अम्बिका खण्ड · अध्याय 158
भूमिज-पुत्र-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.8.158.1)
व्यास उवाच । अन्धकं गणपं कृत्वा देव्या सह महेश्वरः । किं चक्रेतः परं ब्रूहि नुद कौतूहलं मम
vyāsa uvāca | andhakaṁ gaṇapaṁ kṛtvā devyā saha maheśvaraḥ | kiṁ cakretaḥ paraṁ brūhi nuda kautūhalaṁ mama
व्यास ने कहा - अन्धक को गणपति बनाकर, देवी-सहित महेश्वर ने इसके बाद और क्या किया, वह बताइए और मेरी जिज्ञासा को दूर कीजिए।
श्लोक 2 (skanda.8.158.2)
सनत्कुमार उवाच । जित्वान्धकं ततो व्यास कृत्वा च गणनायकम् । गिरीन्द्रसुतया सार्धं विजहार सुरार्त्तिहा
sanatkumāra uvāca | jitvāndhakaṁ tato vyāsa kṛtvā ca gaṇanāyakam | girīndrasutayā sārdhaṁ vijahāra surārttihā
सनत्कुमार ने कहा - हे व्यास! अन्धक को जीतकर और उसे गणनायक बनाकर, देवताओं के दुःख का नाश करने वाले भगवान् पर्वतराज-पुत्री के साथ विहार करने लगे।
श्लोक 3 (skanda.8.158.3)
अथ भूतेशजननी षडाननतनूकरी । अपृच्छत् पुत्रसम्बद्धं प्रश्नं प्रश्नविदां वरा
atha bhūteśajananī ṣaḍānanatanūkarī | apṛcchat putrasambaddhaṁ praśnaṁ praśnavidāṁ varā
तब भूतेश की पत्नी, षडानन कार्तिकेय को जन्म देने वाली, प्रश्नविदों में श्रेष्ठ देवी ने पुत्र से सम्बन्धित एक प्रश्न पूछा।
श्लोक 4 (skanda.8.158.4)
किमर्थं गीयते देव गाथेयं सद्भिरुत्तमा । वरं भूमिरुहाः पञ्च न च कोष्ठरुहा दश
kimarthaṁ gīyate deva gātheyaṁ sadbhiruttamā | varaṁ bhūmiruhāḥ pañca na ca koṣṭharuhā daśa
हे देव! सज्जनों द्वारा गाई गई यह उत्तम गाथा किसलिए है कि पाँच वृक्ष-सुत श्रेष्ठ हैं, परन्तु दस कोष्ठज पुत्र भी उनके समान नहीं?
श्लोक 5 (skanda.8.158.5)
षोडशेहाङ्गमङ्गानि भित्त्वा पुत्रोभिजायते । तस्मात्पुत्रात् कथं श्रेष्ठः कोष्ठजाद् भुविजः सुतः
ṣoḍaśehāṅgamaṅgāni bhittvā putrobhijāyate | tasmātputrāt kathaṁ śreṣṭhaḥ koṣṭhajād bhuvijaḥ sutaḥ
सोलह अंगों को भेदकर, गर्भ के भीतर विकसित होकर, यहाँ पुत्र जन्म लेता है - फिर उस कोष्ठज पुत्र से भूमि में उत्पन्न पुत्र कैसे श्रेष्ठ है?
श्लोक 6 (skanda.8.158.6)
इत्येवं वृच्छतीं पृच्छां शिक्षां दीक्षां क्रियां मतिम् । उमामनुपमां देव इदं वचनमब्रवीत्
ityevaṁ vṛcchatīṁ pṛcchāṁ śikṣāṁ dīkṣāṁ kriyāṁ matim | umāmanupamāṁ deva idaṁ vacanamabravīt
इस प्रकार शिक्षा, दीक्षा, क्रिया और बुद्धिपूर्वक प्रश्न पूछती हुई अनुपमा उमा से देव ने यह वचन कहा।
श्लोक 7 (skanda.8.158.7)
सूक्ष्मार्थं एष रम्भोरु यं पृच्छसि वरानने । अहं ते तं प्रवक्ष्यामि शैलेन्द्रतनयेव्यये
sūkṣmārthaṁ eṣa rambhoru yaṁ pṛcchasi varānane | ahaṁ te taṁ pravakṣyāmi śailendratanayevyaye
हे रम्भा-सी जंघाओं वाली, हे वरानने! तुम जो सूक्ष्म अर्थवाला प्रश्न पूछ रही हो, उसे मैं तुम्हें बताता हूँ, हे अविनाशिनी शैलेन्द्र-पुत्री!
श्लोक 8 (skanda.8.158.8)
कोष्ठजात्तनयाद्यस्माद् भूमिजस्तनयो वरः । शाल्मलौ वैतरण्यां च असिपत्रवनेषु च
koṣṭhajāttanayādyasmād bhūmijastanayo varaḥ | śālmalau vaitaraṇyāṁ ca asipatravaneṣu ca
भूमि से उत्पन्न पुत्र कोष्ठज पुत्र से इसलिए श्रेष्ठ है - क्योंकि शाल्मलि वृक्ष पर, वैतरणी नदी में, और असिपत्र वन में -
श्लोक 9 (skanda.8.158.9)
कुम्भीपाके रौरवे च महारौरव एव च । एवमाद्येषु चान्येषु कुकृतैरनुवेष्टितान् । शास्यतो मृत्युवचनाद्राक्षसैः क्रूरकर्मभिः
kumbhīpāke raurave ca mahāraurava eva ca | evamādyeṣu cānyeṣu kukṛtairanuveṣṭitān | śāsyato mṛtyuvacanādrākṣasaiḥ krūrakarmabhiḥ
कुम्भीपाक, रौरव, महारौरव तथा इन आदि अन्य नरकों में, अपने कुकर्मों से घिरे हुए, यमराज की आज्ञा से क्रूरकर्मा राक्षसों द्वारा दण्डित किए जाने वाले पितरों को -
श्लोक 10 (skanda.8.158.10)
