अम्बिका खण्ड · अध्याय 153
युद्धभूमि-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.8.153.1)
सनत्कुमार उवाच । ततोन्धको वियत्स्थितो महाम्बुदौघसन्निभः । विरज्य वर्षमौपलं यथैव वर्षमम्बुदः
sanatkumāra uvāca | tatondhako viyatsthito mahāmbudaughasannibhaḥ | virajya varṣamaupalaṁ yathaiva varṣamambudaḥ
सनत्कुमार ने कहा - तब आकाश में स्थित, विशाल मेघसमूह के समान अन्धक ने उसी प्रकार पत्थरों की वर्षा बरसाई, जैसे मेघ जलवृष्टि करता है।
श्लोक 2 (skanda.8.153.2)
पुनः प्रगृह्य कार्मुकं महेन्द्रकार्मुकोपमम् । मुमोच बाणदुर्दिनं बभूव चातिदुर्दिनम्
punaḥ pragṛhya kārmukaṁ mahendrakārmukopamam | mumoca bāṇadurdinaṁ babhūva cātidurdinam
फिर इन्द्रधनुष के समान अपना धनुष उठाकर उसने बाणों की घनघोर वर्षा छोड़ी, और चारों ओर अत्यन्त दुर्दिन-सा वातावरण छा गया।
श्लोक 3 (skanda.8.153.3)
ततः सुपर्णपुंखिनां सुपर्णपत्रपत्रिणाम् । सुपर्णतुल्यपातिनां सुपर्णतुङ्गतुण्डिनाम्
tataḥ suparṇapuṁkhināṁ suparṇapatrapatriṇām | suparṇatulyapātināṁ suparṇatuṅgatuṇḍinām
फिर सुवर्ण-पंख वाले, सुवर्ण-पत्र से युक्त पंखों वाले, गरुड़ के समान वेग से गिरने वाले, गरुड़ की चोंच के समान ऊँची नोक वाले -
श्लोक 4 (skanda.8.153.4)
शतं शरीरभेदिनां शरीरसारभोजिनाम् । ससर्ज दानवाधिपो जगर्ज चापि दर्पितः
śataṁ śarīrabhedināṁ śarīrasārabhojinām | sasarja dānavādhipo jagarja cāpi darpitaḥ
शरीर को बींध डालने वाले तथा शरीर के सार को भक्षण करने वाले सौ बाण उस दानवाधिपति ने छोड़े, और अभिमानपूर्वक गरज उठा।
श्लोक 5 (skanda.8.153.5)
धनुः प्रपूरितेरिता रणप्रचारितैवृताः । स्वमार्गयानदेशिका जवे मनोनिलोपमाः
dhanuḥ prapūriteritā raṇapracāritaivṛtāḥ | svamārgayānadeśikā jave manonilopamāḥ
धनुष से पूरी शक्ति से छोड़े गए, युद्ध में सर्वत्र संचरित वे बाण अपने ही मार्ग के मार्गदर्शक बने, मन और वायु के समान वेगवान् थे।
श्लोक 6 (skanda.8.153.6)
महेषवोन्धकस्य ते पतन्ति देवतोपरि । यथा दिवाकरेरिताः करा महाचलेष्विव
maheṣavondhakasya te patanti devatopari | yathā divākareritāḥ karā mahācaleṣviva
अन्धक के वे महान् बाण देवताओं के ऊपर उसी प्रकार गिरते थे, जैसे सूर्य की किरणें महापर्वतों के ऊपर पड़ती हैं।
श्लोक 7 (skanda.8.153.7)
शराहताश्च कुञ्जराः शराहताश्च वाजिनः । शराहताश्च देवता गणेश्वराश्च सर्वतः
śarāhatāśca kuñjarāḥ śarāhatāśca vājinaḥ | śarāhatāśca devatā gaṇeśvarāśca sarvataḥ
बाणों से आहत हाथी, बाणों से आहत घोड़े, तथा बाणों से आहत देवता और गणेश्वर - सब कुछ चारों ओर बिखर गया।
श्लोक 8 (skanda.8.153.8)
विनिर्गतान्त्रशेणिता विकीर्णहारभूषणाः । विमुक्तकेशबन्धनाः पतन्ति गाढवेदनाः
vinirgatāntraśeṇitā vikīrṇahārabhūṣaṇāḥ | vimuktakeśabandhanāḥ patanti gāḍhavedanāḥ
जिनकी अंतड़ियाँ बाहर निकल आई थीं, जिनके हार और आभूषण बिखर गए थे, जिनके केश-बन्धन खुल गए थे - ऐसे प्राणी अत्यन्त पीड़ा से गिरते जा रहे थे।
श्लोक 9 (skanda.8.153.9)
स्थितं चलन्तमुत्थितं प्रधावितं प्रवल्गितम् । हयं गजं सुरं यथा प्रपश्यते हि यं यतः
sthitaṁ calantamutthitaṁ pradhāvitaṁ pravalgitam | hayaṁ gajaṁ suraṁ yathā prapaśyate hi yaṁ yataḥ
खड़ा हुआ, चलता हुआ, उठता हुआ, दौड़ता हुआ या उछलता हुआ - जो भी घोड़ा, हाथी या देवता जहाँ कहीं भी उसे दिखाई देता -
श्लोक 10 (skanda.8.153.10)
तमन्धकस्तदा रिपुं शरैस्तमोरिविग्रहैः । बलान्निपात्य नर्द्दते जलागमे यथाम्बुदः
tamandhakastadā ripuṁ śaraistamorivigrahaiḥ | balānnipātya narddate jalāgame yathāmbudaḥ
