अम्बिका खण्ड · अध्याय 165
तारकवधः
श्लोक 1 (skanda.8.165.1)
सनत्कुमार उवाच स्कन्दं पुरोधाय सुराः समस्ताः सन्नाहयामासुरनीकमाशु । आहत्य भेरीः शतशो महद्भिर्दण्डैर्दृढं हाटकरत्नचित्रैः
sanatkumāra uvāca skandaṁ purodhāya surāḥ samastāḥ sannāhayāmāsuranīkamāśu | āhatya bherīḥ śataśo mahadbhirdaṇḍairdṛḍhaṁ hāṭakaratnacitraiḥ
सनत्कुमार ने कहा - स्कन्द को आगे रखकर सभी देवताओं ने तुरन्त सेना को युद्ध के लिए सुसज्जित किया, स्वर्ण और रत्नों से जड़ी भारी दण्डों से सैकड़ों भेरियाँ बजाते हुए।
श्लोक 2 (skanda.8.165.2)
दिग्वारणान् भूधरकूटकल्पान् मन्दाकिनीवारिभिराप्लुताङ्गान् । आनाय्य गन्धैर्विविधैश्च माल्यैरभ्यर्च्चयाञ्चक्रुरनीकमुख्याः
digvāraṇān bhūdharakūṭakalpān mandākinīvāribhirāplutāṅgān | ānāyya gandhairvividhaiśca mālyairabhyarccayāñcakruranīkamukhyāḥ
पर्वत-शिखरों जैसे विशाल दिशा-गजों को मन्दाकिनी (गंगा) के जल से स्नान कराकर लाया गया, और सेनापतियों ने उन्हें विविध सुगन्धों और मालाओं से पूजा।
श्लोक 3 (skanda.8.165.3)
चित्राणि वर्माणि ततो बबन्धुर्बद्घ्वा प्रयत्नातिशयेन कक्षे । तेषां सुयत्नाद् गजवाजिमुख्यान हैमानि यन्त्राणि तयायुधानाम्
citrāṇi varmāṇi tato babandhurbadghvā prayatnātiśayena kakṣe | teṣāṁ suyatnād gajavājimukhyāna haimāni yantrāṇi tayāyudhānām
तब बड़े यत्न से उन्होंने रंग-बिरंगे कवच कक्ष्य (पेटी) में कसकर बाँधे, और अत्यन्त परिश्रम से हाथियों-घोड़ों पर स्वर्णिम अस्त्र-उपकरण जड़े।
श्लोक 4 (skanda.8.165.4)
चित्राः समुच्छिश्रियिरे पताका ध्वजाश्च चामीकरचारुदण्डाः । क्षुरप्रमाला विविधा बबन्धुः पक्षेषु घण्टाश्च समाससर्ज्जुः
citrāḥ samucchiśriyire patākā dhvajāśca cāmīkaracārudaṇḍāḥ | kṣurapramālā vividhā babandhuḥ pakṣeṣu ghaṇṭāśca samāsasarjjuḥ
रंग-बिरंगी पताकाएँ और स्वर्ण-दण्डों वाली सुन्दर ध्वजाएँ फहराई गईं; भाथों में विविध क्षुरप्र-बाणों की पंक्तियाँ बाँधी गईं और घण्टियाँ लटकाई गईं।
श्लोक 5 (skanda.8.165.5)
रथञ्च कार्तस्वरचारुचक्रं सांग्रामिकं रत्नमरीचिचित्रम् । संयोजयामासुरुदारवेषैः प्रहृष्टचित्तैः खगमैस्तुरङ्गै द्वे
rathañca kārtasvaracārucakraṁ sāṁgrāmikaṁ ratnamarīcicitram | saṁyojayāmāsurudāraveṣaiḥ prahṛṣṭacittaiḥ khagamaisturaṅgai dve
स्वर्ण के सुन्दर पहियों वाला, रत्नों की आभा से चित्रित युद्ध-रथ जोता गया - उसमें आकाशगामी दो अश्व, हर्षित चित्त वाले, उत्तम साज-सज्जा में सजाकर जोते गए।
श्लोक 6 (skanda.8.165.6)
पर्यच्छमम्भोरुहगर्भगौरं बबन्ध शक्रः कवचं महार्हम् । वक्षस्यभेद्ये हरिचन्दनाक्ते वज्रप्रभाप्रज्वलितप्रकाशम्
