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अम्बिका खण्ड · अध्याय 150

शुक्रोदयसुरशाप

अध्याय 149अध्याय-सूचीअध्याय 151

श्लोक 1 (skanda.8.150.1)

मायावीर्यं च वीर्यं च अन्धकस्यामरद्विषः । सृष्टं भगवता सम्यग् देवरूपनिमित्तजम् ।।

māyāvīryaṁ ca vīryaṁ ca andhakasyāmaradviṣaḥ | sṛṣṭaṁ bhagavatā samyag devarūpanimittajam ||

व्यास ने कहा - देवशत्रु अन्धक की माया-शक्ति और वीर्य (पराक्रम), जो देवरूप के निमित्त से भगवान द्वारा भलीभाँति उत्पन्न किए गए थे -

श्लोक 2 (skanda.8.150.2)

निगीर्णो यस्य देवेन शरीरे भार्गवो मुनिः । कथं तु कृतवांस्तत्र देवदेवशरीरगः ।।

nigīrṇo yasya devena śarīre bhārgavo muniḥ | kathaṁ tu kṛtavāṁstatra devadevaśarīragaḥ ||

- जिस देव के शरीर में मुनि भार्गव को निगल लिया गया था, वहाँ देवदेव के शरीर में जाकर उन्होंने क्या किया?

श्लोक 3 (skanda.8.150.3)

कथं च तपसो वीर्याद्योगवीर्याच्च स द्विजः । श्वेताभ्रादिव वै चन्द्रो निःसृतो भृगुनन्दनः ।।

kathaṁ ca tapaso vīryādyogavīryācca sa dvijaḥ | śvetābhrādiva vai candro niḥsṛto bhṛgunandanaḥ ||

उस ब्राह्मण भृगुनन्दन ने तप और योग के बल से किस प्रकार श्वेत मेघ से चन्द्रमा के समान वहाँ से बाहर निकलकर प्राप्ति पाई?

श्लोक 4 (skanda.8.150.4)

एतत् कौतूहलं जातं ममाद्य मुनिसत्तम । कथयेशानचरितं भार्गवस्य च धीमतः ।।

etat kautūhalaṁ jātaṁ mamādya munisattama | kathayeśānacaritaṁ bhārgavasya ca dhīmataḥ ||

हे मुनिश्रेष्ठ! आज मुझे यह जिज्ञासा हुई है; भगवान शिव के चरित्र और बुद्धिमान भार्गव के चरित्र का वर्णन कीजिए।

श्लोक 5 (skanda.8.150.5)

स एवमुक्तो व्यासेन पद्मगर्भसुतः प्रभुः । सनत्कुमारोऽकथयच्छिवाच्छुक्रस्य निर्गमम् ।।

sa evamukto vyāsena padmagarbhasutaḥ prabhuḥ | sanatkumāro'kathayacchivācchukrasya nirgamam ||

सूत ने कहा - व्यास द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर ब्रह्मा के पुत्र प्रभु सनत्कुमार ने शिव से शुक्र के निकलने का वृत्तान्त कहा।

श्लोक 6 (skanda.8.150.6)

देहे तस्य तदा शम्भोः शुक्रो विनिहतद्युतिः । छिद्रान्वेषी भ्रमन्नेव अनिकेतो यथानिलः ।।

dehe tasya tadā śambhoḥ śukro vinihatadyutiḥ | chidrānveṣī bhramanneva aniketo yathānilaḥ ||

उस समय शिव के शरीर में तेजहीन हुए शुक्राचार्य, आश्रयहीन वायु के समान भटकते हुए, बाहर निकलने का कोई छिद्र (मार्ग) ढूँढ़ते रहे।

श्लोक 7 (skanda.8.150.7)

स लोकानग्निवर्णाभान् रुद्रकोटिशतैर्वृतान् । रुद्रकन्याविचरितान् रुद्रदेहेभ्यपश्यत ।।

sa lokānagnivarṇābhān rudrakoṭiśatairvṛtān | rudrakanyāvicaritān rudradehebhyapaśyata ||

उन्होंने रुद्र के शरीर के भीतर अग्नि के समान वर्णवाले, करोड़ों-करोड़ रुद्रों से घिरे हुए तथा रुद्र-कन्याओं द्वारा विचरण किए गए लोकों को देखा।

श्लोक 8 (skanda.8.150.8)

कुन्देन्दुशंखवर्णानां दंष्ट्रिणां नखिनामपि । दीर्घलाङ्गूलजुष्टानां सदर्पाणां क्षमावताम् ।।

kundenduśaṁkhavarṇānāṁ daṁṣṭriṇāṁ nakhināmapi | dīrghalāṅgūlajuṣṭānāṁ sadarpāṇāṁ kṣamāvatām ||

