अम्बिका खण्ड · अध्याय 160
विप्रामन्त्रण
श्लोक 1 (skanda.8.160.1)
सनत्कुमार उवाच । आमन्त्र्य तानृषीन् सर्वान् सत्यवीर्ययशःश्रुतान् । नन्दी विसर्जितस्तैस्तु ययौ सूर्यरथं प्रति
sanatkumāra uvāca | āmantrya tānṛṣīn sarvān satyavīryayaśaḥśrutān | nandī visarjitastaistu yayau sūryarathaṁ prati
सनत्कुमार ने कहा - सत्य, वीर्य और यश से विख्यात उन सभी ऋषियों को आमन्त्रित कर, उनके द्वारा विदा किए गए नन्दी सूर्य के रथ की ओर चल पड़े।
श्लोक 2 (skanda.8.160.2)
स तं सप्तोत्तमहयं शकुन्तवरसारथिम् । हराज्ञया रविं देवमुपासर्पत भूतपः
sa taṁ saptottamahayaṁ śakuntavarasārathim | harājñayā raviṁ devamupāsarpata bhūtapaḥ
हर की आज्ञा से भूतप नन्दी सात उत्तम अश्वों वाले, अरुण नामक श्रेष्ठ पक्षी-सारथि वाले सूर्यदेव के समीप पहुँचे।
श्लोक 3 (skanda.8.160.3)
सूर्यरश्मिसहस्रेषु तापसान् स मरीचिपान् । अपश्यत् स सुखासीनान् छायास्विव विहङ्गमान्
sūryaraśmisahasreṣu tāpasān sa marīcipān | apaśyat sa sukhāsīnān chāyāsviva vihaṅgamān
उन्होंने सूर्य की सहस्रों किरणों में किरण-भक्षी तपस्वियों को उसी प्रकार सुखपूर्वक बैठे देखा, जैसे छाया में पक्षी बैठे हों।
श्लोक 4 (skanda.8.160.4)
ततः सूर्यरथं शीघ्रमुपेत्यारुणसारथिम् । सोंशुमालिनमत्रिञ्च अथर्वाङ्गिरसावपि
tataḥ sūryarathaṁ śīghramupetyāruṇasārathim | soṁśumālinamatriñca atharvāṅgirasāvapi
फिर अरुण-सारथि वाले सूर्य-रथ के पास शीघ्र पहुँचकर, अंशुमाली सूर्य को, अत्रि को, तथा अथर्वा और अंगिरा को भी -
श्लोक 5 (skanda.8.160.5)
देवानृषीन् भुजङ्गाँश्च अश्वाँश्चामन्त्रयच्छुभः । आदित्याश्वादिभिर्नन्दी रुद्रपिप्रीषुभिस्तदा
devānṛṣīn bhujaṅgā~śca aśvā~ścāmantrayacchubhaḥ | ādityāśvādibhirnandī rudrapiprīṣubhistadā
उन शुभ नन्दी ने देवताओं, ऋषियों, सर्पों और अश्वों को भी आमन्त्रित किया - रुद्र को प्रसन्न करने की इच्छा से सूर्य के अश्वों-सहित सबको।
श्लोक 6 (skanda.8.160.6)
तथेत्युक्तोपचक्राम सूर्यवाहादथ द्रुतम् । देवानृषीन् भुजङ्गाँश्च तत आमन्त्र्य भूतपः
tathetyuktopacakrāma sūryavāhādatha drutam | devānṛṣīn bhujaṅgā~śca tata āmantrya bhūtapaḥ
'ऐसा ही होगा' कहे जाने पर, देवताओं, ऋषियों और सर्पों को आमन्त्रित कर, भूतप नन्दी सूर्य-वाहन से शीघ्र आगे बढ़े।
श्लोक 7 (skanda.8.160.7)
स वायुरिव शीघ्रस्तु गरुडो वा यथाण्डजः । धनेशभवनं नन्दी कैलासं समुपागतः
sa vāyuriva śīghrastu garuḍo vā yathāṇḍajaḥ | dhaneśabhavanaṁ nandī kailāsaṁ samupāgataḥ
वायु के समान वेगवान्, या पक्षिराज गरुड़ के समान, नन्दी कुबेर के भवन कैलास पर जा पहुँचे।
श्लोक 8 (skanda.8.160.8)
