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अम्बिका खण्ड · अध्याय 166

श्वेतवरप्रदान

अध्याय 165अध्याय-सूचीअध्याय 167

श्लोक 1 (skanda.8.166.1)

व्यास उवाच । भगवन् सर्वधर्मज्ञ महायोगबलान्वित । श्रुतमेतन्मया कृत्स्नं स्कन्दस्य चरितं महत्

vyāsa uvāca | bhagavan sarvadharmajña mahāyogabalānvita | śrutametanmayā kṛtsnaṁ skandasya caritaṁ mahat

व्यास ने कहा - हे भगवन्! हे सर्वधर्मज्ञ! हे महायोगबल से संपन्न! मैंने स्कन्द का यह सम्पूर्ण महान् चरित्र सुन लिया।

श्लोक 2 (skanda.8.166.2)

त्वत्तः परमयोगेश गुह्यं भगवतः परम् । ततः परं स देवेशस्त्रिपुरारिर्वृषध्वजः

tvattaḥ paramayogeśa guhyaṁ bhagavataḥ param | tataḥ paraṁ sa deveśastripurārirvṛṣadhvajaḥ

हे परम योगेश्वर! आपसे भगवान् का यह परम गुह्य रहस्य मैंने सुना। तदनन्तर उन त्रिपुरारि वृषभध्वज देवेश ने -

श्लोक 3 (skanda.8.166.3)

संप्रेष्य सहितं देवैर्महासेनापतिं गुहम् । संन्यस्य देवताः स्कन्दे किमन्यदकरोत् प्रभुः

saṁpreṣya sahitaṁ devairmahāsenāpatiṁ guham | saṁnyasya devatāḥ skande kimanyadakarot prabhuḥ

- देवताओं को महासेनापति गुह (स्कन्द) के साथ भेजकर, स्कन्द को देवगणों का भार सौंपकर, प्रभु ने और क्या किया?

श्लोक 4 (skanda.8.166.4)

क्व जगाम च देवेशः किमुवाचाचलात्मजा । कानि चैनमुमा प्राह शंसैतत् पृच्छतो मम

kva jagāma ca deveśaḥ kimuvācācalātmajā | kāni cainamumā prāha śaṁsaitat pṛcchato mama

देवेश्वर कहाँ गये? पर्वतपुत्री ने उनसे क्या कहा? उमा ने उनसे कैसे वचन कहे? मुझ पूछनेवाले को यह बताइये।

श्लोक 5 (skanda.8.166.5)

सूत उवाच । व्यासेनैवं तदा पृष्ट आख्यातुमुपचक्रमे । सर्वागमपरार्थज्ञो ब्रह्मसूनुर्महातपाः

sūta uvāca | vyāsenaivaṁ tadā pṛṣṭa ākhyātumupacakrame | sarvāgamaparārthajño brahmasūnurmahātapāḥ

सूत ने कहा - इस प्रकार व्यास द्वारा पूछे जाने पर, समस्त आगमों के परम अर्थ को जाननेवाले, महान् तपस्वी ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार कहने लगे।

श्लोक 6 (skanda.8.166.6)

सनत्कुमार उवाच । संन्यस्य षण्मुखे देवान् देवदेवो भवस्तदा । जगाम सहितो देव्या मन्दरं हेमकन्दरम्

sanatkumāra uvāca | saṁnyasya ṣaṇmukhe devān devadevo bhavastadā | jagāma sahito devyā mandaraṁ hemakandaram

सनत्कुमार ने कहा - देवताओं को षण्मुख (स्कन्द) पर छोड़कर, देवदेव भव तब देवी के साथ स्वर्णगुहाओं वाले मन्दराचल पर्वत पर गये।

श्लोक 7 (skanda.8.166.7)

तस्तस्थावासने तत्र हैमे महति सुप्रभे । नानारत्नसमाकीर्णे हेमशृङ्ग इवोच्छ्रिते

tastasthāvāsane tatra haime mahati suprabhe | nānāratnasamākīrṇe hemaśṛṅga ivocchrite

वहाँ वे एक विशाल, अत्यन्त प्रकाशमान, अनेक रत्नों से जड़े हुए, स्वर्णशिखर के समान ऊँचे स्वर्णासन पर विराजमान हुए।

श्लोक 8 (skanda.8.166.8)

तस्य पार्श्वे स्थिता देवी रराज हिमवत्सुता । व्यभ्रे वियति पूर्णेन्दो रोहिणीव समीपगा

tasya pārśve sthitā devī rarāja himavatsutā | vyabhre viyati pūrṇendo rohiṇīva samīpagā

उनके पार्श्व में स्थित हिमवत्सुता देवी वैसे ही सुशोभित हुईं जैसे मेघरहित आकाश में पूर्णचन्द्र के समीप रोहिणी शोभित होती है।

श्लोक 9 (skanda.8.166.9)

सोवाच परमेशानं प्रणम्य गिरिजा तदा । सहधर्मचरी यस्मात् प्रिया चाहमतीव ते

sovāca parameśānaṁ praṇamya girijā tadā | sahadharmacarī yasmāt priyā cāhamatīva te

तब गिरिजा ने परमेश्वर को प्रणाम कर कहा - चूँकि मैं आपकी सहधर्मचारिणी और अत्यन्त प्रिया हूँ,

श्लोक 10 (skanda.8.166.10)

पूर्वप्रणयलब्धा च तेन पृच्छाम्यशङ्किता । पावनानि पवित्राणि नामानि तव कामद

pūrvapraṇayalabdhā ca tena pṛcchāmyaśaṅkitā | pāvanāni pavitrāṇi nāmāni tava kāmada

और पूर्व स्नेह से प्राप्त अधिकार से, मैं निःशंक होकर पूछती हूँ - हे कामद! अपने पवित्र, पावन नामों को

श्लोक 11 (skanda.8.166.11)

सार्थानि श्रोतुमिच्छामि कथितानि त्वया विभो । एवं पृष्टस्तदा गौर्या प्राह सर्वं सुराधिपः

sārthāni śrotumicchāmi kathitāni tvayā vibho | evaṁ pṛṣṭastadā gauryā prāha sarvaṁ surādhipaḥ

उनके अर्थ सहित सुनना चाहती हूँ जो आपने ही कहे हैं, हे विभु! इस प्रकार गौरी के पूछने पर देवाधिदेव ने सब कुछ कहा।

श्लोक 12 (skanda.8.166.12)

सर्वयज्ञफलैस्तुल्यं नाम्नामर्थप्रबोधनम् । मम देवि परं गुह्यं ब्रह्माद्या यद्विजानते

sarvayajñaphalaistulyaṁ nāmnāmarthaprabodhanam | mama devi paraṁ guhyaṁ brahmādyā yadvijānate

हे देवि! मेरे नामों के अर्थ का यह बोध समस्त यज्ञों के फल के तुल्य है; यह मेरा परम गुह्य रहस्य है, जिसे ब्रह्मादि देवता जानते हैं।

श्लोक 13 (skanda.8.166.13)

तत् प्रवक्ष्यामि ते देवि येन देवत्वमाप्यते । रुजः सर्वगतो यस्माद् द्रावयामि जगत्यहम्

tat pravakṣyāmi te devi yena devatvamāpyate | rujaḥ sarvagato yasmād drāvayāmi jagatyaham

हे देवि! मैं तुम्हें वह बताऊँगा जिससे देवत्व प्राप्त होता है। चूँकि मैं समस्त व्यापी रोगों को जगत् से दूर कर देता हूँ,

श्लोक 14 (skanda.8.166.14)

रोदनं हन्मि यस्माच्च रुद्रस्तस्मादहं प्रिये । संहरामि जगत् कृत्स्नमन्तकाले यतो ह्यहम्

rodanaṁ hanmi yasmācca rudrastasmādahaṁ priye | saṁharāmi jagat kṛtsnamantakāle yato hyaham

और चूँकि मैं रुदन (दुःख) का नाश करता हूँ, हे प्रिये! इसीलिये मैं 'रुद्र' कहलाता हूँ। और चूँकि मैं प्रलयकाल में सम्पूर्ण जगत् का संहार करता हूँ,

श्लोक 15 (skanda.8.166.15)

मृत्युहर्त्ता यतश्चापि हरस्तेन प्रकीर्त्तितः । पुरं शरीरमाख्यातं सर्वेषां प्राणिनामिह

mṛtyuharttā yataścāpi harastena prakīrttitaḥ | puraṁ śarīramākhyātaṁ sarveṣāṁ prāṇināmiha

और चूँकि मैं मृत्यु का हरण करनेवाला भी हूँ, इसलिये मैं 'हर' कहलाता हूँ। यहाँ सब प्राणियों का शरीर 'पुर' कहा गया है,

श्लोक 16 (skanda.8.166.16)

सर्वप्राणिगतं यस्मात् तत्पुरं शयनं मम । तस्मात् पुरुष इत्येव मम नाम महर्द्धिमत्

sarvaprāṇigataṁ yasmāt tatpuraṁ śayanaṁ mama | tasmāt puruṣa ityeva mama nāma maharddhimat

और चूँकि वह पुर, जो सब प्राणियों में स्थित है, मेरा शयनस्थान है, इसीलिये मेरा महान् ऐश्वर्यशाली नाम 'पुरुष' है।

श्लोक 17 (skanda.8.166.17)

कदाचिन्नैव जातोहं न च मे जन्म यत् क्वचित् । अजस्ततोहमीशानि सर्वदैव प्रकीर्त्तितः

kadācinnaiva jātohaṁ na ca me janma yat kvacit | ajastatohamīśāni sarvadaiva prakīrttitaḥ

