अम्बिका खण्ड · अध्याय 154
अन्धक-विजय
श्लोक 1 (skanda.8.154.1)
सनत्कुमार उवाच । हन्यमाने बले तस्मिन् देवैः सप्रमथेश्वरैः । चुक्रुधुर्दानवा घोराश्चतुर्विंशतिदर्पिताः
sanatkumāra uvāca | hanyamāne bale tasmin devaiḥ sapramatheśvaraiḥ | cukrudhurdānavā ghorāścaturviṁśatidarpitāḥ
सनत्कुमार ने कहा - जब देवताओं और प्रमथेश्वरों द्वारा उस सेना का संहार हो रहा था, तब अभिमानी चौबीस भयंकर दानव क्रुद्ध हो उठे।
श्लोक 2 (skanda.8.154.2)
प्रह्रादश्चानुह्रादश्च संह्रादः शिनिबाष्कलौ । जम्भो विरोचनो वृत्रो बलिर्बाणोवनिञ्जयः
prahrādaścānuhrādaśca saṁhrādaḥ śinibāṣkalau | jambho virocano vṛtro balirbāṇovaniñjayaḥ
प्रह्राद, अनुह्राद, संह्राद, शिनि और बाष्कल, जम्भ, विरोचन, वृत्र, बलि, बाण और अविनिंजय -
श्लोक 3 (skanda.8.154.3)
तथा तुहुण्डो हुण्डश्च शम्भुः कार्तस्वनः कुभः । शम्बरो विप्रचित्तिश्च इल्वकः पिल्वकस्तथा
tathā tuhuṇḍo huṇḍaśca śambhuḥ kārtasvanaḥ kubhaḥ | śambaro vipracittiśca ilvakaḥ pilvakastathā
तथा तुहुण्ड, हुण्ड, शम्भु, कार्तस्वन, कुभ, शम्बर, विप्रचित्ति, इल्वक और पिल्वक -
श्लोक 4 (skanda.8.154.4)
मयस्तारस्तारकाक्षो विद्युन्माली प्रमोहनः । एते मर्षवशं प्राप्ताश्चतुर्विंशतिदानवाः
mayastārastārakākṣo vidyunmālī pramohanaḥ | ete marṣavaśaṁ prāptāścaturviṁśatidānavāḥ
मय, तार, तारकाक्ष, विद्युन्माली और प्रमोहन - ये चौबीस दानव क्रोधवश हो उठे।
श्लोक 5 (skanda.8.154.5)
दुद्रुवुः सायुधं देवं नन्दिनं समवस्थितम् । तेञ्जनाचलसंकाशाः काञ्चनाचलसन्निभम्
dudruvuḥ sāyudhaṁ devaṁ nandinaṁ samavasthitam | teñjanācalasaṁkāśāḥ kāñcanācalasannibham
अंजनगिरि के समान श्याम वे दानव, स्वर्णपर्वत के समान वहाँ खड़े शस्त्रधारी देव नन्दी की ओर दौड़ पड़े।
श्लोक 6 (skanda.8.154.6)
नन्दिनं ताडयामासुः शूलशक्त्यृष्टिपट्टिशैः । तथा तैररिभिः शस्त्रैस्ताडितो वारितश्च वै
nandinaṁ tāḍayāmāsuḥ śūlaśaktyṛṣṭipaṭṭiśaiḥ | tathā tairaribhiḥ śastraistāḍito vāritaśca vai
उन्होंने त्रिशूल, शक्ति, ऋष्टि और पट्टिश आदि शस्त्रों से नन्दी पर प्रहार किया; उन शत्रुओं के शस्त्रों से आहत होकर भी वे डटे रहे।
श्लोक 7 (skanda.8.154.7)
नाक्षुभ्यत तदा नन्दी नार्त्तिमापन्न च व्यथाम् । ततो विकृष्य भगवानाततं कार्मुकं महत्
nākṣubhyata tadā nandī nārttimāpanna ca vyathām | tato vikṛṣya bhagavānātataṁ kārmukaṁ mahat
तब भी नन्दी विचलित नहीं हुए और न ही उन्हें कोई पीड़ा हुई। तब भगवान् ने अपना विशाल, तना हुआ धनुष खींचा।
श्लोक 8 (skanda.8.154.8)
त्रिभिस्त्रिभिर्बिभेदाशु सर्वान्दानवसत्तमान् । ते बाणमार्गनिस्रावै दानवाः शोणितक्षराः
