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अम्बिका खण्ड · अध्याय 164

सेनापत्याभिषेकः

अध्याय 163अध्याय-सूचीअध्याय 165

श्लोक 1 (skanda.8.164.1)

सनत्कुमार उवाच अथ ते स्कन्दमादाय सुरा ब्रह्मपुरस्सराः । समन्तपञ्चकं पुण्यमाजग्मुरमितौजसः

sanatkumāra uvāca atha te skandamādāya surā brahmapurassarāḥ | samantapañcakaṁ puṇyamājagmuramitaujasaḥ

सनत्कुमार ने कहा - तब वे अपार तेजस्वी देवगण, ब्रह्मा को आगे कर, स्कन्द को लेकर पवित्र समन्तपञ्चक क्षेत्र में पहुँचे।

श्लोक 2 (skanda.8.164.2)

तस्मिँस्तीरे सरस्वत्याः प्रागुदक्प्रवणे समे । विस्तीर्णे श्वभ्रपाषाण कण्टकोषरवर्जिते

tasmiṁstīre sarasvatyāḥ prāgudakpravaṇe same | vistīrṇe śvabhrapāṣāṇa kaṇṭakoṣaravarjite

सरस्वती के उस तट पर, जो पूर्वोत्तर की ओर ढाल लिए हुए समतल था, विस्तीर्ण, गड्ढों-पत्थरों-काँटों और ऊसर भूमि से रहित था -

श्लोक 3 (skanda.8.164.3)

स्कन्दस्य परितः सर्वे तदा संहृष्टचेतसः । निषेदुस्ते सुरश्रेष्ठा ज्वलितानलवर्चसः

skandasya paritaḥ sarve tadā saṁhṛṣṭacetasaḥ | niṣeduste suraśreṣṭhā jvalitānalavarcasaḥ

स्कन्द के चारों ओर वे सब श्रेष्ठ देवगण, प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी, प्रसन्नचित्त होकर बैठ गए।

श्लोक 4 (skanda.8.164.4)

तत् पुण्यममरैः पृक्तं स्थानं पुण्यतरं पुनः । अभूद् गाङ्गैरिवाम्भोभिः समेतं यामुनं पयः

tat puṇyamamaraiḥ pṛktaṁ sthānaṁ puṇyataraṁ punaḥ | abhūd gāṅgairivāmbhobhiḥ sametaṁ yāmunaṁ payaḥ

देवताओं के स्पर्श से वह पवित्र स्थान और भी अधिक पवित्र हो गया, मानो गंगा के जल से मिला हुआ यमुना का जल हो।

श्लोक 5 (skanda.8.164.5)

आजगामाथ तं देशं क्षितिर्मूर्त्तिमती तदा । स्कन्दाभिषेके सञ्जाते हर्षसंफुल्ललोचना

ājagāmātha taṁ deśaṁ kṣitirmūrttimatī tadā | skandābhiṣeke sañjāte harṣasaṁphullalocanā

तब स्कन्द के अभिषेक का समय आते ही स्वयं मूर्तिमती पृथ्वी वहाँ आ पहुँची, हर्ष से उसके नेत्र खिल उठे।

श्लोक 6 (skanda.8.164.6)

अथासौ क्षिप्रमभवद् देशः कनकबालुकः । विचित्रः परितश्चित्रैः स्फुरद्रत्नगभस्तिभिः

athāsau kṣipramabhavad deśaḥ kanakabālukaḥ | vicitraḥ paritaścitraiḥ sphuradratnagabhastibhiḥ

उसी क्षण वह प्रदेश स्वर्ण-बालुका से युक्त हो गया, चमकते रत्नों की किरणों से चारों ओर विचित्र शोभा वाला बन गया।

श्लोक 7 (skanda.8.164.7)

अध्यासत महात्मानो यं देशमपमत्सराः । निरस्तदुरितः सोभूत्तत्र तेषां विभूतिभिः

adhyāsata mahātmāno yaṁ deśamapamatsarāḥ | nirastaduritaḥ sobhūttatra teṣāṁ vibhūtibhiḥ

ईर्ष्या-रहित महात्माजन जिस भूमि पर निवास करते थे, वह उनकी महिमा से समस्त पाप से रहित हो गई।

श्लोक 8 (skanda.8.164.8)

अथ सिंहासनं दिव्यं शातकुम्भं सुसंस्कृतम् । गृहीत्वा गिरिभिः सार्धमाजगाम हिमलयः

atha siṁhāsanaṁ divyaṁ śātakumbhaṁ susaṁskṛtam | gṛhītvā giribhiḥ sārdhamājagāma himalayaḥ

तब हिमालय पर्वत, अन्य पर्वतों के साथ, सुसज्जित दिव्य स्वर्ण-सिंहासन लेकर वहाँ आया।

श्लोक 9 (skanda.8.164.9)

रत्नैरोषधिभिर्गन्धैः पूर्णान् पुण्यैश्च वारिभिः । आदाय कलाशान् हैमान् फुल्लाम्बुरुहमालिनः

ratnairoṣadhibhirgandhaiḥ pūrṇān puṇyaiśca vāribhiḥ | ādāya kalāśān haimān phullāmburuhamālinaḥ

समुद्र, अत्यन्त व्याकुल होकर, कमल-मालाओं से सुशोभित स्वर्ण-कलश लेकर आए, जो रत्नों, औषधियों, सुगन्धों और पवित्र जल से भरे थे।

श्लोक 10 (skanda.8.164.10)

उदन्वन्तः सुसम्भ्रान्ताः प्रचलन्मणिकुण्डलाः । आजग्मुस्त्वरितास्तत्र हारविभ्राजितोरसः

udanvantaḥ susambhrāntāḥ pracalanmaṇikuṇḍalāḥ | ājagmustvaritāstatra hāravibhrājitorasaḥ

वे उतावले होकर वहाँ पहुँचे, हार से चमकते वक्षस्थल और हिलते हुए मणि-कुण्डलों के साथ।

श्लोक 11 (skanda.8.164.11)

गङ्गा रत्नमयाँश्चारून् कलशान् स्फुरितत्विषः । हैमाम्बुजकृतोत्तंसान् पूर्णान् परमवारिणा

gaṅgā ratnamayāṁścārūn kalaśān sphuritatviṣaḥ | haimāmbujakṛtottaṁsān pūrṇān paramavāriṇā

गंगा भी चमकते रत्नमय सुन्दर कलश लाईं, जो स्वर्ण-कमलों से सजे और उत्तम जल से पूर्ण थे।

श्लोक 12 (skanda.8.164.12)

गृहीत्वा सह सर्वाभिस्सरिद्भिस्सरिताम्बरा । आजगाम तदा हर्षात् प्रस्खलन्ती समेष्वपि

gṛhītvā saha sarvābhissaridbhissaritāmbarā | ājagāma tadā harṣāt praskhalantī sameṣvapi

सभी सरिताओं से घिरी हुई, वस्त्र के रूप में नदियों को धारण किए, वह हर्ष से लड़खड़ाती हुई भी वहाँ पहुँची।

श्लोक 13 (skanda.8.164.13)

अभिषेचनिकान् कुम्भान् ग्राहयित्वा सुसंस्कृतान् । नानारत्नप्रभोद्योतप्रतिरक्तार्कदीधितीन्

abhiṣecanikān kumbhān grāhayitvā susaṁskṛtān | nānāratnaprabhodyotapratiraktārkadīdhitīn

उसने अभिषेक के सुसज्जित कलश उठवाए, जो विविध रत्नों की प्रभा से सूर्य-किरणों के समान लाल-लाल चमक रहे थे।

श्लोक 14 (skanda.8.164.14)

देवीभिः सह बह्वीभिराजगाम दिवौकसाम् । आक्रामन्तीव तेजांसि तेजसा स्वेन पार्वती

devībhiḥ saha bahvībhirājagāma divaukasām | ākrāmantīva tejāṁsi tejasā svena pārvatī

अपने तेज से मानो अन्य तेजों को भी आच्छादित करती हुई, पार्वती अनेक देवियों के साथ वहाँ आईं।

श्लोक 15 (skanda.8.164.15)

अद्भिः परमपुण्याभिः पूर्णान् रत्नांशुमालिनः । कलशान् स्फाटिकान् शुभ्रान् ग्राहयित्वा सुसंस्कृतान्

adbhiḥ paramapuṇyābhiḥ pūrṇān ratnāṁśumālinaḥ | kalaśān sphāṭikān śubhrān grāhayitvā susaṁskṛtān

उसने अत्यन्त पवित्र जल से भरे, रत्न-किरणों वाले, स्फटिक के उज्ज्वल कलश तैयार करवाए।

श्लोक 16 (skanda.8.164.16)

मुकुटं च महच्छ्रलाघ्यं दीप्तिमच्चारुविग्रहम् । नानारत्नविवित्रांशुसमूहस्फुरितोदरम्

mukuṭaṁ ca mahacchralāghyaṁ dīptimaccāruvigraham | nānāratnavivitrāṁśusamūhasphuritodaram

एक दिव्य, प्रशंसनीय, चमकता हुआ सुन्दर मुकुट लाया गया, जिसका भीतरी भाग विविध रत्नों की किरणों से जगमगा रहा था।

श्लोक 17 (skanda.8.164.17)

हारञ्च निर्मलं शुद्धं शशाङ्ककिरणत्विषम् । कान्तं मुक्तावितानञ्च चेतोहारि सुनिर्मलम्

hārañca nirmalaṁ śuddhaṁ śaśāṅkakiraṇatviṣam | kāntaṁ muktāvitānañca cetohāri sunirmalam

और एक निर्मल, शुद्ध हार भी लाया गया, जिसकी आभा चन्द्र-किरणों जैसी थी - मनोहर, मोतियों की लड़ियों से युक्त, मन को हरने वाला और अत्यन्त निर्मल।

श्लोक 18 (skanda.8.164.18)

अभ्यागमत्तदा तत्र प्रहृष्टो यादसां पतिः । दानवाधिपमातङ्गविषाणोल्लिखिताङ्गदः

abhyāgamattadā tatra prahṛṣṭo yādasāṁ patiḥ | dānavādhipamātaṅgaviṣāṇollikhitāṅgadaḥ

तब जलचरों के स्वामी वरुण भी प्रसन्न होकर वहाँ आए, दानव-राजा के गजों के दाँतों से खरोंचे हुए अपने अंगदों सहित।

श्लोक 19 (skanda.8.164.19)

रत्नाङ्गदानि चारूणि द्युतिमन्ति धनेश्वरः । समादायाभ्यगात् सारं सर्वासामिव सम्पदाम्

ratnāṅgadāni cārūṇi dyutimanti dhaneśvaraḥ | samādāyābhyagāt sāraṁ sarvāsāmiva sampadām

कुबेर (धनेश्वर) सुन्दर, कान्तिमान रत्न-अंगद लेकर आए, मानो सम्पूर्ण सम्पत्तियों का सार साथ लाए हों।

श्लोक 20 (skanda.8.164.20)

निशाकरांशुगौराणि दीर्घाणि रुचिमन्ति च । आदाय रत्नदण्डानि चामराणि नहाद्युतिः

niśākarāṁśugaurāṇi dīrghāṇi rucimanti ca | ādāya ratnadaṇḍāni cāmarāṇi nahādyutiḥ

वायु ने चन्द्र-किरणों-सी श्वेत, लम्बी, कान्तिमान चामरें रत्न-दण्डों सहित लाईं।

श्लोक 21 (skanda.8.164.21)

वैवस्वतोपि संपूर्णशरच्चन्द्रांशुनिर्मलम् । प्रोद्वहन् वक्षसा हारमाजगाम तदन्तिकम्

vaivasvatopi saṁpūrṇaśaraccandrāṁśunirmalam | prodvahan vakṣasā hāramājagāma tadantikam

यम (वैवस्वत) शरद्-चन्द्रमा की किरणों-सी निर्मल, पूर्ण एक माला वक्ष पर धारण किए उनके निकट आए।

श्लोक 22 (skanda.8.164.22)

आतपत्रापदेशेन ददौ तस्मै महात्मने । फलं सुराधिपत्यस्य समग्रमिव वासवः

ātapatrāpadeśena dadau tasmai mahātmane | phalaṁ surādhipatyasya samagramiva vāsavaḥ

इन्द्र (वासव) ने उस महात्मा को छत्र के बहाने मानो अपने सम्पूर्ण साम्राज्य का फल ही अर्पित कर दिया।

श्लोक 23 (skanda.8.164.23)

भूषयन्तस्तरूँस्तत्र खपुष्पानेकरोद्गमैः । ऋतवस्तं तदा देशमाजग्मुस्तुष्टचेतसः

bhūṣayantastarūṁstatra khapuṣpānekarodgamaiḥ | ṛtavastaṁ tadā deśamājagmustuṣṭacetasaḥ

प्रसन्नचित्त ऋतुएँ भी वहाँ आ पहुँचीं, वृक्षों को अनेक प्रकार के दिव्य पुष्पों से सजाती हुईं।

श्लोक 24 (skanda.8.164.24)

अरुन्धती शची स्वाहा सिनीवाली गिरीन्द्रजा । अदितिर्देवमाता च निशा सानुमतिः कुहूः

arundhatī śacī svāhā sinīvālī girīndrajā | aditirdevamātā ca niśā sānumatiḥ kuhūḥ

अरुन्धती, शची, स्वाहा, सिनीवाली, गिरिराज-पुत्री (पार्वती), देवमाता अदिति, निशा, सानुमती और कुहू -

