अम्बिका खण्ड · अध्याय 167
शिवायतनवर्णन
श्लोक 1 (skanda.8.167.1)
व्यास उवाच । यत् प्रोक्तं भवता गुह्यं माहात्म्यमिदमुत्तमम् । नान्यस्यैतद् भवेन्मुक्त्वा जगदार्त्तिहरं हरम्
vyāsa uvāca | yat proktaṁ bhavatā guhyaṁ māhātmyamidamuttamam | nānyasyaitad bhavenmuktvā jagadārttiharaṁ haram
व्यास ने कहा - आपने जो यह उत्तम गुह्य माहात्म्य कहा, वह जगत् की पीड़ा हरनेवाले हर के अतिरिक्त और किसी का नहीं हो सकता।
श्लोक 2 (skanda.8.167.2)
पुण्यान्यायतनानीह देदेवस्य शूलिनः । यानि दृष्ट्वा न शोचन्ति जन्ममृत्यू महामुने
puṇyānyāyatanānīha dedevasya śūlinaḥ | yāni dṛṣṭvā na śocanti janmamṛtyū mahāmune
हे महामुने! यहाँ त्रिशूलधारी देवदेव के जो पवित्र आयतन हैं, जिन्हें देखकर मनुष्य जन्म-मृत्यु का शोक नहीं करते,
श्लोक 3 (skanda.8.167.3)
तानि मे ब्रूहि धर्मज्ञ यद्यनुग्राह्यता मयि । एवं कृतार्थमात्मानं मुच्ये यन्मुनिसत्तम
tāni me brūhi dharmajña yadyanugrāhyatā mayi | evaṁ kṛtārthamātmānaṁ mucye yanmunisattama
हे धर्मज्ञ! यदि मुझ पर आपकी कृपा हो तो वे मुझे बताइये, जिससे हे मुनिश्रेष्ठ! मैं अपने को कृतार्थ मानकर मुक्त हो जाऊँ।
श्लोक 4 (skanda.8.167.4)
व्यासस्य वचनं श्रुत्वा ब्रह्मपुत्रोब्रवीदिदम् । साधु व्यास महाबुद्धे भक्तिमानसि शङ्करे
vyāsasya vacanaṁ śrutvā brahmaputrobravīdidam | sādhu vyāsa mahābuddhe bhaktimānasi śaṅkare
व्यास के वचन सुनकर ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार ने यह कहा - हे महाबुद्धे व्यास! उत्तम है, तुम शंकर में भक्तिमान् हो।
श्लोक 5 (skanda.8.167.5)
स्थानानि शूलिनो यस्त्वं पुण्यानि श्रोतुमिच्छसि । कृतार्थस्त्वं महायोग मुक्तः संसारबन्धनैः
sthānāni śūlino yastvaṁ puṇyāni śrotumicchasi | kṛtārthastvaṁ mahāyoga muktaḥ saṁsārabandhanaiḥ
तुम जो शूलधारी के पवित्र स्थानों को सुनना चाहते हो, हे महायोगिन्! तुम कृतार्थ हो, संसार-बन्धनों से मुक्त हो।
श्लोक 6 (skanda.8.167.6)
शृणु वक्ष्यामि ते वत्स गुह्यमेतत् परं हि मे । स्थानानुवर्णनं शम्भोर्मृत्युजन्मभयापहम्
śṛṇu vakṣyāmi te vatsa guhyametat paraṁ hi me | sthānānuvarṇanaṁ śambhormṛtyujanmabhayāpaham
सुनो वत्स, मैं तुम्हें यह अपना परम गुह्य रहस्य बताऊँगा - शम्भु के स्थानों का यह वर्णन जन्म-मृत्यु के भय को दूर करनेवाला है।
श्लोक 7 (skanda.8.167.7)
आदित्यबन्धनं नाम कूटं विन्ध्यगिरेः शुभम् । स्थापितं तत्र लिङ्गं तु तपनेन महाप्रभम्
ādityabandhanaṁ nāma kūṭaṁ vindhyagireḥ śubham | sthāpitaṁ tatra liṅgaṁ tu tapanena mahāprabham
विन्ध्यगिरि का शुभ शिखर 'आदित्यबन्धन' नाम से है, जहाँ सूर्य (तपन) द्वारा महाप्रभावाला लिंग स्थापित किया गया।
श्लोक 8 (skanda.8.167.8)
तद् दृष्ट्वा मनुजो व्यास जन्मप्रति न शोचति । हेमसोमोद्भवं नाम कूटं हिमगिरेः शुभम्
tad dṛṣṭvā manujo vyāsa janmaprati na śocati | hemasomodbhavaṁ nāma kūṭaṁ himagireḥ śubham
उसे देखकर, हे व्यास! मनुष्य जन्म के प्रति शोक नहीं करता। हिमगिरि का एक शुभ शिखर 'हेमसोमोद्भव' नाम से है।
श्लोक 9 (skanda.8.167.9)
पुण्यमायतनं तत्र च्यवनेनाभिनिर्मितम् । ये तदायतनं शम्भोरभिगच्छन्ति मानवाः
puṇyamāyatanaṁ tatra cyavanenābhinirmitam | ye tadāyatanaṁ śambhorabhigacchanti mānavāḥ
वहाँ च्यवन द्वारा निर्मित एक पवित्र आयतन है। जो मनुष्य शम्भु के उस आयतन में जाते हैं,
श्लोक 10 (skanda.8.167.10)
न च्यवन्ति पुनः स्वर्गात् प्रलयेपि समागते । उदये तु गिरौ पुण्ये सिद्धसंघैर्निषेविते
na cyavanti punaḥ svargāt pralayepi samāgate | udaye tu girau puṇye siddhasaṁghairniṣevite
वे स्वर्ग से पुनः च्युत नहीं होते, प्रलय के आने पर भी। सिद्धसंघों से सेवित पुण्य उदयगिरि पर,
श्लोक 11 (skanda.8.167.11)
सत्यो नाम ह्रदः पुण्यो हेमपद्मसमावृतः । यत्र ते मुनयः सत्याः सत्यानलरविप्रभाः
satyo nāma hradaḥ puṇyo hemapadmasamāvṛtaḥ | yatra te munayaḥ satyāḥ satyānalaraviprabhāḥ
वहाँ स्वर्णकमलों से घिरा हुआ 'सत्य' नामक पुण्य ह्रद है, जहाँ वे सत्यनिष्ठ मुनि, अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी,
श्लोक 12 (skanda.8.167.12)
धारयन्ति महात्मान आशीर्भिस्सरथं रविम् । पुण्यमायतनं तत्र स्थापितं तैः पिनाकिनः
dhārayanti mahātmāna āśīrbhissarathaṁ ravim | puṇyamāyatanaṁ tatra sthāpitaṁ taiḥ pinākinaḥ
वे महात्मा अपने आशीर्वचनों से रथसहित सूर्य को धारण करते हैं; वहाँ उन्होंने त्रिशूलधारी का पुण्य आयतन स्थापित किया।
श्लोक 13 (skanda.8.167.13)
अमरैरर्चितं व्यास सिद्धविद्याधरैर्वृतम् । यैस्तदायतनं दृष्टं भवभक्तैर्वियद्गमैः
amarairarcitaṁ vyāsa siddhavidyādharairvṛtam | yaistadāyatanaṁ dṛṣṭaṁ bhavabhaktairviyadgamaiḥ
हे व्यास! वह अमरों से पूजित, सिद्धों और विद्याधरों से घिरा है। भव के जिन आकाशगामी भक्तों ने उस आयतन को देखा है,
श्लोक 14 (skanda.8.167.14)
ते भवस्य प्रिया भूत्वा भवन्ति प्रमथेश्वराः । उशीरवीजः शैलेन्द्रस्तत्राश्रमपदं महत्
te bhavasya priyā bhūtvā bhavanti pramatheśvarāḥ | uśīravījaḥ śailendrastatrāśramapadaṁ mahat
वे भव के प्रिय होकर प्रमथों के स्वामी बन जाते हैं। वहाँ उशीरबीज पर्वतराज का महान् आश्रमस्थल है,
श्लोक 15 (skanda.8.167.15)
आगस्त्यस्य तृणाङ्गस्य देवदानवपूजितम् । महानीलमयं लिङ्गं तस्मिन् व्यास महोच्छ्रयम्
āgastyasya tṛṇāṅgasya devadānavapūjitam | mahānīlamayaṁ liṅgaṁ tasmin vyāsa mahocchrayam
वहाँ अगस्त्य के शिष्य तृणाङ्ग का, देवों-दानवों से पूजित, महानील मणि से बना विशाल लिंग है, हे व्यास!
