अम्बिका खण्ड · अध्याय 152
अन्धक युद्ध
श्लोक 1 (skanda.8.152.1)
सनत्कुमार उवाच । विष्णुं मर्द्यमानं तु दानवान् दानवार्दनम् । जम्भोम्बुद इवारावं कृत्वा दुद्राव दानवः
sanatkumāra uvāca | viṣṇuṁ mardyamānaṁ tu dānavān dānavārdanam | jambhombuda ivārāvaṁ kṛtvā dudrāva dānavaḥ
सनत्कुमार ने कहा - तब जम्भ नामक दानव मेघ के समान गर्जन करते हुए, दानवों का संहार करते विष्णु की ओर दौड़ पड़ा।
श्लोक 2 (skanda.8.152.2)
तमापतन्तं दृष्ट्वा तु जम्भमम्बुदनिस्वनम् । न स संविविजे देवः सिंहो दृष्ट्वेव कुञ्जरम्
tamāpatantaṁ dṛṣṭvā tu jambhamambudanisvanam | na sa saṁvivije devaḥ siṁho dṛṣṭveva kuñjaram
मेघ-गर्जन के समान गरजते हुए उस आक्रमणकारी जम्भ को देखकर भी वह देव विचलित नहीं हुए, जैसे सिंह हाथी को देखकर विचलित नहीं होता।
श्लोक 3 (skanda.8.152.3)
कुजम्भश्चैव जम्भश्च यवीयान दानवाचलः । अनन्तमन्तं शत्रूणामाववार ररास च
kujambhaścaiva jambhaśca yavīyāna dānavācalaḥ | anantamantaṁ śatrūṇāmāvavāra rarāsa ca
कुजम्भ और जम्भ, तथा दानव-पर्वत के समान उनका छोटा भाई, शत्रुओं का अन्त करने वाले अनन्त को रोककर गरज उठे।
श्लोक 4 (skanda.8.152.4)
वृत्रोञ्जनगिरिप्रख्यः संवर्त्तकनिकाशदृक् । जिघृक्षुरभ्यगादिन्द्रं नदमानः पयोदवत्
vṛtroñjanagiriprakhyaḥ saṁvarttakanikāśadṛk | jighṛkṣurabhyagādindraṁ nadamānaḥ payodavat
अंजनगिरि के समान श्याम वृत्र, प्रलयकालीन अग्नि जैसी दृष्टि वाला, मेघ के समान गरजता हुआ, इन्द्र को पकड़ने की इच्छा से उनकी ओर बढ़ा।
श्लोक 5 (skanda.8.152.5)
तं धावन्तं नदन्तं च दानवं शतलोचनः । कुहरे गिरीसंकाश माजघान पुरन्दरः
taṁ dhāvantaṁ nadantaṁ ca dānavaṁ śatalocanaḥ | kuhare girīsaṁkāśa mājaghāna purandaraḥ
उस दौड़ते और गरजते हुए, पर्वत के समान विशाल दानव को शतलोचन पुरन्दर ने कण्ठ-गुहा में प्रहार किया।
श्लोक 6 (skanda.8.152.6)
भावयत्यो गदायोधी शतायुं वायुमाहवे । योद्धुकामोभ्ययात्तूर्णं जगर्ज च जहास च
bhāvayatyo gadāyodhī śatāyuṁ vāyumāhave | yoddhukāmobhyayāttūrṇaṁ jagarja ca jahāsa ca
गदा से युद्ध करने वाला शतायु युद्ध की इच्छा से वायु की ओर वेगपूर्वक बढ़ा, गरजता और हँसता हुआ।
श्लोक 7 (skanda.8.152.7)
तुहुण्डहुण्डावश्विभ्यामयुध्येतां महासुरौ । प्रह्लादेन भगस्सार्धमंशेन च विरोचनः
tuhuṇḍahuṇḍāvaśvibhyāmayudhyetāṁ mahāsurau | prahlādena bhagassārdhamaṁśena ca virocanaḥ
तुहुण्ड और हुण्ड नामक दोनों महासुर अश्विनीकुमारों से युद्ध करने लगे, तथा भग प्रह्लाद से और अंश विरोचन से भिड़ गए।
श्लोक 8 (skanda.8.152.8)
अर्यमाणं यमञ्चैव युद्धेतां विल्वकेल्वलौ । विप्रचित्तिमुखा ये च बलिष्वग्रा महासुराः
