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अम्बिका खण्ड · अध्याय 149

अन्धकपराक्रम

अध्याय 148अध्याय-सूचीअध्याय 150

श्लोक 1 (skanda.8.149.1)

निगीर्णो ब्राह्मणः सोऽथ चन्द्रावयवधारिणा । किं चक्रे कोष्ठगस्तस्य देवदेवस्य भार्गवः ।।

nigīrṇo brāhmaṇaḥ so'tha candrāvayavadhāriṇā | kiṁ cakre koṣṭhagastasya devadevasya bhārgavaḥ ||

व्यास ने कहा - चन्द्रकला धारण करने वाले देवदेव शिव द्वारा निगले गए वह ब्राह्मण भार्गव उनके उदर में जाकर क्या करने लगे?

श्लोक 2 (skanda.8.149.2)

कथं च तपतां श्रेष्ठो योगी योगेन स द्विजः । न निःसृतो योगबलाद्देवदेहान्महातपाः ।।

kathaṁ ca tapatāṁ śreṣṭho yogī yogena sa dvijaḥ | na niḥsṛto yogabalāddevadehānmahātapāḥ ||

तपस्वियों में श्रेष्ठ, महातपस्वी वह योगी ब्राह्मण योग-बल से भी देव के शरीर से बाहर क्यों नहीं निकल सका?

श्लोक 3 (skanda.8.149.3)

अन्धकश्चासुरश्रेष्ठः स तदा भार्गवं विना । चकार कथमावापं गणेशैः समभिद्रुतः ।।

andhakaścāsuraśreṣṭhaḥ sa tadā bhārgavaṁ vinā | cakāra kathamāvāpaṁ gaṇeśaiḥ samabhidrutaḥ ||

गणेश्वरों द्वारा आक्रान्त होने पर असुरश्रेष्ठ अन्धक ने उस समय भार्गव के बिना युद्ध कैसे किया?

श्लोक 4 (skanda.8.149.4)

एतन्मे सर्वमखिलं खिलवेदविदां वर । कथयस्व न मे तृप्तिः शृण्वानस्येशचेष्टितम् ।।

etanme sarvamakhilaṁ khilavedavidāṁ vara | kathayasva na me tṛptiḥ śṛṇvānasyeśaceṣṭitam ||

हे वेदों के परिशिष्ट-ज्ञाताओं में श्रेष्ठ! यह सब मुझे पूरा-पूरा बताइए; भगवान शिव की लीला सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती।

श्लोक 5 (skanda.8.149.5)

अथैवं पृच्छतस्तस्य व्यासस्य मुनिसत्तमः । सनत्कुमारोऽकथयच्छुक्रस्याथ विचेष्टितम् ।।

athaivaṁ pṛcchatastasya vyāsasya munisattamaḥ | sanatkumāro'kathayacchukrasyātha viceṣṭitam ||

सूत ने कहा - इस प्रकार पूछने वाले व्यास मुनि से मुनिश्रेष्ठ सनत्कुमार ने शुक्राचार्य के आगे के कार्यकलाप का वर्णन किया।

श्लोक 6 (skanda.8.149.6)

निगीर्णे भार्गवे तेन भूतोमादेवबन्धुना । अन्धको निष्प्रभो जज्ञे घनरुद्धो यथा रविः ।।

nigīrṇe bhārgave tena bhūtomādevabandhunā | andhako niṣprabho jajñe ghanaruddho yathā raviḥ ||

सनत्कुमार ने कहा - भूतों तथा उमा के स्वामी शिव द्वारा भार्गव के निगल लिए जाने पर, अन्धक उसी प्रकार निस्तेज हो गया, जैसे मेघों से आवृत सूर्य निस्तेज हो जाता है।

श्लोक 7 (skanda.8.149.7)

दृष्ट्वा स्वसैन्यं प्रमथैर्भज्यमानं पुनः पुनः । दुद्राव रथमास्थाय स्वयमेवान्धको गणान् ।।

dṛṣṭvā svasainyaṁ pramathairbhajyamānaṁ punaḥ punaḥ | dudrāva rathamāsthāya svayamevāndhako gaṇān ||