tribhistribhirbibhedāśu sarvāndānavasattamān | te bāṇamārganisrāvai dānavāḥ śoṇitakṣarāḥ
उन्होंने तीन-तीन बाणों से शीघ्र ही समस्त श्रेष्ठ दानवों को बींध डाला। बाण-मार्ग से रक्त बहाते हुए वे दानव -
श्लोक 9 (skanda.8.154.9)
क्षरन्त इव शैलेन्द्रास्तपनीयरसान् बभुः । ततो रोषोद्धतो नन्दी शुक्रेणोज्जीवितं पुनः
kṣaranta iva śailendrāstapanīyarasān babhuḥ | tato roṣoddhato nandī śukreṇojjīvitaṁ punaḥ
वे उसी प्रकार शोभित हुए जैसे महापर्वत सुवर्ण-रस बहाते हों। तब क्रोध से उद्धत नन्दी ने, शुक्राचार्य द्वारा फिर से जीवित किए गए एक दानव को -
श्लोक 10 (skanda.8.154.10)
कार्त्तस्वनं शरैर्घोरैरनयद्यमसादनम् । जीवितस्रंसनं प्राप्य स दानवमहाचलः
kārttasvanaṁ śarairghorairanayadyamasādanam | jīvitasraṁsanaṁ prāpya sa dānavamahācalaḥ
उस कार्तस्वन नामक दानव को भयंकर बाणों से यमलोक भेज दिया। जीवन का नाश पाकर वह पर्वत के समान विशाल दानव -
श्लोक 11 (skanda.8.154.11)
शीर्णोपलः पपाताशु वज्राहत इवाचलः । पतमाने क्षितौ तस्मिन्नन्दिबाणाहते हते
śīrṇopalaḥ papātāśu vajrāhata ivācalaḥ | patamāne kṣitau tasminnandibāṇāhate hate
पत्थर बिखेरता हुआ शीघ्र ही उसी प्रकार गिर पड़ा जैसे वज्र से आहत पर्वत गिरता है। जब नन्दी के बाण से आहत होकर मारा गया वह इस प्रकार भूमि पर गिर रहा था -
श्लोक 12 (skanda.8.154.12)
बलिरुत्पाट्य शैलाग्रं चिक्षेपोद्दिश्य नन्दिनम् । तत् सधातुमृगव्यालं सर्क्षवृक्षं गिरेस्तटम्
balirutpāṭya śailāgraṁ cikṣepoddiśya nandinam | tat sadhātumṛgavyālaṁ sarkṣavṛkṣaṁ girestaṭam
तभी बलि ने धातुओं, मृगों और सर्पों-सहित, भालुओं और वृक्षों से युक्त एक पर्वत-शिखर उखाड़कर नन्दी की ओर फेंक दिया।
श्लोक 13 (skanda.8.154.13)
निर्भ्रान्तोपलवृक्षालमभ्यधावद् गणेश्वरम् । शृङ्गस्य बलिमुक्तस्य तस्य व्यालादयो जवात्
nirbhrāntopalavṛkṣālamabhyadhāvad gaṇeśvaram | śṛṅgasya balimuktasya tasya vyālādayo javāt
पत्थरों और वृक्षों को बिखेरता हुआ वह शिखर गणेश्वर की ओर दौड़ पड़ा; बलि द्वारा छोड़े गए उस शिखर पर के सर्प आदि जीव वेगपूर्वक -
श्लोक 14 (skanda.8.154.14)
अपक्रान्तानयार्त्तस्य पुरुषस्येव बान्धवाः । तदापतत् तद् गिर्यग्रं नन्दी बाणेन वीर्यवान् । मेघानिव महावायुर्बिभेद च ननाद च
apakrāntānayārttasya puruṣasyeva bāndhavāḥ | tadāpatat tad giryagraṁ nandī bāṇena vīryavān | meghāniva mahāvāyurbibheda ca nanāda ca
वैसे ही भाग खड़े हुए जैसे किसी संकटग्रस्त पुरुष के बन्धु-बान्धव उसे छोड़कर भाग जाते हैं। जब वह पर्वत-शिखर गिरने लगा, तब पराक्रमी नन्दी ने उसे बाण से उसी प्रकार विदीर्ण कर गर्जना की, जैसे प्रचण्ड वायु मेघों को छिन्न-भिन्न कर देता है।