कुन्द-पुष्प, चन्द्रमा और शंख के समान वर्णवाले, दाढ़ोंवाले, नखोंवाले, लम्बी पूँछोंवाले, गर्वयुक्त और क्षमाशील -

श्लोक 9 (skanda.8.150.9)

ज्वलनप्रभकेशानां नन्द्यावर्तकधारिणाम् । किंशुकप्रभजिह्वानां कैलासगिरिवर्ष्मणाम् ।।

jvalanaprabhakeśānāṁ nandyāvartakadhāriṇām | kiṁśukaprabhajihvānāṁ kailāsagirivarṣmaṇām ||

अग्नि के समान चमकते केशोंवाले, नन्द्यावर्त चिह्न धारण किए हुए, किंशुक पुष्प के समान लाल जिह्वावाले, कैलास पर्वत के समान विशालकाय -

श्लोक 10 (skanda.8.150.10)

अग्निबन्धनबद्धानां सिंहानां भीमरूपिणाम् । सहस्रं ददृशे देहे देवदेवस्य भार्गवः ।।

agnibandhanabaddhānāṁ siṁhānāṁ bhīmarūpiṇām | sahasraṁ dadṛśe dehe devadevasya bhārgavaḥ ||

और अग्नि की जंजीरों से बँधे हुए भीषण रूपधारी सहस्र सिंहों को देवदेव शिव के शरीर में भार्गव ने देखा।

श्लोक 11 (skanda.8.150.11)

सुरांश्च सेन्द्रान् सादित्यान् साप्सरोगणमानवान् । गणेशासुरयुद्धं च सोऽपश्यद्धरदेहगः ।।

surāṁśca sendrān sādityān sāpsarogaṇamānavān | gaṇeśāsurayuddhaṁ ca so'paśyaddharadehagaḥ ||

शिव के शरीर में स्थित रहते हुए उन्होंने इन्द्र-सहित देवताओं, आदित्यों, अप्सरागणों, मनुष्यों तथा गणेश्वरों और असुरों के युद्ध को भी देखा।

श्लोक 12 (skanda.8.150.12)

वर्षाणां तु शतं कुक्षौ भ्रममाणो भवस्य सः । न तस्य ददृशे छिद्रं शुचेरिव यथा कलिः ।।

varṣāṇāṁ tu śataṁ kukṣau bhramamāṇo bhavasya saḥ | na tasya dadṛśe chidraṁ śuceriva yathā kaliḥ ||

शिव के उदर में सौ वर्षों तक भटकते हुए भी उन्हें कोई छिद्र उसी प्रकार नहीं दिखा, जैसे पवित्र पुरुष में कलियुग को कोई छिद्र (दोष) नहीं मिलता।

श्लोक 13 (skanda.8.150.13)

योगमप्यस्य सैश्वर्यमणिमादिगुणान्वितम् । प्रजहार महादेवो मनोवाग्यतचेतसः ।।

yogamapyasya saiśvaryamaṇimādiguṇānvitam | prajahāra mahādevo manovāgyatacetasaḥ ||

जिसका मन और वाणी संयत थे, ऐसे उस भार्गव की अणिमादि गुणों से युक्त ऐश्वर्यशाली योगशक्ति को भी महादेव ने हर लिया था।

श्लोक 14 (skanda.8.150.14)

अथ शब्दो महानासीत् प्रमथासुरसैन्ययोः । तं श्रुत्वा शब्दमाविग्नो भार्गवः प्रतिबोधितः ।।

atha śabdo mahānāsīt pramathāsurasainyayoḥ | taṁ śrutvā śabdamāvigno bhārgavaḥ pratibodhitaḥ ||

इसी बीच प्रमथों और असुरों की सेनाओं का महान शब्द उत्पन्न हुआ। उस शब्द को सुनकर व्याकुल हुए भार्गव सचेत हो उठे।

श्लोक 15 (skanda.8.150.15)

सोऽन्तर्गत उमाभर्तुर्ब्राह्मणस्तपसैधितः । तुष्टावेष्टैः स्तवैर्देवं सोमं सोमविभूषणम् ।।

so'ntargata umābharturbrāhmaṇastapasaidhitaḥ | tuṣṭāveṣṭaiḥ stavairdevaṁ somaṁ somavibhūṣaṇam ||

उमापति के भीतर स्थित, तप से समृद्ध वह ब्राह्मण चन्द्रमा से विभूषित देव सोम (शिव) की मनोवांछित स्तोत्रों से स्तुति करने लगे।

श्लोक 16 (skanda.8.150.16)

आपद्भावं प्रपन्नस्य तस्य देवेन शूलिना । लिङ्गेन निष्क्रमस्वेति प्रसादाभ्युदयः कृतः ।।

