अम्बिका खण्ड · अध्याय 161
तरु-पुत्र-ग्रहण में विप्रामन्त्रण
श्लोक 1 (skanda.8.161.1)
सनत्कुमार उवाच । शक्रेण तु कृतानुज्ञो नन्दी प्रमथनायकः । ब्रह्मणो भवनं गन्तुं मतिं दध्रे महाद्युतिः
sanatkumāra uvāca | śakreṇa tu kṛtānujño nandī pramathanāyakaḥ | brahmaṇo bhavanaṁ gantuṁ matiṁ dadhre mahādyutiḥ
सनत्कुमार ने कहा - इन्द्र से अनुमति पाकर, महातेजस्वी प्रमथनायक नन्दी ने ब्रह्मा के भवन जाने का विचार किया।
श्लोक 2 (skanda.8.161.2)
स मुहूर्त्तान्महावेगो महावेग इवानिलः । वैराजं भवनं प्राप्तश्चतुर्वक्त्रस्य पार्षदः
sa muhūrttānmahāvego mahāvega ivānilaḥ | vairājaṁ bhavanaṁ prāptaścaturvaktrasya pārṣadaḥ
क्षणभर में ही महावेगशाली वे, वायु के समान वेगपूर्वक, चतुर्मुख ब्रह्मा के पार्षद, वैराज भवन में जा पहुँचे।
श्लोक 3 (skanda.8.161.3)
हतक्लमां स तु सभां सभां मेरुगिरेरिव । विवेश नन्दी तेजस्वी दिवाकरकरो यथा
hataklamāṁ sa tu sabhāṁ sabhāṁ merugireriva | viveśa nandī tejasvī divākarakaro yathā
मेरु पर्वत के समान उस थकानरहित सभा में तेजस्वी नन्दी उसी प्रकार प्रविष्ट हुए, जैसे सूर्य की किरण प्रवेश करती है।
श्लोक 4 (skanda.8.161.4)
तां कथामिव चित्रार्थां चित्रार्थैर्बहुभिर्युताम् । ददर्श स सभां नन्दी बह्वाश्चर्यसमाकुलाम्
tāṁ kathāmiva citrārthāṁ citrārthairbahubhiryutām | dadarśa sa sabhāṁ nandī bahvāścaryasamākulām
उस सभा को, मानो चित्र-चित्र अर्थोंवाली कथा के समान, अनेक अद्भुत विषयों से युक्त, बहुत आश्चर्यों से भरी हुई, नन्दी ने देखा।
श्लोक 5 (skanda.8.161.5)
तस्यां सभायामालीनं यतिभिस्सह सोद्भुतम् । अपश्यदब्जजं नन्दी देवैः पञ्चभिरावृतम्
tasyāṁ sabhāyāmālīnaṁ yatibhissaha sodbhutam | apaśyadabjajaṁ nandī devaiḥ pañcabhirāvṛtam
उस सभा में यतियों-सहित विराजमान, पाँच देवताओं से घिरे, अद्भुत कमलजन्मा ब्रह्मा को नन्दी ने देखा।
श्लोक 6 (skanda.8.161.6)
वेदार्थं भाषमाणं तं यतीनां परिपृच्छताम् । ताँश्च भाष्यविदः सर्वान् श्रुत्वा साध्विति वादिनः
vedārthaṁ bhāṣamāṇaṁ taṁ yatīnāṁ paripṛcchatām | tā~śca bhāṣyavidaḥ sarvān śrutvā sādhviti vādinaḥ
वे यतियों के प्रश्न पूछने पर वेद के अर्थ की व्याख्या कर रहे थे, और उन सभी भाष्य-ज्ञाताओं को सुनकर 'साधु!' कह रहे थे।
श्लोक 7 (skanda.8.161.7)
नन्दी पितामहं सम्यक् पूजयामास सत्वरम् । ततः पितामहः प्राह नन्दिनं गणनायकम्
nandī pitāmahaṁ samyak pūjayāmāsa satvaram | tataḥ pitāmahaḥ prāha nandinaṁ gaṇanāyakam
नन्दी ने तुरन्त पितामह की भली-भाँति पूजा की। तब पितामह ने गणनायक नन्दी से कहा।
श्लोक 8 (skanda.8.161.8)
