Skip to main content

अम्बिका खण्ड · अध्याय 163

स्कन्दाभिषेक-अनुज्ञान

अध्याय 162अध्याय-सूचीअध्याय 164

श्लोक 1 (skanda.8.163.1)

व्यास उवाच । शार्वं तेजः समादाय वह्निः किं कृतवांस्तदा । कथं स्कन्दस्समुत्पन्नः कस्मिँस्थाने महाद्युतिः

vyāsa uvāca | śārvaṁ tejaḥ samādāya vahniḥ kiṁ kṛtavāṁstadā | kathaṁ skandassamutpannaḥ kasmi~sthāne mahādyutiḥ

व्यास ने कहा - शिव का वह तेज ग्रहण कर अग्नि ने तब क्या किया? महातेजस्वी स्कन्द किस स्थान पर उत्पन्न हुए?

श्लोक 2 (skanda.8.163.2)

सेनापत्ये कथञ्चासावभिषिक्तः सुरोत्तमैः । किमर्थमभिषिक्तश्च कस्मिन्देशेपि वा प्रभो

senāpatye kathañcāsāvabhiṣiktaḥ surottamaiḥ | kimarthamabhiṣiktaśca kasmindeśepi vā prabho

वे श्रेष्ठ देवताओं द्वारा सेनापति-पद पर कैसे अभिषिक्त किए गए? किस कारण से, और किस देश में, हे प्रभो?

श्लोक 3 (skanda.8.163.3)

तारकश्च कथं तेन निहतो रणमूर्धनि । एतदिच्छाम्यहं वेत्तु त्वत्प्रसादान्महामुने

tārakaśca kathaṁ tena nihato raṇamūrdhani | etadicchāmyahaṁ vettu tvatprasādānmahāmune

और तारकासुर उनके द्वारा युद्धभूमि में किस प्रकार मारा गया? हे महामुने! मैं आपकी कृपा से यह जानना चाहता हूँ।

श्लोक 4 (skanda.8.163.4)

इति विज्ञापितो धीमान् व्यासेनाक्लिष्टकर्मणा । प्रोवाच वदतां श्रेष्ठः पितामहसुतस्तदा

iti vijñāpito dhīmān vyāsenākliṣṭakarmaṇā | provāca vadatāṁ śreṣṭhaḥ pitāmahasutastadā

अनथक कर्मी व्यास द्वारा इस प्रकार निवेदन किए जाने पर, वक्ताओं में श्रेष्ठ, पितामह-पुत्र बुद्धिमान् सनत्कुमार ने तब कहा।

श्लोक 5 (skanda.8.163.5)

सनत्कुमार उवाच । अथ त्रैलोचनं तेजः सुतसंकल्पसंभवम् । न धारयितुमुत्सेहे दीप्तिमानपि पावकः

sanatkumāra uvāca | atha trailocanaṁ tejaḥ sutasaṁkalpasaṁbhavam | na dhārayitumutsehe dīptimānapi pāvakaḥ

सनत्कुमार ने कहा - त्रिनेत्र शिव का, पुत्र-प्राप्ति के संकल्प से उत्पन्न वह तेज, तेजस्वी अग्नि भी धारण करने में समर्थ न हो सके।

श्लोक 6 (skanda.8.163.6)

दाहात्मकोपि भूतानां दह्यमानस्स तेजसा । गङ्गामभ्यर्थयामास धारणे तस्य तेजसः

dāhātmakopi bhūtānāṁ dahyamānassa tejasā | gaṅgāmabhyarthayāmāsa dhāraṇe tasya tejasaḥ

स्वयं प्राणियों को जलाने वाले होते हुए भी, उस तेज से जलते हुए, उन्होंने गंगा से उस तेज को धारण करने की प्रार्थना की।

श्लोक 7 (skanda.8.163.7)

सा तेनाभ्यर्थिता देवी हुताशेन त्रिलोकगा । एवमस्त्विति साशङ्कमुवाच मधुरस्वरा

sā tenābhyarthitā devī hutāśena trilokagā | evamastviti sāśaṅkamuvāca madhurasvarā

अग्नि द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर, त्रिलोकगामिनी वह देवी गंगा ने मधुर स्वर में आशंकित होकर कहा - 'ऐसा ही हो।'

श्लोक 8 (skanda.8.163.8)

तत्तेजो देवदेवस्य तेजस्वी हव्यवाहनः । तदा संक्रामयाञ्चक्रे गङ्गायां योगमायया

tattejo devadevasya tejasvī havyavāhanaḥ | tadā saṁkrāmayāñcakre gaṅgāyāṁ yogamāyayā

तब तेजस्वी अग्नि ने देवाधिदेव के उस तेज को योगमाया के द्वारा गंगा में संक्रमित कर दिया।

श्लोक 9 (skanda.8.163.9)

ज्ञात्वापि दुर्धरं तत्सा प्रतिपेदे वरानना । अर्थिप्रणयनिर्भङ्गदोषभीता सरिद्वरा

jñātvāpi durdharaṁ tatsā pratipede varānanā | arthipraṇayanirbhaṅgadoṣabhītā saridvarā

उसे धारण करना कठिन जानते हुए भी, याचक के अनुरोध को भंग करने के दोष से डरती हुई, वह सुन्दरमुखी श्रेष्ठ नदी गंगा ने उसे स्वीकार कर लिया।

श्लोक 10 (skanda.8.163.10)