हे ईशानि! मैं कभी भी उत्पन्न नहीं हुआ, मेरा जन्म कहीं भी नहीं है; इसलिये मैं सदा 'अज' (अजन्मा) कहलाता हूँ।

श्लोक 18 (skanda.8.166.18)

अभावं मयि गत्वा तु जगत् स्थावरजङ्गमम् । पुनर्भवति मत्तश्च भवस्तेन निरूपितः

abhāvaṁ mayi gatvā tu jagat sthāvarajaṅgamam | punarbhavati mattaśca bhavastena nirūpitaḥ

चराचर जगत् मुझमें विलीन होकर पुनः मुझसे ही उत्पन्न होता है, इसीलिये मुझे 'भव' कहा गया है।

श्लोक 19 (skanda.8.166.19)

महतामपि देवानामहमेव महान् यतः । न च मत्तो महानन्यो महादेवस्ततो ह्यहम्

mahatāmapi devānāmahameva mahān yataḥ | na ca matto mahānanyo mahādevastato hyaham

चूँकि मैं महान् देवताओं में भी सबसे महान् हूँ, और मुझसे बढ़कर कोई महान् नहीं है, इसीलिये मैं 'महादेव' हूँ।

श्लोक 20 (skanda.8.166.20)

पालयामि पशून् यस्मात् सृजामि च यदृच्छया । तेषाञ्च पतिरेवाहं तस्मात् पशुपतिः स्मृतः

pālayāmi paśūn yasmāt sṛjāmi ca yadṛcchayā | teṣāñca patirevāhaṁ tasmāt paśupatiḥ smṛtaḥ

चूँकि मैं पशुओं (जीवों) का पालन करता हूँ, अपनी इच्छा से उन्हें उत्पन्न करता हूँ, और उनका स्वामी हूँ, इसीलिये मैं 'पशुपति' कहलाता हूँ।

श्लोक 21 (skanda.8.166.21)

ईश एवाहमन्येषां न च मामीशते परे । नयामि चेशतां भक्तानीशानस्तेन कीर्त्तितः

īśa evāhamanyeṣāṁ na ca māmīśate pare | nayāmi ceśatāṁ bhaktānīśānastena kīrttitaḥ

मैं ही सबका स्वामी हूँ, कोई अन्य मुझ पर शासन नहीं करता; और अपने भक्तों को ऐश्वर्य की ओर ले जाता हूँ, इसीलिये मैं 'ईशान' कहा जाता हूँ।

श्लोक 22 (skanda.8.166.22)

दिशो हि मम वासांसि सर्वदिक्षु वसाम्यहम् । वासश्चाहं दिशां यस्माद् दिग्वासास्तेन संस्मृतः

diśo hi mama vāsāṁsi sarvadikṣu vasāmyaham | vāsaścāhaṁ diśāṁ yasmād digvāsāstena saṁsmṛtaḥ

दिशाएँ ही मेरे वस्त्र हैं, मैं सब दिशाओं में निवास करता हूँ; और चूँकि मैं ही दिशाओं का आवरण हूँ, इसीलिये मुझे 'दिग्वासा' कहा गया है।

श्लोक 23 (skanda.8.166.23)

भूतानां शङ्करो यस्मात् तेनाहं शङ्करः स्मृतः । लोकानां शिबकृद् यस्माच्छिवस्तस्मादहं स्मृतः

bhūtānāṁ śaṅkaro yasmāt tenāhaṁ śaṅkaraḥ smṛtaḥ | lokānāṁ śibakṛd yasmācchivastasmādahaṁ smṛtaḥ

चूँकि मैं प्राणियों का कल्याण करनेवाला हूँ, इसीलिये मैं 'शंकर' कहलाता हूँ; और चूँकि मैं लोकों का शिव (कल्याण) करता हूँ, इसीलिये मैं 'शिव' कहलाता हूँ।

श्लोक 24 (skanda.8.166.24)

नीलं येन ममाङ्गस्य संरक्तं लोहितत्विषम् । नीललोहित इत्येव तेनाहं परिकीर्तितः

nīlaṁ yena mamāṅgasya saṁraktaṁ lohitatviṣam | nīlalohita ityeva tenāhaṁ parikīrtitaḥ

जिस कारण मेरे अंग का नीला रंग रक्तवर्ण की आभा से मिश्रित है, उसी कारण मैं 'नीललोहित' कहलाता हूँ।

श्लोक 25 (skanda.8.166.25)

शूली शूलेन संप्रोक्तो लकुलेन च लाकुली । रुद्रेति कीर्तिते देवि अग्निष्टोमफलं स्मृतम्

śūlī śūlena saṁprokto lakulena ca lākulī | rudreti kīrtite devi agniṣṭomaphalaṁ smṛtam

शूल धारण करने के कारण मैं 'शूली' और लकुट धारण करने के कारण 'लाकुली' कहा जाता हूँ। हे देवि! 'रुद्र' नाम के कीर्तन से अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 26 (skanda.8.166.26)

हरेत्यभिहिते चापि गोसवस्य फलं लभेत् । भवेति कीर्तिते सद्यः सर्वपापैर्विमुच्यते

haretyabhihite cāpi gosavasya phalaṁ labhet | bhaveti kīrtite sadyaḥ sarvapāpairvimucyate

'हर' कहने से गोसव यज्ञ का फल प्राप्त होता है। 'भव' कह देने मात्र से मनुष्य तुरन्त समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 27 (skanda.8.166.27)

पुरुषेति परं सौख्यमजेति च सलोकताम् । ईशानेति महैश्वर्यं महादेवेति चाक्षयम्

puruṣeti paraṁ saukhyamajeti ca salokatām | īśāneti mahaiśvaryaṁ mahādeveti cākṣayam

'पुरुष' कहने से परम सुख, 'अज' कहने से सालोक्य, 'ईशान' कहने से महान् ऐश्वर्य, और 'महादेव' कहने से अक्षय पद प्राप्त होता है।

श्लोक 28 (skanda.8.166.28)

दिग्वासेति परं मोक्षं शङ्करेति सुखं महत् । शिवेति शिवमत्यर्थं शूलीति परमं बलम्

digvāseti paraṁ mokṣaṁ śaṅkareti sukhaṁ mahat | śiveti śivamatyarthaṁ śūlīti paramaṁ balam

'दिग्वासा' कहने से परम मोक्ष, 'शंकर' कहने से महान् सुख, 'शिव' कहने से अत्यन्त कल्याण, और 'शूली' कहने से परम बल प्राप्त होता है।

श्लोक 29 (skanda.8.166.29)

लाकुलीति परांल्लोकान् कीर्तर्येल्लभते नरः । सर्वयज्ञफलानीह कीर्त्तयन्नीललोहितम्

lākulīti parāṁllokān kīrtaryellabhate naraḥ | sarvayajñaphalānīha kīrttayannīlalohitam

'लाकुली' कहने से मनुष्य परम लोकों को प्राप्त करता है। 'नीललोहित' नाम का कीर्तन करने से यहाँ समस्त यज्ञों के फल प्राप्त होते हैं।

श्लोक 30 (skanda.8.166.30)

लभते देवि मद्भक्तो मयि चावासमव्ययम् । एवं तत् कथितं व्यास नाम्नामर्थप्रबोधनम्

labhate devi madbhakto mayi cāvāsamavyayam | evaṁ tat kathitaṁ vyāsa nāmnāmarthaprabodhanam

हे देवि! मेरा भक्त इस प्रकार मुझमें अविनाशी निवास प्राप्त करता है। हे व्यास! इस प्रकार मैंने नामों के अर्थ का यह बोध कह दिया।

श्लोक 31 (skanda.8.166.31)

शूलिना देवदेवेन देव्याः प्रियहितेच्छया । किमन्यत् पृच्छसि ब्रह्मन् वद यावद् ब्रवीमि ते

śūlinā devadevena devyāḥ priyahitecchayā | kimanyat pṛcchasi brahman vada yāvad bravīmi te

यह शूलधारी देवदेव ने देवी के प्रिय एवं हित की इच्छा से कहा। हे ब्रह्मन्! अब तुम और क्या पूछना चाहते हो? कहो, जब तक मैं तुम्हें बताऊँ।

श्लोक 32 (skanda.8.166.32)

व्यास उवाच । श्वेतजीवप्रदो रुद्र इति पूर्वं त्वया मुने । प्रोक्तं परमधर्मज्ञ तन्मे ब्रूहि समासतः

vyāsa uvāca | śvetajīvaprado rudra iti pūrvaṁ tvayā mune | proktaṁ paramadharmajña tanme brūhi samāsataḥ

व्यास ने कहा - हे मुने! हे परमधर्मज्ञ! आपने पहले कहा था कि रुद्र ने श्वेत को जीवन प्रदान किया था। वह कथा मुझे संक्षेप में सुनाइये।

श्लोक 33 (skanda.8.166.33)

प्रददौ कथमीशानस्तज्जीवं मुनये विभो । किमर्थं क्व च योगेश कश्चासौ श्वेत उच्यते

pradadau kathamīśānastajjīvaṁ munaye vibho | kimarthaṁ kva ca yogeśa kaścāsau śveta ucyate

हे विभो! ईशान ने उस मुनि को जीवन कैसे प्रदान किया? हे योगेश्वर! किसलिये और कहाँ? और यह श्वेत कौन कहलाता है?