श्लोक 15 (skanda.8.154.15)
तद्विदार्य गिरेः शृङ्गं गिरिशृङ्गनिकेतनः । बलिं बिभेद बाणेन बलिर्विघ्नमिवोत्थितम्
tadvidārya gireḥ śṛṅgaṁ giriśṛṅganiketanaḥ | baliṁ bibheda bāṇena balirvighnamivotthitam
पर्वत-शिखरों में निवास करने वाले नन्दी ने उस पर्वत-शिखर को विदीर्ण कर, बलि को बाण से उसी प्रकार बींध डाला, जैसे कोई शक्तिशाली पुरुष उठे हुए विघ्न को छिन्न कर देता है।
श्लोक 16 (skanda.8.154.16)
सोभ्याहतो गणेशेन प्राह्लादितनयोवशः । पपात सहसा भूमौ वाताहत इव द्रुमः
sobhyāhato gaṇeśena prāhlāditanayovaśaḥ | papāta sahasā bhūmau vātāhata iva drumaḥ
गणेश्वर के इस प्रहार से आहत होकर प्रह्लाद-पुत्र बलि वश खोकर वैसे ही अचानक भूमि पर गिर पड़ा, जैसे आँधी से आहत वृक्ष गिर पड़ता है।
श्लोक 17 (skanda.8.154.17)
ततो बलौ निपतिते नन्दीषुवरताडिते । जहुः समरमारात्तं दानवाः शरपीडिताः
tato balau nipatite nandīṣuvaratāḍite | jahuḥ samaramārāttaṁ dānavāḥ śarapīḍitāḥ
नन्दी के श्रेष्ठ बाण से आहत होकर बलि के गिर पड़ने पर, बाणों से पीड़ित दानव समरभूमि छोड़कर भाग गए।
श्लोक 18 (skanda.8.154.18)
प्रसृताम्बुदसंकाशाँस्ततोम्बुदनिभाकृतिः । अन्धकः खात् क्षितिं प्राप्य दानवानिदमब्रवीत्
prasṛtāmbudasaṁkāśā~statombudanibhākṛtiḥ | andhakaḥ khāt kṣitiṁ prāpya dānavānidamabravīt
तब मेघ के समान आकृतिवाला अन्धक, फैले हुए मेघों-जैसे उन दानवों को देखकर, आकाश से भूमि पर उतरकर उनसे यह बोला।
श्लोक 19 (skanda.8.154.19)
अद्य दाक्षायणीपुत्रा निबोधध्वं वचो मम । मया चोक्तानि पथ्यानि कुरुध्वं यदि मन्यत
adya dākṣāyaṇīputrā nibodhadhvaṁ vaco mama | mayā coktāni pathyāni kurudhvaṁ yadi manyata
हे दक्षकन्या के पुत्रो! आज मेरी बात सुनो। यदि तुम मानते हो तो मेरे कहे हुए हितकर वचनों का पालन करो।
श्लोक 20 (skanda.8.154.20)
कुलेषु जाता वीराश्च सर्वास्त्रकृतनिश्चयाः । द्रवध्वे वै किमुद्दिश्य पटुनाराचवेजिताः
kuleṣu jātā vīrāśca sarvāstrakṛtaniścayāḥ | dravadhve vai kimuddiśya paṭunārācavejitāḥ
कुलीन घरानों में जन्मे, सभी अस्त्रों में निपुण होने का दृढ़ निश्चय रखने वाले तुम वीर, तीक्ष्ण बाणों से भयभीत होकर किसलिए भाग रहे हो?
श्लोक 21 (skanda.8.154.21)
जल्पितानि क्व वस्तानि कथितानि च संसदि । क्व वस्तद्वैरबाहुल्यं दैवतैस्सह सांप्रतम्
jalpitāni kva vastāni kathitāni ca saṁsadi | kva vastadvairabāhulyaṁ daivataissaha sāṁpratam
सभा में कहे गए तुम्हारे वे बड़े-बड़े वचन कहाँ गए? देवताओं के साथ तुम्हारा वह प्रबल वैर आज कहाँ चला गया?
