यं बलं धृतिः । शत्रुभिर्नो हृतं सर्वं देवे शुक्रेऽपवाहिते ।।
dhairyañca vikramastejaḥ satvaṁ vīryaṁ balaṁ dhṛtiḥ | śatrubhirno hṛtaṁ sarvaṁ deve śukre'pavāhite ||
'शुक्राचार्य देव के हर लिए जाने पर हमारा धैर्य, पराक्रम, तेज, सत्व, वीर्य, बल और धृति - यह सब कुछ शत्रुओं ने हर लिया है।'
श्लोक 11 (skanda.8.148.11)
भार्गवेऽपहृते देवे ममापि व्यथितं मनः । न त्वहं संयुगं जह्यां प्रमथैस्समभिद्रुतः ।।
bhārgave'pahṛte deve mamāpi vyathitaṁ manaḥ | na tvahaṁ saṁyugaṁ jahyāṁ pramathaissamabhidrutaḥ ||
'भार्गव देव के हर लिए जाने पर मेरा मन भी व्यथित है, फिर भी प्रमथों द्वारा आक्रान्त होने पर भी मैं युद्ध का त्याग नहीं करूँगा।'
श्लोक 12 (skanda.8.148.12)
संस्तम्भयत माभैष्ट युध्यध्वमरिभिः सह । सूदयिष्याम्यहं सर्वान् प्रमथान् सह नन्दिना ।।
saṁstambhayata mābhaiṣṭa yudhyadhvamaribhiḥ saha | sūdayiṣyāmyahaṁ sarvān pramathān saha nandinā ||
'स्थिर हो जाओ, भयभीत मत होओ, शत्रुओं से युद्ध करो; मैं नन्दी सहित सभी प्रमथों का वध कर डालूँगा।'
श्लोक 13 (skanda.8.148.13)
अद्यैतान्विवशान्कृत्वा हत्वा च त्रिदशानपि । भार्गवं मोक्षयिष्यामि पञ्जरस्थं यथा हरिम् ।।
adyaitānvivaśānkṛtvā hatvā ca tridaśānapi | bhārgavaṁ mokṣayiṣyāmi pañjarasthaṁ yathā harim ||
'आज इन्हें विवश करके और देवताओं को भी मारकर मैं भार्गव को उसी प्रकार मुक्त करूँगा, जैसे कोई पिंजरे में बन्द सिंह को मुक्त कर दे।'
श्लोक 14 (skanda.8.148.14)
स चापि योगी योगेन यदि नाम स्वयं प्रभुः । शरीरान्निष्क्रमेत्तस्य अस्माकं शेषपालितः ।।
sa cāpi yogī yogena yadi nāma svayaṁ prabhuḥ | śarīrānniṣkramettasya asmākaṁ śeṣapālitaḥ ||
'वे योगी भी यदि स्वयं समर्थ होकर योग-बल से उस शरीर से बाहर निकल आएँ, तो हमारा शेष जीवन सुरक्षित हो जाएगा।'
श्लोक 15 (skanda.8.148.15)
इत्यन्धकवचः श्रुत्वा दानवा मेघनर्दनाः । प्रमथानर्दयामासुर्मर्त्तव्यकृतनिश्चयाः ।।
ityandhakavacaḥ śrutvā dānavā meghanardanāḥ | pramathānardayāmāsurmarttavyakṛtaniścayāḥ ||
अन्धक के इन वचनों को सुनकर, मरने का दृढ़ निश्चय कर चुके, मेघ के समान गर्जन करने वाले दानव प्रमथों पर गरजने लगे।
श्लोक 16 (skanda.8.148.16)
तत्र षाणासिवज्रौघैः कटङ्ककटशिलोपलैः । अन्योन्यमवकृन्तन्तस्ते चक्रुः कदनं महत् ।।
tatra ṣāṇāsivajraughaiḥ kaṭaṅkakaṭaśilopalaiḥ | anyonyamavakṛntantaste cakruḥ kadanaṁ mahat ||
वहाँ बाणों, तलवारों, वज्रों के समूहों तथा कुल्हाड़ी-विशेषों, शिलाओं और पत्थरों से एक-दूसरे को काटते हुए उन्होंने महान संहार किया।