श्लोक 34 (skanda.8.166.34)

सनत्कुमार उवाच । शृणु वत्स यथा दत्तं पुनर्जन्म पिनाकिना । यमेन ह्रियमाणाय श्वेताय विगतायुषे

sanatkumāra uvāca | śṛṇu vatsa yathā dattaṁ punarjanma pinākinā | yamena hriyamāṇāya śvetāya vigatāyuṣe

सनत्कुमार ने कहा - हे वत्स! सुनो कि यम द्वारा ले जाये जाते हुए, आयुहीन हुए श्वेत को पिनाकधारी ने किस प्रकार पुनर्जन्म दिया।

श्लोक 35 (skanda.8.166.35)

आसीद् दर्भध्वजो नाम बृहस्पतिसमो मुनिः । सर्वविद्याविनीतात्मा यस्य पुत्रः कुशध्वजः

āsīd darbhadhvajo nāma bṛhaspatisamo muniḥ | sarvavidyāvinītātmā yasya putraḥ kuśadhvajaḥ

दर्भध्वज नामक एक मुनि थे, जो बृहस्पति के समान थे और जिनकी आत्मा समस्त विद्याओं में विनीत थी। उनके पुत्र का नाम कुशध्वज था।

श्लोक 36 (skanda.8.166.36)

बभूव सुमहातेजा विश्वामित्र इवापरः । प्रियस्तस्याभवत्पुत्रः श्वेतो नाम महाद्युतिः

babhūva sumahātejā viśvāmitra ivāparaḥ | priyastasyābhavatputraḥ śveto nāma mahādyutiḥ

वे अत्यन्त महातेजस्वी थे, मानो द्वितीय विश्वामित्र हों। उनका प्रिय पुत्र महाद्युति श्वेत नामक था।

श्लोक 37 (skanda.8.166.37)

तस्य जन्मप्रभृत्येव कुशध्वजसुतस्य वै । छायेवानपगा भक्तिर्बभूव वृषभध्वजे

tasya janmaprabhṛtyeva kuśadhvajasutasya vai | chāyevānapagā bhaktirbabhūva vṛṣabhadhvaje

उस कुशध्वजपुत्र की जन्म से ही वृषभध्वज के प्रति भक्ति छाया के समान अविचल बनी रही।

श्लोक 38 (skanda.8.166.38)

तिष्ठतो गच्छतश्चापि स्वपतस्तप्यतस्तथा । सर्वभावेन देवेशं ध्यायन् तस्थौ महामुनिः

tiṣṭhato gacchataścāpi svapatastapyatastathā | sarvabhāvena deveśaṁ dhyāyan tasthau mahāmuniḥ

खड़े रहते, चलते, सोते और तप करते हुए भी, वह महामुनि सर्वभाव से देवेश्वर का ध्यान करते हुए रहते थे।

श्लोक 39 (skanda.8.166.39)

अथ कालेन विप्रेन्द्र विपृथुर्नाम दानवः । वव्रे दुहितरं गत्वा श्वेतस्य पितरं बली

atha kālena viprendra vipṛthurnāma dānavaḥ | vavre duhitaraṁ gatvā śvetasya pitaraṁ balī

तदनन्तर समय आने पर, हे विप्रेन्द्र! विपृथु नामक एक बलवान् दानव, श्वेत के पिता के पास जाकर उसकी पुत्री की याचना करने लगा।

श्लोक 40 (skanda.8.166.40)

न च तस्मै सुतां प्रादात् तामसौ सुरविद्विषे । स तेन निहतो रात्रौ बलाद् दर्भध्वजोपि च

na ca tasmai sutāṁ prādāt tāmasau suravidviṣe | sa tena nihato rātrau balād darbhadhvajopi ca

उसने उस देवद्वेषी दानव को अपनी पुत्री नहीं दी। इस पर उस दानव ने बलपूर्वक रात्रि में दर्भध्वज का भी वध कर दिया।

श्लोक 41 (skanda.8.166.41)

जामाता कांक्षितश्चासीत् तेन चक्रगदाधरः । विष्णुः परमधर्मात्मा दुहित्रा चास्य सुव्रत

jāmātā kāṁkṣitaścāsīt tena cakragadādharaḥ | viṣṇuḥ paramadharmātmā duhitrā cāsya suvrata

हे सुव्रत! उस दर्भध्वज की पुत्री ने चक्र-गदाधारी परमधर्मात्मा विष्णु को दामाद के रूप में चाहा था।

श्लोक 42 (skanda.8.166.42)

तस्य तं दुहिता ज्ञात्वा हतं पितरमात्मनः । जगाम तपसे साध्वी परहेतोर्महाव्रता

tasya taṁ duhitā jñātvā hataṁ pitaramātmanaḥ | jagāma tapase sādhvī parahetormahāvratā

अपने पिता को मारा गया जानकर, वह साध्वी महाव्रता पुत्री शत्रु के वध के हेतु तप करने चली गयी।

श्लोक 43 (skanda.8.166.43)

श्वेतोपि तत्ततो ज्ञात्वा वैराग्यं परमास्थितः । नर्मदातीरमासाद्य एकचित्तो जितेन्द्रियः

śvetopi tattato jñātvā vairāgyaṁ paramāsthitaḥ | narmadātīramāsādya ekacitto jitendriyaḥ

श्वेत भी वह सब जानकर परम वैराग्य को प्राप्त हो गया, और नर्मदा के तट पर पहुँचकर, एकाग्रचित्त तथा जितेन्द्रिय होकर,

श्लोक 44 (skanda.8.166.44)

रुद्रमेवार्पितावस्थस्तन्निष्ठस्तत्परायणः । तप्यमानस्तपो घोरं तस्थौ युक्तस्तपोधनः

rudramevārpitāvasthastanniṣṭhastatparāyaṇaḥ | tapyamānastapo ghoraṁ tasthau yuktastapodhanaḥ

अपनी सारी स्थिति रुद्र को समर्पित कर, उन्हीं में निष्ठ, उन्हीं के परायण होकर, वह तपोधन घोर तप करता हुआ योगयुक्त होकर रहने लगा।

श्लोक 45 (skanda.8.166.45)

अथागात् सुमहान् कालस्तप्यतस्तस्य धीमतः । आयुर्यद्विहितं धात्रा तत्तस्य क्षयमभ्यगात्

athāgāt sumahān kālastapyatastasya dhīmataḥ | āyuryadvihitaṁ dhātrā tattasya kṣayamabhyagāt

इस प्रकार तप करते हुए उस बुद्धिमान् को बहुत बड़ा समय बीत गया। विधाता ने जो आयु उसके लिये निश्चित की थी, वह क्षीण होने लगी।

श्लोक 46 (skanda.8.166.46)

क्षीणायुषमथो ज्ञात्वा श्वेतं मृत्युविचेष्टितम् । सुतो विवस्वतो हृष्टः कालमृत्युपुरोगमान्

kṣīṇāyuṣamatho jñātvā śvetaṁ mṛtyuviceṣṭitam | suto vivasvato hṛṣṭaḥ kālamṛtyupurogamān

उसकी आयु क्षीण हो गयी है और वह मृत्यु के अधीन आ गया है, यह जानकर, सूर्यपुत्र यम प्रसन्न होकर काल और मृत्यु को आगे करके

श्लोक 47 (skanda.8.166.47)

किङ्करान् प्रेषयामास तमानेतुं द्विजोत्तमम् । तमथाभ्येत्य ते दूताः स्थिताः श्वेतजिघांसया

kiṅkarān preṣayāmāsa tamānetuṁ dvijottamam | tamathābhyetya te dūtāḥ sthitāḥ śvetajighāṁsayā

उस उत्तम द्विज को लाने के लिये अपने किंकरों को भेजा। तब वे दूत उसके पास पहुँचकर श्वेत को हरने की इच्छा से खड़े हो गये।

श्लोक 48 (skanda.8.166.48)

तान् दृष्ट्वा स तदा श्वेतो यमदूतानवस्थितान् । हाहेति मरणाद्भीतस्त्रासाद् दुःखपरिप्लुतः

tān dṛṣṭvā sa tadā śveto yamadūtānavasthitān | hāheti maraṇādbhītastrāsād duḥkhapariplutaḥ

उन खड़े हुए यमदूतों को देखकर, श्वेत मृत्यु के भय से हाहाकार कर उठा और त्रास से दुःखमग्न हो गया।

श्लोक 49 (skanda.8.166.49)

अन्वचिन्तयदव्यग्रः परित्राणाय शङ्करम् । अथ चिन्तितमात्रस्तु गिरीन्द्रशिखरस्थितः

anvacintayadavyagraḥ paritrāṇāya śaṅkaram | atha cintitamātrastu girīndraśikharasthitaḥ

फिर भी अव्यग्र होकर उसने रक्षा के लिये शंकर का स्मरण किया। और स्मरण करते ही, पर्वतराज के शिखर पर स्थित

श्लोक 50 (skanda.8.166.50)

भक्तानुग्रहकृद्देवः श्वेतं वेद यमार्द्दितम् । तं तथा दुःखितं ज्ञात्वा भक्तं मृत्युवशं गतम्

bhaktānugrahakṛddevaḥ śvetaṁ veda yamārdditam | taṁ tathā duḥkhitaṁ jñātvā bhaktaṁ mṛtyuvaśaṁ gatam

भक्तों पर अनुग्रह करनेवाले उस देव ने जान लिया कि श्वेत यम से पीड़ित है। इस प्रकार उस दुःखित भक्त को मृत्यु के वश में गया हुआ जानकर,