पितॄँस्तथाशुभैर्घोरैर्वेष्टितान् राक्षासार्दितान् । सत्पुत्रस्त्रायते देवि नेतरः पापनिश्चयः
pitṝ~stathāśubhairghorairveṣṭitān rākṣāsārditān | satputrastrāyate devi netaraḥ pāpaniścayaḥ
- ऐसे अशुभ और भयंकर यातनाओं से घिरे, राक्षसों से पीड़ित पितरों को केवल सत्पुत्र ही बचाता है, हे देवि! पापनिश्चयी अन्य कोई नहीं।
श्लोक 11 (skanda.8.158.11)
नरस्य न च सत्पुत्राः सर्व एव भवन्त्युत । एक एवात्र भवति यः पितॄँस्त्रायते भयात्
narasya na ca satputrāḥ sarva eva bhavantyuta | eka evātra bhavati yaḥ pitṝ~strāyate bhayāt
किसी मनुष्य के सभी पुत्र सत्पुत्र नहीं होते; इनमें से केवल एक ही ऐसा होता है जो पितरों को भय से बचाता है।
श्लोक 12 (skanda.8.158.12)
तत्र ये दुष्टचारित्राः पुत्रसंख्यां न ते गताः । शठो यद्वद्बलीवर्दः षण्ढो वापि नराधिपः
tatra ye duṣṭacāritrāḥ putrasaṁkhyāṁ na te gatāḥ | śaṭho yadvadbalīvardaḥ ṣaṇḍho vāpi narādhipaḥ
उनमें से जो दुष्ट-चरित्र वाले हैं, वे पुत्र की गणना में नहीं आते - जैसे धूर्त बैल, या नपुंसक राजा भी सच्चा राजा नहीं कहलाता।
श्लोक 13 (skanda.8.158.13)
तत्रापि चोद्यते दुःखं दुःखं च नरकं विदुः । यत् पितॄँस्त्रायते तस्मात् सुतः पुत्रस्ततः स्मृतः
tatrāpi codyate duḥkhaṁ duḥkhaṁ ca narakaṁ viduḥ | yat pitṝ~strāyate tasmāt sutaḥ putrastataḥ smṛtaḥ
वहाँ भी दुःख ही दुःख उत्पन्न होता रहता है, और नरक को भी दुःख ही माना गया है। जो पितरों को बचाता है, उसी से 'पुत्र' शब्द की व्युत्पत्ति मानी गई है।
श्लोक 14 (skanda.8.158.14)
नान्यः सम्बद्धको देवि पितुः पुत्रस्य चोभयोः । पाति पुत्रं पिता तस्मात् पुत्रो यत् त्रायते भयात्
nānyaḥ sambaddhako devi pituḥ putrasya cobhayoḥ | pāti putraṁ pitā tasmāt putro yat trāyate bhayāt
हे देवि! पिता और पुत्र, दोनों के बीच कोई और सम्बन्ध नहीं है - पिता पुत्र का पालन करता है, इसलिए पुत्र भी उसे भय से बचाता है।
श्लोक 15 (skanda.8.158.15)
इन्द्रियाणां तु प्राबल्यात् तत् पुत्रेष्वपि पार्वति । पापकान्यपि कुर्वन्ति ते सत्पुत्रा भवन्त्युत
indriyāṇāṁ tu prābalyāt tat putreṣvapi pārvati | pāpakānyapi kurvanti te satputrā bhavantyuta
किन्तु हे पार्वति! इन्द्रियों की प्रबलता के कारण पुत्रों में भी कुछ पाप कर बैठते हैं, फिर भी वे सत्पुत्र ही कहलाते हैं।
श्लोक 16 (skanda.8.158.16)
इमे हि तरवो देवि दक्षशापाद् हतेन्द्रियाः । पापकानि न कुर्वन्ति संवृतैः करणैश्च ह
ime hi taravo devi dakṣaśāpād hatendriyāḥ | pāpakāni na kurvanti saṁvṛtaiḥ karaṇaiśca ha
किन्तु ये वृक्ष, हे देवि! दक्ष के शाप से इन्द्रिय-रहित होकर, संवृत इन्द्रियों के कारण कोई पाप नहीं करते।
श्लोक 17 (skanda.8.158.17)
एतस्मात् कारणाद् देवि कोष्ठजानां शतादपि । एको भूमिरुहः पुत्रः शस्यते न तु कोष्ठजः
etasmāt kāraṇād devi koṣṭhajānāṁ śatādapi | eko bhūmiruhaḥ putraḥ śasyate na tu koṣṭhajaḥ
इसी कारण से, हे देवि! सौ कोष्ठज पुत्रों की तुलना में भी एक ही वृक्ष-पुत्र श्रेष्ठ माना जाता है, कोष्ठज नहीं।
श्लोक 18 (skanda.8.158.18)
छेदं भेदं तथा त्रासं पाटनञ्च निशाचरैः । कुर्वद्भिस्तरवः पुत्राः पितॄणां
chedaṁ bhedaṁ tathā trāsaṁ pāṭanañca niśācaraiḥ | kurvadbhistaravaḥ putrāḥ pitṝṇāṁ
निशाचरों द्वारा छेदन, भेदन, त्रास और विदारण किए जाते हुए भी वृक्ष-पुत्र पितरों के लिए उन्हें बचाते हैं - इस श्लोक का शेष भाग मूल पाठ में खण्डित है।
श्लोक 19 (skanda.8.158.19)
उमोवाच । छेदं भेदं त्रासनं च राक्षसैर्निरयोपगैः । कथं पितॄणां तरवो वारयन्ति यमक्षये
umovāca | chedaṁ bhedaṁ trāsanaṁ ca rākṣasairnirayopagaiḥ | kathaṁ pitṝṇāṁ taravo vārayanti yamakṣaye
उमा ने कहा - 'नरकवासी राक्षसों द्वारा किए जाते हुए छेदन, भेदन और त्रास को यम के क्षय-स्थान में वृक्ष कैसे रोक सकते हैं?'