श्लोक 17 (skanda.8.148.17)
कार्मुकाणां विकृष्टानां विसृष्टानां च पत्रिणाम् । निपात्यतामसीनां च शब्दोऽभूद्भृशदारुणः ।।
kārmukāṇāṁ vikṛṣṭānāṁ visṛṣṭānāṁ ca patriṇām | nipātyatāmasīnāṁ ca śabdo'bhūdbhṛśadāruṇaḥ ||
खींचे जाते हुए धनुषों, छोड़े जाते हुए बाणों और गिरती हुई तलवारों का अत्यन्त भयंकर शब्द उत्पन्न हो रहा था।
श्लोक 18 (skanda.8.148.18)
भग्नध्वजपताकानि क्षीणप्रहरणानि च । रुधिरास्रावचित्राणि व्रणाकुसुमितानि च ।।
bhagnadhvajapatākāni kṣīṇapraharaṇāni ca | rudhirāsrāvacitrāṇi vraṇākusumitāni ca ||
जिनकी ध्वजा-पताकाएँ टूट गई थीं, आयुध क्षीण हो चुके थे, जो रक्तस्राव से चित्रित और घावों से मानो पुष्पित हो उठे थे,
श्लोक 19 (skanda.8.148.19)
पिपासितानि श्रान्तानि हतवाजिगजानि च । समुद्राम्बरकल्पानि बलान्यासन्समन्ततः ।।
pipāsitāni śrāntāni hatavājigajāni ca | samudrāmbarakalpāni balānyāsansamantataḥ ||
प्यासी, थकी हुई, जिनके घोड़े और हाथी मारे जा चुके थे, ऐसी वे सेनाएँ चारों ओर समुद्र और आकाश के समान फैली हुई थीं।
श्लोक 20 (skanda.8.148.20)
अथ भूयो गजेन्द्रेण चतुर्दन्तेन गर्जता । अञ्जनाचलकल्पेन अञ्जनद्विपवर्चसा ।।
atha bhūyo gajendreṇa caturdantena garjatā | añjanācalakalpena añjanadvipavarcasā ||
फिर चार दाँतोंवाले, गरजते हुए, अंजनगिरि के समान तथा अंजनगिरि के गज के समान तेजस्वी गजराज पर सवार होकर -
श्लोक 21 (skanda.8.148.21)
सतूणीरपताकेन अंकुशारोषितेन च । जम्भो दानवशार्दूल अभिदुद्राव नन्दिनम् ।।
satūṇīrapatākena aṁkuśāroṣitena ca | jambho dānavaśārdūla abhidudrāva nandinam ||
तरकश और पताका से युक्त तथा अंकुश से क्रुद्ध किए गए उस गज पर दानवश्रेष्ठ जम्भ नन्दी की ओर दौड़ पड़ा।
श्लोक 22 (skanda.8.148.22)
गजस्कन्धगतो दैत्यो बभौ जम्भः सतोमरः । कृष्णापर्वतशृंगस्थस्सबलाक इवाम्बुदः ।।
gajaskandhagato daityo babhau jambhaḥ satomaraḥ | kṛṣṇāparvataśṛṁgasthassabalāka ivāmbudaḥ ||
गज के कंधे पर भाला लिए बैठा हुआ दैत्य जम्भ उसी प्रकार शोभित हुआ, जैसे काले पर्वत के शिखर पर बगुलों-सहित मेघ शोभित होता है।
श्लोक 23 (skanda.8.148.23)
स्तब्धलाडत्गूलदृक्कर्णः प्रसारितमहाकरः । चोदितो दानवेन्द्रेण समधावन्महागजः ।।
stabdhalāḍatgūladṛkkarṇaḥ prasāritamahākaraḥ | codito dānavendreṇa samadhāvanmahāgajaḥ ||
स्तब्ध पूँछ, दृष्टि और कानोंवाला तथा फैलाई हुई विशाल सूँड़वाला वह महागज दानवेन्द्र द्वारा प्रेरित होकर तेजी से दौड़ने लगा।