श्लोक 16 (skanda.8.167.16)
तस्मिन्नायतने रुद्रं तृणाङ्गः स महानृषिः । दक्षिणामूर्त्तिमास्थाय स्तौति नित्यं कपर्दिनम् । दिवौकसस्तमभ्यर्च्य भवन्ति गणपाधिपाः
tasminnāyatane rudraṁ tṛṇāṅgaḥ sa mahānṛṣiḥ | dakṣiṇāmūrttimāsthāya stauti nityaṁ kapardinam | divaukasastamabhyarcya bhavanti gaṇapādhipāḥ
उस आयतन में, वह महर्षि तृणाङ्ग, दक्षिणामूर्ति के रूप में स्थित होकर, नित्य कपर्दी रुद्र की स्तुति करते हैं; देवगण उनकी अर्चना करके गणों के अधिपति बन जाते हैं।
श्लोक 17 (skanda.8.167.17)
उत्तरेण निरालोके रविचन्द्रविवर्जिते । मेरुशृङ्गे महोत्सेधं सौवर्णं स्थापितं महत्
uttareṇa nirāloke ravicandravivarjite | meruśṛṅge mahotsedhaṁ sauvarṇaṁ sthāpitaṁ mahat
उत्तर दिशा में, सूर्य-चन्द्र से रहित प्रकाशहीन प्रदेश में, मेरु के विशाल, ऊँचे सुवर्णशिखर पर,
श्लोक 18 (skanda.8.167.18)
लिङ्गं भगवतो व्यास यत्रास्ते शूलधृक् स्वयम् । उत्तानपादपुत्रेण भवभक्तिपरात्मना
liṅgaṁ bhagavato vyāsa yatrāste śūladhṛk svayam | uttānapādaputreṇa bhavabhaktiparātmanā
हे व्यास! वहाँ भगवान् का लिंग है, जहाँ स्वयं शूलधारी विराजते हैं, जो उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव, जिनकी आत्मा भव-भक्ति में लीन थी, के द्वारा स्थापित किया गया,
श्लोक 19 (skanda.8.167.19)
नित्यमभ्यर्चितं लिङ्गं ध्रुवेणास्ते महामुने । देवानामप्यगम्यं तद् ध्रुवं मुक्त्वा परं वरम्
nityamabhyarcitaṁ liṅgaṁ dhruveṇāste mahāmune | devānāmapyagamyaṁ tad dhruvaṁ muktvā paraṁ varam
हे महामुने! वह लिंग नित्य ध्रुव द्वारा पूजित है; वह देवताओं के लिये भी अगम्य है, ध्रुव को छोड़कर वह परम वर है।
श्लोक 20 (skanda.8.167.20)
जैगीषव्येण मुनिना अस्ते पर्वतराजनि । स्थापितं सुमहल्लिङ्गं देवदेवस्य शूलिनः
jaigīṣavyeṇa muninā aste parvatarājani | sthāpitaṁ sumahalliṅgaṁ devadevasya śūlinaḥ
जैगीषव्य मुनि द्वारा, पर्वतराज पर, देवदेव शूलधारी का एक महान् लिंग स्थापित किया गया।
श्लोक 21 (skanda.8.167.21)
तद् दृष्ट्वा मानवो व्यास रुद्रलोकमवाप्नुयात् । मोक्षविद्यास्वभिज्ञाश्च सांख्ययोगविशारदाः
tad dṛṣṭvā mānavo vyāsa rudralokamavāpnuyāt | mokṣavidyāsvabhijñāśca sāṁkhyayogaviśāradāḥ
उसे देखकर, हे व्यास! मनुष्य रुद्रलोक को प्राप्त करता है। उस अत्यन्त अद्भुत लिंग को देखकर मनुष्य -
श्लोक 22 (skanda.8.167.22)
भवन्ति मनुजा दृष्ट्वा तल्लिङ्गं परमाद्भुतम् । नन्दने देवराजेन स्थापितं लिङ्गमुत्तमम्
bhavanti manujā dṛṣṭvā talliṅgaṁ paramādbhutam | nandane devarājena sthāpitaṁ liṅgamuttamam
मोक्षविद्या के ज्ञाता और सांख्य-योग में निपुण हो जाते हैं। नन्दनवन में देवराज इन्द्र द्वारा एक उत्तम लिंग स्थापित किया गया,
श्लोक 23 (skanda.8.167.23)
तपनीयमयं शुभ्रं देवता यदुपासते । तद् दृष्ट्वा देवता लिङ्गं प्राप्नुवन्ति परं पदम्
tapanīyamayaṁ śubhraṁ devatā yadupāsate | tad dṛṣṭvā devatā liṅgaṁ prāpnuvanti paraṁ padam
वह स्वर्णमय और उज्ज्वल है, जिसकी देवता उपासना करते हैं। उस लिंग को देखकर देवगण परम पद को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 24 (skanda.8.167.24)
क्षीरोदे सागरे दिव्यं बालखिल्यैः स्वयं कृतम् । महदायतनं पुण्यं सिद्धकिन्नरसेवितम्
kṣīrode sāgare divyaṁ bālakhilyaiḥ svayaṁ kṛtam | mahadāyatanaṁ puṇyaṁ siddhakinnarasevitam
क्षीरसागर में बालखिल्यों द्वारा स्वयं निर्मित एक दिव्य, महान्, पुण्य आयतन है, जो सिद्धों-किन्नरों से सेवित है।
श्लोक 25 (skanda.8.167.25)
तस्मिँश्चन्द्रप्रभं लिङ्गं स्फाटिकं मणिरञ्जितम् । बालखिल्यास्तमभ्यर्च्य जग्मुरीशसलोकताम्
tasmi~ścandraprabhaṁ liṅgaṁ sphāṭikaṁ maṇirañjitam | bālakhilyāstamabhyarcya jagmurīśasalokatām
वहाँ चन्द्रप्रभावाला, स्फटिक का, मणियों से सुशोभित लिंग है; बालखिल्यों ने उसकी अर्चना करके ईश्वर के सालोक्य को प्राप्त किया।
श्लोक 26 (skanda.8.167.26)
सौवर्णं यक्षराजेन स्थापितं गन्धमादने । लिङ्गं भगवतो दिव्यं यत् कुबेरेशनामकम्
sauvarṇaṁ yakṣarājena sthāpitaṁ gandhamādane | liṅgaṁ bhagavato divyaṁ yat kubereśanāmakam
गन्धमादन पर्वत पर यक्षराज कुबेर द्वारा भगवान् का एक स्वर्णमय दिव्य लिंग स्थापित किया गया, जो 'कुबेरेश' नाम से जाना जाता है,
श्लोक 27 (skanda.8.167.27)
मन्दारकुसुमैर्दिव्यैर्हेमपद्मैश्च भक्तितः । तमभ्यर्च्य महेशानं कुबेरो निर्वृतोभवत्
mandārakusumairdivyairhemapadmaiśca bhaktitaḥ | tamabhyarcya maheśānaṁ kubero nirvṛtobhavat
दिव्य मन्दार पुष्पों और स्वर्णकमलों से भक्तिपूर्वक महेश्वर की अर्चना करके कुबेर आनन्दित हुआ।
श्लोक 28 (skanda.8.167.28)
यैस्तदायतनं दृष्टं कुबेरस्य सुरासुरैः । सर्वयज्ञफलं तेभ्यो ददाति वृषभध्वजः
yaistadāyatanaṁ dṛṣṭaṁ kuberasya surāsuraiḥ | sarvayajñaphalaṁ tebhyo dadāti vṛṣabhadhvajaḥ
कुबेर के उस आयतन को जिन देवों-असुरों ने देखा है, उन्हें वृषभध्वज सब यज्ञों का फल प्रदान करते हैं।
श्लोक 29 (skanda.8.167.29)
एभ्यः पुण्यतमानीह यानि गम्यानि मानुषैः । शृणु तानि महाबुद्धे स्थानानि शशिमौलिनः
ebhyaḥ puṇyatamānīha yāni gamyāni mānuṣaiḥ | śṛṇu tāni mahābuddhe sthānāni śaśimaulinaḥ
इनमें से जो पुण्यतम स्थान मनुष्यों के लिये सुगम्य हैं, हे महाबुद्धे! उन शशिमौलि के स्थानों को सुनो।
श्लोक 30 (skanda.8.167.30)
सर्वपर्वतराजस्य शृङ्गे हिमवतः शुभे । महालयमिति ख्यातं स्थानमाद्यं स्वयम्भुवः
sarvaparvatarājasya śṛṅge himavataḥ śubhe | mahālayamiti khyātaṁ sthānamādyaṁ svayambhuvaḥ
सर्वपर्वतराज हिमालय के शुभ शिखर पर, स्वयंभू का आदि स्थान है, जो 'महालय' नाम से विख्यात है।
श्लोक 31 (skanda.8.167.31)
यत्र सर्वामरा व्यास चतुर्वक्त्रपुरस्सराः । संसिद्धा मुनयश्चैव ये च योगीश्वरा भुवि
yatra sarvāmarā vyāsa caturvaktrapurassarāḥ | saṁsiddhā munayaścaiva ye ca yogīśvarā bhuvi
हे व्यास! जहाँ चतुर्मुख ब्रह्मा को आगे किये हुए समस्त देवगण, सिद्ध मुनिगण, और भूतल के योगीश्वर,
श्लोक 32 (skanda.8.167.32)
समभ्यर्च्य हरं भक्त्या तदवाप्ताः परं पदम् । यत्र साक्षान्महादेवो न्यस्तवान् पदमात्मनः
samabhyarcya haraṁ bhaktyā tadavāptāḥ paraṁ padam | yatra sākṣānmahādevo nyastavān padamātmanaḥ
भक्तिपूर्वक हर की अर्चना करके वहाँ परम पद को प्राप्त हुए। वहाँ साक्षात् महादेव ने अपना चरण रखा है,
श्लोक 33 (skanda.8.167.33)
यं प्रणम्य नराः सर्वे मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः । अभिगम्य तमीशानं महालयनिवासिनम्
yaṁ praṇamya narāḥ sarve mucyante sarvakilbiṣaiḥ | abhigamya tamīśānaṁ mahālayanivāsinam
जिसे प्रणाम करके सभी मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं। महालयवासी उस ईशान के पास पहुँचकर,
श्लोक 34 (skanda.8.167.34)
देहभेदं समासाद्य यत्र तत्र यथा तथा । न पुनर्जायते मर्त्यो यातः सिद्धिमनुत्तमाम्
dehabhedaṁ samāsādya yatra tatra yathā tathā | na punarjāyate martyo yātaḥ siddhimanuttamām
देहत्याग जहाँ भी और जैसे भी हो, वह मर्त्य पुनः जन्म नहीं लेता, अनुत्तम सिद्धि को प्राप्त होकर।
श्लोक 35 (skanda.8.167.35)
न तं पश्यन्त्यधर्मज्ञा येपि पापकृतो नराः । महागणपतिस्तत्र द्वारसंस्थो महाबलः
na taṁ paśyantyadharmajñā yepi pāpakṛto narāḥ | mahāgaṇapatistatra dvārasaṁstho mahābalaḥ
जो अधर्मज्ञ हैं, पापकर्मी मनुष्य भी, वे उसे नहीं देख पाते। वहाँ द्वार पर एक महाबली महागणपति स्थित है,
श्लोक 36 (skanda.8.167.36)
स तेषां गमनं हन्ति ये नराः पापकारिणः । योगिनो यत्र देवाश्च सिद्धाश्च परमर्षयः
sa teṣāṁ gamanaṁ hanti ye narāḥ pāpakāriṇaḥ | yogino yatra devāśca siddhāśca paramarṣayaḥ
वह उन पापकारी मनुष्यों की गति को रोक देता है। जहाँ योगी, देवता, सिद्ध और परमर्षिगण,
श्लोक 37 (skanda.8.167.37)
