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अम्बिका खण्ड · अध्याय 151

अन्धक-नन्दि युद्ध

अध्याय 150अध्याय-सूचीअध्याय 152

श्लोक 1 (skanda.8.151.1)

सनत्कुमार उवाच । वर्तमानेन्धके युद्धे विद्रवत्सु गणेषु च । त्रिदशाधिपतिं शक्रमित्युवाच पितामहः

sanatkumāra uvāca | vartamānendhake yuddhe vidravatsu gaṇeṣu ca | tridaśādhipatiṁ śakramityuvāca pitāmahaḥ

सनत्कुमार ने कहा - जब अन्धक के साथ युद्ध चल रहा था और गण (शिवगण) भाग रहे थे, तब पितामह ब्रह्मा ने देवराज इन्द्र से यह कहा।

श्लोक 2 (skanda.8.151.2)

विमुखान्पश्य भद्रन्ते प्रमथानमरधिप । काल्यमानान् रणे घोरैर्दानवैरन्धकेन

vimukhānpaśya bhadrante pramathānamaradhipa | kālyamānān raṇe ghorairdānavairandhakena

हे देवराज! देखो, तुम्हारे ये प्रमथगण मुख मोड़कर भाग रहे हैं, क्योंकि अन्धक के भयंकर दानव उन्हें युद्ध में खदेड़ रहे हैं।

श्लोक 3 (skanda.8.151.3)

निहतान्निहतानेष प्रथमैर्दानवान् युधि । शुक्र उज्जीवयन्नास्ते सस्यानि जलदो यथा

nihatānnihatāneṣa prathamairdānavān yudhi | śukra ujjīvayannāste sasyāni jalado yathā

पहले भी मारे गए दानवों को शुक्राचार्य युद्धभूमि में पुनः जीवित करते जा रहे हैं, जैसे मेघ मुरझाई फसलों को सींचकर पुनः हरा-भरा कर देता है।

श्लोक 4 (skanda.8.151.4)

असौ विकृष्टचापश्च सेन्द्रायुधघनोपमः । सृजतीषुमयं वर्षमन्धकः क्षपयन् रिपून्

asau vikṛṣṭacāpaśca sendrāyudhaghanopamaḥ | sṛjatīṣumayaṁ varṣamandhakaḥ kṣapayan ripūn

यह अन्धक अपने खिंचे हुए धनुष के साथ इन्द्रधनुष-सहित मेघ के समान बाणों की वर्षा करता हुआ शत्रुओं का नाश कर रहा है।

श्लोक 5 (skanda.8.151.5)

प्रमथाभ्यर्दनं ह्येतदहितं ह्ययशस्करम् । क्षममाणा ह्यतिष्ठध्वं कस्मादेतत् पराजयम्

pramathābhyardanaṁ hyetadahitaṁ hyayaśaskaram | kṣamamāṇā hyatiṣṭhadhvaṁ kasmādetat parājayam

प्रमथों का यह उत्पीड़न हमारे लिए अहितकर और अपयशकारी है। तुम सब यह पराजय सहन करते हुए क्यों बैठे हो?

श्लोक 6 (skanda.8.151.6)

जित्वा ह्येष गणन्सर्वानन्धको दानवेश्वरः । अस्माकमपि मूलानि निर्मूलानि करिष्यति

jitvā hyeṣa gaṇansarvānandhako dānaveśvaraḥ | asmākamapi mūlāni nirmūlāni kariṣyati

यह दानवराज अन्धक समस्त गणों को जीतकर हमारी जड़ों को भी उखाड़ फेंकेगा।

श्लोक 7 (skanda.8.151.7)

तद्यावदेष नो बाणैः प्रमथान्नयति क्षयम् । तावदेव वयं पार्ष्णिं गृह्णाम कृत्तिवाससः

tadyāvadeṣa no bāṇaiḥ pramathānnayati kṣayam | tāvadeva vayaṁ pārṣṇiṁ gṛhṇāma kṛttivāsasaḥ

