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अम्बिका खण्ड · अध्याय 162

अशोक-तरु-पुत्र-ग्रहण

अध्याय 161अध्याय-सूचीअध्याय 163

श्लोक 1 (skanda.8.162.1)

सनत्कुमार उवाच । आमन्त्रितेषु विप्रेषु नारायणपदत्रये । नन्दिन्यथ निवृत्ते च गणयूथपयूथपे

sanatkumāra uvāca | āmantriteṣu vipreṣu nārāyaṇapadatraye | nandinyatha nivṛtte ca gaṇayūthapayūthape

सनत्कुमार ने कहा - नारायण के तीनों पदों में ब्राह्मणों के आमन्त्रित हो जाने पर, तथा गणों के अधिपतियों के भी अधिपति नन्दी के लौट आने पर -

श्लोक 2 (skanda.8.162.2)

भगवान् क्रतुकामघ्नः पूष्णो दन्तनिपातनः । माली मौली बली कालः काले वचनमव्रवीत्

bhagavān kratukāmaghnaḥ pūṣṇo dantanipātanaḥ | mālī maulī balī kālaḥ kāle vacanamavravīt

- भगवान्, यज्ञ के अहंकार का नाश करने वाले, पूषा के दाँत गिराने वाले, मालाधारी, मुकुटधारी, बलशाली, काल-स्वरूप शिव ने उचित समय पर वचन कहा।

श्लोक 3 (skanda.8.162.3)

अम्बिके जगतः सर्वे ब्राह्मणा ब्राह्मणः समाः । आमन्त्रिता वरारोहे कुरु यत्ते मनोगतम्

ambike jagataḥ sarve brāhmaṇā brāhmaṇaḥ samāḥ | āmantritā varārohe kuru yatte manogatam

हे अम्बिके! जगत् के समस्त ब्राह्मण, ब्रह्मा के समान, आमन्त्रित किए जा चुके हैं। हे वरारोहे! अब जो तुम्हारे मन में है, वह करो।

श्लोक 4 (skanda.8.162.4)

स यत्राशोकतरुकः पुत्रकस्ते भविष्यति । तत्र सज्जीकरोप्यन्नमन्नदः पिङ्गलः प्रिये

sa yatrāśokatarukaḥ putrakaste bhaviṣyati | tatra sajjīkaropyannamannadaḥ piṅgalaḥ priye

हे प्रिये! जहाँ वह अशोक वृक्ष तुम्हारा पुत्र बनेगा, वहाँ अन्नदाता पिंगल अन्न की व्यवस्था कर रहा है।

श्लोक 5 (skanda.8.162.5)

श्वः प्रभाते यथा देवि नन्दिना सह नन्दिनि । यामोशोकतरोः पार्श्वं तथा कुरु गिरीन्द्रजे

śvaḥ prabhāte yathā devi nandinā saha nandini | yāmośokataroḥ pārśvaṁ tathā kuru girīndraje

हे देवि! हे नन्दिनि! हे गिरीन्द्रजे! कल प्रातःकाल हम नन्दी के साथ जिस प्रकार अशोक वृक्ष के समीप जाएँ, वैसी व्यवस्था करो।

श्लोक 6 (skanda.8.162.6)

साकाशजलपातालं जगज्जननि तत्र हि । पिण्डीकृतं त्वद्धितार्थे भविष्यति गिरेः सुते

sākāśajalapātālaṁ jagajjanani tatra hi | piṇḍīkṛtaṁ tvaddhitārthe bhaviṣyati gireḥ sute

हे जगज्जननि! हे गिरि-पुत्री! आकाश, जल और पाताल - सब मानो पिण्डीभूत होकर तुम्हारे हित के लिए वहाँ उपस्थित हो जाएँगे।

श्लोक 7 (skanda.8.162.7)

अनेन चामन्त्रयता नन्दिना वै द्विजोत्तमान् । क्रान्तं त्रिविक्रमाक्रान्तं नारायणपदत्रयम्

anena cāmantrayatā nandinā vai dvijottamān | krāntaṁ trivikramākrāntaṁ nārāyaṇapadatrayam

इस प्रकार श्रेष्ठ ब्राह्मणों को आमन्त्रित करते हुए नन्दी ने त्रिविक्रम द्वारा नापे गए नारायण के तीनों पदों को भी लाँघ लिया है।

श्लोक 8 (skanda.8.162.8)

सोहमस्य वरारोहे वरेण्ये वरदायिनि । वरं दास्यामि वरदे यदि ते रुचितं प्रिये

sohamasya varārohe vareṇye varadāyini | varaṁ dāsyāmi varade yadi te rucitaṁ priye

हे वरारोहे! हे वरणीये! हे वरदायिनि! हे वरदे! हे प्रिये! यदि तुम्हें रुचिकर हो तो मैं भी इसे वरदान दूँगा।

श्लोक 9 (skanda.8.162.9)

अथ देवी दिवोनाथं डिण्डिमुण्डेश्वरं हरम् । अवदद्वरदं कान्तं कान्तं चन्द्रार्धभूषणम्

atha devī divonāthaṁ ḍiṇḍimuṇḍeśvaraṁ haram | avadadvaradaṁ kāntaṁ kāntaṁ candrārdhabhūṣaṇam

तब देवी ने स्वर्ग के स्वामी, वरदायक, सुन्दर, चन्द्रार्ध-भूषित प्रिय पति हर से कहा।

श्लोक 10 (skanda.8.162.10)

अयन्नन्दीश्वरो देव आवयोः परमो हितः । वरकोटीसहस्राणि त्वत्तोर्हति न संशयः

ayannandīśvaro deva āvayoḥ paramo hitaḥ | varakoṭīsahasrāṇi tvattorhati na saṁśayaḥ

हे देव! यह नन्दीश्वर हम दोनों का परम हितैषी है; निःसन्देह यह आपसे करोड़ों-हजारों वरदानों को पाने का अधिकारी है।

श्लोक 11 (skanda.8.162.11)

वरदो ह्यसि लोकानां लोकानामपि चेश्वरः । यदि तुष्टोसि शैलादेर्दिशस्व प्रवरं वरम्

varado hyasi lokānāṁ lokānāmapi ceśvaraḥ | yadi tuṣṭosi śailāderdiśasva pravaraṁ varam

आप लोकों को वरदान देने वाले हैं, और लोकों के भी स्वामी हैं। यदि आप प्रसन्न हैं तो शिलाद-पुत्र को श्रेष्ठ वरदान दीजिए।

श्लोक 12 (skanda.8.162.12)

कृत्तिवासास्ततो देवो मूर्ध्न्युपाघ्राय नन्दिनम् । उवाच प्रमथेशानं व्रियतामीप्सितो वरः

kṛttivāsāstato devo mūrdhnyupāghrāya nandinam | uvāca pramatheśānaṁ vriyatāmīpsito varaḥ

तब कृत्तिवासा देव ने नन्दी के मस्तक को सूँघकर, प्रमथों के अधिपति से कहा - 'अपना इच्छित वर माँग लो।'

श्लोक 13 (skanda.8.162.13)

ततः कपीन्द्रवदनः सुरेशसदृशद्युतिः । प्रणम्य शिरसा प्राह नन्दी शङ्करवल्लभः

tataḥ kapīndravadanaḥ sureśasadṛśadyutiḥ | praṇamya śirasā prāha nandī śaṅkaravallabhaḥ

तब वानरराज-मुख, इन्द्र के समान तेजस्वी, शंकर के प्रिय नन्दी ने सिर झुकाकर प्रणाम कर कहा।

श्लोक 14 (skanda.8.162.14)

प्रभावात्तव देवेश वरदास्म्यजरामरः । भोगवान् पूजितः पूज्यैर्देवदानवकिन्नरैः

prabhāvāttava deveśa varadāsmyajarāmaraḥ | bhogavān pūjitaḥ pūjyairdevadānavakinnaraiḥ

हे देवेश! आपके ही प्रभाव से मैं वरदाता, अजर-अमर, ऐश्वर्यसम्पन्न, तथा पूज्य देवों, दानवों और किन्नरों द्वारा भी पूजित हूँ।

श्लोक 15 (skanda.8.162.15)

किं मे वरेण योहं ते वरकोटिप्रपूजितौ । पश्यामि चरणौ शर्व साम्बस्य प्रमथार्चितौ

kiṁ me vareṇa yohaṁ te varakoṭiprapūjitau | paśyāmi caraṇau śarva sāmbasya pramathārcitau

हे शर्व! मुझे वरदान से क्या प्रयोजन है, जो मैं करोड़ों वरों से भी पूजित, प्रमथों द्वारा अर्चित, पार्वती-सहित आपके दोनों चरणों को नित्य देखता हूँ?

श्लोक 16 (skanda.8.162.16)

वरेण तु ममानेन गोपते यदि तुष्यसि । नित्या भवतु मे भक्तिस्त्वयि साम्बे महेश्वर

vareṇa tu mamānena gopate yadi tuṣyasi | nityā bhavatu me bhaktistvayi sāmbe maheśvara

हे गोपते! हे महेश्वर! यदि मेरे इस वर से आप प्रसन्न हों, तो पार्वती-सहित आपमें मेरी भक्ति सदा स्थिर रहे - यही मेरा वर हो।

श्लोक 17 (skanda.8.162.17)

शिष्टानां मद्विशिष्टानां गणानां गणपाधिपः । त्वया कृतो देववर किमतोन्यत् करिष्यसि

śiṣṭānāṁ madviśiṣṭānāṁ gaṇānāṁ gaṇapādhipaḥ | tvayā kṛto devavara kimatonyat kariṣyasi

हे देवश्रेष्ठ! मुझसे भी विशिष्ट, शिष्ट गणों का अधिपति आपने मुझे बना दिया है - इससे बढ़कर और आप क्या करेंगे?