स तं पाण्डरमेधाभं कुन्देन्दुरजतप्रभम् । पर्वतं धनदावासं पश्यमानः प्रहष्यत
sa taṁ pāṇḍaramedhābhaṁ kundendurajataprabham | parvataṁ dhanadāvāsaṁ paśyamānaḥ prahaṣyata
मेघ के समान श्वेत, कुन्द, चन्द्रमा और चाँदी के समान कान्तिवाले, कुबेर के निवासस्थान उस पर्वत को देखकर वे हर्षित हुए।
श्लोक 9 (skanda.8.160.9)
स भूतेशो धनेशस्य गिरोशवचनङ्करः । आससाद नगस्याग्रे भवनं काञ्चनं शुभम्
sa bhūteśo dhaneśasya girośavacanaṅkaraḥ | āsasāda nagasyāgre bhavanaṁ kāñcanaṁ śubham
भूतेश की आज्ञा के पालक वे नन्दी, पर्वत-शिखर पर धनेश के शुभ स्वर्ण-भवन के समीप पहुँचे।
श्लोक 10 (skanda.8.160.10)
कैलासाग्रे सन्निविष्टं कैलासाग्रसमत्विषम् । हर्म्यप्रासादसंपन्नं सम्पन्नमिव भासितम्
kailāsāgre sanniviṣṭaṁ kailāsāgrasamatviṣam | harmyaprāsādasaṁpannaṁ sampannamiva bhāsitam
कैलास-शिखर पर स्थित, कैलास-शिखर के समान ही कान्तिमय, अट्टालिकाओं और प्रासादों से सम्पन्न, वह भवन मानो पूर्ण समृद्धि से चमक रहा था।
श्लोक 11 (skanda.8.160.11)
पताकाभिर्ध्वजैश्चापि किङ्किणीजालमालिभिः । हासैश्च पुरघोषाणां सन्नादितमहर्निशम्
patākābhirdhvajaiścāpi kiṅkiṇījālamālibhiḥ | hāsaiśca puraghoṣāṇāṁ sannāditamaharniśam
पताकाओं, ध्वजों, तथा घण्टिकाओं की मालाओं से युक्त, और नगर की ध्वनियों की हँसी से रात-दिन गूँजता हुआ -
श्लोक 12 (skanda.8.160.12)
भेर्या परमघोराणां वादित्रशतनादितम् । इज्याध्ययनसंपन्नास्तिष्ठन्त्यत्र सभासदः
bheryā paramaghorāṇāṁ vāditraśatanāditam | ijyādhyayanasaṁpannāstiṣṭhantyatra sabhāsadaḥ
अत्यन्त गम्भीर नगाड़ों तथा सैकड़ों वाद्य-यन्त्रों से निनादित उस भवन में यज्ञ और अध्ययन से सम्पन्न सभासद विराजमान थे।
श्लोक 13 (skanda.8.160.13)
भाभिर्जुष्टां सभां तस्य ततो रुद्रसभासदः । आससाद स यत्रास्ते मुनेर्विश्रवसः सुतः
bhābhirjuṣṭāṁ sabhāṁ tasya tato rudrasabhāsadaḥ | āsasāda sa yatrāste munerviśravasaḥ sutaḥ
फिर रुद्र के उस सभासद ने, कान्ति से भरी हुई उस सभा में प्रवेश किया, जहाँ मुनि विश्रवा के पुत्र विराजमान थे।
श्लोक 14 (skanda.8.160.14)
तमृद्ध्या परया युक्तं सेव्यमानं श्रिया तथा । अपश्यद् धनदं नन्दी दिव्यस्त्रीगणसेवितम्
tamṛddhyā parayā yuktaṁ sevyamānaṁ śriyā tathā | apaśyad dhanadaṁ nandī divyastrīgaṇasevitam
परम समृद्धि से युक्त, श्री द्वारा सेवित, दिव्य स्त्री-समूह से घिरे हुए कुबेर को नन्दी ने देखा।
श्लोक 15 (skanda.8.160.15)
शुक्तिकणं शुक्तिकर्णैर्यक्षेन्द्रैरभिसंवृतम् । उपगीयमानं गन्धर्वैरेकपिङ्गायतेक्षणम्
śuktikaṇaṁ śuktikarṇairyakṣendrairabhisaṁvṛtam | upagīyamānaṁ gandharvairekapiṅgāyatekṣaṇam