श्लोक 51 (skanda.8.166.51)

शङ्करः प्रहसन् देवीमिदमाह सुरेश्वरः । श्वेतो नाम मुनिर्देवि मद्भक्तस्तपसैधितः

śaṅkaraḥ prahasan devīmidamāha sureśvaraḥ | śveto nāma munirdevi madbhaktastapasaidhitaḥ

शंकर मुस्कुराते हुए देवी से बोले - हे देवि! श्वेत नामक मुनि, जो तप से समृद्ध हुआ है, मेरा भक्त है।

श्लोक 52 (skanda.8.166.52)

क्षीणायुरभवन्मूढो मृत्युपाशविमोहितः । व्यवस्थैषा पुरा सृष्टा ब्रह्मणा लोककर्तृणा

kṣīṇāyurabhavanmūḍho mṛtyupāśavimohitaḥ | vyavasthaiṣā purā sṛṣṭā brahmaṇā lokakartṛṇā

उसकी आयु क्षीण हो गई है और वह मृत्युपाश से मोहित हो रहा है। यह व्यवस्था लोकों के रचयिता ब्रह्मा द्वारा पूर्वकाल में बनाई गयी थी,

श्लोक 53 (skanda.8.166.53)

प्राणिनामायुषो हानिः कालसंस्थानसंक्षये । ब्रह्मापि हि सृजँल्लोकान् मूढो भवति शैलजे

prāṇināmāyuṣo hāniḥ kālasaṁsthānasaṁkṣaye | brahmāpi hi sṛja~llokān mūḍho bhavati śailaje

कि समय पूरा होने पर प्राणियों की आयु समाप्त हो जाती है। हे शैलजे! लोकों की सृष्टि करते हुए स्वयं ब्रह्मा भी मोहग्रस्त हो जाते हैं,

श्लोक 54 (skanda.8.166.54)

मृत्युदुःखान्विताँल्लोकान् यस्मात्सृजति मोहितः । सोपि भक्तो ममात्यन्तं ब्रह्मा लोकपितामहः

mṛtyuduḥkhānvitā~llokān yasmātsṛjati mohitaḥ | sopi bhakto mamātyantaṁ brahmā lokapitāmahaḥ

क्योंकि वे मोहित होकर मृत्यु और दुःख से युक्त लोकों की रचना करते हैं। परन्तु वे लोकपितामह ब्रह्मा भी मेरे अत्यन्त भक्त हैं।

श्लोक 55 (skanda.8.166.55)

तस्य भक्तिविशेषाच्च गौरवाच्च गिरीन्द्रजे । अनुज्ञाता मयाप्येषा सृष्टिर्मृत्युसमन्विता

tasya bhaktiviśeṣācca gauravācca girīndraje | anujñātā mayāpyeṣā sṛṣṭirmṛtyusamanvitā

हे गिरीन्द्रजे! उन्हीं की विशेष भक्ति और गौरव के कारण, यह मृत्युसहित सृष्टि मेरे द्वारा भी स्वीकृत की गयी है।

श्लोक 56 (skanda.8.166.56)

तथा तु स मुनिर्देवि मयि सर्वार्पितक्रियः । एकभक्तितया तस्य दृढं प्रीतोस्मि पार्वति

tathā tu sa munirdevi mayi sarvārpitakriyaḥ | ekabhaktitayā tasya dṛḍhaṁ prītosmi pārvati

फिर भी, हे देवि! उस मुनि ने अपनी समस्त क्रियाएँ मुझमें अर्पित कर दी हैं। हे पार्वति! उसकी अनन्य भक्ति से मैं दृढ़तापूर्वक प्रसन्न हूँ।

श्लोक 57 (skanda.8.166.57)

त्राता तस्य भविष्यामि जीवयिष्यामि तं मुनिम् । ततो भर्तुर्वचः श्रुत्वा गिरिजा वाक्यमब्रवीत्

trātā tasya bhaviṣyāmi jīvayiṣyāmi taṁ munim | tato bharturvacaḥ śrutvā girijā vākyamabravīt

मैं उसका रक्षक बनूँगा, उस मुनि को जीवित करूँगा। तब पति के वचन सुनकर गिरिजा ने कहा -

श्लोक 58 (skanda.8.166.58)

एवं कुरु महादेव भक्तानुग्रहमीप्सितम् । शरणं को भवेदन्यस्तस्य भक्तिमतो मुनेः

evaṁ kuru mahādeva bhaktānugrahamīpsitam | śaraṇaṁ ko bhavedanyastasya bhaktimato muneḥ

हे महादेव! ऐसा ही करें, यह भक्त पर अनुग्रह अभीष्ट है। उस भक्तिमान् मुनि की और कौन शरण हो सकता है?

श्लोक 59 (skanda.8.166.59)

एवमुक्तः स पार्वत्या देवदेवो वृषध्वजः । नन्दीश्वरपुरोगाँस्तान् गणेशान् गणपाधिपः

evamuktaḥ sa pārvatyā devadevo vṛṣadhvajaḥ | nandīśvarapurogā~stān gaṇeśān gaṇapādhipaḥ

पार्वती द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, वृषभध्वज देवदेव, गणों के अधिपति ने, नन्दीश्वर आदि उन गणेश्वरों को,

श्लोक 60 (skanda.8.166.60)

शंकुकर्णञ्च गणपं तथान्यांश्च सहस्रशः । मुनेः श्वेतस्य रक्षार्थं प्रेषयामास शूलधृक्

śaṁkukarṇañca gaṇapaṁ tathānyāṁśca sahasraśaḥ | muneḥ śvetasya rakṣārthaṁ preṣayāmāsa śūladhṛk

और शंकुकर्ण नामक गणपति को, तथा हजारों अन्य गणों को, मुनि श्वेत की रक्षा के लिये शूलधारी शिव ने भेजा।

श्लोक 61 (skanda.8.166.61)

महाबलास्ते गणनायकेन्द्रा आज्ञां गृहीत्वा परमेशवक्त्रात् । तूर्ण ययुः श्वेतमुनेरुपान्तं दूतान् दिधक्षन्त इवान्तकस्य

mahābalāste gaṇanāyakendrā ājñāṁ gṛhītvā parameśavaktrāt | tūrṇa yayuḥ śvetamunerupāntaṁ dūtān didhakṣanta ivāntakasya

वे महाबली गणनायक श्रेष्ठ, परमेश्वर के मुख से आज्ञा पाकर, यमदूतों को मानो भस्म कर देने की इच्छा से, तुरन्त श्वेत मुनि के समीप गये।

श्लोक 62 (skanda.8.166.62)

ते गत्वा श्वेतमैक्षन्त यमदूतैरथादिर्तम् । मृगमेकमिवारण्ये व्याधैर्बहुभिरावृतम्

te gatvā śvetamaikṣanta yamadūtairathādirtam | mṛgamekamivāraṇye vyādhairbahubhirāvṛtam

वहाँ पहुँचकर, उन्होंने यमदूतों द्वारा पीड़ित श्वेत को देखा, जैसे वन में अनेक व्याधों से घिरा हुआ कोई हिरण हो।

श्लोक 63 (skanda.8.166.63)

ग्रीवायां कालपाशेन हस्तपादे च यन्त्रितम् । मृत्युना स्वयमाकृष्टं स्रवद्रुधिरचक्षुषा

grīvāyāṁ kālapāśena hastapāde ca yantritam | mṛtyunā svayamākṛṣṭaṁ sravadrudhiracakṣuṣā

उसकी गर्दन कालपाश से बँधी थी, हाथ-पैर जकड़े हुए थे, और स्वयं मृत्यु उसे खींच रहा था, जिसकी आँखों से रुधिर बह रहा था।

श्लोक 64 (skanda.8.166.64)

विकृतास्यैर्महादंष्ट्रैस्संरक्तश्मश्रुमूर्धजैः । विद्युत्सदृशनेत्रैश्च लोहदण्डोग्रपाणिभिः । यमदूतैर्महाघोरैः क्षिप्यमाणं समन्ततः

vikṛtāsyairmahādaṁṣṭraissaṁraktaśmaśrumūrdhajaiḥ | vidyutsadṛśanetraiśca lohadaṇḍograpāṇibhiḥ | yamadūtairmahāghoraiḥ kṣipyamāṇaṁ samantataḥ

विकृत मुखवाले, विशाल दाढ़ोंवाले, रक्तवर्ण दाढ़ी-केशोंवाले, बिजली के समान नेत्रोंवाले, लोहे के भयंकर दण्ड हाथों में लिये हुए, अत्यन्त भयानक यमदूतों द्वारा वह चारों ओर से घसीटा जा रहा था।

श्लोक 65 (skanda.8.166.65)

दृष्ट्वा तथा तं मुनिमार्त्तमुच्चैः क्रोशन्तमीशेत्यसकृद् गणेन्द्रः । मुमोच पाशान्मुनिमाशु तस्मात् पाशात्पशूनामिव बन्धमीशः

dṛṣṭvā tathā taṁ munimārttamuccaiḥ krośantamīśetyasakṛd gaṇendraḥ | mumoca pāśānmunimāśu tasmāt pāśātpaśūnāmiva bandhamīśaḥ

उस पीड़ित मुनि को इस प्रकार बार-बार ऊँचे स्वर में 'हे ईश!' पुकारते देखकर, गणों के स्वामी नन्दी ने उस मुनि को तुरन्त उन पाशों से मुक्त कर दिया, जैसे स्वामी पशुओं को बन्धन से मुक्त कर देता है।