paryacchamambhoruhagarbhagauraṁ babandha śakraḥ kavacaṁ mahārham | vakṣasyabhedye haricandanākte vajraprabhāprajvalitaprakāśam
इन्द्र ने कमल-गर्भ के समान गौर वर्ण का, अभेद्य, वक्षस्थल पर हरिचन्दन लगा हुआ, वज्र की प्रभा से प्रज्वलित महामूल्य कवच धारण किया।
श्लोक 7 (skanda.8.165.7)
बबन्धुरुच्चैर्विनियम्य पिङ्गा जटा भुजङ्गैर्बृहतीः श्वसद्भिः । चित्राणि हृष्टाः कवचानि रुद्रा वक्षस्सु दैत्यद्विपविक्षतेषु
babandhuruccairviniyamya piṅgā jaṭā bhujaṅgairbṛhatīḥ śvasadbhiḥ | citrāṇi hṛṣṭāḥ kavacāni rudrā vakṣassu daityadvipavikṣateṣu
रुद्रगण अपनी ऊँची पिंगल जटाओं को फुफकारते हुए बड़े सर्पों से कसकर बाँधकर, दैत्य-गजों से क्षत-विक्षत वक्षस्थलों पर हर्षपूर्वक रंग-बिरंगे कवच धारण करने लगे।
श्लोक 8 (skanda.8.165.8)
चित्रं दधानः कवचं महाद्युतिर्निबद्धनिस्त्रिंशतलाङ्गुलित्रवान् । बिभ्रद्धनुः सज्जमपीद्धपौरुषो जहौ शशाङ्कः सहजां न सौम्यताम्
citraṁ dadhānaḥ kavacaṁ mahādyutirnibaddhanistriṁśatalāṅgulitravān | bibhraddhanuḥ sajjamapīddhapauruṣo jahau śaśāṅkaḥ sahajāṁ na saumyatām
अद्भुत कवच धारण किए हुए, महातेजस्वी, तलवार-म्यान और अंगुलित्राण बाँधे, धनुष सन्नद्ध किए हुए पराक्रमी चन्द्रमा ने भी अपनी सहज सौम्यता नहीं छोड़ी।
श्लोक 9 (skanda.8.165.9)
यत्नाद् बन्द्बधुः कवचानि सूर्याः किञ्चित्प्रदीप्तानि तदा स्वदीप्त्या । लौहान्यभेद्यानि शरैः परास्तैश्चारूणि चामीकरचित्रितानि
yatnād bandbadhuḥ kavacāni sūryāḥ kiñcitpradīptāni tadā svadīptyā | lauhānyabhedyāni śaraiḥ parāstaiścārūṇi cāmīkaracitritāni
आदित्यगणों ने भी यत्नपूर्वक अपने ही तेज से किंचित् दीप्त, बाणों से भी अभेद्य, सुन्दर स्वर्ण-जटित कवच धारण किए।
श्लोक 10 (skanda.8.165.10)
निबद्धभास्वत्कवचः सुधन्वा सुपीननिस्त्रिंशनिबद्धपार्श्वः । गृहीतदण्डो विनिबद्धमौलिर्भयानकोभूत् सुतरां यमोपि
nibaddhabhāsvatkavacaḥ sudhanvā supīnanistriṁśanibaddhapārśvaḥ | gṛhītadaṇḍo vinibaddhamaulirbhayānakobhūt sutarāṁ yamopi
सुधन्वा (महाधनुर्धर यम) ने चमकता कवच बाँधकर, पुष्ट तलवार कमर में कसकर, दण्ड ग्रहण कर और मुकुट दृढ़ता से बाँधकर - इतना भयानक रूप धारण किया कि वह और भी अधिक भयंकर हो उठा।
श्लोक 11 (skanda.8.165.11)
रुचा परीतः परयातिमात्रं स्फुरन्मुहुः प्रोन्नतपूर्वकायः । पराभवं विद्विषतां समाजे प्रचेतसः ख्यापयतीव पाशः
rucā parītaḥ parayātimātraṁ sphuranmuhuḥ pronnatapūrvakāyaḥ | parābhavaṁ vidviṣatāṁ samāje pracetasaḥ khyāpayatīva pāśaḥ
अपने ही तेज से घिरा, आगे बढ़ते ही बार-बार काँपता हुआ, वक्षस्थल ऊँचा उठाए - मानो वरुण का पाश शत्रुओं की सभा में उनकी आसन्न पराजय की घोषणा कर रहा था।