तं प्रणम्य ययुः सिद्धिं पुण्यं पशुपतेः पदम् । तस्य संकल्पनादेव द्रक्ष्यामीति महालयम्
taṁ praṇamya yayuḥ siddhiṁ puṇyaṁ paśupateḥ padam | tasya saṁkalpanādeva drakṣyāmīti mahālayam
उसे प्रणाम करके पशुपति के पुण्य पद, सिद्धि को प्राप्त हुए - मात्र इस संकल्प से कि 'मैं महालय को देखूँगा' -
श्लोक 38 (skanda.8.167.38)
कर्मभिर्मुच्यते जन्तुर्महापातकसंज्ञितैः । महालयं महत्क्षेत्रं मोक्षसिद्धिप्रदं शुभम्
karmabhirmucyate janturmahāpātakasaṁjñitaiḥ | mahālayaṁ mahatkṣetraṁ mokṣasiddhipradaṁ śubham
प्राणी महापातक कहे जानेवाले कर्मों से मुक्त हो जाता है। मोक्ष-सिद्धि प्रदान करनेवाला वह महान् पुण्य क्षेत्र महालय,
श्लोक 39 (skanda.8.167.39)
कुलान्युभयतः सप्त दृष्टत्वा त्रायति मानवः । ततः पुण्यतमं व्यास केदारं नाम नामतः
kulānyubhayataḥ sapta dṛṣṭatvā trāyati mānavaḥ | tataḥ puṇyatamaṁ vyāsa kedāraṁ nāma nāmataḥ
उसे देखकर मनुष्य दोनों ओर की सात-सात पीढ़ियों का उद्धार करता है। तदनन्तर, हे व्यास! 'केदार' नामक अत्यन्त पुण्यतम स्थान है -
श्लोक 40 (skanda.8.167.40)
परं धाम वृषाङ्कस्य तस्यैवोत्तरतः शुभम् । स्वयं किल हरो देवस्तस्मिन्नचलसत्तमे
paraṁ dhāma vṛṣāṅkasya tasyaivottarataḥ śubham | svayaṁ kila haro devastasminnacalasattame
वृषाङ्क का वह परम धाम उसी के उत्तर में शुभ है - वहाँ, उस श्रेष्ठतम पर्वत पर, स्वयं देव हर,
श्लोक 41 (skanda.8.167.41)
जटाभाराज्जलं पुण्यं मुमोच । दभवत्तत्र हरमौलिविनिःसृतम्
jaṭābhārājjalaṁ puṇyaṁ mumoca | dabhavattatra haramauliviniḥsṛtam
जटाओं के भार से उन्होंने पवित्र जल प्रवाहित किया [मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं] - वह वहाँ हर के मस्तक से निःसृत होकर उत्पन्न हुआ।
श्लोक 42 (skanda.8.167.42)
नरास्तदमृतप्रख्यं ये पिबन्ति जलं शुभम् । ते भवन्ति गणा व्यास कुष्माण्डा रुद्रवल्लभा
narāstadamṛtaprakhyaṁ ye pibanti jalaṁ śubham | te bhavanti gaṇā vyāsa kuṣmāṇḍā rudravallabhā
उस अमृततुल्य पवित्र जल को जो मनुष्य पीते हैं, हे व्यास! वे रुद्र के प्रिय 'कुष्माण्ड' नामक गण बन जाते हैं,
श्लोक 43 (skanda.8.167.43)
महारूपा महात्मनो नन्दिनोप्यधिकप्रभाः । केदारवासिनं दृष्टवा देवदेवं जगत्पतिम
mahārūpā mahātmano nandinopyadhikaprabhāḥ | kedāravāsinaṁ dṛṣṭavā devadevaṁ jagatpatima
वे महान् रूपवाले, महात्मा, नन्दी से भी अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं, केदारवासी देवदेव जगत्पति के दर्शन करके -
श्लोक 44 (skanda.8.167.44)
ब्रह्मा शक्रस्तथा विष्णुः सोमो यक्षगणाधिपः
brahmā śakrastathā viṣṇuḥ somo yakṣagaṇādhipaḥ
[इस श्लोक की प्रथम पंक्ति मूलपाठ में लुप्त है] ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, सोम, यक्षगणों के अधिपति कुबेर -
श्लोक 45 (skanda.8.167.45)
अर्चयन्ति स्थितं तत्र भक्तितः परमेश्वरम् । केदारसलिलं पीतं यैर्नरैः सुमहात्मभिः
arcayanti sthitaṁ tatra bhaktitaḥ parameśvaram | kedārasalilaṁ pītaṁ yairnaraiḥ sumahātmabhiḥ
वहाँ स्थित परमेश्वर की भक्तिपूर्वक अर्चना करते हैं। केदार का जल पीनेवाले वे महात्मा मनुष्य,
श्लोक 46 (skanda.8.167.46)
कथं शोचन्ति ते व्यास प्राप्तं किन्नु न तैः सुखम् । केदारे हिमवन्महीध्रशिखरे यत्तत्पयः प्रस्रुतं मूर्ध्नः सोममहेन्द्रविष्णुमरुतां स्रष्टुर्विभोः शूलिनः । पातुं यन्न लभन्त्यधर्मरुचयः शैवं विनानुग्रहं तत्पीत्वा भवबन्धनप्रतिभयान्मुक्ता भवेयुः प्रजाः
kathaṁ śocanti te vyāsa prāptaṁ kinnu na taiḥ sukham | kedāre himavanmahīdhraśikhare yattatpayaḥ prasrutaṁ mūrdhnaḥ somamahendraviṣṇumarutāṁ sraṣṭurvibhoḥ śūlinaḥ | pātuṁ yanna labhantyadharmarucayaḥ śaivaṁ vinānugrahaṁ tatpītvā bhavabandhanapratibhayānmuktā bhaveyuḥ prajāḥ
वे कैसे शोक करेंगे, हे व्यास? क्या उन्हें सुख प्राप्त नहीं हुआ? - 'केदार में हिमगिरि के शिखर पर जो वह जल बहता है, सोम, महेन्द्र, विष्णु और मरुतों के स्रष्टा शूलधारी विभु के मस्तक से - जिसे अधर्मरुचि लोग शिव की कृपा के बिना पी नहीं पाते - उसे पीकर प्रजाएँ संसार-बन्धन के भयानक भय से मुक्त हो जाती हैं।'
श्लोक 47 (skanda.8.167.47)
मध्यमेश्वरमत्रैव स्थानमाद्यमुमापतेः । गत्वा तमपि देवेशं गाणपत्यमवाप्नुयात्
madhyameśvaramatraiva sthānamādyamumāpateḥ | gatvā tamapi deveśaṁ gāṇapatyamavāpnuyāt
यहीं मध्यमेश्वर, उमापति का आदि स्थान है; उस देवेश्वर के पास जाकर भी मनुष्य गणपद को प्राप्त करता है।
श्लोक 48 (skanda.8.167.48)
तत्रापि स्वयमेवेशः सदा सन्निहितो मुने । अभिगम्य तमीशानं न शोचेन्मरणं प्रतिं
tatrāpi svayameveśaḥ sadā sannihito mune | abhigamya tamīśānaṁ na śocenmaraṇaṁ pratiṁ
वहाँ भी स्वयं ईश्वर सदा विद्यमान हैं, हे मुने! उस ईशान के पास पहुँचकर मृत्यु के प्रति शोक नहीं करना चाहिये।
श्लोक 49 (skanda.8.167.49)
त्रयाणामपि लोकानां प्रदेशे हिमवद्गिरेः । एष श्रेष्ठतमो व्यास सर्वसिद्धिप्रदः शुभः
trayāṇāmapi lokānāṁ pradeśe himavadgireḥ | eṣa śreṣṭhatamo vyāsa sarvasiddhipradaḥ śubhaḥ
तीनों लोकों के मध्य, हिमवत्पर्वत के प्रदेश में, यह, हे व्यास! सर्वश्रेष्ठ, शुभ, सर्वसिद्धिप्रद स्थान है।
श्लोक 50 (skanda.8.167.50)
अस्याभिगमनादेव सर्वयज्ञफलं स्मृतम् । विपन्नस्य प्रमादाद्वा गाणपत्या गतिर्वरा
asyābhigamanādeva sarvayajñaphalaṁ smṛtam | vipannasya pramādādvā gāṇapatyā gatirvarā
मात्र इसके पास जाने से समस्त यज्ञों का फल प्राप्त होता माना गया है; प्रमाद से भी वहाँ मृत्यु हो जाने पर गणपद की उत्तम गति मिलती है।
श्लोक 51 (skanda.8.167.51)
नातः पुण्यतमं किञ्चित् सर्वलोकेषु विद्यते । त्रैलोक्ये चक्रवर्त्तित्वमस्मिन् वा मरणं गिरौ
nātaḥ puṇyatamaṁ kiñcit sarvalokeṣu vidyate | trailokye cakravarttitvamasmin vā maraṇaṁ girau
इससे अधिक पुण्यमय कुछ भी सम्पूर्ण लोकों में विद्यमान नहीं है - त्रैलोक्य का चक्रवर्तित्व हो, अथवा इस पर्वत पर मृत्यु हो -
श्लोक 52 (skanda.8.167.52)
चक्रवर्त्तिपदात्तस्मादिह मृत्युर्विशिष्यते । याति सायुज्यतां शम्भोः परमैश्वर्यसंयुतः
cakravarttipadāttasmādiha mṛtyurviśiṣyate | yāti sāyujyatāṁ śambhoḥ paramaiśvaryasaṁyutaḥ
चक्रवर्ति-पद से भी यहाँ की मृत्यु श्रेष्ठ है; परम ऐश्वर्य से युक्त होकर मनुष्य शम्भु के सायुज्य को प्राप्त होता है।
श्लोक 53 (skanda.8.167.53)
गिराविह मृतो जन्तुः किन्ततः परमं पदम् । महद्धिमवतस्त्वन्यत् कूटं सिद्धनिषेवितम्
girāviha mṛto jantuḥ kintataḥ paramaṁ padam | mahaddhimavatastvanyat kūṭaṁ siddhaniṣevitam
इस पर्वत पर मरा हुआ प्राणी - उससे परे और क्या परम पद है? हिमालय का एक और महान् शिखर है, सिद्धों से सेवित,
श्लोक 54 (skanda.8.167.54)
यत्र देवी तपस्तेपे गौरवर्णसमीप्सया । गौरीशिखरमित्येव त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्
yatra devī tapastepe gauravarṇasamīpsayā | gaurīśikharamityeva triṣu lokeṣu viśrutam
जहाँ देवी ने गौरवर्ण की कामना से तप किया था - वह त्रिलोक में 'गौरीशिखर' नाम से विख्यात है।
श्लोक 55 (skanda.8.167.55)
कुचकुण्ड इति ख्याते तीर्थे यत्रोमया कृते । तद् गौरीशिखरं पुण्यं येभिगच्छन्ति मानवाः
kucakuṇḍa iti khyāte tīrthe yatromayā kṛte | tad gaurīśikharaṁ puṇyaṁ yebhigacchanti mānavāḥ
उमा द्वारा बनाये गये 'कुचकुण्ड' नामक तीर्थ में - उस पुण्य गौरीशिखर में जो मनुष्य जाते हैं,
श्लोक 56 (skanda.8.167.56)
अश्वमेधफलं प्राप्य ते यान्ति परमां गतिम् । ऋषभं शृङ्गमपरं वज्रस्फटिकसन्निभम्
aśvamedhaphalaṁ prāpya te yānti paramāṁ gatim | ṛṣabhaṁ śṛṅgamaparaṁ vajrasphaṭikasannibham
अश्वमेध का फल पाकर परम गति को प्राप्त होते हैं। एक अन्य शिखर 'ऋषभ' नाम से है, वज्र और स्फटिक के समान,
श्लोक 57 (skanda.8.167.57)