श्लोक 66 (skanda.8.166.66)

गच्छध्वं यमकिङ्करा मुनिमितस्त्यक्त्वा शरीरैर्दृढैर्भक्तो ह्येष सुरासुरेश्वरमजं शम्भुं जगत्कारणम् । यः स्रष्टा पवनाग्निशक्रमरुतां ब्रह्मादिभिर्वन्दितस्त्राता सोस्य वृषेन्द्रकेतुरजितो नैनं यमो द्रक्ष्यति

gacchadhvaṁ yamakiṅkarā munimitastyaktvā śarīrairdṛḍhairbhakto hyeṣa surāsureśvaramajaṁ śambhuṁ jagatkāraṇam | yaḥ sraṣṭā pavanāgniśakramarutāṁ brahmādibhirvanditastrātā sosya vṛṣendraketurajito nainaṁ yamo drakṣyati

नन्दी ने कहा - हे यमदूतो! अपने सुदृढ़ शरीरों सहित इस मुनि को छोड़कर यहाँ से चले जाओ; क्योंकि यह देवों-असुरों के ईश्वर, अजन्मा, जगत्कारण शम्भु का भक्त है - जो पवन, अग्नि, इन्द्र और मरुतों के स्रष्टा हैं और ब्रह्मादि द्वारा वन्दित हैं। वही अजित, वृषभध्वज इसका रक्षक है; यम इसे कभी नहीं देख पायेगा।

श्लोक 67 (skanda.8.166.67)

ते दृष्ट्वा गणपान् दूताः कालमृत्युपुरस्सराः । भयान्मुक्त्वा मुनिं श्वेतमब्रुवन् दूरतः स्थिताः

te dṛṣṭvā gaṇapān dūtāḥ kālamṛtyupurassarāḥ | bhayānmuktvā muniṁ śvetamabruvan dūrataḥ sthitāḥ

काल और मृत्यु को आगे किये हुए वे दूत, गणों को देखकर भय से मुनि श्वेत को छोड़कर, दूर खड़े होकर बोले -

श्लोक 68 (skanda.8.166.68)

पूर्णः कालो मुनेरस्य क्षीणमायुर्गणेश्वराः । किमनेन विमुञ्चध्वं नयामैनं यमान्तिकम्

pūrṇaḥ kālo munerasya kṣīṇamāyurgaṇeśvarāḥ | kimanena vimuñcadhvaṁ nayāmainaṁ yamāntikam

हे गणेश्वरो! इस मुनि का समय पूरा हो चुका है, इसकी आयु क्षीण हो गयी है। इसके प्रति इतना आग्रह क्यों? इसे छोड़ दो, हम इसे यम के समीप ले जायेंगे।

श्लोक 69 (skanda.8.166.69)

अथ नन्दीश्वरः प्राह क्रुद्धस्तान् प्रदहन्निव । अक्षता गच्छत क्षिप्रं कृपणा यमकिङ्कराः

atha nandīśvaraḥ prāha kruddhastān pradahanniva | akṣatā gacchata kṣipraṁ kṛpaṇā yamakiṅkarāḥ

तब नन्दीश्वर ने क्रुद्ध होकर, मानो उन्हें भस्म करते हुए, कहा - हे दीन यमकिंकरो! अक्षत रहते हुए ही शीघ्र यहाँ से चले जाओ।

श्लोक 70 (skanda.8.166.70)

यावच्चैते न कुप्यन्ति प्रमथेन्द्राः सुरोषणाः । मा वः सिंहा इवारण्ये वारणान्मदमोहितान् । सकृदेव समाहत्य करिष्यन्ति गतायुषः

yāvaccaite na kupyanti pramathendrāḥ suroṣaṇāḥ | mā vaḥ siṁhā ivāraṇye vāraṇānmadamohitān | sakṛdeva samāhatya kariṣyanti gatāyuṣaḥ

जब तक ये अत्यन्त रुष्ट प्रमथगण क्रुद्ध नहीं होते, तब तक चले जाओ; अन्यथा जैसे सिंह वन में मद से मोहित हाथियों को एक ही आघात से मार डालते हैं, वैसे ही ये तुम्हें एक ही प्रहार में आयुहीन कर देंगे।

श्लोक 71 (skanda.8.166.71)

अथैवमुक्ता गणनायकेन नन्दीश्वरेणामितविक्रमेण । भीता ययुस्ते पितृराजदूता गत्वा च चक्रुः कथयां यमस्य

athaivamuktā gaṇanāyakena nandīśvareṇāmitavikrameṇa | bhītā yayuste pitṛrājadūtā gatvā ca cakruḥ kathayāṁ yamasya

इस प्रकार अमित पराक्रमी गणनायक नन्दीश्वर द्वारा कहे जाने पर, वे पितृराज (यम) के दूत भयभीत होकर चले गये, और जाकर यम को यह वृत्तान्त सुनाया।

श्लोक 72 (skanda.8.166.72)

तेषामुपश्रुत्य तदा वचांसि तीव्राणि नन्दीश्वरभाषितानि । आदित्यसूनुः प्रचुकोप मोहात् स्वयं प्रयातुं च मतिं चकार

teṣāmupaśrutya tadā vacāṁsi tīvrāṇi nandīśvarabhāṣitāni | ādityasūnuḥ pracukopa mohāt svayaṁ prayātuṁ ca matiṁ cakāra

उनके मुख से नन्दीश्वर के कठोर वचनों को सुनकर, आदित्यपुत्र यम मोहवश अत्यन्त क्रुद्ध हो गये और स्वयं वहाँ जाने का निश्चय किया।

श्लोक 73 (skanda.8.166.73)

अथाभ्ययात् क्रोधविरक्तनेत्रः सर्वैर्वृतो मृत्युपुरस्सरैस्तैः । विनिःश्वसन्नाग इव प्रचण्डो जगद्दिधक्षन्निव कृत्स्नमेकः

athābhyayāt krodhaviraktanetraḥ sarvairvṛto mṛtyupurassaraistaiḥ | viniḥśvasannāga iva pracaṇḍo jagaddidhakṣanniva kṛtsnamekaḥ

फिर वे क्रोध से लाल नेत्रों वाले होकर, मृत्यु आदि उन सबसे घिरे हुए, फुफकारते हुए भयंकर सर्प के समान, मानो अकेले ही सम्पूर्ण जगत् को भस्म कर देने की इच्छा से आगे बढ़े।

श्लोक 74 (skanda.8.166.74)

दृष्टा मुनिं श्वेतमपेतमोहं वृतं गणेन्द्रैर्हरतुल्यरूपैः । मुञ्चध्वमेनं तरसेत्यवोचन् नन्दीश्वराद्यान् ग्रहराजसूनुः

dṛṣṭā muniṁ śvetamapetamohaṁ vṛtaṁ gaṇendrairharatulyarūpaiḥ | muñcadhvamenaṁ tarasetyavocan nandīśvarādyān graharājasūnuḥ

मोहरहित मुनि श्वेत को शिव के समान रूपवाले गणेश्वरों से घिरा हुआ देखकर, ग्रहराज (सूर्य) के पुत्र यम ने नन्दीश्वर आदि से कहा - इसे शीघ्र छोड़ दो।

श्लोक 75 (skanda.8.166.75)

कस्त्वं यम श्वेतमुनिं विनेतुं भवस्य धन्यः प्रमथेशभक्तम् । संरक्ष्यमाणं स्वयमेव मूढं गच्छाकृतात्मन्निति नन्द्युवाच

kastvaṁ yama śvetamuniṁ vinetuṁ bhavasya dhanyaḥ pramatheśabhaktam | saṁrakṣyamāṇaṁ svayameva mūḍhaṁ gacchākṛtātmanniti nandyuvāca

नन्दी ने कहा - अरे यम! स्वयं भव के द्वारा रक्षित, प्रमथेश्वर के भक्त, धन्य श्वेत मुनि को ले जाने के लिये तू कौन है, अरे मूढ़! चला जा।

श्लोक 76 (skanda.8.166.76)

अथ श्रुत्वा वचस्तस्य नन्दिनः परुषं महत् । यमः प्रोवाच संक्रुद्ध इदं सर्वगणाधिपम्

atha śrutvā vacastasya nandinaḥ paruṣaṁ mahat | yamaḥ provāca saṁkruddha idaṁ sarvagaṇādhipam

तब नन्दी के इस कठोर वचन को सुनकर, अत्यन्त क्रुद्ध होकर यम ने उस समस्त गणों के अधिपति से यह कहा -

श्लोक 77 (skanda.8.166.77)

गणेन्द्रा गतजीवोयं विप्रस्तिष्ठति मूढवत् । किमनेन विमुञ्चध्वं मा वृथा खेदमाप्स्यथ

gaṇendrā gatajīvoyaṁ viprastiṣṭhati mūḍhavat | kimanena vimuñcadhvaṁ mā vṛthā khedamāpsyatha

हे गणेन्द्रो! यह विप्र प्राणहीन हो चुका है, फिर भी मूढ़ की भाँति खड़ा है। इसके लिये क्यों आग्रह? इसे छोड़ दो, व्यर्थ खेद मत करो।

श्लोक 78 (skanda.8.166.78)

रक्षितोपि चिरं ह्येष मामेव समुपैष्यति । कालेन परिपूर्णेन क्षीणायुरिह कश्चन

rakṣitopi ciraṁ hyeṣa māmeva samupaiṣyati | kālena paripūrṇena kṣīṇāyuriha kaścana