अथ सा क्षिप्रमभवन्मन्थरालसगामिनी । प्रभावात्तेजसस्तस्य श्यामोन्मुखपयोधरा

atha sā kṣipramabhavanmantharālasagāminī | prabhāvāttejasastasya śyāmonmukhapayodharā

फिर उस तेज के प्रभाव से वह शीघ्र ही मन्द और शिथिल गति वाली हो गई, और उसके स्तनों के अग्रभाग श्याम हो गए।

श्लोक 11 (skanda.8.163.11)

भिन्नाञ्जनरुचा तन्व्या रोमराज्या रराज सा । घनराज्या घनापाये लेखेवानुष्णदीधितेः

bhinnāñjanarucā tanvyā romarājyā rarāja sā | ghanarājyā ghanāpāye lekhevānuṣṇadīdhiteḥ

अंजन के समान श्याम, कोमल रोमराजी से वह उसी प्रकार शोभित हुई, जैसे मेघों के हटने पर मेघ-पंक्ति चन्द्र-रेखा से शोभित होती है।

श्लोक 12 (skanda.8.163.12)

जगाम च तदा ग्लानिं किञ्चिदाविप्लुतेक्षणा । नोपलेभे तदा देवी रतिं शय्यासनेषु च

jagāma ca tadā glāniṁ kiñcidāviplutekṣaṇā | nopalebhe tadā devī ratiṁ śayyāsaneṣu ca

उसकी दृष्टि कुछ धुँधली हो गई, और उसमें कुछ म्लानता आ गई; वह देवी शय्या और आसन में कहीं भी रति का सुख प्राप्त नहीं कर सकीं।

श्लोक 13 (skanda.8.163.13)

अमृतस्यन्दिभिः शीतैः स्पृष्टापि शशिनः करैः । मम्लौ सा तेजसा तेन दह्यमाना तदानघा

amṛtasyandibhiḥ śītaiḥ spṛṣṭāpi śaśinaḥ karaiḥ | mamlau sā tejasā tena dahyamānā tadānaghā

अमृत-सी शीतल चन्द्र-किरणों से स्पर्श किए जाने पर भी वह निष्पाप गंगा उस तेज से जलती हुई मुरझा गई।

श्लोक 14 (skanda.8.163.14)

शरस्तम्बाभिराजिते । सोत्ससर्ज तदा तेजो हरस्योग्रं शुभेहनि

śarastambābhirājite | sotsasarja tadā tejo harasyograṁ śubhehani

इस श्लोक का आरम्भ मूल पाठ में खण्डित है - सरकण्डों के झुरमुट से शोभित उस स्थान पर, एक शुभ दिन, उसने हर के उस उग्र तेज को त्याग दिया।

श्लोक 15 (skanda.8.163.15)

शरमध्यात् समभवद् बालो बालपराक्रमः । षड्वक्त्रो द्वादशभुजः सूर्यकोटिसमद्युतिः

śaramadhyāt samabhavad bālo bālaparākramaḥ | ṣaḍvaktro dvādaśabhujaḥ sūryakoṭisamadyutiḥ

उन सरकण्डों के मध्य से एक बालक उत्पन्न हुआ, जो बाल्यावस्था में भी पराक्रमी, छह मुखों और बारह भुजाओं वाला, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी था।

श्लोक 16 (skanda.8.163.16)

समिध्य विधिना तत्र पावकं पावकत्विषः । विश्वामित्रस्तदा चक्रे जातकर्म सुजन्मनः

samidhya vidhinā tatra pāvakaṁ pāvakatviṣaḥ | viśvāmitrastadā cakre jātakarma sujanmanaḥ

वहाँ विधिपूर्वक अग्नि को प्रज्वलित कर, अग्नि-सम तेजस्वी उस सुजन्मा बालक का जातकर्म-संस्कार विश्वामित्र ने किया।

श्लोक 17 (skanda.8.163.17)

कृत्तिकास्तं तदा दृष्ट्वा प्रस्नुतोरुपयोधराः । आजग्मुरन्तिकं तस्य

kṛttikāstaṁ tadā dṛṣṭvā prasnutorupayodharāḥ | ājagmurantikaṁ tasya

उसे देखकर कृत्तिकाएँ, जिनके स्तन दूध से भर उठे थे, उसके समीप आ पहुँचीं। इस श्लोक का शेष अंश मूल में खण्डित है।

श्लोक 18 (skanda.8.163.18)

उपतस्थुश्च तं वेदास्सोपवेदास्ससंग्रहाः । कला विद्याश्च निखिला लक्ष्मीर्मेधा सरस्वती

upatasthuśca taṁ vedāssopavedāssasaṁgrahāḥ | kalā vidyāśca nikhilā lakṣmīrmedhā sarasvatī

उपवेदों और संग्रहों-सहित वेद, समस्त कलाएँ और विद्याएँ, लक्ष्मी, मेधा और सरस्वती - सब उसकी उपासना करने लगे।

श्लोक 19 (skanda.8.163.19)

कान्तिर्धर्मो दया क्षान्तिर्धृतिर्धैर्यं पराक्रमः । योगस्तेजो बल प्रज्ञा स्थितिगाम्भीर्यसत्क्रियाः

kāntirdharmo dayā kṣāntirdhṛtirdhairyaṁ parākramaḥ | yogastejo bala prajñā sthitigāmbhīryasatkriyāḥ