श्लोक 24 (skanda.8.148.24)
युगान्ते नववातस्य अनौपम्यो यथा जवः । अनौपम्यस्तथा तस्य जवो नागस्य धावतः ।।
yugānte navavātasya anaupamyo yathā javaḥ | anaupamyastathā tasya javo nāgasya dhāvataḥ ||
जैसे युग के अन्त में उठे नए तूफान का वेग अनुपम होता है, वैसे ही दौड़ते हुए उस गज का वेग भी अनुपम था।
श्लोक 25 (skanda.8.148.25)
तुरङ्गा ये च मातङ्गा प्रमथा ये च दानवाः । तस्य मार्गादपक्रान्ता मृत्योरिव यथा नराः ।।
turaṅgā ye ca mātaṅgā pramathā ye ca dānavāḥ | tasya mārgādapakrāntā mṛtyoriva yathā narāḥ ||
जो घोड़े, हाथी, प्रमथ और दानव थे, वे सब उसके मार्ग से उसी प्रकार हट गए, जैसे मनुष्य मृत्यु के मार्ग से हट जाते हैं।
श्लोक 26 (skanda.8.148.26)
तं मत्तनागं धावन्तं नदन्तमिव नीरदम् । वारयामास बलवान् विक्रम्य स विनायकः ।।
taṁ mattanāgaṁ dhāvantaṁ nadantamiva nīradam | vārayāmāsa balavān vikramya sa vināyakaḥ ||
मेघ के समान गरजते हुए उस दौड़ते मदमत्त गज को बलवान विनायक ने पराक्रमपूर्वक रोक दिया।
श्लोक 27 (skanda.8.148.27)
स तं देववरो दन्ती करिणं पर्वतोपमम् । प्रकीर्णेन कराग्रेण प्रमुखेऽभिजघान ह ।।
sa taṁ devavaro dantī kariṇaṁ parvatopamam | prakīrṇena karāgreṇa pramukhe'bhijaghāna ha ||
उस श्रेष्ठ गजरूपी देव ने पर्वत के समान उस गज को अपनी फैली हुई सूँड़ के अगले भाग से मुख पर आघात किया।
श्लोक 28 (skanda.8.148.28)
विनायकेनाभिहतो नायकः सर्वहस्तिनाम् । स रुजा घोरया नुन्नो मुहूर्तमभवज्जडः ।।
vināyakenābhihato nāyakaḥ sarvahastinām | sa rujā ghorayā nunno muhūrtamabhavajjaḍaḥ ||
विनायक द्वारा इस प्रकार आहत हुआ वह समस्त हाथियों का नायक भयंकर पीड़ा से पीड़ित होकर क्षणभर के लिए जड़ हो गया।
श्लोक 29 (skanda.8.148.29)
अथाश्वस्य च विश्रम्य संवर्त्यात्मकरं करी । विनायकमुरोदेशे ताडयामास नर्दयन् ।।
athāśvasya ca viśramya saṁvartyātmakaraṁ karī | vināyakamurodeśe tāḍayāmāsa nardayan ||
फिर सचेत होकर और विश्राम पाकर, वह गज अपनी सूँड़ समेटकर गरजते हुए विनायक के वक्षःस्थल पर प्रहार करने लगा।
श्लोक 30 (skanda.8.148.30)
स विन्ध्यकूटकल्पेन तेन नागेन ताडितः । पदात्पदं न चलितो महासत्वो विनायकः ।।
sa vindhyakūṭakalpena tena nāgena tāḍitaḥ | padātpadaṁ na calito mahāsatvo vināyakaḥ ||
विन्ध्यकूट के समान उस गज द्वारा आहत होने पर भी महासत्त्वशाली विनायक अपने स्थान से एक कदम भी नहीं हिले।
श्लोक 31 (skanda.8.148.31)
नासया स गृहीत्वा तं नासायां दानवद्विपम् । आक्षिप्य पातयामास गिरिवर्ष्मा विनायकः ।।