चाहे यह चिरकाल तक रक्षित भी रहे, अन्ततः यह मुझे ही प्राप्त होगा। यहाँ जब समय पूर्ण हो जाता है, तो कोई भी आयुक्षीण हो जाता है।

श्लोक 79 (skanda.8.166.79)

तपोधर्मसमायुक्तो विद्वानपि न जीवति । यदनेन कृतं कर्म धर्म्यं गर्हितमेव वा

tapodharmasamāyukto vidvānapi na jīvati | yadanena kṛtaṁ karma dharmyaṁ garhitameva vā

तप और धर्म से युक्त विद्वान् भी नहीं बचता। इसने जो भी कर्म किया है, चाहे धर्मयुक्त हो या निन्दित,

श्लोक 80 (skanda.8.166.80)

सन्त्यज्य तदिमं देहं प्राप्नोतु गणपाधिपाः । ममायत्तमिदं सर्वं भूतग्रामपरीक्षणम्

santyajya tadimaṁ dehaṁ prāpnotu gaṇapādhipāḥ | mamāyattamidaṁ sarvaṁ bhūtagrāmaparīkṣaṇam

हे गणाधिपो! इस देह को त्यागकर वह उसका फल पावे। यह सम्पूर्ण भूतसमूह की परीक्षा मेरे ही अधीन है।

श्लोक 81 (skanda.8.166.81)

पुण्यपापीयसोर्नित्थं कर्मणोः प्रविचारणम् । तेनार्पयत मे क्षिप्रं श्वेतमेनं गतायुषम्

puṇyapāpīyasornitthaṁ karmaṇoḥ pravicāraṇam | tenārpayata me kṣipraṁ śvetamenaṁ gatāyuṣam

पुण्य और पाप, दोनों प्रकार के कर्मों का यथावत् विवेचन मेरा कार्य है। अतः इस आयुहीन श्वेत को शीघ्र मुझे सौंप दो।

श्लोक 82 (skanda.8.166.82)

अथवैनं गृहीत्वेह सर्व एव गणेश्वराः । प्रयाम शूलिनोभ्यासं नियतं स विमोक्ष्यति

athavainaṁ gṛhītveha sarva eva gaṇeśvarāḥ | prayāma śūlinobhyāsaṁ niyataṁ sa vimokṣyati

अथवा, हे गणेश्वरो! तुम सब भी इसे लेकर, हम सब मिलकर शूलधारी के समीप चलें; वे निश्चय ही इसे मुक्त कर देंगे।

श्लोक 83 (skanda.8.166.83)

पितृराजवचः श्रुत्वा नन्दीश्वरपुरोगमाः । एवमस्त्विति तं प्राहुर्यमं क्रोधवशं गतम्

pitṛrājavacaḥ śrutvā nandīśvarapurogamāḥ | evamastviti taṁ prāhuryamaṁ krodhavaśaṁ gatam

पितृराज के इस वचन को सुनकर, नन्दीश्वर आदि उस क्रोधाविष्ट यम से बोले - ऐसा ही हो।

श्लोक 84 (skanda.8.166.84)

ततस्ते सहिताः सर्वे श्वेतश्च मुनिसत्तमः । जगन्नाथं हरं द्रष्टुमाजग्मुविन्ध्यपर्वतम्

tataste sahitāḥ sarve śvetaśca munisattamaḥ | jagannāthaṁ haraṁ draṣṭumājagmuvindhyaparvatam

तब वे सब मिलकर, तथा मुनिश्रेष्ठ श्वेत भी, जगन्नाथ हर के दर्शन के लिये विन्ध्यपर्वत पर पहुँचे।

श्लोक 85 (skanda.8.166.85)

न्यवेदयद्यथावृत्तं नन्दी सर्वगणाधिपः । प्रणम्य परया भक्त्या भवायामिततेजसे

nyavedayadyathāvṛttaṁ nandī sarvagaṇādhipaḥ | praṇamya parayā bhaktyā bhavāyāmitatejase

सभी गणों के अधिपति नन्दी ने अत्यन्त तेजस्वी भव को परम भक्तिपूर्वक प्रणाम करके सारा वृत्तान्त निवेदन किया।

श्लोक 86 (skanda.8.166.86)

श्रुत्वा तु भगवान् वाक्यं नन्दिना संप्रभाषितम् । प्राह वैवस्वतं साक्षात् स्निग्धगम्भीरया गिरा

śrutvā tu bhagavān vākyaṁ nandinā saṁprabhāṣitam | prāha vaivasvataṁ sākṣāt snigdhagambhīrayā girā

नन्दी द्वारा कहे गये उस वचन को सुनकर, भगवान् ने साक्षात् वैवस्वत (यम) से स्नेहपूर्ण एवं गम्भीर वाणी में कहा -

श्लोक 87 (skanda.8.166.87)

श्वेतस्यास्य परा भक्तिर्मयि प्रेतगणाधिप । अतः क्षीणायुषोप्यस्य मृत्युर्न प्रभविष्यति

śvetasyāsya parā bhaktirmayi pretagaṇādhipa | ataḥ kṣīṇāyuṣopyasya mṛtyurna prabhaviṣyati

हे प्रेतगणाधिप! इस श्वेत की मुझमें परम भक्ति है। इसीलिये इसकी आयु क्षीण हो जाने पर भी, मृत्यु इस पर बल नहीं कर सकेगी।

श्लोक 88 (skanda.8.166.88)

महता तपसा भक्त्या मयि भावितचेतसः । मत्प्रसादाज्जितो मृत्युः श्वेतेनानेन तापन

mahatā tapasā bhaktyā mayi bhāvitacetasaḥ | matprasādājjito mṛtyuḥ śvetenānena tāpana

हे तापन! महान् तप और भक्ति से मुझमें अपने चित्त को स्थिर करनेवाले इस श्वेत ने, मेरी कृपा से मृत्यु को जीत लिया है।

श्लोक 89 (skanda.8.166.89)

ममादेशात्त्वयाप्यस्य नैव कार्यः पराभवः । किन्न वेत्सि रवेः पुत्र मद्भक्ता नरपुङ्गवाः

mamādeśāttvayāpyasya naiva kāryaḥ parābhavaḥ | kinna vetsi raveḥ putra madbhaktā narapuṅgavāḥ

मेरी आज्ञा से, तुम्हें भी इसका पराभव नहीं करना चाहिये। हे सूर्यपुत्र! क्या तुम नहीं जानते कि मेरे भक्त पुरुषों में श्रेष्ठ होते हैं?

श्लोक 90 (skanda.8.166.90)

न पश्यन्ति तवावासं देहभेदेप्युपस्थिते । अस्य भक्तिविशेषेण परेण परितोषितः

na paśyanti tavāvāsaṁ dehabhedepyupasthite | asya bhaktiviśeṣeṇa pareṇa paritoṣitaḥ

शरीरपात हो जाने पर भी वे तुम्हारा निवास नहीं देखते। इसकी विशेष भक्ति से परम प्रसन्न होकर,

श्लोक 91 (skanda.8.166.91)

अनेनैव शरीरेण अमरत्वं ददाम्यहम् । इति मत्वा विसन्देहस्त्वरा गच्छ स्वमालयम्

anenaiva śarīreṇa amaratvaṁ dadāmyaham | iti matvā visandehastvarā gaccha svamālayam

मैं इसी शरीर के साथ इसे अमरत्व प्रदान करता हूँ। ऐसा जानकर, निःसंदेह होकर, तुम शीघ्र अपने निवास को जाओ।

श्लोक 92 (skanda.8.166.92)

इति देववचः श्रुत्वा प्रणम्य तपनात्मजः । परमार्थमविज्ञाय प्रोवाचेदं पिनाकिनम्

iti devavacaḥ śrutvā praṇamya tapanātmajaḥ | paramārthamavijñāya provācedaṁ pinākinam

देव के इस वचन को सुनकर, तपनपुत्र (यम) ने प्रणाम करके, परमार्थ को न समझते हुए, पिनाकधारी से यह कहा -

श्लोक 93 (skanda.8.166.93)

त्वयैव भगवन्नेषा स्थितिः सृष्टा पुरातनी । कर्मण्यस्मिन्नियुक्तोहं जन्ममृत्युविचारणे

tvayaiva bhagavanneṣā sthitiḥ sṛṣṭā purātanī | karmaṇyasminniyuktohaṁ janmamṛtyuvicāraṇe

हे भगवन्! यह पुरातन व्यवस्था आपने ही बनायी है। मैं इसी कर्म में, जन्म-मृत्यु के निर्णय में, नियुक्त हूँ।

श्लोक 94 (skanda.8.166.94)

अधिकारनिवृत्तौ हि शक्रस्यापि वृषध्वज । त्वयैव पवनः सृष्टो ह्यहं चैव सुरेश्वर

adhikāranivṛttau hi śakrasyāpi vṛṣadhvaja | tvayaiva pavanaḥ sṛṣṭo hyahaṁ caiva sureśvara

हे वृषध्वज! अधिकार से हट जाने पर तो इन्द्र का पद भी व्यर्थ हो जायेगा। हे सुरेश्वर! आपने ही तो पवन को और मुझे भी उत्पन्न किया है।

श्लोक 95 (skanda.8.166.95)

न केनचिदयं पन्थाः कालमृत्युक्षयात्मकः । व्यभिचीर्णो महादेव कालातिक्रमधारणात्

na kenacidayaṁ panthāḥ kālamṛtyukṣayātmakaḥ | vyabhicīrṇo mahādeva kālātikramadhāraṇāt