श्लोक 20 (skanda.8.158.20)
देवदेव उवाच । शृणुष्व छेदं भेदं च पितॄणां यमसादने । यथा वै पारयन्त्येते तरवो नागनन्दिनि
devadeva uvāca | śṛṇuṣva chedaṁ bhedaṁ ca pitṝṇāṁ yamasādane | yathā vai pārayantyete taravo nāganandini
देवदेव ने कहा - 'हे नागनन्दिनि! सुनो, यम के धाम में पितरों के छेदन और भेदन को ये वृक्ष जिस प्रकार पार करा देते हैं -'
श्लोक 21 (skanda.8.158.21)
एते निरुद्यमा देवि विहीनाः करणैरुत । यज्ञेर्थितास्ते देवानां तरवो
ete nirudyamā devi vihīnāḥ karaṇairuta | yajñerthitāste devānāṁ taravo
ये वृक्ष, हे देवि! उद्यमरहित और इन्द्रियों से भी रहित होने पर भी, देवताओं के यज्ञ के लिए याचना करते हैं - इस श्लोक का शेष भाग मूल में खण्डित है।
श्लोक 22 (skanda.8.158.22)
दक्षशापेन भगवन् वयं ह्युपहतेन्द्रियाः
dakṣaśāpena bhagavan vayaṁ hyupahatendriyāḥ
यह श्लोक अपने प्रथम पाद में मूल पाठ में पूर्णतः खण्डित है। शेष भाग में वृक्ष कहते हैं - 'हे भगवन्! दक्ष के शाप से हम इन्द्रिय-रहित हो गए हैं।'
श्लोक 23 (skanda.8.158.23)
तमोबाहुल्यतां प्राप्ता निष्क्रिया निष्परिक्रमाः । असुखाः करणैर्हीना महता तमसावृताः
tamobāhulyatāṁ prāptā niṣkriyā niṣparikramāḥ | asukhāḥ karaṇairhīnā mahatā tamasāvṛtāḥ
हम अत्यन्त तमोमय अवस्था को प्राप्त, निष्क्रिय, गतिहीन, इन्द्रिय-रहित होने से सुखरहित तथा घोर तमस् से आच्छादित हैं।
श्लोक 24 (skanda.8.158.24)
एतां दशामनुप्रप्ता धर्मयुक्तान् कुरुष्व नः । इत्येषां वचनं श्रुत्वा देवः सलिलसम्भवः
etāṁ daśāmanupraptā dharmayuktān kuruṣva naḥ | ityeṣāṁ vacanaṁ śrutvā devaḥ salilasambhavaḥ
'इस दशा को प्राप्त हम पर कृपा कर हमें धर्मयुक्त बना दीजिए' - इनका यह वचन सुनकर, जलसे उत्पन्न देव ब्रह्मा -
श्लोक 25 (skanda.8.158.25)
यज्ञवृक्षार्थमाहेदं वृक्षान् वृक्षपतिर्वचः । स्थावराः स्वागतं वोस्तु तुष्यामि शरणैषिणाम् । नाशयाम्येष वो वत्सा दक्षशापकृतं तमः
yajñavṛkṣārthamāhedaṁ vṛkṣān vṛkṣapatirvacaḥ | sthāvarāḥ svāgataṁ vostu tuṣyāmi śaraṇaiṣiṇām | nāśayāmyeṣa vo vatsā dakṣaśāpakṛtaṁ tamaḥ
- यज्ञ-वृक्षों के हित के लिए वृक्षों के स्वामी ब्रह्मा ने यह वचन कहा - 'हे स्थावरो! तुम्हारा स्वागत है। शरणागतों से मैं प्रसन्न हूँ। हे वत्सो! मैं तुम्हारे दक्ष-शाप-जनित इस अन्धकार को नष्ट कर दूँगा।'
श्लोक 26 (skanda.8.158.26)
शाला बिल्वाः पलाशाश्च वरुणाः किंशुकास्तथा । रोहीतकाश्च ये चान्ये यज्ञांगप्रभवा द्रुमाः
śālā bilvāḥ palāśāśca varuṇāḥ kiṁśukāstathā | rohītakāśca ye cānye yajñāṁgaprabhavā drumāḥ
शाल, बिल्व, पलाश, वरुण, किंशुक, रोहीतक तथा अन्य जो भी यज्ञांगों में प्रयुक्त होने वाले वृक्ष हैं -
श्लोक 27 (skanda.8.158.27)
ते सूपयुक्ता यज्ञेषु त्वक्पत्रफलशाखिनः । मूर्त्तीः सुभास्वराः प्राप्य मम लोके निवत्स्यथ
te sūpayuktā yajñeṣu tvakpatraphalaśākhinaḥ | mūrttīḥ subhāsvarāḥ prāpya mama loke nivatsyatha
यज्ञों में जिनकी छाल, पत्ते, फल और शाखाएँ भली-भाँति उपयोग में आती हैं - वे उज्ज्वल मूर्तियाँ प्राप्त कर मेरे लोक में निवास करेंगे।
श्लोक 28 (skanda.8.158.28)
एषां यज्ञियवृक्षाणां यूयमप्यनुगामिनः । यज्ञोपयुक्ता गच्छध्वं तेषामेव सलोकताम्
eṣāṁ yajñiyavṛkṣāṇāṁ yūyamapyanugāminaḥ | yajñopayuktā gacchadhvaṁ teṣāmeva salokatām
तुम भी इन यज्ञिय वृक्षों का अनुसरण करने वाले बनकर, यज्ञ में उपयोग में आकर, उन्हीं के लोक की समानता को प्राप्त होगे।
श्लोक 29 (skanda.8.158.29)
स्थाणुलिङ्गोपयुक्ताश्च जनैर्भक्तिपुरस्सरैः । धर्मेण शुद्धदेहाश्च गतिमिष्टामवाप्स्यथ
sthāṇuliṅgopayuktāśca janairbhaktipurassaraiḥ | dharmeṇa śuddhadehāśca gatimiṣṭāmavāpsyatha
भक्तिपूर्वक जनों द्वारा शिवलिंग के रूप में उपयोग में आकर, धर्म से शुद्ध देह होकर, तुम अभीष्ट गति को प्राप्त करोगे।
श्लोक 30 (skanda.8.158.30)
उपयोगं च गच्छन्तो यज्ञायतनवस्तुषु । दक्षशापतमोमुक्ता मम लोके चरिष्यथ
upayogaṁ ca gacchanto yajñāyatanavastuṣu | dakṣaśāpatamomuktā mama loke cariṣyatha
यज्ञ-मण्डपों की वस्तुओं में उपयोग में आते हुए, दक्ष-शाप के अन्धकार से मुक्त होकर, तुम मेरे लोक में विचरण करोगे।
श्लोक 31 (skanda.8.158.31)
पुत्रहीनो नरो यश्च पुत्रकान्वः करिष्यति । तं भयात् त्रायतां चैव धर्मो वो भविता महान्