श्लोक 12 (skanda.8.165.12)
दृष्टिं धनेशोपि हुताशपिङ्गां दधद् गदायां परिघोरुबाहुः । ईशप्रसादेन निजेन वेति सुरद्विषामाहनने विनाशम्
dṛṣṭiṁ dhaneśopi hutāśapiṅgāṁ dadhad gadāyāṁ parighorubāhuḥ | īśaprasādena nijena veti suradviṣāmāhanane vināśam
कुबेर (धनेश्वर) भी अग्नि के समान पिंगल दृष्टि गदा पर टिकाए, स्थूल भुजाओं वाले परिघ के साथ - मानो शिव की अपनी कृपा से देव-शत्रुओं के वध में विनाश की सूचना दे रहे थे।
श्लोक 13 (skanda.8.165.13)
सैन्येथ देवद्विषतां निपेतुरुल्काः स्फुरद्वह्निकणा बृहत्यः । विना घनैर्व्योम ररास भीमं सवृक्षशैला विचचाल चोर्वी
sainyetha devadviṣatāṁ nipeturulkāḥ sphuradvahnikaṇā bṛhatyaḥ | vinā ghanairvyoma rarāsa bhīmaṁ savṛkṣaśailā vicacāla corvī
तब देव-शत्रुओं की सेना पर चिंगारियाँ बिखेरती हुई विशाल उल्काएँ गिरने लगीं; बिना बादलों के भी आकाश भयंकर गर्जना करने लगा, और वृक्षों-पर्वतों सहित पृथ्वी काँप उठी।
श्लोक 14 (skanda.8.165.14)
रजो नभस्तः परितः पपात वातेरितं रासभपृष्ठधूस्रम् । ध्वजा निपेतुर्दृढहेमदण्ढा रक्ताम्बुवृष्टिं ससृजुः पयोदाः
rajo nabhastaḥ paritaḥ papāta vāteritaṁ rāsabhapṛṣṭhadhūsram | dhvajā nipeturdṛḍhahemadaṇḍhā raktāmbuvṛṣṭiṁ sasṛjuḥ payodāḥ
वायु से उड़ी हुई गर्दभ-पृष्ठ के समान धूसर धूल चारों ओर से गिरने लगी; दृढ़ स्वर्ण-दण्डों वाली ध्वजाएँ गिर पड़ीं, और मेघों ने रक्त-वर्ण जल की वृष्टि की।
श्लोक 15 (skanda.8.165.15)
मुहुर्मुहुर्दैन्यपरितचिताः कदुष्णमस्रं मुमुचुस्तुरङ्गाः । कपोलभित्तीः प्रजहौ गजानां मदश्च पारावतकण्ठनीलः
muhurmuhurdainyaparitacitāḥ kaduṣṇamasraṁ mumucusturaṅgāḥ | kapolabhittīḥ prajahau gajānāṁ madaśca pārāvatakaṇṭhanīlaḥ
बार-बार भय से पीड़ित घोड़े गरम आँसू बहाने लगे, और हाथियों के कपोल-भाग से पारावत-कण्ठ के समान श्याम मद बहने लगा।
श्लोक 16 (skanda.8.165.16)
स्थानेषु दीप्तेषु विनेदुरुच्चैर्दीप्तस्वराः पक्षिमृगाश्वसंघाः । प्रसादमालाः परितो विमृद्रन् ववौ विवृद्धः परुषो नभस्वान्
sthāneṣu dīpteṣu vineduruccairdīptasvarāḥ pakṣimṛgāśvasaṁghāḥ | prasādamālāḥ parito vimṛdran vavau vivṛddhaḥ paruṣo nabhasvān
प्रज्वलित दिशाओं में पक्षी, पशु और अश्व-समूह ऊँचे तीखे स्वर में चिल्लाने लगे; चारों ओर मंगल-मालाएँ मसल दी गईं, और प्रचण्ड, अत्यन्त तीव्र वायु बहने लगी।
श्लोक 17 (skanda.8.165.17)
सेना प्रहृष्टा महती सुराणामभ्याययौ दैत्यपतिं रराणा । दैत्योपि देवागमनं विदित्वा सन्नाहयामास तदा स्वसैन्यम्
senā prahṛṣṭā mahatī surāṇāmabhyāyayau daityapatiṁ rarāṇā | daityopi devāgamanaṁ viditvā sannāhayāmāsa tadā svasainyam
