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अम्बिका खण्ड · अध्याय 155

गण-युद्ध, अन्धक-मथन और ब्रह्मकृत स्तव

अध्याय 154अध्याय-सूचीअध्याय 156

श्लोक 1 (skanda.8.155.1)

सनत्कुमार उवाच । एतस्मिन्नन्तरे देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः । ब्रह्मणा सहिता जग्मुः शरण्यं शूलपाणिनम्

sanatkumāra uvāca | etasminnantare devāḥ sarve śakrapurogamāḥ | brahmaṇā sahitā jagmuḥ śaraṇyaṁ śūlapāṇinam

सनत्कुमार ने कहा - इसी बीच इन्द्र-प्रमुख समस्त देवता ब्रह्मा-सहित शरणदाता त्रिशूलधारी शिव के पास गए।

श्लोक 2 (skanda.8.155.2)

ते प्रणम्य महादेवमिदमूचुर्भयार्दिताः । विजिताः सर्व एव स्मः किमन्धकमुपेक्षसे

te praṇamya mahādevamidamūcurbhayārditāḥ | vijitāḥ sarva eva smaḥ kimandhakamupekṣase

महादेव को प्रणाम कर, भय से पीड़ित उन्होंने यह कहा - 'हम सब पराजित हो चुके हैं। आप अन्धक की उपेक्षा क्यों कर रहे हैं?'

श्लोक 3 (skanda.8.155.3)

देवदेवस्ततः प्राह देवान् ब्रह्मपुरोगमान् । मया दत्तवरो यस्मात् तस्माद् यूयं विनिर्जिताः

devadevastataḥ prāha devān brahmapurogamān | mayā dattavaro yasmāt tasmād yūyaṁ vinirjitāḥ

तब देवाधिदेव ने ब्रह्मा-प्रमुख देवताओं से कहा - 'मैंने ही उसे वरदान दिया था, इसीलिए तुम पराजित हुए हो।'

श्लोक 4 (skanda.8.155.4)

क्रीडार्थमेव च मया संगरे स उपेक्षितः । अधुना भवतामर्थे शामयिष्येहमन्धकम्

krīḍārthameva ca mayā saṁgare sa upekṣitaḥ | adhunā bhavatāmarthe śāmayiṣyehamandhakam

मैंने केवल क्रीड़ा के लिए ही युद्ध में उसकी उपेक्षा की थी। अब तुम्हारे प्रयोजन के लिए मैं अन्धक को शान्त कर दूँगा।

श्लोक 5 (skanda.8.155.5)

ततो देवः स्मितं कृत्वा पार्श्वस्थं शूलमैक्षत । देवाभिप्रायतत्त्वज्ञः शूलो जज्वाल तत्क्षणात्

tato devaḥ smitaṁ kṛtvā pārśvasthaṁ śūlamaikṣata | devābhiprāyatattvajñaḥ śūlo jajvāla tatkṣaṇāt

तब भगवान् ने मुसकराकर अपने पास रखे त्रिशूल की ओर देखा। देव के अभिप्राय के सत्य को जानने वाला त्रिशूल उसी क्षण प्रज्वलित हो उठा।

श्लोक 6 (skanda.8.155.6)

अभिसृत्य द्रुतञ्चैवमन्धकं जितकाशिनम् । युद्धे विक्रम्य सहसा निर्बिभेद स्तनान्तरे

abhisṛtya drutañcaivamandhakaṁ jitakāśinam | yuddhe vikramya sahasā nirbibheda stanāntare

इस प्रकार शीघ्रतापूर्वक विजय के मद में डूबे हुए अन्धक के पास पहुँचकर, युद्ध में पराक्रम दिखाते हुए, उसने अचानक उसके दोनों स्तनों के बीच में उसे बींध डाला।

श्लोक 7 (skanda.8.155.7)

ततोन्धकं तदा भित्त्वा स शूलस्तं महाबलम् । दानवेन्द्रं महाकायमानिन्ये शङ्करान्तिकम्

tatondhakaṁ tadā bhittvā sa śūlastaṁ mahābalam | dānavendraṁ mahākāyamāninye śaṅkarāntikam

उस त्रिशूल ने अन्धक को इस प्रकार बींधकर, उस महाबली, विशालकाय दानवेन्द्र को शंकर के समीप ले आया।

श्लोक 8 (skanda.8.155.8)

तस्य भिन्नस्य शूलेन येक्षरन् रक्तबिन्दवः । पतिताः पुरुषा भूत्वा तेप्ययुध्यन्त दुस्सहाः

tasya bhinnasya śūlena yekṣaran raktabindavaḥ | patitāḥ puruṣā bhūtvā tepyayudhyanta dussahāḥ

त्रिशूल से बिंधे हुए उसके शरीर से जो रक्त-बिन्दु टपके, वे भूमि पर गिरकर पुरुष बन गए और वे भी असह्य रूप से युद्ध करने लगे।

श्लोक 9 (skanda.8.155.9)

तस्यैव तुल्यरूपास्ते तस्य तुल्यपराक्रमाः । नानाशस्त्रप्रहरणास्तेप्ययुध्यन् गणेश्वरैः

tasyaiva tulyarūpāste tasya tulyaparākramāḥ | nānāśastrapraharaṇāstepyayudhyan gaṇeśvaraiḥ