इसलिए, जब तक यह अपने बाणों से प्रमथों का नाश कर रहा है, तभी हमें कृत्तिवासा (शिव) की शरण ग्रहण कर लेनी चाहिए।

श्लोक 8 (skanda.8.151.8)

एवं तव च कार्यार्थः सेत्स्यते देवताधिप । रुद्रस्य च कृतं ह्येवं भविष्यति महत् प्रियम्

evaṁ tava ca kāryārthaḥ setsyate devatādhipa | rudrasya ca kṛtaṁ hyevaṁ bhaviṣyati mahat priyam

हे देवाधिप! इस प्रकार तुम्हारा प्रयोजन भी सिद्ध होगा, और रुद्र को भी यह कार्य महान् प्रिय होगा।

श्लोक 9 (skanda.8.151.9)

स्वयम्भुवचनं श्रुत्वा बलवृत्रनिबर्हणः । युक्तमेतदिति प्रोच्य सुरान् सुरपतिर्जगौ

svayambhuvacanaṁ śrutvā balavṛtranibarhaṇaḥ | yuktametaditi procya surān surapatirjagau

स्वयंभू (ब्रह्मा) के वचन सुनकर बल और वृत्र के संहारक इन्द्र ने 'यह उचित है' ऐसा कहकर देवताओं से यह कहा।

श्लोक 10 (skanda.8.151.10)

गृहीतवर्मशस्त्रास्त्राः शीघ्रं शीघ्रपराक्रमाः । साहाय्यं करवामाद्य गणानां युध्यतां रणे

gṛhītavarmaśastrāstrāḥ śīghraṁ śīghraparākramāḥ | sāhāyyaṁ karavāmādya gaṇānāṁ yudhyatāṁ raṇe

अपने कवच, शस्त्र और अस्त्र धारण कर, शीघ्र-पराक्रमी बनकर, आज हम युद्ध करते हुए गणों की सहायता करें।

श्लोक 11 (skanda.8.151.11)

ततो नारायणानन्तौ नरेन्द्रौ चन्द्र एव च । स्वयम्भुरनलो वायुः सूर्यो धनद एव च

tato nārāyaṇānantau narendrau candra eva ca | svayambhuranalo vāyuḥ sūryo dhanada eva ca

तब नारायण और अनन्त - दोनों नरेन्द्र - तथा चन्द्रमा, स्वयंभू, अग्नि, वायु, सूर्य और कुबेर -

श्लोक 12 (skanda.8.151.12)

पूषार्यमा भगो मित्रो यमश्च रविनन्दनः । अंशस्त्वष्टा जयश्चैव जयन्तश्चैव शक्रजः

pūṣāryamā bhago mitro yamaśca ravinandanaḥ | aṁśastvaṣṭā jayaścaiva jayantaścaiva śakrajaḥ

पूषा, अर्यमा, भग, मित्र, यम और सूर्यपुत्र शनि, अंश, त्वष्टा, जय, तथा इन्द्रपुत्र जयन्त -

श्लोक 13 (skanda.8.151.13)

मरुतो वसवः साध्यास्तथाश्विगरुडोरगाः । तुषिताश्चैव लेखाश्च विश्वेदेवाश्च गुह्यकाः

maruto vasavaḥ sādhyāstathāśvigaruḍoragāḥ | tuṣitāścaiva lekhāśca viśvedevāśca guhyakāḥ

मरुद्गण, वसुगण, साध्यगण, तथा अश्विनीकुमार, गरुड़, नाग, तुषितगण, लेखगण, विश्वेदेवगण और गुह्यकगण -

श्लोक 14 (skanda.8.151.14)