यत्र नन्दी तपस्तेपे वरञ्चावाप शङ्करात् । ऋषभं प्राप्य तत्कूटं स्थानं पुण्यमुमापतेः
yatra nandī tapastepe varañcāvāpa śaṅkarāt | ṛṣabhaṁ prāpya tatkūṭaṁ sthānaṁ puṇyamumāpateḥ
जहाँ नन्दी ने तप किया और शंकर से वर प्राप्त किया - उस ऋषभ शिखर, उमापति के पुण्य स्थान को प्राप्त करके,
श्लोक 58 (skanda.8.167.58)
दृष्ट्वा पापविनिर्मुक्तो रुद्रलोकमवाप्नुते । अन्यद्धिमगिरेः कूटं हेमकूटसमप्रभम्
dṛṣṭvā pāpavinirmukto rudralokamavāpnute | anyaddhimagireḥ kūṭaṁ hemakūṭasamaprabham
उसे देखकर, पापमुक्त होकर, मनुष्य रुद्रलोक को प्राप्त करता है। हिमगिरि का एक और शिखर है, हेमकूट के समान प्रभावाला,
श्लोक 59 (skanda.8.167.59)
यत्र भस्त्रेश्वरं नाम रुद्रस्यायतनं शुभम् । रुद्रस्तस्मिन् गिरौ देवो भस्त्रेश्वर इति स्मृतः
yatra bhastreśvaraṁ nāma rudrasyāyatanaṁ śubham | rudrastasmin girau devo bhastreśvara iti smṛtaḥ
जहाँ रुद्र का पुण्य आयतन 'भस्त्रेश्वर' नाम से है; उस पर्वत पर रुद्र देव 'भस्त्रेश्वर' नाम से स्मरण किये जाते हैं।
श्लोक 60 (skanda.8.167.60)
तं नमस्य महादेवं किन्नरोरगचारणाः । मृत्युभीताश्च पुरुषा जन्मदुःखैस्तथार्दिताः
taṁ namasya mahādevaṁ kinnaroragacāraṇāḥ | mṛtyubhītāśca puruṣā janmaduḥkhaistathārditāḥ
उस महादेव को नमस्कार करके किन्नर, नाग और चारण, तथा मृत्यु से भयभीत, जन्म के दुःखों से पीड़ित मनुष्य,
श्लोक 61 (skanda.8.167.61)
तदायतनमासाद्य कामानापुर्यथेप्सितान् । तं दृष्ट्वा मनुजो व्याप्त राजसूयफलं लभेत्
tadāyatanamāsādya kāmānāpuryathepsitān | taṁ dṛṣṭvā manujo vyāpta rājasūyaphalaṁ labhet
उस आयतन को पाकर अपनी अभीष्ट कामनाओं को प्राप्त करते हैं; उसे देखकर, हे व्यास! मनुष्य राजसूय का फल पाता है।
श्लोक 62 (skanda.8.167.62)
गङ्गाद्वारे शुभद्वारे महापुण्ये महात्मना । दक्षेण स्थापितं लिङ्गं भक्तिहेतोः कपर्दिनः
gaṅgādvāre śubhadvāre mahāpuṇye mahātmanā | dakṣeṇa sthāpitaṁ liṅgaṁ bhaktihetoḥ kapardinaḥ
गंगाद्वार में, उस शुभ, महापुण्य द्वार में, महात्मा दक्ष द्वारा कपर्दी की भक्ति के हेतु एक लिंग स्थापित किया गया।
श्लोक 63 (skanda.8.167.63)
वृक्षाः कनखला नाम यत्रासन् कनकात्मकाः । मानुषाणामशीलत्वात् संवृक्णा दारवो बभुः
vṛkṣāḥ kanakhalā nāma yatrāsan kanakātmakāḥ | mānuṣāṇāmaśīlatvāt saṁvṛkṇā dāravo babhuḥ
जहाँ 'कनखल' नामक स्वर्णमय वृक्ष थे; मनुष्यों की अशीलता के कारण काटे जाकर वे साधारण काष्ठ बन गये।
श्लोक 64 (skanda.8.167.64)
विश्वात्मा यत्र विश्वेशः शम्भुरम्बिकया सह । बहुरूपेश्वरो नाम्ना नैकप्राणिवरप्रदः
viśvātmā yatra viśveśaḥ śambhurambikayā saha | bahurūpeśvaro nāmnā naikaprāṇivarapradaḥ
वहाँ विश्वात्मा विश्वेश शम्भु, अम्बिका के साथ, 'बहुरूपेश्वर' नाम से अनेक प्राणियों को वरदान देनेवाले हैं,
श्लोक 65 (skanda.8.167.65)
मानवा यन्न पश्यन्ति जन्म चेष मुमुक्षवः । वाजिमेधं दशगुणं यं दृष्टवा प्राप्नुते नरः
mānavā yanna paśyanti janma ceṣa mumukṣavaḥ | vājimedhaṁ daśaguṇaṁ yaṁ dṛṣṭavā prāpnute naraḥ
जिसे मुमुक्षु मनुष्य जन्म से मुक्त होने पर नहीं देखते; उसे देखकर मनुष्य अश्वमेध के दसगुने फल को प्राप्त करता है।
श्लोक 66 (skanda.8.167.66)
यं देवविद्याधरसिद्धसंघा गन्धर्वयक्षोरगदानवाश्च । दृष्ट्वेश्वरं नीलपयोदकण्ठं संसारपङ्के न पुनः पतन्ति
yaṁ devavidyādharasiddhasaṁghā gandharvayakṣoragadānavāśca | dṛṣṭveśvaraṁ nīlapayodakaṇṭhaṁ saṁsārapaṅke na punaḥ patanti
जिस नीलकण्ठ ईश्वर को देवगण, विद्याधर, सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष, नाग और दानव देखकर - संसार के कीचड़ में पुनः नहीं गिरते।
श्लोक 67 (skanda.8.167.67)
जप्येश्वरमिति ख्यातमन्यदायतनं विभोः । यत्र जप्यं पुरा कृत्वा लिङ्गं स्थापितवान् द्विजः
japyeśvaramiti khyātamanyadāyatanaṁ vibhoḥ | yatra japyaṁ purā kṛtvā liṅgaṁ sthāpitavān dvijaḥ
प्रभु का एक अन्य आयतन 'जप्येश्वर' नाम से जाना जाता है, जहाँ पूर्वकाल में जप करके एक द्विज ने लिंग स्थापित किया था।
श्लोक 68 (skanda.8.167.68)
जप्येश्वरं तदासाद्य प्राणाँस्त्यक्ष्यन्ति ये नराः । ते जन्ममरणान्मुक्ता वत्स्यन्ति शिवसद्मनि
japyeśvaraṁ tadāsādya prāṇā~styakṣyanti ye narāḥ | te janmamaraṇānmuktā vatsyanti śivasadmani
जप्येश्वर को पाकर जो मनुष्य वहाँ प्राण त्यागते हैं, वे जन्म-मृत्यु से मुक्त होकर शिवसदन में निवास करते हैं।
श्लोक 69 (skanda.8.167.69)
अन्यदायतनं व्यास शशिबिम्बार्धमौलिनः । महाभैरव इत्येव ख्यातं जगति यन्मुने
anyadāyatanaṁ vyāsa śaśibimbārdhamaulinaḥ | mahābhairava ityeva khyātaṁ jagati yanmune
हे व्यास! अर्धचन्द्रमौलि का एक और आयतन 'महाभैरव' नाम से जगत् में विख्यात है,
श्लोक 70 (skanda.8.167.70)
यत्र शूलधरो देवः स्वयमेव वृषध्वजः । चकार भैरवं रूपं नन्द्युमागणभीषणम्
yatra śūladharo devaḥ svayameva vṛṣadhvajaḥ | cakāra bhairavaṁ rūpaṁ nandyumāgaṇabhīṣaṇam
जहाँ स्वयं वृषभध्वज शूलधारी देव ने नन्दी सहित गणों के साथ भैरव का भीषण रूप धारण किया था,
श्लोक 71 (skanda.8.167.71)
यद् दृष्टवा हिमवत्पुत्री बभूव भयविह्वला । क्रीडाहेतोर्भवो यत्र त्रासयित्वा रिरीन्द्रजाम्
yad dṛṣṭavā himavatputrī babhūva bhayavihvalā | krīḍāhetorbhavo yatra trāsayitvā rirīndrajām
जिसे देखकर हिमवत्पुत्री भयविह्वल हो गयी - भव ने क्रीड़ावश पर्वतराजपुत्री को भयभीत करके -
श्लोक 72 (skanda.8.167.72)
सौम्यरूपोभवद् भूयः सान्त्वयामास शैलजाम् । महाभैरव इत्येव तदायतनमुच्यते
saumyarūpobhavad bhūyaḥ sāntvayāmāsa śailajām | mahābhairava ityeva tadāyatanamucyate
फिर सौम्यरूप धारण करके पर्वतपुत्री को सान्त्वना दी; वह आयतन 'महाभैरव' कहलाता है।
श्लोक 73 (skanda.8.167.73)
भैरवेश्वरमागम्य यः पश्येत पिनाकिनम् । मरणं जन्म च व्यास नासौ पुनरवाप्नुयात्
bhairaveśvaramāgamya yaḥ paśyeta pinākinam | maraṇaṁ janma ca vyāsa nāsau punaravāpnuyāt
भैरवेश्वर में आकर जो शूलधारी का दर्शन करता है, हे व्यास! वह पुनः मृत्यु और जन्म को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 74 (skanda.8.167.74)
यदेवाश्रमिणां पुण्यं तथेशव्रतचारिणाम् । तत्फलं भैरवं दृष्ट्वा प्राप्नोति नरपुङ्गवः
yadevāśramiṇāṁ puṇyaṁ tatheśavratacāriṇām | tatphalaṁ bhairavaṁ dṛṣṭvā prāpnoti narapuṅgavaḥ
आश्रमवासियों का जो पुण्य है, तथा शिव-व्रतचारियों का जो पुण्य है - वही फल श्रेष्ठ पुरुष भैरव को देखकर पाता है।
श्लोक 75 (skanda.8.167.75)
कुम्भकारेश्वरं चैव तथैवोत्कुटुकेश्वरम् । छगलण्डेश्वरं चैव महाभैरवजं स्थलम्
kumbhakāreśvaraṁ caiva tathaivotkuṭukeśvaram | chagalaṇḍeśvaraṁ caiva mahābhairavajaṁ sthalam
और कुम्भकारेश्वर, तथा उत्कुटुकेश्वर, और छगलण्डेश्वर भी - ये महाभैरव से उत्पन्न स्थल हैं -
श्लोक 76 (skanda.8.167.76)
दृष्टैरेभिस्त्रिभिः स्थानैस्त्रिलोकाधिपतिर्भवेत् । रुद्रकोटीति चाप्यन्यच्छिवायतनमुच्यते
dṛṣṭairebhistribhiḥ sthānaistrilokādhipatirbhavet | rudrakoṭīti cāpyanyacchivāyatanamucyate
इन तीनों स्थानों को देखकर मनुष्य त्रिलोक का अधिपति बन जाता है; और एक अन्य शिवायतन 'रुद्रकोटि' कहलाता है।
श्लोक 77 (skanda.8.167.77)
रुद्रकोटीत्रयं जप्त्वा तत्र नन्दी वरोत्तमान् । अवाप शङ्कराद् व्यास गणेशत्वं तथोत्तमम्
rudrakoṭītrayaṁ japtvā tatra nandī varottamān | avāpa śaṅkarād vyāsa gaṇeśatvaṁ tathottamam
वहाँ 'रुद्रकोटि' का त्रिवार जप करके नन्दी ने शंकर से उत्तम वरों को प्राप्त किया, हे व्यास! उत्तम गणेशत्व को।
श्लोक 78 (skanda.8.167.78)
यैस्तदायतनं दृष्टं ते यान्ति परमां गतिम् । देवदारुवने चापि भवस्यायतनं वरम्
yaistadāyatanaṁ dṛṣṭaṁ te yānti paramāṁ gatim | devadāruvane cāpi bhavasyāyatanaṁ varam
जिन्होंने उस आयतन को देखा है, वे परम गति को प्राप्त होते हैं। देवदारुवन में भी भव का एक उत्तम आयतन है,