श्लोक 25 (skanda.8.164.25)

ह्रीः श्रीः पुष्टिर्दिशो द्यौश्च सुताः सर्वाः प्रजापतेः । राका च धिषणा चैव सुरभिर्देवयोषितः

hrīḥ śrīḥ puṣṭirdiśo dyauśca sutāḥ sarvāḥ prajāpateḥ | rākā ca dhiṣaṇā caiva surabhirdevayoṣitaḥ

ह्री, श्री, पुष्टि, दिशाएँ और द्यौ - प्रजापति की ये सभी पुत्रियाँ - तथा राका, धिषणा और देव-पत्नी सुरभि,

श्लोक 26 (skanda.8.164.26)

ओषध्यो मूत्तिमत्यश्च कौशिको वनदेवता । अहः काष्ठा मुहूर्ताश्च मासाः संवत्सरः कलाः

oṣadhyo mūttimatyaśca kauśiko vanadevatā | ahaḥ kāṣṭhā muhūrtāśca māsāḥ saṁvatsaraḥ kalāḥ

मूर्तिमती औषधियाँ, वन-देवता कौशिकी, तथा दिन, काष्ठा, मुहूर्त, मास, संवत्सर और कला (काल के विभाग) -

श्लोक 27 (skanda.8.164.27)

ऐरावणः सुप्रतीको वामनः कुमुदोञ्जनः । पुष्पदन्तो महापद्मः सार्वभौमश्च दिग्गजाः । आभिषेचनिकं सर्वमुपनिन्युर्महात्मनः

airāvaṇaḥ supratīko vāmanaḥ kumudoñjanaḥ | puṣpadanto mahāpadmaḥ sārvabhaumaśca diggajāḥ | ābhiṣecanikaṁ sarvamupaninyurmahātmanaḥ

और दिग्गज ऐरावत, सुप्रतीक, वामन, कुमुद, अंजन, पुष्पदन्त, महापद्म तथा सार्वभौम - इन सबने उस महात्मा के अभिषेक की सम्पूर्ण सामग्री वहाँ पहुँचाई।

श्लोक 28 (skanda.8.164.28)

ज्वलितवह्निसमानरुचो जटाः परिनियम्य हिमाचलवासिनः । तमभिजग्मुरुदीर्णतपोबला मुनिवरा मुदिता दहनात्मजम्

jvalitavahnisamānaruco jaṭāḥ pariniyamya himācalavāsinaḥ | tamabhijagmurudīrṇatapobalā munivarā muditā dahanātmajam

अग्नि की ज्वाला के समान तेजस्वी, अपनी जटाओं को संवारे हुए हिमालय-निवासी श्रेष्ठ मुनिगण, उग्र तपोबल से युक्त, हर्षित होकर अग्निपुत्र (स्कन्द) के पास पहुँचे।

श्लोक 29 (skanda.8.164.29)

विबुधसद्मरता ज्वलितौजसस्त्रिदशवन्दितपादसरोरुहाः । ऋषिगणास्त्वरिताभिययुर्गुहं नियमितोर्जितनित्यतपःक्रियाः

vibudhasadmaratā jvalitaujasastridaśavanditapādasaroruhāḥ | ṛṣigaṇāstvaritābhiyayurguhaṁ niyamitorjitanityatapaḥkriyāḥ

देवलोक में निवास करने वाले, तेजस्वी, देवताओं द्वारा जिनके चरण-कमल वन्दित हैं, ऐसे ऋषिगण, अपने नियमित उग्र नित्य तप में स्थित रहते हुए भी, शीघ्रता से गुह (स्कन्द) के पास पहुँचे।

श्लोक 30 (skanda.8.164.30)

समुदिता मुदितोत्सुकमानसाः कमलयोनिसुताश्च महौजसः । तमभिजग्मुरुदारयशोभृतस्त्रिनयनात्मजमग्र्यबलोदयम्

samuditā muditotsukamānasāḥ kamalayonisutāśca mahaujasaḥ | tamabhijagmurudārayaśobhṛtastrinayanātmajamagryabalodayam

कमल-योनि (ब्रह्मा) के महातेजस्वी पुत्र, हर्षित और उत्सुक चित्त से एकत्र होकर, उदार यशस्वी त्रिनयन (शिव) के उस पुत्र के पास पहुँचे, जिसका बल अभी उदित हुआ था।

श्लोक 31 (skanda.8.164.31)

अभिययुस्त्वरिता भुजगेश्वराः स्वफणिरत्नमरीचिवितानिनः । विषभृतोप्यतिसौम्यवपुर्धरा दहनसूनुमलंघ्यपराक्रमम्

abhiyayustvaritā bhujageśvarāḥ svaphaṇiratnamarīcivitāninaḥ | viṣabhṛtopyatisaumyavapurdharā dahanasūnumalaṁghyaparākramam

अपनी फणों के रत्नों की किरणों का चंदोवा फैलाए सर्पराज शीघ्रता से वहाँ पहुँचे - विष धारण करने वाले होते हुए भी अत्यन्त सौम्य शरीर वाले - अग्निपुत्र के पास, जिसका पराक्रम अलंघनीय था।

श्लोक 32 (skanda.8.164.32)

उपययुर्गरुडाश्च विमत्सरा भुजगराजसुरूढबलोदयाः । द्रुततरं तरुणार्कसमद्युतिं पवनवेगविजिह्मितपादपाः

upayayurgaruḍāśca vimatsarā bhujagarājasurūḍhabalodayāḥ | drutataraṁ taruṇārkasamadyutiṁ pavanavegavijihmitapādapāḥ

ईर्ष्या-रहित गरुड़गण भी, सर्पराज के समान बलशाली, तरुण सूर्य के समान कान्तिमान, पवन-वेग से पंख फड़फड़ाते हुए, अत्यन्त द्रुत गति से वहाँ आए।

श्लोक 33 (skanda.8.164.33)

ननृतुरायतलोलविलोचना विविधभावविलासरसान्विताः । परमयौवनरूपगुणान्विताः प्रमुदिताः परितोप्सरसोलसाः

nanṛturāyatalolavilocanā vividhabhāvavilāsarasānvitāḥ | paramayauvanarūpaguṇānvitāḥ pramuditāḥ paritopsarasolasāḥ

विशाल, चंचल नेत्रों वाली, विविध भाव-विलास के रस से युक्त, परम यौवन-रूप-गुणों से सम्पन्न अप्सराएँ हर्षित होकर चारों ओर नृत्य करने लगीं।

श्लोक 34 (skanda.8.164.34)

विविधपुष्परजोरुणमूर्त्तयः सुरभिगन्धवहा विववुस्तदा । विरजसोतितरां मृदुवृत्तयो विबुधचित्तसुखाश्च समीरणाः

vividhapuṣparajoruṇamūrttayaḥ surabhigandhavahā vivavustadā | virajasotitarāṁ mṛduvṛttayo vibudhacittasukhāśca samīraṇāḥ

विविध पुष्पों की लाल पराग-कणों वाली, सुगन्ध ढोती हुई, अत्यन्त कोमल-गति वाली, रज-रहित वायुएँ तब देवताओं के मन को सुख देने लगीं।

श्लोक 35 (skanda.8.164.35)

आभिषेचनिकं कृत्स्नं विधिं तस्य बृहस्पतिः । समिद्ध्य ज्वलनं सम्यक् चचार शरजन्मनः

ābhiṣecanikaṁ kṛtsnaṁ vidhiṁ tasya bṛhaspatiḥ | samiddhya jvalanaṁ samyak cacāra śarajanmanaḥ

बृहस्पति ने अग्निपुत्र के सम्पूर्ण अभिषेक-विधि का सम्यक् संचालन किया, यज्ञाग्नि को भलीभाँति प्रज्वलित करते हुए।

श्लोक 36 (skanda.8.164.36)

आशीर्भिराशिषां धाम समाश्लिष्य शिवात्मजम् । स्तुत्यं स्तुतिभिरग्र्याभिस्तुष्टुवुर्मुनयस्तदा

āśīrbhirāśiṣāṁ dhāma samāśliṣya śivātmajam | stutyaṁ stutibhiragryābhistuṣṭuvurmunayastadā

मुनिजन आशीर्वादों के धाम शिवपुत्र को आशीषों से आलिंगन कर, श्रेष्ठ स्तुतियों से उनकी स्तुति करने लगे, जो स्वयं स्तुति के योग्य थे।

श्लोक 37 (skanda.8.164.37)

मङ्गलानि जगुस्तस्य गन्धर्वा नारदश्च यः । प्रतिसार्य तदा वीणां तारं रक्तमनाकुलम्

maṅgalāni jagustasya gandharvā nāradaśca yaḥ | pratisārya tadā vīṇāṁ tāraṁ raktamanākulam

गन्धर्व और नारद, वीणा के तारों को स्पष्ट, मधुर और अव्याकुल स्वर में साधकर, उनके मंगल-गीत गाने लगे।

श्लोक 38 (skanda.8.164.38)

अथ तं दक्षिणे पाणौ गृहीत्वा कृतमङ्गलम् । गुरुः सिंहासने तस्मिन् प्राङ्मुखं संन्यवेशयत्

atha taṁ dakṣiṇe pāṇau gṛhītvā kṛtamaṅgalam | guruḥ siṁhāsane tasmin prāṅmukhaṁ saṁnyaveśayat

तब गुरु (बृहस्पति) ने मंगल-कृत्य सम्पन्न कर उन्हें दाहिने हाथ से पकड़कर उस सिंहासन पर पूर्वाभिमुख बिठा दिया।

श्लोक 39 (skanda.8.164.39)

अनाहतास्तदा व्योम्नि नेदुरुच्चैर्दिवौकसाम् । भृशं दुन्दुभयश्चित्राः सम्यक् चेतोपहारिणः

anāhatāstadā vyomni neduruccairdivaukasām | bhṛśaṁ dundubhayaścitrāḥ samyak cetopahāriṇaḥ

उसी क्षण आकाश में देवताओं के अनाहत (स्वतः बजने वाले), मन को हरने वाले, विचित्र दुन्दुभि-नाद ऊँचे स्वर में तीव्रता से गूँज उठे।

श्लोक 40 (skanda.8.164.40)

मत्तद्विरेफसंगीताः स्वकिञ्जल्कारुणत्विषः । पुण्यगन्धा विचित्राश्च निपेतुः पुष्पवृष्टयः

mattadvirephasaṁgītāḥ svakiñjalkāruṇatviṣaḥ | puṇyagandhā vicitrāśca nipetuḥ puṣpavṛṣṭayaḥ

मत्त भ्रमरों के गुंजार से युक्त, अपने पराग से लाल, पवित्र सुगन्ध वाली, विचित्र पुष्प-वर्षा वहाँ बरसने लगी।

श्लोक 41 (skanda.8.164.41)

चतुर्भिर्वदनैः स्कन्दं स्तुवन् गीर्भिः प्रजापतिः । आददे कलशं पूर्वं पूर्णं पुण्येन वारिणा

caturbhirvadanaiḥ skandaṁ stuvan gīrbhiḥ prajāpatiḥ | ādade kalaśaṁ pūrvaṁ pūrṇaṁ puṇyena vāriṇā

चतुर्मुख ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों से स्कन्द की स्तुति करते हुए, पवित्र जल से भरा प्रथम कलश ग्रहण किया।

श्लोक 42 (skanda.8.164.42)

समाधायाम्बरं पीतं ततो विष्णुः समाददे । कलशं कौस्तुभमणेः परामृष्टं गभस्तिभिः

samādhāyāmbaraṁ pītaṁ tato viṣṇuḥ samādade | kalaśaṁ kaustubhamaṇeḥ parāmṛṣṭaṁ gabhastibhiḥ

तब विष्णु ने पीत वस्त्र धारण कर, कौस्तुभ मणि की किरणों से स्पर्शित कलश ग्रहण किया।

श्लोक 43 (skanda.8.164.43)

ततः केयूररत्नांशुखचितं पाकशासनः । उत्तरीयं नियम्याशु जग्राह कलशं तदा

tataḥ keyūraratnāṁśukhacitaṁ pākaśāsanaḥ | uttarīyaṁ niyamyāśu jagrāha kalaśaṁ tadā

फिर इन्द्र (पाकशासन) ने केयूर-रत्नों की किरणों से जटित उत्तरीय शीघ्र बाँधकर वह कलश ग्रहण किया।

श्लोक 44 (skanda.8.164.44)

निबध्य शशिलेखाङ्का जटा ज्वलनपिङ्गलाः । जगृहुः कलशान् रुद्रा भुजङ्गकृतकङ्कणाः

nibadhya śaśilekhāṅkā jaṭā jvalanapiṅgalāḥ | jagṛhuḥ kalaśān rudrā bhujaṅgakṛtakaṅkaṇāḥ

चन्द्र-रेखा से चिह्नित, अग्नि के समान पिंगल जटाओं को बाँधकर, सर्प-कंकणधारी रुद्रगण ने कलश ग्रहण किए।

श्लोक 45 (skanda.8.164.45)

बिभ्रतोपि परां दीप्तिं सुखसंस्पर्शमूर्त्तयः । आदित्या जगृहुः पूर्णान् कलशान् पुण्यवारिभिः

bibhratopi parāṁ dīptiṁ sukhasaṁsparśamūrttayaḥ | ādityā jagṛhuḥ pūrṇān kalaśān puṇyavāribhiḥ

परम कान्ति धारण करते हुए, सुखद स्पर्श वाले शरीर धारण करने वाले आदित्यगणों ने पवित्र जल से भरे कलश ग्रहण किए।