aryamāṇaṁ yamañcaiva yuddhetāṁ vilvakelvalau | vipracittimukhā ye ca baliṣvagrā mahāsurāḥ
विल्वक और केल्वल नामक दैत्य अर्यमा और यम से युद्ध करने लगे, तथा विप्रचित्ति आदि जो बलि की सेना के अग्रणी महासुर थे, वे भी युद्धरत हुए।
श्लोक 9 (skanda.8.152.9)
गणेश्वरांस्ते देवांश्च अयुध्यन्त सहस्रशः । अन्धकस्तु समागम्य नन्दिनं दानवर्षभः
gaṇeśvarāṁste devāṁśca ayudhyanta sahasraśaḥ | andhakastu samāgamya nandinaṁ dānavarṣabhaḥ
वे हज़ारों की संख्या में गणेश्वरों और देवताओं से युद्ध करने लगे। इधर दानवश्रेष्ठ अन्धक नन्दी के पास आ पहुँचा।
श्लोक 10 (skanda.8.152.10)
ततक्षे वत्सरदनैः शरैः कार्मुकनिःसृतैः । सोन्धकेन दृढं विद्धः शरैर्मर्मविदारणैः
tatakṣe vatsaradanaiḥ śaraiḥ kārmukaniḥsṛtaiḥ | sondhakena dṛḍhaṁ viddhaḥ śarairmarmavidāraṇaiḥ
बछड़े के दाँत के समान तीक्ष्ण, धनुष से छूटे बाणों से उसने उसे बींध डाला, और वह स्वयं अन्धक के मर्मभेदी बाणों से दृढ़तापूर्वक बिंध गया।
श्लोक 11 (skanda.8.152.11)
चुकोप नन्दी क्रुद्धश्च ससारान्धकमहाहवे । सवज्रमुद्यम्य करं दिवाकरकरप्रभम्
cukopa nandī kruddhaśca sasārāndhakamahāhave | savajramudyamya karaṁ divākarakaraprabham
नन्दी क्रुद्ध होकर कुपित हो उठे और सूर्य-किरण के समान तेजस्वी वज्र-सहित हाथ उठाकर अन्धक के महासमर की ओर दौड़ पड़े।
श्लोक 12 (skanda.8.152.12)
ररास नन्दी संरब्धः पयोद इव संक्षये । वज्रेण शतधारेण सोन्धकस्य गणेश्वरः
rarāsa nandī saṁrabdhaḥ payoda iva saṁkṣaye | vajreṇa śatadhāreṇa sondhakasya gaṇeśvaraḥ
क्रोध से भरे हुए वह गणेश्वर नन्दी प्रलयकालीन मेघ के समान गरजे और शतधार वज्र से अन्धक पर प्रहार किया।
श्लोक 13 (skanda.8.152.13)
चूर्णयामास तुरगान्नियन्तारं रथं तथा । ततोन्धकं कर्णमूले कुण्डलालकशोभिते
cūrṇayāmāsa turagānniyantāraṁ rathaṁ tathā | tatondhakaṁ karṇamūle kuṇḍalālakaśobhite
उसने उसके घोड़ों, सारथी और रथ को चूर-चूर कर दिया, फिर कुण्डल और अलकों से सुशोभित अन्धक के कर्णमूल पर प्रहार किया।
श्लोक 14 (skanda.8.152.14)
आजघान घनारावो वरदश्चारुकुण्डलः । तेनाप्यपावृत्य हस्तो हस्तिहस्तनिभस्ततः
ājaghāna ghanārāvo varadaścārukuṇḍalaḥ | tenāpyapāvṛtya hasto hastihastanibhastataḥ
मेघ-गर्जन जैसी वाणी वाले, वरदायक, सुन्दर कुण्डलधारी नन्दी ने उस पर प्रहार किया, जिससे हाथी की सूँड़ के समान विशाल उसका हाथ मुड़ गया।
श्लोक 15 (skanda.8.152.15)
पातितो नन्दिनः क्रोडे कुञ्जरेणेव संयुगे । अपहस्ताहतस्तेन दानवेन गणेश्वरः
pātito nandinaḥ kroḍe kuñjareṇeva saṁyuge | apahastāhatastena dānavena gaṇeśvaraḥ
युद्ध में जैसे दो गजराज टकराते हैं, वैसे ही अन्धक नन्दी की भुजाओं में जा गिरा; परन्तु उस दानव के थप्पड़ से आहत होकर गणेश्वर नन्दी भी लड़खड़ा गए।