putrahīno naro yaśca putrakānvaḥ kariṣyati | taṁ bhayāt trāyatāṁ caiva dharmo vo bhavitā mahān
जो भी सन्तानरहित मनुष्य तुममें से किसी को पुत्र बनाएगा, उसे भय से बचाना; इसी से तुम्हें महान् धर्म प्राप्त होगा।
श्लोक 32 (skanda.8.158.32)
तरव ऊचुः । कथं वयं पुत्रकृतास्तान् पितॄन्निरयोपगान्
tarava ūcuḥ | kathaṁ vayaṁ putrakṛtāstān pitṝnnirayopagān
वृक्षों ने कहा - 'हम, पुत्र बनाए जाकर, नरकगामी उन पितरों को कैसे बचा सकते हैं?' - इस श्लोक का शेष भाग मूल पाठ में खण्डित है।
श्लोक 33 (skanda.8.158.33)
सोमविक्रयिणो ये च ये च विश्वस्तघातिनः । ये च प्राणिवधे युक्ताः पृष्ठमांसाशिनश्च ये
somavikrayiṇo ye ca ye ca viśvastaghātinaḥ | ye ca prāṇivadhe yuktāḥ pṛṣṭhamāṁsāśinaśca ye
जो सोम बेचने वाले हैं, जो विश्वासघाती हत्यारे हैं, जो प्राणि-वध में लगे रहते हैं, और जो पीठ-पीछे मांस खाने वाले हैं -
श्लोक 34 (skanda.8.158.34)
राज्ञामाक्रोशका ये च ये च पिण्डापहारकाः । एते स्वकर्मभिर्घोरैर्वेष्टिता लोमहर्षणैः
rājñāmākrośakā ye ca ye ca piṇḍāpahārakāḥ | ete svakarmabhirghorairveṣṭitā lomaharṣaṇaiḥ
जो राजाओं को कोसते हैं, और जो पिण्ड-दान का अपहरण करते हैं - ये सब अपने ही घोर, रोमहर्षक कर्मों से घिरे हुए हैं।
श्लोक 35 (skanda.8.158.35)
पच्यन्ते निरये घोरे क्रोशन्तो भैरवान् रवान् । अहो भृशं यातनाभिरशिवाभिरभिद्रुताः
pacyante niraye ghore krośanto bhairavān ravān | aho bhṛśaṁ yātanābhiraśivābhirabhidrutāḥ
वे घोर नरक में पकाए जाते हैं, भयंकर स्वरों में चीत्कार करते हुए। हाय! वे अत्यन्त अशुभ यातनाओं से पीड़ित हैं।
श्लोक 36 (skanda.8.158.36)
शास्यन्ते मृत्युवचनाद्राक्षसैर्भीमविक्रमैः । तानेव तुद्यमानाँश्च कुट्यमानाँश्च राक्षसैः
śāsyante mṛtyuvacanādrākṣasairbhīmavikramaiḥ | tāneva tudyamānā~śca kuṭyamānā~śca rākṣasaiḥ
यम की आज्ञा से भयंकर पराक्रमी राक्षसों द्वारा दण्डित किए जाते हैं। उन्हीं राक्षसों द्वारा कुचले और कूटे जाते हुए उन पितरों को -
श्लोक 37 (skanda.8.158.37)
पितॄन्निरयसंमग्नानुद्धरिष्यामहे कथम्
pitṝnnirayasaṁmagnānuddhariṣyāmahe katham
- उन नरक में डूबे हुए पितरों को हम कैसे उद्धार कर सकते हैं?
श्लोक 38 (skanda.8.158.38)
ब्रह्मोवाच । ताँस्तथा तुद्यमानांश्च कुट्यमानाँश्च राक्षसैः । पितॄन्निरय संमग्नान् यूयमभ्युद्धरिष्यथ
brahmovāca | tā~stathā tudyamānāṁśca kuṭyamānā~śca rākṣasaiḥ | pitṝnniraya saṁmagnān yūyamabhyuddhariṣyatha
ब्रह्मा ने कहा - 'राक्षसों द्वारा वैसे ही कुचले और कूटे जाते हुए, नरक में डूबे हुए उन पितरों को तुम ही उद्धार करोगे।'
श्लोक 39 (skanda.8.158.39)
निरयस्थान् यथा चैतान् पितॄन् निस्तारयिष्यथ । तन्मे सुमनसो भूत्वा निशामयत पादपाः
nirayasthān yathā caitān pitṝn nistārayiṣyatha | tanme sumanaso bhūtvā niśāmayata pādapāḥ
नरकस्थ उन पितरों को तुम जिस प्रकार पार करोगे, हे वृक्षो! उसे प्रसन्न मन से मुझसे सुनो।
श्लोक 40 (skanda.8.158.40)
पुत्रप्रकृतका यूयं यस्य यस्य भविष्यथ । तस्य तस्य स्मृताः शीघ्रं तं देशं यास्यथानघाः
putraprakṛtakā yūyaṁ yasya yasya bhaviṣyatha | tasya tasya smṛtāḥ śīghraṁ taṁ deśaṁ yāsyathānaghāḥ
जिस-जिस मनुष्य के तुम पुत्र-रूप में बनाए जाओगे, उसी-उसी के स्मरण करते ही, हे निष्पापो! तुम शीघ्र उस स्थान में पहुँच जाओगे।
श्लोक 41 (skanda.8.158.41)
निरयप्राप्तान् पितॄन् क्लेशैरुपद्रुतान् । सुखाय धास्यथ यथा स्थावरास्तन्निबोधत
nirayaprāptān pitṝn kleśairupadrutān | sukhāya dhāsyatha yathā sthāvarāstannibodhata
इस श्लोक का प्रथम अंश मूल में खण्डित है - क्लेशों से पीड़ित, नरक में पड़े उन पितरों को सुख के लिए स्थापित करोगे, हे स्थावरो! उसे सुनो।
श्लोक 42 (skanda.8.158.42)
मन्त्रवद् विधितश्चैव यो वः संस्कारमन्तशः । गर्भाधानादिभिः कृत्वा पुत्रत्वे कल्पयेन्नरः
mantravad vidhitaścaiva yo vaḥ saṁskāramantaśaḥ | garbhādhānādibhiḥ kṛtvā putratve kalpayennaraḥ
जो मनुष्य मन्त्र-सहित विधिपूर्वक, गर्भाधान आदि संस्कारों को अन्ततः पूरा कर तुम्हें पुत्र-रूप में कल्पित करेगा -
श्लोक 43 (skanda.8.158.43)
ये चापि पूर्वजातान् यो विधिना निष्परिग्रहान् । पुत्रप्रकृतकान् कुर्य्युस्ताँश्च निस्तारयिष्यथ