किं चिरादागतोसीति स च तं प्रत्यभाषत । अशोकतरुकं पुत्रं गिरिपुत्री ग्रहीष्यति
kiṁ cirādāgatosīti sa ca taṁ pratyabhāṣata | aśokatarukaṁ putraṁ giriputrī grahīṣyati
'इतने काल बाद क्या कारण है कि तुम आए हो?' - इस पर उसने उत्तर दिया - 'पर्वत-पुत्री अशोक वृक्ष को पुत्र-रूप में ग्रहण करेंगी।'
श्लोक 9 (skanda.8.161.9)
भगवँस्तत्र देवस्त्वां निमन्त्रयति शङ्करः । इमांश्च तपसाग्न्याभान् सवेदान् वेदवादिनः
bhagava~statra devastvāṁ nimantrayati śaṅkaraḥ | imāṁśca tapasāgnyābhān savedān vedavādinaḥ
हे भगवन्! देव शंकर आपको वहाँ आमन्त्रित करते हैं, तथा तप से अग्नि-सदृश तेजस्वी इन वेदवादी वेदज्ञों को भी।
श्लोक 10 (skanda.8.161.10)
निमन्त्रयति देवेशो यज्ञकोटीनिमन्त्रितः । यतिभिस्सह सर्वस्त्वं मन्दरं चित्रकन्दरम्
nimantrayati deveśo yajñakoṭīnimantritaḥ | yatibhissaha sarvastvaṁ mandaraṁ citrakandaram
करोड़ों यज्ञों से पूजित देवेश आपको यतियों-सहित विचित्र गुफाओंवाले मन्दराचल पर आमन्त्रित करते हैं।
श्लोक 11 (skanda.8.161.11)
व्रज मानद देवानामेवमाज्ञापयत्यजः । इत्येवं वचसां कर्ता वचः श्रुत्वा स नन्दिनः
vraja mānada devānāmevamājñāpayatyajaḥ | ityevaṁ vacasāṁ kartā vacaḥ śrutvā sa nandinaḥ
हे मानद! जाइए - अजन्मा शिव ऐसी आज्ञा देते हैं। इस प्रकार वचनों को रचने में निपुण नन्दी के वचन सुनकर -
श्लोक 12 (skanda.8.161.12)
जप्यप्रियमुवाचेदं हृष्टरूपः पितामहः । नन्दीश्वर व्रजस्व त्वमविघ्नेन शिवेन च
japyapriyamuvācedaṁ hṛṣṭarūpaḥ pitāmahaḥ | nandīśvara vrajasva tvamavighnena śivena ca
- जप-प्रिय पितामह ने प्रसन्न होकर यह कहा - 'हे नन्दीश्वर! तुम निर्विघ्न और मंगलपूर्वक जाओ।'
श्लोक 13 (skanda.8.161.13)
अहमप्यागमिष्यामि एभिस्सह शिवान्तिकम् । मोक्ष्यते चाप्यशोकोसौ दक्षशापकृतं तमः
ahamapyāgamiṣyāmi ebhissaha śivāntikam | mokṣyate cāpyaśokosau dakṣaśāpakṛtaṁ tamaḥ
मैं भी इन सबके साथ शिव के समीप आऊँगा। और इस प्रकार वह अशोक वृक्ष भी दक्ष-शाप-जनित अन्धकार से मुक्त हो जाएगा।
श्लोक 14 (skanda.8.161.14)
पुत्री हिमवतो देवी यं ग्रहीष्यति पुत्रकम् । इत्युक्तः प्रतिमान्येश ईशस्य दयितोग्रणीः
putrī himavato devī yaṁ grahīṣyati putrakam | ityuktaḥ pratimānyeśa īśasya dayitograṇīḥ
हिमालय-पुत्री देवी जिसे पुत्र-रूप में ग्रहण करेंगी। इस प्रकार कहे जाने पर, शिव के अत्यन्त प्रिय अग्रणी नन्दी -
श्लोक 15 (skanda.8.161.15)
ब्रह्मणो भवनात्तूर्णं क्षीरोदमुदधिं ययौ । मालामिव समुद्रस्य स तु वेलाममालिनीम्
brahmaṇo bhavanāttūrṇaṁ kṣīrodamudadhiṁ yayau | mālāmiva samudrasya sa tu velāmamālinīm