कान्ति, धर्म, दया, क्षमा, धृति, धैर्य, पराक्रम, योग, तेज, बल, प्रज्ञा, स्थिरता, गाम्भीर्य और सत्क्रिया - ये सब भी उसकी सेवा में उपस्थित हुए।

श्लोक 20 (skanda.8.163.20)

अथातो धनुरादाय दिव्यमद्भुतविक्रमः । सन्धाय लीलया बाणं स मुमोच गिरौ

athāto dhanurādāya divyamadbhutavikramaḥ | sandhāya līlayā bāṇaṁ sa mumoca girau

फिर अद्भुत पराक्रमी उस बालक ने दिव्य धनुष उठाकर, लीलापूर्वक बाण चढ़ाकर, उसे किसी पर्वत की ओर छोड़ दिया। इस श्लोक का शेष अंश मूल में खण्डित है।

श्लोक 21 (skanda.8.163.21)

प्रोद्भिन्नं सहसा तेन भूभृतः शिखरोत्तमम् । पपाताशु परित्रस्तभीतोद्भ्रान्तविहङ्गमम्

prodbhinnaṁ sahasā tena bhūbhṛtaḥ śikharottamam | papātāśu paritrastabhītodbhrāntavihaṅgamam

उस बाण से पर्वत का श्रेष्ठ शिखर एकाएक फट पड़ा, और भयभीत, संत्रस्त, इधर-उधर उड़ते पक्षियों-सहित शीघ्र ही गिर पड़ा।

श्लोक 22 (skanda.8.163.22)

तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं सत्वानां तन्निवासिनाम् । विस्मयश्च भयञ्चैव युगपत् संबभूवतुः

tad dṛṣṭvā mahadāścaryaṁ satvānāṁ tannivāsinām | vismayaśca bhayañcaiva yugapat saṁbabhūvatuḥ

उस महान् आश्चर्य को देखकर, वहाँ निवास करने वाले प्राणियों में विस्मय और भय दोनों एक साथ उत्पन्न हो गए।

श्लोक 23 (skanda.8.163.23)

अथ प्रेक्ष्य भयं तस्मादात्मनो बलसूदनः । मातॄः संप्रेषयामास विनाशायामितद्युतेः

atha prekṣya bhayaṁ tasmādātmano balasūdanaḥ | mātṝḥ saṁpreṣayāmāsa vināśāyāmitadyuteḥ

उस भय को देखकर बल के संहारक इन्द्र ने, उस अपरिमित तेजस्वी बालक के विनाश के लिए मातृ-गणों को भेजा।

श्लोक 24 (skanda.8.163.24)

आगत्य मातरस्तत्र दृष्ट्वा तं तेजसां निधिम् । तमेव शरणं जग्मुस्तत्तेजोहृतचेतसः

āgatya mātarastatra dṛṣṭvā taṁ tejasāṁ nidhim | tameva śaraṇaṁ jagmustattejohṛtacetasaḥ

वहाँ आकर, तेज के उस निधि-स्वरूप बालक को देखकर, उसके तेज से मन हर लिए गए मातृगण उसी की शरण में चले गए।

श्लोक 25 (skanda.8.163.25)

आजगाम ततः क्रुद्धः सह व्रातैर्दिवौकसाम् । ऐरावतगजस्कन्धमारूढः पाकशासनः

ājagāma tataḥ kruddhaḥ saha vrātairdivaukasām | airāvatagajaskandhamārūḍhaḥ pākaśāsanaḥ

तब देवताओं के समूहों-सहित क्रुद्ध होकर, ऐरावत हाथी के कन्धे पर आरूढ़, इन्द्र स्वयं वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 26 (skanda.8.163.26)

आगच्छतः सुरान्दृष्ट्वा ननादोच्चैर्महाद्युतिः । अभ्यद्रवच्च संक्रुद्धः सिंहो मत्तान् गजानिव

āgacchataḥ surāndṛṣṭvā nanādoccairmahādyutiḥ | abhyadravacca saṁkruddhaḥ siṁho mattān gajāniva

आते हुए देवताओं को देखकर, वह महातेजस्वी बालक ऊँचे स्वर में गरजा और उसी प्रकार क्रुद्ध होकर झपटा, जैसे सिंह मतवाले हाथियों पर झपटता है।

श्लोक 27 (skanda.8.163.27)

बभूवुस्तेन नादेन मुहुर्मूढा दिवौकसः । अभूदैरावणस्यापि मदध्वंसः कपोलयोः

babhūvustena nādena muhurmūḍhā divaukasaḥ | abhūdairāvaṇasyāpi madadhvaṁsaḥ kapolayoḥ

उस गर्जना से देवता बार-बार मोहग्रस्त हो गए, और ऐरावत के कपोलों का मद भी नष्ट हो गया।

श्लोक 28 (skanda.8.163.28)

अर्चींषि च प्रदीप्तानि विससर्ज सहस्रशः । त्रिलोचनसुतस्तेषां सुराणां सुरदर्पहा

arcīṁṣi ca pradīptāni visasarja sahasraśaḥ | trilocanasutasteṣāṁ surāṇāṁ suradarpahā

उन देवताओं के अभिमान का नाश करने वाले उस त्रिलोचन-पुत्र ने सहस्रों प्रज्वलित ज्वालाएँ छोड़ीं।

श्लोक 29 (skanda.8.163.29)

