Skip to main content

अम्बिका खण्ड · अध्याय 159

तरु-पुत्रक-ग्रहण में ब्राह्मणामन्त्रण

अध्याय 158अध्याय-सूचीअध्याय 160

श्लोक 1 (skanda.8.159.1)

सनत्कुमार उवाच । पार्वत्या निश्चयं ज्ञात्वा भगवान् त्र्यम्बकस्तदा । सुमालिं पिङ्गल यक्षं प्राह वाक्यविदां वरः

sanatkumāra uvāca | pārvatyā niścayaṁ jñātvā bhagavān tryambakastadā | sumāliṁ piṅgala yakṣaṁ prāha vākyavidāṁ varaḥ

सनत्कुमार ने कहा - पार्वती के निश्चय को जानकर तब त्रिनेत्रधारी भगवान्, वाक्यविदों में श्रेष्ठ, सुमाली और पिंगल नामक यक्षों से बोले।

श्लोक 2 (skanda.8.159.2)

भक्तिमन्तं महायोगं पुरा लब्धवरं गणम् । पार्श्वस्थं नन्दिनं तत्र भगवान् शङ्करः स्वयम्

bhaktimantaṁ mahāyogaṁ purā labdhavaraṁ gaṇam | pārśvasthaṁ nandinaṁ tatra bhagavān śaṅkaraḥ svayam

वहाँ भक्तिमान्, महायोगी, पहले वरदान पाए हुए, अपने ही पार्श्व में स्थित नन्दी-गण को भगवान् शंकर ने स्वयं यह कहा -

श्लोक 3 (skanda.8.159.3)

पर्वतेन्द्रसुताशोकं तरुं पुत्रं ग्रहीष्यति । त्वय्यायत्तं च तत्सर्वं तस्मात् कुरु ममाज्ञया

parvatendrasutāśokaṁ taruṁ putraṁ grahīṣyati | tvayyāyattaṁ ca tatsarvaṁ tasmāt kuru mamājñayā

पर्वतेन्द्र-पुत्री अशोक वृक्ष को पुत्र-रूप में ग्रहण करेगी। यह सारा कार्य तुम्हारे ही अधीन है, इसलिए मेरी आज्ञा से इसे सम्पन्न करो।

श्लोक 4 (skanda.8.159.4)

यत्राशोकतरुस्तत्र यथान्नमुपलक्षितम् । भवेत् सुप्रचुरं वीर तथा कुरु गणेश्वर

yatrāśokatarustatra yathānnamupalakṣitam | bhavet supracuraṁ vīra tathā kuru gaṇeśvara

हे वीर! हे गणेश्वर! जहाँ अशोक वृक्ष है, वहाँ यथोचित अन्न भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो, ऐसी व्यवस्था करो।

श्लोक 5 (skanda.8.159.5)

प्रदेशश्च गिरेस्तस्य यथा रम्यो भविष्यति । तथा विधत्स्व यक्षेन्द्र यत्राशोकतरुः स्थितः

pradeśaśca girestasya yathā ramyo bhaviṣyati | tathā vidhatsva yakṣendra yatrāśokataruḥ sthitaḥ

हे यक्षेन्द्र! पर्वत का वह प्रदेश जहाँ अशोक वृक्ष स्थित है, जिस प्रकार रमणीय बने, वैसी व्यवस्था करो।

श्लोक 6 (skanda.8.159.6)

इत्युक्तः परमेशेन पिङ्गलः पिङ्गलेक्षणः । उवाच सोमया सार्धं त्रिदशानां पतिं पतिम्

ityuktaḥ parameśena piṅgalaḥ piṅgalekṣaṇaḥ | uvāca somayā sārdhaṁ tridaśānāṁ patiṁ patim

परमेश्वर द्वारा इस प्रकार आज्ञप्त, पिंगल-नेत्रधारी पिंगल ने, सोमा के साथ, देवताओं के भी स्वामी उस प्रभु से कहा।

श्लोक 7 (skanda.8.159.7)

गणाधिप यथाज्ञप्तं तत् करिष्यामि यज्ञहन् । यथा सोमः स नन्दी च प्रसन्नो मे भविष्यति

gaṇādhipa yathājñaptaṁ tat kariṣyāmi yajñahan | yathā somaḥ sa nandī ca prasanno me bhaviṣyati