श्लोक 18 (skanda.8.162.18)

इत्येवं नन्दिनं देवो भाषमाणं तदा नतम् । प्रीत्यापश्यद् विरूपाक्षः शशाङ्ककृतशेखरः

ityevaṁ nandinaṁ devo bhāṣamāṇaṁ tadā natam | prītyāpaśyad virūpākṣaḥ śaśāṅkakṛtaśekharaḥ

इस प्रकार बोलते हुए, झुके हुए नन्दी को, विषम-नेत्र, चन्द्र-मुकुटधारी देव ने प्रेमपूर्वक देखा।

श्लोक 19 (skanda.8.162.19)

ततोत्पलनिकाशेन करेण भगवान् हरः । प्रमृज्य प्राह हर्षेण हर्षयन् नन्दिनं भृशम्

tatotpalanikāśena kareṇa bhagavān haraḥ | pramṛjya prāha harṣeṇa harṣayan nandinaṁ bhṛśam

फिर भगवान् हर ने कमल-सदृश हाथ से उन्हें सहलाकर, हर्षपूर्वक, नन्दी को अत्यन्त हर्षित करते हुए कहा।

श्लोक 20 (skanda.8.162.20)

भक्तिमानसि मे नन्दिन् सदारं सगणाश्रयम् । तां च भक्तिं पुरस्कृत्य पार्श्वस्थोसि मया कृतः

bhaktimānasi me nandin sadāraṁ sagaṇāśrayam | tāṁ ca bhaktiṁ puraskṛtya pārśvasthosi mayā kṛtaḥ

हे नन्दिन्! तुम मुझ पत्नी-सहित, गणों-सहित मेरे प्रति भक्तिमान् हो। उसी भक्ति को आगे रखकर ही मैंने तुम्हें अपना पार्श्ववर्ती बनाया है।

श्लोक 21 (skanda.8.162.21)

सत्याद्धर्मात्तपोदानाद् गोभ्यो वेदेभ्य एव च । एभ्यो मे त्वं प्रियतरः सर्वेभ्यो गणपेश्वर

satyāddharmāttapodānād gobhyo vedebhya eva ca | ebhyo me tvaṁ priyataraḥ sarvebhyo gaṇapeśvara

हे गणपेश्वर! सत्य से, धर्म से, तप से, दान से, गौओं से और वेदों से भी - इन सबसे अधिक तुम मुझे प्रिय हो।

श्लोक 22 (skanda.8.162.22)

प्रभाते यश्च ते नाम कीर्तयिष्यति लोकप । सोश्वमेधस्य च फलं सम्यगिष्टस्य लप्स्यते

prabhāte yaśca te nāma kīrtayiṣyati lokapa | sośvamedhasya ca phalaṁ samyagiṣṭasya lapsyate

हे लोकपाल! जो भी प्रातःकाल तुम्हारे नाम का कीर्तन करेगा, वह सम्यक् रूप से सम्पन्न अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करेगा।

श्लोक 23 (skanda.8.162.23)

यश्च त्वां द्वेष्टि विद्विष्टः स मे धर्मरतोपि हि । यस्य त्वं दयितोसौ मे दयितस्तु भवेत् सदा

yaśca tvāṁ dveṣṭi vidviṣṭaḥ sa me dharmaratopi hi | yasya tvaṁ dayitosau me dayitastu bhavet sadā

जो तुमसे द्वेष करता है, वह मेरे लिए धर्मरत होते हुए भी विद्वेष्य ही है; और जिसे तुम प्रिय हो, वही सदा मुझे भी प्रिय रहेगा।

श्लोक 24 (skanda.8.162.24)

नमो नन्दीश्वरायेति प्रोच्य यः स्वप्स्यते नरः । तस्य कुष्माण्डराजेभ्यो न भविष्यति वै भयम्

namo nandīśvarāyeti procya yaḥ svapsyate naraḥ | tasya kuṣmāṇḍarājebhyo na bhaviṣyati vai bhayam

जो मनुष्य 'नन्दीश्वराय नमः' कहकर सोएगा, उसे कूष्माण्ड-राजाओं से कोई भय नहीं होगा।

श्लोक 25 (skanda.8.162.25)

इत्येवं ब्रुवतस्तस्य नन्दीश्वरगुणस्तवम् । ब्रह्मणस्तनुरत्युग्रा सन्ध्या समभिवर्तत

ityevaṁ bruvatastasya nandīśvaraguṇastavam | brahmaṇastanuratyugrā sandhyā samabhivartata

इस प्रकार नन्दीश्वर के गुणों की स्तुति करते हुए उस देव को - ब्रह्मा की अत्यन्त उग्र देहरूपिणी सन्ध्या आ पहुँची।

श्लोक 26 (skanda.8.162.26)

सन्ध्याकालन्तु कालज्ञः कालः कालनिहा हरः । उपोढं वीक्ष्य नृत्तस्य देवः कालममन्यत

sandhyākālantu kālajñaḥ kālaḥ kālanihā haraḥ | upoḍhaṁ vīkṣya nṛttasya devaḥ kālamamanyata

काल के ज्ञाता, स्वयं काल-स्वरूप, काल के भी नाशक हर देव ने संध्याकाल को समीप देखकर, उसे नृत्य का समय मान लिया।

श्लोक 27 (skanda.8.162.27)

उपस्पृश्य ततः सोद्भिरपां स्रष्टा त्रिलोकपः । अन्वास्त भगवानि सन्ध्यां लोकसंस्थां नु पालयन्

upaspṛśya tataḥ sodbhirapāṁ sraṣṭā trilokapaḥ | anvāsta bhagavāni sandhyāṁ lokasaṁsthāṁ nu pālayan

जल से आचमन कर, त्रिलोक-पालक जल के स्रष्टा भगवान् वरुण ने, लोक-मर्यादा की रक्षा करते हुए, संध्या की उपासना की।

श्लोक 28 (skanda.8.162.28)

प्रसारितकरो देवो न्यस्तजानुकमण्डलः । प्रसरितकरो व्योम्नि दिवाकर इवाभवत्

prasāritakaro devo nyastajānukamaṇḍalaḥ | prasaritakaro vyomni divākara ivābhavat

फैलाए हुए हाथों वाले, घुटनों पर कमण्डलु रखे हुए वे देव, आकाश में फैली हुई किरणोंवाले सूर्य के समान दिखाई दिए।

श्लोक 29 (skanda.8.162.29)

जप्त्वा तु परमं जप्यं त्रिवेदरससंभवम् । भवः प्रनृत्त्यच्चतुरश्चतुरं चतुरानन

japtvā tu paramaṁ japyaṁ trivedarasasaṁbhavam | bhavaḥ pranṛttyaccaturaścaturaṁ caturānana

तीनों वेदों के सार से उत्पन्न परम जप्य मन्त्र का जप कर, भव अत्यन्त निपुणतापूर्वक नृत्य करने लगे, हे चतुरानन!

श्लोक 30 (skanda.8.162.30)

भर्त्तारं वीक्ष्य नृत्यन्तं विषक्तकरपल्लवम् । सहधर्मचरी देवी भर्त्तारं सान्वनृत्यत

bharttāraṁ vīkṣya nṛtyantaṁ viṣaktakarapallavam | sahadharmacarī devī bharttāraṁ sānvanṛtyata

अपने पल्लव-सदृश हाथों को हिलाते हुए नृत्य करते पति को देखकर, सहधर्मचारिणी देवी भी पति के साथ नृत्य करने लगीं।

श्लोक 31 (skanda.8.162.31)

दम्पती वीक्ष्य नृत्यन्तौ साट्टहासं गणाग्रणीः । प्रानृत्यत ततो नन्दी देवयोः प्रीतिमावहन्

dampatī vīkṣya nṛtyantau sāṭṭahāsaṁ gaṇāgraṇīḥ | prānṛtyata tato nandī devayoḥ prītimāvahan

उस दम्पति को अट्टहास-सहित नृत्य करते देख, गणों में अग्रणी नन्दी भी नाच उठे, और देवताओं की प्रसन्नता बढ़ाने लगे।

श्लोक 32 (skanda.8.162.32)

देवमम्बाञ्च नृत्यन्तौ नन्दिनञ्च समीक्ष्य तु । प्रमथा नीलमेघाभाः प्रनृत्तास्तूर्यनिस्वनैः

devamambāñca nṛtyantau nandinañca samīkṣya tu | pramathā nīlameghābhāḥ pranṛttāstūryanisvanaiḥ

देव, अम्बा और नन्दी को नृत्य करते देखकर, नील मेघ के समान प्रमथ भी वाद्यों की ध्वनि के साथ नाच उठे।

श्लोक 33 (skanda.8.162.33)

ततो भेर्यो झर्झराश्च किखिरानकमण्डुकाः । आडम्बरा डिण्डिमाश्च शंखाश्चैव प्रसस्वनुः

tato bheryo jharjharāśca kikhirānakamaṇḍukāḥ | āḍambarā ḍiṇḍimāśca śaṁkhāścaiva prasasvanuḥ

तब भेरियाँ, झर्झर, किंकिणी, आनक, मृदंग, आडम्बर, डिण्डिम और शंख - सब बज उठे।

श्लोक 34 (skanda.8.162.34)

मुहुर्मुहुः साधयते नृत्तं चतुरमम्बिका । नन्दी विसृजते हासं प्रमथा नेदुरुल्बणाः

muhurmuhuḥ sādhayate nṛttaṁ caturamambikā | nandī visṛjate hāsaṁ pramathā nedurulbaṇāḥ

अम्बिका बार-बार निपुणतापूर्वक नृत्य करती रहीं, नन्दी अट्टहास करते रहे, और प्रमथ भयंकर गर्जना करते रहे।

श्लोक 35 (skanda.8.162.35)

तत्तूर्यवरशब्दाढ्यं शिवाशनिरवाकुलम् । सन्ध्यामुखं बभौ रौद्रं वडवामुखसन्निभम्

tattūryavaraśabdāḍhyaṁ śivāśaniravākulam | sandhyāmukhaṁ babhau raudraṁ vaḍavāmukhasannibham

उन उत्तम वाद्यों की ध्वनि से युक्त, गीदड़ों के स्वर और वज्र-गर्जन से व्याकुल संध्या का वह मुख भयंकर, बड़वाग्नि के मुख के समान शोभित हुआ।