āpadbhāvaṁ prapannasya tasya devena śūlinā | liṅgena niṣkramasveti prasādābhyudayaḥ kṛtaḥ ||

संकट में पड़े हुए उस भार्गव पर त्रिशूलधारी शिव ने कृपा करते हुए कहा - 'लिंग के द्वारा बाहर निकल आओ' - इस प्रकार अनुग्रह का उदय हुआ।

श्लोक 17 (skanda.8.150.17)

सूक्ष्मरूपस्ततो भूत्वा स शुक्रो मुनिसत्तमः । शुक्रवन्निःसृतो लिङ्गाद्देवदेवस्य धीमतः ।।

sūkṣmarūpastato bhūtvā sa śukro munisattamaḥ | śukravanniḥsṛto liṅgāddevadevasya dhīmataḥ ||

तब मुनिश्रेष्ठ भार्गव सूक्ष्म रूप धारण करके बुद्धिमान देवदेव के लिंग से शुक्र (वीर्य) के समान बाहर निकल आए।

श्लोक 18 (skanda.8.150.18)

शुक्रवन्निःसृतो यस्माच्छिश्नाद्भार्गवनन्दनः । तस्माच्छुक्र इति ख्यातिं गतो गतिमतां वरः ।।

śukravanniḥsṛto yasmācchiśnādbhārgavanandanaḥ | tasmācchukra iti khyātiṁ gato gatimatāṁ varaḥ ||

जिस कारण भार्गव-पुत्र शिश्न (लिंग) से शुक्र के समान बाहर निकले, उसी कारण से गतिशीलों में श्रेष्ठ वे 'शुक्र' नाम से विख्यात हुए।

श्लोक 19 (skanda.8.150.19)

वन्दमानश्च तेनोक्तः पयोदपतिकेतुना । शुक्रवन्निःसृतो मद्य यस्मात्त्वं भृगुनन्दन ।।

vandamānaśca tenoktaḥ payodapatiketunā | śukravanniḥsṛto madya yasmāttvaṁ bhṛgunandana ||

प्रणाम करते हुए उससे मेघपति-केतुधारी शिव ने कहा - 'हे भृगुनन्दन! चूँकि तुम मुझसे शुक्र के समान बाहर निकले हो,'

श्लोक 20 (skanda.8.150.20)

कर्मणा तेन शुक्रोऽसि मम पुत्रश्च गम्यताम् । इत्येवमुक्तो देवेन शुक्रोऽर्कसदृशद्युतिः ।।

karmaṇā tena śukro'si mama putraśca gamyatām | ityevamukto devena śukro'rkasadṛśadyutiḥ ||

'इसी कारण तुम शुक्र हो, और अब मेरे पुत्र के रूप में जाओ' - देव द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर सूर्य के समान तेजस्वी शुक्राचार्य -

श्लोक 21 (skanda.8.150.21)

विवेश दानवानीकं मेघानीकं शशी यथा । तं दृष्ट्वा चन्द्रसंकाशं चन्द्रोदयनिभोदयम् ।।

viveśa dānavānīkaṁ meghānīkaṁ śaśī yathā | taṁ dṛṣṭvā candrasaṁkāśaṁ candrodayanibhodayam ||

उसी प्रकार दानव-सेना में प्रविष्ट हुए, जैसे चन्द्रमा मेघों की सेना में प्रविष्ट होता है। चन्द्रमा के समान कान्तिवाले और चन्द्रोदय के समान उदयवाले उन्हें देखकर -

श्लोक 22 (skanda.8.150.22)

चन्द्रोदये यथा नॄणां प्रीतिरासीत् सुरद्विषाम् । ते दृष्ट्वा दनुदैतेयाः शुक्रं चन्द्रसमप्रभम् ।।

candrodaye yathā nṝṇāṁ prītirāsīt suradviṣām | te dṛṣṭvā danudaiteyāḥ śukraṁ candrasamaprabham ||

- जैसे चन्द्रोदय पर मनुष्यों को प्रसन्नता होती है, वैसी ही प्रसन्नता देवशत्रुओं को हुई। चन्द्रमा के समान तेजस्वी शुक्र को देखकर वे दनु-दैत्य -

श्लोक 23 (skanda.8.150.23)

सर्वे सिंहरवाँश्चक्रुः संप्रहृष्टा युयुत्सवः । निहता दानवा ये तु प्रमथैर्जितकाशिभिः ।।

sarve siṁharavā~ścakruḥ saṁprahṛṣṭā yuyutsavaḥ | nihatā dānavā ye tu pramathairjitakāśibhiḥ ||

- सभी अत्यन्त हर्षित होकर, युद्ध की इच्छा से सिंहनाद करने लगे। जो दानव विजयी प्रमथों द्वारा मारे गए थे,