श्लोक 46 (skanda.8.164.46)

वसवोपि सुरेन्द्रारिगजदन्तक्षतोरसः । आददुः कलशाँस्तत्र पूर्णान् पुण्येन वारिणा

vasavopi surendrārigajadantakṣatorasaḥ | ādaduḥ kalaśāṁstatra pūrṇān puṇyena vāriṇā

इन्द्र के शत्रु-गजों के दाँतों से घायल वक्षस्थल वाले वसुगण ने भी वहाँ पवित्र जल से भरे कलश ग्रहण किए।

श्लोक 47 (skanda.8.164.47)

अश्विनावपि पुण्याभिः पूर्णावद्भिः सुसंस्कृतौ । आददाते तदा कुम्भौ हैमौ रत्नांशुमालिनौ

aśvināvapi puṇyābhiḥ pūrṇāvadbhiḥ susaṁskṛtau | ādadāte tadā kumbhau haimau ratnāṁśumālinau

दोनों अश्विनीकुमारों ने भी सुसज्जित, पवित्र जल से पूर्ण, स्वर्णमय, रत्न-किरणों वाले दो कलश ग्रहण किए।

श्लोक 48 (skanda.8.164.48)

कुम्भानाददिरे तत्र ज्वलना ज्वलितत्विषः । हैमाम्बुरुहसंछन्नान् चित्रान् रत्नगभस्तिभिः

kumbhānādadire tatra jvalanā jvalitatviṣaḥ | haimāmburuhasaṁchannān citrān ratnagabhastibhiḥ

प्रज्वलित अग्नियों ने वहाँ रत्न-किरणों से युक्त, स्वर्ण-कमलों से आच्छादित विचित्र कलश ग्रहण किए।

श्लोक 49 (skanda.8.164.49)

नागगन्धर्वराजानो लोकपाला मरुद्गणाः । ऋषयो बालखिल्याश्च पितरः पतगेश्वराः

nāgagandharvarājāno lokapālā marudgaṇāḥ | ṛṣayo bālakhilyāśca pitaraḥ patageśvarāḥ

नाग और गन्धर्वों के राजा, लोकपाल, मरुद्गण, ऋषिगण, बालखिल्यगण, पितरगण और पक्षिराज (गरुड़ आदि) -

श्लोक 50 (skanda.8.164.50)

धर्मो धाता विधाता च कालो मृत्युर्वसुन्धरा । सन्ध्या कान्तिर्धृतिर्मेधा कीर्तिर्लक्ष्मीः सरस्वती

dharmo dhātā vidhātā ca kālo mṛtyurvasundharā | sandhyā kāntirdhṛtirmedhā kīrtirlakṣmīḥ sarasvatī

धर्म, धाता, विधाता, काल, मृत्यु, वसुन्धरा, सन्ध्या, कान्ति, धृति, मेधा, कीर्ति, लक्ष्मी और सरस्वती -

श्लोक 51 (skanda.8.164.51)

समुद्रास्सरितो वेदास्तीर्थानि गिरयो ग्रहाः । कुम्भानाददिरे तत्र पूर्णान् परमवारिणा

samudrāssarito vedāstīrthāni girayo grahāḥ | kumbhānādadire tatra pūrṇān paramavāriṇā

तथा समुद्र, नदियाँ, वेद, तीर्थ, पर्वत और ग्रह - इन सबने भी वहाँ परम जल से भरे पूर्ण कलश ग्रहण किए।

श्लोक 52 (skanda.8.164.52)

अथ ते हृष्टमनसः प्रहृष्टं पावकात्मजम् । अभ्यषिञ्चन् तदा सर्वे सेनापत्ये महौजसम्

atha te hṛṣṭamanasaḥ prahṛṣṭaṁ pāvakātmajam | abhyaṣiñcan tadā sarve senāpatye mahaujasam

तब वे सब हर्षित मन से, अत्यन्त तेजस्वी, प्रफुल्लित अग्निपुत्र (स्कन्द) का सेनापति-पद पर अभिषेक करने लगे।

श्लोक 53 (skanda.8.164.53)

जयशब्दं ततश्चक्रुः समं सर्वे दिवौकसः । जयिनः शर्वपुत्रस्य ऋषयश्च समागताः

jayaśabdaṁ tataścakruḥ samaṁ sarve divaukasaḥ | jayinaḥ śarvaputrasya ṛṣayaśca samāgatāḥ

सभी देवताओं ने एक साथ जय-जयकार किया, और वहाँ एकत्र ऋषिगण भी शिवपुत्र की विजय की घोषणा करने लगे।

श्लोक 54 (skanda.8.164.54)

जग्राह मघवा तस्य श्वेतमातपवारणम् । सर्वरत्नप्रभाव्रातवितानपरिवेषवत्

jagrāha maghavā tasya śvetamātapavāraṇam | sarvaratnaprabhāvrātavitānapariveṣavat

इन्द्र (मघवा) ने उनके लिए वह श्वेत छत्र ग्रहण किया, जो सभी रत्नों की प्रभा-समूह के मण्डल से घिरा हुआ था।

श्लोक 55 (skanda.8.164.55)

दुधुवुश्चामरैर्दीर्घैः शरच्चन्द्रांशुनिर्मलैः । परितो रत्नदण्डैश्च लोकपाला महाद्युतिम्

dudhuvuścāmarairdīrghaiḥ śaraccandrāṁśunirmalaiḥ | parito ratnadaṇḍaiśca lokapālā mahādyutim

लोकपालों ने शरद्-चन्द्र की किरणों-सी निर्मल, रत्न-दण्डों वाली लम्बी चामरें उस महातेजस्वी के चारों ओर हिलाईं।

श्लोक 56 (skanda.8.164.56)

अमृतादुत्थितं दिव्यमुपनीतं प्रचेतसा । मौलिमारोपयाञ्चक्रे सुतस्य हिमवत्सुता

amṛtādutthitaṁ divyamupanītaṁ pracetasā | maulimāropayāñcakre sutasya himavatsutā

हिमवत्-पुत्री (पार्वती) ने अमृत से उत्पन्न, वरुण (प्रचेता) द्वारा लाए गए उस दिव्य मुकुट को अपने पुत्र के मस्तक पर धारण कराया।

श्लोक 57 (skanda.8.164.57)

हेमावदाते विस्तीर्णे शशाङ्ककिरणद्युतिम् । तस्य वक्षःस्थले हारं बबन्ध सरितां वरा

hemāvadāte vistīrṇe śaśāṅkakiraṇadyutim | tasya vakṣaḥsthale hāraṁ babandha saritāṁ varā

श्रेष्ठ नदी (गंगा) ने उस विस्तीर्ण, स्वर्ण के समान गौर, चन्द्र-किरणों की कान्ति वाले हार को उनके वक्षस्थल पर बाँध दिया।

श्लोक 58 (skanda.8.164.58)

हारेणालंकृतं वक्षः किन्नु हारो गुहोरसा । इति तत्र वितर्कोभूत्तदा विबुधसंसदि

hāreṇālaṁkṛtaṁ vakṣaḥ kinnu hāro guhorasā | iti tatra vitarkobhūttadā vibudhasaṁsadi

"क्या यह वक्षस्थल हार से सुशोभित है, या हार ही गुह के वक्षस्थल से सुशोभित है?" - देवताओं की सभा में उस समय ऐसा विचार-विमर्श होने लगा।

श्लोक 59 (skanda.8.164.59)

आबबन्ध महाबाहोरङ्गदानि स्वलंकृता । भुजेषु पारणालानस्तम्भपीनेष्वरुन्धर्ता

ābabandha mahābāhoraṅgadāni svalaṁkṛtā | bhujeṣu pāraṇālānastambhapīneṣvarundhartā

उस महाबाहु की भुजाओं पर, हाथी बाँधने के दृढ़ स्तम्भों के समान पुष्ट भुजाओं पर, सुन्दर अंगद बाँधे गए।

श्लोक 60 (skanda.8.164.60)

दीप्तिमान् पावकसुतस्तदाभूद्दीप्तिमत्तरः । सर्पिषा हूयमानेन ज्वलितोग्निरिवाध्वरे

dīptimān pāvakasutastadābhūddīptimattaraḥ | sarpiṣā hūyamānena jvalitognirivādhvare

तेजस्वी अग्निपुत्र उस समय और भी अधिक तेजस्वी हो उठे, मानो यज्ञ में घृत की आहुति से प्रज्वलित अग्नि हो।

श्लोक 61 (skanda.8.164.61)

ददौ तस्मै चतुर्वक्त्रः प्रभुः प्रीतो महात्मने । महापारिषदान् शूरान् बलिनः कामरूपिणः

dadau tasmai caturvaktraḥ prabhuḥ prīto mahātmane | mahāpāriṣadān śūrān balinaḥ kāmarūpiṇaḥ

प्रसन्नचित्त चतुर्मुख प्रभु (ब्रह्मा) ने उस महात्मा को इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, बलवान, वीर महापारिषद (मुख्य अनुचर) प्रदान किए -

श्लोक 62 (skanda.8.164.62)

घण्टाकर्णं सुरक्ताक्षं नन्दिषेणं च दुर्जयम् । चतुर्थं बलिनां श्रेष्ठं ख्यातं कुमुदमालिनम्

ghaṇṭākarṇaṁ suraktākṣaṁ nandiṣeṇaṁ ca durjayam | caturthaṁ balināṁ śreṣṭhaṁ khyātaṁ kumudamālinam

लाल आँखों वाले घण्टाकर्ण, अजेय नन्दिषेण, और चौथे बलवानों में श्रेष्ठ, विख्यात कुमुदमालिन को।

श्लोक 63 (skanda.8.164.63)

ददौ स्थाणुर्महावीर्यं महापारिषदं क्रतुम् । संप्रवृत्ते तदा घोरे संग्रामे तारकामये

dadau sthāṇurmahāvīryaṁ mahāpāriṣadaṁ kratum | saṁpravṛtte tadā ghore saṁgrāme tārakāmaye

स्थाणु (शिव) ने महापराक्रमी क्रतु नामक महापारिषद प्रदान किया, जो घोर तारक-संग्राम में -

श्लोक 64 (skanda.8.164.64)

क्रुद्धो जघान दैत्यानां योयुतानि चतुर्दश । विबुधाश्च ददुस्तस्मै सेनां नैर्ऋतसंकुलाम्

kruddho jaghāna daityānāṁ yoyutāni caturdaśa | vibudhāśca dadustasmai senāṁ nairṛtasaṁkulām

क्रोधित होकर दैत्यों के चौदह अयुत (एक लाख चालीस हजार) सैनिकों का वध कर डालेगा; और देवताओं ने भी उन्हें राक्षसों से भरी हुई सेना प्रदान की।

श्लोक 65 (skanda.8.164.65)

दैत्ययक्षक्षयकरीमजेयां विश्वरूपिणीम् । ददौ वैवस्वतस्तस्मै महापारिषदावुभौ

daityayakṣakṣayakarīmajeyāṁ viśvarūpiṇīm | dadau vaivasvatastasmai mahāpāriṣadāvubhau

यम (वैवस्वत) ने दैत्यों और यक्षों का नाश करने वाली, अजेय, विश्वरूपिणी सेना के साथ दो महापारिषद उन्हें प्रदान किए।

श्लोक 66 (skanda.8.164.66)

उन्माथञ्च प्रमाथञ्च महावीर्यपराक्रमौ । सुभ्राजं भास्वरञ्चैव ददौ सूर्योनुयायिनौ

unmāthañca pramāthañca mahāvīryaparākramau | subhrājaṁ bhāsvarañcaiva dadau sūryonuyāyinau

सूर्य ने उन्मथ और प्रमथ नामक दो महापराक्रमी अनुचर कार्तिकेय को प्रसन्न होकर प्रदान किए, तथा सुभ्राज और भास्वर भी।

श्लोक 67 (skanda.8.164.67)

कार्त्तिकेयाय संहृष्टो रणे परमदुर्जयौ । कैलासशिखराकारौ श्वेतस्रगनुलेपनौ

kārttikeyāya saṁhṛṣṭo raṇe paramadurjayau | kailāsaśikharākārau śvetasraganulepanau

वे युद्ध में अत्यन्त अजेय, कैलास-शिखर के समान आकार वाले, श्वेत माला और अनुलेपन से सुशोभित थे।

श्लोक 68 (skanda.8.164.68)

चन्द्रमापि ददौ तस्मै मणिं सुमणिमेव च । ज्वालाजिह्वं तथा ज्योतिमात्मजाय विभावसुः

candramāpi dadau tasmai maṇiṁ sumaṇimeva ca | jvālājihvaṁ tathā jyotimātmajāya vibhāvasuḥ

चन्द्रमा ने भी उन्हें मणि और सुमणि नामक दो अनुचर प्रदान किए; और अग्नि (विभावसु) ने अपने ही तेजस्वी पुत्र को ज्वालाजिह्व नामक अनुचर प्रदान किया।

श्लोक 69 (skanda.8.164.69)

ददौ परमसंप्रीतः शत्रुसैन्यनिबर्हणौ । परिघं पटहं भीमं दहातिदहनौ तथा

dadau paramasaṁprītaḥ śatrusainyanibarhaṇau | parighaṁ paṭahaṁ bhīmaṁ dahātidahanau tathā

उसने अत्यन्त प्रसन्न होकर शत्रु-सेना का नाश करने वाले परिघ और भीषण पटह, तथा दहाति और दहन नामक दो अनुचर भी प्रदान किए।