गन्धर्वाश्चैव यक्षाश्च ये चान्ये देवपक्षिणः । ते सर्वे वातरन् युद्धे हन्तुकामास्तथान्धकम्

gandharvāścaiva yakṣāśca ye cānye devapakṣiṇaḥ | te sarve vātaran yuddhe hantukāmāstathāndhakam

गन्धर्व, यक्ष तथा अन्य जो भी देव-पक्षी थे - वे सब अन्धक का वध करने की इच्छा से युद्ध में जुट गए।

श्लोक 15 (skanda.8.151.15)

अथ दुन्दुभिशब्दाश्च सिंहनादाश्च भैरवाः । बभूवुर्देवसैन्येषु प्रमथानां प्रियंकराः

atha dundubhiśabdāśca siṁhanādāśca bhairavāḥ | babhūvurdevasainyeṣu pramathānāṁ priyaṁkarāḥ

तब देवसेनाओं में भयंकर दुन्दुभि-ध्वनियाँ और सिंहनाद गूँज उठे, जो प्रमथों को प्रिय लगने वाले थे।

श्लोक 16 (skanda.8.151.16)

देवैः पतद्भिस्तत्सैन्यं दानवानां विलोडितम् । प्रभूतमीनं क्षीणाम्बु राजहंसैर्यथा सरः

devaiḥ patadbhistatsainyaṁ dānavānāṁ viloḍitam | prabhūtamīnaṁ kṣīṇāmbu rājahaṁsairyathā saraḥ

टूट पड़ते हुए देवताओं ने दानवों की उस सेना को वैसे ही मथ डाला, जैसे राजहंस मछलियों से भरे किंतु उथले सरोवर को मथ देते हैं।

श्लोक 17 (skanda.8.151.17)

ततो हलहलाशब्दः संजज्ञेतीवभैरवः । देवताध्युषिते सैन्ये दानवानां समाकुले

tato halahalāśabdaḥ saṁjajñetīvabhairavaḥ | devatādhyuṣite sainye dānavānāṁ samākule

तब देवताओं से भरी और दानवों से व्याकुल उस सेना में अत्यन्त भयंकर कोलाहल उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 18 (skanda.8.151.18)

सामुद्रमम्भस्तिमिभिर्घनैरिव यथा नभः । कफपित्तैर्यथा देहो गरुडैर्भोगिनो यथा

sāmudramambhastimibhirghanairiva yathā nabhaḥ | kaphapittairyathā deho garuḍairbhogino yathā

जैसे समुद्र का जल बड़ी-बड़ी मछलियों से, आकाश मेघों से, शरीर कफ-पित्त से, और सर्प गरुड़ों से क्षुब्ध होते हैं -

श्लोक 19 (skanda.8.151.19)

तथा तदन्धकबलं बलेन त्रिदिवौकसाम् । मुहूर्तेन कृतं सर्वं विहस्तकवचध्वजम्

tathā tadandhakabalaṁ balena tridivaukasām | muhūrtena kṛtaṁ sarvaṁ vihastakavacadhvajam

उसी प्रकार अन्धक की उस सेना को देवताओं के बल ने क्षणभर में ही समूचा अस्त-व्यस्त कर, कवच और ध्वजों से रहित कर दिया।

श्लोक 20 (skanda.8.151.20)

एकतः सेन्द्रकैर्देवैरेकतश्च गणेश्वरैः । हन्यते दानवानीकमजा वृकशतैरिव

ekataḥ sendrakairdevairekataśca gaṇeśvaraiḥ | hanyate dānavānīkamajā vṛkaśatairiva

एक ओर से इन्द्र-सहित देवताओं द्वारा, और दूसरी ओर से गणेश्वरों द्वारा, दानव-सेना उसी प्रकार मारी जा रही थी जैसे सैकड़ों भेड़िये बकरियों के झुंड को मार डालते हैं।

श्लोक 21 (skanda.8.151.21)