श्लोक 24 (skanda.8.150.24)

तानागतान्मृत्युमुखान्मेनिरे भार्गवागमात् । ववन्दुस्तं ननन्दुश्च प्रसेदुश्च महासुराः ।।

tānāgatānmṛtyumukhānmenire bhārgavāgamāt | vavandustaṁ nananduśca praseduśca mahāsurāḥ ||

- भार्गव के आगमन से उन्होंने अपने आपको मृत्यु के मुख से लौटा हुआ माना। महासुरों ने उनकी वन्दना की, उनके आगमन पर आनन्दित हुए और प्रसन्न हुए।

श्लोक 25 (skanda.8.150.25)

शुक्रोदयमुदं लेभे स दानवमहार्णवः । यथा चन्द्रोदये नित्यं सागरो राक्षसैर्युतः ।।

śukrodayamudaṁ lebhe sa dānavamahārṇavaḥ | yathā candrodaye nityaṁ sāgaro rākṣasairyutaḥ ||

शुक्र के उदय से वह विशाल दानव-सागर उसी प्रकार आनन्द से भर उठा, जैसे राक्षसों-सहित समुद्र चन्द्रोदय पर सदा आनन्दित होता है।

श्लोक 26 (skanda.8.150.26)

अथ शाखो विशाखश्च छागवक्त्रश्चतुर्मुखः । नन्दी च सोमनन्दी च नन्दिषेणश्च वीर्यवान् ।।

atha śākho viśākhaśca chāgavaktraścaturmukhaḥ | nandī ca somanandī ca nandiṣeṇaśca vīryavān ||

फिर शाख, विशाख, बकरे के मुखवाला चतुर्मुख, नन्दी, सोमनन्दी और पराक्रमी नन्दिषेण,

श्लोक 27 (skanda.8.150.27)

घण्टाकर्णः शंकुकर्णः कुण्डोदरमहोदरौ । विट्पतिर्वीरभद्रश्च स च देवः प्रभामयः ।।

ghaṇṭākarṇaḥ śaṁkukarṇaḥ kuṇḍodaramahodarau | viṭpatirvīrabhadraśca sa ca devaḥ prabhāmayaḥ ||

घण्टाकर्ण, शंकुकर्ण, कुण्डोदर और महोदर, विट्पति, वीरभद्र और वह देव प्रभामय,

श्लोक 28 (skanda.8.150.28)

संवर्तकानलोर्वौ च यशोदीप्तो विभाकरः । वेगपश्च शिखण्डी च ताम्रचूडश्च कुक्कुटः ।।

saṁvartakānalorvau ca yaśodīpto vibhākaraḥ | vegapaśca śikhaṇḍī ca tāmracūḍaśca kukkuṭaḥ ||

संवर्तक, अनल, ऊर्वी, यश से देदीप्यमान विभाकर, वेगप, शिखण्डी, ताम्रचूड और कुक्कुट,

श्लोक 29 (skanda.8.150.29)

अन्नदः पिङ्गलो यक्षः पिङ्गलश्च वटुः पटुः । विद्युत्केशः सुकेशश्च राक्षसौ चापराजितौ ।।

annadaḥ piṅgalo yakṣaḥ piṅgalaśca vaṭuḥ paṭuḥ | vidyutkeśaḥ sukeśaśca rākṣasau cāparājitau ||

अन्नद, यक्ष पिंगल, पिंगल, वटु, पटु, विद्युत्केश और सुकेश - ये दोनों अजेय राक्षस,

श्लोक 30 (skanda.8.150.30)

एते चान्ये च गणपा लोकपालसमत्विषः । विविशुर्दानवानीकं शुक्रोदयसमुद्धतम् ।।

ete cānye ca gaṇapā lokapālasamatviṣaḥ | viviśurdānavānīkaṁ śukrodayasamuddhatam ||

ये और अन्य भी लोकपालों के समान तेजस्वी गणपति, शुक्र के उदय से उत्साहित हुई दानव-सेना में घुस पड़े।

श्लोक 31 (skanda.8.150.31)

अथ वादित्रशब्दास्तु सिंहनादरवैः सह । बभूवुः सेनयोरुग्राः सर्वभूतप्रकम्पनाः ।।

atha vāditraśabdāstu siṁhanādaravaiḥ saha | babhūvuḥ senayorugrāḥ sarvabhūtaprakampanāḥ ||

फिर सिंहनादों के साथ वाद्यों के भयंकर शब्द दोनों सेनाओं में उत्पन्न होने लगे, जो समस्त प्राणियों को कँपा देने वाले थे।

श्लोक 32 (skanda.8.150.32)