श्लोक 16 (skanda.8.152.16)
अपासर्पत् पदान्यष्टौ तान्येवापतितः पुनः । साधु साध्विति वै दैत्यास्ततो ह्यन्धकमब्रुवन्
apāsarpat padānyaṣṭau tānyevāpatitaḥ punaḥ | sādhu sādhviti vai daityāstato hyandhakamabruvan
वह आठ कदम पीछे हट गया, फिर वहीं पुनः आ गिरा। तब दैत्यों ने अन्धक से 'साधु! साधु!' कहा।
श्लोक 17 (skanda.8.152.17)
स तेन सुप्रहारेण दानवं प्रति रोषितः । क्रोधमाहारयन्तीव्रमभिदुद्राव चैव हि
sa tena suprahāreṇa dānavaṁ prati roṣitaḥ | krodhamāhārayantīvramabhidudrāva caiva hi
उस सुदृढ़ प्रहार से क्रुद्ध होकर नन्दी ने उस दानव के प्रति तीव्र क्रोध धारण करते हुए उस पर आक्रमण कर दिया।
श्लोक 18 (skanda.8.152.18)
तस्य गत्वा धनुश्चित्रं कवचं च महाप्रभम् । वज्रेण शतधारेण खण्डशः प्रचकार ह
tasya gatvā dhanuścitraṁ kavacaṁ ca mahāprabham | vajreṇa śatadhāreṇa khaṇḍaśaḥ pracakāra ha
उसके पास पहुँचकर नन्दी ने उसके सुन्दर धनुष और महातेजस्वी कवच को शतधार वज्र से टुकड़े-टुकड़े कर दिया।
श्लोक 19 (skanda.8.152.19)
बाहुपाशेन चैवैनं बद्ध्वा भूतपतिः स्वयम् । इयेष भूमौ निष्पेष्टुमन्धकश्चावमोचयत्
bāhupāśena caivainaṁ baddhvā bhūtapatiḥ svayam | iyeṣa bhūmau niṣpeṣṭumandhakaścāvamocayat
भूतपति नन्दी ने स्वयं उसे भुजाओं के पाश से बाँधकर भूमि पर पटक कर कुचल डालने की इच्छा की, किन्तु अन्धक ने स्वयं को छुड़ा लिया।
श्लोक 20 (skanda.8.152.20)
स मोचयित्वा ह्यात्मानं मायामास्थाय मोहनीम् । अभिदुद्राव शैलादिं तिष्ठतिष्ठेति चोचिवान्
sa mocayitvā hyātmānaṁ māyāmāsthāya mohanīm | abhidudrāva śailādiṁ tiṣṭhatiṣṭheti cocivān
स्वयं को मुक्त कर, मोहिनी माया का सहारा लेकर, वह शैलादि नन्दी पर टूट पड़ा और 'ठहरो, ठहरो' ऐसा कहता रहा।
श्लोक 21 (skanda.8.152.21)
तमापतन्तं वेगेन गणेश्वरमहत्तराः । सर्वे संक्रुद्धमनसो विविधायुधपाणयः
tamāpatantaṁ vegena gaṇeśvaramahattarāḥ | sarve saṁkruddhamanaso vividhāyudhapāṇayaḥ
उस वेगपूर्वक आक्रमण करते हुए अन्धक पर, अनेक प्रकार के शस्त्र हाथों में लिए, क्रुद्ध मन वाले वे सभी गणेश्वरों में श्रेष्ठ आ पहुँचे।
श्लोक 22 (skanda.8.152.22)
नन्दिषेणः सोमनन्दी शंकुकर्णो महोदरः । घण्टाकर्णो वीरभद्रः स च देवः प्रभामयः
nandiṣeṇaḥ somanandī śaṁkukarṇo mahodaraḥ | ghaṇṭākarṇo vīrabhadraḥ sa ca devaḥ prabhāmayaḥ
नन्दिषेण, सोमनन्दी, शंकुकर्ण, महोदर, घण्टाकर्ण, वीरभद्र और तेजोमय देव प्रभामय -
श्लोक 23 (skanda.8.152.23)
भर्त्तारमभिरक्षन्तस्तेषां पारिषदाग्रगाः । अन्धकं योधयन्ति स्म सिंहाः शक्रगजं यथा
bharttāramabhirakṣantasteṣāṁ pāriṣadāgragāḥ | andhakaṁ yodhayanti sma siṁhāḥ śakragajaṁ yathā