हे गणाधिप! हे यज्ञहन्! जैसी आज्ञा है, वैसा ही मैं करूँगा, जिससे सोम और वह नन्दी भी मुझसे प्रसन्न हो जाएँ।

श्लोक 8 (skanda.8.159.8)

इत्युक्त्वा सोभ्यनुज्ञातो यक्षो लोकान्तदस्तदा । तस्याशोकतरोः पार्श्वे विदधावन्नमुत्तमम्

ityuktvā sobhyanujñāto yakṣo lokāntadastadā | tasyāśokataroḥ pārśve vidadhāvannamuttamam

इस प्रकार कहकर अनुज्ञात हुआ वह यक्ष, तीनों लोकों में शीघ्रगामी, तब उस अशोक वृक्ष के समीप उत्तम अन्न की व्यवस्था करने लगा।

श्लोक 9 (skanda.8.159.9)

सुमालावथ निष्क्रान्ते सिंहक्रोधस्त्रिलोचनः । नन्दिनं तेजसां राशिर्दिण्डि चण्डेश्वरोब्रवीत्

sumālāvatha niṣkrānte siṁhakrodhastrilocanaḥ | nandinaṁ tejasāṁ rāśirdiṇḍi caṇḍeśvarobravīt

सुमाली के चले जाने पर, सिंह के समान क्रोधी, त्रिलोचन, तेजोराशि चण्डेश्वर ने डिंडि नन्दी से कहा।

श्लोक 10 (skanda.8.159.10)

ब्रह्मण्यान् ब्राह्मणान् नन्दिन् देवी यज्ञेन यक्ष्यति । श्वः प्रभाते महाबुद्धे तत्र विप्रैः प्रयोजनम्

brahmaṇyān brāhmaṇān nandin devī yajñena yakṣyati | śvaḥ prabhāte mahābuddhe tatra vipraiḥ prayojanam

हे नन्दिन्! हे महाबुद्धे! कल प्रातःकाल देवी ब्रह्म-हितैषी ब्राह्मणों का यज्ञ द्वारा पूजन करेंगी; वहाँ विप्रों की आवश्यकता है।

श्लोक 11 (skanda.8.159.11)

स त्वं मत्प्रहितो देव यत्र यत्र वदाम्यहम् । तत्र तत्र गतो विप्रान् निमन्त्रय पदत्रये

sa tvaṁ matprahito deva yatra yatra vadāmyaham | tatra tatra gato viprān nimantraya padatraye

हे देव! तुम मेरे भेजे हुए दूत बनकर, मैं जहाँ-जहाँ कहूँ, वहाँ-वहाँ जाकर, त्रिलोक के ब्राह्मणों को आमन्त्रित करो।

श्लोक 12 (skanda.8.159.12)

औदकायां विरूपास्य ब्राह्मणा ब्रह्मसंभवाः । उपासते ये वरुणं पातालतलसंश्रयाः

audakāyāṁ virūpāsya brāhmaṇā brahmasaṁbhavāḥ | upāsate ye varuṇaṁ pātālatalasaṁśrayāḥ

जो ब्राह्मण जल-लोक में निवास करते हैं, ब्रह्म से उत्पन्न, विरूप-मुख वाले, पाताल-तल के आश्रित होकर वरुण की उपासना करते हैं -

श्लोक 13 (skanda.8.159.13)

ये सुरेव्यासुऽराद्याश्च रसावयवमुत्तम । पिबन्ति फेनपा नाम तान्निमन्त्रय मा चिरम्

ye surevyāsu'rādyāśca rasāvayavamuttama | pibanti phenapā nāma tānnimantraya mā ciram

तथा जो देव-असुर आदि रस के उत्तम अंश को फेनपा नाम से पीते हैं, उन्हें बिना विलम्ब आमन्त्रित करो।

श्लोक 14 (skanda.8.159.14)

संयमन्यां तथा चैव ये यमं पर्युपासते । ब्राह्मणा ब्रह्मणा तुल्यास्तान्निमन्त्रय भूतप

saṁyamanyāṁ tathā caiva ye yamaṁ paryupāsate | brāhmaṇā brahmaṇā tulyāstānnimantraya bhūtapa

हे भूतप! संयमनी नगरी में भी जो ब्राह्मण, ब्रह्मा के समान, यम की उपासना करते हैं, उन्हें भी आमन्त्रित करो।

श्लोक 15 (skanda.8.159.15)