ततः प्रहरणैर्घोरैस्तुण्डनिर्वापितैस्तलैः । परस्परं समासाद्य निर्जघ्नुस्ते परस्परम् ।।

tataḥ praharaṇairghoraistuṇḍanirvāpitaistalaiḥ | parasparaṁ samāsādya nirjaghnuste parasparam ||

तब भयंकर आयुधों से, थप्पड़ों से जिनकी नोक तोड़ दी गई थी, वे परस्पर भिड़कर एक-दूसरे का वध करने लगे।

श्लोक 33 (skanda.8.150.33)

नन्दीश्वरं पुरस्कृत्य कार्त्तिकेयञ्च षण्मुखम् । मृद्नन्ति प्रमथा दैत्यान् सर्पाँस्तार्क्ष्य इवाहवे ।।

nandīśvaraṁ puraskṛtya kārttikeyañca ṣaṇmukham | mṛdnanti pramathā daityān sarpā~stārkṣya ivāhave ||

नन्दीश्वर और षण्मुख कार्तिकेय को आगे रखकर प्रमथ दैत्यों को युद्ध में उसी प्रकार कुचल रहे थे, जैसे गरुड़ सर्पों को कुचलता है।

श्लोक 34 (skanda.8.150.34)

असिपातावलूनाग्रा मुशलाहतमस्तकाः । दानवाः शेरते भूमौ वज्रभिन्ना इवाचलाः ।।

asipātāvalūnāgrā muśalāhatamastakāḥ | dānavāḥ śerate bhūmau vajrabhinnā ivācalāḥ ||

तलवारों के प्रहार से जिनके अंग कट गए थे और मूसलों से जिनके मस्तक टूट गए थे, ऐसे दानव उसी प्रकार भूमि पर पड़े थे, जैसे वज्र से टूटे हुए पर्वत पड़े रहते हैं।

श्लोक 35 (skanda.8.150.35)

शरनिर्भिन्ननिर्भग्नाः संभग्नोरुप्रबाहवः । रिरिङ्गुःसमरे दैत्याः सर्पास्तार्क्ष्यार्दिता इव ।।

śaranirbhinnanirbhagnāḥ saṁbhagnoruprabāhavaḥ | ririṅguḥsamare daityāḥ sarpāstārkṣyārditā iva ||

बाणों से बुरी तरह छिन्न-भिन्न और जिनकी जंघाएँ और भुजाएँ टूट गई थीं, ऐसे दैत्य रणभूमि में उसी प्रकार तड़पते-रेंगते रहे, जैसे गरुड़ से पीड़ित सर्प तड़पते हैं।

श्लोक 36 (skanda.8.150.36)

भग्नत्रिकोरुजघना घनबाणावपीडिताः । दैत्या विनिष्टनन्त्यार्त्तास्तोयपूर्णा इवाम्बुदाः ।।

bhagnatrikorujaghanā ghanabāṇāvapīḍitāḥ | daityā viniṣṭanantyārttāstoyapūrṇā ivāmbudāḥ ||

जिनकी रीढ़, जंघाएँ और नितम्ब टूट गए थे, सघन बाणों से पीड़ित वे दैत्य पीड़ा से इस प्रकार कराहते रहे, जैसे जल से भरे मेघ गरजते हैं।

श्लोक 37 (skanda.8.150.37)

तस्मिन् गणपदैत्यानां मथने भृशदारुणे । बभूव पूर्णा दैत्यानां धरा द्यौरिव नीरदैः ।।

tasmin gaṇapadaityānāṁ mathane bhṛśadāruṇe | babhūva pūrṇā daityānāṁ dharā dyauriva nīradaiḥ ||

गणपतियों और दैत्यों के उस अत्यन्त भयंकर संघर्ष में पृथ्वी दैत्यों से उसी प्रकार भर गई, जैसे आकाश मेघों से भर जाता है।

श्लोक 38 (skanda.8.150.38)

किरीटैर्मुकुटैर्हारैर्वलयाभरणाङ्गदैः । पारिहार्यैस्स केयूरैः श्रोणीसूत्रैस्सकुण्डलैः ।।

kirīṭairmukuṭairhārairvalayābharaṇāṅgadaiḥ | pārihāryaissa keyūraiḥ śroṇīsūtraissakuṇḍalaiḥ ||

किरीटों, मुकुटों, हारों, कड़ों, आभूषणों, बाजूबन्दों, परिहार्यों (आभूषण-विशेष), कटिसूत्रों और कुण्डलों से,

श्लोक 39 (skanda.8.150.39)

शिरस्त्रैर्मणिभिः शुभ्रैर्ग्रैवेयैरपि सुप्रभैः । स्रग्दामैश्चारुकुसुमैर्नेत्रै रत्नाग्रबाहुभिः ।।