- ब्रह्मा के भवन से तुरन्त क्षीरसागर की ओर चल पड़े, जो समुद्र की माला के समान तट-रेखा से सुशोभित था।
श्लोक 16 (skanda.8.161.16)
गणेश्वरसदोमुख्य आससाद दुरुत्सहाम् । स वेलानिलयान् विप्रान् वालखिल्याँस्तपोधनान्
gaṇeśvarasadomukhya āsasāda durutsahām | sa velānilayān viprān vālakhilyā~stapodhanān
गणेश्वरों की सभा में मुख्य वे, उस दुर्गम्य तटवासी बालखिल्य तपस्वी ब्राह्मणों के पास जा पहुँचे।
श्लोक 17 (skanda.8.161.17)
नानानियमसंयुक्तानपश्यद् गणनायकः । वन्दमानं तमालोक्य गणेशं सुयशापतिम्
nānāniyamasaṁyuktānapaśyad gaṇanāyakaḥ | vandamānaṁ tamālokya gaṇeśaṁ suyaśāpatim
गणनायक ने विविध नियमों में लगे उन्हें देखा। वन्दना करते हुए उस सुयशस्वी गणेश्वर को देखकर -
श्लोक 18 (skanda.8.161.18)
आशीभिरनुकूलाभिर्ननन्दुस्ते तपोधनाः । तपोधनानां हृष्टानां नन्दी मध्यगतो बभौ
āśībhiranukūlābhirnananduste tapodhanāḥ | tapodhanānāṁ hṛṣṭānāṁ nandī madhyagato babhau
- वे तपस्वी अनुकूल आशीर्वादों से प्रसन्न हो उठे। प्रसन्न हुए उन तपस्वियों के बीच नन्दी उसी प्रकार शोभित हुए -
श्लोक 19 (skanda.8.161.19)
ग्रहाणां सौम्यरूपाणां यथा मध्यगतोडुपः । अथ पाद्यार्घ्यदानेन फलदानेन वैव हि
grahāṇāṁ saumyarūpāṇāṁ yathā madhyagatoḍupaḥ | atha pādyārghyadānena phaladānena vaiva hi
- जैसे सौम्य रूपवाले ग्रहों के मध्य चन्द्रमा शोभित होता है। फिर पाद्य, अर्घ्य और फलों का दान देकर -
श्लोक 20 (skanda.8.161.20)
संपूज्य नन्दिनं देवं बालखिल्यास्तमब्रुवन् । कुतश्चिरस्यागमनमिह ते प्रमथाधिप । कच्चिद् द्रक्ष्याम देवेशं साम्बमम्बापतिं भवम्
saṁpūjya nandinaṁ devaṁ bālakhilyāstamabruvan | kutaścirasyāgamanamiha te pramathādhipa | kaccid drakṣyāma deveśaṁ sāmbamambāpatiṁ bhavam
- देव नन्दी की पूजा कर बालखिल्यों ने उनसे कहा - 'हे प्रमथाधिप! इतने काल बाद यहाँ आपका आगमन किस कारण हुआ? क्या हम पार्वती-सहित देवेश भव के दर्शन कर पाएँगे?'
श्लोक 21 (skanda.8.161.21)
ततो नन्दी द्विजश्रेष्ठान् श्रेष्ठो वै प्रमथाधिपः । सालाङ्कारमिदं वाक्यमब्रवीद् द्विजसंसदि
tato nandī dvijaśreṣṭhān śreṣṭho vai pramathādhipaḥ | sālāṅkāramidaṁ vākyamabravīd dvijasaṁsadi
तब प्रमथों में श्रेष्ठ नन्दी ने उन श्रेष्ठ द्विजों से, द्विज-सभा में, यह सुसज्जित वचन कहा।
श्लोक 22 (skanda.8.161.22)
मन्दरे साम्बिको देवो नेहागच्छति शङ्करः । इह चागमनं यन्मे तच्छृणुध्वं तपोधनाः
mandare sāmbiko devo nehāgacchati śaṅkaraḥ | iha cāgamanaṁ yanme tacchṛṇudhvaṁ tapodhanāḥ
पार्वती-सहित देव शंकर मन्दराचल पर हैं, यहाँ नहीं आते। यहाँ मेरा जो आगमन हुआ है, उसका कारण सुनो, हे तपोधनो!