तथोदयगिरेः शृङ्गे सत्यो नाम महाह्रदः । राजहंसानुचरितः कान्ततामरसावृतः

tathodayagireḥ śṛṅge satyo nāma mahāhradaḥ | rājahaṁsānucaritaḥ kāntatāmarasāvṛtaḥ

तथा उदयाचल के शिखर पर सत्य नामक एक महान् सरोवर है, जो राजहंसों से युक्त और सुन्दर कमलों से आच्छादित है।

श्लोक 16 (skanda.8.159.16)

वसन्ति यत्र ते सत्याः सत्यानाम तपोधनाः । सत्येन येषामादित्यो दिनं नयति नित्यशः

vasanti yatra te satyāḥ satyānāma tapodhanāḥ | satyena yeṣāmādityo dinaṁ nayati nityaśaḥ

वहाँ 'सत्य' नामक सत्यनिष्ठ तपस्वी निवास करते हैं, जिनके सत्य के प्रभाव से सूर्य नित्य ही दिन को आगे बढ़ाते हैं।

श्लोक 17 (skanda.8.159.17)

तेषां निष्कल्मषस्तस्मिन् ह्रदे स्नातो दिवाकरः । प्रत्यहं कुरुते देवः प्रयाणं शुभकर्मकृत्

teṣāṁ niṣkalmaṣastasmin hrade snāto divākaraḥ | pratyahaṁ kurute devaḥ prayāṇaṁ śubhakarmakṛt

उनके उस निष्कलंक सरोवर में स्नान कर, शुभकर्मा सूर्यदेव प्रतिदिन अपनी यात्रा प्रारम्भ करते हैं।

श्लोक 18 (skanda.8.159.18)

तेषां प्रणम्य शिरसा ह्यात्मानं सन्निवेद्य च । सद्भावं दर्शयन्नग्रे नन्दीश्वर निमन्त्रय

teṣāṁ praṇamya śirasā hyātmānaṁ sannivedya ca | sadbhāvaṁ darśayannagre nandīśvara nimantraya

हे नन्दीश्वर! उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम कर, अपना परिचय देकर, और सामने सद्भाव प्रकट करते हुए उन्हें आमन्त्रित करो।

श्लोक 19 (skanda.8.159.19)

ये चादित्यरथं शश्वत् परिवार्य व्रजन्त्युत । अथर्वाङ्गिरसस्तांश्च निमन्त्रय गण द्विजान्

ye cādityarathaṁ śaśvat parivārya vrajantyuta | atharvāṅgirasastāṁśca nimantraya gaṇa dvijān

हे गण! जो अथर्वाङ्गिरस ब्राह्मण सदा सूर्य के रथ को घेरकर चलते हैं, उन द्विजों को भी आमन्त्रित करो।

श्लोक 20 (skanda.8.159.20)

ये च चक्रचराः सिद्धा ये कपोतोञ्छवृत्तयः । उपासते ये च शक्रं तानामन्त्रय वै द्विजान्

ye ca cakracarāḥ siddhā ye kapotoñchavṛttayaḥ | upāsate ye ca śakraṁ tānāmantraya vai dvijān

जो सिद्ध चक्र-मार्ग पर विचरण करते हैं, जो कपोत के समान बीने हुए अन्न से जीवन-निर्वाह करते हैं, तथा जो इन्द्र की उपासना करते हैं, उन द्विजों को भी आमन्त्रित करो।

श्लोक 21 (skanda.8.159.21)

ततो ब्रह्मसदो गत्वा ब्रह्मण्यान् ब्रह्मणः प्रियान् । ब्रह्माणं च सपत्नीकं ब्राह्मणांश्च निमन्त्रय

tato brahmasado gatvā brahmaṇyān brahmaṇaḥ priyān | brahmāṇaṁ ca sapatnīkaṁ brāhmaṇāṁśca nimantraya

फिर ब्रह्मलोक जाकर, ब्रह्म-हितैषी, ब्रह्मा के प्रिय ब्राह्मणों को, तथा पत्नी-सहित स्वयं ब्रह्मा को भी आमन्त्रित करो।

श्लोक 22 (skanda.8.159.22)

क्षीरोदवेलानिलयास्तपोवननिवासिनः । ब्रह्मणो भवनादेत्य बालखिल्यान् निमन्त्रय

kṣīrodavelānilayāstapovananivāsinaḥ | brahmaṇo bhavanādetya bālakhilyān nimantraya

