अम्बिका खण्ड · अध्याय 157
अन्धक-वर-प्रदान
श्लोक 1 (skanda.8.157.1)
व्यास उवाच । अनुगृह्यान्धकं देवो विसृज्य सगणान् सुरान् । चराचरेशो यच्चक्रे तन्ममाचक्ष्व तत्त्वतः
vyāsa uvāca | anugṛhyāndhakaṁ devo visṛjya sagaṇān surān | carācareśo yaccakre tanmamācakṣva tattvataḥ
व्यास ने कहा - अन्धक पर अनुग्रह कर, गणों-सहित देवताओं को विदा करके, चराचर के स्वामी शिव ने आगे क्या किया, वह मुझे यथार्थ रूप से बताइए।
श्लोक 2 (skanda.8.157.2)
सनत्कुमार उवाच । दिवं देवेषु यातेषु गणपे चान्धके कृते । देवेशोन्धकनन्दिभ्यां सहदेव्या
sanatkumāra uvāca | divaṁ deveṣu yāteṣu gaṇape cāndhake kṛte | deveśondhakanandibhyāṁ sahadevyā
सनत्कुमार ने कहा - देवताओं के स्वर्ग लौट जाने पर और अन्धक को गणपति बना दिए जाने पर, देवेश शिव, अन्धक और नन्दी के साथ, तथा देवी के साथ - इस श्लोक का अन्तिम अंश मूल पाठ में खण्डित है।
श्लोक 3 (skanda.8.157.3)
चिरस्य चन्द्रमौलिस्तु प्रमथाधिपतिर्गृहान् । प्रविश्य रञ्जयामास म्मेरुगृहानिव
cirasya candramaulistu pramathādhipatirgṛhān | praviśya rañjayāmāsa mmerugṛhāniva
बहुत समय बाद चन्द्रशेखर, प्रमथों के अधिपति, अपने भवन में प्रवेश कर - इस श्लोक का मध्य भाग मूल में खण्डित है - मेरु के भवन के समान उसे रमणीय बना रहे थे।
श्लोक 4 (skanda.8.157.4)
सीमां सोमानुवदनां सोमार्धतिलको हरः । सखीनां दृश्यते मध्ये ताराणामिव रोहिणी
sīmāṁ somānuvadanāṁ somārdhatilako haraḥ | sakhīnāṁ dṛśyate madhye tārāṇāmiva rohiṇī
चन्द्र-अर्ध से सुशोभित हर, चन्द्रमुखी उमा की सीमा तक पहुँचे - इस श्लोक की मध्य पंक्ति मूल में खण्डित है - वह अपनी सखियों के मध्य वैसे ही दिखाई दे रही थीं, जैसे तारों के मध्य रोहिणी।
श्लोक 5 (skanda.8.157.5)
दृष्टवा देव्यपि देवेशमुपायातं वृषध्वजम् । उत्तस्थावासनात्तूर्णं सखीभिः सहिता तदा
dṛṣṭavā devyapi deveśamupāyātaṁ vṛṣadhvajam | uttasthāvāsanāttūrṇaṁ sakhībhiḥ sahitā tadā
देवी ने भी वृषभध्वज देवेश को आते हुए देखकर, सखियों-सहित तुरन्त आसन से उठ खड़ी हुईं।
श्लोक 6 (skanda.8.157.6)
शिरस्यञ्जलिमाधाय पद्मकुड्मलसन्निभम् । ववन्दे चरणौ तस्य प्रीयमाणेन चेतसा
śirasyañjalimādhāya padmakuḍmalasannibham | vavande caraṇau tasya prīyamāṇena cetasā
सिर पर कमल-कली के समान अंजलि बाँधकर, प्रसन्न मन से उन्होंने उनके दोनों चरणों की वन्दना की।
श्लोक 7 (skanda.8.157.7)