वज्रोद्यतकरो देवो देवानां देवपुङ्गवः । ओङ्कार इव वेदानां तेषामासीत् पुरस्सरः

vajrodyatakaro devo devānāṁ devapuṅgavaḥ | oṅkāra iva vedānāṁ teṣāmāsīt purassaraḥ

जिसका हाथ वज्र उठाए हुए था, वह देवश्रेष्ठ इन्द्र उन देवताओं का उसी प्रकार अग्रणी बना हुआ था, जैसे ॐकार वेदों का अग्रणी है।

श्लोक 22 (skanda.8.151.22)

वज्रास्त्रपावकेनेन्द्रो ददाह समरे रिपून् । दुरितानि तु सर्वाणि प्रायश्चित्तानलो यथा

vajrāstrapāvakenendro dadāha samare ripūn | duritāni tu sarvāṇi prāyaścittānalo yathā

इन्द्र ने वज्रास्त्र की अग्नि से युद्ध में शत्रुओं को उसी प्रकार भस्म कर दिया, जैसे प्रायश्चित्त की अग्नि समस्त पापों को भस्म कर देती है।

श्लोक 23 (skanda.8.151.23)

देवैश्च प्रमथैश्चैव हन्यमाने बलेन्धकः । उवाच क्रोधरागान्धो दानवान्दानवाधिपः

devaiśca pramathaiścaiva hanyamāne balendhakaḥ | uvāca krodharāgāndho dānavāndānavādhipaḥ

जब देवताओं और प्रमथों द्वारा उसकी सेना का संहार हो रहा था, तब क्रोध और राग से अन्धे हुए दानवाधिपति अन्धक ने दानवों से कहा।

श्लोक 24 (skanda.8.151.24)

उत्पाद्य वैरं रुद्रेण सर्वलोकाभिरक्षिणा । न शक्यं प्रमथान् जेतुमनिर्विण्णैः सहामरान्

utpādya vairaṁ rudreṇa sarvalokābhirakṣiṇā | na śakyaṁ pramathān jetumanirviṇṇaiḥ sahāmarān

सम्पूर्ण लोकों के रक्षक रुद्र से वैर मोल लेकर अब बिना खेद छोड़े ही देवताओं-सहित प्रमथों को जीतना सम्भव है, इसलिए पीछे मत हटो।

श्लोक 25 (skanda.8.151.25)

मरणाच्च न भेतव्यं युध्यध्वं दैत्यदानवाः । भार्गवस्तिष्ठति ह्येष यो नः संजीवयिष्यति

maraṇācca na bhetavyaṁ yudhyadhvaṁ daityadānavāḥ | bhārgavastiṣṭhati hyeṣa yo naḥ saṁjīvayiṣyati

हे दैत्य-दानवो! मृत्यु से भयभीत मत होओ, युद्ध करो। यह भार्गव (शुक्राचार्य) यहीं उपस्थित हैं, जो हमें पुनः जीवित कर देंगे।

श्लोक 26 (skanda.8.151.26)

तत् प्राणेष्वदयन्तो वै यूयं देवगणेश्वरान् । यथाबलं यथोत्साहं वारयध्वमशङ्किताः

tat prāṇeṣvadayanto vai yūyaṁ devagaṇeśvarān | yathābalaṁ yathotsāhaṁ vārayadhvamaśaṅkitāḥ

इसलिए अपने प्राणों की चिन्ता न करते हुए तुम सब देवताओं और गणेश्वरों को अपने बल और उत्साह के अनुसार निःशंक होकर रोको।

श्लोक 27 (skanda.8.151.27)

मायाभिरेतान् बह्वीभिर्गूढाभिर्गूढरूपिणः । निवारयत युद्धेन सर्वान् देवान् समागतान्

māyābhiretān bahvībhirgūḍhābhirgūḍharūpiṇaḥ | nivārayata yuddhena sarvān devān samāgatān