देवताओं की विशाल, हर्षित सेना गर्जना करती हुई दैत्यराज (तारक) की ओर बढ़ चली; दैत्य ने भी देवताओं का आगमन जानकर तब अपनी सेना सुसज्जित की।
श्लोक 18 (skanda.8.165.18)
सैन्यानि तानि त्रिदशासुराणामन्योन्यमासेदुरुदायुधानि । क्षुब्धान्यतीव प्रलये महाब्धेः पूर्वापराणीव तदा जलानि
sainyāni tāni tridaśāsurāṇāmanyonyamāsedurudāyudhāni | kṣubdhānyatīva pralaye mahābdheḥ pūrvāparāṇīva tadā jalāni
उठाए हुए शस्त्रों वाली देव और असुरों की वे सेनाएँ परस्पर भिड़ गईं - प्रलयकाल के महासागर के पूर्वी-पश्चिमी जलों के समान अत्यन्त क्षुब्ध।
श्लोक 19 (skanda.8.165.19)
निशाम्य दैत्या रणतूर्यनिस्वनं प्ररूढगर्वा बलिनो जयोत्सुकाः । अतिप्रहर्षादसमाप्तमङ्गला गृहीतशस्त्राः समराय निर्ययुः
niśāmya daityā raṇatūryanisvanaṁ prarūḍhagarvā balino jayotsukāḥ | atipraharṣādasamāptamaṅgalā gṛhītaśastrāḥ samarāya niryayuḥ
युद्ध-तूर्यों का घोष सुनकर, अहंकार से भरे, बलवान, विजय के लिए उत्सुक दैत्य - मंगल-कृत्य पूरा किए बिना ही अत्यधिक हर्ष से शस्त्र उठाकर युद्ध के लिए निकल पड़े।
श्लोक 20 (skanda.8.165.20)
रथाश्वपादातसमुद्धतं रजो रणाजिरे वानरकण्ठधूसरम् । स्वनश्च तेषामतिदारुणो महान् नभस्तदा व्याप दिशश्च सर्वतः
rathāśvapādātasamuddhataṁ rajo raṇājire vānarakaṇṭhadhūsaram | svanaśca teṣāmatidāruṇo mahān nabhastadā vyāpa diśaśca sarvataḥ
रथों, अश्वों और पैदल सैनिकों से उठी वानर-कण्ठ के समान धूसर धूल रणभूमि में छा गई, और उनका अत्यन्त भयंकर महान् घोष आकाश और सभी दिशाओं में फैल गया।
श्लोक 21 (skanda.8.165.21)
समुद्यतैर्दानवदेवतायुधैर्ध्वजैः पताकातपवारणैस्तथा । बभौ सविद्युच्छशिशक्रकार्मुकं सहंसपंक्तीव तदा नभस्तलम्
samudyatairdānavadevatāyudhairdhvajaiḥ patākātapavāraṇaistathā | babhau savidyucchaśiśakrakārmukaṁ sahaṁsapaṁktīva tadā nabhastalam
दानवों और देवताओं के उठाए हुए आयुधों, ध्वजों, पताकाओं और छत्रों से - बिजली, चन्द्र और इन्द्रधनुष सहित वह आकाश-मण्डल तब हंसों की पंक्ति के समान शोभित हुआ।
श्लोक 22 (skanda.8.165.22)
शस्त्राणि गात्रेषु तनुत्रवत्सु निपात्यमानानि परस्परस्य । दैत्यामरैराहनने प्रचक्रुः शब्दं स्फुरद्वह्नकिणैः समेतम्
śastrāṇi gātreṣu tanutravatsu nipātyamānāni parasparasya | daityāmarairāhanane pracakruḥ śabdaṁ sphuradvahnakiṇaiḥ sametam
कवच-धारी अंगों पर परस्पर गिरते हुए शस्त्रों से दैत्य और देवताओं ने उस संघर्ष में चिंगारियाँ बिखेरते हुए तुमुल शब्द उत्पन्न किया।
श्लोक 23 (skanda.8.165.23)