ye cāpi pūrvajātān yo vidhinā niṣparigrahān | putraprakṛtakān kuryyustā~śca nistārayiṣyatha
तथा जो पहले से उगे हुए, स्वामित्वरहित वृक्षों को भी विधिपूर्वक पुत्र-रूप में बनाएँगे, उन्हें भी तुम पार करोगे।
श्लोक 44 (skanda.8.158.44)
सर्वकामाँश्च दास्यध्वं सुखञ्चैव तथोत्तमम् । कर्मक्षयं च सर्वेषां लोकाँश्चैव तथाक्षयान्
sarvakāmā~śca dāsyadhvaṁ sukhañcaiva tathottamam | karmakṣayaṁ ca sarveṣāṁ lokā~ścaiva tathākṣayān
तुम उन्हें सब कामनाएँ, उत्तम सुख, समस्त कर्मों का क्षय, तथा अक्षय लोक भी प्रदान करोगे।
श्लोक 45 (skanda.8.158.45)
सनत्कुमार उवाच । ततः शैलसुता भूयोपृच्छत्तद्विधिमुत्तमम् । तां पृच्छतीं महादेव इदं वचनमब्रवीत्
sanatkumāra uvāca | tataḥ śailasutā bhūyopṛcchattadvidhimuttamam | tāṁ pṛcchatīṁ mahādeva idaṁ vacanamabravīt
सनत्कुमार ने कहा - तब शैलसुता ने पुनः वह उत्तम विधि पूछी। इस प्रकार पूछती हुई उनसे महादेव ने यह वचन कहा।
श्लोक 46 (skanda.8.158.46)
देवि नागेन्द्रनासोरु नागेन्द्रगतिगामिनि । शृणुष्व येन विधिना गृह्यतेवनिजः सुतः
devi nāgendranāsoru nāgendragatigāmini | śṛṇuṣva yena vidhinā gṛhyatevanijaḥ sutaḥ
हे देवि! हे गजराज की सूँड़ के समान जंघाओं वाली, गजराज की गति से चलने वाली! सुनो, जिस विधि से वन में उत्पन्न पुत्र ग्रहण किया जाता है -
श्लोक 47 (skanda.8.158.47)
श्वो भूतेहं भुविरुहं ग्रहीष्यामीति पार्वति । सोपवासा भवेन्नारी शुचिशीला शुचिव्रता
śvo bhūtehaṁ bhuviruhaṁ grahīṣyāmīti pārvati | sopavāsā bhavennārī śuciśīlā śucivratā
हे पार्वति! 'कल प्रातःकाल मैं भूमि से उत्पन्न इस वृक्ष को ग्रहण करूँगी' - ऐसा संकल्प कर, स्त्री उपवासयुक्त, पवित्र स्वभाव और पवित्र व्रत वाली हो जाए।
श्लोक 48 (skanda.8.158.48)
ततः शतसहस्रांशावस्तशृङ्गं गते रवौ । उदिते विमले चापि चन्द्रे चन्द्रनिभानने
tataḥ śatasahasrāṁśāvastaśṛṅgaṁ gate ravau | udite vimale cāpi candre candranibhānane
फिर, हे चन्द्रमुखी! जब सैकड़ों-हजारों किरणों वाला सूर्य अस्ताचल को चला जाए, और निर्मल चन्द्रमा उदित हो जाए -
श्लोक 49 (skanda.8.158.49)
आपद्भावेन सुभगे परेण परमात्मिके । विप्रानामन्त्रयेद्रात्रौ पावनान् वेदवादिनः
āpadbhāvena subhage pareṇa paramātmike | viprānāmantrayedrātrau pāvanān vedavādinaḥ
हे सुभगे! हे परमात्मस्वरूपे! उस रात्रि में, आपत्काल के समान भाव से, पवित्र वेदवादी ब्राह्मणों को आमन्त्रित करे।
श्लोक 50 (skanda.8.158.50)
श्रुतीनामाकरा ह्येते रत्नानामिव सागराः । विप्रा विप्राधिपमुखि पूजनीयाः सहस्रशः
śrutīnāmākarā hyete ratnānāmiva sāgarāḥ | viprā viprādhipamukhi pūjanīyāḥ sahasraśaḥ
हे विप्राधिप-मुखी! ये ब्राह्मण श्रुतियों की खान हैं, जैसे रत्नों की खान सागर होता है; उन्हें सहस्रों की संख्या में पूजना चाहिए।
श्लोक 51 (skanda.8.158.51)
यत्र मन्त्रविदो विप्रा न प्राश्नन्त्युत्तमं हविः । न तत्र देवा देवेशे हविर्भुञ्जन्ति कर्हिचित्
yatra mantravido viprā na prāśnantyuttamaṁ haviḥ | na tatra devā deveśe havirbhuñjanti karhicit
जहाँ मन्त्रज्ञ ब्राह्मण उत्तम हवि ग्रहण नहीं करते, हे देवेश! वहाँ देवता भी कभी हवि नहीं ग्रहण करते।
श्लोक 52 (skanda.8.158.52)
न स्कन्दते न व्यथते नैनमाक्रमते तमः । वरिष्ठमेतद्दानानां यद् ब्राह्मणमुखे हुतम्
na skandate na vyathate nainamākramate tamaḥ | variṣṭhametaddānānāṁ yad brāhmaṇamukhe hutam
यह गिरता नहीं, नष्ट नहीं होता, इस पर अन्धकार भी आक्रमण नहीं कर सकता - यह दानों में सर्वश्रेष्ठ है जो ब्राह्मण के मुख में हवन किया जाता है।
श्लोक 53 (skanda.8.158.53)
ब्रह्मणत्वे महासत्वे अणधातुस्तु भक्षणे । ब्रह्म भक्षयते यस्माद् ब्राह्मणस्तेन स स्मृतः
brahmaṇatve mahāsatve aṇadhātustu bhakṣaṇe | brahma bhakṣayate yasmād brāhmaṇastena sa smṛtaḥ
महासत्त्वयुक्त ब्रह्म-भाव में, 'अण्' धातु का अर्थ भक्षण करना है - चूँकि वह ब्रह्म का भक्षण करता है, इसलिए वह ब्राह्मण कहलाता है।
श्लोक 54 (skanda.8.158.54)
जायन्ते ये पुनर्जाता ह्युपनीता महात्मभिः । ततो देवि द्विजाख्येयं तेषु नित्यं निपात्यते
jāyante ye punarjātā hyupanītā mahātmabhiḥ | tato devi dvijākhyeyaṁ teṣu nityaṁ nipātyate
जो महात्माओं द्वारा उपनयन-संस्कार से पुनः जन्म पाते हैं, हे देवि! उन्हीं में सदा यह 'द्विज' संज्ञा प्रयुक्त होती है।