श्लोक 70 (skanda.8.164.70)

अंशोप्यनुचरान् पञ्च ददौ स्कन्दाय धीमते । उत्क्रोशं सत्वरञ्चैव वज्रदण्डधरावुभौ

aṁśopyanucarān pañca dadau skandāya dhīmate | utkrośaṁ satvarañcaiva vajradaṇḍadharāvubhau

अंश ने भी बुद्धिमान स्कन्द को वज्र-दण्ड धारण करने वाले उत्क्रोश और सत्वर नामक अनुचर प्रदान किए।

श्लोक 71 (skanda.8.164.71)

सुताय देवदेवस्य ददौ प्रीतः शतक्रतुः । चक्रं विक्रमकञ्चैव संक्रमञ्चातिदुर्जयम्

sutāya devadevasya dadau prītaḥ śatakratuḥ | cakraṁ vikramakañcaiva saṁkramañcātidurjayam

देवताओं के स्वामी शतक्रतु (इन्द्र) ने प्रसन्न होकर अपने पुत्र (स्कन्द) को चक्र, विक्रमक और अत्यन्त दुर्जय संक्रम नामक अनुचर प्रदान किए।

श्लोक 72 (skanda.8.164.72)

ददौ ज्वलनपुत्राय विष्णुः प्रीतो महायशाः । वर्द्धनं नन्दनञ्चैव सर्वविद्यान्तगावुभौ

dadau jvalanaputrāya viṣṇuḥ prīto mahāyaśāḥ | varddhanaṁ nandanañcaiva sarvavidyāntagāvubhau

महायशस्वी विष्णु ने प्रसन्न होकर अग्निपुत्र को वर्धन और नन्दन नामक दो अनुचर प्रदान किए, जो सम्पूर्ण विद्याओं में पारंगत थे।

श्लोक 73 (skanda.8.164.73)

स्कन्दाय ददतुः प्रीतावश्विनौ च महाबलौ । कुन्दरं कुमुदं चोग्रं कुमुदञ्च महाबलम्

skandāya dadatuḥ prītāvaśvinau ca mahābalau | kundaraṁ kumudaṁ cograṁ kumudañca mahābalam

दोनों महाबली अश्विनीकुमारों ने भी प्रसन्न होकर स्कन्द को कुन्दर, कुमुद, उग्र और महाबली कुमुद नामक अनुचर प्रदान किए।

श्लोक 74 (skanda.8.164.74)

डम्बराडम्बरौ चौभौ ददौ धाताग्निसूनवे । वक्रानुवक्रौ बलिनौ मेषास्यौ दुर्जयौ रणे

ḍambarāḍambarau caubhau dadau dhātāgnisūnave | vakrānuvakrau balinau meṣāsyau durjayau raṇe

धाता ने अग्निपुत्र को डम्बर और अडम्बर नामक दोनों, तथा बलवान, युद्ध में दुर्जय मेषमुख वक्र और अनुवक्र भी प्रदान किए।

श्लोक 75 (skanda.8.164.75)

ददौ त्वष्टा महामायौ स्कन्दायानुचरावुभौ । सुव्रतं सत्यसन्धञ्च ददौ मित्रो महात्मने

dadau tvaṣṭā mahāmāyau skandāyānucarāvubhau | suvrataṁ satyasandhañca dadau mitro mahātmane

त्वष्टा ने स्कन्द को महामाया-सम्पन्न दो अनुचर प्रदान किए; और मित्र ने उस महात्मा को सुव्रत और सत्यसन्ध नामक अनुचर प्रदान किए।

श्लोक 76 (skanda.8.164.76)

सुप्रभञ्च महामायं शुभकर्माणमेव च । प्रादाद्विधाता स्कन्दाय शत्रुपक्षनिषूदनौ

suprabhañca mahāmāyaṁ śubhakarmāṇameva ca | prādādvidhātā skandāya śatrupakṣaniṣūdanau

विधाता ने शत्रु-पक्ष का नाश करने वाले सुप्रभ, महामाय और शुभकर्मा नामक अनुचर स्कन्द को प्रदान किए।

श्लोक 77 (skanda.8.164.77)

पालिन्तकं महावीर्यं कालकञ्च महाबलम् । ददौ पारिषदौ पूषा स्कन्दायामिततेजसे

pālintakaṁ mahāvīryaṁ kālakañca mahābalam | dadau pāriṣadau pūṣā skandāyāmitatejase

पूषा ने अमित तेजस्वी स्कन्द को महापराक्रमी पालिन्तक और महाबली कालक नामक अनुचर प्रदान किए।

श्लोक 78 (skanda.8.164.78)

बलञ्चातिबलञ्चैव महाकायौ महाबलौ । प्रददौ कार्त्तिकेयाय वायुः प्रीतो महात्मने

balañcātibalañcaiva mahākāyau mahābalau | pradadau kārttikeyāya vāyuḥ prīto mahātmane

प्रसन्नचित्त वायु ने महात्मा कार्तिकेय को विशालकाय, महाबली बल और अतिबल नामक अनुचर प्रदान किए।

श्लोक 79 (skanda.8.164.79)

घसञ्च प्रघसञ्चैव तिमिवक्त्रौ महोदरौ । ददौ ज्वलनपुत्राय वरुणः पाशधारिणौ

ghasañca praghasañcaiva timivaktrau mahodarau | dadau jvalanaputrāya varuṇaḥ pāśadhāriṇau

वरुण ने अग्निपुत्र को पाश धारण करने वाले, मत्स्य-मुख, विशाल उदर वाले घस और प्रघस नामक अनुचर प्रदान किए।

श्लोक 80 (skanda.8.164.80)

सुवर्चसं महावीर्यं तथा चाप्यतिवर्चसम् । हिमवान् प्रददौ तस्मै स्कन्दायातिबलावुभौ

suvarcasaṁ mahāvīryaṁ tathā cāpyativarcasam | himavān pradadau tasmai skandāyātibalāvubhau

हिमवान् ने अत्यन्त बलवान स्कन्द को महापराक्रमी सुवर्चस और अतिवर्चस नामक अनुचर प्रदान किए।

श्लोक 81 (skanda.8.164.81)

काञ्चनञ्च महामायं तथा जीमूतमालिनम् । ददावनुचरौ मेरुरुभौ ज्वलनसूनवे

kāñcanañca mahāmāyaṁ tathā jīmūtamālinam | dadāvanucarau merurubhau jvalanasūnave

मेरु ने अग्निपुत्र को महामायाधारी काञ्चन और जीमूतमालिन नामक दो अनुचर प्रदान किए।

श्लोक 82 (skanda.8.164.82)

स्थिरञ्चातिस्थिरञ्चैव तथा परिषदावुभौ । पुनर्ददौ महामेरुः स्कन्दायामिततेजसे

sthirañcātisthirañcaiva tathā pariṣadāvubhau | punardadau mahāmeruḥ skandāyāmitatejase

महामेरु ने पुनः अमित तेजस्वी स्कन्द को स्थिर और अतिस्थिर नामक दो अनुचर प्रदान किए।

श्लोक 83 (skanda.8.164.83)

उच्छृङ्गं च विशृङ्गं च शिलापाषाणयोधिनौ । प्रादाद्विन्ध्यो महासत्वौ स्कन्दाय ज्वलितौजसे

ucchṛṅgaṁ ca viśṛṅgaṁ ca śilāpāṣāṇayodhinau | prādādvindhyo mahāsatvau skandāya jvalitaujase

विन्ध्य ने प्रज्वलित तेजस्वी स्कन्द को शिला और पत्थरों से युद्ध करने वाले महाबली उच्छृंग और विशृंग नामक अनुचर प्रदान किए।

श्लोक 84 (skanda.8.164.84)

संग्रहं विग्रहं चैव समुद्रश्च गदाधरौ । प्रददौ कार्त्तिकेयाय महापारिषदौ तदा

saṁgrahaṁ vigrahaṁ caiva samudraśca gadādharau | pradadau kārttikeyāya mahāpāriṣadau tadā

तब समुद्र ने कार्तिकेय को गदाधारी संग्रह और विग्रह नामक दो महापारिषद प्रदान किए।

श्लोक 85 (skanda.8.164.85)

उन्मादं पुष्पदन्तं च शङकुकर्णञ्च दुर्जयम् । महावीर्यान्महासत्वान् प्रादात् पुत्राय पार्वती

unmādaṁ puṣpadantaṁ ca śaṅakukarṇañca durjayam | mahāvīryānmahāsatvān prādāt putrāya pārvatī

पार्वती ने अपने पुत्र को उन्माद, पुष्पदन्त और अजेय शंकुकर्ण नामक महापराक्रमी, महाबली अनुचर प्रदान किए।

श्लोक 86 (skanda.8.164.86)

जयं महाजयं चैव ददुर्नागा महात्मने । ददौ च परमप्रीतः स्कन्दाय वृषवाहनः

jayaṁ mahājayaṁ caiva dadurnāgā mahātmane | dadau ca paramaprītaḥ skandāya vṛṣavāhanaḥ

नागों ने उस महात्मा को जय और महाजय नामक अनुचर प्रदान किए; और वृषभवाहन (शिव) ने भी अत्यन्त प्रसन्न होकर स्कन्द को प्रदान किए -

श्लोक 87 (skanda.8.164.87)

बहून्पारिषदाञ्छूरान् समरे दुर्जयान्परैः । गजकर्णं निकुम्भञ्च पद्मं कुमुदमेव च

bahūnpāriṣadāñchūrān samare durjayānparaiḥ | gajakarṇaṁ nikumbhañca padmaṁ kumudameva ca

युद्ध में शत्रुओं के लिए दुर्जेय, अनेक वीर पारिषदों को - गजकर्ण, निकुम्भ, पद्म और कुमुद को,

श्लोक 88 (skanda.8.164.88)

सनन्दं द्वादशभुजं तथा कृष्णोपकृष्णकौ । कृतग्रीवं कपिस्कन्धं काञ्चनाक्षं जलन्धमम्

sanandaṁ dvādaśabhujaṁ tathā kṛṣṇopakṛṣṇakau | kṛtagrīvaṁ kapiskandhaṁ kāñcanākṣaṁ jalandhamam

सनन्द, द्वादशभुज, कृष्ण और उपकृष्णक, कृतग्रीव, कपिस्कन्ध, काञ्चनाक्ष और जलन्धम को,

श्लोक 89 (skanda.8.164.89)

अक्षिसन्तर्दनं कुण्ठं पार्श्वग्रीवं महोदरम् । एकाक्षं द्वादशभुजमेकपादं महाजटम्

akṣisantardanaṁ kuṇṭhaṁ pārśvagrīvaṁ mahodaram | ekākṣaṁ dvādaśabhujamekapādaṁ mahājaṭam

अक्षिसन्तर्दन, कुण्ठ, पार्श्वग्रीव, महोदर, एकाक्ष, द्वादशभुज, एकपाद और महाजट को,

श्लोक 90 (skanda.8.164.90)

सहस्रबाहुं विकचं व्याघ्रास्यं क्षितिकम्पनम् । पृष्ठवक्त्रं सुनामानं पार्श्वाननमहाननौ

sahasrabāhuṁ vikacaṁ vyāghrāsyaṁ kṣitikampanam | pṛṣṭhavaktraṁ sunāmānaṁ pārśvānanamahānanau

सहस्रबाहु, विकच, व्याघ्रास्य, क्षितिकम्पन, पृष्ठवक्त्र, सुनामन् और पार्श्वानन-महानन को,

श्लोक 91 (skanda.8.164.91)

परिस्रुतं कोकनदं प्रियमाल्यानुलेपनम् । अजोदरं गजस्कन्धं स्कन्धाक्षं शतलोचनम्

parisrutaṁ kokanadaṁ priyamālyānulepanam | ajodaraṁ gajaskandhaṁ skandhākṣaṁ śatalocanam

परिस्रुत, कोकनद, प्रियमाल्यानुलेपन, अजोदर, गजस्कन्ध, स्कन्धाक्ष और शतलोचन को,

श्लोक 92 (skanda.8.164.92)

ज्वालाजिह्वं करालं च शितकेशं ततोदरम् । अष्टजिह्वं चतुर्दंष्ट्रं मेघनादं पृथूदरम्

jvālājihvaṁ karālaṁ ca śitakeśaṁ tatodaram | aṣṭajihvaṁ caturdaṁṣṭraṁ meghanādaṁ pṛthūdaram

ज्वालाजिह्व, करालमुख, शितकेश, ततोदर, अष्टजिह्व, चतुर्दंष्ट्र, मेघनाद और पृथूदर को,

श्लोक 93 (skanda.8.164.93)

विद्युदक्षं धनुर्वक्त्रं जरठं मारुताशनम । उदराक्षं झषाक्षं च वज्रनाभं च सुप्रभम्

vidyudakṣaṁ dhanurvaktraṁ jaraṭhaṁ mārutāśanama | udarākṣaṁ jhaṣākṣaṁ ca vajranābhaṁ ca suprabham

विद्युदक्ष, धनुर्वक्त्र, जरठ, वायु-भक्षी मारुताशन, उदराक्ष, झषाक्ष, वज्रनाभ और सुप्रभ को,

श्लोक 94 (skanda.8.164.94)

समुद्रवेगं गोकर्णं शैलकम्पनमेव च । पत्रमेषं प्रबाहुं च तथा नन्दोपनन्दकौ

samudravegaṁ gokarṇaṁ śailakampanameva ca | patrameṣaṁ prabāhuṁ ca tathā nandopanandakau