दृष्ट्वासुरान् सत्वबलोपपन्नान् सुरास्सहायाननपेक्ष्य केचित् । सन्नेहिरे मत्तगजानिवेभा मदाम्बुभिः श्यामकपोलदेशाः
dṛṣṭvāsurān satvabalopapannān surāssahāyānanapekṣya kecit | sannehire mattagajānivebhā madāmbubhiḥ śyāmakapoladeśāḥ
बल-वीर्य से सम्पन्न असुरों को देखकर, देवताओं में से कुछ ने सहायकों की प्रतीक्षा किए बिना ही स्वयं को सन्नद्ध कर लिया, मानो मदोन्मत्त गजों के समान उनके कपोल मद-जल से श्याम हो गए हों।
श्लोक 24 (skanda.8.165.24)
बलानि वेगादभिसृत्य दूरमग्रेसराणि त्रिदशासुराणाम् । स्वजीविताशामपहाय जघ्नुरन्योन्यमाविष्कृतपौरुषाणि
balāni vegādabhisṛtya dūramagresarāṇi tridaśāsurāṇām | svajīvitāśāmapahāya jaghnuranyonyamāviṣkṛtapauruṣāṇi
देवताओं और असुरों के अग्रगामी सैन्यदल वेग से दूर तक टूट पड़े, और अपने प्राणों की आशा त्यागकर अपना-अपना पराक्रम प्रकट करते हुए एक-दूसरे का वध करने लगे।
श्लोक 25 (skanda.8.165.25)
निकामवैराशयमानसानां जिघांसता तत्र परस्परेण । स संप्रहारस्तुमुलस्तदासीत् सुरासुराणामनवो महाजौ
nikāmavairāśayamānasānāṁ jighāṁsatā tatra paraspareṇa | sa saṁprahārastumulastadāsīt surāsurāṇāmanavo mahājau
परस्पर वैर-भाव से भरे, एक-दूसरे को मार डालने की इच्छा रखने वालों के बीच वहाँ देवताओं और असुरों का वह तुमुल संग्राम उस समय अभूतपूर्व हो उठा।
श्लोक 26 (skanda.8.165.26)
सेदुर्गजास्तोमरशक्तिभिन्नास्तुरङ्गमा बाणहता निपेतुः । सफेनमास्यै रुधिरं वमन्तो दृढप्रहारान्मुमुहुश्च योधाः
sedurgajāstomaraśaktibhinnāsturaṅgamā bāṇahatā nipetuḥ | saphenamāsyai rudhiraṁ vamanto dṛḍhaprahārānmumuhuśca yodhāḥ
तोमरों और शक्तियों से बिंधे हाथी गिर पड़े, बाणों से आहत घोड़े ढह गए; मुख से झागयुक्त रक्त वमन करते हुए योद्धा प्रबल प्रहारों से मूर्च्छित हो गए।
श्लोक 27 (skanda.8.165.27)
छिन्नानि पेतुर्निशितैः क्षुरप्रैः सकुण्डलान्याननपङ्कजानि । अन्योन्यमाविष्कृतदर्परोषैर्महाहवे दानवदेवमुख्यैः
chinnāni peturniśitaiḥ kṣurapraiḥ sakuṇḍalānyānanapaṅkajāni | anyonyamāviṣkṛtadarparoṣairmahāhave dānavadevamukhyaiḥ
उस महासमर में परस्पर अहंकार और क्रोध प्रकट करने वाले दैत्य और देव-श्रेष्ठों के कुण्डल-सहित मुख-कमल तीखे क्षुरप्र-बाणों से कटकर गिर पड़े।
श्लोक 28 (skanda.8.165.28)
ता मातरस्ते च गणा विचेरुर्विपोथयन्तः समरेरिसंघान् । मुष्टिप्रहारैस्तलपार्ष्णिघातैर्विकर्षणावेष्टनपीडनैश्च
tā mātaraste ca gaṇā vicerurvipothayantaḥ samarerisaṁghān | muṣṭiprahāraistalapārṣṇighātairvikarṣaṇāveṣṭanapīḍanaiśca
वे मातृकाएँ और गणगण युद्ध में शत्रु-सेना को घूँसों, थप्पड़ों और एड़ी की चोटों से, तथा घसीटकर, घेरकर और दबाकर पीटते हुए घूमने लगे - [आगे का अंश मूल में लुप्त है]।