श्लोक 79 (skanda.8.167.79)
देवदारुवनैश्छन्नं सरलैश्च सुगन्धिभिः । सदा संसेवितं तद्धि गन्धर्वोरगकिन्नरैः
devadāruvanaiśchannaṁ saralaiśca sugandhibhiḥ | sadā saṁsevitaṁ taddhi gandharvoragakinnaraiḥ
देवदारु और सुगन्धित सरल वृक्षों से आच्छादित, सदा गन्धर्वों, नागों और किन्नरों से सेवित,
श्लोक 80 (skanda.8.167.80)
यत्र वैखानसा विप्राः शिवभक्तिपरायणाः । भास्करानलसंकाशा निवसन्ति तपोधनाः
yatra vaikhānasā viprāḥ śivabhaktiparāyaṇāḥ | bhāskarānalasaṁkāśā nivasanti tapodhanāḥ
जहाँ शिवभक्तिपरायण वैखानस विप्र, सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी, तपोधन निवास करते हैं -
श्लोक 81 (skanda.8.167.81)
भिक्षाहेतोर्वनं तत्तु प्राविशत् किल शूलधृक् । स दृष्टस्तत्र देवेशो मुनिभिः स्तब्धमेहनः
bhikṣāhetorvanaṁ tattu prāviśat kila śūladhṛk | sa dṛṣṭastatra deveśo munibhiḥ stabdhamehanaḥ
भिक्षा के लिये शूलधारी ने उस वन में प्रवेश किया; वहाँ मुनियों ने देवेश्वर को स्तब्धमेहन (ऊर्ध्वलिंग) अवस्था में देखा।
श्लोक 82 (skanda.8.167.82)
ईर्ष्यया मुनिभिर्लिङ्गं तस्य देवस्य तन्महत् । विमूढैः पातितं व्यास देवदारुवनाश्रमे
īrṣyayā munibhirliṅgaṁ tasya devasya tanmahat | vimūḍhaiḥ pātitaṁ vyāsa devadāruvanāśrame
ईर्ष्यावश, हे व्यास! उन मूढ़ मुनियों ने देवदारुवन के आश्रम में उस देव के उस महान् लिंग को गिरा दिया।
श्लोक 83 (skanda.8.167.83)
तस्मिन् निपतिते लिङ्गे लिङ्गहीनमभूज्जगत् । स्थावरं जङ्गमं चैव बभौ सर्वं नपुंसकम्
tasmin nipatite liṅge liṅgahīnamabhūjjagat | sthāvaraṁ jaṅgamaṁ caiva babhau sarvaṁ napuṁsakam
उस लिंग के गिर जाने पर जगत् लिंगहीन हो गया; स्थावर-जंगम सभी सर्वथा नपुंसक हो गये।
श्लोक 84 (skanda.8.167.84)
ब्रह्मादयस्ततो देवास्ते च सिद्धा मुमुक्षवः । ज्ञात्वा शङ्करजं सर्वं तदपायं सुदारुणम्
brahmādayastato devāste ca siddhā mumukṣavaḥ | jñātvā śaṅkarajaṁ sarvaṁ tadapāyaṁ sudāruṇam
तब ब्रह्मादि देवगण तथा मुमुक्षु सिद्धगण, शंकरजनित इस भयंकर विपत्ति को समझकर,
श्लोक 85 (skanda.8.167.85)
संस्तुत्य विविधैः स्तोत्रैः शङ्करं पर्यतोषयन् । ततस्तदभवल्लिङ्गं यथापूर्वं पिनाकिनः
saṁstutya vividhaiḥ stotraiḥ śaṅkaraṁ paryatoṣayan | tatastadabhavalliṅgaṁ yathāpūrvaṁ pinākinaḥ
विविध स्तोत्रों से स्तवन करके शंकर को सन्तुष्ट किया; तब वह लिंग शूलधारी का पूर्ववत् हो गया।
श्लोक 86 (skanda.8.167.86)
जगतश्च ततः पुंस्त्वं तत्क्षणात् समपद्यत । तत्र तैः स्थापितं लिङ्गं परमेशस्य भक्तितः
jagataśca tataḥ puṁstvaṁ tatkṣaṇāt samapadyata | tatra taiḥ sthāpitaṁ liṅgaṁ parameśasya bhaktitaḥ
और तत्क्षण जगत् का पुंस्त्व पुनः स्थापित हो गया। वहाँ उन्होंने भक्तिपूर्वक परमेश्वर का एक लिंग स्थापित किया।
श्लोक 87 (skanda.8.167.87)
तद् दृष्टवा वाजिमेधानां दशानां प्राप्नुते फलम् । एवं दारुवनं पुण्यमीशस्यास्ते महामुने
tad dṛṣṭavā vājimedhānāṁ daśānāṁ prāpnute phalam | evaṁ dāruvanaṁ puṇyamīśasyāste mahāmune
उसे देखकर मनुष्य दस अश्वमेधों का फल पाता है। इस प्रकार हे महामुने! ईश्वर का यह पुण्य देवदारुवन,
श्लोक 88 (skanda.8.167.88)
अभिगम्य नराः क्षिप्रं मुच्यन्ते सर्वपातकैः । दधीचेन महद्दिव्यं पुण्यमायतनं कृतम्
abhigamya narāḥ kṣipraṁ mucyante sarvapātakaiḥ | dadhīcena mahaddivyaṁ puṇyamāyatanaṁ kṛtam
उसमें जाकर मनुष्य शीघ्र ही समस्त पातकों से मुक्त हो जाते हैं। दधीचि द्वारा एक महान् दिव्य पुण्य आयतन बनाया गया,
श्लोक 89 (skanda.8.167.89)
स्थानेश्वरमिति ख्यातं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । नरः स्थानेश्वरं प्राप्य यस्त्यजेदात्मनस्तनुम्
sthāneśvaramiti khyātaṁ triṣu lokeṣu viśrutam | naraḥ sthāneśvaraṁ prāpya yastyajedātmanastanum
जो 'स्थानेश्वर' नाम से त्रिलोक में विख्यात है; जो मनुष्य स्थानेश्वर को पाकर वहाँ अपनी देह त्याग देता है,
श्लोक 90 (skanda.8.167.90)
योगैश्वर्यमनुप्राप्य स्वर्गलोके स मोदते । तक्षकेन भुजङ्गेन दृढभक्तेन शङ्करे
yogaiśvaryamanuprāpya svargaloke sa modate | takṣakena bhujaṅgena dṛḍhabhaktena śaṅkare
योगैश्वर्य को प्राप्त कर स्वर्गलोक में आनन्दित होता है। तक्षक नामक भुजंग ने, जो शंकर का दृढ़ भक्त था,
श्लोक 91 (skanda.8.167.91)
तक्षकेश्वरमित्येवं स्थापितं जाह्नवीतटे । देवदेवस्य रुद्रस्य यत्र सान्निध्यमुत्तमम्
takṣakeśvaramityevaṁ sthāpitaṁ jāhnavītaṭe | devadevasya rudrasya yatra sānnidhyamuttamam
गंगातट पर 'तक्षकेश्वर' नामक आयतन स्थापित किया गया, जहाँ देवदेव रुद्र का उत्तम सान्निध्य है।
श्लोक 92 (skanda.8.167.92)
तन्दृष्टत्वा पुरुषो देवमश्वमेधफलं लभेत् । अगस्त्येन कृतं चान्यत् पुण्यमायतनं महत्
tandṛṣṭatvā puruṣo devamaśvamedhaphalaṁ labhet | agastyena kṛtaṁ cānyat puṇyamāyatanaṁ mahat
उस देव को देखकर मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है। अगस्त्य द्वारा एक अन्य महान् पुण्य आयतन बनाया गया,
श्लोक 93 (skanda.8.167.93)
आम्रातेश्वरमित्येव ख्यातं जगति सुव्रत । दृष्ट्वा परमया भक्त्या पुरुषस्तं शुचिव्रतः
āmrāteśvaramityeva khyātaṁ jagati suvrata | dṛṣṭvā paramayā bhaktyā puruṣastaṁ śucivrataḥ
हे सुव्रत! जो जगत् में 'आम्रातेश्वर' नाम से विख्यात है; शुचिव्रत पुरुष उसे परम भक्ति से देखकर,
श्लोक 94 (skanda.8.167.94)
देहभेदमनुप्राप्य शर्वलोकमवाप्नुयात् । गिरौ कालञ्जरे लिङ्गं दृष्ट्वा स्थानमुमापतेः
dehabhedamanuprāpya śarvalokamavāpnuyāt | girau kālañjare liṅgaṁ dṛṣṭvā sthānamumāpateḥ
देहत्याग को प्राप्त होकर शर्वलोक को पाता है। कालंजर पर्वत पर उमापति के स्थान लिंग को देखकर,
श्लोक 95 (skanda.8.167.95)
अश्वमेधफलं प्राप्य रुद्रलोकमवाप्नुयात् । पुष्पभद्रमिति ख्यातं विन्ध्यप्रस्थे द्रुमावृतम्
aśvamedhaphalaṁ prāpya rudralokamavāpnuyāt | puṣpabhadramiti khyātaṁ vindhyaprasthe drumāvṛtam
अश्वमेध का फल पाकर मनुष्य रुद्रलोक को प्राप्त होता है। विन्ध्यप्रस्थ में वृक्षों से आच्छादित 'पुष्पभद्र' नामक स्थान है,
श्लोक 96 (skanda.8.167.96)
भवस्यायतनं पुण्यं देवगन्धर्वसेवितम् । यत्तद्रावणपुत्रेण मेघनादेन रक्षसा । स्थापितं तोषयानेन सर्वभूतपतिं भवम्
bhavasyāyatanaṁ puṇyaṁ devagandharvasevitam | yattadrāvaṇaputreṇa meghanādena rakṣasā | sthāpitaṁ toṣayānena sarvabhūtapatiṁ bhavam
भव का वह पुण्य आयतन देवों-गन्धर्वों से सेवित है, जिसे रावणपुत्र मेघनाद राक्षस ने सर्वभूतपति भव को सन्तुष्ट करने के लिये स्थापित किया।
श्लोक 97 (skanda.8.167.97)
यत्र मन्दोदरीपुत्रः स्थाणुना शशिमौलिना । मायारथप्रदानेन कृतः प्राप्तमनोरथः
yatra mandodarīputraḥ sthāṇunā śaśimaulinā | māyārathapradānena kṛtaḥ prāptamanorathaḥ
जहाँ मन्दोदरी-पुत्र को शशिमौलि स्थाणु ने मायामय रथ प्रदान कर उसकी अभिलषित कामना पूर्ण की थी।
श्लोक 98 (skanda.8.167.98)
तद, दृष्टवा तत्र गत्वा च प्रणम्य च जगत्पतिम् । पुरुषाः स्वर्गमायान्ति दिव्ययोगसमन्विताः
tada, dṛṣṭavā tatra gatvā ca praṇamya ca jagatpatim | puruṣāḥ svargamāyānti divyayogasamanvitāḥ
उसे देखकर, वहाँ जाकर, जगत्पति को प्रणाम करके, मनुष्य दिव्य योग से युक्त होकर स्वर्ग को जाते हैं।
श्लोक 99 (skanda.8.167.99)
अन्ध्रेष्वायतनं चान्यच्छर्वस्य परमात्मनः । नाम्ना चित्ररथं नाम योगसिद्धिवरप्रदम्
andhreṣvāyatanaṁ cānyaccharvasya paramātmanaḥ | nāmnā citrarathaṁ nāma yogasiddhivarapradam
आन्ध्र देश में परमात्मा शर्व का एक और आयतन है, 'चित्ररथ' नाम से, जो योगसिद्धि का वरदान देनेवाला है।
श्लोक 100 (skanda.8.167.100)
त्रिपुरस्य वधे यत्र रथो देवस्य धीमतः । अमरैश्चित्रितो व्यास सोमादित्ययमादिभिः
tripurasya vadhe yatra ratho devasya dhīmataḥ | amaraiścitrito vyāsa somādityayamādibhiḥ