nāsayā sa gṛhītvā taṁ nāsāyāṁ dānavadvipam | ākṣipya pātayāmāsa girivarṣmā vināyakaḥ ||
पर्वत के समान विशालकाय विनायक ने अपनी सूँड़ से उस दानव-गज की सूँड़ पकड़कर उसे झटककर भूमि पर गिरा दिया।
श्लोक 32 (skanda.8.148.32)
स सिंह इव सिंहेन वनमध्ये निपातितः । ररास विस्फुरन्नागो मेघो वाय्वाहतो यथा ।।
sa siṁha iva siṁhena vanamadhye nipātitaḥ | rarāsa visphurannāgo megho vāyvāhato yathā ||
वन के बीच सिंह द्वारा गिराए गए सिंह के समान वह तड़पता हुआ गज उसी प्रकार गरजने लगा, जैसे वायु से आहत मेघ गरजता है।
श्लोक 33 (skanda.8.148.33)
तं नागं पातययानं तु नागवक्त्रमसृक्स्रवम् । बिभेद तोमरेणाशु करेणार्क इवाम्बुदम् ।।
taṁ nāgaṁ pātayayānaṁ tu nāgavaktramasṛksravam | bibheda tomareṇāśu kareṇārka ivāmbudam ||
गिरते हुए उस गज के रक्त बहाते मुख को गजमुख विनायक ने अपने हाथ में लिए भाले से उसी प्रकार तुरन्त बेध डाला, जैसे सूर्य अपनी किरणों से मेघ को बेध देता है।
श्लोक 34 (skanda.8.148.34)
मोचयन्तं तु चरणौ ग्रीवायां दानवोत्तमम् । तेनैव तोमरेणाथ आजघान विनायकः ।।
mocayantaṁ tu caraṇau grīvāyāṁ dānavottamam | tenaiva tomareṇātha ājaghāna vināyakaḥ ||
अपने पैरों को छुड़ाने की चेष्टा करते हुए उस श्रेष्ठ दानव-गज की गर्दन पर विनायक ने उसी भाले से पुनः प्रहार किया।
श्लोक 35 (skanda.8.148.35)
स सुप्रहाराभिहतो गजवक्त्रेण दानवः । चक्षार रुधिरं जम्भो निर्ज्जराम्भो गिरिर्यथा ।।
sa suprahārābhihato gajavaktreṇa dānavaḥ | cakṣāra rudhiraṁ jambho nirjjarāmbho giriryathā ||
गजमुख विनायक के उस भारी प्रहार से आहत होकर जम्भ ने उसी प्रकार रक्त वमन किया, जैसे झरने के जल से युक्त पर्वत जलधारा बहाता है।
श्लोक 36 (skanda.8.148.36)
पुनश्चास्य वधाकांक्षी असिं जग्राह वीर्यवान् । तस्योद्यतासेर्नदतश्चिच्छित्सोर्जम्भकन्धराम् ।।
punaścāsya vadhākāṁkṣī asiṁ jagrāha vīryavān | tasyodyatāsernadataścicchitsorjambhakandharām ||
उसके वध की इच्छा से पराक्रमी जम्भ ने पुनः तलवार उठा ली, और गर्जना करते हुए, उसकी गर्दन काटने की इच्छा से तलवार ऊँची उठाई -
श्लोक 37 (skanda.8.148.37)
असिं कुजम्भश्चिच्छेद गरुडः पन्नगं यथा । तञ्चापि सुविकृष्टेन शरेणासृग्भुजा तदा ।।
asiṁ kujambhaściccheda garuḍaḥ pannagaṁ yathā | tañcāpi suvikṛṣṭena śareṇāsṛgbhujā tadā ||
किन्तु विनायक ने उस उठी हुई तलवार को उसी प्रकार काट डाला, जैसे गरुड़ सर्प को काट देता है; और तब कसकर खींचे गए बाण से उसकी रक्तरंजित भुजा को भी बेध डाला।