श्लोक 29 (skanda.8.165.29)
मातङ्गमुख्यान् द्विरदैः प्रभिन्नैस्तुरङ्गमान् वाजिभिरुत्तमाँश्च । रथान् रथैः पत्तिगणान् पदातैर्गणा निजघ्नुर्युधि दानवानाम्
mātaṅgamukhyān dviradaiḥ prabhinnaisturaṅgamān vājibhiruttamāṁśca | rathān rathaiḥ pattigaṇān padātairgaṇā nijaghnuryudhi dānavānām
गणों ने युद्ध में शत्रु-दैत्यों के प्रमुख हाथियों को अपने ही विदीर्ण करने वाले गजों से, घोड़ों को उत्तम अश्वों से, रथों को रथों से, और पैदल सैनिकों को पैदल सैनिकों से मार गिराया।
श्लोक 30 (skanda.8.165.30)
उत्पत्य वेगादिषुभिर्गणेन्द्रा गजाधिरूढान् दितिजेन्द्रयोधान् । मुष्टिप्रहारैः कुलिशोग्रपातैर्विभिन्नमस्तिष्कविनिर्गताक्षान्
utpatya vegādiṣubhirgaṇendrā gajādhirūḍhān ditijendrayodhān | muṣṭiprahāraiḥ kuliśograpātairvibhinnamastiṣkavinirgatākṣān
वेग से बाणों सहित कूदकर, गणों के स्वामियों ने गजारूढ़ दैत्येन्द्र-योद्धाओं को घूँसों और वज्र-सम तीव्र प्रहारों से - जिनसे मस्तक फट गए और आँखें बाहर निकल आईं - मार डाला।
श्लोक 31 (skanda.8.165.31)
परश्वधैश्चिच्छिदुरात्तरोषाः खड्गैश्चकर्तुर्बिभिदुश्च शूलैः । महाद्विपालाननितान्तपीनैः प्रपोथयाञ्चक्रुररीन् भुजैश्च
paraśvadhaiścicchidurāttaroṣāḥ khaḍgaiścakarturbibhiduśca śūlaiḥ | mahādvipālānanitāntapīnaiḥ prapothayāñcakrurarīn bhujaiśca
क्रोध से भरकर वे कुल्हाड़ियों से काटने लगे, तलवारों से चीरने लगे और त्रिशूलों से बींधने लगे; महागजों के मस्तक के समान स्थूल भुजाओं से शत्रुओं को कुचल डाला।
श्लोक 32 (skanda.8.165.32)
देव्योपि तान् दैत्यगणान् निजघ्नुर्महासमाजे समुपात्तशस्त्रान् । उत्पत्य वाजिप्रवराधिरूढान् रथस्थितान् वारणधूर्गतांश्च
devyopi tān daityagaṇān nijaghnurmahāsamāje samupāttaśastrān | utpatya vājipravarādhirūḍhān rathasthitān vāraṇadhūrgatāṁśca
देवियों ने भी उस महासमाज में शस्त्रधारी दैत्य-गणों को मार डाला, उत्तम अश्वों पर, रथों पर और गजों की पीठ पर बैठे हुओं पर कूदकर।
श्लोक 33 (skanda.8.165.33)
प्रचुक्षुभे तद्बलमासुरं तदा गणेन्द्रनिष्पिष्टबलाग्रनायकम् । गुरुत्मतः पक्षसमीरणाहतं महाह्रदं यद्वदगाधमम्बुधेः
pracukṣubhe tadbalamāsuraṁ tadā gaṇendraniṣpiṣṭabalāgranāyakam | gurutmataḥ pakṣasamīraṇāhataṁ mahāhradaṁ yadvadagādhamambudheḥ
गणों के स्वामियों द्वारा अग्रणी सेनापति कुचले जाने से वह असुर-सेना उसी क्षण अत्यन्त क्षुब्ध हो उठी - मानो गरुड़ के पंखों की वायु से क्षुब्ध सागर का अथाह महाह्रद हो।
श्लोक 34 (skanda.8.165.34)