समुद्रवेग, गोकर्ण, शैलकम्पन, पत्रमेष, प्रबाहु, तथा नन्द और उपनन्द को,

श्लोक 95 (skanda.8.164.95)

धूम्रं श्वेतं कलिङ्गं च सिद्धार्थं वरदं तथा । प्रियकं गर्दभास्यं च गोनर्दं भूततापनम्

dhūmraṁ śvetaṁ kaliṅgaṁ ca siddhārthaṁ varadaṁ tathā | priyakaṁ gardabhāsyaṁ ca gonardaṁ bhūtatāpanam

धूम्र, श्वेत, कलिंग, सिद्धार्थ, वरद, प्रियक, गर्दभास्य, गोनर्द और भूततापन को,

श्लोक 96 (skanda.8.164.96)

आनन्दं च प्रमोदं च स्वस्तिकं ध्रुवकं तथा । क्षेपवापं सुजातं च सिद्धयात्रं महावरम्

ānandaṁ ca pramodaṁ ca svastikaṁ dhruvakaṁ tathā | kṣepavāpaṁ sujātaṁ ca siddhayātraṁ mahāvaram

आनन्द, प्रमोद, स्वस्तिक, ध्रुवक, क्षेपवाप, सुजात और महाश्रेष्ठ सिद्धयात्र को,

श्लोक 97 (skanda.8.164.97)

गोव्रजं कनकापीडं महापार्श्वं महोदरम् । गायनं हसनं चैव बाणखङ्गधरं प्रभुम्

govrajaṁ kanakāpīḍaṁ mahāpārśvaṁ mahodaram | gāyanaṁ hasanaṁ caiva bāṇakhaṅgadharaṁ prabhum

गोव्रज, कनकापीड, महापार्श्व, महोदर, गायन, हसन तथा बाण-खड्गधारी प्रभु को,

श्लोक 98 (skanda.8.164.98)

वैतालिं चातितालिं च तथा शठिकवातिकौ । मांसजं पङ्कदिग्धं च समुद्रोन्माथमव्ययम्

vaitāliṁ cātitāliṁ ca tathā śaṭhikavātikau | māṁsajaṁ paṅkadigdhaṁ ca samudronmāthamavyayam

वैताली, अतितालि, शठिक, वातिक, मांसज, पंकदिग्ध तथा अविनाशी समुद्रोन्माथ को,

श्लोक 99 (skanda.8.164.99)

रणोत्कटं प्रभासं च श्वेतमूर्धानमच्युतम् । कालकण्ठशरीरञ्च कुष्माण्डं शत्रुतापनम्

raṇotkaṭaṁ prabhāsaṁ ca śvetamūrdhānamacyutam | kālakaṇṭhaśarīrañca kuṣmāṇḍaṁ śatrutāpanam

रणोत्कट, प्रभास, श्वेतमूर्धा, अच्युत, कालकण्ठशरीर, कूष्माण्ड और शत्रुतापन को,

श्लोक 100 (skanda.8.164.100)

गोमायुवक्त्रं श्येनास्यं भूतलोन्माथनं तथा । यज्ञवाहं प्रवाहं च काकास्यं काकलोचनम्

gomāyuvaktraṁ śyenāsyaṁ bhūtalonmāthanaṁ tathā | yajñavāhaṁ pravāhaṁ ca kākāsyaṁ kākalocanam

गोमायुमुख, श्येनास्य, भूतलोन्माथन, यज्ञवाह, प्रवाह तथा काकमुख काकलोचन को,

श्लोक 101 (skanda.8.164.101)

मञ्जुलं वक्रनासं च महानासं गजोदरम् । तुहनं च तुहानं च चित्रदेवमजं खरम्

mañjulaṁ vakranāsaṁ ca mahānāsaṁ gajodaram | tuhanaṁ ca tuhānaṁ ca citradevamajaṁ kharam

मंजुल, वक्रनास, महानास, गजोदर, तुहन, तुहान तथा खर-मुख चित्रदेव को,

श्लोक 102 (skanda.8.164.102)

मधुरं सुप्रसादं च किरीटं भकुटोत्कटम् । वसनं मधुवर्णञ्च कलशं कलशोदरम्

madhuraṁ suprasādaṁ ca kirīṭaṁ bhakuṭotkaṭam | vasanaṁ madhuvarṇañca kalaśaṁ kalaśodaram

मधुर, सुप्रसाद, किरीट, भृकुटी चढ़ाए हुए, वसन, मधुवर्ण तथा कलश-सम उदर वाले कलश को,

श्लोक 103 (skanda.8.164.103)

रेवन्तं मन्मथकरं सूचीवक्त्रं गजाननम् । श्वेतवक्त्रं सुवक्त्रं च चारुवक्त्रं च पाण्डरम्

revantaṁ manmathakaraṁ sūcīvaktraṁ gajānanam | śvetavaktraṁ suvaktraṁ ca cāruvaktraṁ ca pāṇḍaram

रेवन्त, मन्मथकर, सूचीमुख, गजमुख, श्वेतमुख, सुन्दरमुख तथा गौर वर्ण के चारुमुख को,

श्लोक 104 (skanda.8.164.104)

कण्ठबाहुं सुबाहुं च बकं कोकिलकं तथा । अचलं कनकाक्षं च बलानामग्रनायकम्

kaṇṭhabāhuṁ subāhuṁ ca bakaṁ kokilakaṁ tathā | acalaṁ kanakākṣaṁ ca balānāmagranāyakam

कण्ठबाहु, सुबाहु, बक, कोकिलक, अचल, स्वर्ण-नेत्र कनकाक्ष - सेनाओं में अग्रणी - को,

श्लोक 105 (skanda.8.164.105)

सञ्चारं च कोकमुखं गृध्रास्यं जम्बुकं तथा । लोमशञ्च जरास्यं च उष्ट्रग्रीवं कमण्डलुम्

sañcāraṁ ca kokamukhaṁ gṛdhrāsyaṁ jambukaṁ tathā | lomaśañca jarāsyaṁ ca uṣṭragrīvaṁ kamaṇḍalum

संचार, कोकमुख, गृध्रमुख, जम्बुक, लोमश, वृद्धमुख जरास्य तथा उष्ट्रग्रीव कमण्डलु को,

श्लोक 106 (skanda.8.164.106)

दण्डकं दीर्घवक्त्रं च हंसवक्त्रं महाबलम् । टुण्डुकं शतपादं च शताक्षं चापपृष्ठक्रम्

daṇḍakaṁ dīrghavaktraṁ ca haṁsavaktraṁ mahābalam | ṭuṇḍukaṁ śatapādaṁ ca śatākṣaṁ cāpapṛṣṭhakram

दण्डक, दीर्घमुख, महाबली हंसमुख, टुण्डुक, शतपाद, शताक्ष तथा धनुष-पीठ चापपृष्ठक्रम को,

श्लोक 107 (skanda.8.164.107)

शिक्षकं चापवक्त्रं च शाखवक्त्रं च कुण्डकम् । महायोगान्महासत्वान् सततं ब्रह्मचारिणः

śikṣakaṁ cāpavaktraṁ ca śākhavaktraṁ ca kuṇḍakam | mahāyogānmahāsatvān satataṁ brahmacāriṇaḥ

शिक्षक, चापमुख, शाखामुख तथा कुण्डक को - महायोगसम्पन्न, महाबली, नित्य ब्रह्मचारी,

श्लोक 108 (skanda.8.164.108)

अप्रधृष्यान्महावीर्यान् समरे रिपुसूदनान् । नानाशस्त्रप्रहरणान् नानारूपान् महौजसः

apradhṛṣyānmahāvīryān samare ripusūdanān | nānāśastrapraharaṇān nānārūpān mahaujasaḥ

अजेय, महापराक्रमी, युद्ध में शत्रुओं का नाश करने वाले, विविध शस्त्र चलाने वाले, विविध रूपधारी, महातेजस्वी,

श्लोक 109 (skanda.8.164.109)

नानावक्त्रैः परिवृतान् गणैश्च गणनायकान् । गजेन्द्रचर्मवसनान् व्याघ्रकृष्णाजिनाम्बरान्

nānāvaktraiḥ parivṛtān gaṇaiśca gaṇanāyakān | gajendracarmavasanān vyāghrakṛṣṇājināmbarān

अनेक मुखों वाले गणों और गणनायकों से घिरे हुए, गजेन्द्र की खाल पहने, बाघ और काले मृग की खाल ओढ़े हुए,

श्लोक 110 (skanda.8.164.110)

रक्तकेशान् हरिश्मश्रून् मुण्डान् दिग्वाससोपरान् । जटिनः पिङ्गनेत्राँश्च भुजङ्गकृतमेखलान्

raktakeśān hariśmaśrūn muṇḍān digvāsasoparān | jaṭinaḥ piṅganetrāṁśca bhujaṅgakṛtamekhalān

लाल केश वाले, सिंह के समान श्मश्रु वाले, मुण्डित सिर वाले, दिशाओं को ही वस्त्र माने हुए (दिगम्बर), जटाधारी, पिंगल नेत्र वाले, सर्प का करधनी बाँधे हुए,

श्लोक 111 (skanda.8.164.111)

पन्नगाङ्गदिनः शूराञ्छ्वसद्भोगीन्द्रकुण्लान् । पावनैः परिदिग्धाङ्गान् भस्मभिश्चन्द्रपाण्डरैः

pannagāṅgadinaḥ śūrāñchvasadbhogīndrakuṇlān | pāvanaiḥ paridigdhāṅgān bhasmabhiścandrapāṇḍaraiḥ

सर्प का अंगद पहने, शूरवीर, फुफकारते हुए सर्पराजों को कुण्डल बनाए, राख से - चन्द्रमा-सी श्वेत, पवित्र भस्म से - लिपे हुए अंगों वाले,

श्लोक 112 (skanda.8.164.112)

नृत्यतो वल्गमानाँश्च हासोत्फुल्लविलोचनान् । गणैः परिवृतानन्यैर्बहुभिर्गणनायकान्

nṛtyato valgamānāṁśca hāsotphullavilocanān | gaṇaiḥ parivṛtānanyairbahubhirgaṇanāyakān

नाचते-कूदते, हास्य से खिले हुए नेत्रों वाले, अन्य अनेक गणों और गणनायकों से घिरे हुए,

श्लोक 113 (skanda.8.164.113)

कूर्मकुक्कुटवक्त्रैश्च शशगोधावृकाननैः । खरोष्ट्राश्वमुखैर्भीमैर्वराहमहिषाननैः

kūrmakukkuṭavaktraiśca śaśagodhāvṛkānanaiḥ | kharoṣṭrāśvamukhairbhīmairvarāhamahiṣānanaiḥ

कछुए और मुर्गे के मुख वाले, खरगोश, गोह और भेड़िये के मुख वाले, गधे, ऊँट और घोड़े के भयंकर मुख वाले, सूअर और भैंसे के मुख वाले,

श्लोक 114 (skanda.8.164.114)

मनुष्यमेढवक्त्रैश्च श्वशृगालमृगाननैः । भीमैर्मकरवक्त्रैश्च शिशुमाररुषाननैः । मार्जारवृकवक्त्रैश्च दीर्घवक्त्रैरवक्त्रकैः

manuṣyameḍhavaktraiśca śvaśṛgālamṛgānanaiḥ | bhīmairmakaravaktraiśca śiśumāraruṣānanaiḥ | mārjāravṛkavaktraiśca dīrghavaktrairavaktrakaiḥ

मनुष्य और मेढ़े के मुख वाले, कुत्ते, सियार और मृग के मुख वाले, भयंकर मगरमच्छ और शिशुमार-सदृश मुख वाले, बिल्ली और भेड़िये के मुख वाले, लम्बे मुख वाले तथा मुखरहित प्रतीत होने वाले,

श्लोक 115 (skanda.8.164.115)

लकुलोलूकचक्राह्वशतपत्रनिभाननैः । आखुबभ्रु विडालानां तुल्यास्यै रिपुदुर्जयैः

lakulolūkacakrāhvaśatapatranibhānanaiḥ | ākhubabhru viḍālānāṁ tulyāsyai ripudurjayaiḥ

मूषक, उल्लू, चक्रवाक और शतपत्र-सदृश मुख वाले, चूहे, नेवले और बिलाव के समान मुख वाले, शत्रुओं के लिए दुर्जय,

श्लोक 116 (skanda.8.164.116)

छागमेषमुखैश्चान्यैः शुककारण्डवाननैः । ऋक्षशार्दूलवक्त्रैश्च द्विपिसिंहाननैस्तथा

chāgameṣamukhaiścānyaiḥ śukakāraṇḍavānanaiḥ | ṛkṣaśārdūlavaktraiśca dvipisiṁhānanaistathā

बकरे और भेड़ के मुख वाले, तोते और जल-कौवे के मुख वाले, भालू और सिंह के मुख वाले, चीते और सिंह के समान मुख वाले,

श्लोक 117 (skanda.8.164.117)

भीमैर्द्विरदवक्त्रैश्च तरक्षुवदनैस्तथा । गरुडक्रोष्टुकास्यैश्च काककोकिलवक्त्रकैः

bhīmairdviradavaktraiśca tarakṣuvadanaistathā | garuḍakroṣṭukāsyaiśca kākakokilavaktrakaiḥ

भयंकर हाथी के मुख वाले, लकड़बग्घे के मुख वाले, गरुड़ और सियार के मुख वाले, कौवे और कोयल के मुख वाले,

श्लोक 118 (skanda.8.164.118)