श्लोक 55 (skanda.8.158.55)
वियदित्युच्यते व्योम प्रकारः प्रापणे स्मृतः । दिवं संप्रापयन्त्येते देवि विप्रास्ततः स्मृता
viyadityucyate vyoma prakāraḥ prāpaṇe smṛtaḥ | divaṁ saṁprāpayantyete devi viprāstataḥ smṛtā
आकाश को 'वियत्' कहा जाता है, और 'प्र' उपसर्ग पहुँचाने के अर्थ में माना गया है - चूँकि ये अपने यजमानों को स्वर्ग तक पहुँचाते हैं, इसीलिए, हे देवि! ये 'विप्र' कहलाते हैं।
श्लोक 56 (skanda.8.158.56)
सत्यसारमया ह्येते विप्राः सृष्टाः स्वयंभुवा । सिद्धिर्न तेष्वतुष्टेषु शक्या प्राप्तुं सुरैरपि
satyasāramayā hyete viprāḥ sṛṣṭāḥ svayaṁbhuvā | siddhirna teṣvatuṣṭeṣu śakyā prāptuṁ surairapi
ये ब्राह्मण सत्य के सार से बने हुए हैं, स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा रचे गए हैं। इन्हें असन्तुष्ट रखकर देवता भी सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकते।
श्लोक 57 (skanda.8.158.57)
अहं नारायणोनन्तो ब्रह्मा शक्रोनिलः शिखी । तद्दानं नाभिनन्दामो विप्रा यत्र न पूजिताः
ahaṁ nārāyaṇonanto brahmā śakronilaḥ śikhī | taddānaṁ nābhinandāmo viprā yatra na pūjitāḥ
मैं, नारायण, अनन्त, ब्रह्मा, इन्द्र, वायु, अग्नि - हम सब उस दान का अभिनन्दन नहीं करते जिसमें ब्राह्मण पूजित न हों।
श्लोक 58 (skanda.8.158.58)
येषां प्रसादात् सुलभा आयुर्धर्मो बलं सुखम् । श्रीर्यशः स्वर्गवासश्च तान् विप्रानर्चयेद् बुधः
yeṣāṁ prasādāt sulabhā āyurdharmo balaṁ sukham | śrīryaśaḥ svargavāsaśca tān viprānarcayed budhaḥ
जिनकी कृपा से आयु, धर्म, बल, सुख, श्री, यश और स्वर्गवास सहज ही प्राप्त हो जाते हैं, बुद्धिमान् को उन्हीं ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 59 (skanda.8.158.59)
विप्रानामन्त्रयित्वाथ शुचिवस्त्रा शुचिस्मिता । शयीत सनमस्कारा सदर्भा भूमिमाश्रिता
viprānāmantrayitvātha śucivastrā śucismitā | śayīta sanamaskārā sadarbhā bhūmimāśritā
ब्राह्मणों को आमन्त्रित कर, शुद्ध वस्त्रधारिणी, शुद्ध हास्ययुक्त स्त्री, नमस्कार करते हुए, कुश-सहित भूमि पर ही शयन करे।
श्लोक 60 (skanda.8.158.60)
गमयित्वा ततो रात्रिं सवितर्युत्थितेपि च । भक्ष्यभोज्यं समादाय व्रजेत् यत्र भवेत्तरुः
gamayitvā tato rātriṁ savitaryutthitepi ca | bhakṣyabhojyaṁ samādāya vrajet yatra bhavettaruḥ
उस रात्रि को बिताकर, सूर्योदय होते ही, भक्ष्य और भोज्य पदार्थ लेकर वह जाए जहाँ वृक्ष स्थित हो।
श्लोक 61 (skanda.8.158.61)
ततस्तं सपताकं च सातपत्रं सभूषणम् । तरुकं प्रमदा कृत्वा तरुच्छायानुगामिनी
tatastaṁ sapatākaṁ ca sātapatraṁ sabhūṣaṇam | tarukaṁ pramadā kṛtvā tarucchāyānugāminī
फिर उस वृक्ष को पताका, छत्र और आभूषणों से सजाकर, वह स्त्री उसकी छाया का अनुगमन करती हुई -
श्लोक 62 (skanda.8.158.62)
यथोपपन्नमन्नं तु भोजयित्वा द्विजोत्तमान् । पुण्याहं कारयित्वाथ ऋत्विजा ह्यथवात्मना
yathopapannamannaṁ tu bhojayitvā dvijottamān | puṇyāhaṁ kārayitvātha ṛtvijā hyathavātmanā
यथासम्भव उत्तम अन्न से श्रेष्ठ द्विजों को भोजन कराकर, फिर ऋत्विक् द्वारा अथवा स्वयं भी पुण्याह-वाचन कराकर -
श्लोक 63 (skanda.8.158.63)
तृप्तानां ब्राह्मणानां च तत्त्वेनाकूतमात्मनः । निवेद्य परमुद्दिश्य सद्भावेन परेण ह
tṛptānāṁ brāhmaṇānāṁ ca tattvenākūtamātmanaḥ | nivedya paramuddiśya sadbhāvena pareṇa ha
तृप्त हुए ब्राह्मणों के समक्ष सच्चे मन से अपना संकल्प निवेदन कर, परम सद्भाव से, उस परम तत्त्व को उद्दिष्ट कर -
श्लोक 64 (skanda.8.158.64)
अपुत्रा भगवन्तोहं पुत्रप्रकृतकं तरुम् । ग्रहीष्ये तदनुज्ञां वै कर्तुमर्हथ मेनघाः
aputrā bhagavantohaṁ putraprakṛtakaṁ tarum | grahīṣye tadanujñāṁ vai kartumarhatha menaghāḥ
हे भगवन्तो! मैं सन्तानहीन हूँ, अतः इस वृक्ष को पुत्र-रूप में ग्रहण करूँगी - हे निष्पापो! कृपया मुझे इसकी अनुज्ञा दें।
श्लोक 65 (skanda.8.158.65)
ततस्तैरभ्यनुज्ञातं तं तरुं तरुणं प्रिये । भूमिदेवसमक्षं वै गृह्णीयात्तनयं प्रिये
tatastairabhyanujñātaṁ taṁ taruṁ taruṇaṁ priye | bhūmidevasamakṣaṁ vai gṛhṇīyāttanayaṁ priye
हे प्रिये! उनके द्वारा अनुज्ञा दिए जाने पर, उस युवा वृक्ष को, भूदेव ब्राह्मणों के समक्ष ही, वह पुत्र-रूप में ग्रहण करे।