अथाभिवीक्ष्य प्रसभं गणाधिपैर्निहन्यमानानि बलानि तारकः । रुषा तदा ताम्रतरायतेक्षणः समभ्यगान्मौलिबलाभिपालितः
athābhivīkṣya prasabhaṁ gaṇādhipairnihanyamānāni balāni tārakaḥ | ruṣā tadā tāmratarāyatekṣaṇaḥ samabhyagānmaulibalābhipālitaḥ
तब गणपतियों द्वारा बलपूर्वक अपनी सेनाओं को मारा जाता देख, तारक क्रोध से ताम्रवर्ण विशाल नेत्रों वाला होकर, अपने मुकुटधारी बल से सुरक्षित होकर आगे बढ़ा।
श्लोक 35 (skanda.8.165.35)
विस्फार्य शक्राशनितुल्यनिस्वनं रत्नप्रभाप्रज्वलितं स कार्मुकम् । संछादयन् बाणतलैर्नभस्तलं मर्मातिगैः कङ्कमयूरपत्रिभिः
visphārya śakrāśanitulyanisvanaṁ ratnaprabhāprajvalitaṁ sa kārmukam | saṁchādayan bāṇatalairnabhastalaṁ marmātigaiḥ kaṅkamayūrapatribhiḥ
इन्द्र के वज्र-निर्घोष के समान टंकार करता, रत्न-प्रभा से जाज्वल्यमान धनुष खींचकर, उसने मर्मभेदी कंक और मयूर-पंखों वाले बाणों की पंक्तियों से आकाश-तल को ढक दिया।
श्लोक 36 (skanda.8.165.36)
तस्यागमं दैत्यपतेर्विदित्वा तदाननादानलसूनुरुच्चैः । स्वपाणिसस्थामभिवीक्ष्य शक्तिं विचित्रचामीकरचारुघण्टाम्
tasyāgamaṁ daityapaterviditvā tadānanādānalasūnuruccaiḥ | svapāṇisasthāmabhivīkṣya śaktiṁ vicitracāmīkaracārughaṇṭām
दैत्यराज के आगमन को जानकर, अग्निपुत्र (स्कन्द) ने अपने मुखों से ऊँचा घोष करते हुए, अपने ही हाथ में स्थित, विचित्र स्वर्ण-घण्टिकाओं से सुशोभित शक्ति की ओर देखा।
श्लोक 37 (skanda.8.165.37)
नभो विगाह्य प्रदिशो दिशश्च स कार्त्तिकेयस्य तदा निनादः । मनांसि देवद्विषतां प्रसह्य विमोहयामास महासमाजे
nabho vigāhya pradiśo diśaśca sa kārttikeyasya tadā ninādaḥ | manāṁsi devadviṣatāṁ prasahya vimohayāmāsa mahāsamāje
आकाश और सभी दिशाओं में व्याप्त होकर कार्तिकेय की वह हुंकार महासभा में देव-शत्रुओं के मन को बलपूर्वक मोहित कर बैठी।
श्लोक 38 (skanda.8.165.38)
अथापतन्तं समभीक्ष्य तारकं बलेन गुप्तं महता महाहवे । मुमोच शक्तिं ज्वलितानलप्रभां विनाशनायामरविद्विषां गुहः
athāpatantaṁ samabhīkṣya tārakaṁ balena guptaṁ mahatā mahāhave | mumoca śaktiṁ jvalitānalaprabhāṁ vināśanāyāmaravidviṣāṁ guhaḥ
तब महासमर में विशाल सेना से रक्षित तारक को आक्रमण करते देख, गुह ने देव-शत्रुओं के विनाश के लिए अग्नि के समान प्रज्वलित शक्ति का प्रक्षेप किया।
श्लोक 39 (skanda.8.165.39)
सा तेन मुक्ता ज्वलनात्मजेन ज्वालाभिरावृत्य नभो दिशश्च । अनेकधा व्योम्न्यभवत् सुघोरा मायेव दैत्यान् परिमोहयन्ती
sā tena muktā jvalanātmajena jvālābhirāvṛtya nabho diśaśca | anekadhā vyomnyabhavat sughorā māyeva daityān parimohayantī