गोवानरमुखैश्चान्यैः श्येनगृध्रमुखैस्तथा । महाजठरपादाङ्गैस्तारकाक्षैर्महाबलैः

govānaramukhaiścānyaiḥ śyenagṛdhramukhaistathā | mahājaṭharapādāṅgaistārakākṣairmahābalaiḥ

गाय और वानर के मुख वाले, बाज और गीध के मुख वाले, विशाल उदर-चरण-अंगों वाले, तारे-सी आँखों वाले, महाबली,

श्लोक 119 (skanda.8.164.119)

पारावतमुखैश्चान्यैः कृकवाकुमुखैस्तथा । लावतित्तिरिवक्त्रैश्च कृकलासमुखैरपि

pārāvatamukhaiścānyaiḥ kṛkavākumukhaistathā | lāvatittirivaktraiśca kṛkalāsamukhairapi

कबूतर के मुख वाले, मुर्गे के मुख वाले, बटेर और तीतर के मुख वाले, तथा गिरगिट के मुख वाले,

श्लोक 120 (skanda.8.164.120)

पीतकौशेयवासोभिश्चीरवल्कलधारिभिः । फणीन्द्रानद्धगात्रैश्च चित्रगोनसकङ्कणैः

pītakauśeyavāsobhiścīravalkaladhāribhiḥ | phaṇīndrānaddhagātraiśca citragonasakaṅkaṇaiḥ

पीले रेशमी वस्त्र पहने, चीर-वल्कल धारण किए, सर्पराजों से लिपटे अंगों वाले, विचित्र सर्प-कंकण पहने हुए,

श्लोक 121 (skanda.8.164.121)

स्थूलोदरैः कृशाङ्गैश्च स्थूलाङ्गैश्च कृशोदरैः । ह्रस्वग्रीवैर्महाकर्णैर्नानाव्यालविभूषणैः

sthūlodaraiḥ kṛśāṅgaiśca sthūlāṅgaiśca kṛśodaraiḥ | hrasvagrīvairmahākarṇairnānāvyālavibhūṣaṇaiḥ

स्थूल उदर और कृश अंगों वाले, स्थूल अंगों और कृश उदर वाले, छोटी गर्दन और बड़े कानों वाले, विविध सर्प-आभूषणों से युक्त,

श्लोक 122 (skanda.8.164.122)

गजेन्द्रचर्मवासोभिः शूरैः समरदुर्जयैः । स्कन्धवक्त्रैरवक्त्रैश्च पृष्ठास्यैः सर्वतोमुखैः

gajendracarmavāsobhiḥ śūraiḥ samaradurjayaiḥ | skandhavaktrairavaktraiśca pṛṣṭhāsyaiḥ sarvatomukhaiḥ

गजेन्द्र की खाल पहने, युद्ध में दुर्जय शूरवीर, कंधे पर मुख वाले, बिना मुख वाले, पीठ पर मुख वाले, सब ओर मुख वाले,

श्लोक 123 (skanda.8.164.123)

नानाकृतिभुजैर्वीरैर्नानाभुजगभीषणैः । नानावेषै महायोर्गर्नानास्थाननिवासिभिः

nānākṛtibhujairvīrairnānābhujagabhīṣaṇaiḥ | nānāveṣai mahāyorgarnānāsthānanivāsibhiḥ

विविध आकार की भुजाओं वाले वीर, विविध सर्पों से भयानक, विविध वेष वाले, महायोगी, विविध स्थानों में निवास करने वाले,

श्लोक 124 (skanda.8.164.124)

नानावस्त्रधरैश्चान्यै र्नानामाल्यानुलेपनैः । नानाचर्माम्बरैरन्यैर्नानाभरणधारिभिः

nānāvastradharaiścānyai rnānāmālyānulepanaiḥ | nānācarmāmbarairanyairnānābharaṇadhāribhiḥ

विविध वस्त्र धारण करने वाले, विविध मालाओं और अनुलेपनों से युक्त, विविध खालों और वस्त्रों वाले, विविध आभूषण धारण करने वाले,

श्लोक 125 (skanda.8.164.125)

उष्णीषिभिर्मुकुटिभिः कम्बुग्रीवैः सुसंस्थितैः । किरीटिभिः पञ्चशिखैर्जटामुकुटधारिभिः

uṣṇīṣibhirmukuṭibhiḥ kambugrīvaiḥ susaṁsthitaiḥ | kirīṭibhiḥ pañcaśikhairjaṭāmukuṭadhāribhiḥ

पगड़ी और मुकुट धारण करने वाले, शंख के समान गर्दन वाले, सुगठित, किरीटधारी, पाँच शिखाओं वाले, जटा-मुकुट धारण करने वाले,

श्लोक 126 (skanda.8.164.126)

त्रिशिखैर्द्विशिखैश्चापि तथा सप्तशिखैरपि । शिखण्डिभिर्दीर्घजटैर्मुण्डैः कपिलमूर्धजैः

triśikhairdviśikhaiścāpi tathā saptaśikhairapi | śikhaṇḍibhirdīrghajaṭairmuṇḍaiḥ kapilamūrdhajaiḥ

तीन शिखाओं, दो शिखाओं और सात शिखाओं वाले, शिखण्डधारी, लम्बी जटा वाले, मुण्डित सिर वाले, तथा भूरे बालों वाले,

श्लोक 127 (skanda.8.164.127)

चित्राक्षकैश्चित्रमुखैश्चित्रस्रगनुलेपनैः । चित्राम्बरधरैः वीरैः सततं प्रियविग्रहैः

citrākṣakaiścitramukhaiścitrasraganulepanaiḥ | citrāmbaradharaiḥ vīraiḥ satataṁ priyavigrahaiḥ

विचित्र नेत्रों और मुखों वाले, विचित्र मालाओं और अनुलेपनों वाले, विचित्र वस्त्र धारण करने वाले वीर, सदैव प्रिय स्वभाव वाले,

श्लोक 128 (skanda.8.164.128)

कृष्णनिर्मांसवक्त्रैश्च दीर्घपृष्ठैः कृशोदरैः । स्थूलपृष्ठैर्महाग्रीवैर्लम्बोदरमहोदरैः

kṛṣṇanirmāṁsavaktraiśca dīrghapṛṣṭhaiḥ kṛśodaraiḥ | sthūlapṛṣṭhairmahāgrīvairlambodaramahodaraiḥ

काले, मांस-रहित मुख वाले, लम्बी पीठ और कृश उदर वाले, स्थूल पीठ, बड़ी गर्दन, लटकते और विशाल उदर वाले,

श्लोक 129 (skanda.8.164.129)

महाभुजैर्महावक्त्रैर्ह्रस्वग्रीवैः कृशाननैः । कुब्जैभ्र दीर्घजंघैश्च हस्तिकर्णशिरोधरैः

mahābhujairmahāvaktrairhrasvagrīvaiḥ kṛśānanaiḥ | kubjaibhra dīrghajaṁghaiśca hastikarṇaśirodharaiḥ

बड़ी भुजाओं और मुखों वाले, छोटी गर्दन और कृश मुख वाले, कुबड़े, लम्बी पिंडलियों वाले, हाथी के कान और गर्दन वाले,

श्लोक 130 (skanda.8.164.130)

दीर्घोष्ठर्दीर्घजिह्वैश्च दीर्घाक्षैर्दीर्घनासिकैः । महादंष्ट्रैः सुदंष्ट्रैश्च चित्रदंष्ट्रैर्महाबलैः

dīrghoṣṭhardīrghajihvaiśca dīrghākṣairdīrghanāsikaiḥ | mahādaṁṣṭraiḥ sudaṁṣṭraiśca citradaṁṣṭrairmahābalaiḥ

लम्बे होंठ, लम्बी जीभ, लम्बी आँखें, लम्बी नाक वाले, बड़ी दाढ़ों, सुन्दर दाढ़ों और विचित्र, महाबली दाढ़ों वाले,

श्लोक 131 (skanda.8.164.131)

सुविभक्तशरोरैश्च दीप्तिमद्भिः स्वलंकृतैः । पिङ्गलाक्षैर्महाकर्णैः शंकुकर्णैरकर्णकैः

suvibhaktaśaroraiśca dīptimadbhiḥ svalaṁkṛtaiḥ | piṅgalākṣairmahākarṇaiḥ śaṁkukarṇairakarṇakaiḥ

सुगठित शरीर, तेजस्वी, सुसज्जित, पिंगल नेत्रों, बड़े कानों, शंकु-सदृश कानों तथा कान-रहित,

श्लोक 132 (skanda.8.164.132)

दीर्घदंष्टैः पृथूरस्कैः स्थूलोष्ठैर्हरिमूर्धजैः । नानापादोष्ठदंष्ट्रैश्च नानाहस्तशिरोधरैः

dīrghadaṁṣṭaiḥ pṛthūraskaiḥ sthūloṣṭhairharimūrdhajaiḥ | nānāpādoṣṭhadaṁṣṭraiśca nānāhastaśirodharaiḥ

लम्बी दाढ़ों, चौड़ी छाती, स्थूल होंठों, सिंह-केश वाले, विविध पैरों-होंठों-दाढ़ों तथा विविध हाथों-गर्दनों वाले,

श्लोक 133 (skanda.8.164.133)

नानाचर्मभिराच्छन्नैर्नानावासोभिरावृतैः । हृष्टैः परिपतद्भिश्च नृत्यद्भिश्च महारवैः

nānācarmabhirācchannairnānāvāsobhirāvṛtaiḥ | hṛṣṭaiḥ paripatadbhiśca nṛtyadbhiśca mahāravaiḥ

विविध खालों से ढके, विविध वस्त्रों से आवृत, हर्षित, इधर-उधर उछलते, नाचते हुए, महाघोष करने वाले,

श्लोक 134 (skanda.8.164.134)

लम्बकर्णैर्महोरस्कैर्नीलकण्ठै स्त्रिलोचनैः । शुकोदरनिभैः कैश्चित् कैश्चिदञ्जनसन्निभैः

lambakarṇairmahoraskairnīlakaṇṭhai strilocanaiḥ | śukodaranibhaiḥ kaiścit kaiścidañjanasannibhaiḥ

लटकते कानों, चौड़ी छाती, नीले कण्ठ और तीन नेत्रों वाले, तोते के उदर-सदृश तथा काजल-सदृश वर्ण वाले,

श्लोक 135 (skanda.8.164.135)

श्वेताङ्गैर्लोहितग्रीवैः पिङ्गाक्षैर्भीमदर्शनैः । कल्माषपाणिपादैश्च जातीहिङ्गुलकप्रभैः

śvetāṅgairlohitagrīvaiḥ piṅgākṣairbhīmadarśanaiḥ | kalmāṣapāṇipādaiśca jātīhiṅgulakaprabhaiḥ

श्वेत अंगों और लाल गर्दन वाले, पिंगल नेत्रों वाले, भयंकर दिखने वाले, चितकबरे हाथ-पैर वाले, हिंगुल-सदृश कान्ति वाले,

श्लोक 136 (skanda.8.164.136)

चामीकरापीडनिभैः श्वेतैर्लोहितराजिभिः । राजावर्त्तसवर्णैश्च मयूरसदृशप्रभैः

cāmīkarāpīḍanibhaiḥ śvetairlohitarājibhiḥ | rājāvarttasavarṇaiśca mayūrasadṛśaprabhaiḥ

स्वर्ण-आभूषण-सदृश, श्वेत, लाल रेखाओं वाले, राजावर्त मणि-सदृश वर्ण वाले, मयूर-सदृश कान्ति वाले,

श्लोक 137 (skanda.8.164.137)

पाशोद्यतकरैः कैश्चिद् व्यात्तवक्त्रै र्महारवैः । पिङ्गाक्षैर्नीलकण्ठैश्च महापरिघबाहुभिः

pāśodyatakaraiḥ kaiścid vyāttavaktrai rmahāravaiḥ | piṅgākṣairnīlakaṇṭhaiśca mahāparighabāhubhiḥ

पाश उठाए हाथों वाले, खुले मुख और महाघोष वाले, पिंगल नेत्रों, नीले कण्ठ तथा विशाल परिघ-सदृश भुजाओं वाले,

श्लोक 138 (skanda.8.164.138)

शतघ्नीशक्तिहस्तैश्च गदामुशलपाणिभिः । शूलासिपाणिभिः कैश्चिन्महाकायैर्महाबलैः

śataghnīśaktihastaiśca gadāmuśalapāṇibhiḥ | śūlāsipāṇibhiḥ kaiścinmahākāyairmahābalaiḥ

शतघ्नी और शक्ति हाथों में लिए, गदा और मूसल धारण किए,

श्लोक 139 (skanda.8.164.139)

भुशुण्डीप्रासहस्तैश्च वीरैः परशुपाणिभिः । पाशमुद्गरहस्तैश्च चक्रतोमरपाणिमिः

bhuśuṇḍīprāsahastaiśca vīraiḥ paraśupāṇibhiḥ | pāśamudgarahastaiśca cakratomarapāṇimiḥ

शूल और तलवार धारण किए हुए, महाकाय, महाबली, भुशुण्डी और प्रास हाथों में लिए वीर, फरसाधारी,

श्लोक 140 (skanda.8.164.140)

चित्रायुधधरैर्वीरैरावृण्वद्भिर्दिशो दिशम् । घण्टाजालविनद्धाङगैः किंकिणीजालधारिभिः

citrāyudhadharairvīrairāvṛṇvadbhirdiśo diśam | ghaṇṭājālavinaddhāṅagaiḥ kiṁkiṇījāladhāribhiḥ