श्लोक 23 (skanda.8.161.23)
अशोकतरुकं पुत्रं गिरिपुत्री ग्रहीष्यति । तत्र वो गोपतिर्देवो निमन्त्रयति शङ्करः
aśokatarukaṁ putraṁ giriputrī grahīṣyati | tatra vo gopatirdevo nimantrayati śaṅkaraḥ
पर्वत-पुत्री अशोक वृक्ष को पुत्र-रूप में ग्रहण करेंगी। वहाँ गोपति देव शंकर आप सबको आमन्त्रित करते हैं।
श्लोक 24 (skanda.8.161.24)
श्वः सर्वे दारसहिताः सशिष्यतनयाग्नयः । मन्दरं यात विप्राग्र्या मामम्बां चानुगृहणत
śvaḥ sarve dārasahitāḥ saśiṣyatanayāgnayaḥ | mandaraṁ yāta viprāgryā māmambāṁ cānugṛhaṇata
हे श्रेष्ठ विप्रो! कल आप सब पत्नियों, शिष्यों, पुत्रों और अग्निहोत्र-सामग्री-सहित मन्दराचल जाइए, और माता अम्बा पर भी कृपा कीजिए।
श्लोक 25 (skanda.8.161.25)
इत्येवं नन्दिना प्रोक्ता बालखिल्या महर्षयः । देवे भक्ति प्रकर्षेण गणेशमिदमब्रुवन्
ityevaṁ nandinā proktā bālakhilyā maharṣayaḥ | deve bhakti prakarṣeṇa gaṇeśamidamabruvan
इस प्रकार नन्दी द्वारा कहे जाने पर, महर्षि बालखिल्यों ने देव के प्रति अत्यन्त भक्तिपूर्वक गणेश्वर से यह कहा।
श्लोक 26 (skanda.8.161.26)
भो नन्दिन्नागमिष्यामः श्वः प्रभाते वयं प्रभो । पर्वतं याह्यविघ्नेन मन्दरं चारुकन्दरम्
bho nandinnāgamiṣyāmaḥ śvaḥ prabhāte vayaṁ prabho | parvataṁ yāhyavighnena mandaraṁ cārukandaram
हे नन्दिन्! हे प्रभो! हम कल प्रातःकाल अवश्य आएँगे। आप निर्विघ्न होकर सुन्दर कन्दराओंवाले मन्दर पर्वत को जाइए।
श्लोक 27 (skanda.8.161.27)
स बालखिल्यैः प्रणतोभिपूजितो निमन्त्र्य सर्वान् त्रिपदे द्विजोत्तमान् । पुनर्निवृतोभिजगाम मन्दरं स यत्र देव्या सहितोवतिष्ठते
sa bālakhilyaiḥ praṇatobhipūjito nimantrya sarvān tripade dvijottamān | punarnivṛtobhijagāma mandaraṁ sa yatra devyā sahitovatiṣṭhate
बालखिल्यों द्वारा प्रणत होकर पूजित वे, तीनों लोकों के समस्त श्रेष्ठ द्विजों को आमन्त्रित कर, पुनः लौटकर मन्दराचल की ओर गए, जहाँ देवी-सहित शिव विराजमान थे।
श्लोक 28 (skanda.8.161.28)
अथ भुवनपतिं पतिं सुराणां गिरितनयामुखपङ्कजद्विरेफम् । धनदवरदमेत्य भूतनाथं गणपतिनाथ इदं तदावभाषे
atha bhuvanapatiṁ patiṁ surāṇāṁ giritanayāmukhapaṅkajadvirepham | dhanadavaradametya bhūtanāthaṁ gaṇapatinātha idaṁ tadāvabhāṣe
तब गणपतियों के भी नाथ नन्दी ने, लोकों के स्वामी, देवताओं के पति, पर्वत-पुत्री के मुख-कमल पर भ्रमर के समान, धनद को वरदान देने वाले, भूतनाथ के पास पहुँचकर यह कहा।
श्लोक 29 (skanda.8.161.29)
दिवि च भुवि च ये चरन्ति विप्राः शमदमसंयमशौचसत्वयुक्ताः । त्रिपुरदमन कालनाश सर्वे तव वचनाद्विनिमन्त्रिता मया ते
divi ca bhuvi ca ye caranti viprāḥ śamadamasaṁyamaśaucasatvayuktāḥ | tripuradamana kālanāśa sarve tava vacanādvinimantritā mayā te
हे त्रिपुर-दमन! हे कालनाश! स्वर्ग और पृथ्वी में जो भी ब्राह्मण शम, दम, संयम, शौच और सत्त्व से युक्त होकर विचरण करते हैं, वे सब आपके वचन से मेरे द्वारा आमन्त्रित किए जा चुके हैं।