हे छद्मरूपधारी दानवो! अनेक गूढ़ मायाओं के द्वारा और युद्ध के द्वारा भी इन समस्त आगत देवताओं को रोक दो।

श्लोक 28 (skanda.8.151.28)

इत्युक्ता चक्रुर्घोराणि कल्पान्ते नीरदा इव

ityuktā cakrurghorāṇi kalpānte nīradā iva

इस प्रकार आज्ञा दिए जाने पर - आगे की पंक्ति मूल पाठ में खण्डित है - उन्होंने प्रलयकाल के मेघों के समान भयंकर कर्म किए।

श्लोक 29 (skanda.8.151.29)

धनुःशब्दान् प्रकुर्वाणाः सिंहनादरवांस्तथा । दुद्रुवुर्दानवा देवानन्धकेन प्रचोदिताः

dhanuḥśabdān prakurvāṇāḥ siṁhanādaravāṁstathā | dudruvurdānavā devānandhakena pracoditāḥ

धनुष की टंकार और सिंहनाद करते हुए, अन्धक से प्रेरित होकर दानव देवताओं की ओर दौड़ पड़े।

श्लोक 30 (skanda.8.151.30)

विकृष्य तु महाचापं सागराम्बुदनर्दनम् । रुद्रमुद्दिश्य वेगेन ससारान्धकदानवः

vikṛṣya tu mahācāpaṁ sāgarāmbudanardanam | rudramuddiśya vegena sasārāndhakadānavaḥ

समुद्र-गर्जन जैसा भयंकर शब्द करने वाले महान् धनुष को खींचकर, दानव अन्धक वेगपूर्वक रुद्र की ओर दौड़ पड़ा।

श्लोक 31 (skanda.8.151.31)

तं दानवेन्द्रं दुर्वारं धावमानम् वारयामास शैलादिर्धर्मचित्तमिवाशुभम्

taṁ dānavendraṁ durvāraṁ dhāvamānam vārayāmāsa śailādirdharmacittamivāśubham

उस दुर्निवार, दौड़ते हुए दानवेन्द्र को शैलादि नन्दी ने उसी प्रकार रोक दिया, जैसे धर्मपरायण चित्त किसी अशुभ विचार को रोक देता है। आगे की एक पंक्ति मूल में खण्डित है।

श्लोक 32 (skanda.8.151.32)

स नन्दिनं त्रिभिर्बाणैर्ज्वलनादित्यसन्निभैः । निबिभेदान्धकः क्रोधाद् बाहुमध्ये निपीडयन्

sa nandinaṁ tribhirbāṇairjvalanādityasannibhaiḥ | nibibhedāndhakaḥ krodhād bāhumadhye nipīḍayan

क्रोध में भरकर अन्धक ने अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी तीन बाणों से नन्दी को उनके दोनों बाहुओं के मध्य में पीड़ा देते हुए बींध दिया।

श्लोक 33 (skanda.8.151.33)

गाढं विदारितस्तेन दानवेन गणेश्वरः । सं जुघूर्ण तदा नन्दी वायुनुन्नो यथा द्रुमः

gāḍhaṁ vidāritastena dānavena gaṇeśvaraḥ | saṁ jughūrṇa tadā nandī vāyununno yathā drumaḥ

उस दानव द्वारा गहरे रूप से घायल किए गए गणेश्वर नन्दी उसी प्रकार डगमगा उठे, जैसे वायु से हिलाया गया वृक्ष डगमगाता है।

श्लोक 34 (skanda.8.151.34)

घूर्णमानो बभौ नन्दी मृष्टकुण्डलभूषणः । चलत्पल्लवपुष्पाढ्यो यथाशोकतरुस्तथा

ghūrṇamāno babhau nandī mṛṣṭakuṇḍalabhūṣaṇaḥ | calatpallavapuṣpāḍhyo yathāśokatarustathā