श्लोक 36 (skanda.8.162.36)

ननृतुर्जहसुश्चान्ये जजपुश्च तथापरे । जगुश्चान्येतिमधुरं गन्धर्वा इव पार्षदाः

nanṛturjahasuścānye jajapuśca tathāpare | jaguścānyetimadhuraṁ gandharvā iva pārṣadāḥ

कुछ नाचते रहे, कुछ हँसते रहे, कुछ जप करते रहे, और कुछ पार्षद गन्धर्वों के समान अत्यन्त मधुर गान करते रहे।

श्लोक 37 (skanda.8.162.37)

ततोम्बरतलापीडे पूर्णविम्बेतिनिर्मले । मृगाङ्के ह्युदिते चन्द्रे चन्द्रावयवभूषणः

tatombaratalāpīḍe pūrṇavimbetinirmale | mṛgāṅke hyudite candre candrāvayavabhūṣaṇaḥ

फिर आकाश-तल के आभूषण-स्वरूप, पूर्ण-बिम्ब, निर्मल मृगांक चन्द्रमा के उदित होने पर, चन्द्रकला से भूषित शिव -

श्लोक 38 (skanda.8.162.38)

समाप्य नियमं देवः साम्बनन्दीशपार्षदः । विररामोत्सवात्तस्मात् पार्वतीं चेदमब्रवीत्

samāpya niyamaṁ devaḥ sāmbanandīśapārṣadaḥ | virarāmotsavāttasmāt pārvatīṁ cedamabravīt

- पार्वती-सहित, नन्दीश्वर आदि पार्षदों-सहित, अपना नियम पूर्ण कर उस उत्सव से विरत हुए, और पार्वती से यह कहा।

श्लोक 39 (skanda.8.162.39)

उषित्वा शर्वरीमेतां शर्वर्यमितविक्रमे । अशोकतरुकं पुत्रं ततः श्वस्त्वं ग्रहीष्यसि

uṣitvā śarvarīmetāṁ śarvaryamitavikrame | aśokatarukaṁ putraṁ tataḥ śvastvaṁ grahīṣyasi

हे अपरिमित पराक्रमवाली शर्वरी! इस रात्रि को व्रतपूर्वक बिताकर, कल तुम अशोक वृक्ष को पुत्र-रूप में ग्रहण करोगी।

श्लोक 40 (skanda.8.162.40)

धारेयी सा सदर्भायां धरायां धारणीधरा । सुष्वाप देववचनादेकां रात्रिं यतव्रता

dhāreyī sā sadarbhāyāṁ dharāyāṁ dhāraṇīdharā | suṣvāpa devavacanādekāṁ rātriṁ yatavratā

पृथ्वी को धारण करने वाली वह देवी, कुश-सहित भूमि पर, देव के वचनानुसार व्रतपरायण होकर एक रात्रि सोईं।

श्लोक 41 (skanda.8.162.41)

ततः शतसहस्रांशावुदितेर्केर्कभावनः । उमामाह प्रयामेति यत्राशोकः सुतः स ते

tataḥ śatasahasrāṁśāvuditerkerkabhāvanaḥ | umāmāha prayāmeti yatrāśokaḥ sutaḥ sa te

फिर लाखों किरणोंवाले सूर्य के उदय होने पर, सूर्य-सम तेजस्वी शिव ने उमा से कहा - 'चलें, जहाँ अशोक तुम्हारा पुत्र होगा।'

श्लोक 42 (skanda.8.162.42)

ततो भगवती धन्या धनदा धनदार्चिता । भवमाह प्रयामेति सिञ्जमानविभूषणा

tato bhagavatī dhanyā dhanadā dhanadārcitā | bhavamāha prayāmeti siñjamānavibhūṣaṇā

तब धन्य, धनदायिनी, कुबेर-पूजित भगवती ने, अपने झंकृत आभूषणों-सहित भव से कहा - 'चलें।'

श्लोक 43 (skanda.8.162.43)

पादचारेण भगवान् पादपं पादपालयः । तमशोकतरु प्राप सनन्दी साम्बिको हरः

pādacāreṇa bhagavān pādapaṁ pādapālayaḥ | tamaśokataru prāpa sanandī sāmbiko haraḥ

पैदल चलते हुए, वृक्षों के आश्रयदाता भगवान्, पार्वती-सहित और नन्दी-सहित हर उस अशोक वृक्ष के पास जा पहुँचे।

श्लोक 44 (skanda.8.162.44)

स तत्र पिङ्गलं यक्षं पिङ्गलानलसन्निभम् । साधयानं ददर्शान्नमन्नदं प्रमथैः सह

sa tatra piṅgalaṁ yakṣaṁ piṅgalānalasannibham | sādhayānaṁ dadarśānnamannadaṁ pramathaiḥ saha

वहाँ उन्होंने पिंगल अग्नि के समान तेजस्वी अन्नदाता यक्ष पिंगल को, प्रमथों-सहित अन्न की व्यवस्था करते हुए देखा।

श्लोक 45 (skanda.8.162.45)

अथात्र भक्ष्यभोज्यस्य चोष्यलेह्यस्य च प्रभुः । सोपश्यत् पर्वतप्रख्यान् राशीन् राशिविदां वरः

athātra bhakṣyabhojyasya coṣyalehyasya ca prabhuḥ | sopaśyat parvataprakhyān rāśīn rāśividāṁ varaḥ

फिर वहाँ राशियों के ज्ञाता प्रभु शिव ने खाने, पीने, चूसने और चाटने योग्य पदार्थों के पर्वत-सदृश ढेर देखे।

श्लोक 46 (skanda.8.162.46)

स साधितं ततो दृष्ट्वा यक्षेणान्नं पिनाकधृक् । प्रहर्षमतुलं लेभे साम्बिकः सह नन्दिना

sa sādhitaṁ tato dṛṣṭvā yakṣeṇānnaṁ pinākadhṛk | praharṣamatulaṁ lebhe sāmbikaḥ saha nandinā

यक्ष द्वारा तैयार किए गए उस अन्न को देखकर, पार्वती-सहित पिनाकधारी शिव ने नन्दी के साथ अतुलनीय हर्ष प्राप्त किया।

श्लोक 47 (skanda.8.162.47)

ततः पितामहो देवः सह देवाप्सरोरगैः । तत्रागान्मुदितो भूत्वा यत्र साम्बोम्बिकापतिः

tataḥ pitāmaho devaḥ saha devāpsaroragaiḥ | tatrāgānmudito bhūtvā yatra sāmbombikāpatiḥ

फिर पितामह ब्रह्मा भी, देवताओं, अप्सराओं और नागों-सहित, प्रसन्न होकर वहाँ आ पहुँचे, जहाँ पार्वती-सहित उमापति विराजमान थे।

श्लोक 48 (skanda.8.162.48)

ते प्रणम्य महादेवं देवास्तेनाभिपूजिताः । परिवार्य तदाशोकमिदमूचुर्हराग्रतः

te praṇamya mahādevaṁ devāstenābhipūjitāḥ | parivārya tadāśokamidamūcurharāgrataḥ

महादेव को प्रणाम कर, उनके द्वारा पूजित हुए देवता, उस अशोक वृक्ष को घेरकर, हर के समक्ष यह बोले।

श्लोक 49 (skanda.8.162.49)

अद्यप्रभृति वृक्षोयं सर्वतः सुखसंयुतः । दक्षशापतमोन्मुक्तो भविष्यति दिवौकसः

adyaprabhṛti vṛkṣoyaṁ sarvataḥ sukhasaṁyutaḥ | dakṣaśāpatamonmukto bhaviṣyati divaukasaḥ

आज से यह वृक्ष सब प्रकार से सुखसंयुक्त और दक्ष-शाप-जनित अन्धकार से मुक्त, देवताओं के समान हो जाएगा।

श्लोक 50 (skanda.8.162.50)

अमरो जरया त्यक्तः सर्वदुःखविवर्जितः । सर्वाभरणपुष्पाढ्यः सर्वगन्धरसान्वितः

amaro jarayā tyaktaḥ sarvaduḥkhavivarjitaḥ | sarvābharaṇapuṣpāḍhyaḥ sarvagandharasānvitaḥ

यह अमर होगा, जरा से मुक्त होगा, समस्त दुःखों से रहित होगा, समस्त आभूषणों और फूलों से समृद्ध होगा, और समस्त सुगन्धों और रसों से युक्त होगा।

श्लोक 51 (skanda.8.162.51)

सर्वकामप्रदश्चैव इच्छापुष्पफलस्तथा । भविष्यति न सन्देहो देव्याश्च सुदृढं प्रियः

sarvakāmapradaścaiva icchāpuṣpaphalastathā | bhaviṣyati na sandeho devyāśca sudṛḍhaṁ priyaḥ

यह समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला होगा, इच्छानुसार फूल-फल देने वाला होगा, और निःसन्देह देवी को अत्यन्त प्रिय होगा।

श्लोक 52 (skanda.8.162.52)

सनत्कुमार उवाच । ततो गिरीन्द्रतनयां गिरीशः प्रणतार्तिहा । पश्यान्नपर्वतानेतानिति प्रोवाच कामदः

sanatkumāra uvāca | tato girīndratanayāṁ girīśaḥ praṇatārtihā | paśyānnaparvatānetāniti provāca kāmadaḥ

सनत्कुमार ने कहा - तब गिरीश, जो शरणागतों के दुःख का नाश करने वाले हैं, कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं, ने पर्वत-पुत्री से कहा - 'देखो इन अन्न-पर्वतों को।'

श्लोक 53 (skanda.8.162.53)

सा वीक्ष्य भक्ष्यभोज्यस्य उच्छ्रयान् पर्वतोपमान् । दृढं तुतोष देवेशा पिङ्गलस्य गुहारणिः

sā vīkṣya bhakṣyabhojyasya ucchrayān parvatopamān | dṛḍhaṁ tutoṣa deveśā piṅgalasya guhāraṇiḥ

भक्ष्य-भोज्य पदार्थों के पर्वत-सदृश ढेरों को देखकर, गुफा-निवासी पिंगल की सहायिका वह देवेशी अत्यन्त सन्तुष्ट हुईं।

श्लोक 54 (skanda.8.162.54)

सुमालिनं यक्षवरं पिङ्गलं पर्वतात्मजा । युयोज वरदानेन तामाह च महेश्वरः

sumālinaṁ yakṣavaraṁ piṅgalaṁ parvatātmajā | yuyoja varadānena tāmāha ca maheśvaraḥ

पर्वत-पुत्री ने श्रेष्ठ यक्ष सुमाली और पिंगल को वरदान से युक्त किया, और महेश्वर ने उनसे कहा।

श्लोक 55 (skanda.8.162.55)

देवि सर्वमिदं सज्जं भक्ष्यं भोज्यं तवोत्तमम् । यत्ते मनीषितं कार्यं तत्कुरुष्व किमास्यते

devi sarvamidaṁ sajjaṁ bhakṣyaṁ bhojyaṁ tavottamam | yatte manīṣitaṁ kāryaṁ tatkuruṣva kimāsyate

हे देवि! यह सब उत्तम भक्ष्य-भोज्य तैयार है। जो भी कार्य तुम्हारे मन में है, उसे करो - अब किस बात की प्रतीक्षा है?