मोती के समान चमकता हुआ, सीप-कर्ण वाले यक्षराजों से घिरा हुआ, गन्धर्वों द्वारा गाया जाता हुआ, विषम-नेत्र वाला वह कुबेर -
श्लोक 16 (skanda.8.160.16)
महेश्वरसखत्वेन वरदानमदेन च । माद्यन्तं स्वर्णया नद्धमालयामललोलया
maheśvarasakhatvena varadānamadena ca | mādyantaṁ svarṇayā naddhamālayāmalalolayā
महेश्वर की सख्यता के मद से और वरदान-प्राप्ति के गर्व से उन्मत्त, निर्मल स्वर्णिम माला से बँधा हुआ -
श्लोक 17 (skanda.8.160.17)
धनदश्चापि तं दृष्ट्वा शङ्करानुचरं वरम् । पूजयञ्छङ्करं सोममुत्पपातासनाद् द्रुतम्
dhanadaścāpi taṁ dṛṣṭvā śaṅkarānucaraṁ varam | pūjayañchaṅkaraṁ somamutpapātāsanād drutam
कुबेर ने भी शंकर के उस श्रेष्ठ अनुचर को देखकर, शंकर और पार्वती का आदर करते हुए, तुरन्त आसन से उठ खड़े हुए।
श्लोक 18 (skanda.8.160.18)
स्वर्णादुत्पतमानस्तु आसनाद् धनदो बभौ । साशोकादिव पुष्पाढ्यादुदग्रात् पर्वताद्रविः
svarṇādutpatamānastu āsanād dhanado babhau | sāśokādiva puṣpāḍhyādudagrāt parvatādraviḥ
स्वर्णासन से उठते हुए कुबेर उसी प्रकार शोभित हुए, जैसे फूलों से भरे अशोक-सहित ऊँचे पर्वत से सूर्य उदित होता है।
श्लोक 19 (skanda.8.160.19)
तमुत्पतन्तमुत्पेतुर्यक्षा यक्षपतिं द्रुतम् । ग्रहा यथा दीप्यमाना दिनहानौ ग्रहाधिपम्
tamutpatantamutpeturyakṣā yakṣapatiṁ drutam | grahā yathā dīpyamānā dinahānau grahādhipam
उस उठते हुए यक्षपति के साथ, यक्षगण भी वैसे ही तुरन्त उठ खड़े हुए, जैसे दिन के क्षय होने पर चमकते हुए ग्रह अपने अधिपति के साथ उठते हैं।
श्लोक 20 (skanda.8.160.20)
नन्दिने स तदार्घञ्च पाद्यञ्चावेद्य वित्तदः । सपुत्रदारः सामात्यः प्रणेमे मनसा हरम्
nandine sa tadārghañca pādyañcāvedya vittadaḥ | saputradāraḥ sāmātyaḥ praṇeme manasā haram
उस धनदाता कुबेर ने नन्दी को अर्घ्य और पाद्य समर्पित कर, पुत्र, पत्नी और मन्त्रियों-सहित, मन से हर को प्रणाम किया।
श्लोक 21 (skanda.8.160.21)
ततः कथा बहुविधाः कृत्वोद्दिश्य महेश्वरम् । पप्रच्छ धनदो नन्दिं चिरस्यागमनं कृतम्
tataḥ kathā bahuvidhāḥ kṛtvoddiśya maheśvaram | papraccha dhanado nandiṁ cirasyāgamanaṁ kṛtam
फिर महेश्वर के विषय में अनेक प्रकार की बातें करते हुए, कुबेर ने नन्दी से पूछा कि इतने काल बाद आगमन का क्या कारण है।
श्लोक 22 (skanda.8.160.22)
नन्द्युवाच । अशोकतरुकं पुत्रं गिरिपुत्री ग्रहीष्यति । निमन्त्रयति तत्र त्वां द्रविणेश महेश्वरः
nandyuvāca | aśokatarukaṁ putraṁ giriputrī grahīṣyati | nimantrayati tatra tvāṁ draviṇeśa maheśvaraḥ
नन्दी ने कहा - 'पर्वत-पुत्री अशोक वृक्ष को पुत्र-रूप में ग्रहण करेंगी। हे द्रविणेश! महेश्वर आपको वहाँ आमन्त्रित करते हैं।'
श्लोक 23 (skanda.8.160.23)