अपने चमकते कुण्डलों से सुशोभित, डगमगाते हुए नन्दी उसी प्रकार शोभायमान हुए, जैसे हिलते हुए पल्लवों और फूलों से लदा अशोक वृक्ष शोभा पाता है।

श्लोक 35 (skanda.8.151.35)

ततश्चिरात्समाश्वस्य सुयशाः सुयशापतिः । वज्रमूर्जितमुत्क्षिप्य सोन्धकाय ससर्ज ह

tataścirātsamāśvasya suyaśāḥ suyaśāpatiḥ | vajramūrjitamutkṣipya sondhakāya sasarja ha

तत्पश्चात् बहुत देर बाद संभलकर सुयशस्वी नन्दी ने बलशाली वज्र उठाकर अन्धक पर छोड़ दिया।

श्लोक 36 (skanda.8.151.36)

तत्पावकरविप्रख्यं वज्रमागतमूर्जितम् । व्यष्टम्भयत बाणौघैरन्धकः प्रजहास च

tatpāvakaraviprakhyaṁ vajramāgatamūrjitam | vyaṣṭambhayata bāṇaughairandhakaḥ prajahāsa ca

अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी उस प्रबल वज्र को आते देख, अन्धक ने बाणों की झड़ी से उसे रोक दिया और अट्टहास किया।

श्लोक 37 (skanda.8.151.37)

हसतस्तस्य नेत्राभ्यां सुभ्रूभ्यामश्रुबिन्दवः । न्यस्रवन्त यथार्कस्य किरणा दीप्तमण्डलात्

hasatastasya netrābhyāṁ subhrūbhyāmaśrubindavaḥ | nyasravanta yathārkasya kiraṇā dīptamaṇḍalāt

हँसते हुए उस अन्धक की सुन्दर भौंहों वाली दोनों आँखों से आँसू की बूँदें उसी प्रकार टपकने लगीं, जैसे प्रदीप्त सूर्यमण्डल से किरणें फूट पड़ती हैं।

श्लोक 38 (skanda.8.151.38)

भूतराजस्ततोत्पाट्य द्रुमं व्याकुलपल्लवम् । हतोसि हेन्धकेत्युक्त्वा ससर्ज च जगर्ज च

bhūtarājastatotpāṭya drumaṁ vyākulapallavam | hatosi hendhaketyuktvā sasarja ca jagarja ca

तब भूतराज नन्दी ने पत्तों से लहराता हुआ एक वृक्ष उखाड़कर और 'हे अन्धक! अब तू मारा गया' ऐसा कहकर उसे छोड़ दिया और गरज उठे।

श्लोक 39 (skanda.8.151.39)

तं धावमानमाकाशे तरुमारुतवीजिताः । अनुव्रजन्ति भ्रमरा मित्रं व्यसनगं यथा

taṁ dhāvamānamākāśe tarumārutavījitāḥ | anuvrajanti bhramarā mitraṁ vyasanagaṁ yathā

आकाश में उड़ते हुए उस वृक्ष के पीछे वायु से हिलाए गए भौंरे उसी प्रकार दौड़ पड़े, जैसे संकट में पड़े मित्र के पीछे मित्र दौड़ पड़ता है।

श्लोक 40 (skanda.8.151.40)

तमप्यस्यान्धको बाणैश्चारुकाञ्चनभूषणैः । चकर्त धर्ता लोकानां दितिगर्भं यथाहिहा

tamapyasyāndhako bāṇaiścārukāñcanabhūṣaṇaiḥ | cakarta dhartā lokānāṁ ditigarbhaṁ yathāhihā

अन्धक ने सुन्दर स्वर्ण-जटित बाणों से उस वृक्ष को भी उसी प्रकार काट डाला, जैसे अहिहन्ता लोकधारिणी दिति के गर्भ को विदीर्ण कर देता है।

श्लोक 41 (skanda.8.151.41)

