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अम्बिका खण्ड · अध्याय 156

गणयुद्ध में दैवत-वर-कीर्तन

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श्लोक 1 (skanda.8.156.1)

सनत्कुमार उवाच । एवं स्तुतस्स भगवान् ब्रह्मणा युग्मलोचनः । उवाच देवांस्तान् सर्वान् ब्रह्मणा सहिताँस्तदा

sanatkumāra uvāca | evaṁ stutassa bhagavān brahmaṇā yugmalocanaḥ | uvāca devāṁstān sarvān brahmaṇā sahitā~stadā

सनत्कुमार ने कहा - इस प्रकार द्विनेत्रधारी ब्रह्मा द्वारा स्तुति किए जाने पर, भगवान् शिव ने ब्रह्मा-सहित उन समस्त देवताओं से कहा।

श्लोक 2 (skanda.8.156.2)

प्रीतोस्मि विबुधा यात नाशितो देवकण्टकः । किमन्यत् करवाण्यद्य प्रियं वो वरतानघाः

prītosmi vibudhā yāta nāśito devakaṇṭakaḥ | kimanyat karavāṇyadya priyaṁ vo varatānaghāḥ

हे देवगण! मैं प्रसन्न हूँ, जाओ - देवताओं का काँटा नष्ट कर दिया गया है। हे निष्पाप देवो! अब और क्या प्रिय कार्य करूँ, वर माँगो।

श्लोक 3 (skanda.8.156.3)

इत्युक्ता देवदेवेन देवाः सर्वे बभाषिरे । स्तुवन्तः प्रह्वमूर्धानो देवेशं हृष्टमानसाः

ityuktā devadevena devāḥ sarve babhāṣire | stuvantaḥ prahvamūrdhāno deveśaṁ hṛṣṭamānasāḥ

देवाधिदेव द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, समस्त देवता प्रसन्नचित्त होकर, सिर झुकाकर स्तुति करते हुए बोले।

श्लोक 4 (skanda.8.156.4)

त्वमेव देव सर्वेषामस्माकं शरणं परम् । त्वं पिता सर्वलोकानां त्वयायं नाशितोन्धकः

tvameva deva sarveṣāmasmākaṁ śaraṇaṁ param | tvaṁ pitā sarvalokānāṁ tvayāyaṁ nāśitondhakaḥ

हे देव! आप ही हम सबके लिए परम शरण हैं। आप ही समस्त लोकों के पिता हैं। आपने ही इस अन्धक का नाश किया है।

श्लोक 5 (skanda.8.156.5)

इत्युक्त्वा विबुधास्सर्वे प्रणिपत्य च शङ्करम् । ब्रह्मणा सहिता जग्मुर्यथास्थानं मुदा युताः

ityuktvā vibudhāssarve praṇipatya ca śaṅkaram | brahmaṇā sahitā jagmuryathāsthānaṁ mudā yutāḥ

इस प्रकार कहकर समस्त देवता शंकर को प्रणाम कर, ब्रह्मा-सहित हर्षपूर्वक अपने-अपने स्थान को लौट गए।

श्लोक 6 (skanda.8.156.6)

ततो गणानपीशानो युद्धकृतश्रमान् । अर्चयित्वा यथावद्धि विससर्ज महामनाः

tato gaṇānapīśāno yuddhakṛtaśramān | arcayitvā yathāvaddhi visasarja mahāmanāḥ

तत्पश्चात् महामना ईशान ने युद्ध के श्रम से थके हुए गणों का भी यथोचित सत्कार कर, उन्हें विदा किया।

श्लोक 7 (skanda.8.156.7)

सनत्कुमार उवाच । एवं तमन्धकं जित्वा कृत्वा च गणनायकम् । विसृज्य च सुरान् देवो विजहार सुरार्तिहा

sanatkumāra uvāca | evaṁ tamandhakaṁ jitvā kṛtvā ca gaṇanāyakam | visṛjya ca surān devo vijahāra surārtihā

सनत्कुमार ने कहा - इस प्रकार उस अन्धक को जीतकर और उसे गणनायक बनाकर, सुरों के दुःख का नाश करने वाले देव, देवताओं को विदा कर स्वेच्छा से विहार करने लगे।

श्लोक 8 (skanda.8.156.8)

इमं यो ह्यन्धकवधं पठेत द्विजसंसदि । ब्राह्मणो लभते यो रक्षां न संशयः

imaṁ yo hyandhakavadhaṁ paṭheta dvijasaṁsadi | brāhmaṇo labhate yo rakṣāṁ na saṁśayaḥ

जो कोई भी इस अन्धक-वध की कथा को द्विजों की सभा में पढ़ता है, वह ब्राह्मण उत्तम फल प्राप्त करता है - इसमें रक्षा प्राप्त होने में कोई संशय नहीं है। इस श्लोक के मध्य का एक अंश मूल पाठ में खण्डित है।

श्लोक 9 (skanda.8.156.9)

शरीर योगं रूपं धर्म विन्दति । यच्च त्वा गाणपत्येन युज्यते देहपर्यये

śarīra yogaṁ rūpaṁ dharma vindati | yacca tvā gāṇapatyena yujyate dehaparyaye

यह श्लोक मूल पाठ में अत्यन्त खण्डित है; इतना ही स्पष्ट होता है कि वह शरीर के योग से रूप और धर्म को प्राप्त करता है, और देह-त्याग के समय गणपति-पद से युक्त हो जाता है।

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