अपनी सेना को प्रमथों द्वारा बार-बार तोड़ा जाता देखकर अन्धक स्वयं ही रथ पर सवार होकर गणों की ओर दौड़ पड़ा।

श्लोक 8 (skanda.8.149.8)

शरवज्रप्रहारैस्तैर्वज्राघातैर्धरा इव । प्रमथाः पेतुरेवोर्व्यां निस्तोया इव तोयदाः ।।

śaravajraprahāraistairvajrāghātairdharā iva | pramathāḥ peturevorvyāṁ nistoyā iva toyadāḥ ||

वज्र के समान उन बाणों के प्रहारों से, वज्राघात से आहत पर्वत के समान, प्रमथ जलहीन मेघों के समान भूमि पर गिरने लगे।

श्लोक 9 (skanda.8.149.9)

क्रोडेषूरुकपोलेषु पृष्ठबाहूदरेषु च । रुरुवुर्बाणनिर्भिन्नाः प्रमथाः कुञ्जरा यथा ।।

kroḍeṣūrukapoleṣu pṛṣṭhabāhūdareṣu ca | ruruvurbāṇanirbhinnāḥ pramathāḥ kuñjarā yathā ||

छाती, जंघा, गाल, पीठ, भुजा और उदर में बाणों से बिंधे हुए प्रमथ गजों के समान चीत्कार करने लगे।

श्लोक 10 (skanda.8.149.10)

यान्तमायान्तमप्राप्तं प्राप्तं दूरस्थमेव च । अपश्यद्यं यतस्तं तं निर्बिभेद शरैर्भृशम् ।।

yāntamāyāntamaprāptaṁ prāptaṁ dūrasthameva ca | apaśyadyaṁ yatastaṁ taṁ nirbibheda śarairbhṛśam ||

जाते हुए, आते हुए, दूर के, निकट के - जिस-जिस को वह जिस-जिस ओर देखता, उसी-उसी को बाणों से बुरी तरह विदीर्ण कर देता।

श्लोक 11 (skanda.8.149.11)

बिभेद शतमेकेन शतेन च शतं पुनः । सहस्रं च सहस्रेण कोटिं कोट्या तथैव च ।।

bibheda śatamekena śatena ca śataṁ punaḥ | sahasraṁ ca sahasreṇa koṭiṁ koṭyā tathaiva ca ||

एक बाण से सौ को, सौ बाणों से पुनः सौ को, सहस्र बाणों से सहस्र को, और उसी प्रकार करोड़ बाणों से करोड़ को उसने विदीर्ण कर डाला।

श्लोक 12 (skanda.8.149.12)

ध्वजाः पताकाश्छत्राणि वैजयन्त्योऽङ्कुशाः कुथाः । चामराणि किरीटानि कुण्डलान्यम्बराणि च ।।

dhvajāḥ patākāśchatrāṇi vaijayantyo'ṅkuśāḥ kuthāḥ | cāmarāṇi kirīṭāni kuṇḍalānyambarāṇi ca ||

ध्वजाएँ, पताकाएँ, छत्र, वैजयन्तियाँ, अंकुश, कुथा (हाथी की झूल), चँवर, मुकुट, कुण्डल और वस्त्र -

श्लोक 13 (skanda.8.149.13)

प्रमथानां बले यच्च कम्पते धावतेऽपि वा । तत्सर्वं चिच्छिदे तूर्णं शरैरन्धकदानवः ।।

pramathānāṁ bale yacca kampate dhāvate'pi vā | tatsarvaṁ cicchide tūrṇaṁ śarairandhakadānavaḥ ||

प्रमथों की सेना में जो कुछ भी हिलता या दौड़ता था, उस सबको दानव अन्धक ने अपने बाणों से तुरन्त काट डाला।

श्लोक 14 (skanda.8.149.14)