श्वः सपुत्रः सदारश्च सानुगः साप्सरोगणः । मन्दरं याहि वित्तेश देवेशः प्रीयते त्वया
śvaḥ saputraḥ sadāraśca sānugaḥ sāpsarogaṇaḥ | mandaraṁ yāhi vitteśa deveśaḥ prīyate tvayā
हे वित्तेश! कल पुत्रों, पत्नी, अनुचरों और अप्सरा-समूह-सहित मन्दराचल जाइए; देवेश आपसे प्रसन्न होंगे।
श्लोक 24 (skanda.8.160.24)
एवमामन्त्र्य धनदं धनदेन विसर्जितः । ययौ संयमनीं नन्दी यमस्य यमसन्निभः
evamāmantrya dhanadaṁ dhanadena visarjitaḥ | yayau saṁyamanīṁ nandī yamasya yamasannibhaḥ
इस प्रकार कुबेर को आमन्त्रित कर, कुबेर द्वारा विदा किए गए, संयमशील नन्दी यम की संयमनी नगरी की ओर चल पड़े।
श्लोक 25 (skanda.8.160.25)
स यमं धर्मवक्तारं हर्तारं प्राणिनां प्रभुम् । साग्निं सधर्मं सव्याधिमपश्यद् गणनायकः
sa yamaṁ dharmavaktāraṁ hartāraṁ prāṇināṁ prabhum | sāgniṁ sadharmaṁ savyādhimapaśyad gaṇanāyakaḥ
उस गणनायक ने धर्म के वक्ता, प्राणियों को हरण करने वाले प्रभु यम को, अग्नि, धर्म और व्याधि-सहित देखा।
श्लोक 26 (skanda.8.160.26)
आयांतं नन्दिनं दृष्ट्वा यमो भूतशतावृतः । पादाभ्यां नन्दिनः सोथ निपपात तुतोष च
āyāṁtaṁ nandinaṁ dṛṣṭvā yamo bhūtaśatāvṛtaḥ | pādābhyāṁ nandinaḥ sotha nipapāta tutoṣa ca
आते हुए नन्दी को देखकर, सैकड़ों भूतों से घिरे यम उनके दोनों चरणों में गिर पड़े और प्रसन्न हुए।
श्लोक 27 (skanda.8.160.27)
रुद्रस्येव यमस्तस्य पूजां कृत्वा ह्यनुत्तमाम् । पप्रच्छ नन्दिनं यत्नाच्चिरस्यागमनं कृतम्
rudrasyeva yamastasya pūjāṁ kṛtvā hyanuttamām | papraccha nandinaṁ yatnāccirasyāgamanaṁ kṛtam
रुद्र की ही भाँति उनकी सर्वोत्तम पूजा कर, यम ने प्रयत्नपूर्वक नन्दी से इतने काल बाद आगमन का कारण पूछा।
श्लोक 28 (skanda.8.160.28)
नन्द्युवाच । अशोकतरुकं पुत्रं गिरिपुत्री ग्रहीष्यति । तत्र त्वां सानुगं देवो निमन्त्रयति शङ्करः
nandyuvāca | aśokatarukaṁ putraṁ giriputrī grahīṣyati | tatra tvāṁ sānugaṁ devo nimantrayati śaṅkaraḥ
नन्दी ने कहा - 'पर्वत-पुत्री अशोक वृक्ष को पुत्र-रूप में ग्रहण करेंगी। वहाँ अनुचरों-सहित आपको देव शंकर आमन्त्रित करते हैं।'
श्लोक 29 (skanda.8.160.29)
ये चैव विषये ह्यस्मिन् निवसन्ति द्विजातयः । ताँश्चामन्त्रयते देवः संमान्य बहुमानतः
ye caiva viṣaye hyasmin nivasanti dvijātayaḥ | tā~ścāmantrayate devaḥ saṁmānya bahumānataḥ
तथा इस प्रदेश में जो भी द्विजगण निवास करते हैं, देव उन्हें भी बड़े आदर के साथ सम्मानपूर्वक आमन्त्रित करते हैं।
श्लोक 30 (skanda.8.160.30)
कल्यं स भगवान् कल्यः कालः कालप्रियं गिरिम् । मानयन् प्रभुमीशानं गन्तुमर्हसि मन्दरम्
kalyaṁ sa bhagavān kalyaḥ kālaḥ kālapriyaṁ girim | mānayan prabhumīśānaṁ gantumarhasi mandaram