पाश और मुद्गर हाथों में लिए, चक्र और तोमर धारण किए, विविध अस्त्र धारण करने वाले वीर, सभी दिशाओं को घेरते हुए, घण्टियों के जाल से बँधे अंगों वाले, घुंघरुओं की झालर धारण किए हुए -

श्लोक 141 (skanda.8.164.141)

वृता गणैर्गणाध्यक्षा महासत्वैर्महाबलैः । उपतस्थुर्महात्मानं कार्त्तिकेयं यशस्विनम्

vṛtā gaṇairgaṇādhyakṣā mahāsatvairmahābalaiḥ | upatasthurmahātmānaṁ kārttikeyaṁ yaśasvinam

ऐसे महासत्त्व, महाबली गणों और गण-नायकों से घिरे हुए वे सब उस महात्मा, यशस्वी कार्तिकेय की उपासना करने लगे।

श्लोक 142 (skanda.8.164.142)

मातॄश्च प्रददौ तस्मै कौशिकीदेहसंभवाः । महाबला महासत्वाः समरेष्वपराजिताः

mātṝśca pradadau tasmai kauśikīdehasaṁbhavāḥ | mahābalā mahāsatvāḥ samareṣvaparājitāḥ

कौशिकी (दुर्गा) ने भी उन्हें अपने ही शरीर से उत्पन्न मातृकाएँ प्रदान कीं - महाबली, महापराक्रमी, युद्धों में अपराजित -

श्लोक 143 (skanda.8.164.143)

प्रभावतीं विशालाक्षीं पलितां वृषनासिकाम् । श्रीमतीं बहुलां सिंहीं विजयां बहुपुत्रिकाम्

prabhāvatīṁ viśālākṣīṁ palitāṁ vṛṣanāsikām | śrīmatīṁ bahulāṁ siṁhīṁ vijayāṁ bahuputrikām

प्रभावती, विशालाक्षी, पलिता, वृषनासिका, श्रीमती, बहुला, सिंही, विजया और बहुपुत्रिका।

श्लोक 144 (skanda.8.164.144)

गोपालीं सुप्रभां षष्ठीं बृहदम्बालिकां कृशाम् । जयावतीं मालतिकां ध्रुवरत्नां प्रभाकरीम्

gopālīṁ suprabhāṁ ṣaṣṭhīṁ bṛhadambālikāṁ kṛśām | jayāvatīṁ mālatikāṁ dhruvaratnāṁ prabhākarīm

गोपाली, सुप्रभा, षष्ठी, कृशांगी बृहदम्बालिका, जयावती, मालतिका, ध्रुवरत्ना और प्रभाकरी।

श्लोक 145 (skanda.8.164.145)

सुप्रभां वसुदां चैव विशोकां नन्दिनीं तथा । वज्रचूडां महचूडां वज्रनेमिं महाप्रभाम्

suprabhāṁ vasudāṁ caiva viśokāṁ nandinīṁ tathā | vajracūḍāṁ mahacūḍāṁ vajranemiṁ mahāprabhām

सुप्रभा, वसुदा, विशोका, नन्दिनी, वज्रचूडा, महाचूडा, वज्रनेमि और महाप्रभा।

श्लोक 146 (skanda.8.164.146)

अञ्जनीञ्च भरत्सेनां कमलाक्षीं शशिप्रभाम् । शत्रुञ्जयां महानासां क्रोधनां शलभीं खषीम्

añjanīñca bharatsenāṁ kamalākṣīṁ śaśiprabhām | śatruñjayāṁ mahānāsāṁ krodhanāṁ śalabhīṁ khaṣīm

अंजनी, भरत्सेना, कमलाक्षी, शशिप्रभा, शत्रुंजया, महानासा, क्रोधना, शलभी और खषी।

श्लोक 147 (skanda.8.164.147)

माधवीं शुकवक्त्राञ्च कीर्तिनेमिमनिन्दिताम् । गीतप्रियां महामायां वायसीममृतां सतीम्

mādhavīṁ śukavaktrāñca kīrtinemimaninditām | gītapriyāṁ mahāmāyāṁ vāyasīmamṛtāṁ satīm

माधवी, शुकवक्त्रा, अनिन्दिता कीर्तिनेमि, गीतप्रिया, महामाया, वायसी, अमृता और सती।

श्लोक 148 (skanda.8.164.148)

सरस्वतीं भोगवतीं सुभ्रूञ्च कनकावतीम् । सुतां लक्ष्मीं वीर्यवतीं विद्युज्जिह्वां महाबलाम्

sarasvatīṁ bhogavatīṁ subhrūñca kanakāvatīm | sutāṁ lakṣmīṁ vīryavatīṁ vidyujjihvāṁ mahābalām

सरस्वती, भोगवती, सुभ्रू कनकावती, तथा पुत्री लक्ष्मी, वीर्यवती और महाबली विद्युज्जिह्वा।

श्लोक 149 (skanda.8.164.149)

पद्मावतीं सुनक्षत्रां कन्दरां बहुयोजनाम् । सन्तानिकां शिवां चैव कमलां मलदामपि

padmāvatīṁ sunakṣatrāṁ kandarāṁ bahuyojanām | santānikāṁ śivāṁ caiva kamalāṁ maladāmapi

पद्मावती, सुनक्षत्रा, बहुयोजन-विस्तृत कन्दरा, सन्तानिका, शिवा, कमला और मलदा।

श्लोक 150 (skanda.8.164.150)

सुदामां बहुदामां च सुप्रभां च यशस्विनीम् । नृत्तप्रियां वरारोहां सितोलूखलमेखलाम्

sudāmāṁ bahudāmāṁ ca suprabhāṁ ca yaśasvinīm | nṛttapriyāṁ varārohāṁ sitolūkhalamekhalām

सुदामा, बहुदामा, यशस्विनी सुप्रभा, नृत्तप्रिया, वरारोहा तथा श्वेत ऊखल के समान करधनी वाली।

श्लोक 151 (skanda.8.164.151)

शतघण्टां शतानन्दां शतनेत्रां यशस्विनीम् । वपुष्मतीं च शीलाञ्च भद्रकालीञ्च भैरवाम्

śataghaṇṭāṁ śatānandāṁ śatanetrāṁ yaśasvinīm | vapuṣmatīṁ ca śīlāñca bhadrakālīñca bhairavām

शतघण्टा, शतानन्दा, यशस्विनी शतनेत्रा, वपुष्मती, शीला, भद्रकाली और भैरवी।

श्लोक 152 (skanda.8.164.152)

संहारिकां निष्कुटिकां भूतां चत्वरवासिनीम् । सुमङ्गलां स्वस्तिमतीं वृद्धिकामां जनप्रियाम्

saṁhārikāṁ niṣkuṭikāṁ bhūtāṁ catvaravāsinīm | sumaṅgalāṁ svastimatīṁ vṛddhikāmāṁ janapriyām

संहारिका, निष्कुटिका, चौराहों में निवास करने वाली भूता, सुमंगला, स्वस्तिमती, वृद्धिकामा और जनप्रिया।

श्लोक 153 (skanda.8.164.153)

धनदां सुप्रदां चैव भवदां सुखदामपि । ऐलीं भेलीं समेलीं च वेतालीं जननीं निशाम्

dhanadāṁ supradāṁ caiva bhavadāṁ sukhadāmapi | ailīṁ bhelīṁ samelīṁ ca vetālīṁ jananīṁ niśām

धनदा, सुप्रदा, भवदा, सुखदा, ऐली, भेली, समेली, वेताली, जननी और निशा।

श्लोक 154 (skanda.8.164.154)

कण्डूं पिङ्गलिकां चैव देवमित्रां यशस्विनीम् । लम्बुषीं सनकां चैव चित्रसेनामथाचलाम्

kaṇḍūṁ piṅgalikāṁ caiva devamitrāṁ yaśasvinīm | lambuṣīṁ sanakāṁ caiva citrasenāmathācalām

कण्डू, पिंगलिका, यशस्विनी देवमित्रा, लम्बुषी, सनका, चित्रसेना और अचला।

श्लोक 155 (skanda.8.164.155)

कुकूनिकां शंखिनिकां तथा झर्झरिकामपि । कुण्डालिकां कोलविलां कण्डराञ्च शतोदरीम्

kukūnikāṁ śaṁkhinikāṁ tathā jharjharikāmapi | kuṇḍālikāṁ kolavilāṁ kaṇḍarāñca śatodarīm

कुकूनिका, शंखिनिका, झर्झरिका, कुण्डालिका, कोलविला, कन्दरा और शतोदरी।

श्लोक 156 (skanda.8.164.156)

उत्क्वाथनीं जुरेलाञ्च महावेलां च कङ्कणाम् । मनोजवां कण्टकिनीं विघसां पूतनां तथा

utkvāthanīṁ jurelāñca mahāvelāṁ ca kaṅkaṇām | manojavāṁ kaṇṭakinīṁ vighasāṁ pūtanāṁ tathā

उत्क्वाथिनी, जुरेला, महावेला, कंकणा, मनोजवा, कण्टकिनी, विघसा और पूतना।

श्लोक 157 (skanda.8.164.157)

वैशयां चर्चिकां वामां क्रोधनां मुखमण्डिकाम् । मण्डोदरीं च टुण्डाञ्च कोटरां मेघवासिनीम्

vaiśayāṁ carcikāṁ vāmāṁ krodhanāṁ mukhamaṇḍikām | maṇḍodarīṁ ca ṭuṇḍāñca koṭarāṁ meghavāsinīm

वैशया, चर्चिका, वामा, क्रोधना, मुखमण्डिका, मण्डोदरी, टुण्डा, कोटरा और मेघवासिनी।

श्लोक 158 (skanda.8.164.158)

सुभगां लम्बिनीं लम्बां वामधूलीं विकत्थनाम् । ऊर्ध्ववेणीधरां चैव ललाटनयनां तथा

subhagāṁ lambinīṁ lambāṁ vāmadhūlīṁ vikatthanām | ūrdhvaveṇīdharāṁ caiva lalāṭanayanāṁ tathā

सुभगा, लम्बिनी, लम्बा, वामधूली, विकत्थना, ऊँची वेणी बाँधने वाली तथा ललाट में नेत्र वाली।

श्लोक 159 (skanda.8.164.159)

पृथुबर्हां महाकायां मधुकुम्भां तडित्प्रभाम् । मन्थानिकामुन्मनिकां जरायुं जर्जराननाम्

pṛthubarhāṁ mahākāyāṁ madhukumbhāṁ taḍitprabhām | manthānikāmunmanikāṁ jarāyuṁ jarjarānanām

पृथुबर्हा, महाकाया, मधुकुम्भा, तड़ित्प्रभा, मन्थानिका, उन्मनिका, जरायु और जर्जरानना।

श्लोक 160 (skanda.8.164.160)

ख्यातां दहदहां चैव तथा धमधमामपि । खटंखटां महावीर्यां वृषणां मणितुण्डिकाम्

khyātāṁ dahadahāṁ caiva tathā dhamadhamāmapi | khaṭaṁkhaṭāṁ mahāvīryāṁ vṛṣaṇāṁ maṇituṇḍikām

ख्याता, दहदहा, धमधमा, खटंखटा, महापराक्रमी वृषणा तथा मणितुण्डिका।

श्लोक 161 (skanda.8.164.161)

बद्धवेणीं धराधारां पिङ्गाक्षीं लम्बकर्णिकाम् । आमोदां च प्रमोदां च तथा लम्बपयोधराम्

baddhaveṇīṁ dharādhārāṁ piṅgākṣīṁ lambakarṇikām | āmodāṁ ca pramodāṁ ca tathā lambapayodharām

बद्धवेणी, धराधारा, पिंगाक्षी, लम्बकर्णिका, आमोदा, प्रमोदा तथा लटकते स्तनों वाली।

श्लोक 162 (skanda.8.164.162)

शशोलूकमुखीं कृष्णां खरजंघां महारवाम् । शिशुमारमुखीं श्वेतां लोहिताक्षीं विभीषणाम्

śaśolūkamukhīṁ kṛṣṇāṁ kharajaṁghāṁ mahāravām | śiśumāramukhīṁ śvetāṁ lohitākṣīṁ vibhīṣaṇām

शश और उल्लू के समान मुख वाली काली, गधे-सी टाँगों वाली, तीव्र स्वर वाली, शिशुमार-सदृश मुख वाली श्वेत, लाल आँखों वाली भयंकर।

श्लोक 163 (skanda.8.164.163)

जटालिकां कामचरीं दीर्घजिह्वां च लोलुपाम् । कनेलिकां वासनिकां मुकुटाञ्च महाबलाम्

jaṭālikāṁ kāmacarīṁ dīrghajihvāṁ ca lolupām | kanelikāṁ vāsanikāṁ mukuṭāñca mahābalām

जटालिका, इच्छानुसार विचरने वाली कामचरी, दीर्घजिह्वा, लोलुपा, कनेलिका, वासनिका तथा महाबली मुकुटा।

श्लोक 164 (skanda.8.164.164)

लोहिताक्षीं महाकायां हरिपिण्डीञ्च दुर्जयाम् । पशुदां वित्तदां वीरामङ्गदाञ्च महबलाम्

lohitākṣīṁ mahākāyāṁ haripiṇḍīñca durjayām | paśudāṁ vittadāṁ vīrāmaṅgadāñca mahabalām