अन्धक के समान ही रूप और पराक्रम वाले, विविध शस्त्रों से प्रहार करने वाले वे भी गणेश्वरों से युद्ध करने लगे।

श्लोक 10 (skanda.8.155.10)

जघ्नुः केचिद् गणानेव द्रवतस्ते महाबलाः

jaghnuḥ kecid gaṇāneva dravataste mahābalāḥ

हाथों में शस्त्र उठाए हुए वे महाबली - इस श्लोक के आरम्भ की पंक्ति मूल पाठ में खण्डित है - उनमें से कुछ ने तो भागते हुए गणों को ही मार डाला।

श्लोक 11 (skanda.8.155.11)

न तेषां युध्यमानानां कश्चित्तस्थौ गणेश्वरः । संग्रामे दानवेन्द्राणां भयात् सर्वे प्रदुद्रुवुः

na teṣāṁ yudhyamānānāṁ kaścittasthau gaṇeśvaraḥ | saṁgrāme dānavendrāṇāṁ bhayāt sarve pradudruvuḥ

उन युद्धरत दानवों के समक्ष कोई भी गणेश्वर टिक न सका; उस संग्राम में दानवेन्द्रों के भय से सभी भाग खड़े हुए।

श्लोक 12 (skanda.8.155.12)

तान्दृष्ट्वा विद्रुतान् सर्वान् गणान् सह सुरेश्वरैः । महादेवोसृजत्

tāndṛṣṭvā vidrutān sarvān gaṇān saha sureśvaraiḥ | mahādevosṛjat

देवताओं-सहित समस्त गणों को इस प्रकार भागते देखकर, महादेव ने कुछ उत्पन्न किया - आगे की पंक्ति मूल में खण्डित है (जैसा आगे स्पष्ट होता है, उन्होंने योगेश्वरी मातृशक्तियों को उत्पन्न किया था)।

श्लोक 13 (skanda.8.155.13)

विज्ञापयामासु राज्ञां नो दातुमर्हसि

vijñāpayāmāsu rājñāṁ no dātumarhasi

यह श्लोक मूल पाठ में अत्यन्त खण्डित है; इतना ही स्पष्ट है कि उन्होंने निवेदन किया - 'आपको हमें आज्ञा देनी चाहिए।'

श्लोक 14 (skanda.8.155.14)

देवदेवस्तदा प्राह सर्वाः प्रहरणोद्यताः । असृग्बिन्दुसमुद्भूतान् भक्षयध्वं महासुरान्

devadevastadā prāha sarvāḥ praharaṇodyatāḥ | asṛgbindusamudbhūtān bhakṣayadhvaṁ mahāsurān

तब देवाधिदेव ने शस्त्र उठाए हुए उन सभी योगेश्वरियों से कहा - 'रक्त-बिन्दुओं से उत्पन्न इन महासुरों को खा जाओ।'

श्लोक 15 (skanda.8.155.15)

एवमुक्तास्तु तास्सर्वा योगेश्वर्यो महाबलाः । हत्वा हत्वासुरान् युद्धे चखादुश्च

evamuktāstu tāssarvā yogeśvaryo mahābalāḥ | hatvā hatvāsurān yuddhe cakhāduśca

इस प्रकार आज्ञा पाकर वे समस्त महाबली योगेश्वरियाँ युद्ध में असुरों को मार-मारकर खा गईं - इसके आगे का अंश मूल में खण्डित है।

श्लोक 16 (skanda.8.155.16)

देवोपि ज्वलितं शूलमब्रवीदन्धकान्तकृत् । अन्धकं पच सूर्याग्नौ सहस्रं शरदां शतम्

devopi jvalitaṁ śūlamabravīdandhakāntakṛt | andhakaṁ paca sūryāgnau sahasraṁ śaradāṁ śatam

अन्धक का अन्त करने वाले भगवान् ने भी अपने प्रज्वलित त्रिशूल से कहा - 'अन्धक को सूर्य की अग्नि में एक लाख वर्षों तक पकाओ।'

श्लोक 17 (skanda.8.155.17)

अन्धकोपि हि शूलाग्रे पच्यमानोर्कतेजसा । पूर्णे सहस्रे वर्षाणां सात्विकं भावमभ्यगात्

andhakopi hi śūlāgre pacyamānorkatejasā | pūrṇe sahasre varṣāṇāṁ sātvikaṁ bhāvamabhyagāt

त्रिशूल की नोक पर सूर्य के तेज से पकता हुआ अन्धक भी, सहस्र वर्ष पूर्ण होने पर, सात्त्विक भाव को प्राप्त हो गया।

श्लोक 18 (skanda.8.155.18)

सात्विकं भावमापन्नो विनिर्धूतरजस्तमः । लोकानां कारणं देवं बुबुधे गोवृषध्वजम्

sātvikaṁ bhāvamāpanno vinirdhūtarajastamaḥ | lokānāṁ kāraṇaṁ devaṁ bubudhe govṛṣadhvajam

सात्त्विक भाव को प्राप्त होकर, रज और तम से मुक्त होकर, उसने लोकों के कारणभूत, वृषभ-ध्वजधारी देव को पहचान लिया।

श्लोक 19 (skanda.8.155.19)