अर्च्चिर्भिर्हतकान्तीनि मुखान्यसुरविद्विषाम् । बभूवुर्हिमदग्धानि सरोजानि सरःस्विव

arccirbhirhatakāntīni mukhānyasuravidviṣām | babhūvurhimadagdhāni sarojāni saraḥsviva

उन ज्वालाओं से देवताओं के मुखों की कान्ति उसी प्रकार नष्ट हो गई, जैसे तालाबों में कमल पाले से झुलस जाते हैं।

श्लोक 30 (skanda.8.163.30)

अथ वज्रं समादाय ज्वलितं ज्वलनद्युतेः । रोषादाताम्रनेत्रान्तो विससर्ज शतक्रतुः

atha vajraṁ samādāya jvalitaṁ jvalanadyuteḥ | roṣādātāmranetrānto visasarja śatakratuḥ

फिर अग्नि के समान तेजस्वी, प्रज्वलित वज्र उठाकर, क्रोध से नेत्रों के कोने ताम्रवर्ण हुए इन्द्र ने उसे छोड़ दिया।

श्लोक 31 (skanda.8.163.31)

तेन वज्रप्रहारेण स द्विमूर्त्तिस्तदाभवत् । द्वाभ्यामपि च मूर्त्तिभ्यामभ्यधावत् पुरन्दरम्

tena vajraprahāreṇa sa dvimūrttistadābhavat | dvābhyāmapi ca mūrttibhyāmabhyadhāvat purandaram

उस वज्र-प्रहार से वह बालक तत्काल दो मूर्तियों में विभक्त हो गया, और दोनों ही मूर्तियों से इन्द्र की ओर दौड़ पड़ा।

श्लोक 32 (skanda.8.163.32)

अथ दर्पं विहायाशु प्रणेमे पाकशासनः । तेजसां निधये तस्मै प्राह चैवं विनिर्जितः

atha darpaṁ vihāyāśu praṇeme pākaśāsanaḥ | tejasāṁ nidhaye tasmai prāha caivaṁ vinirjitaḥ

तब अपना अभिमान तुरन्त त्यागकर इन्द्र ने उस तेज-निधि को प्रणाम किया, और पराजित होकर उससे यह कहा।

श्लोक 33 (skanda.8.163.33)

गृहाण राज्यमप्येयत् प्रार्थनीयं मनस्विनाम् । त्वमेव युक्तो लोकानां पालने पावकात्मज

gṛhāṇa rājyamapyeyat prārthanīyaṁ manasvinām | tvameva yukto lokānāṁ pālane pāvakātmaja

'मनस्वियों द्वारा भी वांछनीय यह राज्य ग्रहण कर लो। हे अग्निपुत्र! लोकों के पालन के लिए तुम ही योग्य हो।'

श्लोक 34 (skanda.8.163.34)

सत्स्वप्यन्येषु तेजस्सु तमसां विनिहन्तृषु । अग्नावेव हविः पुण्यं हूयते

satsvapyanyeṣu tejassu tamasāṁ vinihantṛṣu | agnāveva haviḥ puṇyaṁ hūyate

'अन्य तेजस्वी, अन्धकार को नष्ट करने वाले पदार्थों के होते हुए भी, पवित्र हवि तो अग्नि में ही हवन की जाती है।' - इस श्लोक का शेष अंश मूल में खण्डित है।

श्लोक 35 (skanda.8.163.35)

प्राह प्रभवतां श्रेष्ठो विहस्य विबुधाधिपम्

prāha prabhavatāṁ śreṣṭho vihasya vibudhādhipam

समर्थों में श्रेष्ठ उस बालक ने हँसते हुए देवताओं के अधिपति इन्द्र से कहा - इस श्लोक के आगे का अंश मूल में खण्डित है।

श्लोक 36 (skanda.8.163.36)

शाधि शक्र त्वमेवेदं राज्यं चिरमभीप्सितम् । अनेन बहुदोषेण नाहमर्थी पुरन्दर

śādhi śakra tvamevedaṁ rājyaṁ ciramabhīpsitam | anena bahudoṣeṇa nāhamarthī purandara

'हे शक्र! तुम स्वयं ही चिरकाल से इच्छित इस राज्य पर शासन करो। हे पुरन्दर! इस बहुदोषयुक्त वस्तु का मैं अभिलाषी नहीं हूँ।'

श्लोक 37 (skanda.8.163.37)

निशाम्य तद्वचः श्रीमान् स्कन्दस्याक्लिष्टचेतसः । अर्थवद्वचनं श्लक्ष्णं पुनराह शचीपतिः

niśāmya tadvacaḥ śrīmān skandasyākliṣṭacetasaḥ | arthavadvacanaṁ ślakṣṇaṁ punarāha śacīpatiḥ

श्रीमान्, अक्लिष्ट-चित्त स्कन्द के उस अर्थपूर्ण, कोमल वचन को सुनकर, शचीपति इन्द्र ने पुनः कहा।

श्लोक 38 (skanda.8.163.38)

दर्शय नो विचित्राणि कार्यजातान्यनेकधा । संगतानि विभिन्नानि त्रैलोक्यराज्यग्रहणं स्वनुबद्धमनव्ययम्

darśaya no vicitrāṇi kāryajātānyanekadhā | saṁgatāni vibhinnāni trailokyarājyagrahaṇaṁ svanubaddhamanavyayam