देवोपि तां समुत्थाप्य तयैव सहितः प्रभुः । निषसादासने रत्नमयूखपरिपिञ्जरे
devopi tāṁ samutthāpya tayaiva sahitaḥ prabhuḥ | niṣasādāsane ratnamayūkhaparipiñjare
देव भी उन्हें उठाकर, उन्हीं के साथ, रत्न-किरणों से पीत आसन पर विराजमान हुए।
श्लोक 8 (skanda.8.157.8)
अन्धकञ्च जितं युद्धे देव्याः प्रियचिकीर्षया । शङ्करः कथयामास पुनश्च प्रवरीकृतम्
andhakañca jitaṁ yuddhe devyāḥ priyacikīrṣayā | śaṅkaraḥ kathayāmāsa punaśca pravarīkṛtam
देवी को प्रसन्न करने की इच्छा से शंकर ने युद्ध में जीते गए अन्धक की कथा फिर से सुनाई, और उसे कैसे श्रेष्ठ पद पर स्थापित किया, यह भी बताया।
श्लोक 9 (skanda.8.157.9)
अन्धकोयं तव सुतो ममैव नयनोद्भवः । आसुरं त्याजितो भावं त्वामवज्ञातवान् हि यः
andhakoyaṁ tava suto mamaiva nayanodbhavaḥ | āsuraṁ tyājito bhāvaṁ tvāmavajñātavān hi yaḥ
यह अन्धक तुम्हारा पुत्र है, मेरे ही नेत्र से उत्पन्न हुआ है। जिसने तुम्हारा तिरस्कार किया था, उसे आसुरी भाव से मुक्त कर दिया गया है।
श्लोक 10 (skanda.8.157.10)
इत्युक्तवति देवेशे शङ्करेन्धकदानवः । प्रणतः प्राञ्जलिर्भूत्वा व्यज्ञापयत पार्वतीम्
ityuktavati deveśe śaṅkarendhakadānavaḥ | praṇataḥ prāñjalirbhūtvā vyajñāpayata pārvatīm
देवेश के इस प्रकार कहने पर, अन्धक दानव प्रणत होकर, हाथ जोड़कर पार्वती से निवेदन करने लगा।
श्लोक 11 (skanda.8.157.11)
देव्यन्धकोहं देवेन प्रकृतानुग्रहः शुभे । तव प्रेष्यत्वमायातः पश्य मां सौम्यचक्षुषा
devyandhakohaṁ devena prakṛtānugrahaḥ śubhe | tava preṣyatvamāyātaḥ paśya māṁ saumyacakṣuṣā
हे कल्याणी देवि! मैं अन्धक, शिव द्वारा अनुगृहीत होकर आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूँ - मुझे सौम्य दृष्टि से देखिए।
श्लोक 12 (skanda.8.157.12)
अम्ब तन्मे व्यतिक्रान्तं यन्मे दानवजं तव । देवेनानुगृहीतोहं तव हासश्च किङ्करः
amba tanme vyatikrāntaṁ yanme dānavajaṁ tava | devenānugṛhītohaṁ tava hāsaśca kiṅkaraḥ
हे माता! मेरा जो भी दानव-सुलभ अपराध आपके प्रति हुआ, वह अब बीत चुका है। देव द्वारा अनुगृहीत होकर मैं आपकी हँसी का भी दास हूँ।
श्लोक 13 (skanda.8.157.13)
क्षान्तं दान्तञ्च भक्तञ्च त्ददाश्रयपरायणम् । विद्धि मामम्ब शुद्धेन भावेन समवस्थितम्
kṣāntaṁ dāntañca bhaktañca tdadāśrayaparāyaṇam | viddhi māmamba śuddhena bhāvena samavasthitam
मुझे क्षमाशील, संयमी, भक्त और आपके ही आश्रय में तत्पर जानिए - हे माता! शुद्ध भाव से स्थित मुझे पहचानिए।