śirastrairmaṇibhiḥ śubhrairgraiveyairapi suprabhaiḥ | sragdāmaiścārukusumairnetrai ratnāgrabāhubhiḥ ||

शिरस्त्राणों, उज्ज्वल मणियों, तेजस्वी कण्ठहारों, सुन्दर पुष्पों की मालाओं, नेत्रों और रत्नजड़ित भुजाओं से,

श्लोक 40 (skanda.8.150.40)

अस्त्रैः शस्त्रैश्च वस्त्रैश्च छत्रैश्चेन्दुसमप्रभैः । रक्तकुंकुमचित्राङ्गी नानाभरणभूषणा ।।

astraiḥ śastraiśca vastraiśca chatraiścendusamaprabhaiḥ | raktakuṁkumacitrāṅgī nānābharaṇabhūṣaṇā ||

अस्त्रों, शस्त्रों, वस्त्रों और चन्द्रमा के समान कान्तिवाले छत्रों से, तथा रक्त-रूपी कुंकुम से चित्रित अंगोंवाली और नाना आभूषणों से विभूषित होकर -

श्लोक 41 (skanda.8.150.41)

धनाढ्या स्त्रीरिवाभाति तत्र तत्र रणावनिः । सिंहानामिव दृप्तानां हस्तिनामपि वा यथा ।।

dhanāḍhyā strīrivābhāti tatra tatra raṇāvaniḥ | siṁhānāmiva dṛptānāṁ hastināmapi vā yathā ||

वह रणभूमि की धरती इधर-उधर एक धनाढ्य स्त्री के समान शोभित हो रही थी - मानो गर्वित सिंहों और गजों के अलंकरणों से सुसज्जित हो।

श्लोक 42 (skanda.8.150.42)

उत्साहोऽभूद्गणेशानां दानवान् संमर्दताम् । ते हन्यमानाऽशरणा भयार्त्ताः शरणार्थिनः ।।

utsāho'bhūdgaṇeśānāṁ dānavān saṁmardatām | te hanyamānā'śaraṇā bhayārttāḥ śaraṇārthinaḥ ||

दानवों को कुचलते हुए गणेश्वरों का उत्साह बढ़ने लगा। मारे जाते हुए, आश्रयहीन, भय से पीड़ित वे दानव शरण खोजने लगे।

श्लोक 43 (skanda.8.150.43)

प्रमथैरनुबद्धाश्च दानवाः सागरं श्रिताः । दृष्ट्वा तद्रेचितं सैन्यं दानवैः प्रमथार्दितैः ।।

pramathairanubaddhāśca dānavāḥ sāgaraṁ śritāḥ | dṛṣṭvā tadrecitaṁ sainyaṁ dānavaiḥ pramathārditaiḥ ||

प्रमथों द्वारा खदेड़े गए दानवों ने समुद्र की शरण ली। प्रमथों द्वारा पीड़ित दानवों से रिक्त हुई अपनी सेना को देखकर -

श्लोक 44 (skanda.8.150.44)

प्रविष्टेषु च दैत्येषु सागरं मकरालयम् । भार्गवः सुमहातेजा यथाग्निरिव मूर्छितः ।।

praviṣṭeṣu ca daityeṣu sāgaraṁ makarālayam | bhārgavaḥ sumahātejā yathāgniriva mūrchitaḥ ||

और दैत्यों को मगरमच्छों के आवास समुद्र में प्रविष्ट हुआ देखकर, महातेजस्वी भार्गव अग्नि के समान क्रोध से मूर्च्छित-से हो उठे।

श्लोक 45 (skanda.8.150.45)

स समुद्रालयान् दैत्याञ्छशाप कुपितो भृशम् । यस्मात्सहायानुत्सृज्य मां चापि पितृवद्धितम् ।।

sa samudrālayān daityāñchaśāpa kupito bhṛśam | yasmātsahāyānutsṛjya māṁ cāpi pitṛvaddhitam ||

अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन्होंने समुद्र में शरण लिए हुए उन दैत्यों को शाप दिया - 'चूँकि तुमने अपने साथियों को और पिता के समान हितैषी मुझे भी त्यागकर -'

श्लोक 46 (skanda.8.150.46)

प्राणत्राणार्थमबलाः प्रविष्टाः स्थ पयोनिधिम् । तस्मात्तत्रैव निर्ह्रीका मम शापपरिक्षताः ।।

prāṇatrāṇārthamabalāḥ praviṣṭāḥ stha payonidhim | tasmāttatraiva nirhrīkā mama śāpaparikṣatāḥ ||

'- केवल प्राण बचाने के लिए, दुर्बल होकर समुद्र में प्रवेश किया है, इसलिए वहीं निर्लज्ज होकर मेरे शाप से क्षीण हुए तुम -'