लोहिताक्षी, महाकाया, दुर्जय हरिपिण्डी, पशुदा, वित्तदा, वीरा तथा महाबली अंगदा।

श्लोक 165 (skanda.8.164.165)

पयोदां गोप्रदां शंखां सुनिषण्णां तरस्विनीम् । प्रतिष्ठां सुप्रतिष्ठां च रोचमानां सुरोचनाम्

payodāṁ gopradāṁ śaṁkhāṁ suniṣaṇṇāṁ tarasvinīm | pratiṣṭhāṁ supratiṣṭhāṁ ca rocamānāṁ surocanām

पयोदा, गोप्रदा, शंखा, सुनिषण्णा, तेजस्विनी प्रतिष्ठा, सुप्रतिष्ठा, रोचमाना तथा सुरोचना।

श्लोक 166 (skanda.8.164.166)

गोकर्णीमश्वकर्णीञ्च सशिरां खरिकां तथा । कचक्रचां मेघरवां मेघमालां विरोचनाम्

gokarṇīmaśvakarṇīñca saśirāṁ kharikāṁ tathā | kacakracāṁ megharavāṁ meghamālāṁ virocanām

गोकर्णी, अश्वकर्णी, ससिरा, खरिका, कचक्रचा, मेघरवा, मेघमाला तथा विरोचना।

श्लोक 167 (skanda.8.164.167)

एताश्चान्याश्च बहुला मातरो मारुतस्यदाः । एकाक्षरां सुगन्धां च कृष्णकर्णीं च दारुणाम्

etāścānyāśca bahulā mātaro mārutasyadāḥ | ekākṣarāṁ sugandhāṁ ca kṛṣṇakarṇīṁ ca dāruṇām

ये तथा अन्य भी अनेक, वायु के समान वेगवती मातृकाएँ - एकाक्षरा, सुगन्धा, कृष्णकर्णी तथा भयंकर।

श्लोक 168 (skanda.8.164.168)

क्षुरकर्णीं चतुष्कर्णीं कर्णप्रावरणां तथा । चतुष्पथनिकेतां च गोकर्णीं महिषाननाम्

kṣurakarṇīṁ catuṣkarṇīṁ karṇaprāvaraṇāṁ tathā | catuṣpathaniketāṁ ca gokarṇīṁ mahiṣānanām

क्षुरकर्णी, चतुष्कर्णी, कर्णप्रावरणा, चौराहों में निवास करने वाली, गोकर्णी तथा भैंसे-सदृश मुख वाली।

श्लोक 169 (skanda.8.164.169)

खरकर्णीं महाकर्णीं भेरीस्वनमहास्वने । शंखकुंभश्रवां चैव संग्रामेष्वपराजिताम्

kharakarṇīṁ mahākarṇīṁ bherīsvanamahāsvane | śaṁkhakuṁbhaśravāṁ caiva saṁgrāmeṣvaparājitām

खरकर्णी, महाकर्णी, भेरी के महानाद के समान गर्जने वाली, शंख-कुम्भ-सी ध्वनि करने वाली, तथा संग्रामों में अपराजित।

श्लोक 170 (skanda.8.164.170)

गणां च सुगणां चैव तथा वातीं च कामगाम् । चतुष्पथरवां चैव भूतिनीं वन्यगोचराम्

gaṇāṁ ca sugaṇāṁ caiva tathā vātīṁ ca kāmagām | catuṣpatharavāṁ caiva bhūtinīṁ vanyagocarām

गणा, सुगणा, इच्छानुसार गमन करने वाली वाती, चौराहों पर गरजने वाली भूतिनी, वनों में विचरने वाली।

श्लोक 171 (skanda.8.164.171)

कार्त्तिकेयानुयायिन्यो नानारूपाः सहस्रशः । दीर्घदन्त्योतिनख्यश्च दीर्घवक्त्रातिभीषणाः

kārttikeyānuyāyinyo nānārūpāḥ sahasraśaḥ | dīrghadantyotinakhyaśca dīrghavaktrātibhīṣaṇāḥ

ये कार्तिकेय की अनुयायिनी सहस्रों विविध-रूपधारी मातृकाएँ - लम्बे दाँतों और नखों वाली, लम्बे मुख वाली, अत्यन्त भयंकर,

श्लोक 172 (skanda.8.164.172)

चतुरा मधुराश्चैव यौवनस्थाः स्वलंकृताः । माहात्म्येन च संयुक्ताः कामरूपा महाबलाः

caturā madhurāścaiva yauvanasthāḥ svalaṁkṛtāḥ | māhātmyena ca saṁyuktāḥ kāmarūpā mahābalāḥ

चतुर, मधुर स्वभाव वाली, युवावस्था में स्थित, सुसज्जित, महिमा से युक्त, इच्छानुसार रूप धारण करने वाली, महाबली,

श्लोक 173 (skanda.8.164.173)

निर्मांसगात्र्यः श्वेताश्च जाम्बूनदसमप्रभाः । कृष्णा जीमूतवर्णाश्च धूम्रकेश्यो महाभयाः

nirmāṁsagātryaḥ śvetāśca jāmbūnadasamaprabhāḥ | kṛṣṇā jīmūtavarṇāśca dhūmrakeśyo mahābhayāḥ

कोई मांस-रहित, श्वेत, स्वर्ण-सदृश कान्ति वाली, कोई काली, बादल-सी वर्ण वाली, धूम्र-केश वाली, अत्यन्त भयंकर,

श्लोक 174 (skanda.8.164.174)

असुराणां महादंष्ट्रा दीर्घदंष्ट्राः सिताम्बराः । ऊर्ध्वकर्णोधराश्चैव पिङ्गाक्ष्यो लम्बमेखलाः

asurāṇāṁ mahādaṁṣṭrā dīrghadaṁṣṭrāḥ sitāmbarāḥ | ūrdhvakarṇodharāścaiva piṅgākṣyo lambamekhalāḥ

असुरों के समान महादाढ़ें और लम्बी दाढ़ें रखने वाली, श्वेत वस्त्र धारण करने वाली, ऊपर उठे कान-होंठ वाली, पिंगल आँखों और लटकती करधनी वाली,

श्लोक 175 (skanda.8.164.175)

लम्बोदर्यो विलम्बोष्ठ्यो लम्वकर्णपयोधराः । ताम्राक्ष्यस्ताम्रवक्त्राश्च हर्यक्ष्यो हरिमूर्धजाः

lambodaryo vilamboṣṭhyo lamvakarṇapayodharāḥ | tāmrākṣyastāmravaktrāśca haryakṣyo harimūrdhajāḥ

लटकते उदर वाली, लटकते होंठ वाली, लम्बे कानों और स्तनों वाली, ताम्र नेत्र-मुख वाली, सिंह-सदृश केश वाली,

श्लोक 176 (skanda.8.164.176)

वृक्षचत्वरवासिन्यश्चतुष्पथनिकेतनाः । गुहाश्मशानवासिन्यः शैलप्रस्रवणालयाः

vṛkṣacatvaravāsinyaścatuṣpathaniketanāḥ | guhāśmaśānavāsinyaḥ śailaprasravaṇālayāḥ

वृक्षों, चौराहों, गुफाओं और श्मशानों में निवास करने वाली, पर्वतों के झरनों में रहने वाली,

श्लोक 177 (skanda.8.164.177)

नानाभरणधारिण्यो नानास्रगनुलेपनाः । नानावस्त्राणि बिभ्रत्यो नानायुधधरास्तथा

nānābharaṇadhāriṇyo nānāsraganulepanāḥ | nānāvastrāṇi bibhratyo nānāyudhadharāstathā

विविध आभूषण धारण करने वाली, विविध मालाओं और अनुलेपनों से युक्त, विविध वस्त्र पहनने वाली तथा विविध अस्त्र धारण करने वाली -

श्लोक 178 (skanda.8.164.178)

एताश्चान्याश्च संहृष्टा ददौ स्कन्दाय कौशिकी । वैजयन्तीं ददौ तस्मै मालामञ्चितकेसराम्

etāścānyāśca saṁhṛṣṭā dadau skandāya kauśikī | vaijayantīṁ dadau tasmai mālāmañcitakesarām

इन सबको तथा और भी हर्षित मातृकाओं को कौशिकी ने स्कन्द को प्रदान किया; और उन्होंने उन्हें वैजयन्ती नामक, शोभित केसरों वाली माला भी प्रदान की।

श्लोक 179 (skanda.8.164.179)

विष्णुर्विविधगन्धाढ्यामुत्फुल्लां चारुदर्शनाम् । वाससी विरजस्के च तरुणार्कसमप्रभे

viṣṇurvividhagandhāḍhyāmutphullāṁ cārudarśanām | vāsasī virajaske ca taruṇārkasamaprabhe

विष्णु ने उन्हें विविध सुगन्धों से युक्त, खिली हुई, सुन्दर दिखने वाली, तरुण सूर्य के समान कान्तिमान दो निर्मल वस्त्र प्रदान किए।

श्लोक 180 (skanda.8.164.180)

संप्रीता प्रीतमनसे ददौ स्कन्दाय पार्वती । कमण्डलुं सुधावारिसंपूर्णममृतोद्भवम्

saṁprītā prītamanase dadau skandāya pārvatī | kamaṇḍaluṁ sudhāvārisaṁpūrṇamamṛtodbhavam

पार्वती ने प्रसन्नचित्त पुत्र को अमृत से उत्पन्न, दिव्य जल से पूर्ण कमण्डलु प्रेम से प्रदान किया।

श्लोक 181 (skanda.8.164.181)

ददौ प्रीता कुमाराय गङ्गा गम्भीरचेतसे । गरुत्मान् दयितं पुत्रं चित्रबर्हं शिखण्डिनम्

dadau prītā kumārāya gaṅgā gambhīracetase | garutmān dayitaṁ putraṁ citrabarhaṁ śikhaṇḍinam

गंगा ने भी प्रसन्न होकर गम्भीर-चित्त कुमार को कमण्डलु प्रदान किया; और गरुड़ ने अपने प्रिय पुत्र, चित्रबर्ह शिखण्डी (मयूर) को प्रदान किया।

श्लोक 182 (skanda.8.164.182)

ददौ स्कन्दाय संप्रीतो बलिनं कामरूपिणम् । ताम्रचूडमदाद्वीरमरुणश्चरणायुधम्

dadau skandāya saṁprīto balinaṁ kāmarūpiṇam | tāmracūḍamadādvīramaruṇaścaraṇāyudham

अरुण ने स्कन्द को प्रसन्नतापूर्वक, बलवान्, इच्छानुसार रूप धारण करने वाला वीर ताम्रचूड (मुर्गा) प्रदान किया, जिसके पैर ही उसके आयुध थे।

श्लोक 183 (skanda.8.164.183)

भववीर्यजवोपेतं स्कन्दाय प्रियदर्शनम् । महाभारसहं छागं कामगं कामरूपिणम् । प्रददौ वरुणस्तस्मै स्कन्दाय बलवत्तरम्

bhavavīryajavopetaṁ skandāya priyadarśanam | mahābhārasahaṁ chāgaṁ kāmagaṁ kāmarūpiṇam | pradadau varuṇastasmai skandāya balavattaram

वरुण ने भव (शिव) के समान वेग और पराक्रम से युक्त, प्रियदर्शन, भारी बोझ ढोने में समर्थ, इच्छानुसार गमन करने वाला, रूप बदलने वाला, अत्यन्त बलवान बकरा स्कन्द को प्रदान किया।

श्लोक 184 (skanda.8.164.184)

ब्रह्मण्याय ददौ ब्रह्मा मेध्यं कृष्णाजिनाम्बरम् । प्रमदाहावविभ्रान्तं लोचनोदरसन्निभम्

brahmaṇyāya dadau brahmā medhyaṁ kṛṣṇājināmbaram | pramadāhāvavibhrāntaṁ locanodarasannibham

ब्रह्मा ने ब्राह्मणों के हितकारी स्कन्द को एक पवित्र काले मृग की खाल का वस्त्र प्रदान किया, जो नवयौवना के विलास के समान मनोहर और नेत्र-पुतली के समान गहरा वर्ण लिए था।

श्लोक 185 (skanda.8.164.185)

तेजसां निधये तस्मै ददौ दण्डं बृहस्पतिः । स्कन्दाय परमप्रीतश्चारुचामीकरस्रजम्

tejasāṁ nidhaye tasmai dadau daṇḍaṁ bṛhaspatiḥ | skandāya paramaprītaścārucāmīkarasrajam

बृहस्पति ने अत्यन्त प्रसन्न होकर तेजों के भण्डार-स्वरूप स्कन्द को एक सुन्दर स्वर्ण-माला से सुशोभित दण्ड प्रदान किया।

श्लोक 186 (skanda.8.164.186)

सेनापतिं तमभिषिच्य हुताशपुत्रं सम्यक् प्रहृष्टमनसो विबुधाः समेताः । दैत्येश्वरस्य निधनाय महाप्रभावा यात्रां सुरारिजयिनी सहिताः प्रचक्रुः

senāpatiṁ tamabhiṣicya hutāśaputraṁ samyak prahṛṣṭamanaso vibudhāḥ sametāḥ | daityeśvarasya nidhanāya mahāprabhāvā yātrāṁ surārijayinī sahitāḥ pracakruḥ

अग्निपुत्र को सेनापति-पद पर अभिषिक्त कर, सम्यक् प्रसन्नचित्त हुए वे समस्त देवगण मिलकर, दैत्यराज के विनाश के लिए, महाप्रभावशाली, शत्रु-विजयिनी उस यात्रा को आरम्भ करने लगे।

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