श्लोक 56 (skanda.8.162.56)

ततः सातिप्रमुदिता दिव्याम्बरनिवासिनी । मनोजवमनुज्ञाप्य शङ्करं भुवनेश्वरम्

tataḥ sātipramuditā divyāmbaranivāsinī | manojavamanujñāpya śaṅkaraṁ bhuvaneśvaram

तब अत्यन्त प्रसन्न होकर, दिव्य वस्त्रधारिणी वह देवी, मन के समान वेगवाले भुवनेश्वर शंकर से अनुमति लेकर -

श्लोक 57 (skanda.8.162.57)

दैत्यशोकप्रदा देवी तमशोकं विभावरी । अलञ्चकार सस्नेहा अलङ्कारैः पृथग्विधैः

daityaśokapradā devī tamaśokaṁ vibhāvarī | alañcakāra sasnehā alaṅkāraiḥ pṛthagvidhaiḥ

- दैत्यों के लिए शोक-कारिणी, रात्रि के समान तेजस्विनी वह देवी, स्नेहपूर्वक उस अशोक वृक्ष को विविध आभूषणों से सजाने लगीं।

श्लोक 58 (skanda.8.162.58)

आतपत्रं च तस्याग्रे मुक्तादामावभासितम् । उच्छ्रयामास गिरिजा मयूराङ्गरुहैः सह

ātapatraṁ ca tasyāgre muktādāmāvabhāsitam | ucchrayāmāsa girijā mayūrāṅgaruhaiḥ saha

गिरिजा ने उसके ऊपर मोतियों की माला से चमकता हुआ, मोरपंखों-सहित एक छत्र भी लगाया।

श्लोक 59 (skanda.8.162.59)

नानावर्णेन चाप्यस्य चन्दनेन सुगन्धिना । आमूलादकरोद्देवी वरपङ्काङ्कितां तनुम्

nānāvarṇena cāpyasya candanena sugandhinā | āmūlādakaroddevī varapaṅkāṅkitāṁ tanum

नाना रंगों के सुगन्धित चन्दन से देवी ने उसकी जड़ से लेकर ऊपर तक समस्त देह को उत्तम लेप से सुशोभित कर दिया।

श्लोक 60 (skanda.8.162.60)

जाम्बूनदमयश्चापि पट्टैर्मणिविराजितैः । सर्वतो भूषयामास अशोकतरुकं प्रियम्

jāmbūnadamayaścāpi paṭṭairmaṇivirājitaiḥ | sarvato bhūṣayāmāsa aśokatarukaṁ priyam

सुवर्ण-निर्मित, मणियों से सुशोभित पट्टों से भी उन्होंने उस प्रिय अशोक वृक्ष को चारों ओर से सजाया।

श्लोक 61 (skanda.8.162.61)

तस्य शाखाप्रशाखासु मुक्तादामानि पार्वती । आबबन्ध स तैर्भाति नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः

tasya śākhāpraśākhāsu muktādāmāni pārvatī | ābabandha sa tairbhāti nakṣatrairiva candramāḥ

पार्वती ने उसकी शाखाओं और उपशाखाओं में मोतियों की मालाएँ बाँध दीं; उनसे वह वैसे ही शोभित हुआ, जैसे नक्षत्रों से चन्द्रमा शोभित होता है।

श्लोक 62 (skanda.8.162.62)

अथ वासोयुगैः श्वेतैस्तमशोकं गुहारणिः । वासयामास लोकानां जननी पुत्रलालसा

atha vāsoyugaiḥ śvetaistamaśokaṁ guhāraṇiḥ | vāsayāmāsa lokānāṁ jananī putralālasā

फिर पुत्र-लालसा से भरी, लोकों की जननी, गुहा-निवासी की सहायिका देवी ने उस अशोक वृक्ष को श्वेत वस्त्र-युगल से ढक दिया।

श्लोक 63 (skanda.8.162.63)

श्रीवेष्टकं नमेरुञ्च गुग्गुलं घृतमेव च । समवेतं ततो धूपं ददौ देववरप्रदा

śrīveṣṭakaṁ nameruñca guggulaṁ ghṛtameva ca | samavetaṁ tato dhūpaṁ dadau devavarapradā

श्रीवेष्टक, नमेरु, गुग्गुल और घृत को मिलाकर, वरदायिनी देवी ने उसे धूप अर्पित किया।

श्लोक 64 (skanda.8.162.64)

ततः शंखनिनादेन देवतूर्यरवेण च । बलिं बलवतो भार्या चकार चरती तपः

tataḥ śaṁkhaninādena devatūryaraveṇa ca | baliṁ balavato bhāryā cakāra caratī tapaḥ

फिर शंख-ध्वनि और देव-वाद्यों की ध्वनि के साथ, तपश्चरण करती हुई उस बलशाली शिव की पत्नी ने बलि अर्पित की।

श्लोक 65 (skanda.8.162.65)

तथार्चयन्त्यास्तं वृक्षं चन्द्रहारामृतप्रभम् । स्तनाभ्यामस्रवत् क्षीरं पुत्रस्नेहाभिसंगमात्

tathārcayantyāstaṁ vṛkṣaṁ candrahārāmṛtaprabham | stanābhyāmasravat kṣīraṁ putrasnehābhisaṁgamāt

इस प्रकार चन्द्र-हार के समान अमृत-कान्तिवाले उस वृक्ष की पूजा करती हुई देवी के दोनों स्तनों से पुत्र-स्नेह के मिलन से दूध बहने लगा।

श्लोक 66 (skanda.8.162.66)

उमया सोर्चितो वृक्षः अशोको वनदीपकः । अतीव शुशुभे तत्र वसन्त इव रूपवान्

umayā sorcito vṛkṣaḥ aśoko vanadīpakaḥ | atīva śuśubhe tatra vasanta iva rūpavān

उमा द्वारा इस प्रकार पूजित वह अशोक वृक्ष, वन का दीपक-सा, वहाँ अत्यन्त शोभित हुआ, मानो सुन्दर वसन्त ही साकार हो गया हो।

श्लोक 67 (skanda.8.162.67)

नन्दिनाथ समानीतान् ब्राह्मणान् ब्रह्मणः समान् । वाचयामास पुण्याहं दत्त्वा तेषां यथेप्सितम्

nandinātha samānītān brāhmaṇān brahmaṇaḥ samān | vācayāmāsa puṇyāhaṁ dattvā teṣāṁ yathepsitam

फिर नन्दी द्वारा लाए गए, ब्रह्मा के समान उन ब्राह्मणों को यथेच्छ दान देकर, उनसे पुण्याह-वाचन कराया गया।

श्लोक 68 (skanda.8.162.68)

ततः पुण्याहघोषान्ते आशीर्वादस्य चोभयोः । अनुमान्य पतिं देवी ऋषीँस्तानब्रवीत्तु सा

tataḥ puṇyāhaghoṣānte āśīrvādasya cobhayoḥ | anumānya patiṁ devī ṛṣī~stānabravīttu sā

फिर पुण्याह-घोष और दोनों के आशीर्वाद के समाप्त होने पर, अपने पति की अनुमति लेकर देवी ने उन ऋषियों से यह कहा।

श्लोक 69 (skanda.8.162.69)

अपुत्रा भगवन्तोहमशोकतरुकं सुतम् । इममद्य ग्रहीष्यामि समनुज्ञातुमर्हथ

aputrā bhagavantohamaśokatarukaṁ sutam | imamadya grahīṣyāmi samanujñātumarhatha

हे भगवन्तो! मैं सन्तानहीन हूँ, अतः आज इस अशोक वृक्ष को पुत्र-रूप में ग्रहण करूँगी - कृपया मुझे अनुमति दें।

श्लोक 70 (skanda.8.162.70)

इत्येवं ब्रुवतीं देवीं पार्वतीं पुत्रलालसाम् । सममूचुर्द्विजाः सर्वे इष्टतो गृह्यतामिति

ityevaṁ bruvatīṁ devīṁ pārvatīṁ putralālasām | samamūcurdvijāḥ sarve iṣṭato gṛhyatāmiti

इस प्रकार कहती हुई पुत्र-लालसा से भरी देवी पार्वती से समस्त द्विजों ने एक साथ कहा - 'इच्छानुसार ग्रहण कीजिए।'

श्लोक 71 (skanda.8.162.71)

ततः शंखरवो दिव्यः सर्वतूर्यरवान्वितः । प्रबभौ पूरयन् सर्वं नारायणपदत्रयम्

tataḥ śaṁkharavo divyaḥ sarvatūryaravānvitaḥ | prababhau pūrayan sarvaṁ nārāyaṇapadatrayam

फिर दिव्य शंख-ध्वनि, समस्त वाद्यों की ध्वनि-सहित, नारायण के तीनों पदों को भरती हुई गूँज उठी।

श्लोक 72 (skanda.8.162.72)