क्षीरसागर के तट पर निवास करने वाले, तपोवन में रहने वाले बालखिल्य ऋषियों को भी ब्रह्मा के भवन से आकर आमन्त्रित करो।

श्लोक 23 (skanda.8.159.23)

ये मां सदाराः ससुताः साग्निहोत्रपरिच्छदाः । भक्ता येषामहं नित्यं प्रसादसुमुखोग्रणीः

ye māṁ sadārāḥ sasutāḥ sāgnihotraparicchadāḥ | bhaktā yeṣāmahaṁ nityaṁ prasādasumukhograṇīḥ

जो अपनी पत्नियों, पुत्रों और अग्निहोत्र-सामग्री-सहित मेरे भक्त हैं, जिनके प्रति मैं सदा कृपादृष्टि रखने वाला, प्रसन्न-मुख अग्रणी रहा हूँ -

श्लोक 24 (skanda.8.159.24)

तान् बालखिल्यान् वागीश व्यालानिव दुरासदान् । आमन्त्रय यतो भूत्वा सुयशाः सुयशापते

tān bālakhilyān vāgīśa vyālāniva durāsadān | āmantraya yato bhūtvā suyaśāḥ suyaśāpate

हे वागीश! उन बालखिल्यों को, जो सर्पों के समान दुर्गम्य हैं, संयमपूर्वक आमन्त्रित करो, हे सुयशस्वी सुयशापते!

श्लोक 25 (skanda.8.159.25)

सञ्चरँश्च त्रिभुवनं वायुरव्याहतो यथा । यान्यतः पश्यसे विप्रान् सर्वानेव निमन्त्रय

sañcara~śca tribhuvanaṁ vāyuravyāhato yathā | yānyataḥ paśyase viprān sarvāneva nimantraya

तीनों लोकों में अप्रतिहत वायु के समान विचरण करते हुए, जहाँ-जहाँ भी तुम्हें ब्राह्मण दिखाई दें, उन सबको आमन्त्रित करो।

श्लोक 26 (skanda.8.159.26)

ये चापि प्रमथाः केचिद् गोचरे ते सुरारिहन् । ते च सर्वे समायान्तु विप्राणां परिवेशकाः

ye cāpi pramathāḥ kecid gocare te surārihan | te ca sarve samāyāntu viprāṇāṁ pariveśakāḥ

हे सुरारि-हन्! तुम्हारी दृष्टि में जो भी प्रमथगण हों, वे सभी भी वहाँ आएँ, ताकि वे ब्राह्मणों के परिवेशक बन सकें।

श्लोक 27 (skanda.8.159.27)

कपर्दिनैवमुक्तस्तु नन्दी सूर्यसमप्रभः । शूलं ज्वलन्तमुद्यम्य प्रययौ वरुणालयम्

kapardinaivamuktastu nandī sūryasamaprabhaḥ | śūlaṁ jvalantamudyamya prayayau varuṇālayam

जटाधारी शिव द्वारा इस प्रकार आज्ञप्त, सूर्य के समान तेजस्वी नन्दी, प्रज्वलित त्रिशूल उठाकर वरुण के धाम की ओर चल पड़े।

श्लोक 28 (skanda.8.159.28)

सागरं सोम्बराकारं साम्बरोम्बगोचरः । आससाद प्रवल्गन्तं रङ्गस्थमिव वारणम्

sāgaraṁ sombarākāraṁ sāmbarombagocaraḥ | āsasāda pravalgantaṁ raṅgasthamiva vāraṇam

आकाशगामी नन्दी उस आकाश जैसे विशाल, उछलते हुए सागर के समीप वैसे ही पहुँचे, जैसे कोई मल्ल-भूमि में उछलते हुए हाथी के पास पहुँचता है।

श्लोक 29 (skanda.8.159.29)

स तं तिमिशताकीर्णमर्णवं प्रमथाग्रणीः । प्रविवेश प्रदीप्तोर्कः पयोदनिचयं यथा

sa taṁ timiśatākīrṇamarṇavaṁ pramathāgraṇīḥ | praviveśa pradīptorkaḥ payodanicayaṁ yathā

प्रमथों में अग्रणी वे, सैकड़ों तिमि-मत्स्यों से भरे उस समुद्र में उसी प्रकार प्रविष्ट हुए, जैसे प्रदीप्त सूर्य मेघ-समूह में प्रवेश करता है।