श्लोक 14 (skanda.8.157.14)
इत्येवमुक्त्वा गिरिजां गिरिकूटनिभोन्धकः । वाग्भिराहवनीयाभिरस्तुवत् प्राञ्जलिर्नतः
ityevamuktvā girijāṁ girikūṭanibhondhakaḥ | vāgbhirāhavanīyābhirastuvat prāñjalirnataḥ
पर्वत-शिखर के समान विशाल अन्धक इस प्रकार गिरिजा से कहकर, हाथ जोड़कर, नमन करते हुए यज्ञ-योग्य वाणियों से उनकी स्तुति करने लगा।
श्लोक 15 (skanda.8.157.15)
विभावरी वारिचरी शर्वरी शर्ववल्लभा । धृतिर्मतिस्तथा कीर्तिर्दीप्तिः प्राप्तिः प्रमोहिनी
vibhāvarī vāricarī śarvarī śarvavallabhā | dhṛtirmatistathā kīrtirdīptiḥ prāptiḥ pramohinī
विभावरी, वारिचरी, शर्वरी, शर्ववल्लभा, धृति, मति, कीर्ति, दीप्ति, प्राप्ति, प्रमोहिनी -
श्लोक 16 (skanda.8.157.16)
मेधा सुधा तथा साध्वी स्वधा स्वाहा महाद्युतिः । पुष्टिरिष्टिस्तथा तुष्टिर्गृष्टिर्दृष्टिस्त्रुटिस्तडित्
medhā sudhā tathā sādhvī svadhā svāhā mahādyutiḥ | puṣṭiriṣṭistathā tuṣṭirgṛṣṭirdṛṣṭistruṭistaḍit
मेधा, सुधा, साध्वी, स्वधा, स्वाहा, महाद्युति, पुष्टि, इष्टि, तुष्टि, गृष्टि, दृष्टि, त्रुटि, तडित् -
श्लोक 17 (skanda.8.157.17)
स्मृतिः प्रीतिः स्पृहा हानिर्वाणी ग्लानिर्दया क्रिया । लक्ष्मीः श्रीः सन्नतिः श्रद्धा माया मायाधरार्चिता
smṛtiḥ prītiḥ spṛhā hānirvāṇī glānirdayā kriyā | lakṣmīḥ śrīḥ sannatiḥ śraddhā māyā māyādharārcitā
स्मृति, प्रीति, स्पृहा, हानि, वाणी, ग्लानि, दया, क्रिया, लक्ष्मी, श्री, सन्नति, श्रद्धा, माया, तथा मायाधर विष्णु द्वारा पूजित -
श्लोक 18 (skanda.8.157.18)
अदितिर्दितिस्तथा कद्रूः सिंहिका सुरसा दनुः । राका कुहूः सिनीवाली चर्षणी सुखदायिनी
aditirditistathā kadrūḥ siṁhikā surasā danuḥ | rākā kuhūḥ sinīvālī carṣaṇī sukhadāyinī
अदिति, दिति, कद्रू, सिंहिका, सुरसा, दनु, राका, कुहू, सिनीवाली, चर्षणी, सुखदायिनी -
श्लोक 19 (skanda.8.157.19)
दीक्षा दक्षावरा रक्षा शिक्षा कक्षनिकेतना । सुगन्धा सुभगा भव्या भूतभव्यभवत्करी
dīkṣā dakṣāvarā rakṣā śikṣā kakṣaniketanā | sugandhā subhagā bhavyā bhūtabhavyabhavatkarī
दीक्षा, दक्षावरा, रक्षा, शिक्षा, कक्षनिकेतना, सुगन्धा, सुभगा, भव्या, भूत-भव्य-भवत्करी - अर्थात् भूत, भविष्य और वर्तमान की रचयिता -
श्लोक 20 (skanda.8.157.20)
धरणी धारणी धन्या वीरणी वै गुहारणी । ला गोला तथा चैव मङ्गलाविधा तथा
dharaṇī dhāraṇī dhanyā vīraṇī vai guhāraṇī | lā golā tathā caiva maṅgalāvidhā tathā