वेदानुच्चारयन् विप्रा नृत्यन्त्यप्सरसां गणाः । नेदुश्च प्रमथास्सर्वे सगन्धर्वमहोरगाः

vedānuccārayan viprā nṛtyantyapsarasāṁ gaṇāḥ | neduśca pramathāssarve sagandharvamahoragāḥ

ब्राह्मण वेद-मन्त्रों का उच्चारण करने लगे, अप्सराओं के समूह नृत्य करने लगे, और गन्धर्वों तथा महानागों-सहित समस्त प्रमथ गरज उठे।

श्लोक 73 (skanda.8.162.73)

ऋतवः षट् च संहृष्टाः स्वैः स्वैः कुसुमसंचयैः । अलञ्चक्रुरशोकञ्च तच्च दैवतमण्डलम्

ṛtavaḥ ṣaṭ ca saṁhṛṣṭāḥ svaiḥ svaiḥ kusumasaṁcayaiḥ | alañcakruraśokañca tacca daivatamaṇḍalam

प्रसन्न हुए छहों ऋतुओं ने अपने-अपने पुष्प-समूहों से अशोक वृक्ष को और उस समस्त देव-मण्डल को भी सजा दिया।

श्लोक 74 (skanda.8.162.74)

तत्प्रवादितगान्धर्वं प्रनृत्ताप्सरसां गणम् । पश्यन्ति हृषिता देवा अशोकतरुकोत्सवम्

tatpravāditagāndharvaṁ pranṛttāpsarasāṁ gaṇam | paśyanti hṛṣitā devā aśokatarukotsavam

उस गन्धर्व-वाद्यों से गूँजते, अप्सराओं के नृत्य से युक्त अशोक-तरु-उत्सव को हर्षित देवता देखने लगे।

श्लोक 75 (skanda.8.162.75)

वादयन् कच्छपीं वीणां वीणावादयतां वरः । नारदो नृत्यते हर्षाद् वातनुन्न इवानलः

vādayan kacchapīṁ vīṇāṁ vīṇāvādayatāṁ varaḥ | nārado nṛtyate harṣād vātanunna ivānalaḥ

कच्छपी वीणा बजाते हुए, वीणावादकों में श्रेष्ठ नारद हर्षपूर्वक उसी प्रकार नाच उठे, जैसे वायु से प्रेरित अग्नि नाचती है।

श्लोक 76 (skanda.8.162.76)

तपोधनैश्च धनिनो देवैश्च धनदार्चिता । पूज्यमाना बभौ तत्र रवेरिव यथा प्रभा

tapodhanaiśca dhanino devaiśca dhanadārcitā | pūjyamānā babhau tatra raveriva yathā prabhā

तपस्वियों, धनवानों, देवताओं और कुबेर द्वारा पूजित होती हुई देवी वहाँ उसी प्रकार शोभित हुईं, जैसे सूर्य की प्रभा शोभित होती है।

श्लोक 77 (skanda.8.162.77)

समाप्य नियमं साथ गृहीत्वाशोकपुत्रकम् । गिरीन्द्रतनया भाति धरा इव जलोक्षिता

samāpya niyamaṁ sātha gṛhītvāśokaputrakam | girīndratanayā bhāti dharā iva jalokṣitā

अपना नियम पूर्ण कर, अशोक-पुत्र को ग्रहण कर, गिरीन्द्र-तनया उसी प्रकार शोभित हुईं, जैसे जल से सिंचित पृथ्वी शोभित होती है।

श्लोक 78 (skanda.8.162.78)

अथ नन्दीश्वरादिष्टाः प्रमथास्ते सहस्रशः । अददन् स्वासनान्याशु विप्राणां विप्रवत्सलाः

atha nandīśvarādiṣṭāḥ pramathāste sahasraśaḥ | adadan svāsanānyāśu viprāṇāṁ vipravatsalāḥ

फिर नन्दीश्वर की आज्ञा पाकर वे सहस्रों प्रमथ, ब्राह्मणों के हितैषी होकर, शीघ्रता से ब्राह्मणों को आसन देने लगे।

श्लोक 79 (skanda.8.162.79)

स्वर्णानां राजतानां च स्फटिकानां प्रभावताम् । प्रमथैः कीर्यमाणाना मासनानामभूत् स्वनः

svarṇānāṁ rājatānāṁ ca sphaṭikānāṁ prabhāvatām | pramathaiḥ kīryamāṇānā māsanānāmabhūt svanaḥ

स्वर्ण, चाँदी और तेजस्वी स्फटिक से बने आसनों को बिछाते हुए प्रमथों से उठती हुई ध्वनि सुनाई देने लगी।

श्लोक 80 (skanda.8.162.80)

मेरोः शिखरवर्षाणां महती कुशजैरिव । तथासनान्युद्वहतां प्रमथानां बभौ रवः

meroḥ śikharavarṣāṇāṁ mahatī kuśajairiva | tathāsanānyudvahatāṁ pramathānāṁ babhau ravaḥ

जैसे मेरु-पर्वत के शिखरों की वर्षा से बड़ी ध्वनि उत्पन्न हो, वैसे ही आसनों को ढोते हुए प्रमथों की भी ध्वनि गूँज उठी।

श्लोक 81 (skanda.8.162.81)

वर्षान्नमृष्टाकामानां मेघानां स्तनतामिव । स्कन्धस्थैश्च करस्थैश्च उत्तमांगस्थितैरपि

varṣānnamṛṣṭākāmānāṁ meghānāṁ stanatāmiva | skandhasthaiśca karasthaiśca uttamāṁgasthitairapi

मानो अन्न-वर्षा करने को उद्यत तृप्त मेघों की गर्जना हो - इस प्रकार कन्धों, हाथों और सिर पर आसन ढोए जाते हुए -

श्लोक 82 (skanda.8.162.82)

आसनैः प्रमथा रेजुः सार्काग्नय इवाचलाः । आनयन्त्यपरे तूर्णमपरे धारयन्त्युत

āsanaiḥ pramathā rejuḥ sārkāgnaya ivācalāḥ | ānayantyapare tūrṇamapare dhārayantyuta

आसनों-सहित प्रमथ उसी प्रकार शोभित हुए, जैसे सूर्य और अग्नि-सहित पर्वत शोभित होते हैं; कुछ शीघ्रतापूर्वक ले आते, कुछ धारण किए रहते।

श्लोक 83 (skanda.8.162.83)

प्रमथास्ते हृष्टरूपा ह्यासनानि महासनाः । एकैकयोजनशतं विस्तृतायोजनान्तरम्

pramathāste hṛṣṭarūpā hyāsanāni mahāsanāḥ | ekaikayojanaśataṁ vistṛtāyojanāntaram

प्रसन्नचित्त वे प्रमथ, सौ-सौ योजन विस्तृत, योजन-योजन के अन्तर पर महान् आसन बिछाने लगे।

श्लोक 84 (skanda.8.162.84)

असंसक्तासना पंक्तिर्निर्मिता विश्वकर्मणा । मन्दरस्य शुभे पृष्ठे विप्रपंक्त्यो विनिःसृताः

asaṁsaktāsanā paṁktirnirmitā viśvakarmaṇā | mandarasya śubhe pṛṣṭhe viprapaṁktyo viniḥsṛtāḥ

विश्वकर्मा द्वारा निर्मित, अनासक्त आसनों की पंक्ति, मन्दराचल के शुभ पृष्ठभाग पर, ब्राह्मणों की पंक्तियों में बिछ गई।

श्लोक 85 (skanda.8.162.85)

तपनैर्निर्गतैः सर्वैः समामेघास्वसेचतान् । स्नाते पथ इव दृष्टवा रेजुरासनभूषणाः

tapanairnirgataiḥ sarvaiḥ samāmeghāsvasecatān | snāte patha iva dṛṣṭavā rejurāsanabhūṣaṇāḥ

सूर्य की सभी निकली किरणों से समान रूप से सिंचित, मानो स्नान किए हुए मार्ग के समान दृष्ट होकर, आभूषणों-सहित वे आसन शोभित हुए।

श्लोक 86 (skanda.8.162.86)

सहस्रपंक्तयस्तास्तु मंदरे विस्तृते गिरौ । द्विजातीननुलिप्ताँस्तु यक्षजम्बालमिश्रकान्

sahasrapaṁktayastāstu maṁdare vistṛte girau | dvijātīnanuliptā~stu yakṣajambālamiśrakān

विस्तृत मन्दराचल पर्वत पर सहस्रों पंक्तियों में वे आसन बिछे थे, जो द्विजातियों से अनुलिप्त और यक्ष-कर्दम-मिश्रित थे।

श्लोक 87 (skanda.8.162.87)

सशेखरान् सस्रग्दामाननुहूय समोद्यतान् । मंदारैस्तु ससंतानैः पारिभद्रैस्तथैव च

saśekharān sasragdāmānanuhūya samodyatān | maṁdāraistu sasaṁtānaiḥ pāribhadraistathaiva ca

मुकुटों और माला-दामों-सहित, सम्मान से आमन्त्रित, समान रूप से तत्पर, मन्दार, सन्तान और पारिभद्र वृक्षों के फूलों से सजे -

श्लोक 88 (skanda.8.162.88)

अनिलैः सांगनादाश्च रेजुर्देवा इव द्विजाः । सुश्लक्ष्णैश्च सुगन्धैश्च गन्धचूर्णैः सपिञ्जरैः

anilaiḥ sāṁganādāśca rejurdevā iva dvijāḥ | suślakṣṇaiśca sugandhaiśca gandhacūrṇaiḥ sapiñjaraiḥ

- हवाओं से सरसराहट करते हुए, वे द्विज देवताओं के समान शोभित हुए। अत्यन्त कोमल, सुगन्धित, पीतवर्ण गन्ध-चूर्णों से -

श्लोक 89 (skanda.8.162.89)

अवकीर्णास्ततो देवैर्भूमिदेवाः समंततः । दिव्यचन्दनपङ्काङ्का दिव्यचूर्णावचूर्णिताः

avakīrṇāstato devairbhūmidevāḥ samaṁtataḥ | divyacandanapaṅkāṅkā divyacūrṇāvacūrṇitāḥ