अग्निपुत्र द्वारा छोड़ी गई वह शक्ति ज्वालाओं से आकाश और दिशाओं को घेरकर अनेक रूपों में अत्यन्त भयंकर बन गई, मानो माया से दैत्यों को मोहित कर रही हो।
श्लोक 40 (skanda.8.165.40)
पपात वक्षःसु च सहतेषु सुरद्विषां चित्रतनुत्रभृत्सु । समं समस्तैस्त्वनिवार्यवेगा विदार्य चोरांसि विवेश तूर्णम्
papāta vakṣaḥsu ca sahateṣu suradviṣāṁ citratanutrabhṛtsu | samaṁ samastaistvanivāryavegā vidārya corāṁsi viveśa tūrṇam
वह अजेय वेग वाली शक्ति देव-शत्रुओं के विचित्र कवच-युक्त वक्षस्थलों पर एक साथ गिरकर उनके वक्षों को विदीर्ण करती हुई शीघ्र ही भीतर घुस गई।
श्लोक 41 (skanda.8.165.41)
देवद्विषस्तेभिहतास्समस्ताः पर्यस्तपृथ्वायतरक्तनेत्राः । सन्दष्टजिह्वाधरविह्वलाङ्गाः प्राणाञ्जहुः शोणितमुद्वमन्तः
devadviṣastebhihatāssamastāḥ paryastapṛthvāyataraktanetrāḥ | sandaṣṭajihvādharavihvalāṅgāḥ prāṇāñjahuḥ śoṇitamudvamantaḥ
उससे आहत सभी देव-शत्रु, चौड़ी लाल आँखों वाले, पृथ्वी पर लोटते हुए, जीभ और होंठ काटते, अंगों में विह्वल होकर रक्त वमन करते हुए प्राण त्याग बैठे।
श्लोक 42 (skanda.8.165.42)
तमांसि यद्वत् सविता भिनत्ति समं मयूखैरतिरस्कृतानि । बिभेद तद्वद् द्विषतां बलानि रणाजिरे शक्तिभिरग्निसूनुः
tamāṁsi yadvat savitā bhinatti samaṁ mayūkhairatiraskṛtāni | bibheda tadvad dviṣatāṁ balāni raṇājire śaktibhiragnisūnuḥ
जैसे सूर्य अपनी किरणों से अंधकार को समूल विदीर्ण कर देता है, वैसे ही अग्निपुत्र (स्कन्द) ने रणभूमि में अपनी शक्तियों से शत्रु-सेनाओं को विदीर्ण कर डाला।
श्लोक 43 (skanda.8.165.43)
निहत्य देवद्विषतः समस्तान् रणाजिरे प्रोन्नतदर्पवीर्यान् । प्रभेव सूर्यं परितप्य लोकान् पुनस्तदा स्कन्दमियाय शक्तिः
nihatya devadviṣataḥ samastān raṇājire pronnatadarpavīryān | prabheva sūryaṁ paritapya lokān punastadā skandamiyāya śaktiḥ
रणभूमि में अभिमान और पराक्रम से उन्नत सभी देव-शत्रुओं का वध करके, लोकों को संतप्त करने वाली सूर्य-प्रभा के समान वह शक्ति पुनः स्कन्द के पास लौट आई।
श्लोक 44 (skanda.8.165.44)
दितितनयसमूहैः सार्धमाविप्रतापैः समरशिरसि हत्वा तारक दैत्यराजम् । त्रिदशसमितिमुख्यैः स्तूयमानः प्रहृष्टैः प्रतिगमदमितौजाः शूलपाणेः समीपम्
dititanayasamūhaiḥ sārdhamāvipratāpaiḥ samaraśirasi hatvā tāraka daityarājam | tridaśasamitimukhyaiḥ stūyamānaḥ prahṛṣṭaiḥ pratigamadamitaujāḥ śūlapāṇeḥ samīpam
दिति के पुत्रों (दैत्यों) के समूह सहित (जिनका पाठ मूल में अनिश्चित है) रणभूमि के अग्रभाग में दैत्यराज तारक का वध करके, देव-सभा के प्रमुखों द्वारा हर्षपूर्वक स्तुति किया जाता हुआ, वह अमित तेजस्वी (स्कन्द) शूलपाणि (शिव) के समीप लौट आया।