तं बुद्ध्वा च ततो भक्त्या निर्मलेनान्तरात्मना । स्नाय्वस्थिशेषस्तुष्टाव देवं चंद्रार्धमौलिनम्

taṁ buddhvā ca tato bhaktyā nirmalenāntarātmanā | snāyvasthiśeṣastuṣṭāva devaṁ caṁdrārdhamaulinam

उसे पहचानकर, निर्मल अन्तरात्मा से भक्तिपूर्वक, केवल स्नायु और अस्थि-शेष रह गया वह, चन्द्रार्ध-मौलिधारी देव की स्तुति करने लगा।

श्लोक 20 (skanda.8.155.20)

अन्धक उवाच । कृत्स्नस्य योस्य जगतः सचराचरस्य कर्ता कृतस्य च तथा सुखदुःखदाता । संहारहेतुरपि यः पुनरन्तकाले, तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

andhaka uvāca | kṛtsnasya yosya jagataḥ sacarācarasya kartā kṛtasya ca tathā sukhaduḥkhadātā | saṁhāraheturapi yaḥ punarantakāle, taṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

अन्धक ने कहा - जो इस सम्पूर्ण चराचर जगत् के कर्ता हैं, तथा रचे हुए जगत् को सुख-दुःख देने वाले हैं, और जो अन्तकाल में पुनः इसके संहार के कारण भी हैं - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 21 (skanda.8.155.21)

यं योगिनो विगतमोहतमोरजस्का भक्त्यैकतानमनसो विनिवृत्तकामाः । ध्यायन्ति निश्चितधियामितदिव्यभावं, तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

yaṁ yogino vigatamohatamorajaskā bhaktyaikatānamanaso vinivṛttakāmāḥ | dhyāyanti niścitadhiyāmitadivyabhāvaṁ, taṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

जिनका ध्यान वे योगीजन करते हैं, जो मोह, तम और रज से मुक्त होकर, भक्ति में एकाग्रचित्त हुए, समस्त कामनाओं से निवृत्त होकर, दृढ़-बुद्धि से उनके असीम दिव्य स्वरूप का चिन्तन करते हैं - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 22 (skanda.8.155.22)

यश्चन्द्रखण्डममलं विकसन्मयूखं बध्वासयं प्रियतया शिरसा बिभर्ति । यश्चार्धदेहमददाद् गिरिराजपुत्र्यै, तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

yaścandrakhaṇḍamamalaṁ vikasanmayūkhaṁ badhvāsayaṁ priyatayā śirasā bibharti | yaścārdhadehamadadād girirājaputryai, taṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

जो निर्मल, खिली हुई किरणों वाले चन्द्र-खण्ड को स्नेहपूर्वक अपने शिर पर धारण करते हैं, और जिन्होंने गिरिराज-पुत्री को अपने शरीर का आधा भाग दे दिया - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 23 (skanda.8.155.23)

यः सिद्धचारणनिषेवितचारुतोयां गङ्गां महोर्मिरभसां गगनात्पतन्तीम् । मूर्ध्ना दधे स्रजमिवाप्रतिलोलपुष्यां, तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

yaḥ siddhacāraṇaniṣevitacārutoyāṁ gaṅgāṁ mahormirabhasāṁ gaganātpatantīm | mūrdhnā dadhe srajamivāpratilolapuṣyāṁ, taṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

जिन्होंने सिद्धों और चारणों से सेवित, सुन्दर जलवाली, महान् तरंगों के वेग से आकाश से गिरती हुई गंगा को अपने मस्तक पर वैसे ही धारण किया, जैसे कोई अडिग पुष्पों वाली माला धारण करता है - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 24 (skanda.8.155.24)

कैलासशृङ्गशिखरं प्रविकम्प्यमानं कैलाशशृङ्गसदृशेन दशाननेन । यः पादपद्मपरिपीडनया दधार, तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

kailāsaśṛṅgaśikharaṁ pravikampyamānaṁ kailāśaśṛṅgasadṛśena daśānanena | yaḥ pādapadmaparipīḍanayā dadhāra, taṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

कैलास के शिखर के समान विशाल दशानन द्वारा हिलाए जाते हुए कैलास-शिखर को जिन्होंने अपने चरण-कमल के हल्के दबाव मात्र से थाम लिया - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 25 (skanda.8.155.25)

येनासकृद्दितिसुताश्च दनोः सुताश्च विद्याधरोरगगणाश्च वरैस्समग्राः । संयोजिता मुनिवराः फलमूलभक्षास्तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

yenāsakṛdditisutāśca danoḥ sutāśca vidyādharoragagaṇāśca varaissamagrāḥ | saṁyojitā munivarāḥ phalamūlabhakṣāstaṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

जिन्होंने बार-बार दिति और दनु के पुत्रों को, विद्याधरों और नाग-समूहों को समुचित वरों से सम्पन्न किया, तथा फल-मूल भक्षण करने वाले श्रेष्ठ मुनियों को भी वरदान से युक्त किया - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 26 (skanda.8.155.26)

दक्षाध्वरं च नयनञ्च तथा भगस्य पूष्णस्तदा दशनपंक्तिमशातयच्च । व्यष्टम्भयत् कुलिशयुक्तमहेन्द्रबाहुं, तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

dakṣādhvaraṁ ca nayanañca tathā bhagasya pūṣṇastadā daśanapaṁktimaśātayacca | vyaṣṭambhayat kuliśayuktamahendrabāhuṁ, taṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