धरणी, धारणी, धन्या, वीरणी, गुहारणी, ला, गोला, तथा मंगलविधा -
श्लोक 21 (skanda.8.157.21)
रोवृता सता सक्षत्रनन्दिनी । नक्षत्रचित्रा द्यौः पृथ्वी क्रिया स्मृतिरलोलुपा
rovṛtā satā sakṣatranandinī | nakṣatracitrā dyauḥ pṛthvī kriyā smṛtiralolupā
इस श्लोक की पहली पंक्ति मूल में खण्डित है, जिसमें केवल इतना पढ़ा जा सकता है - आवृत, सती, तारे-सी पुत्री। दूसरी पंक्ति में - नक्षत्रचित्रा, द्यौ, पृथ्वी, क्रिया, तथा अलोलुप स्मृति -
श्लोक 22 (skanda.8.157.22)
शुद्धा शुद्धिः सुधीः कीर्तिः कृत्तिवासोधरप्रिया । धनुर्ज्या जयिनी पूज्या ईज्या व्रज्या जयप्रदा
śuddhā śuddhiḥ sudhīḥ kīrtiḥ kṛttivāsodharapriyā | dhanurjyā jayinī pūjyā ījyā vrajyā jayapradā
शुद्धा, शुद्धि, सुधी, कीर्ति, कृत्तिवासोधरप्रिया - अर्थात् कृत्तिवासा शिव की प्रिया, धनुर्ज्या, जयिनी, पूज्या, ईज्या, व्रज्या, जयप्रदा -
श्लोक 23 (skanda.8.157.23)
वरावरेण्या वरदा वरनारी वचोरणि । भूतिर्भूताधिजननी सुकृतिः सुमना रतिः
varāvareṇyā varadā varanārī vacoraṇi | bhūtirbhūtādhijananī sukṛtiḥ sumanā ratiḥ
वरावरेण्या, वरदा, वरनारी, वचोरणि, भूति, भूताधिजननी - अर्थात् सर्व प्राणियों की जननी, सुकृति, सुमना, रति -
श्लोक 24 (skanda.8.157.24)
भारती भासमायुक्ता युक्तरक्तवचोधरी । आज्ञा प्रज्ञा तथा संज्ञा उल्का नासासमुद्भवा । वेदमातथ गायत्री दुर्गा सावित्र्यथापि च
bhāratī bhāsamāyuktā yuktaraktavacodharī | ājñā prajñā tathā saṁjñā ulkā nāsāsamudbhavā | vedamātatha gāyatrī durgā sāvitryathāpi ca
भारती, भासमायुक्ता, युक्तरक्तवचोधरी, आज्ञा, प्रज्ञा, संज्ञा, उल्का, नासासमुद्भवा, वेदमाता, गायत्री, दुर्गा, तथा सावित्री भी -
श्लोक 25 (skanda.8.157.25)
धर्म्मिणी धर्मजननी तेजनी तेजसां वरा । रजनी रञ्जनी धीरा योनिर्वनजलोचना
dharmmiṇī dharmajananī tejanī tejasāṁ varā | rajanī rañjanī dhīrā yonirvanajalocanā
धर्मिणी, धर्मजननी, तेजनी, तेजस्विनियों में श्रेष्ठ, रजनी, रञ्जनी, धीरा, तथा कमल-नेत्रों वाली योनि - सृष्टि का उद्गम -
श्लोक 26 (skanda.8.157.26)
श्रदर्थिनी दनुनदी श्रुतार्था श्रुतवत्तरा । बलयालातकधरा मेखला मेखलाधरा
śradarthinī danunadī śrutārthā śrutavattarā | balayālātakadharā mekhalā mekhalādharā
श्रदर्थिनी, दनुनदी, श्रुतार्था, श्रुतवत्तरा, कंकण और अंगारे धारण करने वाली, मेखला, मेखलाधरा -
श्लोक 27 (skanda.8.157.27)