जहाँ त्रिपुरवध के समय बुद्धिमान् देव के रथ को, हे व्यास! सोम, आदित्य, यम आदि अमरों ने अलंकृत किया था।
श्लोक 101 (skanda.8.167.101)
सम्यगिष्टे तु यत् प्रोक्तमश्वमेधे फलं बुधैः । तच्चित्ररथमासाद्य फलं प्राप्नोति मानवः
samyagiṣṭe tu yat proktamaśvamedhe phalaṁ budhaiḥ | taccitrarathamāsādya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ
सम्यक् रूप से किये गये अश्वमेध का जो फल विद्वानों द्वारा कहा गया है - वही फल मनुष्य चित्ररथ को पाकर प्राप्त करता है।
श्लोक 102 (skanda.8.167.102)
अन्यदुक्तरथं नाम भवस्यायतनं शुभम् । सुरकिन्नरगन्धर्वैः सदा संसेवितं शुभम्
anyaduktarathaṁ nāma bhavasyāyatanaṁ śubham | surakinnaragandharvaiḥ sadā saṁsevitaṁ śubham
भव का एक और शुभ आयतन 'उक्तरथ' कहलाता है, जो सदा देवों, किन्नरों और गन्धर्वों से सेवित है।
श्लोक 103 (skanda.8.167.103)
तत्र श्रीपर्वतो नाम पर्वतः श्रीनिकेतनः । सिद्धामरशताकीर्ण्णं सिद्धिक्षेत्रं तदुत्तमम्
tatra śrīparvato nāma parvataḥ śrīniketanaḥ | siddhāmaraśatākīrṇṇaṁ siddhikṣetraṁ taduttamam
वहाँ 'श्रीपर्वत' नामक पर्वत है, जो श्री का निवास है, सैकड़ों सिद्धों और अमरों से भरा हुआ - वह उत्तम सिद्धिक्षेत्र है।
श्लोक 104 (skanda.8.167.104)
शूलिनो यत्र लिङ्गानां पुण्यानां वरदायिनाम् । सहस्रं स्थापितं व्यास शिलादेन महात्मना
śūlino yatra liṅgānāṁ puṇyānāṁ varadāyinām | sahasraṁ sthāpitaṁ vyāsa śilādena mahātmanā
हे व्यास! जहाँ महात्मा शिलाद द्वारा शूलधारी के सहस्र पुण्य वरदायी लिंग स्थापित किये गये।
श्लोक 105 (skanda.8.167.105)
ये पश्यन्ति तमीशानं श्रीपर्वतनिवासिनम् । जन्ममृत्युभयं तेषां नास्ति पुंसां कदाचन
ye paśyanti tamīśānaṁ śrīparvatanivāsinam | janmamṛtyubhayaṁ teṣāṁ nāsti puṁsāṁ kadācana
श्रीपर्वतवासी उस ईशान को जो देखते हैं, उन पुरुषों को कभी जन्म-मृत्यु का भय नहीं होता।
श्लोक 106 (skanda.8.167.106)
अनेनैव शरीरेण तस्मिन् क्षेत्रे भवात्मके । योगाभ्यासपरा विप्राः सिद्धिं यान्ति यथेप्सिताम्
anenaiva śarīreṇa tasmin kṣetre bhavātmake | yogābhyāsaparā viprāḥ siddhiṁ yānti yathepsitām
उस भवात्मक क्षेत्र में इसी शरीर से, योगाभ्यास में तत्पर विप्र यथेच्छ सिद्धि को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 107 (skanda.8.167.107)
मनसाप्यभिगच्छन्ति ये नराः श्रीगिरिं मुने । न ते यान्ति यमावासं मृत्यावपि समागते
manasāpyabhigacchanti ye narāḥ śrīgiriṁ mune | na te yānti yamāvāsaṁ mṛtyāvapi samāgate
जो मनुष्य मन से भी श्रीगिरि के पास पहुँचते हैं, हे मुने! वे मृत्यु के आने पर भी यम के निवास को नहीं जाते।
श्लोक 108 (skanda.8.167.108)
ततश्चोत्तरगोकर्णं हरलिङ्गाङ्किताश्रमम् । तप्तं यत्र तपस्तीव्रं राक्षसैः पिशिताशनैः
tataścottaragokarṇaṁ haraliṅgāṅkitāśramam | taptaṁ yatra tapastīvraṁ rākṣasaiḥ piśitāśanaiḥ
तत्पश्चात् उत्तर-गोकर्ण है, हरलिङ्ग से अंकित आश्रम, जहाँ मांसाहारी राक्षसों ने तीव्र तप किया था -
श्लोक 109 (skanda.8.167.109)
रावणाद्यैर्महाभागैर्लब्धश्च वर ईप्सितः । पुरा यत्र तपः कृत्वा प्रसाद्य च पिनाकिनम्
rāvaṇādyairmahābhāgairlabdhaśca vara īpsitaḥ | purā yatra tapaḥ kṛtvā prasādya ca pinākinam
रावण आदि महाभागों ने वहाँ इच्छित वर प्राप्त किया; पूर्वकाल में वहाँ तप करके और शूलधारी को प्रसन्न करके,
श्लोक 110 (skanda.8.167.110)
त्रैलोक्ये चक्रवर्तित्वं रावणस्समवाप्तवान् । अश्वमेधं दशगुणं तद् दृष्टवा लभते नरः
trailokye cakravartitvaṁ rāvaṇassamavāptavān | aśvamedhaṁ daśaguṇaṁ tad dṛṣṭavā labhate naraḥ
रावण ने त्रैलोक्य का चक्रवर्तित्व प्राप्त किया था। उस स्थान को देखकर मनुष्य अश्वमेध के दसगुने फल को पाता है।
श्लोक 111 (skanda.8.167.111)
मृतश्च रुद्रसायुज्यं गच्छत्यत्र न संशयः । ततो दक्षिणगोकर्णं स्थानं पुण्यं पिनाकिनः
mṛtaśca rudrasāyujyaṁ gacchatyatra na saṁśayaḥ | tato dakṣiṇagokarṇaṁ sthānaṁ puṇyaṁ pinākinaḥ
और जो वहाँ मरता है, वह निःसन्देह रुद्रसायुज्य को प्राप्त होता है। फिर दक्षिण-गोकर्ण है, शूलधारी का पुण्य स्थान,
श्लोक 112 (skanda.8.167.112)
स्पृक्कया जातया यत्र लङ्कामलयसानुषु । अर्च्यते भगवान्देवः सर्वामरवरेश्वरः
spṛkkayā jātayā yatra laṅkāmalayasānuṣu | arcyate bhagavāndevaḥ sarvāmaravareśvaraḥ
जहाँ लंका के मलयगिरि की तराइयों में उत्पन्न स्पृक्का (सुगन्धित लता) से, सर्व अमरवरेश्वर भगवान् की अर्चना की जाती है -
श्लोक 113 (skanda.8.167.113)
एको राक्षसशार्दूलो यत्राद्यापि विभीषणः । समभ्यर्च्यामरेशानं भुंक्ते राज्यमशङ्कितः
eko rākṣasaśārdūlo yatrādyāpi vibhīṣaṇaḥ | samabhyarcyāmareśānaṁ bhuṁkte rājyamaśaṅkitaḥ
वहाँ आज भी राक्षसश्रेष्ठ विभीषण अकेले ही देवेश्वर की अर्चना करके निर्भय होकर राज्य भोगते हैं।
श्लोक 114 (skanda.8.167.114)
मानवा येभिगच्छन्ति गोकर्णायतनाश्रमम् । दशानामश्वमेधानां प्राप्नुवन्ति फलं शुभम्
mānavā yebhigacchanti gokarṇāyatanāśramam | daśānāmaśvamedhānāṁ prāpnuvanti phalaṁ śubham
गोकर्ण के आयतन-आश्रम को जो मनुष्य पाते हैं, वे दस अश्वमेधों के शुभ फल को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 115 (skanda.8.167.115)
हरिश्चन्द्र इति ख्यातो गिरिर्नैकविनिर्झरः । जामदग्न्येन रामेण यस्मिन्नायतनं कृतम्
hariścandra iti khyāto girirnaikavinirjharaḥ | jāmadagnyena rāmeṇa yasminnāyatanaṁ kṛtam
'हरिश्चन्द्र' नामक पर्वत है, अनेक झरनोंवाला, जहाँ जमदग्निनन्दन राम ने एक आयतन बनाया था,
श्लोक 116 (skanda.8.167.116)
यत्र देवाश्च सिद्धाश्च यक्षगुह्यककिन्नराः । व्रतिनो योगिनश्चैव नेमिरे वृषभध्वजम्
yatra devāśca siddhāśca yakṣaguhyakakinnarāḥ | vratino yoginaścaiva nemire vṛṣabhadhvajam
जहाँ देवता, सिद्ध, यक्ष, गुह्यक, किन्नर तथा व्रती और योगीजन वृषभध्वज को नमस्कार करते थे।
श्लोक 117 (skanda.8.167.117)
हरिश्चन्द्रगिरे शृङ्गमाकूटं यैर्निरीक्षितम् । न ते वसन्ति मर्त्येषु देवा भूत्वा पुनर्मुने
hariścandragire śṛṅgamākūṭaṁ yairnirīkṣitam | na te vasanti martyeṣu devā bhūtvā punarmune
हरिश्चन्द्रगिरि के शिखर को जिन्होंने दूर से भी देखा है, वे मनुष्यों में पुनः निवास नहीं करते, हे मुने! वे देवता बनकर रहते हैं।
श्लोक 118 (skanda.8.167.118)
उत्तरे नर्मदातीरे योजनैकपथान्तरे । कारोहणमिति स्थानं त्रिनेत्रायतनं महत्
uttare narmadātīre yojanaikapathāntare | kārohaṇamiti sthānaṁ trinetrāyatanaṁ mahat
नर्मदा के उत्तर तट पर, एक योजन की दूरी पर, 'कारोहण' नामक स्थान है, त्रिनेत्र का महान् आयतन।
श्लोक 119 (skanda.8.167.119)
यत्र काकां तपस्यन्तीमारुरोह प्रजापतिः । आरुरोह यतः काकां तस्मिन् देशे प्रजापतिः
yatra kākāṁ tapasyantīmāruroha prajāpatiḥ | āruroha yataḥ kākāṁ tasmin deśe prajāpatiḥ
जहाँ तपस्या करती हुई काकी पर प्रजापति आरूढ़ हुए थे - क्योंकि उस प्रदेश में प्रजापति काकी पर आरूढ़ हुए,
श्लोक 120 (skanda.8.167.120)
तस्मात् कारोहणो नाम्ना स देशः परिकीर्तितः । तस्मिन् देशेवतीर्णश्च भगवान् वृषभध्वजः
tasmāt kārohaṇo nāmnā sa deśaḥ parikīrtitaḥ | tasmin deśevatīrṇaśca bhagavān vṛṣabhadhvajaḥ
इसलिये वह प्रदेश 'कारोहण' नाम से कहा गया। उस प्रदेश में भगवान् वृषभध्वज अवतीर्ण हुए -
श्लोक 121 (skanda.8.167.121)
पुण्योसौ सर्वदेशेभ्यो देशो येन निबोध तम् । क्षीणे कृतयुगे व्यास त्रेतायुगमुखोदये
puṇyosau sarvadeśebhyo deśo yena nibodha tam | kṣīṇe kṛtayuge vyāsa tretāyugamukhodaye
यह प्रदेश समस्त देशों से अधिक पुण्यमय है - क्यों, यह जानो, हे व्यास! जब कृतयुग क्षीण हो गया, त्रेतायुग के आरम्भ में,
श्लोक 122 (skanda.8.167.122)
तस्मिन् पादं मुमोचैकं धर्मोधर्मनिपीडितः । द्वितीयं द्वापरे प्राप्त तृतीयं च कलौ युगे