जिन्होंने दक्ष के यज्ञ का विनाश किया, भग के नेत्र को, और पूषा के दन्त-पंक्ति को उखाड़ दिया, तथा वज्रधारी महेन्द्र की भुजा को भी रोक दिया - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 27 (skanda.8.155.27)

त्रिविधबन्धविमोक्षभावा ज्ञानान्वयश्रुतगुणैरपि नैव युक्ताः । यं संश्रिताः सुखभुजः पुरुषा भवन्ति, तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

trividhabandhavimokṣabhāvā jñānānvayaśrutaguṇairapi naiva yuktāḥ | yaṁ saṁśritāḥ sukhabhujaḥ puruṣā bhavanti, taṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

इस श्लोक का आरम्भ मूल में खण्डित है - जो लोग ज्ञान, कुल और शास्त्रज्ञान के गुणों से युक्त न होने पर भी, तीनों बन्धनों से मुक्ति का भाव रखते हुए जिनकी शरण लेते हैं, वे ही सुखभोगी पुरुष बनते हैं - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 28 (skanda.8.155.28)

अग्रे मृतस्य रविकोटिसमानतेजः सन्त्रासनं विबुधसत्तमदानवानाम् । यः कालकूटमपिबत् समुदीर्णवेगं, तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

agre mṛtasya ravikoṭisamānatejaḥ santrāsanaṁ vibudhasattamadānavānām | yaḥ kālakūṭamapibat samudīrṇavegaṁ, taṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी, श्रेष्ठ देवताओं और दानवों को भी भयभीत करने वाले, उग्र वेग से उठे हुए कालकूट विष को जिन्होंने मृत्यु के भय की परवाह किए बिना पी लिया - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 29 (skanda.8.155.29)

ब्रह्मेन्द्रविष्णुमरुतां च सषण्मुखानां योदाद् वरान् सुबहुशो भगवान्महेशः । नन्दिञ्च मृत्युवदनात्प्रभुरुज्जहार, तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

brahmendraviṣṇumarutāṁ ca saṣaṇmukhānāṁ yodād varān subahuśo bhagavānmaheśaḥ | nandiñca mṛtyuvadanātprabhurujjahāra, taṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

जिन भगवान् महेश्वर ने ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, मरुद्गण तथा षडानन को अनेक बार वरदान दिए, और जिन प्रभु ने नन्दी को मृत्यु के मुख से भी बचा लिया - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 30 (skanda.8.155.30)

कामश्च कार्मुकधरो भुवि पञ्चबाणो हास्यात्कृतो भगवता स तदा विदेहः । एकेषुणा त्रिपुरमेव पुरा जघान, तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

kāmaśca kārmukadharo bhuvi pañcabāṇo hāsyātkṛto bhagavatā sa tadā videhaḥ | ekeṣuṇā tripurameva purā jaghāna, taṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

जिन्होंने पृथ्वी पर धनुर्धारी, पंचबाण कामदेव को केवल हँसी में ही अशरीरी बना दिया, और जिन्होंने पूर्वकाल में एक ही बाण से त्रिपुर का वध कर दिया - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 31 (skanda.8.155.31)

आराधितः सुतपसा हिमवन्निकुञ्जे धूमव्रतेन मनसापि परैरगम्ये । सञ्जीवनीमदित यः परमार्थगम्यस्तस्मै नमः शिवकराय शिवाय नित्यम्

ārādhitaḥ sutapasā himavannikuñje dhūmavratena manasāpi parairagamye | sañjīvanīmadita yaḥ paramārthagamyastasmai namaḥ śivakarāya śivāya nityam

हिमालय की कुंज-भूमि में उग्र तपस्या द्वारा, धूमपान-व्रत द्वारा - जो अन्य किसी के मन से भी दुर्गम है - आराधित होकर, जो परमार्थ से ही जाने जा सकते हैं, उन्होंने संजीवनी विद्या प्रदान की। उन कल्याणकारी, नित्य शिव को नमस्कार है।

श्लोक 32 (skanda.8.155.32)

नानाविधैर्गजविडालसमानवक्त्रैर्दक्षाध्वरप्रमथनैर्वलिभिर्गणैन्द्रैः । योभ्यर्च्यतेमरगणः सहलोकपालैस्तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

nānāvidhairgajaviḍālasamānavaktrairdakṣādhvarapramathanairvalibhirgaṇaindraiḥ | yobhyarcyatemaragaṇaḥ sahalokapālaistaṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

हाथी और बिल्ली जैसे विविध मुखोंवाले, दक्ष-यज्ञ के विध्वंसक, बलशाली गणेश्वरों द्वारा, तथा लोकपालों-सहित देवताओं द्वारा जो पूजित होते हैं - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 33 (skanda.8.155.33)

क्रीडार्थमेव भगवान् भुवनानि सप्त नानानदीविहगपादपमण्डितानि । सब्रह्मकानि ससृजे सुकृतेहितानि, तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

krīḍārthameva bhagavān bhuvanāni sapta nānānadīvihagapādapamaṇḍitāni | sabrahmakāni sasṛje sukṛtehitāni, taṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