श्लोक 66 (skanda.8.158.66)
अनेन विधिना देवि गृहीतस्तरुकः सुतः । पितॄणां निरयस्थानां मधु सोमञ्च वर्षति
anena vidhinā devi gṛhītastarukaḥ sutaḥ | pitṝṇāṁ nirayasthānāṁ madhu somañca varṣati
इस विधि से ग्रहण किया गया वह वृक्ष-पुत्र, हे देवि! नरकवासी पितरों के लिए मधु और सोम की वर्षा करता है।
श्लोक 67 (skanda.8.158.67)
गृहीतो विधिनानेन सुभ्रु भूमिरुहात्मजः । शुभे सुखाय भवति विपरीतेन दुःखदः
gṛhīto vidhinānena subhru bhūmiruhātmajaḥ | śubhe sukhāya bhavati viparītena duḥkhadaḥ
हे सुभ्रु! इस विधि से ग्रहण किया गया भूमि-उत्पन्न पुत्र, हे शुभे! सुख के लिए होता है, परन्तु विपरीत विधि से लिया जाने पर दुःखदायी होता है।
श्लोक 68 (skanda.8.158.68)
सत्पुत्राणां शताच्चापि देवि चन्द्रनिभानने । एको भूमिरुहः श्रेष्ठः पुत्रत्वे कल्पितः सुतः
satputrāṇāṁ śatāccāpi devi candranibhānane | eko bhūmiruhaḥ śreṣṭhaḥ putratve kalpitaḥ sutaḥ
हे चन्द्रमुखी देवि! सौ सत्पुत्रों की तुलना में भी, पुत्र-रूप में कल्पित एक ही वृक्ष-पुत्र श्रेष्ठ होता है।
श्लोक 69 (skanda.8.158.69)
इत्येतत्ते मया शिष्टं श्लिष्टमृष्ट वचोरणि । यथा भूमिरुहः पुत्रो विशिष्टः कोष्ठजात् सुतात्
ityetatte mayā śiṣṭaṁ śliṣṭamṛṣṭa vacoraṇi | yathā bhūmiruhaḥ putro viśiṣṭaḥ koṣṭhajāt sutāt
हे मधुर वाणीवाली! यह सब मैंने तुम्हें संक्षिप्त और सुसम्बद्ध रूप से बता दिया, कि वृक्ष-पुत्र कोष्ठज पुत्र से किस प्रकार श्रेष्ठ है।
श्लोक 70 (skanda.8.158.70)
ततः पुनर्देवदेवी प्रणिपत्य महेश्वरम् । प्रणयात् कौतुकाच्चैव इदं वचनमब्रवीत्
tataḥ punardevadevī praṇipatya maheśvaram | praṇayāt kautukāccaiva idaṁ vacanamabravīt
तत्पश्चात् देवदेवी ने पुनः महेश्वर को प्रणाम कर, प्रेम और कुतूहलवश यह वचन कहा।
श्लोक 71 (skanda.8.158.71)
प्रोषिते त्वयि देवेश भ्रमन्त्या मन्दरे मया । अशोकतरुको दृष्टः कोमलः सुमनोरमः
proṣite tvayi deveśa bhramantyā mandare mayā | aśokataruko dṛṣṭaḥ komalaḥ sumanoramaḥ
हे देवेश! जब आप परदेश गए हुए थे, तब मन्दराचल पर भ्रमण करती हुई मैंने एक कोमल, अत्यन्त मनोहर अशोक वृक्ष का शिशु देखा था।
श्लोक 72 (skanda.8.158.72)
आसीच्च मे तदा भाव एष मे तरुपोतकः । भविष्यति सुतो रुद्रे निर्विघ्नं पुनरागते
āsīcca me tadā bhāva eṣa me tarupotakaḥ | bhaviṣyati suto rudre nirvighnaṁ punarāgate
तभी मेरे मन में यह भाव उठा था कि यह वृक्ष-शिशु ही मेरा पुत्र बनेगा, जब हे रुद्र! आप निर्विघ्न लौट आएँगे।
श्लोक 73 (skanda.8.158.73)
आभ्यां च मे महादेव कुचाभ्यां द्विजपावन । क्षीरमागात् सुधासारं पुत्रस्नेहात् सुखप्रदम्
ābhyāṁ ca me mahādeva kucābhyāṁ dvijapāvana | kṣīramāgāt sudhāsāraṁ putrasnehāt sukhapradam
हे द्विजपावन महादेव! और उसी क्षण मेरे इन दोनों स्तनों से पुत्र-स्नेह के कारण अमृत-सार जैसा सुखदायी दूध बहने लगा।
श्लोक 74 (skanda.8.158.74)
तमहं देव गृहणीयां पुत्रप्रकृतकं तरुम् । यदि मे कुरुषेनुज्ञां तवाहं वशवर्तिनी
tamahaṁ deva gṛhaṇīyāṁ putraprakṛtakaṁ tarum | yadi me kuruṣenujñāṁ tavāhaṁ vaśavartinī
हे देव! यदि आप मुझे अनुज्ञा दें, तो मैं उस वृक्ष को पुत्र-रूप में ग्रहण करूँ; मैं तो सर्वथा आपके अधीन हूँ।
श्लोक 75 (skanda.8.158.75)
देवैः पुत्रफले क्षिप्ते स हि मे तरुपोतकः । तुष्टिप्रदो ह्यपुत्रायाः पुत्रको भवितानघ
devaiḥ putraphale kṣipte sa hi me tarupotakaḥ | tuṣṭiprado hyaputrāyāḥ putrako bhavitānagha
हे निष्पाप! जब देवताओं ने ही मुझे पुत्र-फल से वंचित रखा है, तो यह वृक्ष-शिशु ही, सन्तानहीना मेरे लिए सन्तोषदायी पुत्र बने।
श्लोक 76 (skanda.8.158.76)
इत्येवं भाषमाणान्तु भवानीं भगवान् भवः । सद्भावान्निःसृतं वाक्यमवदत् परतापनः
ityevaṁ bhāṣamāṇāntu bhavānīṁ bhagavān bhavaḥ | sadbhāvānniḥsṛtaṁ vākyamavadat paratāpanaḥ
इस प्रकार कहती हुई भवानी से, शत्रु-तापन भगवान् भव ने सद्भाव से निकला हुआ वचन कहा।
श्लोक 77 (skanda.8.158.77)
देवि फुल्लारविन्दाक्षि कथं नाम न ते सुतः । भविष्यति तपस्विन्या ऐश्वर्यपरमे मया
devi phullāravindākṣi kathaṁ nāma na te sutaḥ | bhaviṣyati tapasvinyā aiśvaryaparame mayā
हे विकसित कमल-नेत्री देवि! भला मुझ ऐश्वर्य-परायण के होते हुए, हे तपस्विनी! तुम्हारा पुत्र कैसे नहीं होगा?