इस बीच का एक श्लोक मूल पाठ में पूर्णतः खण्डित रह जाने के कारण छोड़ दिया गया है। इन्द्र ने आगे कहा - 'हमें अपने अनेक विचित्र और महान् कार्य दिखाओ, जो एकत्र भी हैं और पृथक् भी। त्रैलोक्य के राज्य का ग्रहण तुम्हारे लिए स्वाभाविक और अक्षय है।' इस श्लोक की मध्य पंक्ति का अन्तिम अंश मूल में खण्डित है।

श्लोक 39 (skanda.8.163.39)

एवमुक्तवति प्राह सम्भवत्यनलद्युतिः । स्निग्धगम्भीरया वाचा स्मितपूर्वमिदं वचः

evamuktavati prāha sambhavatyanaladyutiḥ | snigdhagambhīrayā vācā smitapūrvamidaṁ vacaḥ

इस प्रकार कहे जाने पर, अग्नि के समान तेजस्वी, अभी-अभी उत्पन्न वह बालक स्नेहपूर्ण, गम्भीर वाणी में, मुसकराते हुए यह वचन कहने लगा।

श्लोक 40 (skanda.8.163.40)

न विचालयितुं चेतः शक्र शक्ता हठान्मम । न वारि सरितां पत्युरलातैः संप्रतप्यते

na vicālayituṁ cetaḥ śakra śaktā haṭhānmama | na vāri saritāṁ patyuralātaiḥ saṁpratapyate

'हे शक्र! तुम बलपूर्वक मेरे चित्त को विचलित करने में समर्थ नहीं हो। समुद्र का जल जलती हुई लकड़ियों से गर्म नहीं हो जाता।'

श्लोक 41 (skanda.8.163.41)

राज्यं राजीवपत्राक्ष न जातु मनसाप्यहम् । दोषाणां नित्यमावासं कामये पाकशासन

rājyaṁ rājīvapatrākṣa na jātu manasāpyaham | doṣāṇāṁ nityamāvāsaṁ kāmaye pākaśāsana

'हे कमल-नेत्र! हे पाकशासन! राज्य, जो नित्य दोषों का निवासस्थान है, उसकी कामना मैं कभी मन से भी नहीं करता।'

श्लोक 42 (skanda.8.163.42)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पुनर्वक्तुमियेष सः । सुधानिष्यन्दिभिः स्कन्दं स्नपयन्निव लोचनैः

tasya tadvacanaṁ śrutvā punarvaktumiyeṣa saḥ | sudhāniṣyandibhiḥ skandaṁ snapayanniva locanaiḥ

उसका वह वचन सुनकर, इन्द्र स्कन्द को मानो अमृत टपकाते नेत्रों से स्नान कराते हुए, पुनः कुछ कहने की इच्छा करने लगा।

श्लोक 43 (skanda.8.163.43)

आकरे तेजसां श्लाघ्ये नैतच्चित्रं त्वयि प्रभो । शक्ता एवं न सज्जन्ते भोगेषु सुमहत्स्वपि

ākare tejasāṁ ślāghye naitaccitraṁ tvayi prabho | śaktā evaṁ na sajjante bhogeṣu sumahatsvapi

'हे प्रभो! तेज की प्रशंसनीय खान तुझमें यह कोई आश्चर्य नहीं है। समर्थ पुरुष महान् से महान् भोगों में भी इस प्रकार आसक्त नहीं होते।'

श्लोक 44 (skanda.8.163.44)

सेनापत्येभिषिच्यस्व सुराणामर्थसिद्धये । वपुः संमानयामीह नाहमाज्ञापये विभो

senāpatyebhiṣicyasva surāṇāmarthasiddhaye | vapuḥ saṁmānayāmīha nāhamājñāpaye vibho

'देवताओं के प्रयोजन की सिद्धि के लिए तू सेनापति-पद पर अभिषिक्त हो जा। मैं तेरे स्वरूप का सम्मान करता हूँ, हे विभो! मैं तुझे आज्ञा नहीं दे रहा।'

श्लोक 45 (skanda.8.163.45)

अथ तद्वचनं श्रुत्वा पुरुहूतं महाभुजः । द्वादशाक्षः सहस्राक्षमिदमाहोरुविक्रमः

atha tadvacanaṁ śrutvā puruhūtaṁ mahābhujaḥ | dvādaśākṣaḥ sahasrākṣamidamāhoruvikramaḥ

फिर उस वचन को सुनकर, महाभुज, बारह नेत्रोंवाले, महापराक्रमी बालक ने सहस्र-नेत्रधारी इन्द्र से यह कहा।

श्लोक 46 (skanda.8.163.46)

मम प्रभवति श्रीमान् लोकानां प्रभुरव्ययः । अनन्यभूरमेयात्मा वृषकेतुः पुरन्दर

mama prabhavati śrīmān lokānāṁ prabhuravyayaḥ | ananyabhūrameyātmā vṛṣaketuḥ purandara

'हे पुरन्दर! मुझ पर तो श्रीमान्, लोकों के अव्यय स्वामी, अनन्य-आश्रय, अपरिमेय आत्मावाले वृषकेतु शिव का ही प्रभाव है।'

श्लोक 47 (skanda.8.163.47)

तमाराध्य प्रभुं भक्त्या गृहाणाज्ञां शतक्रतो । तामहं प्रतिपत्स्यामि यामसौ दास्यति प्रभुः

tamārādhya prabhuṁ bhaktyā gṛhāṇājñāṁ śatakrato | tāmahaṁ pratipatsyāmi yāmasau dāsyati prabhuḥ