अपने स्वामी की रक्षा करते हुए उनके अग्रणी पार्षद उसी प्रकार अन्धक से युद्ध करने लगे, जैसे सिंह ऐरावत गजराज से युद्ध करते हैं।
श्लोक 24 (skanda.8.152.24)
तं नन्दिषेणः शूलेन सोमनन्दी च मुष्टिना । शरेण वीरभद्रश्च घण्टाकर्णोसिनापि च
taṁ nandiṣeṇaḥ śūlena somanandī ca muṣṭinā | śareṇa vīrabhadraśca ghaṇṭākarṇosināpi ca
उस पर नन्दिषेण ने शूल से, सोमनन्दी ने मुष्टि से, वीरभद्र ने बाण से, और घण्टाकर्ण ने तलवार से प्रहार किया।
श्लोक 25 (skanda.8.152.25)
शङ्कुकर्णो चलाग्रेण पादपेन प्रभामयः । अन्धकं चिच्छिदुर्देवा द्रमिडा इव चन्दनम्
śaṅkukarṇo calāgreṇa pādapena prabhāmayaḥ | andhakaṁ cicchidurdevā dramiḍā iva candanam
शंकुकर्ण ने पर्वत-शिखर से और प्रभामय ने एक वृक्ष से - इस प्रकार उन देवताओं ने अन्धक को उसी प्रकार छिन्न-भिन्न कर डाला, जैसे द्रविड़ लोग चन्दन-वृक्ष को काट डालते हैं।
श्लोक 26 (skanda.8.152.26)
नन्दीश्वरस्तु गणपो गणपैर्विमुखीकृतम् । आजघानोत्तमाङ्गे तु अन्धकं दानवाधिपम्
nandīśvarastu gaṇapo gaṇapairvimukhīkṛtam | ājaghānottamāṅge tu andhakaṁ dānavādhipam
तब गणपति नन्दीश्वर ने, गणों द्वारा विमुख किए गए दानवाधिपति अन्धक के मस्तक पर प्रहार किया।
श्लोक 27 (skanda.8.152.27)
दृष्ट्वासुरपतिं देवैर्गणपैः समभिद्रुतम् । असुराणां बले जज्ञे धाव गृह्णेति निस्वनः
dṛṣṭvāsurapatiṁ devairgaṇapaiḥ samabhidrutam | asurāṇāṁ bale jajñe dhāva gṛhṇeti nisvanaḥ
देवताओं और गणपतियों द्वारा घेरे गए असुरपति को देखकर असुरों की सेना में 'दौड़ो, पकड़ लो' की पुकार गूँज उठी।
श्लोक 28 (skanda.8.152.28)
ततोसुराः समाजग्मुः प्रह्लादप्रमुखा द्रुतम् । तान्युद्धायागतानेको विष्णुः सर्वानदीधरत्
tatosurāḥ samājagmuḥ prahlādapramukhā drutam | tānyuddhāyāgatāneko viṣṇuḥ sarvānadīdharat
तब प्रह्लाद आदि असुर शीघ्रता से वहाँ आ पहुँचे, किन्तु युद्ध के लिए आए उन सबको अकेले विष्णु ने रोक लिया।
श्लोक 29 (skanda.8.152.29)
चक्रहस्तं तु दृष्ट्वैवं विक्रान्तं रणमूर्धनि । चकार सुमहद्वेगमन्धकः क्रोधमूर्च्छितः
cakrahastaṁ tu dṛṣṭvaivaṁ vikrāntaṁ raṇamūrdhani | cakāra sumahadvegamandhakaḥ krodhamūrcchitaḥ
चक्रधारी विष्णु को रणभूमि में इस प्रकार पराक्रम करते देख, क्रोध से मूर्च्छित-सा अन्धक अत्यन्त वेगपूर्वक झपटा।
श्लोक 30 (skanda.8.152.30)
व्यायच्छमानं निश्चेष्टं प्रधावन्तं प्रगर्जितम् । यं यतः पश्यतेसौ वै तंतं विव्याध सायकैः
vyāyacchamānaṁ niśceṣṭaṁ pradhāvantaṁ pragarjitam | yaṁ yataḥ paśyatesau vai taṁtaṁ vivyādha sāyakaiḥ
जो भी उसे संघर्षरत, स्तब्ध, दौड़ता हुआ या गरजता हुआ दिखाई देता, उसी को वह अपने बाणों से बींध देता था।