जिन भगवान् ने केवल क्रीड़ा के लिए ही, ब्रह्मा-सहित, विविध नदियों, पक्षियों और वृक्षों से सुशोभित, पुण्यकर्मों से युक्त सातों लोकों की रचना की - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 34 (skanda.8.155.34)

यस्याखिलं जगदिदं वशवर्ति नित्यं योष्टाभिरेव तनुभिर्भुवनानि भुंक्ते । यः कारणं सुमहतामपि कारणानां, तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

yasyākhilaṁ jagadidaṁ vaśavarti nityaṁ yoṣṭābhireva tanubhirbhuvanāni bhuṁkte | yaḥ kāraṇaṁ sumahatāmapi kāraṇānāṁ, taṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

जिनके वश में यह सम्पूर्ण जगत् सदा रहता है, जो अपनी आठों मूर्तियों से ही लोकों का भोग करते हैं, तथा जो महान् से महान् कारणों के भी कारण हैं - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 35 (skanda.8.155.35)

आसज्य मां क्षितिधरेन्द्रसुतानुयात विभूषणाङ्गं तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

āsajya māṁ kṣitidharendrasutānuyāta vibhūṣaṇāṅgaṁ taṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

यह श्लोक मूल पाठ में अधिकांशतः खण्डित है; केवल इतना ही बचा है कि - मुझे संलग्न कर, पर्वतराज-पुत्री का अनुगमन करने वाले, आभूषण-भूषित अंगोंवाले - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 36 (skanda.8.155.36)

श्वेतं मुनिं यमनियोगपरायणैस्तैर्भीमैर्महोग्रपुरुषैः प्रतिनीयमानम् । बद्ध्वा तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

śvetaṁ muniṁ yamaniyogaparāyaṇaistairbhīmairmahograpuruṣaiḥ pratinīyamānam | baddhvā taṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

श्वेत मुनि को यम की आज्ञा के पालन में तत्पर, भयंकर और अत्यन्त उग्र पुरुषों द्वारा बाँधकर ले जाया जा रहा था - इसके आगे की पंक्ति मूल में खण्डित है - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 37 (skanda.8.155.37)

परिचिन्त्यमानं तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि

paricintyamānaṁ taṁ śaṅkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi

यह श्लोक भी मूल में लगभग पूर्णतः खण्डित है; केवल 'चिन्तन किए जाते हुए' और शरणागति का चरण-वाक्य ही बचा है - उन शरण-दाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 38 (skanda.8.155.38)

विमूढा, जानन्ति नास्य जगतो भवबन्धरूपाः । ऐश्वर्यदोषविषये भिबद्धा, निर्यातमाद्यनुभवन्ति यथाहमेव

vimūḍhā, jānanti nāsya jagato bhavabandharūpāḥ | aiśvaryadoṣaviṣaye bhibaddhā, niryātamādyanubhavanti yathāhameva

इस श्लोक का आरम्भ मूल में खण्डित है - जो मोहग्रस्त प्राणी इस जगत् के भव-बन्धन के स्वरूप को नहीं जानते, वे ऐश्वर्य के दोष-रूपी विषय में बँधे हुए, वैसा ही परिणाम भोगते हैं जैसा मैंने स्वयं भोगा है।

श्लोक 39 (skanda.8.155.39)

प्रसादाद्धि शुभकर्मा शिवलोकमकल्पयः

prasādāddhi śubhakarmā śivalokamakalpayaḥ

यह श्लोक मूल पाठ में अत्यन्त खण्डित है; इतना ही संकेत मिलता है कि - कृपा से ही तब, शुभ कर्मों वाले को शिवलोक की प्राप्ति कराई गई।

श्लोक 40 (skanda.8.155.40)

सनत्कुमार उवाच । तस्यैवं स्तुवतो देवः शूलपाणिर्वृषध्वजः । पूर्णे वर्षसहस्रे तु प्रीतः प्रोवाच शङ्करः

sanatkumāra uvāca | tasyaivaṁ stuvato devaḥ śūlapāṇirvṛṣadhvajaḥ | pūrṇe varṣasahasre tu prītaḥ provāca śaṅkaraḥ

सनत्कुमार ने कहा - इस प्रकार स्तुति करते हुए उसे, त्रिशूलधारी वृषभध्वज भगवान् शंकर ने सहस्र वर्ष पूर्ण होने पर प्रसन्न होकर कहा।

श्लोक 41 (skanda.8.155.41)

पुत्र तुष्टोस्मि भद्रं ते जातस्त्वं निर्मलोधुना । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मां दानवेश्वर

putra tuṣṭosmi bhadraṁ te jātastvaṁ nirmalodhunā | divyaṁ dadāmi te cakṣuḥ paśya māṁ dānaveśvara

हे पुत्र! मैं तुझसे प्रसन्न हूँ, तेरा कल्याण हो। अब तू निर्मल हो गया है। मैं तुझे दिव्य नेत्र प्रदान करता हूँ - हे दानवेश्वर! मुझे देख।

श्लोक 42 (skanda.8.155.42)

यत्किञ्चित् कांक्षितं फलमुत्तमम् । तत्सर्वमेव दास्यामि ब्रूहि दानवसत्तम

yatkiñcit kāṁkṣitaṁ phalamuttamam | tatsarvameva dāsyāmi brūhi dānavasattama

इस श्लोक का आरम्भ मूल में खण्डित है - 'जो भी उत्तम फल तुम चाहते हो, वह सब मैं तुम्हें दूँगा; कहो, हे दानवश्रेष्ठ!'