'हे शतक्रतो! भक्तिपूर्वक उस प्रभु की आराधना कर, उनसे आज्ञा ले आओ। वे प्रभु जो आज्ञा देंगे, उसी को मैं स्वीकार करूँगा।'

श्लोक 48 (skanda.8.163.48)

तस्याभिप्रायमाज्ञाय देवदेवो वृषध्वजः । आजगाम सपत्नीको दिदृक्षुस्तनयं तदा

tasyābhiprāyamājñāya devadevo vṛṣadhvajaḥ | ājagāma sapatnīko didṛkṣustanayaṁ tadā

उसका अभिप्राय जानकर, बैल-ध्वजधारी देवदेव शिव अपने पुत्र को देखने की इच्छा से, पत्नी-सहित वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 49 (skanda.8.163.49)

स्वाहया सहितो वह्निर्गङ्गा च सरितां वरा । कृत्तिकाश्च सुसंहृष्टाः श्वेतं शिखरिणां वरम्

svāhayā sahito vahnirgaṅgā ca saritāṁ varā | kṛttikāśca susaṁhṛṣṭāḥ śvetaṁ śikhariṇāṁ varam

स्वाहा-सहित अग्नि, नदियों में श्रेष्ठ गंगा, और अत्यन्त हर्षित कृत्तिकाएँ भी - सब पर्वतों में श्रेष्ठ श्वेत पर्वत की ओर चल पड़े।

श्लोक 50 (skanda.8.163.50)

युगपत्ते तदा तत्र श्वेतस्य शिखरोत्तमे । चिन्तयामासुरायान्तः कन्नु स्कन्दोभियास्यति

yugapatte tadā tatra śvetasya śikharottame | cintayāmāsurāyāntaḥ kannu skandobhiyāsyati

वे सब एक साथ श्वेत पर्वत के उस श्रेष्ठ शिखर पर आते हुए यह सोचने लगे - 'स्कन्द किसके पास पहले जाएगा?'

श्लोक 51 (skanda.8.163.51)

अथ तेषामभिप्रायं ज्ञात्वा मतिमतां वरः । षोढा समभवत् स्कन्दो योगीशो बलवत्तदा

atha teṣāmabhiprāyaṁ jñātvā matimatāṁ varaḥ | ṣoḍhā samabhavat skando yogīśo balavattadā

बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, योगेश्वर स्कन्द ने उनके इस विचार को जानकर, तब बलपूर्वक स्वयं को छह रूपों में विभक्त कर लिया।

श्लोक 52 (skanda.8.163.52)

स्कन्दोभ्यगान्महादेवं विशाखो हिमवत्सुताम् । नैगमेषो ययौ गङ्गां वह्निं शाखो महाद्युतिः

skandobhyagānmahādevaṁ viśākho himavatsutām | naigameṣo yayau gaṅgāṁ vahniṁ śākho mahādyutiḥ

स्कन्द महादेव के पास गया, विशाख हिमालय-पुत्री के पास गया, नैगमेष गंगा के पास गया, और महातेजस्वी शाख अग्नि के पास गया।

श्लोक 53 (skanda.8.163.53)

स्वाहां जगाम संहृष्टः काकपक्षधरो गुहः । कृत्तिकाः षण्मुखः श्रीमान् वेगादभिससार च

svāhāṁ jagāma saṁhṛṣṭaḥ kākapakṣadharo guhaḥ | kṛttikāḥ ṣaṇmukhaḥ śrīmān vegādabhisasāra ca

अत्यन्त प्रसन्न होकर, चोटीधारी गुह स्वाहा के पास गया, और श्रीमान् षण्मुख वेगपूर्वक कृत्तिकाओं के पास पहुँचा।

श्लोक 54 (skanda.8.163.54)

मनोरथान् स सर्वेषां देवदेवात्मजः प्रभुः । युगपद्योगिनामीशः पूरयामास मूर्तिभिः

manorathān sa sarveṣāṁ devadevātmajaḥ prabhuḥ | yugapadyogināmīśaḥ pūrayāmāsa mūrtibhiḥ

देवदेव के पुत्र, योगियों के स्वामी उस प्रभु ने अपनी उन मूर्तियों से सबकी मनोकामनाओं को एक साथ पूर्ण कर दिया।

श्लोक 55 (skanda.8.163.55)

अथ तस्मै ददौ शम्भुरस्त्रग्रामं चतुर्विधम् । सुधाकणपरिस्रावि चूडारत्नं च पार्वती

atha tasmai dadau śambhurastragrāmaṁ caturvidham | sudhākaṇaparisrāvi cūḍāratnaṁ ca pārvatī

फिर शम्भु ने उसे चार प्रकार के अस्त्रों का समूह दिया, और पार्वती ने अमृत-कणों को टपकाने वाला चूड़ामणि दिया।

श्लोक 56 (skanda.8.163.56)

स्वमनोनिर्मलां गङ्गा विशुद्धाममृतोद्भवाम् । एकावलिं ददौ तस्मै गुहायोत्फुल्ललोचना

svamanonirmalāṁ gaṅgā viśuddhāmamṛtodbhavām | ekāvaliṁ dadau tasmai guhāyotphullalocanā

उत्फुल्ल-नेत्रा गंगा ने गुह को अपने ही मन के समान निर्मल, विशुद्ध, अमृत से उत्पन्न एक हार दिया।

श्लोक 57 (skanda.8.163.57)