- देवताओं द्वारा भूदेव ब्राह्मण चारों ओर से बिखेरे गए थे; दिव्य चन्दन-लेप से चिह्नित, दिव्य चूर्ण से चूर्णित -

श्लोक 90 (skanda.8.162.90)

ब्राह्मणा रेजुरेकस्था एकस्था इव पावकाः । दिव्यं धूपं चारयित्वा सर्वशश्च ह

brāhmaṇā rejurekasthā ekasthā iva pāvakāḥ | divyaṁ dhūpaṁ cārayitvā sarvaśaśca ha

- वे ब्राह्मण, अकेले-अकेले बैठे हुए भी, अकेली-अकेली अग्नियों के समान शोभित हुए। सर्वत्र दिव्य धूप फैलाकर -

श्लोक 91 (skanda.8.162.91)

ततः स्फटिकसंकाशं पद्मरेणुरिवार्जिताः । हस्तशौचं मुहूर्तेन दत्तं शंकरकिंकरैः

tataḥ sphaṭikasaṁkāśaṁ padmareṇurivārjitāḥ | hastaśaucaṁ muhūrtena dattaṁ śaṁkarakiṁkaraiḥ

- स्फटिक के समान स्वच्छ, कमल-पराग के समान शुद्ध किए गए, शंकर के सेवकों द्वारा तुरन्त हाथ धोने का जल दिया गया।

श्लोक 92 (skanda.8.162.92)

बद्धकक्षास्ततः शूरा बद्धकक्षा इव द्विपाः । परिवेष्टुमुपक्रान्ताः प्रमथा ब्राह्मणर्षभान्

baddhakakṣāstataḥ śūrā baddhakakṣā iva dvipāḥ | pariveṣṭumupakrāntāḥ pramathā brāhmaṇarṣabhān

फिर कमरबन्द बाँधे हुए, बद्धकक्ष हाथियों के समान वीर प्रमथ श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन परोसने के लिए तत्पर हो गए।

श्लोक 93 (skanda.8.162.93)

भाजनान्यथ स्वर्णानि राजतस्फाटिकानि च । मुहूर्तेन द्विजातीनां ददुर्देवा विनीतवत्

bhājanānyatha svarṇāni rājatasphāṭikāni ca | muhūrtena dvijātīnāṁ dadurdevā vinītavat

स्वर्ण, चाँदी और स्फटिक के पात्र देवताओं ने विनीत भाव से क्षणभर में ही ब्राह्मणों को दे दिए।

श्लोक 94 (skanda.8.162.94)

हृत्वा हृत्वा बभूरेखं दंडे वारि समंडलम् । भक्ष्यभोज्यान्नपानानि ददुः सम्यक् समन्ततः

hṛtvā hṛtvā babhūrekhaṁ daṁḍe vāri samaṁḍalam | bhakṣyabhojyānnapānāni daduḥ samyak samantataḥ

बार-बार लाकर, दण्ड में मण्डलाकार जल भरकर, उन्होंने भक्ष्य, भोज्य, अन्न और पान चारों ओर भली-भाँति परोसे।

श्लोक 95 (skanda.8.162.95)

अर्थवद्यो हरिपुरासराटपुरकान्यपि । नेत्रस्थं हृदयस्थं च मुखस्थं हस्तसूचितम्

arthavadyo haripurāsarāṭapurakānyapi | netrasthaṁ hṛdayasthaṁ ca mukhasthaṁ hastasūcitam

यह श्लोक मूल पाठ में अत्यन्त अस्पष्ट और संदिग्ध रूप से सुरक्षित है; इसका निश्चित अर्थ नहीं समझा जा सकता। संकेत मिलता है कि नेत्रों, हृदय, मुख और हाथों से इंगित वस्तुएँ भी अर्पित की गईं।

श्लोक 96 (skanda.8.162.96)

ब्राह्मणानां विदुश्चैव ददुश्च प्रमथाधिपाः । भृङ्गारैः काञ्चनैः केचित् पानीयं गुणवर्धनम्

brāhmaṇānāṁ viduścaiva daduśca pramathādhipāḥ | bhṛṅgāraiḥ kāñcanaiḥ kecit pānīyaṁ guṇavardhanam

प्रमथाधिपतियों ने ब्राह्मणों की इच्छाओं को जान-जानकर उन्हें वस्तुएँ दीं; कुछ ने सुवर्ण के कलशों से गुणवर्धक जल परोसा।

श्लोक 97 (skanda.8.162.97)

दिशंतोपि चरंत्येते पानीयमितिवादिनः । अपरे चन्द्ररश्म्याभैश्चामरैः सत्सुगन्धिभिः

diśaṁtopi caraṁtyete pānīyamitivādinaḥ | apare candraraśmyābhaiścāmaraiḥ satsugandhibhiḥ

'जल लीजिए' - ऐसा कहते हुए वे इधर-उधर घूमते रहे, और कुछ चन्द्रकिरणों के समान श्वेत, अत्यन्त सुगन्धित चँवरों से -

श्लोक 98 (skanda.8.162.98)

आबीजुर्ब्राह्मणान् हृष्टाः प्रमथाः तपसोनिलः । दिव्या देवस्त्रियश्चैव लोकत्रयनिवासिनः

ābījurbrāhmaṇān hṛṣṭāḥ pramathāḥ tapasonilaḥ | divyā devastriyaścaiva lokatrayanivāsinaḥ

- प्रसन्न प्रमथों ने तप की भाँति ब्राह्मणों को शीतल वायु से पंखा झला; तीनों लोकों में निवास करने वाली दिव्य देव-स्त्रियाँ भी -

श्लोक 99 (skanda.8.162.99)

एकैकं ब्राह्मणांस्तत्र सेवन्ते वासवं यथा । अप्सरोवारसंघाश्च सर्वालंकारभूषिताः

ekaikaṁ brāhmaṇāṁstatra sevante vāsavaṁ yathā | apsarovārasaṁghāśca sarvālaṁkārabhūṣitāḥ

- वहाँ प्रत्येक ब्राह्मण की उसी प्रकार सेवा करने लगीं, जैसे इन्द्र की सेवा की जाती है; तथा समस्त आभूषणों से भूषित अप्सराओं के समूह भी -

श्लोक 100 (skanda.8.162.100)

ननृतुर्देवचेतांसि मुष्णन्त्यः सर्वतोदिशम् । विश्वावसुर्नारदश्च तुम्बुरुः पर्वतस्तथा

nanṛturdevacetāṁsi muṣṇantyaḥ sarvatodiśam | viśvāvasurnāradaśca tumburuḥ parvatastathā

- चारों ओर देवताओं के मन को हरती हुई नृत्य करने लगीं। विश्वावसु, नारद, तुम्बुरु, पर्वत -

श्लोक 101 (skanda.8.162.101)

कुस्तुम्बुरुः शालिशिराः पर्जन्यो गण्डमण्डकः । चित्राङ्गदश्चित्रसेनश्चित्रश्चित्ररथस्तथा

kustumburuḥ śāliśirāḥ parjanyo gaṇḍamaṇḍakaḥ | citrāṅgadaścitrasenaścitraścitrarathastathā

कुस्तुम्बुरु, शालिशिरा, पर्जन्य, गण्डमण्डक, चित्रांगद, चित्रसेन, चित्र, तथा चित्ररथ -

श्लोक 102 (skanda.8.162.102)

एते दैवतगन्धर्वा रक्तातोद्या हरप्रियाः । दिव्यतानेषु गायन्ति गेयं मन्मथदीपनम्

ete daivatagandharvā raktātodyā harapriyāḥ | divyatāneṣu gāyanti geyaṁ manmathadīpanam

- ये देव-गन्धर्व, अनुरक्त वाद्यों से युक्त, हर के प्रिय, दिव्य स्वरों में मन्मथ को प्रज्वलित करने वाला गीत गाने लगे।

श्लोक 103 (skanda.8.162.103)

नमेरुर्गुग्गुलून्मिश्रो घृतधारावसेचितः । धूपः सञ्चार्यते तत्र प्रतीहारीभिरुत्तमः

namerurguggulūnmiśro ghṛtadhārāvasecitaḥ | dhūpaḥ sañcāryate tatra pratīhārībhiruttamaḥ

नमेरु और गुग्गुल से मिश्रित, घृतधारा से सिक्त उत्तम धूप वहाँ द्वारपालिकाओं द्वारा घुमाया जाता रहा।

श्लोक 104 (skanda.8.162.104)

यदर्थमेष भ्रमति नारायणपदत्रये । पूज्यमानः सुरैः सेन्द्रैः श्लोको धूपत्रयाङ्कनः

yadarthameṣa bhramati nārāyaṇapadatraye | pūjyamānaḥ suraiḥ sendraiḥ śloko dhūpatrayāṅkanaḥ

जिस उद्देश्य से यह धूप, इन्द्र-सहित देवताओं द्वारा पूजित होता हुआ, तीन प्रकार के धूप-चिह्नों-सहित नारायण के तीनों पदों में विचरण करता है -

श्लोक 105 (skanda.8.162.105)

गुग्गुलोश्च नमेरोश्च आज्यधूपस्य चैव ह । तृप्तिं न देवा गच्छन्ति प्रियाणामिव दर्शनात्

guggulośca namerośca ājyadhūpasya caiva ha | tṛptiṁ na devā gacchanti priyāṇāmiva darśanāt

- गुग्गुल, नमेरु और घृत-धूप की सुगन्ध से देवता उसी प्रकार अतृप्त रहते हैं, जैसे प्रियजनों के दर्शन से कोई तृप्त नहीं होता।

श्लोक 106 (skanda.8.162.106)

त्रयाणामेव धूपानां जहुर्न पवना गतिम् । गुग्गुलोश्च नमेरोश्च आज्यधूपस्य चैव ह

trayāṇāmeva dhūpānāṁ jahurna pavanā gatim | guggulośca namerośca ājyadhūpasya caiva ha