निरोगी भगवान् काल आप, कल प्रातःकाल, काल के प्रिय उस पर्वत पर, प्रभु ईशान का सम्मान करते हुए, जाने योग्य हैं।
श्लोक 31 (skanda.8.160.31)
तथेत्युक्तो यमेनाथ तैश्चाग्निसदृशैर्द्विजैः । सूर्यात्मजगृहान्नन्दी शक्रलोकं ततो गतः
tathetyukto yamenātha taiścāgnisadṛśairdvijaiḥ | sūryātmajagṛhānnandī śakralokaṁ tato gataḥ
यम तथा उन अग्नि-सदृश द्विजों द्वारा 'ऐसा ही होगा' कहे जाने पर, नन्दी सूर्यपुत्र यम के भवन से इन्द्रलोक की ओर चल पड़े।
श्लोक 32 (skanda.8.160.32)
सुकृतीनां तमावासं वासवं लोकमद्भुतम् । विवेश त्वरितं नन्दी दितिगर्भं यथाहिहा
sukṛtīnāṁ tamāvāsaṁ vāsavaṁ lokamadbhutam | viveśa tvaritaṁ nandī ditigarbhaṁ yathāhihā
पुण्यात्माओं के उस अद्भुत निवासस्थान, इन्द्रलोक में नन्दी उसी वेग से प्रविष्ट हुए, जैसे सर्पघाती दिति के गर्भ में प्रविष्ट होता है।
श्लोक 33 (skanda.8.160.33)
स सुधर्मा सुधर्मायां सुधर्मममरैर्वृतम् । गान्धर्वमुपशृण्वानं नन्दी शक्रमपश्यत
sa sudharmā sudharmāyāṁ sudharmamamarairvṛtam | gāndharvamupaśṛṇvānaṁ nandī śakramapaśyata
धर्मनिष्ठ नन्दी ने अपनी सुधर्मा सभा में देवताओं से घिरे, गान्धर्व-संगीत सुनते हुए धर्मनिष्ठ इन्द्र को देखा।
श्लोक 34 (skanda.8.160.34)
शक्रश्च नन्दिनं देवं देवदेवस्य किङ्करम् । हर्षान्नेत्रसहस्रस्थं कृत्वा सम्यगपश्यत
śakraśca nandinaṁ devaṁ devadevasya kiṅkaram | harṣānnetrasahasrasthaṁ kṛtvā samyagapaśyata
इन्द्र ने भी देवदेव के सेवक नन्दी को देखकर हर्षपूर्वक अपनी सहस्र आँखों को उन पर केन्द्रित कर उन्हें भली-भाँति देखा।
श्लोक 35 (skanda.8.160.35)
स पूजां रुद्रसदृशीमवाप्य त्रिदशेश्वरात् । उपाविशदमेयात्मा शक्राभ्यासे वरासने
sa pūjāṁ rudrasadṛśīmavāpya tridaśeśvarāt | upāviśadameyātmā śakrābhyāse varāsane
देवताओं के स्वामी से रुद्र के समान पूजा प्राप्त कर, वे अपार आत्मबल वाले नन्दी इन्द्र के पास ही श्रेष्ठ आसन पर बैठ गए।
श्लोक 36 (skanda.8.160.36)
तमासीनमुपासीनः शतक्रतुररिन्दमः । पिबन्नेत्रसहस्रेण न तृप्तिं सोभ्यगच्छत
tamāsīnamupāsīnaḥ śatakraturarindamaḥ | pibannetrasahasreṇa na tṛptiṁ sobhyagacchata
शत्रुदमन इन्द्र उनके पास बैठकर, अपनी सहस्र आँखों से मानो उन्हें पीते हुए भी, तृप्ति को प्राप्त नहीं हुए।
श्लोक 37 (skanda.8.160.37)
ततो वृत्रबलारिस्तं नन्दिनं दिनकृत्प्रभम् । पर्यपृच्छत हर्षेण किं चिरादागतो भवान्
tato vṛtrabalāristaṁ nandinaṁ dinakṛtprabham | paryapṛcchata harṣeṇa kiṁ cirādāgato bhavān
फिर वृत्र और बल के शत्रु इन्द्र ने सूर्य के समान तेजस्वी नन्दी से हर्षपूर्वक पूछा - 'इतने काल बाद आपका आगमन किस कारण हुआ?'