हे महादेव! काल और मृत्यु के क्षय रूप इस मार्ग का उल्लंघन कालातिक्रमण द्वारा भी किसी के द्वारा कभी नहीं किया गया।

श्लोक 96 (skanda.8.166.96)

एवमेतां परां सृष्टिं विचिन्त्य विबुधेश्वर । मोक्तुमर्हसि विप्राग्र्यं काले पूर्णे गतायुषम्

evametāṁ parāṁ sṛṣṭiṁ vicintya vibudheśvara | moktumarhasi viprāgryaṁ kāle pūrṇe gatāyuṣam

हे विबुधेश्वर! इस सर्वोच्च सृष्टि-व्यवस्था पर विचार करके, आपको समय पूर्ण होने पर आयुहीन हुए इस श्रेष्ठ विप्र को मुझे सौंप देना चाहिये।

श्लोक 97 (skanda.8.166.97)

एवं स्थितिरभिन्ना स्यादहं च न विमानितः । मृत्युश्चान्तःशरीरस्थः श्वेतस्तद्वरमाप्स्यति

evaṁ sthitirabhinnā syādahaṁ ca na vimānitaḥ | mṛtyuścāntaḥśarīrasthaḥ śvetastadvaramāpsyati

इस प्रकार व्यवस्था अभंग रहेगी, और मेरा भी अपमान नहीं होगा। और श्वेत के शरीर के भीतर स्थित मृत्यु भी अपना कार्य पूर्ण कर लेगी।

श्लोक 98 (skanda.8.166.98)

इत्युक्तं प्रेतराजेन श्रुत्वा वाक्यं वृषध्वजः । दिप्ताङ्गार इवैकस्मात् संहार इव पावकः

ityuktaṁ pretarājena śrutvā vākyaṁ vṛṣadhvajaḥ | diptāṅgāra ivaikasmāt saṁhāra iva pāvakaḥ

प्रेतराज द्वारा कहा गया यह वचन सुनकर, वृषभध्वज, मानो अकस्मात् प्रज्वलित अंगार के समान, प्रलयाग्नि के समान हो गये।

श्लोक 99 (skanda.8.166.99)

जगत्क्षोभ इवाकस्मादुत्प्रेक्ष्यः समपद्यत । नन्दीशस्य ततः स्कन्धमुपाश्रित्य पिनाकधृक्

jagatkṣobha ivākasmādutprekṣyaḥ samapadyata | nandīśasya tataḥ skandhamupāśritya pinākadhṛk

वे सहसा मानो जगत् को क्षुब्ध कर देने जैसे प्रतीत होने लगे। तब पिनाकधारी ने नन्दीश्वर के कन्धे का सहारा लेकर,

श्लोक 100 (skanda.8.166.100)

इदं प्राह वचो व्यास तं दृष्ट्वा यममास्थितम् । अहो दिनकृतः सूनोरस्य शाठ्यप्रभाषितम्

idaṁ prāha vaco vyāsa taṁ dṛṣṭvā yamamāsthitam | aho dinakṛtaḥ sūnorasya śāṭhyaprabhāṣitam

हे व्यास! सामने खड़े यम को देखकर यह वचन कहा - अहो! सूर्यपुत्र के इस कपटपूर्ण कथन को देखो!

श्लोक 101 (skanda.8.166.101)

कार्कश्यं वचसः पश्य प्रत्युत्तरसमीरितम् । परित्रातो मया श्वेतो यम गच्छेति भाषितः

kārkaśyaṁ vacasaḥ paśya pratyuttarasamīritam | paritrāto mayā śveto yama gaccheti bhāṣitaḥ

इसके वचनों की कठोरता तो देखो, जो प्रत्युत्तर में कही गयी है! मैंने कहा था - मैंने श्वेत की रक्षा कर दी है, हे यम! अब जाओ -

श्लोक 102 (skanda.8.166.102)

मुञ्च श्वेतमिति प्राह मामेव गतचेतनः । किन्त्वयं मूढ एव स्यादुत पौरुषगर्वितः

muñca śvetamiti prāha māmeva gatacetanaḥ | kintvayaṁ mūḍha eva syāduta pauruṣagarvitaḥ

'श्वेत को छोड़ दो' - ऐसा मैंने ही कहा था; परन्तु यह मूढ़ ही होगा, अथवा अपने पौरुष के अभिमान से गर्वित है।

श्लोक 103 (skanda.8.166.103)

गच्छेति को मयाज्ञप्ते स्थातुमत्र भवत्यलम् । प्रत्युत्तरं पुनः प्राह मामेव पुरतः स्थितः

gaccheti ko mayājñapte sthātumatra bhavatyalam | pratyuttaraṁ punaḥ prāha māmeva purataḥ sthitaḥ

'जाओ' ऐसी मेरी आज्ञा दिये जाने पर, यहाँ ठहरने का साहस कौन करे? फिर भी यह मेरे सामने ही खड़ा होकर पुनः प्रत्युत्तर देता है।

श्लोक 104 (skanda.8.166.104)

एवं स भगवानुक्त्वा जगत्प्रभवकारणः । तिर्यग् दृष्टि समाधाय सरोषं यममैक्षत

evaṁ sa bhagavānuktvā jagatprabhavakāraṇaḥ | tiryag dṛṣṭi samādhāya saroṣaṁ yamamaikṣata

इस प्रकार कहकर, जगत् के उत्पत्ति-कारण उन भगवान् ने तिरछी दृष्टि करके, क्रोधपूर्वक यम की ओर देखा।

श्लोक 105 (skanda.8.166.105)

स तेन चक्षुषा दग्धो निपपात महीतले । महावृक्ष इवारण्ये महावायुसमीरितः । भस्मसात्त्वं ययौ तूर्णं प्रजहास ततो भवः

sa tena cakṣuṣā dagdho nipapāta mahītale | mahāvṛkṣa ivāraṇye mahāvāyusamīritaḥ | bhasmasāttvaṁ yayau tūrṇaṁ prajahāsa tato bhavaḥ

उस दृष्टि से दग्ध होकर यम पृथ्वी पर गिर पड़े, जैसे वन में महावायु से हिलाया गया कोई महावृक्ष; और तत्काल भस्म हो गये। तब भव हँस पड़े।

श्लोक 106 (skanda.8.166.106)

श्वेतं ततस्तं प्रणतं मुनिं तु सगद्गदं मृत्युभयाद्विषण्णम् । पस्पर्श मूर्ध्नि त्रिपुरासुरारिर्वचो न भेतव्यमिति ब्रुवाणः

śvetaṁ tatastaṁ praṇataṁ muniṁ tu sagadgadaṁ mṛtyubhayādviṣaṇṇam | pasparśa mūrdhni tripurāsurārirvaco na bhetavyamiti bruvāṇaḥ

तत्पश्चात् त्रिपुरासुरारि ने, प्रणत, गद्गदवाणी में बोलते हुए, मृत्यु के भय से विषण्ण उस मुनि श्वेत के मस्तक का स्पर्श किया और कहा - डरो मत।

श्लोक 107 (skanda.8.166.107)

प्रादाद्वरं शूलधरश्च तस्मै मृत्युर्न ते विप्र भविष्यतीति । ददौ च नित्यं गणपत्वमेव प्रोवाच चैनं परितुष्ट ईशः

prādādvaraṁ śūladharaśca tasmai mṛtyurna te vipra bhaviṣyatīti | dadau ca nityaṁ gaṇapatvameva provāca cainaṁ parituṣṭa īśaḥ

शूलधारी ने उसे वर दिया - हे विप्र! तुझे मृत्यु नहीं होगी; और उसे नित्य गणपद भी प्रदान किया, तथा प्रसन्न होकर ईश्वर ने उससे यह कहा -

श्लोक 108 (skanda.8.166.108)

क्रुद्धश्च यस्मादहमर्कसूनोरस्मिन् गिरौ पुण्यतमस्ततोयम् । वत्स्यामि चेहाचलराजमूर्ध्नि क्रोधेश्वरस्तेन भविष्यतीह

kruddhaśca yasmādahamarkasūnorasmin girau puṇyatamastatoyam | vatsyāmi cehācalarājamūrdhni krodheśvarastena bhaviṣyatīha

चूँकि मैं सूर्यपुत्र पर इस पर्वत पर क्रुद्ध हुआ, इसलिये यह पर्वत परम पवित्र हो गया है, और मैं इस पर्वतराज के शिखर पर निवास करूँगा; इसीलिये यह यहाँ 'क्रोधेश्वर' के नाम से प्रसिद्ध होगा।

श्लोक 109 (skanda.8.166.109)

विन्ध्यप्रदेशेमरसिद्धजुष्टे क्रोधेश्वरे पुण्यगिरौ पुमांसः । त्यक्ष्यन्ति ये देहमपेतमोहास्तेषां गतिः श्वेतसमा स्मृता मे

vindhyapradeśemarasiddhajuṣṭe krodheśvare puṇyagirau pumāṁsaḥ | tyakṣyanti ye dehamapetamohāsteṣāṁ gatiḥ śvetasamā smṛtā me

विन्ध्यप्रदेश में देव-सिद्धों से सेवित इस पुण्य पर्वत क्रोधेश्वर में, जो पुरुष मोहरहित होकर देह त्यागेंगे, उनकी गति मेरे द्वारा श्वेत के समान ही मानी जायेगी।