श्लोक 30 (skanda.8.159.30)

सुतले स तु पाताले गां गजेन्द्रेन्द्रविक्रमः । अपश्यत् क्षरतीं क्षीरं दिव्यं तदमृताकरम्

sutale sa tu pātāle gāṁ gajendrendravikramaḥ | apaśyat kṣaratīṁ kṣīraṁ divyaṁ tadamṛtākaram

गजराज के समान पराक्रमी वे सुतल नामक पाताल में उस दिव्य पृथ्वी को देखने लगे, जो अमृत की खान के समान दूध बहा रही थी।

श्लोक 31 (skanda.8.159.31)

सुरभीमभिवाद्यैव शङ्करानुचरोरिहा । विवेश नन्दी वरुणो यत्रास्ते सगणोर्चितः

surabhīmabhivādyaiva śaṅkarānucarorihā | viveśa nandī varuṇo yatrāste sagaṇorcitaḥ

शंकर के अनुचर, वैरी-नाशक नन्दी ने सुरभि गौ को प्रणाम कर, वहाँ प्रवेश किया जहाँ गणों-सहित पूजित वरुण विराजमान थे।

श्लोक 32 (skanda.8.159.32)

स दिव्यवस्त्राभरणं पुत्रपौत्रगणान्वितम् । अपश्यदम्बुगोप्तामादित्ययुतसन्निभम्

sa divyavastrābharaṇaṁ putrapautragaṇānvitam | apaśyadambugoptāmādityayutasannibham

उन्होंने दिव्य वस्त्र और आभूषणों से युक्त, पुत्र-पौत्रों-सहित, दस हजार सूर्यों के समान तेजस्वी जल-रक्षक वरुण को देखा।

श्लोक 33 (skanda.8.159.33)

वरुणं द्वारपालेन पूर्वमेव निवेदितः । प्रविवेश तदा नन्दी वरुणस्य निवेशनम्

varuṇaṁ dvārapālena pūrvameva niveditaḥ | praviveśa tadā nandī varuṇasya niveśanam

द्वारपाल द्वारा पहले ही सूचित किए जाने पर, नन्दी तब वरुण के निवास में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 34 (skanda.8.159.34)

स चाप्यपात्तदा राजा दूरादेव प्रहृष्टवत् । दृष्ट्वा नन्दिनमुत्तस्थौ पूजयन्मन्मथार्दनम्

sa cāpyapāttadā rājā dūrādeva prahṛṣṭavat | dṛṣṭvā nandinamuttasthau pūjayanmanmathārdanam

उस राजा वरुण ने भी दूर से ही नन्दी को देखकर, प्रसन्नतापूर्वक, मन्मथ के अनुचर की पूजा करते हुए, तुरन्त उठकर खड़े हो गए।

श्लोक 35 (skanda.8.159.35)

तस्यार्घं गाञ्च पाद्यञ्च निवेद्य वरुणः स्वयम् । आसीनं तमपां गोप्ता पप्रच्छ वदतां वरः

tasyārghaṁ gāñca pādyañca nivedya varuṇaḥ svayam | āsīnaṁ tamapāṁ goptā papraccha vadatāṁ varaḥ

उन्हें अर्घ्य, गौ और पाद्य समर्पित कर, स्वयं वरुण ने, वक्ताओं में श्रेष्ठ उस जल-रक्षक ने, आसीन नन्दी से पूछा।

श्लोक 36 (skanda.8.159.36)

भगवन् किं चिरस्याद्य त्वया वयमपेक्षिताः । दर्शनं देवदेवस्य मन्यामस्तव दर्शनात्

bhagavan kiṁ cirasyādya tvayā vayamapekṣitāḥ | darśanaṁ devadevasya manyāmastava darśanāt

हे भगवन्! आज बहुत काल बाद आपने हमें याद किया - आपके दर्शन से ही हम देवदेव के दर्शन को मान लेते हैं।

श्लोक 37 (skanda.8.159.37)

विवक्षोरिव ते वक्त्रमिन्द्रगोपायतेनघ । वद सर्वानभिप्रायान् कर्ता तेहं न संशयः

vivakṣoriva te vaktramindragopāyatenagha | vada sarvānabhiprāyān kartā tehaṁ na saṁśayaḥ