श्लोक 38 (skanda.8.160.38)
इत्युक्तः स तु देवेन देवः स्वर्गनिवासिना । मन्दारवासितोव्यग्रः प्रोवाच कुलिशाधरः
ityuktaḥ sa tu devena devaḥ svarganivāsinā | mandāravāsitovyagraḥ provāca kuliśādharaḥ
स्वर्गवासी देव इन्द्र द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, मन्दार-सुगन्धित, अव्यग्र, वज्रधारी इन्द्र से देव नन्दी ने कहा।
श्लोक 39 (skanda.8.160.39)
अशोकतरुकं पुत्रं गिरिपुत्री ग्रहीष्यति । तत्र त्वां सामरं देवो निमन्त्रयति भूतपः
aśokatarukaṁ putraṁ giriputrī grahīṣyati | tatra tvāṁ sāmaraṁ devo nimantrayati bhūtapaḥ
'पर्वत-पुत्री अशोक वृक्ष को पुत्र-रूप में ग्रहण करेंगी। भूतप देव आपको वहाँ देवताओं-सहित आमन्त्रित करते हैं।'
श्लोक 40 (skanda.8.160.40)
द्विजपूर्वं द्विजा ये च तवालयनिवासिनः । सपुत्रदाराँस्ताँश्चापि निमन्त्रयति शङ्करः
dvijapūrvaṁ dvijā ye ca tavālayanivāsinaḥ | saputradārā~stā~ścāpi nimantrayati śaṅkaraḥ
'तथा जो द्विजगण आपके निवास में रहते हैं, उन्हें भी पुत्र-पत्नी-सहित शंकर आमन्त्रित करते हैं।'
श्लोक 41 (skanda.8.160.41)
श्वस्सपुत्रः सदारस्त्वं देवदेवस्य शासनात् । मन्दरं गच्छ देवेश गिरीशमभिनन्दय
śvassaputraḥ sadārastvaṁ devadevasya śāsanāt | mandaraṁ gaccha deveśa girīśamabhinandaya
'हे देवेश! देवदेव की आज्ञा से आप कल पुत्र-पत्नी-सहित मन्दराचल जाकर गिरीश का अभिनन्दन कीजिए।'
श्लोक 42 (skanda.8.160.42)
त्वयि याते सुरश्रेष्ठ अशोकतरुकोत्सवे । प्रीतिं यास्यति देवेशः परां सुरनरार्त्तिहा
tvayi yāte suraśreṣṭha aśokatarukotsave | prītiṁ yāsyati deveśaḥ parāṁ suranarārttihā
'हे सुरश्रेष्ठ! अशोक-तरु-उत्सव में आपके पहुँचने पर, सुर-नरों के दुःख का नाश करने वाले देवेश को परम प्रसन्नता होगी।'
श्लोक 43 (skanda.8.160.43)
शितशूलधरं पिनाकिनं गिरिराजेन्द्रसुतापतिं प्रभुम् । प्रणिपत्य महेशमूर्जितं पुनरेवैष्यसि नाकसंसदम्
śitaśūladharaṁ pinākinaṁ girirājendrasutāpatiṁ prabhum | praṇipatya maheśamūrjitaṁ punarevaiṣyasi nākasaṁsadam
'तीक्ष्ण त्रिशूलधारी, पिनाकधारी, गिरिराजेन्द्र-पुत्री के स्वामी, प्रभु, बलशाली महेश को प्रणाम करके आप पुनः स्वर्ग की सभा में लौट आइएगा।'