वृक्षे कृते ततो नन्दी समृगव्यालपन्नगम् । मन्दराग्रं समुत्पाट्य दुद्रावान्धकमाहवे

vṛkṣe kṛte tato nandī samṛgavyālapannagam | mandarāgraṁ samutpāṭya dudrāvāndhakamāhave

अपने वृक्ष के इस प्रकार कट जाने पर, नन्दी ने मृगों, सर्पों और नागों-सहित मन्दराचल के शिखर को ही उखाड़कर अन्धक की ओर युद्ध में दौड़ लगा दी।

श्लोक 42 (skanda.8.151.42)

गिरिकूटं तु तं नन्दी गिरिकूटवनालयः । अपातयद्रथे तस्य विन्ध्ये वज्रमिवाहिहा

girikūṭaṁ tu taṁ nandī girikūṭavanālayaḥ | apātayadrathe tasya vindhye vajramivāhihā

पर्वत-शिखर के वनों में निवास करने वाले नन्दी ने उस पर्वत-शिखर को अन्धक के रथ पर उसी प्रकार गिरा दिया, जैसे सर्पघाती इन्द्र विन्ध्याचल पर वज्र गिरा देते हैं।

श्लोक 43 (skanda.8.151.43)

स रथस्तेन शृङ्गेण नन्दिना दृढमाहतः । सचक्रकूबरहयः पांसुसायुज्यमागमत्

sa rathastena śṛṅgeṇa nandinā dṛḍhamāhataḥ | sacakrakūbarahayaḥ pāṁsusāyujyamāgamat

नन्दी द्वारा उस शिखर से दृढ़तापूर्वक प्रहार किया गया रथ अपने पहियों, धुरी और घोड़ों-सहित धूल में मिल गया।

श्लोक 44 (skanda.8.151.44)

ततोन्धकरथं दृष्ट्वा सचक्राक्षं विचूर्णितम् । नेदुर्देवाः सगन्धर्वाः प्रमथाश्च सगुह्यकाः

tatondhakarathaṁ dṛṣṭvā sacakrākṣaṁ vicūrṇitam | nedurdevāḥ sagandharvāḥ pramathāśca saguhyakāḥ

अन्धक के उस चूर्ण-चूर्ण हुए रथ को पहियों और धुरी-सहित देखकर, गन्धर्वों-सहित देवता तथा गुह्यकों-सहित प्रमथ हर्ष से गरज उठे।

श्लोक 45 (skanda.8.151.45)

ततोन्धकस्त्रिशूलेन नदित्वा कालमेघवत् । नन्दिनं ताडयामास गजेन्द्र इव पादपम्

tatondhakastriśūlena naditvā kālameghavat | nandinaṁ tāḍayāmāsa gajendra iva pādapam

तब अन्धक ने प्रलयकालीन मेघ के समान गर्जना करते हुए त्रिशूल से नन्दी पर वैसे ही प्रहार किया, जैसे गजराज किसी वृक्ष पर प्रहार करता है।

श्लोक 46 (skanda.8.151.46)

त्रिशूलिदयितस्तेन त्रिशूलेनाभिताडितः । नन्दी विह्वलसर्वाङ्गश्चकम्पेन्तर्जलेन्दुवत्

triśūlidayitastena triśūlenābhitāḍitaḥ | nandī vihvalasarvāṅgaścakampentarjalenduvat

त्रिशूलधारी शिव के प्रिय नन्दी उस त्रिशूल से आहत होकर, अपने सम्पूर्ण अंगों में व्याकुल होकर, जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा के समान काँप उठे।

श्लोक 47 (skanda.8.151.47)

नन्दीश्वरे घूर्णमाने प्रहारेण भृशार्दिते । असुराणां बले जज्ञे सिंहनादरवो मुहुः

nandīśvare ghūrṇamāne prahāreṇa bhṛśārdite | asurāṇāṁ bale jajñe siṁhanādaravo muhuḥ