हे निष्पाप! तुम्हारा मुख कुछ कहने के इच्छुक इन्द्रगोप कीट के समान लाल हो रहा है - अपना सारा अभिप्राय कहो; मुझ में सन्देह मत करो, मैं उसे पूरा करूँगा।

श्लोक 38 (skanda.8.159.38)

वरुणेनैवमुक्तस्तु तत्परेण शिलादजः । ततः स वरुणं प्राह दानवैरपराजितम्

varuṇenaivamuktastu tatpareṇa śilādajaḥ | tataḥ sa varuṇaṁ prāha dānavairaparājitam

वरुण द्वारा इस प्रकार तत्परतापूर्वक कहे जाने पर, शिलाद-पुत्र नन्दी ने तब दानवों से अपराजित वरुण से कहा।

श्लोक 39 (skanda.8.159.39)

अशोकतरुकं पुत्रं गिरिपुत्री ग्रहीष्यति । क्रीडार्थमुमया सार्ध निमन्त्रयति ते हरः

aśokatarukaṁ putraṁ giriputrī grahīṣyati | krīḍārthamumayā sārdha nimantrayati te haraḥ

पर्वत-पुत्री अशोक वृक्ष को पुत्र-रूप में ग्रहण करेंगी। उमा के साथ क्रीड़ा के लिए हर आपको आमन्त्रित करते हैं।

श्लोक 40 (skanda.8.159.40)

तद्देव पुत्राभिवृतः सदारः सह फेनपैः । श्वो याहि मन्दरगिरिं प्रीतिं वर्द्धय शूलिनः

taddeva putrābhivṛtaḥ sadāraḥ saha phenapaiḥ | śvo yāhi mandaragiriṁ prītiṁ varddhaya śūlinaḥ

अतः हे देव! पुत्रों-सहित, पत्नी-सहित, फेनपों के साथ, कल मन्दराचल जाइए और त्रिशूलधारी शिव की प्रसन्नता बढ़ाइए।

श्लोक 41 (skanda.8.159.41)

इत्युक्त्वा सोभ्युनुज्ञातो वरुणेन गणेश्वरः । निष्क्रान्तो वरुणावासाच्छ्वेताभ्रादिव भास्करः

ityuktvā sobhyunujñāto varuṇena gaṇeśvaraḥ | niṣkrānto varuṇāvāsācchvetābhrādiva bhāskaraḥ

यह कहकर, वरुण द्वारा अनुज्ञात होकर, गणेश्वर नन्दी वरुण के धाम से उसी प्रकार बाहर निकले, जैसे श्वेत मेघों से सूर्य निकलता है।

श्लोक 42 (skanda.8.159.42)

स पूज्यमानः सिद्धैश्च चारणैश्च सुरैरपि । प्रापोदयगिरिं नन्दी हरेषुस्त्रिपुरं यथा

sa pūjyamānaḥ siddhaiśca cāraṇaiśca surairapi | prāpodayagiriṁ nandī hareṣustripuraṁ yathā

सिद्धों, चारणों और देवताओं द्वारा पूजित होते हुए, नन्दी उदयाचल को उसी प्रकार जा पहुँचे, जैसे हर का बाण त्रिपुर की ओर जा पहुँचा था।

श्लोक 43 (skanda.8.159.43)

सोथ तस्य गिरेः शृङ्गे रञ्जिते तापनैः करैः । निलिल्ये गरुडः पक्षी प्रभञ्जनपथे यथा

sotha tasya gireḥ śṛṅge rañjite tāpanaiḥ karaiḥ | nililye garuḍaḥ pakṣī prabhañjanapathe yathā

फिर सूर्य-किरणों से रंजित उस पर्वत-शिखर पर वे उसी प्रकार अवतरित हुए, जैसे पक्षिराज गरुड़ वायु-पथ में अवतरित होता है।

श्लोक 44 (skanda.8.159.44)

ह्रदं तत्रार्णवाकारं काञ्चनाम्बुजशोभितम् । शीर्णोत्पलतरङ्गाढ्यमपश्यत्सोप्सरोवृतम्

hradaṁ tatrārṇavākāraṁ kāñcanāmbujaśobhitam | śīrṇotpalataraṅgāḍhyamapaśyatsopsarovṛtam

वहाँ उन्होंने समुद्र के समान विशाल, सुवर्ण-कमलों से सुशोभित, बिखरे हुए नील-कमलों की तरंगों से युक्त, अप्सराओं से घिरा हुआ सरोवर देखा।