उन तीनों धूपों - गुग्गुल, नमेरु और घृत-धूप - की गति को वायु भी नहीं छोड़ती थी। यहाँ से आगे मूल पाठ में कुछ अंश खण्डित हैं।

श्लोक 107 (skanda.8.162.107)

तं दृष्टवा चन्द्रमौलिस्तु तरुकोत्सवमीश्वरः । पार्वतीहर्षदो हर्षं पुपोषानुत्तमं मुहुः

taṁ dṛṣṭavā candramaulistu tarukotsavamīśvaraḥ | pārvatīharṣado harṣaṁ pupoṣānuttamaṁ muhuḥ

उस वृक्ष-उत्सव को देखकर, चन्द्रमौलि ईश्वर, पार्वती को हर्षित करने वाले, बार-बार अनुपम हर्ष का पोषण करते रहे।

श्लोक 108 (skanda.8.162.108)

हृष्यमाणे पशुपतौ मुहुर्व्रतपतौ हरे । चराचरं पशुपतौ त्रैलोक्यं हर्षणायते

hṛṣyamāṇe paśupatau muhurvratapatau hare | carācaraṁ paśupatau trailokyaṁ harṣaṇāyate

पशुपति व्रतपति हर के बार-बार हर्षित होने पर, समस्त चराचर त्रिलोक भी उस पशुपति में हर्षमय हो उठा।

श्लोक 109 (skanda.8.162.109)

प्रनृत्ताप्सरसोवारं दिव्यधूपाधिवासितम् । ऋतुभिः कुसुमैः कीर्णं तत्सदो गगनायते

pranṛttāpsarasovāraṁ divyadhūpādhivāsitam | ṛtubhiḥ kusumaiḥ kīrṇaṁ tatsado gaganāyate

अप्सराओं के नृत्य से युक्त, दिव्य धूप से सुवासित, ऋतुओं के फूलों से बिखरा हुआ वह सभा-स्थल मानो आकाश-सा प्रतीत होने लगा।

श्लोक 110 (skanda.8.162.110)

ततः शाल्योदनं तूर्णं तेन तेमृतकल्पेन सर्व एव द्विजोत्तमाः । भक्ष्यभोज्यान्नपानेन ततृपुर्लोकपूजिताः

tataḥ śālyodanaṁ tūrṇaṁ tena temṛtakalpena sarva eva dvijottamāḥ | bhakṣyabhojyānnapānena tatṛpurlokapūjitāḥ

फिर शीघ्रतापूर्वक शालि-चावल का भात परोसा गया - इस श्लोक की एक पंक्ति मूल में खण्डित है - उस अमृत-तुल्य भोजन से, खाने-पीने योग्य अन्न-पान से, लोक-पूजित समस्त श्रेष्ठ द्विज तृप्त हो गए।

श्लोक 111 (skanda.8.162.111)

ततः श्रुतिसुखः पुण्यो राक्षसासुरवेजनः । पुण्याहशब्दः प्रकृतो विप्रैस्त्रैलोक्यपूरणः

tataḥ śrutisukhaḥ puṇyo rākṣasāsuravejanaḥ | puṇyāhaśabdaḥ prakṛto vipraistrailokyapūraṇaḥ

फिर कानों को सुखद, पुण्यकारी, राक्षसों और असुरों को कँपाने वाला, त्रिलोक को भर देने वाला पुण्याह-शब्द ब्राह्मणों द्वारा उच्चारित किया गया।

श्लोक 112 (skanda.8.162.112)

ततः साम्बमशोकं तं सहरं सह नन्दिना । कुसुमाक्षतसंयुक्तमाशीर्भिरभिनन्द्य च

tataḥ sāmbamaśokaṁ taṁ saharaṁ saha nandinā | kusumākṣatasaṁyuktamāśīrbhirabhinandya ca

फिर पार्वती-सहित, हर-सहित, नन्दी-सहित, फूलों और अक्षतों से युक्त उस अशोक वृक्ष को आशीर्वादों से अभिनन्दित कर -

श्लोक 113 (skanda.8.162.113)

महान्तः सुस्वनाः सर्वे ब्रह्मसूत्रजटाधराः । प्रणमन्तो विरूपाक्षं ययुर्विप्रा यथागतम्

mahāntaḥ susvanāḥ sarve brahmasūtrajaṭādharāḥ | praṇamanto virūpākṣaṁ yayurviprā yathāgatam

- महान्, मधुर-स्वरवाले, यज्ञोपवीत और जटाधारी वे सभी ब्राह्मण, विरूपाक्ष शिव को प्रणाम कर, जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।

श्लोक 114 (skanda.8.162.114)

सुराश्च पूजिता दानैर्वाक्प्रदानैश्च शूलिना । यथागतं गताः सर्वे परिवार्य शतक्रतुम्

surāśca pūjitā dānairvākpradānaiśca śūlinā | yathāgataṁ gatāḥ sarve parivārya śatakratum

त्रिशूलधारी शिव द्वारा दानों और वचनों से पूजित देवता भी, इन्द्र को घेरकर, जैसे आए थे वैसे ही सब लौट गए।

श्लोक 115 (skanda.8.162.115)

गणाश्च गणपालेन पूजिताः सगणाधिपाः । यथावासं ययुः सर्वे हर्षादुद्धूतवाससः

gaṇāśca gaṇapālena pūjitāḥ sagaṇādhipāḥ | yathāvāsaṁ yayuḥ sarve harṣāduddhūtavāsasaḥ

गणों के अधिपतियों-सहित समस्त गण भी, गण-पालक द्वारा पूजित होकर, हर्ष से वस्त्र उड़ाते हुए अपने-अपने निवास को लौट गए।

श्लोक 116 (skanda.8.162.116)

अहो देव्या हि सौभाग्यमहोस्या वल्लभो हरः । अहो देवस्य देव्यर्थं संभ्रमो लक्षितो हि नः

aho devyā hi saubhāgyamahosyā vallabho haraḥ | aho devasya devyarthaṁ saṁbhramo lakṣito hi naḥ

अहो! देवी का यह सौभाग्य है, कि हर स्वयं उनके वल्लभ हैं। अहो! देवी के प्रति देव की उत्कण्ठा भी हमने देख ली।

श्लोक 117 (skanda.8.162.117)

या नैवं दयिता भर्त्तुर्यथेशस्य गिरेः सुता । कथं सा सुभगा नाम स्त्रीत्वं चापि बिभर्त्ति किम्

yā naivaṁ dayitā bhartturyatheśasya gireḥ sutā | kathaṁ sā subhagā nāma strītvaṁ cāpi bibhartti kim

जो स्त्री अपने पति की उतनी प्रिय नहीं होती जितनी गिरि-पुत्री ईश्वर की हैं, वह भला सुभगा किस प्रकार कहलाए, और उसका स्त्रीत्व भी किस काम का?

श्लोक 118 (skanda.8.162.118)

गिरिपुत्र्या कृतं मन्ये तपः परमभास्वरम् । तपसाभिजितो यस्या वरदो वृषभध्वजः

giriputryā kṛtaṁ manye tapaḥ paramabhāsvaram | tapasābhijito yasyā varado vṛṣabhadhvajaḥ

मुझे लगता है कि पर्वत-पुत्री ने परम तेजस्वी तप किया है, जिसके तप से वरदायक वृषभध्वज शिव भी जीत लिए गए हैं।

श्लोक 119 (skanda.8.162.119)

अहो स्त्रीणां बलं सूक्ष्मं देवैरपि सुदुर्जयम् । येन रुद्रसमा ईशाः स्त्रीणां वश्यत्वमागताः

aho strīṇāṁ balaṁ sūkṣmaṁ devairapi sudurjayam | yena rudrasamā īśāḥ strīṇāṁ vaśyatvamāgatāḥ

अहो! स्त्रियों का बल कितना सूक्ष्म है, देवताओं के लिए भी अजेय है, जिसके कारण रुद्र-तुल्य ईश्वर भी स्त्रियों के वश में आ गए हैं।

श्लोक 120 (skanda.8.162.120)

अन्ये तानब्रुवँस्तत्र महात्मानो गणाधिपाः । देव एवैष रूपेण भार्या भूत्वावतिष्ठते

anye tānabruva~statra mahātmāno gaṇādhipāḥ | deva evaiṣa rūpeṇa bhāryā bhūtvāvatiṣṭhate

वहाँ अन्य महात्मा गणाधिपतियों ने उनसे कहा - 'यह तो स्वयं देव ही, अपने ही रूप में, पत्नी बनकर विराजमान है।'

श्लोक 121 (skanda.8.162.121)

मावमन्यत देवीं तां योगात् किं नावबुध्यथ । इत्येवं जल्पमानास्ते अन्योन्येन गणोत्तमाः

māvamanyata devīṁ tāṁ yogāt kiṁ nāvabudhyatha | ityevaṁ jalpamānāste anyonyena gaṇottamāḥ

'उस देवी का अनादर मत करो - क्या तुम योग के रहस्य को नहीं समझते?' इस प्रकार आपस में बातें करते हुए वे श्रेष्ठ गण -

श्लोक 122 (skanda.8.162.122)

जग्मुः स्वभवनान्येव दीप्यमाना यथाग्नयः । देवोपि नन्दिना सार्धं सोम्बया चाभिरूपया

jagmuḥ svabhavanānyeva dīpyamānā yathāgnayaḥ | devopi nandinā sārdhaṁ sombayā cābhirūpayā

- अग्नियों के समान चमकते हुए अपने-अपने भवनों को लौट गए। देव भी नन्दी और सुरूपा अम्बा-सहित -

श्लोक 123 (skanda.8.162.123)

अशोकतरुकस्याध उपविष्टोम्बिकार्चितः । ततः प्रणम्य वरदं सोमा सोमविभूषणम्

aśokatarukasyādha upaviṣṭombikārcitaḥ | tataḥ praṇamya varadaṁ somā somavibhūṣaṇam

- अशोक वृक्ष के नीचे अम्बिका द्वारा पूजित होकर बैठे। फिर सोमा ने चन्द्र-विभूषित वरदायक शिव को प्रणाम कर -