tasmin pādaṁ mumocaikaṁ dharmodharmanipīḍitaḥ | dvitīyaṁ dvāpare prāpta tṛtīyaṁ ca kalau yuge
वहाँ धर्म और अधर्म से पीड़ित होकर उन्होंने एक पैर छोड़ा; दूसरा द्वापर में, तीसरा कलियुग में प्राप्त हुआ,
श्लोक 123 (skanda.8.167.123)
चतुर्थेनावतस्थे च यतः स भगवान् प्रभुः । एवं स धर्मसंवासाद् देशः पुण्यतमः स्मृतः
caturthenāvatasthe ca yataḥ sa bhagavān prabhuḥ | evaṁ sa dharmasaṁvāsād deśaḥ puṇyatamaḥ smṛtaḥ
और चौथे से स्थिर रहे - चूँकि वे भगवान् प्रभु धर्मवास के कारण इस प्रकार रहे, इसीलिये वह देश परम पुण्यतम माना गया।
श्लोक 124 (skanda.8.167.124)
भारभूतिस्त्वसौ भूत्वा तस्मिन्देशे पिनाकधृक् । भारान् बद्ध्वा द्विजातीनां नर्मदायां विचिक्षिपे
bhārabhūtistvasau bhūtvā tasmindeśe pinākadhṛk | bhārān baddhvā dvijātīnāṁ narmadāyāṁ vicikṣipe
उस प्रदेश में भारभूति बनकर शूलधारी ने द्विजातियों के भार बाँधकर नर्मदा में फेंक दिये -
श्लोक 125 (skanda.8.167.125)
कारुण्येन महादेवो मर्त्त्यजन्ममुमुक्षया । त्रेतायां दिण्डिमुण्डश्च शिरांसि विनिकृत्तवान्
kāruṇyena mahādevo marttyajanmamumukṣayā | tretāyāṁ diṇḍimuṇḍaśca śirāṁsi vinikṛttavān
करुणावश महादेव ने मर्त्यजन्म से मुक्त करने की इच्छा से ऐसा किया; त्रेता में दिण्डिमुण्ड बनकर उन्होंने सिर काटे।
श्लोक 126 (skanda.8.167.126)
द्वापरे चाषढिर्भूत्वा नृत्तेनानुगृहीतवान् । एवं प्रतियुगं व्यास तस्मिन्देशे शिवः स्वयम्
dvāpare cāṣaḍhirbhūtvā nṛttenānugṛhītavān | evaṁ pratiyugaṁ vyāsa tasmindeśe śivaḥ svayam
द्वापर में आषाढ़ि बनकर उन्होंने नृत्य द्वारा अनुग्रह किया; इस प्रकार, हे व्यास! प्रत्येक युग में स्वयं शिव,
श्लोक 127 (skanda.8.167.127)
अवतीर्णश्चानुगृह्य ब्राह्मणान् शुद्धमानसान् । तेषामायतनानि स्म सर्वेषामेव सुव्रत
avatīrṇaścānugṛhya brāhmaṇān śuddhamānasān | teṣāmāyatanāni sma sarveṣāmeva suvrata
अवतीर्ण होकर शुद्धमन ब्राह्मणों पर अनुग्रह करते रहे - उन सबके, हे सुव्रत! आयतन हैं,
श्लोक 128 (skanda.8.167.128)
येन दृष्टानि देवस्य ईशानलोकमाप्नुयात् । वर्तमाने कलौ चापि ज्ञात्वा दुःखार्दितं जगत्
yena dṛṣṭāni devasya īśānalokamāpnuyāt | vartamāne kalau cāpi jñātvā duḥkhārditaṁ jagat
जिन्हें देखकर मनुष्य ईशानलोक को प्राप्त करता है। और वर्तमान कलियुग में भी दुःखार्त जगत् को जानकर,
श्लोक 129 (skanda.8.167.129)
चतुरः पुरुषान् सृष्ट्वा स्वस्मान्मुखचतुष्टयात् । प्रोवाच परमेशानो लोकानुग्रहलिप्सया
caturaḥ puruṣān sṛṣṭvā svasmānmukhacatuṣṭayāt | provāca parameśāno lokānugrahalipsayā
अपने चार मुखों से चार पुरुषों को उत्पन्न कर परमेश्वर ने लोकों पर अनुग्रह की इच्छा से कहा -
श्लोक 130 (skanda.8.167.130)
यूयं यात महीं सर्वे द्विजा भूत्वा तपस्विनः । मामेवैष्यथ योगोशा नीत्वा विप्रान् परं पदम्
yūyaṁ yāta mahīṁ sarve dvijā bhūtvā tapasvinaḥ | māmevaiṣyatha yogośā nītvā viprān paraṁ padam
'तुम सब पृथ्वी पर जाओ, द्विज तपस्वी बनकर; योगेश्वर बनकर विप्रों को परम पद तक पहुँचाकर, तुम मुझे ही प्राप्त होओगे।'
श्लोक 131 (skanda.8.167.131)
ते तथोक्त्वा ततो व्यास संबभूवुः पृथक् पृथक् । मानुषेषु तदा विप्रा मोक्षधर्मपरायणाः
te tathoktvā tato vyāsa saṁbabhūvuḥ pṛthak pṛthak | mānuṣeṣu tadā viprā mokṣadharmaparāyaṇāḥ
ऐसा कहकर, हे व्यास! वे अलग-अलग रूप में उत्पन्न हुए, मनुष्यों में विप्र बनकर, मोक्षधर्मपरायण।
श्लोक 132 (skanda.8.167.132)
उज्जयिन्यां गुरुज्येष्ठः कौशिको नाम नामतः । द्वितीयो गार्ग्य इत्येव जंबूमार्गे सतापनः
ujjayinyāṁ gurujyeṣṭhaḥ kauśiko nāma nāmataḥ | dvitīyo gārgya ityeva jaṁbūmārge satāpanaḥ
उज्जयिनी में ज्येष्ठ गुरु 'कौशिक' नाम से; दूसरे 'गार्ग्य' नाम से जम्बूमार्ग में तपस्वी;
श्लोक 133 (skanda.8.167.133)
तृतीयश्चाभवन्मित्रो मथुरायां महामनाः । ब्रह्मचारी चतुर्थस्तु कुरुष्वेव सुगोत्रजः
tṛtīyaścābhavanmitro mathurāyāṁ mahāmanāḥ | brahmacārī caturthastu kuruṣveva sugotrajaḥ
तीसरे मथुरा में 'मित्र' नाम से महामना हुए; चौथे कुरुओं में सुगोत्रज ब्रह्मचारी हुए।
श्लोक 134 (skanda.8.167.134)
भगवानपि देवेशो ह्यमरेश्वरसंयुतः । अत्रिवंशप्रसूतस्य नाम्ना वै सोमशर्मणः
bhagavānapi deveśo hyamareśvarasaṁyutaḥ | atrivaṁśaprasūtasya nāmnā vai somaśarmaṇaḥ
देवेश्वर भगवान् भी, अमरेश्वरों सहित, अत्रिवंश में उत्पन्न सोमशर्मा नामक सिताङ्ग रूप धारण करके,
श्लोक 135 (skanda.8.167.135)
रूपं कृत्वा सिताङ्गं तु जगामात्रेर्गृहं शुभम् । स तं ब्रह्मविदं विप्रमात्रेयं सकुलं विभुः
rūpaṁ kṛtvā sitāṅgaṁ tu jagāmātrergṛhaṁ śubham | sa taṁ brahmavidaṁ vipramātreyaṁ sakulaṁ vibhuḥ
अत्रि के शुभ गृह में गये; वह विभु उस ब्रह्मवेत्ता विप्र आत्रेय के सकुल -
श्लोक 136 (skanda.8.167.136)
योगसिद्धिप्रदानेन अनुजग्राह शङ्करः । अनुगृह्य तदा व्यास सकुलं द्विजसत्तमम्
yogasiddhipradānena anujagrāha śaṅkaraḥ | anugṛhya tadā vyāsa sakulaṁ dvijasattamam
योगसिद्धि प्रदान कर शंकर ने अनुग्रह किया। इस प्रकार, हे व्यास! उस श्रेष्ठ द्विज को सकुल अनुगृहीत करके,
श्लोक 137 (skanda.8.167.137)
जगामोज्जयिनीं देवः श्मशानं च विवेश ह । स तत्र भस्मनात्मानमवगुण्ठ्य वृषध्वजः
jagāmojjayinīṁ devaḥ śmaśānaṁ ca viveśa ha | sa tatra bhasmanātmānamavaguṇṭhya vṛṣadhvajaḥ
वह देव उज्जयिनी गये और श्मशान में प्रवेश किया; वहाँ वृषभध्वज ने भस्म से अपने शरीर का अवगुण्ठन कर,
श्लोक 138 (skanda.8.167.138)
उल्मुकं वामहस्तेन गृहीत्वा समुपाविशत् । तत्र प्रथममादाय शिष्यं कौशिकमीश्वरः
ulmukaṁ vāmahastena gṛhītvā samupāviśat | tatra prathamamādāya śiṣyaṁ kauśikamīśvaraḥ
बायें हाथ में उल्मुक (जलती हुई लकड़ी) लेकर बैठ गये। वहाँ पहले ईश्वर ने कौशिक को शिष्य के रूप में लिया,
श्लोक 139 (skanda.8.167.139)
जम्बूमार्गे द्वितीयं च मथुरायां ततोपरम् । कान्यकुब्जे ततश्चान्यमनुगृह्य जगत्पतिः
jambūmārge dvitīyaṁ ca mathurāyāṁ tatoparam | kānyakubje tataścānyamanugṛhya jagatpatiḥ
दूसरे को जम्बूमार्ग में, फिर मथुरा में; तत्पश्चात् कान्यकुब्ज में एक अन्य को अनुगृहीत करके जगत्पति ने,
श्लोक 140 (skanda.8.167.140)
स्वसिद्धान्तं ददौ योगमुवाचेदं च लाकुली । रहस्यं परमं हीदं पञ्चार्थं इति संज्ञितम्
svasiddhāntaṁ dadau yogamuvācedaṁ ca lākulī | rahasyaṁ paramaṁ hīdaṁ pañcārthaṁ iti saṁjñitam
उसे अपना सिद्धान्त और योग प्रदान किया, और लाकुली ने यह कहा - 'यह परम रहस्य, जो पंचार्थ नाम से जाना जाता है,
श्लोक 141 (skanda.8.167.141)
विप्रान्मोचयितुं दत्तो युष्मभ्यं मर्त्त्यबन्धनात् । अनया दीक्षया विप्रान् प्रापयध्वं परं पदम्
viprānmocayituṁ datto yuṣmabhyaṁ marttyabandhanāt | anayā dīkṣayā viprān prāpayadhvaṁ paraṁ padam
तुम्हें द्विजों को मर्त्य-बन्धन से मुक्त करने के लिये दिया गया है; इस दीक्षा से विप्रों को परम पद तक पहुँचाओ।
श्लोक 142 (skanda.8.167.142)
नदीतीरेषु मेध्येषु पुण्येष्वायतनेषु च । शून्यागारेष्वरण्येषु वासो वः सङ्गवर्जितः
nadītīreṣu medhyeṣu puṇyeṣvāyataneṣu ca | śūnyāgāreṣvaraṇyeṣu vāso vaḥ saṅgavarjitaḥ
नदी-तटों पर, पवित्र स्थानों में, पुण्य आयतनों में,
श्लोक 143 (skanda.8.167.143)
वचो भगवतः श्रुत्वा शिष्याः पशुपतेः स्वयम् । यथाज्ञप्तमकुर्वन्त सर्वे ते भवतेजसः
vaco bhagavataḥ śrutvā śiṣyāḥ paśupateḥ svayam | yathājñaptamakurvanta sarve te bhavatejasaḥ
शून्य गृहों में, वनों में - संगरहित होकर तुम्हारा निवास हो।' भगवान् का यह वचन सुनकर, स्वयं पशुपति के वे शिष्य,
श्लोक 144 (skanda.8.167.144)
धर्मपादाङ्किते देशे अवतीर्णो यतो भवः । स देशः परमस्तस्मान्महापुण्यतमः स्मृतः
dharmapādāṅkite deśe avatīrṇo yato bhavaḥ | sa deśaḥ paramastasmānmahāpuṇyatamaḥ smṛtaḥ