प्रीयतां मे जगद्धात्री श्यामा श्यामाम्बरा ह्युमा । इत्येवमन्धकेनेशा स्तुता स्तुतिशतस्तुता
prīyatāṁ me jagaddhātrī śyāmā śyāmāmbarā hyumā | ityevamandhakeneśā stutā stutiśatastutā
हे जगद्धात्री! हे श्यामा! नीलाम्बरधारिणी उमा! मुझसे प्रसन्न होइए। इस प्रकार अन्धक द्वारा सैकड़ों स्तुतियों से स्तुत ईश्वरी की स्तुति की गई।
श्लोक 28 (skanda.8.157.28)
अन्धकस्य तुतोषाति तुष्टा चेदमुवाच तम् । प्रीतास्मि पुत्र यत् प्राप्तं गाणपत्यं त्वया शुभम् । प्रियोधुना वरस्तूर्णं व्रियतां प्रवरोत्तम
andhakasya tutoṣāti tuṣṭā cedamuvāca tam | prītāsmi putra yat prāptaṁ gāṇapatyaṁ tvayā śubham | priyodhunā varastūrṇaṁ vriyatāṁ pravarottama
अन्धक की इस स्तुति से अत्यन्त प्रसन्न होकर देवी ने उससे कहा - 'हे पुत्र! मैं प्रसन्न हूँ कि तुझे यह शुभ गणपति-पद प्राप्त हुआ। अब तू प्रिय है; हे श्रेष्ठतम! तुरन्त कोई वर माँग ले।'
श्लोक 29 (skanda.8.157.29)
सनत्कुमार उवाच । भवानीं वरदां दृष्टवा सोन्धको गणपोत्तमः । प्रणतः प्राञ्जलिः प्राह हिमवत्तनयामुमाम्
sanatkumāra uvāca | bhavānīṁ varadāṁ dṛṣṭavā sondhako gaṇapottamaḥ | praṇataḥ prāñjaliḥ prāha himavattanayāmumām
सनत्कुमार ने कहा - वरदान देने को उद्यत भवानी को देखकर, गणपतियों में श्रेष्ठ वह अन्धक प्रणत होकर, हाथ जोड़कर हिमालय-पुत्री उमा से बोला।
श्लोक 30 (skanda.8.157.30)
यञ्च त्वं मे वरं देवि ददासीशानबल्लभे । मम तेन समस्तेन त्वयि भक्तिः स्थिरा भवेत्
yañca tvaṁ me varaṁ devi dadāsīśānaballabhe | mama tena samastena tvayi bhaktiḥ sthirā bhavet
हे देवि! हे ईशान-प्रिये! आप मुझे जो भी वर दें, उससे मेरी आप में भक्ति सदा स्थिर बनी रहे - यही मुझे चाहिए।
श्लोक 31 (skanda.8.157.31)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भगवत्यपराजिता । उवाचान्धकमासाद्य प्रीयमाणा पुनस्तदा
tasya tadvacanaṁ śrutvā bhagavatyaparājitā | uvācāndhakamāsādya prīyamāṇā punastadā
उसका यह वचन सुनकर अजेय भगवती पार्वती अन्धक के पास जाकर, अत्यन्त प्रसन्न होकर पुनः बोलीं।
श्लोक 32 (skanda.8.157.32)
ज्ञानेनानेन तुष्टास्मि तव पुत्र शुभेन वै । यन्मत्तोर्थितवानद्य त्वं भक्तिं प्रवरेश्वर
jñānenānena tuṣṭāsmi tava putra śubhena vai | yanmattorthitavānadya tvaṁ bhaktiṁ pravareśvara
हे पुत्र! तेरे इस शुभ ज्ञान से मैं प्रसन्न हूँ, कि तूने आज मुझसे यह भक्ति ही माँगी है, हे श्रेष्ठेश्वर!