श्लोक 22 (skanda.8.154.22)
एकेन नन्दिना भग्नाः शतशोथ सहस्रशः । ह्रीः कथं वै न भवति जल्पतां वो गृहाजिरे
ekena nandinā bhagnāḥ śataśotha sahasraśaḥ | hrīḥ kathaṁ vai na bhavati jalpatāṁ vo gṛhājire
अकेले नन्दी के हाथों सैकड़ों और हजारों की संख्या में तुम पराजित हुए हो - अपने घर के आँगन में बड़ी-बड़ी बातें करने वालों को क्या लज्जा नहीं आती?
श्लोक 23 (skanda.8.154.23)
निवर्तध्वमधर्मज्ञा युध्यध्वं किं सृतेन वै । भवेन्न नो यत्र मृत्युः सोवकाशो न विद्यते
nivartadhvamadharmajñā yudhyadhvaṁ kiṁ sṛtena vai | bhavenna no yatra mṛtyuḥ sovakāśo na vidyate
हे अधर्मज्ञो! लौट आओ और युद्ध करो, भागने से क्या लाभ? ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ मृत्यु न पहुँचे।
श्लोक 24 (skanda.8.154.24)
प्राश्निकाः पार्श्वतः स्थित्वा निर्वैरा वीतमत्सराः । द्वैरथं नन्दिना सार्धमेतत् पश्यत साम्प्रतम्
prāśnikāḥ pārśvataḥ sthitvā nirvairā vītamatsarāḥ | dvairathaṁ nandinā sārdhametat paśyata sāmpratam
वैररहित और ईर्ष्यारहित होकर पार्श्व में मध्यस्थ बनकर खड़े रहो, और अभी नन्दी के साथ मेरा यह द्वन्द्वयुद्ध देखो।
श्लोक 25 (skanda.8.154.25)
इत्यन्धकवचः श्रुत्वा सर्वे ते दानवा रणे । पुनर्निवृत्ता युद्धाय प्रगृहीतवरायुधाः
ityandhakavacaḥ śrutvā sarve te dānavā raṇe | punarnivṛttā yuddhāya pragṛhītavarāyudhāḥ
अन्धक के इन वचनों को सुनकर वे सभी दानव युद्धभूमि में अपने श्रेष्ठ शस्त्र उठाकर पुनः युद्ध के लिए लौट आए।
श्लोक 26 (skanda.8.154.26)
ततोन्यं रथमास्थाय नल्वमात्रं पताकिनम् । अन्धकः सोभ्ययान्नन्दिं सार्धं दानवपुङ्गवैः
tatonyaṁ rathamāsthāya nalvamātraṁ patākinam | andhakaḥ sobhyayānnandiṁ sārdhaṁ dānavapuṅgavaiḥ
फिर एक नल्व-प्रमाण लम्बे, पताकाओं से सुशोभित दूसरे रथ पर आरूढ़ होकर, अन्धक श्रेष्ठ दानवों-सहित नन्दी की ओर बढ़ा।
श्लोक 27 (skanda.8.154.27)
शिताग्ररुक्मविकृताः पृथवः प्रियदर्शनाः । अन्धकस्य धनुःसृष्टा निष्पतन्ति महेषवः
śitāgrarukmavikṛtāḥ pṛthavaḥ priyadarśanāḥ | andhakasya dhanuḥsṛṣṭā niṣpatanti maheṣavaḥ
तीक्ष्ण अग्रभाग वाले, स्वर्ण से जड़े, चौड़े फलक वाले, देखने में सुन्दर वे महान् बाण अन्धक के धनुष से निकलकर चारों ओर फैलने लगे।
श्लोक 28 (skanda.8.154.28)
शलभैरिव केदारा भ्रमरैरिव पादपाः । तोयदैरिव नागेन्द्राः सागरा मकरैरिव
śalabhairiva kedārā bhramarairiva pādapāḥ | toyadairiva nāgendrāḥ sāgarā makarairiva
जैसे टिड्डियों से खेत भर जाते हैं, जैसे भौंरों से वृक्ष भर जाते हैं, जैसे मेघों से पर्वत भर जाते हैं, और जैसे मगरमच्छों से समुद्र भरे रहते हैं -
श्लोक 29 (skanda.8.154.29)