श्लोक 43 (skanda.8.155.43)

ब्राह्मं वैष्णवमैन्द्रं वा पदं विबुधदुर्लभम् । अथवा सर्वलोकानां भव राजा यथा पुरा

brāhmaṁ vaiṣṇavamaindraṁ vā padaṁ vibudhadurlabham | athavā sarvalokānāṁ bhava rājā yathā purā

देवताओं के लिए भी दुर्लभ ब्रह्मा, विष्णु या इन्द्र का पद माँग लो, अथवा पहले की भाँति समस्त लोकों का राजा बन जाओ।

श्लोक 44 (skanda.8.155.44)

अन्धक उवाच । ब्राह्मं वैष्णवमैन्द्रञ्च पदमावृत्तिलक्षणम् । विदितं मम तत्सर्वं मनसापि

andhaka uvāca | brāhmaṁ vaiṣṇavamaindrañca padamāvṛttilakṣaṇam | viditaṁ mama tatsarvaṁ manasāpi

अन्धक ने कहा - ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र का पद, जिसका लक्षण पुनरागमन है, वह सब मुझे ज्ञात है; मन से भी मैंने उसे वरण नहीं किया - इस श्लोक का अन्तिम अंश मूल में खण्डित है।

श्लोक 45 (skanda.8.155.45)

यदि तुष्टोसि देवेश गाणपत्यं विधत्स्व मे । अविशेष्यं विशुद्धञ्च तदक्षय्यं च सर्वदा

yadi tuṣṭosi deveśa gāṇapatyaṁ vidhatsva me | aviśeṣyaṁ viśuddhañca tadakṣayyaṁ ca sarvadā

हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे गणपति-पद प्रदान करें, जो अविशेष्य, विशुद्ध और सदा अक्षय हो।

श्लोक 46 (skanda.8.155.46)

देवदेव उवाच । सर्वलोकनमस्कृतः

devadeva uvāca | sarvalokanamaskṛtaḥ

देवदेव ने कहा - यह श्लोक मूल में लगभग पूर्णतः खण्डित है; केवल इतना ही बचा है कि तू 'समस्त लोकों द्वारा नमस्कृत' होगा।

श्लोक 47 (skanda.8.155.47)

कामरूपी महायोगी सहासत्वो महाबलः । अणिमादिगुणैर्युक्तः प्रियः पुरुषसत्तमः

kāmarūpī mahāyogī sahāsatvo mahābalaḥ | aṇimādiguṇairyuktaḥ priyaḥ puruṣasattamaḥ

तू इच्छानुसार रूप धारण करने वाला, महायोगी, हास्ययुक्त स्वभाव वाला, महाबली, अणिमा आदि सिद्धियों से युक्त, प्रिय और श्रेष्ठ पुरुष होगा।

श्लोक 48 (skanda.8.155.48)

सनत्कुमार उवाच । ततो वरं दत्त्वा सुदुर्लभम् । महादेवः भूत्वा तत्रैवान्तरधीयत

sanatkumāra uvāca | tato varaṁ dattvā sudurlabham | mahādevaḥ bhūtvā tatraivāntaradhīyata

सनत्कुमार ने कहा - इस श्लोक का प्रारम्भिक अंश मूल में खण्डित है - तब यह अत्यन्त दुर्लभ वरदान देकर महादेव वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 49 (skanda.8.155.49)

वरेण्यं वरदं देवं ब्रह्मण्यममितौजसम् । आगत्य चैव

vareṇyaṁ varadaṁ devaṁ brahmaṇyamamitaujasam | āgatya caiva

यह श्लोक मूल में आगे जाकर खण्डित हो जाता है; इतना ही स्पष्ट है कि वे वरणीय, वरदायक, ब्राह्मण-हितैषी, असीम तेजस्वी देव के पास आकर -

श्लोक 50 (skanda.8.155.50)

शूलं परमं विक्रमैः स्तम्भयित्वा

śūlaṁ paramaṁ vikramaiḥ stambhayitvā

यह श्लोक मूल पाठ में लगभग पूर्णतः खण्डित है; केवल यह टुकड़ा बचा है - 'त्रिशूल को परम पराक्रम से रोककर।'

श्लोक 51 (skanda.8.155.51)

वाङ्मनोभिः

vāṅmanobhiḥ

यह श्लोक मूल में लगभग पूर्णतः खण्डित है; केवल एक शब्द बचा है - 'वाणी और मन से'।

श्लोक 52 (skanda.8.155.52)

येन्ये कुशास्त्रमलपङ्कविमग्नदेहा मोक्षेप्यतस्तव विभो चरणा । ते वो स्तुवन्ति मूढा मृगा इव वने मृगतृष्णिकाभिः

yenye kuśāstramalapaṅkavimagnadehā mokṣepyatastava vibho caraṇā | te vo stuvanti mūḍhā mṛgā iva vane mṛgatṛṣṇikābhiḥ

जो अन्य लोग कुशास्त्रों के मैल-रूपी कीचड़ में डूबे हुए हैं, वे मोक्ष के लिए भी, हे विभो, आपके चरणों को नहीं जानते; वे मूढ़ लोग वैसे ही स्तुति करते फिरते हैं, जैसे वन में हिरण मृगतृष्णा के पीछे भागते हैं।