श्लोक 31 (skanda.8.152.31)
पृथवः पीतनिशिता गरुडाङ्गरुहन्धराः । अन्धकस्य शरा घोराश्च्यवन्ते धनुषोक्षयाः
pṛthavaḥ pītaniśitā garuḍāṅgaruhandharāḥ | andhakasya śarā ghorāścyavante dhanuṣokṣayāḥ
गरुड़-पंखों से युक्त, पीले रंग के तीक्ष्ण, चौड़े फलक वाले अन्धक के भयंकर बाण उसके अक्षय धनुष से अनवरत छूटते रहे।
श्लोक 32 (skanda.8.152.32)
मुखेषु दन्तवेष्टेषु उदरेषु करेषु च । अन्धकेन गजा विद्धास्त्यजन्त्यतिमदा मदम्
mukheṣu dantaveṣṭeṣu udareṣu kareṣu ca | andhakena gajā viddhāstyajantyatimadā madam
मुख में, दाँतों के आसपास, पेट में और सूँड़ में अन्धक के बाणों से बिंधे हुए अत्यन्त मतवाले हाथी अपना मद त्याग रहे थे।
श्लोक 33 (skanda.8.152.33)
अन्ये श्रयन्ति देवेशमन्ये चेन्द्रं सुराधिपम् । देवं नारायणं चान्ये नन्दिनं चापरे गणाः
anye śrayanti deveśamanye cendraṁ surādhipam | devaṁ nārāyaṇaṁ cānye nandinaṁ cāpare gaṇāḥ
कुछ गण देवेश की शरण में गए, कुछ देवाधिप इन्द्र की, कुछ भगवान् नारायण की, और कुछ नन्दी की शरण में गए।
श्लोक 34 (skanda.8.152.34)
अन्ये शाखं विशाखं च कुमारमपि चापरे । व्यपाश्रित्य स्थिता देवाः शकुन्ता इव पादपान्
anye śākhaṁ viśākhaṁ ca kumāramapi cāpare | vyapāśritya sthitā devāḥ śakuntā iva pādapān
अन्य देवता शाख, विशाख और कार्तिकेय की शरण लेकर उसी प्रकार खड़े रहे, जैसे पक्षी वृक्षों की शरण लेते हैं।
श्लोक 35 (skanda.8.152.35)
यथाशनिभयान्मर्त्या यथा सिंहभयान्मृगाः । यथा च गरुडान्नित्यं भुजगा भुजगाशिनः
yathāśanibhayānmartyā yathā siṁhabhayānmṛgāḥ | yathā ca garuḍānnityaṁ bhujagā bhujagāśinaḥ
जैसे मनुष्य वज्र के भय से, जैसे मृग सिंह के भय से, और जैसे सर्प सदा सर्पभक्षी गरुड़ के भय से भागते हैं -
श्लोक 36 (skanda.8.152.36)
तथान्धकस्य युद्धस्था देवा दैवतवैरिणः । वित्रेसुः शरजालार्त्ता मूढा इव च बभ्रमुः
tathāndhakasya yuddhasthā devā daivatavairiṇaḥ | vitresuḥ śarajālārttā mūḍhā iva ca babhramuḥ
उसी प्रकार युद्ध में डटे हुए, देवताओं के शत्रु अन्धक से भयभीत होकर, बाणजाल से पीड़ित देवता मोहग्रस्त-से भटकने लगे।
श्लोक 37 (skanda.8.152.37)
बन्धुजीववनं यद्वद् भ्राजते पुष्पसन्नतम् । तथा व्रणजसिक्ताङ्गं तद् बभौ पार्षदं बलम्
bandhujīvavanaṁ yadvad bhrājate puṣpasannatam | tathā vraṇajasiktāṅgaṁ tad babhau pārṣadaṁ balam
जैसे बन्धुजीव वृक्षों का वन फूलों के भार से झुका हुआ शोभित होता है, वैसे ही घावों से सिंचे अंगों वाली वह पार्षद-सेना शोभा पा रही थी।
श्लोक 38 (skanda.8.152.38)
कम्पन्ते पादपा यद्वत् काननेष्वनिलेरिताः । तथान्धकभयाद्देवाः सन्त्रस्ता रणमूर्धनि
kampante pādapā yadvat kānaneṣvanileritāḥ | tathāndhakabhayāddevāḥ santrastā raṇamūrdhani