श्लोक 47 (skanda.8.150.47)

मीनभावमनुप्राप्ता जाताजाता भविष्यथ । यावल्लोका भविष्यन्ति पर्वताश्च ससागराः ।।

mīnabhāvamanuprāptā jātājātā bhaviṣyatha | yāvallokā bhaviṣyanti parvatāśca sasāgarāḥ ||

'- मत्स्य-भाव को प्राप्त होकर, जन्म-जन्मान्तर तक जन्म लेते रहोगे, जब तक लोक, पर्वत और सागर विद्यमान रहेंगे।'

श्लोक 48 (skanda.8.150.48)

तावद्यूयं जले मत्स्या भविष्यथ जलेचराः । नरमांसाशनाः पापा नरभक्ष्या भविष्यथ ।।

tāvadyūyaṁ jale matsyā bhaviṣyatha jalecarāḥ | naramāṁsāśanāḥ pāpā narabhakṣyā bhaviṣyatha ||

'तब तक तुम जल में जलचर मत्स्य बने रहोगे; नरमांस खाने वाले पापी होकर तुम स्वयं भी मनुष्यों द्वारा भक्षण किए जाओगे।'

श्लोक 49 (skanda.8.150.49)

क्षपयिष्यथ मच्छापं वर्षकोटीशतान्युत । इति शापहतान्शेषान् कृत्वार्णवजलौकसः । विरराम महातेजाः शुक्रश्चन्द्रसमद्युतिः ।।

kṣapayiṣyatha macchāpaṁ varṣakoṭīśatānyuta | iti śāpahatānśeṣān kṛtvārṇavajalaukasaḥ | virarāma mahātejāḥ śukraścandrasamadyutiḥ ||

'तुम मेरे इस शाप को करोड़ों-अरबों वर्षों तक भोगोगे' - इस प्रकार समुद्र के जलनिवासी शेष दैत्यों को शाप देकर, महातेजस्वी और चन्द्रमा के समान कान्तिवाले शुक्राचार्य चुप हो गए।

श्लोक 50 (skanda.8.150.50)

ततस्ते वार्धितोयेषु गुरुशापहतासुराः । सायुधाः सतनुत्राश्च दृश्यन्ते दंशिताश्च ह ।।

tataste vārdhitoyeṣu guruśāpahatāsurāḥ | sāyudhāḥ satanutrāśca dṛśyante daṁśitāśca ha ||

सनत्कुमार ने कहा - तब गुरु के शाप से आहत हुए वे असुर समुद्र के जल में शस्त्र, कवच और दंश-सहित मानो मत्स्य-रूप में दिखाई देते हैं।

श्लोक 51 (skanda.8.150.51)

अन्धकं तु ततः शुक्रः शुक्रारिभयविह्वलम् । उवाच पाणिना स्पृश्य जीवयन्निव तं गिरा ।।

andhakaṁ tu tataḥ śukraḥ śukrāribhayavihvalam | uvāca pāṇinā spṛśya jīvayanniva taṁ girā ||

तब शुक्राचार्य ने अपने शत्रु (शिव) से भयभीत हुए अन्धक को अपने हाथ से स्पर्श करके, अपनी वाणी से मानो पुनर्जीवित करते हुए यह कहा -

श्लोक 52 (skanda.8.150.52)

माभैस्त्वं दानवश्रेष्ठ प्रतियुध्यस्व शत्रुषु । अहं त्वां धारयिष्यामि आहार इव जीवितम् ।।

mābhaistvaṁ dānavaśreṣṭha pratiyudhyasva śatruṣu | ahaṁ tvāṁ dhārayiṣyāmi āhāra iva jīvitam ||

'हे दानवश्रेष्ठ! भयभीत मत हो, शत्रुओं से प्रतिकार करते हुए युद्ध करो; जैसे भोजन जीवन को धारण करता है, वैसे ही मैं तुम्हें धारण करूँगा।'

श्लोक 53 (skanda.8.150.53)

इत्येवमुक्तः शुक्रेण सोऽन्धको दानवेश्वरः । एवमेतदिति प्रोच्य रुरोध प्रमथान् रणे ।।

ityevamuktaḥ śukreṇa so'ndhako dānaveśvaraḥ | evametaditi procya rurodha pramathān raṇe ||

शुक्राचार्य द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर दानवेश्वर अन्धक ने 'ऐसा ही हो' कहकर युद्ध में प्रमथों को रोकना आरम्भ कर दिया।

श्लोक 54 (skanda.8.150.54)