महेषुभिर्विनिर्मुक्तैर्नागादित्यसमप्रभैः । अन्धकेन कृता देवाः शतघ्नय इवोत्तमाः
maheṣubhirvinirmuktairnāgādityasamaprabhaiḥ | andhakena kṛtā devāḥ śataghnaya ivottamāḥ
उसी प्रकार सर्प और सूर्य के समान तेजस्वी, छूटे हुए महान् बाणों से अन्धक ने देवताओं को शतघ्नी-आयुधों से बिंधे हुए स्तम्भों के समान बना डाला।
श्लोक 30 (skanda.8.154.30)
वायवोप्रतिघा यद्वद् यथा मृत्युर्यथा जरा । यथा चाप्रतिघाः सूक्ता नियतं ब्राह्मणाशिषः
vāyavopratighā yadvad yathā mṛtyuryathā jarā | yathā cāpratighāḥ sūktā niyataṁ brāhmaṇāśiṣaḥ
जैसे वायु की गति अप्रतिहत है, जैसे मृत्यु और जरा अप्रतिहत हैं, और जैसे ब्राह्मणों के सुभाषित आशीर्वचन अवश्य ही अमोघ होते हैं -
श्लोक 31 (skanda.8.154.31)
तथा ते निशिता ह्युग्रा ब्रह्मदण्डा इवोद्यताः । अनिवार्या ह्यमोघाश्च तेन्धकस्य महेषवः
tathā te niśitā hyugrā brahmadaṇḍā ivodyatāḥ | anivāryā hyamoghāśca tendhakasya maheṣavaḥ
उसी प्रकार अन्धक के वे तीक्ष्ण, उग्र, ब्रह्मदण्ड के समान उठाए हुए महान् बाण भी अनिवार्य और अमोघ थे।
श्लोक 32 (skanda.8.154.32)
यतो यतोसुरास्सर्वे सोन्धकश्च रणे रिपुः । ततस्ततः स्म दीर्यन्ते प्रमथा विबुधैस्सह
yato yatosurāssarve sondhakaśca raṇe ripuḥ | tatastataḥ sma dīryante pramathā vibudhaissaha
उस युद्ध में शत्रु अन्धक और समस्त असुर जिस-जिस दिशा में बढ़ते, उसी-उसी दिशा में देवताओं-सहित प्रमथ छिन्न-भिन्न हो जाते।
श्लोक 33 (skanda.8.154.33)
सोपि नित्यायतधनुः परिवेषीव भास्करः । असृजद्बाणनिकरान् किरणान् भास्करो यथा
sopi nityāyatadhanuḥ pariveṣīva bhāskaraḥ | asṛjadbāṇanikarān kiraṇān bhāskaro yathā
वह भी अपने सदा तने हुए धनुष के साथ, प्रभामण्डलयुक्त सूर्य के समान, सूर्य की किरणों के समान बाणों के समूह छोड़ रहा था।
श्लोक 34 (skanda.8.154.34)
तस्य बाणरुजः प्राप्य नदीतीर इव द्रुमाः । सीदन्ति गणपास्सर्वे देवाश्च सहवासवाः
tasya bāṇarujaḥ prāpya nadītīra iva drumāḥ | sīdanti gaṇapāssarve devāśca sahavāsavāḥ
उसके बाणों की पीड़ा पाकर, नदी-तट पर उगे वृक्षों के समान, इन्द्र-सहित समस्त गणपति और देवता ढहने लगे।
श्लोक 35 (skanda.8.154.35)
स विष्णुमेकेन शरेण विद्ध्वा द्वाभ्यामनन्तं त्रिभिरेव शक्रम् । यमञ्च सोमञ्च जलाधिपञ्च वसूँश्च निर्दार्य ररास घोरम्
sa viṣṇumekena śareṇa viddhvā dvābhyāmanantaṁ tribhireva śakram | yamañca somañca jalādhipañca vasū~śca nirdārya rarāsa ghoram
उसने विष्णु को एक बाण से, अनन्त को दो बाणों से, और इन्द्र को तीन बाणों से बींधकर, तथा यम, चन्द्र, वरुण और वसुओं को भी विदीर्ण कर, भयंकर गर्जना की।
श्लोक 36 (skanda.8.154.36)