जैसे वन में वृक्ष वायु से हिलते हैं, वैसे ही अन्धक के भय से देवता रणभूमि में काँप उठे।
श्लोक 39 (skanda.8.152.39)
ततो नारायणोनन्त ऊर्जितः शक्र एव च । अश्विनौ वसवश्चाष्टावादित्या द्वादशैव तु
tato nārāyaṇonanta ūrjitaḥ śakra eva ca | aśvinau vasavaścāṣṭāvādityā dvādaśaiva tu
तब बलशाली नारायण, अनन्त, तथा इन्द्र, दोनों अश्विनीकुमार, आठों वसु और बारहों आदित्य -
श्लोक 40 (skanda.8.152.40)
नन्दी विशाखः शाखश्च वीरभद्रः प्रभामयः । विट्पतिः शंकुकर्णश्च सोमनन्दी विनायकः
nandī viśākhaḥ śākhaśca vīrabhadraḥ prabhāmayaḥ | viṭpatiḥ śaṁkukarṇaśca somanandī vināyakaḥ
नन्दी, विशाख, शाख, वीरभद्र, प्रभामय, विट्पति, शंकुकर्ण, सोमनन्दी और विनायक -
श्लोक 41 (skanda.8.152.41)
एते बले हन्यमाने अन्धकेन बलोर्मिभिः । दुद्रुवुस्सायुधा देवास्तं दानवगणाधिपम्
ete bale hanyamāne andhakena balormibhiḥ | dudruvussāyudhā devāstaṁ dānavagaṇādhipam
जब अन्धक की सेना की लहरों से यह सेना नष्ट होने लगी, तब ये शस्त्रधारी देवता उस दानव-गणों के अधिपति की ओर दौड़ पड़े।
श्लोक 42 (skanda.8.152.42)
गन्धर्वभवनाकारं तं तस्य रथसत्तमम् । परिवार्य बभंजुस्ते जगर्जुश्च पयोदवत्
gandharvabhavanākāraṁ taṁ tasya rathasattamam | parivārya babhaṁjuste jagarjuśca payodavat
गन्धर्व-नगर के समान उसके उस श्रेष्ठ रथ को घेरकर उन्होंने तोड़ डाला, और मेघ के समान गरज उठे।
श्लोक 43 (skanda.8.152.43)
भज्यमानः सुरैरासीदन्धकस्य महारथः । अधर्मे प्रकृतो यद्वद् विघ्नैरिव मनोरथः
bhajyamānaḥ surairāsīdandhakasya mahārathaḥ | adharme prakṛto yadvad vighnairiva manorathaḥ
देवताओं द्वारा तोड़ा जाता हुआ अन्धक का वह महारथ उसी प्रकार दिखाई दिया, जैसे अधर्म में लगे मनोरथ को विघ्न तोड़ डालते हैं।
श्लोक 44 (skanda.8.152.44)
चक्रायुधं स चक्रेण शक्रं वज्रेण दानवः । अनन्तमिषुणैकेन शूलेन च विनायकम्
cakrāyudhaṁ sa cakreṇa śakraṁ vajreṇa dānavaḥ | anantamiṣuṇaikena śūlena ca vināyakam
उस दानव ने चक्रधारी विष्णु को चक्र से, इन्द्र को वज्र से, अनन्त को एक ही बाण से, और विनायक को शूल से प्रहार किया।
श्लोक 45 (skanda.8.152.45)
मुष्टिना नन्दिनं चैव पट्टिशेन प्रभामयम् । भल्लेन चैव पूषाणं गदया यममेव च
muṣṭinā nandinaṁ caiva paṭṭiśena prabhāmayam | bhallena caiva pūṣāṇaṁ gadayā yamameva ca
नन्दी को मुष्टि से, प्रभामय को पट्टिश से, पूषा को भल्ल से, और यम को गदा से प्रहार किया।
श्लोक 46 (skanda.8.152.46)
आहत्य वैरिणस्तूर्णं सर्वानेव रणेन्धकः । उत्पत्य चानदद् व्योम्नि जलमत्त इवाम्बुदः
āhatya vairiṇastūrṇaṁ sarvāneva raṇendhakaḥ | utpatya cānadad vyomni jalamatta ivāmbudaḥ