उस शत्रु को अन्धक अंधकार-नाशक तेजस्वी बाणों से बलपूर्वक गिराकर, वर्षाकाल के मेघ के समान गरज उठता था।
श्लोक 11 (skanda.8.153.11)
व्रणार्त्तमुक्तनिस्वनं समुद्भ्रमत्तुरङ्गमम् । बलं नदीनवद्बभौ प्रशान्ततूर्यनिस्वनम्
vraṇārttamuktanisvanaṁ samudbhramatturaṅgamam | balaṁ nadīnavadbabhau praśāntatūryanisvanam
घावों से पीड़ित होकर चीत्कार करते हुए, इधर-उधर भागते घोड़ों वाली वह सेना, जिसकी तुरही-ध्वनियाँ शान्त हो चुकी थीं, मानो एक नदी के समान दिखाई दे रही थी।
श्लोक 12 (skanda.8.153.12)
विभिन्नछिन्नदारितं प्रदग्धजग्धनिर्धुतम् । यथा मदान्धकुञ्जर प्रणष्टपादपं वनम्
vibhinnachinnadāritaṁ pradagdhajagdhanirdhutam | yathā madāndhakuñjara praṇaṣṭapādapaṁ vanam
टूटा हुआ, कटा हुआ, फटा हुआ, जला हुआ, कुचला हुआ और उखड़ा हुआ - वह वैसा ही दिखाई दे रहा था जैसे मदोन्मत्त हाथियों द्वारा नष्ट किए गए वृक्षों वाला वन।
श्लोक 13 (skanda.8.153.13)
मुखेषु केचिदाहता निरीक्षणेषु चापरे । उरोदरेषु चापरे तथा हताश्च पृष्ठतः
mukheṣu kecidāhatā nirīkṣaṇeṣu cāpare | urodareṣu cāpare tathā hatāśca pṛṣṭhataḥ
कुछ मुख में घायल थे, कुछ आँखों में, कुछ छाती और पेट में, तथा कुछ पीठ में आहत थे।
श्लोक 14 (skanda.8.153.14)
शतघ्नयो यथाचिताः शरैस्तथा मरुद्गणाः । गणाश्च भीमविक्रमा नभूमिमापुराहताः
śataghnayo yathācitāḥ śaraistathā marudgaṇāḥ | gaṇāśca bhīmavikramā nabhūmimāpurāhatāḥ
जैसे शतघ्नी आयुध बाणों से ढँक जाते हैं, वैसे ही मरुद्गण भी बाणों से ढँक गए, और भयंकर पराक्रमी गण आहत होकर भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 15 (skanda.8.153.15)
सुरासुरैः प्रवर्तिता ततो व्रणाम्बुवाहिनी । गजेन्द्रनक्रसंकुला रथाङ्गचारुकच्छपा
surāsuraiḥ pravartitā tato vraṇāmbuvāhinī | gajendranakrasaṁkulā rathāṅgacārukacchapā
देवताओं और असुरों द्वारा प्रवाहित होकर एक रुधिर की नदी बह चली, जो हाथियों-रूपी मगरमच्छों से भरी और रथ-चक्रों-रूपी सुन्दर कछुओं से युक्त थी।
श्लोक 16 (skanda.8.153.16)
निकृत्तहस्तपन्नगा धनुर्ध्वजोत्तमद्रुमा । किरीटकूटदर्दुरा धनुर्गुणाभितन्तुका
nikṛttahastapannagā dhanurdhvajottamadrumā | kirīṭakūṭadardurā dhanurguṇābhitantukā
कटे हुए हाथ उसके सर्प थे, धनुष और ध्वज उसके श्रेष्ठ वृक्ष थे, मुकुट उसके मेंढक थे, और धनुष की डोरियाँ उसकी काई-लताएँ थीं।
श्लोक 17 (skanda.8.153.17)
विकीर्णहारशर्करा सिताम्बरातिफेनिनी । सुरासुरैः प्रवर्तिता सुरासुरातिदुस्तरा
vikīrṇahāraśarkarā sitāmbarātipheninī | surāsuraiḥ pravartitā surāsurātidustarā
बिखरे हुए हार उसकी बालू थे, सफेद वस्त्र उसका फेन था - देवताओं और असुरों द्वारा प्रवाहित की गई वह नदी देवताओं और असुरों के लिए भी दुस्तर हो गई।
श्लोक 18 (skanda.8.153.18)
ततोञ्जनास्तुदत्विषस्तडित्प्रहासहासिनः । पिशाचयक्षराक्षसाः पिपासयातिकर्षिताः
tatoñjanāstudatviṣastaḍitprahāsahāsinaḥ | piśācayakṣarākṣasāḥ pipāsayātikarṣitāḥ
तब अंजन के समान श्याम कान्तिवाले, बिजली के समान अट्टहास करते पिशाच, यक्ष और राक्षस अत्यन्त प्यास से व्याकुल हो उठे।
श्लोक 19 (skanda.8.153.19)
सुरा यथा वरामृतं पपुस्तथैव शोणितम् । ततः पुनः समाकुलं बभूव युद्धमद्भुतम् । तदान्धके शराहते महेषुणाथ नन्दिने
surā yathā varāmṛtaṁ papustathaiva śoṇitam | tataḥ punaḥ samākulaṁ babhūva yuddhamadbhutam | tadāndhake śarāhate maheṣuṇātha nandine
देवता जैसे उत्तम अमृत पीते हैं, वैसे ही उन्होंने वह रक्त पिया। तत्पश्चात्, जब अन्धक महाबाण से आहत हुआ और नन्दी भी घायल हुए, तब पुनः वह अद्भुत युद्ध घमासान हो उठा।