द्विषत्प्राणहरां गुर्वीममोघां हव्यवाहनः । अर्चिष्मतीं ददौ चास्मै शक्तिं शक्ताय सूनवे

dviṣatprāṇaharāṁ gurvīmamoghāṁ havyavāhanaḥ | arciṣmatīṁ dadau cāsmai śaktiṁ śaktāya sūnave

अग्नि ने अपने शक्तिशाली पुत्र को शत्रुओं के प्राण हरने वाली, भारी, अमोघ, ज्वालायुक्त शक्ति प्रदान की।

श्लोक 58 (skanda.8.163.58)

पताकां महतीं रक्तां ज्वलत्पावकसप्रभाम् । किङ्किणीनादितां दिव्यां प्रादात् स्वाहा महात्मने

patākāṁ mahatīṁ raktāṁ jvalatpāvakasaprabhām | kiṅkiṇīnāditāṁ divyāṁ prādāt svāhā mahātmane

स्वाहा ने उस महात्मा को प्रज्वलित अग्नि के समान लाल रंग की, घण्टिकाओं की ध्वनि से गूँजती, दिव्य महती पताका प्रदान की।

श्लोक 59 (skanda.8.163.59)

सुपुण्यगन्धामुत्फुल्लां स्वरजःपरिपिञ्जराम् । कृत्तिकाश्च ददुस्तस्मै मालामञ्चितकेसराम्

supuṇyagandhāmutphullāṁ svarajaḥparipiñjarām | kṛttikāśca dadustasmai mālāmañcitakesarām

कृत्तिकाओं ने भी उसे अत्यन्त पवित्र सुगन्ध वाली, खिली हुई, अपने ही पराग से पीतवर्ण, केसर से सुशोभित एक माला दी।

श्लोक 60 (skanda.8.163.60)

अथाजग्मुः सुराः सर्वे पितामहपुरःसराः । श्वेताद्रेः शिखरं रम्यं वृषकेतुं दिदृक्षवः

athājagmuḥ surāḥ sarve pitāmahapuraḥsarāḥ | śvetādreḥ śikharaṁ ramyaṁ vṛṣaketuṁ didṛkṣavaḥ

फिर पितामह ब्रह्मा को आगे रखकर समस्त देवता, वृषकेतु शिव के दर्शन की इच्छा से, श्वेत पर्वत के रमणीय शिखर पर आ पहुँचे।

श्लोक 61 (skanda.8.163.61)

तानागतान् समं सर्वान् तदा तत्र दिवौकसः । दृष्ट्वा संभावयामास महादेवः प्रसन्नया

tānāgatān samaṁ sarvān tadā tatra divaukasaḥ | dṛṣṭvā saṁbhāvayāmāsa mahādevaḥ prasannayā

वहाँ आए हुए उन समस्त देवताओं को एक साथ देखकर, महादेव ने प्रसन्नतापूर्वक उनका सत्कार किया।

श्लोक 62 (skanda.8.163.62)

प्रणम्य देवदेवेशं लब्ध्वानुज्ञां दिवौकसः । शिलासु शशिगौरीषु निषेदुरमितौजसः

praṇamya devadeveśaṁ labdhvānujñāṁ divaukasaḥ | śilāsu śaśigaurīṣu niṣeduramitaujasaḥ

देवाधिदेव को प्रणाम कर, उनकी अनुज्ञा पाकर, वे अपरिमित तेजस्वी देवता चन्द्रमा के समान श्वेत शिलाओं पर बैठ गए।

श्लोक 63 (skanda.8.163.63)

प्रोत्तुङ्गशिखरः श्वेतो द्युतिमानपि भूधरः । तेजसां सन्निपातेन बभूव द्युतिमत्तरः

prottuṅgaśikharaḥ śveto dyutimānapi bhūdharaḥ | tejasāṁ sannipātena babhūva dyutimattaraḥ

उच्च शिखरों वाला वह श्वेत पर्वत, स्वयं तेजस्वी होते हुए भी, उन तेजों के सम्मिलन से और भी अधिक तेजस्वी हो गया।

श्लोक 64 (skanda.8.163.64)

अथ प्रचोदितः सर्वैर्विबुधैर्विबुधाधिपः । व्यज्ञापयन्महादेवं प्रणम्य वदतां वरः

atha pracoditaḥ sarvairvibudhairvibudhādhipaḥ | vyajñāpayanmahādevaṁ praṇamya vadatāṁ varaḥ

फिर समस्त देवताओं द्वारा प्रेरित होकर, वक्ताओं में श्रेष्ठ देवाधिपति इन्द्र ने महादेव को प्रणाम कर निवेदन किया।

श्लोक 65 (skanda.8.163.65)

तारकाख्येन नो लक्ष्मीरामृष्टा प्रसभं प्रभो । वज्रं वक्षःस्थले तस्य कठिने कुण्ठतां ययौ

tārakākhyena no lakṣmīrāmṛṣṭā prasabhaṁ prabho | vajraṁ vakṣaḥsthale tasya kaṭhine kuṇṭhatāṁ yayau

हे प्रभो! तारक नामक असुर ने हमारी लक्ष्मी को बलपूर्वक छीन लिया है। उसकी कठोर छाती पर तो मेरा वज्र भी कुण्ठित हो जाता है।

श्लोक 66 (skanda.8.163.66)