विस्फुलिङ्गान् यथैवाग्निर्धारासारान् यथाम्बुदः । सिन्धुराजो यथोद्गारान् करानिव दिवाकरः ।।

visphuliṅgān yathaivāgnirdhārāsārān yathāmbudaḥ | sindhurājo yathodgārān karāniva divākaraḥ ||

जैसे अग्नि चिंगारियाँ छोड़ती है, जैसे मेघ जलधाराएँ बरसाता है, जैसे समुद्र लहरें उठाता है, जैसे सूर्य किरणें छोड़ता है,

श्लोक 15 (skanda.8.149.15)

नादान् सिंहा इवारण्ये सीकरानिव कुञ्जराः । मुमोच बाणाँस्तीक्ष्णाग्रान् परसैन्यविमर्दनान् ।।

nādān siṁhā ivāraṇye sīkarāniva kuñjarāḥ | mumoca bāṇā~stīkṣṇāgrān parasainyavimardanān ||

जैसे सिंह वन में गर्जना करते हैं, जैसे हाथी जल-कण छोड़ते हैं, वैसे ही अन्धक ने शत्रु-सेना को कुचलने वाले तीक्ष्ण-अग्र बाण छोड़े।

श्लोक 16 (skanda.8.149.16)

अन्धके युध्यमाने तु निश्चयेनासुरोत्तमे । असुरा अप्ययुध्यन्त निश्चयेनान्धकादनु ।।

andhake yudhyamāne tu niścayenāsurottame | asurā apyayudhyanta niścayenāndhakādanu ||

असुरश्रेष्ठ अन्धक के दृढ़ निश्चय से युद्ध करने पर, अन्य असुर भी अन्धक का अनुसरण करते हुए दृढ़ निश्चय से युद्ध करने लगे।

श्लोक 17 (skanda.8.149.17)

निवातकवचा ये ते अन्योन्यसदृशा भृशम् । चक्रुस्ते बहवो युद्धं रुद्रैश्च बहुभिः सह ।।

nivātakavacā ye te anyonyasadṛśā bhṛśam | cakruste bahavo yuddhaṁ rudraiśca bahubhiḥ saha ||

जो निवातकवच नामक दानव थे, जो परस्पर अत्यन्त समान थे, उन बहुतों ने अनेक रुद्रों के साथ युद्ध किया।

श्लोक 18 (skanda.8.149.18)

कालेयाः षष्टिसाहस्राः कालकल्पा महासुराः । बाहुजैः षष्टिसाहस्रैः प्रमथैर्युयुधुः सह ।।

kāleyāḥ ṣaṣṭisāhasrāḥ kālakalpā mahāsurāḥ | bāhujaiḥ ṣaṣṭisāhasraiḥ pramathairyuyudhuḥ saha ||

साठ हजार कालेय नामक काल-सदृश महासुरों ने साठ हजार बाहुज (भुजाओं से उत्पन्न) प्रमथों के साथ युद्ध किया।

श्लोक 19 (skanda.8.149.19)

प्रह्रादश्चानुह्रादश्च संह्रादः शिनिबाष्कलौ । विरोचनो बलिर्बाणः कुजम्भोऽथावनिञ्जयः ।।

prahrādaścānuhrādaśca saṁhrādaḥ śinibāṣkalau | virocano balirbāṇaḥ kujambho'thāvaniñjayaḥ ||

प्रह्लाद, अनुह्लाद, संह्लाद, शिनि और बाष्कल, विरोचन, बलि, बाण, कुजम्भ और अवनिंजय -

श्लोक 20 (skanda.8.149.20)

अञ्जकः कालनेमिश्च नमुचिर्व्यंस एव च । एकादशैते प्रख्याता एकादशरविप्रभाः ।।

añjakaḥ kālanemiśca namucirvyaṁsa eva ca | ekādaśaite prakhyātā ekādaśaraviprabhāḥ ||

अंजक, कालनेमि, नमुचि और व्यंस - ये ग्यारह विख्यात दानव ग्यारह सूर्यों के समान तेजस्वी थे।