श्लोक 38 (skanda.8.148.38)
कुजम्भो ह्यहनद्बाहौ वज्रेणेन्द्र इवाचलम् । स दृढाभिहतस्तेन घूर्णितस्सालवृक्षवत् ।।
kujambho hyahanadbāhau vajreṇendra ivācalam | sa dṛḍhābhihatastena ghūrṇitassālavṛkṣavat ||
इस प्रकार बिंधी हुई भुजा से घायल कुजम्भ उसी प्रकार डगमगा उठा, जैसे इन्द्र के वज्र से आहत पर्वत डगमगाता है; उस दृढ़ प्रहार से आहत होकर वह शाल-वृक्ष के समान झूल उठा।
श्लोक 39 (skanda.8.148.39)
कुजम्भमभिदुद्राव केसरी कुञ्जरं यथा । समुच्छ्रितकरो देवस्तं दानवमभिद्रवन् ।।
kujambhamabhidudrāva kesarī kuñjaraṁ yathā | samucchritakaro devastaṁ dānavamabhidravan ||
फिर वह देव अपनी सूँड़ ऊँची उठाए हुए उस दानव कुजम्भ की ओर उसी प्रकार दौड़े, जैसे सिंह गज की ओर दौड़ता है।
श्लोक 40 (skanda.8.148.40)
ऐरावत इवाभाति बलोद्वृत्तो विनायकः । व्यंसस्तं धावमानं तु कुजम्भवधकांक्षिणम् ।।
airāvata ivābhāti balodvṛtto vināyakaḥ | vyaṁsastaṁ dhāvamānaṁ tu kujambhavadhakāṁkṣiṇam ||
बल से उन्मत्त विनायक ऐरावत के समान शोभित हो रहे थे। कुजम्भ के वध की इच्छा से दौड़ते हुए उन विनायक को -
श्लोक 41 (skanda.8.148.41)
ववार स गतोंसेन पातयामास तं क्षितौ । व्यंसमंसेन हत्वा तु नागवक्त्रो महाबलः ।।
vavāra sa gatoṁsena pātayāmāsa taṁ kṣitau | vyaṁsamaṁsena hatvā tu nāgavaktro mahābalaḥ ||
- व्यंस नामक दानव ने अपने कंधे से रोका। तब महाबली गजमुख विनायक ने अपने कंधे से ही व्यंस को मारकर भूमि पर गिरा दिया।
श्लोक 42 (skanda.8.148.42)
कुजम्भस्यान्तिकं प्राप सिंहस्य शरभो यथा । कुजम्भस्तस्य भित्वा तु शरेण करमुद्यतम् ।।
kujambhasyāntikaṁ prāpa siṁhasya śarabho yathā | kujambhastasya bhitvā tu śareṇa karamudyatam ||
फिर वे सिंह के निकट पहुँचते शरभ के समान कुजम्भ के समीप पहुँचे। कुजम्भ ने उनकी उठी हुई सूँड़ को बाण से बेध दिया,
श्लोक 43 (skanda.8.148.43)
गदयाभ्यहनन्मूर्ध्नि मुद्गरेण च वक्षसि । त्रिभिः प्रहारैः स बभौ शोणिताक्तो विनायकः । नागायुतसहस्रौजास्त्रिप्रभिन्न इव द्विपः ।।
gadayābhyahananmūrdhni mudgareṇa ca vakṣasi | tribhiḥ prahāraiḥ sa babhau śoṇitākto vināyakaḥ | nāgāyutasahasraujāstriprabhinna iva dvipaḥ ||
गदा से उनके मस्तक पर और मुद्गर से वक्षःस्थल पर प्रहार किया। उन तीन प्रहारों से रक्त से लथपथ हुए विनायक उसी प्रकार शोभित हुए, जैसे सहस्रों गजों के बल से युक्त कोई गज तीन स्थानों में रक्तस्राव करता हुआ शोभित होता है।
श्लोक 44 (skanda.8.148.44)
धरायां नासयादाय कुजम्भं तु विनायकः । प्रचिक्षेप महावीर्यो यथा भूतबलिं नरः ।।