श्लोक 45 (skanda.8.159.45)

ह्रदस्य तस्य रोधस्सु साशोकेषु सहस्रशः । अपश्यत ऋषीन् सत्यानादित्यायुतसन्निभान्

hradasya tasya rodhassu sāśokeṣu sahasraśaḥ | apaśyata ṛṣīn satyānādityāyutasannibhān

उस सरोवर के अशोक-वृक्षों से युक्त तटों पर उन्होंने सत्य नामक हज़ारों ऋषियों को देखा, जो दस हज़ार सूर्यों के समान तेजस्वी थे।

श्लोक 46 (skanda.8.159.46)

स तान् तपोधनान् दृष्ट्वा तपनाभान् तपोधनान् । नन्दी प्रह्वाञ्जलिपुटो ह्यासाद्यावन्दत द्विजान्

sa tān tapodhanān dṛṣṭvā tapanābhān tapodhanān | nandī prahvāñjalipuṭo hyāsādyāvandata dvijān

सूर्य के समान तेजस्वी उन तपोधनों को देखकर, नन्दी हाथ जोड़कर, झुककर उनके पास पहुँचे और उन द्विजों की वन्दना की।

श्लोक 47 (skanda.8.159.47)

ते सर्वे नियमान् हित्वा नियमस्थास्तपोधनाः । नन्दिनं समयुज्यन्त वासद्रुममिवाण्डजाः

te sarve niyamān hitvā niyamasthāstapodhanāḥ | nandinaṁ samayujyanta vāsadrumamivāṇḍajāḥ

नियमपरायण वे सभी तपस्वी अपने-अपने नियमों को छोड़कर नन्दी की ओर वैसे ही आ मिले, जैसे पक्षी अपने निवास-वृक्ष की ओर आ मिलते हैं।

श्लोक 48 (skanda.8.159.48)

तैः सूर्यकिरणापीतैः पीतचीराम्बरैरपि । संवृतः स बभौ नन्दी जम्बुद्वीप इवाचलैः

taiḥ sūryakiraṇāpītaiḥ pītacīrāmbarairapi | saṁvṛtaḥ sa babhau nandī jambudvīpa ivācalaiḥ

सूर्य-किरणों से पीतवर्ण हो गए, पीत वल्कल-वस्त्रधारी उन ऋषियों से घिरे हुए नन्दी उसी प्रकार शोभित हुए, जैसे पर्वतों से घिरा जम्बूद्वीप शोभित होता है।

श्लोक 49 (skanda.8.159.49)

स पूज्यमानो गणपः सत्यः सत्यैस्तपोधनैः । अतीव प्रबभौ व्यास तीर्थेष्विव महेश्वरः

sa pūjyamāno gaṇapaḥ satyaḥ satyaistapodhanaiḥ | atīva prababhau vyāsa tīrtheṣviva maheśvaraḥ

हे व्यास! सत्यनिष्ठ, सत्य नामक उन तपस्वियों द्वारा पूजित गणपति नन्दी अत्यन्त शोभित हुए, जैसे तीर्थों में स्वयं महेश्वर शोभित होते हैं।

श्लोक 50 (skanda.8.159.50)

ते नन्दिनं सुखासीनं सत्यं सत्यास्तपोधनाः । ऊचुर्हर्षाकुलैर्वाक्यैर्विस्मिताननलोचनाः

te nandinaṁ sukhāsīnaṁ satyaṁ satyāstapodhanāḥ | ūcurharṣākulairvākyairvismitānanalocanāḥ

सुखपूर्वक बैठे हुए, सत्यनिष्ठ नन्दी से वे सत्य नामक तपोधन, विस्मित मुख और नेत्रों वाले होकर, हर्ष-भरी वाणी में बोले।

श्लोक 51 (skanda.8.159.51)

नन्दीश्वर चिरस्याद्य ह्युदयो ह्युदयप्रभः । समाक्रान्तस्त्वया तात धर्मेण निरयो यथा

nandīśvara cirasyādya hyudayo hyudayaprabhaḥ | samākrāntastvayā tāta dharmeṇa nirayo yathā

हे नन्दीश्वर! बहुत काल बाद आज उदयाचल पर सूर्योदय हुआ है - हे तात! तुमने इसे उसी प्रकार आक्रान्त किया है, जैसे धर्म नरक को आक्रान्त करता है।

श्लोक 52 (skanda.8.159.52)

किमिहानघ देवेशस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरार्दनः । विहर्तुमागतो देवो दृष्टोस्माभिस्ततो भवान्

kimihānagha deveśastrinetrastripurārdanaḥ | vihartumāgato devo dṛṣṭosmābhistato bhavān

हे निष्पाप! क्या यहाँ त्रिनेत्रधारी, त्रिपुर-संहारक देवेश विहार करने आए हैं? इसीलिए क्या हमने तुम्हें यहाँ देखा है?