प्रहार से अत्यन्त पीड़ित होकर डगमगाते हुए नन्दीश्वर को देख, असुरों की सेना में बार-बार सिंहनाद गूँज उठा।

श्लोक 48 (skanda.8.151.48)

सिंहनादेन शत्रूणां तेन नन्दी प्रबोधितः । परश्वधेनाभ्यहनदन्धकं भूतबान्धवः

siṁhanādena śatrūṇāṁ tena nandī prabodhitaḥ | paraśvadhenābhyahanadandhakaṁ bhūtabāndhavaḥ

शत्रुओं के उस सिंहनाद से चेत उठे भूतबान्धव नन्दी ने फरसे से अन्धक पर प्रहार किया।

श्लोक 49 (skanda.8.151.49)

परश्वधहतो रक्तं चक्षरान्धकदानवः । गजदन्ताहतो रक्तं स्वरसं चन्दनो यथा

paraśvadhahato raktaṁ cakṣarāndhakadānavaḥ | gajadantāhato raktaṁ svarasaṁ candano yathā

फरसे से आहत होकर दानव अन्धक से रक्त बहने लगा, ठीक वैसे ही जैसे हाथी के दाँत से आहत चन्दन-वृक्ष से अपना रस बहने लगता है।

श्लोक 50 (skanda.8.151.50)

अन्धकं विरथं दृष्ट्वा ररक्षुरमरद्विषः । आशास्ववस्थिता देवा यथा लोकमिमं तथा

andhakaṁ virathaṁ dṛṣṭvā rarakṣuramaradviṣaḥ | āśāsvavasthitā devā yathā lokamimaṁ tathā

अन्धक को रथहीन देखकर देवताओं के शत्रु दानव उसी प्रकार उसकी रक्षा में जुट गए, जैसे दिशाओं में स्थित लोकपाल इस लोक की रक्षा करते हैं।

श्लोक 51 (skanda.8.151.51)

अथ बाणो बलेः पुत्रो बाणपुष्पसमप्रभः । अन्धकं रथयानेन संपादयत दानवः

atha bāṇo baleḥ putro bāṇapuṣpasamaprabhaḥ | andhakaṁ rathayānena saṁpādayata dānavaḥ

तब बलि-पुत्र बाण, जिसकी कान्ति बाणपुष्प के समान थी, उस दानव ने अन्धक को एक रथ पर आरूढ़ करा दिया।

श्लोक 52 (skanda.8.151.52)

स तं रथं दानवेन्द्र आरुरोह तदान्धकः । यथोदयं तु भगवान् दिनकृत् पूर्णमण्डलः

sa taṁ rathaṁ dānavendra āruroha tadāndhakaḥ | yathodayaṁ tu bhagavān dinakṛt pūrṇamaṇḍalaḥ

तब वह दानवेन्द्र अन्धक उस रथ पर उसी प्रकार आरूढ़ हुआ, जैसे उदयाचल पर पूर्ण मण्डलवाले भगवान् सूर्य आरूढ़ होते हैं।

श्लोक 53 (skanda.8.151.53)

ततः पुनर्युज्यत देवदानवैः प्रकर्तुकामैः कलहं सुदारुणम् । त्रिशूलवज्राशनिःसायकै रणे प्रधूपितोग्निर्ज्वलितस्तरां बभौ

tataḥ punaryujyata devadānavaiḥ prakartukāmaiḥ kalahaṁ sudāruṇam | triśūlavajrāśaniḥsāyakai raṇe pradhūpitognirjvalitastarāṁ babhau

फिर घोर संग्राम करने के इच्छुक देवताओं और दानवों में पुनः अत्यन्त भयंकर संघर्ष जुड़ गया, और त्रिशूल, वज्र, वज्राग्नि तथा बाणों से रणभूमि धधकती हुई अग्नि के समान अत्यन्त प्रज्वलित हो उठी।

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