इस प्रकार युद्ध में समस्त शत्रुओं पर तुरन्त प्रहार कर, अन्धक आकाश में उछलकर, जलमत्त मेघ के समान गरज उठा।
श्लोक 47 (skanda.8.152.47)
स कूटयोधी कूटानि गिरीणां गिरिसन्निभः । सवृक्षक्षुपसर्पाणि ससर्ज च जगर्ज च
sa kūṭayodhī kūṭāni girīṇāṁ girisannibhaḥ | savṛkṣakṣupasarpāṇi sasarja ca jagarja ca
पर्वत के समान विशाल, कूट-युद्ध में निपुण वह अपनी माया से पर्वत-शिखरों को वृक्षों, झाड़ियों और सर्पों-सहित उत्पन्न कर छोड़ने लगा और गरजने लगा।
श्लोक 48 (skanda.8.152.48)
गिर्यग्रवर्षं तद् घोरं सवृक्षर्क्षमहोरगम् । पपात देवसैन्येषु शीतमम्बुरुहेष्विव
giryagravarṣaṁ tad ghoraṁ savṛkṣarkṣamahoragam | papāta devasainyeṣu śītamamburuheṣviva
वह भयंकर पर्वत-शिखरों की वर्षा, वृक्षों, भालुओं और महासर्पों-सहित, देवसेना पर उसी प्रकार गिरी, जैसे शीतल ओले कमलों के वन पर गिरते हैं।
श्लोक 49 (skanda.8.152.49)
अविराममविश्रामं निरुच्छ्वासं भयाकुलम्
avirāmamaviśrāmaṁ nirucchvāsaṁ bhayākulam
निरन्तर, विश्रामरहित, साँस रोक देने वाला, भय से व्याकुल - इस वर्णन के आगे की पंक्ति मूल पाठ में खण्डित है और उपलब्ध नहीं है।
श्लोक 50 (skanda.8.152.50)
छिन्ननासाक्षिदन्तौष्ठा भग्नपादकटीकराः । उत्त्रस्तोद्भ्रान्तचकिता दृश्यन्ते प्रमथामराः
chinnanāsākṣidantauṣṭhā bhagnapādakaṭīkarāḥ | uttrastodbhrāntacakitā dṛśyante pramathāmarāḥ
जिनकी नाक, आँखें, दाँत और होंठ कट गए थे, जिनके पैर, कमर और हाथ टूट गए थे - ऐसे भयभीत, भ्रमित, चकित प्रमथ और अमर दिखाई देने लगे।
श्लोक 51 (skanda.8.152.51)
सौधाग्रशृङ्गोपलशस्त्रवर्षी मुहुः सृजन्भात्यसुरोम्बरस्थः
saudhāgraśṛṅgopalaśastravarṣī muhuḥ sṛjanbhātyasurombarasthaḥ
मंदिरों के शिखरों, पत्थरों और शस्त्रों की वर्षा बार-बार करता हुआ, आकाश में स्थित वह असुर उसी प्रकार सुशोभित हो रहा था - इसके आगे की पंक्ति मूल पाठ में खण्डित है।
श्लोक 52 (skanda.8.152.52)
अब्जं महद्धूमलावृतञ्च खद्योततुल्यं च महाग्निचूर्णम्
abjaṁ mahaddhūmalāvṛtañca khadyotatulyaṁ ca mahāgnicūrṇam
इस श्लोक के आरम्भ की पंक्ति मूल में खण्डित है - वह धुएँ से आच्छादित विशाल कमल-जैसा तथा जुगनू के समान महाअग्नि-चूर्ण भी बरसा रहा था।
श्लोक 53 (skanda.8.152.53)
सोप्यायितोद्वृत्तसमुद्रनादो नभोगतो दैवतसंघवैरी । मुहुः सृजत्येव महाम्बुवर्षं यथान्तकालेम्बुमुगुग्रवर्षम्
sopyāyitodvṛttasamudranādo nabhogato daivatasaṁghavairī | muhuḥ sṛjatyeva mahāmbuvarṣaṁ yathāntakālembumugugravarṣam
देवसंघों का वह शत्रु, आकाश में स्थित, प्रचण्ड समुद्र-गर्जन के समान गरजता हुआ, बार-बार महाजल की वर्षा उसी प्रकार बरसाता रहा, जैसे प्रलयकाल में मेघ भयंकर जलवर्षा करते हैं।