श्लोक 53 (skanda.8.159.53)

सत्यं सुचरितं शुद्धं तपोस्माभिर्गणेश्वर । सहोमं यत् त्वया सार्धं द्रक्ष्याम इह शङ्करम्

satyaṁ sucaritaṁ śuddhaṁ taposmābhirgaṇeśvara | sahomaṁ yat tvayā sārdhaṁ drakṣyāma iha śaṅkaram

हे गणेश्वर! हमारा सत्य, सुचरित और शुद्ध तप सफल हुआ, कि तुम्हारे साथ हम पार्वती-सहित शंकर के यहाँ दर्शन करेंगे।

श्लोक 54 (skanda.8.159.54)

एवं कपीन्द्रवदनो वन्दमानाँस्तपोधनान् । स सत्यान् सत्यवचन इदमाह शिलादजः

evaṁ kapīndravadano vandamānā~stapodhanān | sa satyān satyavacana idamāha śilādajaḥ

इस प्रकार वन्दना करते हुए उन तपोधनों से, वानरराज-मुख नन्दी ने, सत्यवचनी शिलाद-पुत्र ने, उन सत्यों से यह कहा।

श्लोक 55 (skanda.8.159.55)

मन्दरं शैलं न कथञ्चित्त्यजेदजः । अहन्तु कार्यवानागां युष्माकमिममाश्रमम्

mandaraṁ śailaṁ na kathañcittyajedajaḥ | ahantu kāryavānāgāṁ yuṣmākamimamāśramam

इस श्लोक का प्रारम्भिक अंश मूल में खण्डित है - 'अजन्मा शिव मन्दराचल को किसी भी दशा में नहीं छोड़ेंगे; मैं ही किसी कार्यवश तुम्हारे इस आश्रम में आया हूँ।'

श्लोक 56 (skanda.8.159.56)

अशोकतरुकं पुत्रं गिरिपुत्री ग्रहीष्यति । निमन्त्रयति वस्तत्र सवाञ्छर्वो द्विजोत्तमान्

aśokatarukaṁ putraṁ giriputrī grahīṣyati | nimantrayati vastatra savāñcharvo dvijottamān

पर्वत-पुत्री अशोक वृक्ष को पुत्र-रूप में ग्रहण करेंगी। हे श्रेष्ठ द्विजो! शर्व वहाँ तुम सबको - अपनी इच्छा-सहित - आमन्त्रित करते हैं।

श्लोक 57 (skanda.8.159.57)

मानयन्तो भवं सर्वे साम्बमम्बापतिं द्रुतम् । श्वो गच्छत तपोनित्या मन्दरं धरणीधरम्

mānayanto bhavaṁ sarve sāmbamambāpatiṁ drutam | śvo gacchata taponityā mandaraṁ dharaṇīdharam

सब लोग, भव को - पार्वती-सहित उमापति को - सम्मानित करते हुए, नित्य तपोनिष्ठ रहते हुए, कल शीघ्र ही मन्दराचल पर्वत पर जाइए।

श्लोक 58 (skanda.8.159.58)

तत्र शर्वममराधिपप्रभुं तारकाधिपविभूषणं शिवम् । द्रक्ष्यथेशमसुरप्रमर्दनं देवतार्तिनिखिलं हरं हरम्

tatra śarvamamarādhipaprabhuṁ tārakādhipavibhūṣaṇaṁ śivam | drakṣyatheśamasurapramardanaṁ devatārtinikhilaṁ haraṁ haram

वहाँ देवाधिपतियों के भी स्वामी शर्व को, चन्द्रमा से विभूषित शिव को, असुरों के संहारक ईश्वर को, तथा देवताओं के समस्त दुःख का हरण करने वाले हर को तुम देखोगे।

अध्याय 158अध्याय-सूचीअध्याय 160