श्लोक 124 (skanda.8.162.124)

उवाच वचसां योनिर्भूतसंघपतिं पतिम् । सुनिर्वृतास्मि संवृत्ता त्रिपुरान्धकसूदन

uvāca vacasāṁ yonirbhūtasaṁghapatiṁ patim | sunirvṛtāsmi saṁvṛttā tripurāndhakasūdana

- वाणी की उद्गम-स्वरूपिणी देवी ने भूतगणों के पति उन पति से कहा - 'हे त्रिपुरान्धक-सूदन! मैं पूर्णतः सन्तुष्ट हो गई हूँ।'

श्लोक 125 (skanda.8.162.125)

यन्मयाशोकतरुकः पुत्रः प्रकृतकः कृतः । समस्तव्यस्तमखिलं त्रैलोक्यं लोकभावन

yanmayāśokatarukaḥ putraḥ prakṛtakaḥ kṛtaḥ | samastavyastamakhilaṁ trailokyaṁ lokabhāvana

कि मैंने अशोक वृक्ष को अपना पुत्र बना लिया है। हे लोक-निर्माता! सम्पूर्ण त्रिलोक, समष्टि और व्यष्टि दोनों रूपों में -

श्लोक 126 (skanda.8.162.126)

समागतं त्वत्प्रभावात् मम पुत्रतरूत्सवे । नूनं मे सुकृतं देव तपः परमभास्वरम्

samāgataṁ tvatprabhāvāt mama putratarūtsave | nūnaṁ me sukṛtaṁ deva tapaḥ paramabhāsvaram

- मेरे इस पुत्र-वृक्ष के उत्सव में आपके प्रभाव से एकत्र हो गया है। निश्चय ही, हे देव! मेरा सुकृत और परम तेजस्वी तप सफल हुआ है -

श्लोक 127 (skanda.8.162.127)

लब्धोसि यन्मया देव सर्वभूतपतिः पतिः । देवैर्यच्चापि मुषितमिष्टपुत्रफलं पुरा

labdhosi yanmayā deva sarvabhūtapatiḥ patiḥ | devairyaccāpi muṣitamiṣṭaputraphalaṁ purā

- कि मैंने आप, हे देव! सर्वभूतों के पति, को अपना पति प्राप्त किया है। देवताओं द्वारा पूर्व में जो इष्ट पुत्र-फल छीना गया था -

श्लोक 128 (skanda.8.162.128)

तन्मे सर्वं व्यपगतं प्राप्याशोकतरुं सुतम् । मत्तो धन्यतरा देव नास्त्यन्या त्रिदिवेऽङ्गना

tanme sarvaṁ vyapagataṁ prāpyāśokataruṁ sutam | matto dhanyatarā deva nāstyanyā tridive'ṅganā

- वह सब अशोक वृक्ष को पुत्र-रूप में पाकर मुझसे दूर हो गया है। हे देव! स्वर्ग में मुझसे बढ़कर भाग्यशालिनी कोई अन्य स्त्री नहीं है -

श्लोक 129 (skanda.8.162.129)

पतिर्व्रतपतिर्वीर यस्या मे त्वं महेश्वर । भवं भवानी प्रीत्यैवमुक्त्वा मुक्तावलीधरा । पपात पद्भ्यां देवस्य नेत्रास्रापूरितेक्षणा

patirvratapatirvīra yasyā me tvaṁ maheśvara | bhavaṁ bhavānī prītyaivamuktvā muktāvalīdharā | papāta padbhyāṁ devasya netrāsrāpūritekṣaṇā

- हे वीर महेश्वर! जिसका पति स्वयं व्रतपति आप हैं। मोतियों की माला धारण किए हुए भवानी ने प्रेमपूर्वक भव से यह कहकर, आँसुओं से भरे नेत्रों के साथ, देव के चरणों में गिर पड़ीं।

श्लोक 130 (skanda.8.162.130)

तामुत्थाप्य गिरीशस्तु परिष्वज्य च पीडितम् । निवेश्य ऊरुभ्यां सस्नेहमिदमब्रवीत्

tāmutthāpya girīśastu pariṣvajya ca pīḍitam | niveśya ūrubhyāṁ sasnehamidamabravīt

गिरीश ने उन्हें उठाकर, आलिंगन में बाँधकर, अपनी दोनों जंघाओं पर बिठाकर, स्नेहपूर्वक यह कहा। इस श्लोक का एक अंश मूल में खण्डित है।

श्लोक 131 (skanda.8.162.131)

देवी सती च साध्वी च सहधर्मचरी च मे । ब्रह्मण्या च शरण्या च त्वं मे नित्यं प्रिया प्रिये

devī satī ca sādhvī ca sahadharmacarī ca me | brahmaṇyā ca śaraṇyā ca tvaṁ me nityaṁ priyā priye

हे प्रिये! तुम मेरी देवी हो, सती हो, साध्वी हो, मेरी सहधर्मचारिणी हो, ब्रह्म-हितैषिणी हो, शरण देने योग्य हो - तुम मुझे सदा प्रिय हो।

श्लोक 132 (skanda.8.162.132)

अकार्यमपि कार्यं हि अतो देवि मया तव । किं पुनर्यद्यशोन्मिश्रमीदृशं धर्मसंयुतम्

akāryamapi kāryaṁ hi ato devi mayā tava | kiṁ punaryadyaśonmiśramīdṛśaṁ dharmasaṁyutam

हे देवि! इसीलिए तुम्हारे लिए तो अकार्य भी कार्य के समान करने योग्य है; फिर यह तो यश से युक्त और धर्मयुक्त कार्य है, इसमें कहना ही क्या!

श्लोक 133 (skanda.8.162.133)

तर्पिता ब्राह्मणा देवि देवाश्च सगणास्त्वया । गृहीतः पुत्रकश्चायं त्वयाशोकतरुः प्रिये

tarpitā brāhmaṇā devi devāśca sagaṇāstvayā | gṛhītaḥ putrakaścāyaṁ tvayāśokataruḥ priye

हे देवि! तुमने ब्राह्मणों को, गणों-सहित देवताओं को तृप्त किया है, और हे प्रिये! तुमने इस अशोक वृक्ष को पुत्र-रूप में ग्रहण भी कर लिया है।

श्लोक 134 (skanda.8.162.134)

एहि देवि गृहान् याम संपूर्णस्ते मनोरथः । भूयः सुतं तं द्रक्ष्यामः स्तबकैः समलंकृतम्

ehi devi gṛhān yāma saṁpūrṇaste manorathaḥ | bhūyaḥ sutaṁ taṁ drakṣyāmaḥ stabakaiḥ samalaṁkṛtam

आओ, हे देवि! घर चलें, तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो चुका है। हम फिर कभी उस पुत्र को गुच्छों से सुसज्जित देखेंगे।

श्लोक 135 (skanda.8.162.135)

इत्युक्ता पतिना साध्वी हर्षपूर्णमुखेक्षणा । प्राहेदं वचनं तत्र हरितं हरिणेक्षणा

ityuktā patinā sādhvī harṣapūrṇamukhekṣaṇā | prāhedaṁ vacanaṁ tatra haritaṁ hariṇekṣaṇā

पति द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, हर्ष से भरे मुख और नेत्रों वाली, मृगनयनी साध्वी देवी ने वहाँ हरित नामक वृक्ष-रक्षक से यह वचन कहा।

श्लोक 136 (skanda.8.162.136)

हरिणाक्ष स्थितमिह अमुं पुत्र सुपुत्रकम् । गोपायस्व हरे यत्नाद् गजाश्वाच्चाण्डजाण्डपात्

hariṇākṣa sthitamiha amuṁ putra suputrakam | gopāyasva hare yatnād gajāśvāccāṇḍajāṇḍapāt

हे मृगनयन! हे हरे! यहाँ स्थित इस सुपुत्र को यत्नपूर्वक हाथियों, घोड़ों तथा पक्षियों से बचाना।

श्लोक 137 (skanda.8.162.137)

यदि वापि भवेदेष स्तबकैः समलंकृतः । अशोकपुत्रको मह्यं तदा मां द्रष्टुमर्हसि

yadi vāpi bhavedeṣa stabakaiḥ samalaṁkṛtaḥ | aśokaputrako mahyaṁ tadā māṁ draṣṭumarhasi

और जब यह अशोक-पुत्र गुच्छों से सुसज्जित हो जाए, तब तुम्हें मेरे पास आकर मुझे यह दिखाने योग्य होना चाहिए।

श्लोक 138 (skanda.8.162.138)

इति संदिश्य हरितमुद्भ्रान्तहरिणेक्षणा । सापाङ्गचक्षुर्विक्षेपं कृत्वोमा पतिना सह । विवेश सदनं देवी प्रभेवादित्यमण्डलम्

iti saṁdiśya haritamudbhrāntahariṇekṣaṇā | sāpāṅgacakṣurvikṣepaṁ kṛtvomā patinā saha | viveśa sadanaṁ devī prabhevādityamaṇḍalam

हरित को इस प्रकार आज्ञा देकर, चंचल मृग-नेत्रोंवाली, कटाक्ष-विक्षेप करती हुई देवी उमा अपने पति के साथ उसी प्रकार भवन में प्रविष्ट हुईं, जैसे प्रभा सूर्यमण्डल में प्रविष्ट होती है।

श्लोक 139 (skanda.8.162.139)

इति पशुपतिना सहैव देवी सुतमुपगृह्य तरुं ह्यशोकपोतम् । प्रमुदितगणमध्यगा विवेश स्वभवनमेव तदा प्रहृष्टचित्ता

iti paśupatinā sahaiva devī sutamupagṛhya taruṁ hyaśokapotam | pramuditagaṇamadhyagā viveśa svabhavanameva tadā prahṛṣṭacittā

इस प्रकार पशुपति के साथ ही देवी, अशोक के उस वृक्ष-शिशु को पुत्र-रूप में ग्रहण कर, हर्षित गणों के मध्य से गुजरती हुई, अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर उस समय अपने भवन में प्रविष्ट हुईं।

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