श्लोक 53 (skanda.8.155.53)

पूषा करोति विमलं किरणौघजालैः

pūṣā karoti vimalaṁ kiraṇaughajālaiḥ

यह श्लोक मूल में अत्यन्त खण्डित है; इतना ही स्पष्ट है कि सूर्य अपनी किरणों के समूह से किसी वस्तु को निर्मल करते हैं।

श्लोक 54 (skanda.8.155.54)

पक्षे तपश्चरति येन कलावशेषश्चन्द्रोपि ते हरतवोत्तमपादमूले । नक्तं तु शूलहसितै रजमीमुखानि सम्पूर्णमण्डलवपुर्धवलीकरोति

pakṣe tapaścarati yena kalāvaśeṣaścandropi te haratavottamapādamūle | naktaṁ tu śūlahasitai rajamīmukhāni sampūrṇamaṇḍalavapurdhavalīkaroti

जिनकी कृपा से चन्द्रमा भी, अपनी एक कला मात्र शेष रहते हुए, कृष्णपक्ष में हे हर! आपके श्रेष्ठ चरणों की जड़ में तपस्या करता है; और रात्रि में, आपके त्रिशूल की चमक-सी हँसी के साथ, पूर्ण मण्डल वाले शरीर से दिशाओं के मुखों को उज्ज्वल कर देता है।

श्लोक 55 (skanda.8.155.55)

वसवो मरुतोश्विनौ च । भृग्वादयश्च ऋषयस्तत्र देव सिद्धाः सिद्धिं गताश्चरणपद्मवरप्रसादात्

vasavo marutośvinau ca | bhṛgvādayaśca ṛṣayastatra deva siddhāḥ siddhiṁ gatāścaraṇapadmavaraprasādāt

इस श्लोक के आरम्भ का अंश खण्डित है - वसुगण, मरुद्गण और अश्विनीकुमार, तथा भृगु आदि ऋषिगण, हे देव! आपके चरण-कमलों की कृपा से वहाँ सिद्धि को प्राप्त हुए सिद्ध बन गए।

श्लोक 56 (skanda.8.155.56)

कैलास द्रवाय देवाय लयलाङ्कितमेखलाय । बद्घ्वासनं परममुन्नतचारुमूर्तिं योगेश्वरं दिभुमहद् भुवनस्य भूत्यै

kailāsa dravāya devāya layalāṅkitamekhalāya | badghvāsanaṁ paramamunnatacārumūrtiṁ yogeśvaraṁ dibhumahad bhuvanasya bhūtyai

इस श्लोक की पहली पंक्ति मूल में अत्यन्त खण्डित है - कैलास पर, प्रलय से चिह्नित मेखलावाले, द्रवित हृदय वाले देव को। दूसरी पंक्ति स्पष्ट है - लोक की समृद्धि के लिए, उन्नत और सुन्दर स्वरूपवाले, महान् दिव्य योगेश्वर ने परम आसन बाँधा।

श्लोक 57 (skanda.8.155.57)

सासि पूर्वमदृष्टपूर्वा सा सा स्पृहां प्रकुरषे महतीं जनस्य । तस्माज्जटेन्दुरिवजार्धशरीरयोगाद् गङ्गां च देव भजसे त्वमपूर्ववत्ताम्

sāsi pūrvamadṛṣṭapūrvā sā sā spṛhāṁ prakuraṣe mahatīṁ janasya | tasmājjaṭendurivajārdhaśarīrayogād gaṅgāṁ ca deva bhajase tvamapūrvavattām

इस श्लोक के आरम्भ का अंश खण्डित है - वह शोभा पहले कभी न देखी गई थी, वही जन-साधारण में महान् अभिलाषा उत्पन्न करती है। इसीलिए, अपने जटाओं में चन्द्रमा और आधे शरीर में पार्वती के योग से, हे देव! आप गंगा को भी धारण कर अपूर्व वैभव को प्राप्त हैं।

श्लोक 58 (skanda.8.155.58)

संस्थैः सम्यग्वरेश्वररुषा सदसोग्रकण्ठ । ते देव लोकविजयं तव देव यावद् दुष्टस्य वक्त्रकमलानि निवेदितानि

saṁsthaiḥ samyagvareśvararuṣā sadasograkaṇṭha | te deva lokavijayaṁ tava deva yāvad duṣṭasya vaktrakamalāni niveditāni

इस श्लोक की पहली पंक्ति मूल में अत्यन्त खण्डित है। दूसरी पंक्ति में इतना स्पष्ट है - हे देव! जब तक आपके क्रोध से उस दुष्ट अन्धक के मुख-कमल आपको समर्पित नहीं किए गए, तब तक आपकी लोक-विजय पूर्ण नहीं हुई थी।

श्लोक 59 (skanda.8.155.59)

कैलासमेरुमलयोदरमन्दरेषु विद्याधरैर्मुनिमहोरगकिन्नरैश्च । अभ्यर्च्यसे मधुरैर्वचोभिः

kailāsamerumalayodaramandareṣu vidyādharairmunimahoragakinnaraiśca | abhyarcyase madhurairvacobhiḥ