श्लोक 110 (skanda.8.166.110)

द्रक्ष्यन्ति श्वेतेश्वरमत्र ये च ते चापि दिव्या गणपा ममैव । तवैव नाम्ना च नदी सुपुण्या श्वेतस्य गङ्गेति भविष्यतीयम्

drakṣyanti śveteśvaramatra ye ca te cāpi divyā gaṇapā mamaiva | tavaiva nāmnā ca nadī supuṇyā śvetasya gaṅgeti bhaviṣyatīyam

और जो यहाँ श्वेतेश्वर लिंग का दर्शन करेंगे, वे भी मेरे दिव्य गणपद को प्राप्त करेंगे। हे श्वेत! तेरे ही नाम से यह अत्यन्त पवित्र नदी 'श्वेतगंगा' कहलायेगी।

श्लोक 111 (skanda.8.166.111)

सन्तर्पणान्नैकविधं पितॄणां स्वर्लोकदं स्थानमतीव यस्याम् । इत्युक्तमात्रे जगदीश्वरेण श्वेतो मुनिर्दिव्यवपुर्बभूव

santarpaṇānnaikavidhaṁ pitṝṇāṁ svarlokadaṁ sthānamatīva yasyām | ityuktamātre jagadīśvareṇa śveto munirdivyavapurbabhūva

जिसके तर्पण से पितरों को अनेक प्रकार से स्वर्गलोक प्रदान करनेवाला यह स्थान अत्यन्त महिमामय होगा। जगदीश्वर के इतना कहते ही, मुनि श्वेत दिव्य शरीरधारी हो गये।

श्लोक 112 (skanda.8.166.112)

नन्दीशचण्डेशसमानधर्मा प्रणम्य देवं पुरतः स्थितोभूत् । दृष्ट्वाथ सूनुं विगतासुमर्कः शोकाभितप्तस्त्वरितो जवेन

nandīśacaṇḍeśasamānadharmā praṇamya devaṁ purataḥ sthitobhūt | dṛṣṭvātha sūnuṁ vigatāsumarkaḥ śokābhitaptastvarito javena

वह, नन्दीश और चण्डेश के समान अधिकारवाला होकर, देव को प्रणाम करके सामने खड़ा हो गया। इधर, अपने पुत्र को प्राणहीन देखकर, सूर्य शोकसन्तप्त होकर वेगपूर्वक वहाँ पहुँचे,

श्लोक 113 (skanda.8.166.113)

ब्रह्मादिभिः शक्रपुरस्सरैस्तैः सार्द्धं जगत्कारणमाजगाम । विज्ञापयामासुरथामरास्ते आदित्यसूनु प्रतिजीवहेतोः

brahmādibhiḥ śakrapurassaraistaiḥ sārddhaṁ jagatkāraṇamājagāma | vijñāpayāmāsurathāmarāste ādityasūnu pratijīvahetoḥ

और ब्रह्मादि तथा इन्द्र आदि देवताओं के साथ जगत्कारण के पास आया। तब उन देवताओं ने आदित्यपुत्र के पुनर्जीवन के लिये निवेदन किया।

श्लोक 114 (skanda.8.166.114)

मूढो यतोयं जगदीश्वरेश कृच्छ्रं ततस्तीव्रमिदं प्रयातः । प्रसीद देवेश कुरु प्रसादं जीवत्वयं प्रेतगणाधिराजः

mūḍho yatoyaṁ jagadīśvareśa kṛcchraṁ tatastīvramidaṁ prayātaḥ | prasīda deveśa kuru prasādaṁ jīvatvayaṁ pretagaṇādhirājaḥ

हे जगदीश्वरेश! चूँकि यह मूढ़ता से प्रेरित होकर इस तीव्र संकट को प्राप्त हुआ है, अतः हे देवेश! प्रसन्न हों, कृपा करें; यह प्रेतगणों का अधिराज पुनः जीवित हो जाये।

श्लोक 115 (skanda.8.166.115)

यथापुरा चैष भवत्विदानीमार्त्तिं हि नश्छिन्धि सुरासुरेश । विज्ञप्तिमेवं त्रिदिवालयानां ब्रह्मादिशक्रार्कपुरस्सराणाम्

yathāpurā caiṣa bhavatvidānīmārttiṁ hi naśchindhi surāsureśa | vijñaptimevaṁ tridivālayānāṁ brahmādiśakrārkapurassarāṇām

यह पहले की भाँति ही अभी हो जाये; हे सुरासुरेश! हमारी पीड़ा को दूर कीजिये - इस प्रकार त्रिदिवालयों, ब्रह्मादि, इन्द्र और सूर्य आदि की यह विनयपूर्ण प्रार्थना हुई।

श्लोक 116 (skanda.8.166.116)

श्रुत्वा यमं तं करुणायमान उत्तिष्ठ पुत्रेति विभुर्बभाषे । दिव्यं ततः पूर्ववदद्रिकल्पं विभ्रत् स देहं ग्रहराजसूनुः

śrutvā yamaṁ taṁ karuṇāyamāna uttiṣṭha putreti vibhurbabhāṣe | divyaṁ tataḥ pūrvavadadrikalpaṁ vibhrat sa dehaṁ graharājasūnuḥ

यह सुनकर, दयार्द्र होकर विभु ने कहा - हे पुत्र, उठो! तब वह ग्रहराज-पुत्र यम पूर्व की भाँति ही पर्वत के समान अपना दिव्य शरीर धारण कर उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 117 (skanda.8.166.117)

प्रोत्थाय तूर्णं भगवन्तमाशु ननाम पद्भ्यां सहसा गृहीत्वा । ब्रह्मादयस्ते च सुरेन्द्रसंघा दृष्ट्वा ततस्तान् प्रणतानवोचत्

protthāya tūrṇaṁ bhagavantamāśu nanāma padbhyāṁ sahasā gṛhītvā | brahmādayaste ca surendrasaṁghā dṛṣṭvā tatastān praṇatānavocat

उठकर तुरन्त ही, उनके चरणों को सहसा पकड़कर, यम ने भगवान् को प्रणाम किया। तब उन प्रणत ब्रह्मादि तथा देवताओं के समूह को देखकर, भगवान् ने उनसे कहा -

श्लोक 118 (skanda.8.166.118)

ब्रह्मार्कविष्णुज्वलनादिनाथः कर्ता सुराणां सुरनाथ एकः । सुरेश्वरः सोमजटार्धमौलिर्देवाः प्रयात स्वनिकेतनानि

brahmārkaviṣṇujvalanādināthaḥ kartā surāṇāṁ suranātha ekaḥ | sureśvaraḥ somajaṭārdhamaulirdevāḥ prayāta svaniketanāni

मैं ही ब्रह्मा, सूर्य, विष्णु, अग्नि आदि का स्वामी और देवताओं का एकमात्र कर्ता, देवेश्वर हूँ, जिसका आधा मस्तक चन्द्रयुक्त जटाओं से सुशोभित है। हे देवगण! अब तुम अपने-अपने निवासों को जाओ।

श्लोक 119 (skanda.8.166.119)

विज्ञप्तिरेषा सफला कृता वो मैवं कृथास्त्वं पुनरात्ममोहम् । प्रेतेश्वरं चेति वचोभ्युवाच जग्मुस्ततो देवगणाः प्रणम्य

vijñaptireṣā saphalā kṛtā vo maivaṁ kṛthāstvaṁ punarātmamoham | preteśvaraṁ ceti vacobhyuvāca jagmustato devagaṇāḥ praṇamya

तुम्हारी यह प्रार्थना सफल हुई। तुम फिर से इस प्रकार आत्ममोह मत करना - ऐसा प्रेतेश्वर (यम) से भी कहा गया। तत्पश्चात् देवगण प्रणाम करके चले गये।

श्लोक 120 (skanda.8.166.120)

प्रगृह्य सौरिं पितृराजमाशु श्वेतोपि तस्थौ मरणाद्विहीनः । नन्दी यथा निर्वृतदुःखभावस्तथैव विप्रः परमेशभक्तः

pragṛhya sauriṁ pitṛrājamāśu śvetopi tasthau maraṇādvihīnaḥ | nandī yathā nirvṛtaduḥkhabhāvastathaiva vipraḥ parameśabhaktaḥ

सूर्यपुत्र पितृराज यम का हाथ थामकर, श्वेत भी, मृत्यु से रहित होकर, वहीं ठहर गया - जैसे नन्दी दुःखरहित होकर स्थित रहते हैं, वैसे ही वह परमेश्वर का भक्त विप्र भी सुखपूर्वक रहने लगा।

श्लोक 121 (skanda.8.166.121)

इति कथितमिदं ते श्वेतमृत्युप्रणाशं हिमगिरितनयाया भर्तुरीशस्य शम्भोः । फलमवितथभक्ति प्राप्तिसंपद्विशेषं जगति शरणमेकं तं शरण्यं नमस्ये

iti kathitamidaṁ te śvetamṛtyupraṇāśaṁ himagiritanayāyā bharturīśasya śambhoḥ | phalamavitathabhakti prāptisaṁpadviśeṣaṁ jagati śaraṇamekaṁ taṁ śaraṇyaṁ namasye

इस प्रकार तुम्हें यह श्वेत की मृत्यु के नाश की कथा सुनायी - हिमगिरिपुत्री के पति, ईश्वर शम्भु का, यह सत्य भक्ति की प्राप्ति का विशेष फल है। जगत् में जो एकमात्र शरण्य शरण हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।

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