चक्रं हरेः सहस्रारं ज्वलितं ज्वलितौजसः । आसाद्य मृदुतां भेजे कण्ठं तस्यामरद्विषः

cakraṁ hareḥ sahasrāraṁ jvalitaṁ jvalitaujasaḥ | āsādya mṛdutāṁ bheje kaṇṭhaṁ tasyāmaradviṣaḥ

उस तेजस्वी विष्णु का प्रज्वलित सहस्रार चक्र भी उस देव-शत्रु के कण्ठ पर पहुँचकर मृदु हो जाता है।

श्लोक 67 (skanda.8.163.67)

दण्डो वैवस्वतस्यापि प्रदीप्तानलभास्वरः । अलातमिव तोयौघे निर्वाणो दानवोरसि

daṇḍo vaivasvatasyāpi pradīptānalabhāsvaraḥ | alātamiva toyaughe nirvāṇo dānavorasi

अग्नि के समान प्रज्वलित यम का दण्ड भी उस दानव की छाती पर वैसे ही बुझ जाता है, जैसे जल की धारा में जलती हुई लकड़ी बुझ जाती है।

श्लोक 68 (skanda.8.163.68)

समरे रिपुदुर्वारो महापाशः प्रचेतसः । तस्य कण्ठे समभवन्मन्त्रेणेव वशीकृतः

samare ripudurvāro mahāpāśaḥ pracetasaḥ | tasya kaṇṭhe samabhavanmantreṇeva vaśīkṛtaḥ

युद्ध में शत्रुओं के लिए दुर्निवार वरुण का महापाश भी उसके कण्ठ पर पहुँचकर मानो मन्त्र से वश में कर लिया गया हो, ऐसा हो जाता है।

श्लोक 69 (skanda.8.163.69)

उत्पाट्य प्रसभं तेन नन्दने कल्पपादपाः । निवेशिता यथाकामं स्वगृहोद्यानभूमिषु

utpāṭya prasabhaṁ tena nandane kalpapādapāḥ | niveśitā yathākāmaṁ svagṛhodyānabhūmiṣu

उसने बलपूर्वक नन्दन-वन के कल्पवृक्षों को उखाड़कर, अपनी इच्छानुसार अपने घर के उद्यानों में लगा लिया है।

श्लोक 70 (skanda.8.163.70)

समीपे तस्य साशङ्कस्तालवृन्तायतेनिलः । स्वपुष्पनिकरैर्भीता ऋतवस्तमुपासते

samīpe tasya sāśaṅkastālavṛntāyatenilaḥ | svapuṣpanikarairbhītā ṛtavastamupāsate

उसके समीप शंकित वायु ताड़-पंखे के समान धीरे-धीरे चलती है, और अपने ही पुष्प-समूहों से भयभीत ऋतुएँ उसकी सेवा में उपस्थित रहती हैं।

श्लोक 71 (skanda.8.163.71)

हविर्भुजि हुतं हव्यमाच्छिनत्ति बलादसौ । मिषतां सर्वदेवानां देवदेव दितेः सुतः

havirbhuji hutaṁ havyamācchinatti balādasau | miṣatāṁ sarvadevānāṁ devadeva diteḥ sutaḥ

हे देवदेव! अग्नि में हवन की गई आहुति को भी वह दिति-पुत्र समस्त देवताओं के देखते-देखते बलपूर्वक छीन लेता है।

श्लोक 72 (skanda.8.163.72)

अभिषिच्य सुराः स्कन्दं सेनापत्ये महाद्युतिम् । जेतुमिच्छन्ति दैत्येन्द्र प्रसादात्तव शङ्कर

abhiṣicya surāḥ skandaṁ senāpatye mahādyutim | jetumicchanti daityendra prasādāttava śaṅkara

हे शंकर! देवता महातेजस्वी स्कन्द का सेनापति-पद पर अभिषेक कर, आपकी कृपा से उस दैत्येन्द्र को जीतना चाहते हैं।

श्लोक 73 (skanda.8.163.73)

एवं विज्ञापितस्तत्र वज्रिणा वृषभध्वजः । दादावनुज्ञां स्कन्दाय सेनापत्याभिषेचने

evaṁ vijñāpitastatra vajriṇā vṛṣabhadhvajaḥ | dādāvanujñāṁ skandāya senāpatyābhiṣecane

इस प्रकार वज्रधारी इन्द्र द्वारा निवेदन किए जाने पर, वृषभध्वज शिव ने स्कन्द को सेनापति-पद पर अभिषिक्त करने की अनुमति दे दी।

श्लोक 74 (skanda.8.163.74)

अथ विबुधसमूहैर्वन्दितो वन्दनीयो मदनतनुविहन्ता बालचर्न्द्रार्धमौलिः । तनयमभिसमीक्ष्य स्नेहसंफुल्लनेत्रः शशिकिरणसिताद्रेराशु सोन्तर्बभूव

atha vibudhasamūhairvandito vandanīyo madanatanuvihantā bālacarndrārdhamauliḥ | tanayamabhisamīkṣya snehasaṁphullanetraḥ śaśikiraṇasitādrerāśu sontarbabhūva

तब देवताओं के समूहों द्वारा वन्दित, स्वयं वन्दनीय, कामदेव के शरीर का नाश करने वाले, अर्ध-चन्द्रमौलिधारी शिव, अपने पुत्र को देखकर, स्नेह से खिले हुए नेत्रों के साथ, चन्द्र-किरणों-सी श्वेत उस पर्वत की गुफा में शीघ्र अन्तर्धान हो गए।

अध्याय 162अध्याय-सूचीअध्याय 164