कैलास, मेरु, मलय और मन्दर पर्वतों की घाटियों में, विद्याधरों, मुनियों, महानागों और किन्नरों द्वारा मधुर वचनों के साथ आपकी पूजा की जाती है - इस श्लोक का अन्तिम अंश मूल में खण्डित है।

श्लोक 60 (skanda.8.155.60)

ये भक्त्या सर्व मजरं मात्मवेद्यम् । पश्यन्ति सत्वमचलास्तव योगदृष्ट्या त्वामेव ते शिव विशन्त्यनिवर्तनाय

ye bhaktyā sarva majaraṁ mātmavedyam | paśyanti satvamacalāstava yogadṛṣṭyā tvāmeva te śiva viśantyanivartanāya

इस श्लोक का प्रथम भाग खण्डित है - जो भक्तिभाव से आपके अजर, आत्मवेद्य स्वरूप को योग-दृष्टि से अचल-रूप में देखते हैं, हे शिव! वे ही आपमें प्रवेश करते हैं, फिर कभी लौटकर नहीं आते।

श्लोक 61 (skanda.8.155.61)

विद्यावयो स्य समेत्य शक्तास्तेजःसृजाशुगमित

vidyāvayo sya sametya śaktāstejaḥsṛjāśugamita

यह श्लोक मूल में लगभग पूर्णतः खण्डित है; केवल कुछ असम्बद्ध शब्द-खण्ड बचे हैं, जिनमें विद्या, आयु, समागम, शक्ति और तेज-सृजन का उल्लेख मिलता है, पर अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता।

श्लोक 62 (skanda.8.155.62)

दक्षाध्वरस्सुरवरैः कृतसर्वरक्षो भृग्वादिभिर्मुनिवरैरुपगीतवेदः । क्रोधोद्भवेन तव देव हतस्सलीलमेकेन शूलवरचक्रभृता गणेन

dakṣādhvarassuravaraiḥ kṛtasarvarakṣo bhṛgvādibhirmunivarairupagītavedaḥ | krodhodbhavena tava deva hatassalīlamekena śūlavaracakrabhṛtā gaṇena

दक्ष का वह यज्ञ, जिसकी श्रेष्ठ देवताओं द्वारा सर्वतोभावेन रक्षा की गई थी, जिसमें भृगु आदि श्रेष्ठ मुनियों द्वारा वेद-मन्त्र गाए गए थे - हे देव! वह भी आपके क्रोध से उत्पन्न, त्रिशूल और चक्र धारण करने वाले एक ही गण द्वारा सहज लीला में नष्ट कर दिया गया।

श्लोक 63 (skanda.8.155.63)

लिङ्गस्य यो हर हरिः अधस्तादूर्ध्वन्त्वहं ब्रुबाणः । रवन्दतवादिमध्ये कोन्यः प्रवीण इह वक्ष्यति तेल्पबुद्धिः

liṅgasya yo hara hariḥ adhastādūrdhvantvahaṁ brubāṇaḥ | ravandatavādimadhye konyaḥ pravīṇa iha vakṣyati telpabuddhiḥ

हे हर! जो ज्योतिर्मय लिंग के नीचे और ऊपर के छोर को खोजने निकले - विष्णु नीचे और ब्रह्मा ऊपर, ऐसा कहते हुए - यह श्लोक अत्यन्त क्षतिग्रस्त है, फिर भी इतना संकेत मिलता है कि उस विवाद के बीच ऐसा अल्पबुद्धि कौन प्रवीण होगा जो यहाँ आपके स्वरूप के विषय में कुछ और कह सके।

श्लोक 64 (skanda.8.155.64)

शर्वोसि सर्वगतससर्वफलप्रदोसि योगोसि योगधर योगविदां वरोसि । मातापितासि जगतः प्रभुरव्ययोसि शान्तः शिवोसि परमोसि शिवङ्करोसि

śarvosi sarvagatasasarvaphalapradosi yogosi yogadhara yogavidāṁ varosi | mātāpitāsi jagataḥ prabhuravyayosi śāntaḥ śivosi paramosi śivaṅkarosi

आप ही शर्व हैं, आप ही सर्वव्यापी और सब फलों के दाता हैं; आप ही योग हैं, हे योगधर! आप ही योगियों में श्रेष्ठ हैं। आप ही जगत् के माता-पिता हैं, अव्यय प्रभु हैं; आप शान्त हैं, शिव हैं, परम हैं, कल्याणकारी हैं।

श्लोक 65 (skanda.8.155.65)

स्तवमिमममलार्थ ब्रह्मणा गीतमग्र्यं द्विजसदसि पठेद्यः कल्यमुत्थाय शश्वत् । इह सुखमनुभूय प्रेत्य चाग्रे च तस्य धनकनकसमृद्धे जायते जन्म वंशे

stavamimamamalārtha brahmaṇā gītamagryaṁ dvijasadasi paṭhedyaḥ kalyamutthāya śaśvat | iha sukhamanubhūya pretya cāgre ca tasya dhanakanakasamṛddhe jāyate janma vaṁśe

इस निर्मल-अर्थ, ब्रह्मा द्वारा गाए गए इस श्रेष्ठ स्तोत्र को जो कोई प्रातःकाल उठकर सदैव द्विज-सभा में पढ़ता है, वह इस लोक में सुख भोगकर, तथा परलोक में जाकर, धन-सम्पदा से समृद्ध कुल में जन्म प्राप्त करता है।

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