ततः प्रविष्टेष्वसुरेषु सागरं निहन्यमानेषु च शङ्करानुगैः । दधार सर्वान्प्रमथान् तदान्धको नदीनदान्भूरिजलो यथार्णवः ।।

tataḥ praviṣṭeṣvasureṣu sāgaraṁ nihanyamāneṣu ca śaṅkarānugaiḥ | dadhāra sarvānpramathān tadāndhako nadīnadānbhūrijalo yathārṇavaḥ ||

जब असुर समुद्र में प्रवेश कर चुके थे और शिव के अनुचरों द्वारा मारे जा रहे थे, तब अन्धक ने अकेले ही सब प्रमथों को उसी प्रकार सँभाला, जैसे विपुल जलवाला समुद्र सब नदियों और नदों को सँभाल लेता है।

श्लोक 55 (skanda.8.150.55)

स नन्दिनं द्वादशभिः पराभिनत्तदान्धकः पञ्चभिरेव चाग्निजम् । विशाखशाखौ दशभिः शतेन च स नैगमेषं प्रतुतोद दानवः ।।

sa nandinaṁ dvādaśabhiḥ parābhinattadāndhakaḥ pañcabhireva cāgnijam | viśākhaśākhau daśabhiḥ śatena ca sa naigameṣaṁ pratutoda dānavaḥ ||

उस समय अन्धक ने नन्दी को बारह बाणों से, अग्निपुत्र को पाँच बाणों से बेध डाला, और विशाख तथा शाख को दस-दस बाणों से; उस दानव ने नैगमेष को सौ बाणों से बेध डाला।

श्लोक 56 (skanda.8.150.56)

स वीरभद्रं च तथा च विट्पतिं प्रभामयं यक्षवरं च पिङ्गलम् । विबभेद बाणैस्तपनीयभूषणैर्यथाङ्कुशाग्रैरिव हस्तिपो गजम् ।।

sa vīrabhadraṁ ca tathā ca viṭpatiṁ prabhāmayaṁ yakṣavaraṁ ca piṅgalam | vibabheda bāṇaistapanīyabhūṣaṇairyathāṅkuśāgrairiva hastipo gajam ||

उसने वीरभद्र, विट्पति, प्रभामय और यक्षश्रेष्ठ पिंगल को भी स्वर्ण-भूषित बाणों से उसी प्रकार बेध डाला, जैसे महावत अंकुश की नोक से हाथी को बेध देता है।

श्लोक 57 (skanda.8.150.57)

न सोऽस्ति तस्मिन् पुरतो न पृष्ठतो हयो गजो वा प्रमथोऽथवेतरः । शरान्न यो धारयतेऽन्धकेरितान् प्रदीप्तकालानलसूर्यसन्निभान् ।।

na so'sti tasmin purato na pṛṣṭhato hayo gajo vā pramatho'thavetaraḥ | śarānna yo dhārayate'ndhakeritān pradīptakālānalasūryasannibhān ||

उसके सामने या पीछे ऐसा कोई घोड़ा, हाथी, प्रमथ या अन्य कोई नहीं था, जो अन्धक द्वारा छोड़े गए, प्रज्वलित कालाग्नि और सूर्य के समान बाणों को न सहता हो।

श्लोक 58 (skanda.8.150.58)

विवृश्चिताश्चन्दनवद्गणेश्वरा भुजोदरे वक्षसि मूर्घ्नि चासकृत् । निरुद्यमास्तस्थुरमित्रनन्दना यथा गजाः पञ्जरबन्धबन्धनाः ।।

vivṛścitāścandanavadgaṇeśvarā bhujodare vakṣasi mūrghni cāsakṛt | nirudyamāstasthuramitranandanā yathā gajāḥ pañjarabandhabandhanāḥ ||

चन्दन के वृक्षों के समान बार-बार अपनी भुजाओं, उदर, वक्षःस्थल और मस्तक पर विदीर्ण किए गए गणेश्वर, उत्साहरहित होकर उसी प्रकार खड़े रह गए, जैसे पिंजरे में बन्द गज खड़े रह जाते हैं।

श्लोक 59 (skanda.8.150.59)

ततोऽसुरैः सिंहरवास्तदा कृताः सशंखभेरीशतदुन्दुभोत्कटाः । पुनश्च युद्धं प्रबभौ भयानकं गणेश्वराणां सह दानवेश्वरैः ।।

tato'suraiḥ siṁharavāstadā kṛtāḥ saśaṁkhabherīśatadundubhotkaṭāḥ | punaśca yuddhaṁ prababhau bhayānakaṁ gaṇeśvarāṇāṁ saha dānaveśvaraiḥ ||

तब असुरों ने शंख, भेरी और सैकड़ों दुन्दुभियों से युक्त भयंकर सिंहनाद किए, और गणेश्वरों तथा दानवेश्वरों के बीच पुनः एक भयानक युद्ध छिड़ गया।

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