अश्विद्वयञ्चापि शरद्वयेन विद्ध्वा भगांशार्यमचन्द्रपूष्णः । ततोथ नन्दीश्वरमुग्रकर्मा गणेश्वराँश्चापि शरैस्ततक्ष
aśvidvayañcāpi śaradvayena viddhvā bhagāṁśāryamacandrapūṣṇaḥ | tatotha nandīśvaramugrakarmā gaṇeśvarā~ścāpi śaraistatakṣa
अश्विनीकुमारों को दो बाणों से बींधकर, तथा भग, अंश, अर्यमा, चन्द्र और पूषा को भी बींधकर, उग्रकर्मा अन्धक ने नन्दीश्वर और गणेश्वरों को भी बाणों से बींध डाला।
श्लोक 37 (skanda.8.154.37)
तथा दहत्यन्धक आततायी थथा पतङ्गान् भगवान् हुताशः । निवारितास्ते शरदारिताश्च तदान्धकेनामरयोधमुख्याः
tathā dahatyandhaka ātatāyī thathā pataṅgān bhagavān hutāśaḥ | nivāritāste śaradāritāśca tadāndhakenāmarayodhamukhyāḥ
जैसे अग्निदेव पतंगों को जला डालते हैं, वैसे ही अत्याचारी अन्धक भी देवताओं को जला डाल रहा था; उसके बाणों से विदीर्ण होकर देव-योद्धाओं में प्रमुख वे सब पीछे हट गए।
श्लोक 38 (skanda.8.154.38)
न स्पन्दितुं शेकुरुदीक्षितुं वा रणेन्धकं खे मनुजा इवार्कम् । यशांसि दीप्तानि ततः प्रहाय देवाः सनारायणदेवपालाः । शरार्दितास्तेन्धकदावेन प्रदुद्रुवुर्दानववेधखिन्नाः
na spandituṁ śekurudīkṣituṁ vā raṇendhakaṁ khe manujā ivārkam | yaśāṁsi dīptāni tataḥ prahāya devāḥ sanārāyaṇadevapālāḥ | śarārditāstendhakadāvena pradudruvurdānavavedhakhinnāḥ
जैसे मनुष्य आकाश में तपते सूर्य को नहीं ताक सकते, वैसे ही वे युद्धरत अन्धक को न तो हिल-डुल सके और न ही सीधे देख सके। तब नारायण-सहित देवगण और लोकपाल अपने प्रज्वलित यश को त्यागकर, अन्धक की अग्नि-सदृश बाणों से पीड़ित और दानव के आघात से क्लान्त होकर भाग खड़े हुए।
श्लोक 39 (skanda.8.154.39)
विष्णुः पितामहश्चैव अनन्तोथ शतक्रतुः । अन्धकेन रणे भग्नाः शरैरग्निशिखोपमैः
viṣṇuḥ pitāmahaścaiva anantotha śatakratuḥ | andhakena raṇe bhagnāḥ śarairagniśikhopamaiḥ
विष्णु, ब्रह्मा, अनन्त और इन्द्र - सब अन्धक द्वारा अग्नि-शिखा के समान बाणों से युद्ध में परास्त कर दिए गए।
श्लोक 40 (skanda.8.154.40)
आदित्या वसवः साध्या अश्विनौ च सुरोत्तमौ । अन्धकेन रणे भग्ना वज्राघातैः पतत्त्रिवत्
ādityā vasavaḥ sādhyā aśvinau ca surottamau | andhakena raṇe bhagnā vajrāghātaiḥ patattrivat
आदित्यगण, वसुगण, साध्यगण और श्रेष्ठ अश्विनीकुमार - ये भी अन्धक द्वारा वज्राघात से पक्षियों के समान युद्ध में गिरा दिए गए।
श्लोक 41 (skanda.8.154.41)
तुषिताश्चैव विश्वाश्च देवाश्चैव स्वधाभुजः । अन्धकेन शरैर्भग्ना मारुतेन यथा द्रुमाः
tuṣitāścaiva viśvāśca devāścaiva svadhābhujaḥ | andhakena śarairbhagnā mārutena yathā drumāḥ
तुषितगण, विश्वेदेव, तथा स्वधा-भोजी पितृदेवगण - ये सब अन्धक के बाणों से उसी प्रकार टूट गए, जैसे तूफान से वृक्ष टूट जाते हैं।