dharāyāṁ nāsayādāya kujambhaṁ tu vināyakaḥ | pracikṣepa mahāvīryo yathā bhūtabaliṁ naraḥ ||
तब महापराक्रमी विनायक ने अपनी सूँड़ से कुजम्भ को पकड़कर भूमि पर उसी प्रकार फेंक दिया, जैसे कोई मनुष्य भूतों को बलि फेंककर देता है।
श्लोक 45 (skanda.8.148.45)
कुजम्भे मन्दरप्रख्ये विनायकभुजेरिते । चुक्रुधुर्दानवाः सर्वे तेऽर्दयंश्च विनायकम् ।।
kujambhe mandaraprakhye vināyakabhujerite | cukrudhurdānavāḥ sarve te'rdayaṁśca vināyakam ||
मन्दराचल के समान विशाल कुजम्भ के विनायक की भुजा से इस प्रकार फेंके जाने पर सभी दानव क्रुद्ध हो उठे और विनायक को पीड़ित करने लगे।
श्लोक 46 (skanda.8.148.46)
सोऽर्दितो दानवशतैर्नानायुधवितक्षितः । चचार देवो दैत्येषु पृषतेषु यथा हरिः ।।
so'rdito dānavaśatairnānāyudhavitakṣitaḥ | cacāra devo daityeṣu pṛṣateṣu yathā hariḥ ||
सैकड़ों दानवों द्वारा नाना प्रकार के आयुधों से घायल किए जाते हुए भी वह देव दैत्यों के बीच उसी प्रकार विचरण करते रहे, जैसे सिंह मृगों के बीच विचरण करता है।
श्लोक 47 (skanda.8.148.47)
स दन्तैश्चरणैश्चापि शुण्डयाततयापि च । ममर्द दानवान् क्रुद्धः कुञ्जरो नड्वलानिव ।।
sa dantaiścaraṇaiścāpi śuṇḍayātatayāpi ca | mamarda dānavān kruddhaḥ kuñjaro naḍvalāniva ||
क्रुद्ध होकर उन्होंने अपने दाँतों, पैरों और फैलाई हुई सूँड़ से दानवों को उसी प्रकार रौंद डाला, जैसे गज नरकुल के वन को रौंद डालता है।
श्लोक 48 (skanda.8.148.48)
ततो गणेशा ह्यपि वीक्ष्य दानवैर्विनायकं शस्त्रशतैः परिक्षतम् । गृहीतशस्त्रा गजसिंहविक्रमा विमुक्तरावाः शतशोऽभिदुद्रुवुः ।।
tato gaṇeśā hyapi vīkṣya dānavairvināyakaṁ śastraśataiḥ parikṣatam | gṛhītaśastrā gajasiṁhavikramā vimuktarāvāḥ śataśo'bhidudruvuḥ ||
तब गणेश्वर भी विनायक को दानवों द्वारा सैकड़ों शस्त्रों से घायल किया गया देखकर, शस्त्र हाथ में लिए, गज और सिंह के समान पराक्रमी होकर, ऊँची पुकार करते हुए सैकड़ों की संख्या में दौड़ पड़े।
श्लोक 49 (skanda.8.148.49)
ततः पुनः शस्त्रसहस्रवेजितं शरासिशक्त्यृष्टिनिपातदुःसहम् । गणासुराणामसुनाशनं महद्बभूव युद्धं हतवाजिकुञ्जरम् ।।
tataḥ punaḥ śastrasahasravejitaṁ śarāsiśaktyṛṣṭinipātaduḥsaham | gaṇāsurāṇāmasunāśanaṁ mahadbabhūva yuddhaṁ hatavājikuñjaram ||
तब गणों और असुरों के बीच पुनः सहस्रों शस्त्रों से वेगयुक्त, बाणों, तलवारों, शक्तियों और ऋष्टियों के दुःसह प्रहारों से भरा, प्राणनाशक और अश्वों तथा गजों को नष्ट करने वाला महायुद्ध छिड़ गया।