श्लोक 33 (skanda.8.157.33)
मच्छन्दादेव चाप्येतद् गाणपत्यं तवानघ । दत्तं देवाधिदेवेन तेन चास्मि सुतोषिता
macchandādeva cāpyetad gāṇapatyaṁ tavānagha | dattaṁ devādhidevena tena cāsmi sutoṣitā
हे निष्पाप! यह गणपति-पद तुझे मेरी ही इच्छा से देवाधिदेव के द्वारा दिया गया है, इसलिए मैं भी सन्तुष्ट हूँ।
श्लोक 34 (skanda.8.157.34)
तस्माच्चादित्यपाकात्ते सुयुद्धेन च पुत्रक । पापव्ययो महानासीत् तेनासि प्रवरीकृतः
tasmāccādityapākātte suyuddhena ca putraka | pāpavyayo mahānāsīt tenāsi pravarīkṛtaḥ
हे पुत्र! सूर्य की अग्नि में पकाए जाने और नन्दी से भीषण युद्ध करने के कारण तेरा महान् पाप-क्षय हुआ, इसीलिए तू श्रेष्ठ बनाया गया है।
श्लोक 35 (skanda.8.157.35)
अमरो जरया त्यक्तो बली बलवतामपि । तपस्वी ह्यक्षयो जेता नन्दिवत्त्वं भविष्यसि
amaro jarayā tyakto balī balavatāmapi | tapasvī hyakṣayo jetā nandivattvaṁ bhaviṣyasi
तू जरा से मुक्त अमर, बलवानों में भी बली, तपस्वी, अक्षय और विजयी नन्दी के समान ही होगा।
श्लोक 36 (skanda.8.157.36)
मम देवस्य चापीष्टः किङ्करो मम चाप्यथ । भव त्वमनघः श्रीमान् गणेश्वरगणेश्वरः
mama devasya cāpīṣṭaḥ kiṅkaro mama cāpyatha | bhava tvamanaghaḥ śrīmān gaṇeśvaragaṇeśvaraḥ
तू मुझ देवी और शिवदेव दोनों का ही प्रिय किंकर बन। हे निष्पाप! तू श्रीमान् और गणेश्वरों का भी ईश्वर हो जा।
श्लोक 37 (skanda.8.157.37)
ये च त्वां कीर्त्तयिष्यन्ति दिवा रात्रावथापि वा । तेषां कीर्त्तिर्यशः स्वर्गो धर्मश्चैव भविष्यति
ye ca tvāṁ kīrttayiṣyanti divā rātrāvathāpi vā | teṣāṁ kīrttiryaśaḥ svargo dharmaścaiva bhaviṣyati
जो भी लोग दिन में या रात्रि में तेरा कीर्तन करेंगे, उन्हें कीर्ति, यश, स्वर्ग और धर्म भी प्राप्त होंगे।
श्लोक 38 (skanda.8.157.38)
स त्वेवमुक्तः पार्वत्या अन्धकोर्चितमानितः । अनुज्ञातश्च पार्वत्या मुमुदे हरपार्श्वगः
sa tvevamuktaḥ pārvatyā andhakorcitamānitaḥ | anujñātaśca pārvatyā mumude harapārśvagaḥ
पार्वती द्वारा इस प्रकार सम्मानित और आदृत होकर, हरपार्श्ववर्ती अन्धक अत्यन्त प्रसन्न हुआ।
श्लोक 39 (skanda.8.157.39)
इत्येवमन्धकं देवस्तमोरिकृतभूषणः । अनुगृह्य गिरौ तस्मिन् विजहार यथासुखम्
ityevamandhakaṁ devastamorikṛtabhūṣaṇaḥ | anugṛhya girau tasmin vijahāra yathāsukham
इस प्रकार अन्धकासुर के अन्धकार को दूर करने वाले भगवान् शिव ने उसे अनुग्रहीत कर, उसी पर्वत पर सुखपूर्वक विहार किया।