श्लोक 21 (skanda.8.149.21)

एकादशैव प्रमथानर्दयन् कलहैषिणः । प्रभामयं वीरभद्रं विट्पतिं पिङ्गलं तथा ।।

ekādaśaiva pramathānardayan kalahaiṣiṇaḥ | prabhāmayaṁ vīrabhadraṁ viṭpatiṁ piṅgalaṁ tathā ||

युद्ध के इच्छुक वे ग्यारह ही प्रमथों को ललकारते थे - प्रभामय, वीरभद्र, विट्पति और पिंगल को,

श्लोक 22 (skanda.8.149.22)

वेगपं पवनादं च सोमार्काप्यायनावपि । संवर्त्तकानलञ्चैव पावकाप्यायनावपि ।।

vegapaṁ pavanādaṁ ca somārkāpyāyanāvapi | saṁvarttakānalañcaiva pāvakāpyāyanāvapi ||

वेगप, पवनाद, सोमाप्यायन और सूर्याप्यायन दोनों, संवर्तक, अनल और पावकाप्यायन को भी,

श्लोक 23 (skanda.8.149.23)

यक्षोन्नदश्च बलवान् विद्युत्केशश्च राक्षसः । प्रह्रादप्रमुखैरेतैर्दानवैर्देवपुङ्गवाः ।।

yakṣonnadaśca balavān vidyutkeśaśca rākṣasaḥ | prahrādapramukhairetairdānavairdevapuṅgavāḥ ||

और बलवान यक्ष उन्नद तथा राक्षस विद्युत्केश को ललकारते थे; प्रह्लाद-प्रमुख इन दानवों के साथ वे देवश्रेष्ठ गणेश्वर -

श्लोक 24 (skanda.8.149.24)

विहस्तशस्त्रकवचावृताः शस्त्रशताचिताः । द्वारपालाश्च रुद्रणां रुद्राणां ये च सूनवः ।।

vihastaśastrakavacāvṛtāḥ śastraśatācitāḥ | dvārapālāśca rudraṇāṁ rudrāṇāṁ ye ca sūnavaḥ ||

हाथों में शस्त्र लिए, कवच पहने और सैकड़ों शस्त्रों से सुशोभित, रुद्रों के द्वारपाल और रुद्रों के पुत्र -

श्लोक 25 (skanda.8.149.25)

स्कन्दपारिषदा ये च ये च शक्तिगणेश्वराः । ते दनोस्तनयैस्सार्धं दनोः पुत्रान्वयाश्च ये । चक्रुः कृतान्तसदृशाः कलहं कलहप्रियाः ।।

skandapāriṣadā ye ca ye ca śaktigaṇeśvarāḥ | te danostanayaissārdhaṁ danoḥ putrānvayāśca ye | cakruḥ kṛtāntasadṛśāḥ kalahaṁ kalahapriyāḥ ||

स्कन्द के पार्षद और शक्ति-गणेश्वर - इन सभी ने दनु के पुत्रों तथा दनु के वंशजों के साथ, यमराज के समान भयंकर होकर, कलह-प्रिय होते हुए युद्ध किया।

श्लोक 26 (skanda.8.149.26)

तस्मिन् तथा वर्तति संप्रहारे विशीर्णहाराभरणस्रगस्त्रैः । व्याविद्धवस्त्रा विकसत्सुनेत्रा नेदुः सुराः सिद्धगणाश्च खस्थाः ।।

tasmin tathā vartati saṁprahāre viśīrṇahārābharaṇasragastraiḥ | vyāviddhavastrā vikasatsunetrā neduḥ surāḥ siddhagaṇāśca khasthāḥ ||

उस युद्ध के इस प्रकार चलते रहने पर, आकाश में स्थित देवगण और सिद्धगण, बिखरे हुए हार, आभूषण, माला और अस्त्रों से युक्त, लहराते वस्त्रोंवाले और खिले हुए सुन्दर नेत्रोंवाले होकर जय-घोष करने लगे।

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