श्लोक 42 (skanda.8.154.42)
चन्द्रमा भगवान् वह्निर्वित्तपालश्च राक्षसः । अन्धकेन रणे भग्नाः शरैराशीविषोपमैः
candramā bhagavān vahnirvittapālaśca rākṣasaḥ | andhakena raṇe bhagnāḥ śarairāśīviṣopamaiḥ
भगवान् चन्द्रमा, अग्नि, और राक्षसों-सहित कुबेर - ये भी अन्धक द्वारा विष-सर्प-सदृश बाणों से युद्ध में परास्त किए गए।
श्लोक 43 (skanda.8.154.43)
गन्धर्वा गुह्यकाः सर्पा गरुडाश्च महोरगाः । अन्धकेन रणे भग्ना विद्धानलसमैः शरैः
gandharvā guhyakāḥ sarpā garuḍāśca mahoragāḥ | andhakena raṇe bhagnā viddhānalasamaiḥ śaraiḥ
गन्धर्व, गुह्यक, सर्प, गरुड़ और महानाग - ये सब भी अग्नि-सदृश तीक्ष्ण बाणों से बिंधकर युद्ध में परास्त हो गए।
श्लोक 44 (skanda.8.154.44)
विट्पतिः शंकुकर्णश्च सोमनन्दी प्रभामयः । पिङ्गलो नन्दिषेणश्च घण्टाकर्णो महोदरः
viṭpatiḥ śaṁkukarṇaśca somanandī prabhāmayaḥ | piṅgalo nandiṣeṇaśca ghaṇṭākarṇo mahodaraḥ
विट्पति, शंकुकर्ण, सोमनन्दी, प्रभामय, पिंगल, नन्दिषेण, घण्टाकर्ण और महोदर -
श्लोक 45 (skanda.8.154.45)
विद्युत्केशः सुकेशश्च स च देवो विनायकः । अन्ये च प्रमथाः शूरा वीरभद्रपुरोगमाः
vidyutkeśaḥ sukeśaśca sa ca devo vināyakaḥ | anye ca pramathāḥ śūrā vīrabhadrapurogamāḥ
विद्युत्केश, सुकेश, तथा देव विनायक, और वीरभद्र आदि अन्य शूरवीर प्रमथगण -
श्लोक 46 (skanda.8.154.46)
अन्धकेन रणे भग्नाः शतशोथ सहस्रशः । त्रैलोक्यं प्रसभं सर्वमुद्युक्तं सचराचरम्
andhakena raṇe bhagnāḥ śataśotha sahasraśaḥ | trailokyaṁ prasabhaṁ sarvamudyuktaṁ sacarācaram
ये सभी सैकड़ों और हजारों की संख्या में अन्धक द्वारा युद्ध में परास्त कर दिए गए। इस प्रकार सम्पूर्ण चराचर त्रिलोक, अपने पूरे उद्यम के साथ भी, बलपूर्वक परास्त हो गया।
श्लोक 47 (skanda.8.154.47)
अन्धकेन रणे भग्नं सनारायणदेवपम् । तस्मिन्सुरबले देवं विमुच्यैकं गणाधिपम्
andhakena raṇe bhagnaṁ sanārāyaṇadevapam | tasminsurabale devaṁ vimucyaikaṁ gaṇādhipam
नारायण और लोकपालों-सहित वह समस्त देवसेना अन्धक द्वारा युद्ध में परास्त कर दी गई। उस देवसेना में एक ही देवता - गणाधिप - को छोड़कर -
श्लोक 48 (skanda.8.154.48)
महामणिशिरोमौलिं न कश्चिदवतस्थिवान् । ततोसुरबले घोरस्सर्वप्राणिकृतो महान् । सिंहनादरवो जज्ञे सवादित्ररवोद्भुतः
mahāmaṇiśiromauliṁ na kaścidavatasthivān | tatosurabale ghorassarvaprāṇikṛto mahān | siṁhanādaravo jajñe savāditraravodbhutaḥ
महामणि-मुकुटधारी नन्दी को छोड़कर कोई भी वहाँ टिका न रह सका। तब असुरों की सेना में समस्त प्राणियों द्वारा किया गया एक महान्, भयंकर सिंहनाद, वाद्यों की ध्वनि-सहित अद्भुत रूप से गूँज उठा।