श्लोक 78 (skanda.8.158.78)
शक्ता जनयितुं पुत्रान् तपसा त्वमनिन्दिते । अहं च ते प्रदास्यामि पुत्रान् परमशोभनान्
śaktā janayituṁ putrān tapasā tvamanindite | ahaṁ ca te pradāsyāmi putrān paramaśobhanān
हे अनिन्दिते! तुम स्वयं तप से पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ हो, और मैं भी तुम्हें अत्यन्त सुन्दर पुत्र प्रदान करूँगा।
श्लोक 79 (skanda.8.158.79)
अथवायमनुग्राह्यस्तवाशोकतरुः प्रिये । अनुज्ञाता मया देवि कुर्वशोकतरुं सुतम्
athavāyamanugrāhyastavāśokataruḥ priye | anujñātā mayā devi kurvaśokataruṁ sutam
अथवा, हे प्रिये! यह तुम्हारा अशोक वृक्ष भी अनुग्रह के योग्य है। हे देवि! मेरी अनुज्ञा है - इस अशोक वृक्ष को अपना पुत्र बना लो।
श्लोक 80 (skanda.8.158.80)
अनुकूलं पतिं ज्ञात्वा तं तामरसलोचना । प्रणिपत्याव्यया तुष्टा इदमाह महेश्वरम्
anukūlaṁ patiṁ jñātvā taṁ tāmarasalocanā | praṇipatyāvyayā tuṣṭā idamāha maheśvaram
अपने पति को अनुकूल जानकर, कमल-नेत्री, अविनाशिनी देवी ने प्रसन्न होकर, प्रणाम करके महेश्वर से यह कहा।
श्लोक 81 (skanda.8.158.81)
देव जानाम्यहं धर्मं यथा स्त्रीणां न विद्यते । दैवतं पतिमुत्सृज्य पूजनीयं हि यद् भवेत्
deva jānāmyahaṁ dharmaṁ yathā strīṇāṁ na vidyate | daivataṁ patimutsṛjya pūjanīyaṁ hi yad bhavet
हे देव! मैं यह धर्म जानती हूँ कि स्त्रियों के लिए पति को छोड़कर पूजनीय अन्य कोई दैवत नहीं होता।
श्लोक 82 (skanda.8.158.82)
अनामन्त्र्य हि भर्त्तारं यद्ददाति यदर्चति । न फलं विन्दते तस्य नारी इत्येव नः श्रुतम्
anāmantrya hi bharttāraṁ yaddadāti yadarcati | na phalaṁ vindate tasya nārī ityeva naḥ śrutam
बिना पति की अनुमति लिए स्त्री जो कुछ भी दान या पूजा करती है, उसका फल उसे नहीं मिलता - ऐसा हमने सुना है।
श्लोक 83 (skanda.8.158.83)
या तु भर्तारमामन्त्र्य नारी धर्म समाचरेत् । तस्या देवाश्च तुष्यन्ति धर्मश्च सुमहान् विभो
yā tu bhartāramāmantrya nārī dharma samācaret | tasyā devāśca tuṣyanti dharmaśca sumahān vibho
किन्तु हे विभो! जो स्त्री पति से अनुमति लेकर धर्माचरण करती है, उससे देवता भी प्रसन्न होते हैं और उसे महान् धर्म-फल मिलता है।
श्लोक 84 (skanda.8.158.84)
अवमन्य तु या नारी भर्तारं दैवतं गुरुम् । स्वबुद्ध्या कुरुते पुण्यं निरयं सा प्रपद्यते
avamanya tu yā nārī bhartāraṁ daivataṁ gurum | svabuddhyā kurute puṇyaṁ nirayaṁ sā prapadyate
परन्तु जो स्त्री अपने पति को, जो देवता और गुरु दोनों है, अवमानित कर स्वयं की बुद्धि से पुण्य-कर्म करती है, वह नरक को प्राप्त होती है।
श्लोक 85 (skanda.8.158.85)
अतीतमपि या नारी भर्तारं परिपृच्छति । अनुमान्य यथावद्धि जीवन्तमिव शोभना
atītamapi yā nārī bhartāraṁ paripṛcchati | anumānya yathāvaddhi jīvantamiva śobhanā
जो सुशोभना स्त्री दिवंगत पति से भी, जैसे वे जीवित हों वैसे ही, विधिपूर्वक अनुमति माँगती है -
श्लोक 86 (skanda.8.158.86)
अनुज्ञाता हि सा तेन प्रीयमाणेन चेतसा । धर्मकृत्येषु देवेश फलं प्राप्नोति पुष्कलम्
anujñātā hi sā tena prīyamāṇena cetasā | dharmakṛtyeṣu deveśa phalaṁ prāpnoti puṣkalam
- उससे प्रसन्नचित्त होकर वे उसे अनुमति देते हैं, हे देवेश! और वह धर्म-कार्यों में प्रचुर फल प्राप्त करती है।
श्लोक 87 (skanda.8.158.87)
तपोपवासो दानं च आर्जवं सत्यमेव च । पतिशुश्रूषणस्यैते कलां नार्घन्ति षोडशीम्
tapopavāso dānaṁ ca ārjavaṁ satyameva ca | patiśuśrūṣaṇasyaite kalāṁ nārghanti ṣoḍaśīm
तप, उपवास, दान, सरलता और सत्य - ये सब मिलकर भी पति-सेवा की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं हैं।
श्लोक 88 (skanda.8.158.88)
या ह्यन्यनरलोलापि सद्भावाच्छयनासने । शुश्रूषां कुरुते भर्तुः सा सत्येव विभाव्यते
yā hyanyanaralolāpi sadbhāvācchayanāsane | śuśrūṣāṁ kurute bhartuḥ sā satyeva vibhāvyate
जो स्त्री, चाहे मन से किसी अन्य पुरुष की ओर आकृष्ट भी हो, शयन और आसन में सद्भाव से पति की सेवा करती है, वह सती ही मानी जाती है।
श्लोक 89 (skanda.8.158.89)
इत्येवं गिरितनया गिरीशमुक्त्वा गिर्यग्रे गिरितरुपुष्पपुञ्जचित्रे । तेनाग्य्रा सह विचचार चारुरूपा भानोर्भा इव सह भानुना भवानी । इति तौ सुरपूजितावपरस्परपूजितौ । सहितौ प्रविचेरतुः प्रवरेश्वरवन्दितौ
ityevaṁ giritanayā girīśamuktvā giryagre giritarupuṣpapuñjacitre | tenāgyrā saha vicacāra cārurūpā bhānorbhā iva saha bhānunā bhavānī | iti tau surapūjitāvaparasparapūjitau | sahitau praviceratuḥ pravareśvaravanditau
इस प्रकार गिरितनया, गिरीश से यह कहकर, पर्वत-पुष्पों के गुच्छों से चित्रित पर्वत-शिखर पर, उस श्रेष्ठ पति के साथ सुन्दर रूपवाली भवानी उसी प्रकार विचरण करने लगीं, जैसे सूर्य-प्रभा सूर्य के साथ विचरती है। इस प्रकार देवताओं द्वारा पूजित और परस्पर एक-दूसरे को पूजने वाले वे दोनों, श्रेष्ठ ईश्वरों द्वारा वन्दित होकर, साथ-साथ विचरण करते रहे।