सभी भव के तेज से युक्त होकर आज्ञानुसार आचरण करने लगे। जिस देश में धर्म के चरणचिह्न अंकित हैं, जहाँ से भव अवतीर्ण हुए,
श्लोक 145 (skanda.8.167.145)
आश्रमो योगिनां यत्र प्रवृत्तः पापनाशनः । अष्टायतनमित्येवं स्थानमत्र महात्मनः
āśramo yogināṁ yatra pravṛttaḥ pāpanāśanaḥ | aṣṭāyatanamityevaṁ sthānamatra mahātmanaḥ
वह प्रदेश परम है, महापुण्यतम माना गया। वहाँ योगियों का पापनाशक आश्रम है, जो 'अष्टायतन' नाम से महात्मा का स्थान कहलाता है -
श्लोक 146 (skanda.8.167.146)
यद् दृष्टवा मनुजा व्यास प्राप्नुवन्ति परं पदम् । कारोहणं शिवस्थानं येभिगच्छन्ति मानवाः
yad dṛṣṭavā manujā vyāsa prāpnuvanti paraṁ padam | kārohaṇaṁ śivasthānaṁ yebhigacchanti mānavāḥ
उसे देखकर, हे व्यास! मनुष्य परम पद को प्राप्त करते हैं। कारोहण, शिव का स्थान, जिसे मनुष्य पाकर -
श्लोक 147 (skanda.8.167.147)
गर्भशय्याभयं तेषां न भवेन्मुनिसत्तम । महीनर्मदयोर्मध्यं सह्यस्य च यदन्तरम्
garbhaśayyābhayaṁ teṣāṁ na bhavenmunisattama | mahīnarmadayormadhyaṁ sahyasya ca yadantaram
उन्हें गर्भशय्या का भय नहीं होता, हे मुनिश्रेष्ठ! महीनदी और नर्मदा के मध्य का, तथा सह्याद्रि से सटा हुआ प्रदेश,
श्लोक 148 (skanda.8.167.148)
एतत्पशुपतेः क्षेत्रं पुराणमृषिभिः स्तुतम् । तदागत्य नरो व्यास यद्यपि स्यात् सुपापकृत् । सर्वपापविनिर्मुक्तो यथेष्टां प्राप्नुयाद् गतिम्
etatpaśupateḥ kṣetraṁ purāṇamṛṣibhiḥ stutam | tadāgatya naro vyāsa yadyapi syāt supāpakṛt | sarvapāpavinirmukto yatheṣṭāṁ prāpnuyād gatim
यह पशुपति का क्षेत्र है, प्राचीन काल में ऋषियों द्वारा स्तुत; वहाँ आकर मनुष्य, हे व्यास! चाहे वह महापापी ही क्यों न हो,
श्लोक 149 (skanda.8.167.149)
कारोहणं स्थानमतीव पुण्यं शैवानि यत्रायतनानि धीमन् । गत्वा नरास्तानि महाफलानि संसारगेहं न पुनर्विशन्ति
kārohaṇaṁ sthānamatīva puṇyaṁ śaivāni yatrāyatanāni dhīman | gatvā narāstāni mahāphalāni saṁsāragehaṁ na punarviśanti
सर्वपापविनिर्मुक्त होकर यथेच्छ गति को प्राप्त करता है। 'कारोहण, वह अत्यन्त पुण्य स्थान जहाँ शैव आयतन हैं, हे बुद्धिमन्! उन महाफलदायी स्थानों में जाकर मनुष्य पुनः संसार-गृह में प्रवेश नहीं करते।'
श्लोक 150 (skanda.8.167.150)
पुण्यमायतनं चान्यत् सप्तलोकाभिवन्दितम् । वाराणस्या मुनिश्रेष्ठ यत्र सन्निहितो हरः
puṇyamāyatanaṁ cānyat saptalokābhivanditam | vārāṇasyā muniśreṣṭha yatra sannihito haraḥ
एक अन्य पुण्य आयतन, सातों लोकों से वन्दित, हे मुनिश्रेष्ठ! वाराणसी में है, जहाँ हर सदा सन्निहित रहते हैं।
श्लोक 151 (skanda.8.167.151)
तत्र भागीरथी पुण्या उत्तरां भजते दिशम् । सिद्धिक्षेत्रं बृहत्क्षेत्रं लोकेषु त्रिषु विश्रुतम्
tatra bhāgīrathī puṇyā uttarāṁ bhajate diśam | siddhikṣetraṁ bṛhatkṣetraṁ lokeṣu triṣu viśrutam
वहाँ पुण्य भागीरथी उत्तर दिशा की ओर मुड़ जाती है; वह सिद्धिक्षेत्र, वह बृहत्क्षेत्र, त्रिलोक में विख्यात है।
श्लोक 152 (skanda.8.167.152)
अविमुक्तं स्मृतं नाम्ना न विमुक्तं हरेण तु । अविमुक्तेश्वरं दृष्ट्वा देवं तत्र ह्युमापतिम्
avimuktaṁ smṛtaṁ nāmnā na vimuktaṁ hareṇa tu | avimukteśvaraṁ dṛṣṭvā devaṁ tatra hyumāpatim
वह हर द्वारा 'अविमुक्त' नाम से स्मरण किया जाता है, अर्थात् कभी न त्यागा गया। वहाँ अविमुक्तेश्वर देव उमापति को देखकर,
श्लोक 153 (skanda.8.167.153)
गाणपत्या गतिः प्रोक्ता मृत्युकाले महामुने । यत्रास्ते गणपो द्वारि विद्युत्केशो महाबलः
gāṇapatyā gatiḥ proktā mṛtyukāle mahāmune | yatrāste gaṇapo dvāri vidyutkeśo mahābalaḥ
मृत्युकाल में गणपद की उत्तम गति कही गयी है, हे महामुने! जहाँ महाबली विद्युत्केश नामक गणपति द्वार पर विराजते हैं,
श्लोक 154 (skanda.8.167.154)
दण्डपाणिर्महातेजाः समादेशात् स्वयंभुवः । तमदृष्टवा न पश्यन्ति देवदेवेश्वरं हरम्
daṇḍapāṇirmahātejāḥ samādeśāt svayaṁbhuvaḥ | tamadṛṣṭavā na paśyanti devadeveśvaraṁ haram
दण्डपाणि, महातेजस्वी, स्वयंभू की आज्ञा से - उनका दर्शन किये बिना देवदेवेश्वर हर का दर्शन नहीं होता।
श्लोक 155 (skanda.8.167.155)
योगिनोपि महात्मानः पुण्यं तस्यापि दर्शनम् । दण्डपाणिं शुचिर्दृष्ट्वा हरदत्तवरं गणम्
yoginopi mahātmānaḥ puṇyaṁ tasyāpi darśanam | daṇḍapāṇiṁ śucirdṛṣṭvā haradattavaraṁ gaṇam
महात्मा योगीजन भी उनका दर्शन पुण्यकर मानते हैं। शुचि पुरुष, हरदत्तवर उस गण दण्डपाणि का दर्शन करके,
श्लोक 156 (skanda.8.167.156)
इह लोके सुखं प्राप्य यान्ति तस्य सलोकताम् । यत्र सिद्धा महात्मानो योगैश्वर्यबलान्विताः
iha loke sukhaṁ prāpya yānti tasya salokatām | yatra siddhā mahātmāno yogaiśvaryabalānvitāḥ
इस लोक में सुख प्राप्त कर उसके सालोक्य को जाते हैं। जहाँ योगैश्वर्यबलयुक्त महात्मा सिद्धगण,
श्लोक 157 (skanda.8.167.157)
छन्नाः प्रदक्षिणं कृत्वा प्रणमन्ति स्वयंभुवम् । शक्रः पितामहो विष्णुर्धनेशो वरुणो यमः
channāḥ pradakṣiṇaṁ kṛtvā praṇamanti svayaṁbhuvam | śakraḥ pitāmaho viṣṇurdhaneśo varuṇo yamaḥ
अदृश्य होकर प्रदक्षिणा करके स्वयंभू को नमस्कार करते हैं - इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु, कुबेर, वरुण, यम,
श्लोक 158 (skanda.8.167.158)
हुतभुक् पवनः सोमः स्वयं चैव दिवाकरः । तथा सप्तर्षयः सिद्धा गन्धर्वाः पन्नगास्तथा
hutabhuk pavanaḥ somaḥ svayaṁ caiva divākaraḥ | tathā saptarṣayaḥ siddhā gandharvāḥ pannagāstathā
अग्नि, पवन, सोम, और स्वयं सूर्य, तथा सप्तर्षि, सिद्ध, गन्धर्व और नाग भी,
श्लोक 159 (skanda.8.167.159)
अविमुक्तेश्वरं देवमर्चयन्ति यतव्रताः । ततः पुण्यतमं नास्ति सिद्धिक्षेत्रमिति श्रुतिः
avimukteśvaraṁ devamarcayanti yatavratāḥ | tataḥ puṇyatamaṁ nāsti siddhikṣetramiti śrutiḥ
संयमित व्रतवाले होकर अविमुक्तेश्वर देव की अर्चना करते हैं। श्रुति कहती है कि इससे अधिक पुण्यमय कोई सिद्धिक्षेत्र नहीं है,
श्लोक 160 (skanda.8.167.160)
यत्र जन्तोर्विपन्नस्य मुक्तिः संसारबन्धनात् । प्रसादाज्जायते शम्भोर्गुह्यमेतत परं स्मृतम्
yatra jantorvipannasya muktiḥ saṁsārabandhanāt | prasādājjāyate śambhorguhyametata paraṁ smṛtam
जहाँ मरणासन्न प्राणी को शम्भु की कृपा से संसार-बन्धन से मुक्ति मिलती है - यह परम गुह्य रहस्य माना गया है।
श्लोक 161 (skanda.8.167.161)
गङ्गा दक्षिणतस्तस्मिन्नुत्तरेण वराणसी । तत्तयोर्मध्यतः क्षेत्रमविमुक्तं पिनाकिनः
gaṅgā dakṣiṇatastasminnuttareṇa varāṇasī | tattayormadhyataḥ kṣetramavimuktaṁ pinākinaḥ
उसके दक्षिण में गंगा, उत्तर में वाराणसी है - इन दोनों के मध्य शूलधारी का क्षेत्र अविमुक्त है।
श्लोक 162 (skanda.8.167.162)
लिङ्गे यत् स्थापिते शम्भोः प्राप्यते फलमन्यतः । तत् सहस्रगुणं प्रोक्तमविमुक्ते निवेशिते
liṅge yat sthāpite śambhoḥ prāpyate phalamanyataḥ | tat sahasraguṇaṁ proktamavimukte niveśite
शम्भु का लिंग अन्यत्र स्थापित करने से जो फल मिलता है - अविमुक्त में स्थापित करने पर वह सहस्रगुणा कहा गया है।
श्लोक 163 (skanda.8.167.163)
स्थापयेद्विधिना योषा पुमान्वा विधिपूर्वकम् । सहस्रं स्थापितं तेन लिङ्गानां भवति प्रभोः
sthāpayedvidhinā yoṣā pumānvā vidhipūrvakam | sahasraṁ sthāpitaṁ tena liṅgānāṁ bhavati prabhoḥ
चाहे स्त्री हो या पुरुष, विधिपूर्वक स्थापित करे तो - उससे सहस्र लिंगों के प्रभु की स्थापना हुई मानी जाती है;
श्लोक 164 (skanda.8.167.164)
त्र्यक्षः स गणपो भूत्वा रुद्रसायुज्यतां व्रजेत् । अतः कृत्वा मुनिश्रेष्ठ ब्रह्मादित्यपुरस्सरैः । लिङ्गानि स्थापितानि स्म सर्वैस्तत्र सुरोत्तमैः
tryakṣaḥ sa gaṇapo bhūtvā rudrasāyujyatāṁ vrajet | ataḥ kṛtvā muniśreṣṭha brahmādityapurassaraiḥ | liṅgāni sthāpitāni sma sarvaistatra surottamaiḥ
वह त्र्यक्ष गणप बनकर रुद्रसायुज्य को प्राप्त होता है। अतः, हे मुनिश्रेष्ठ! ब्रह्मा-आदित्य आदि श्रेष्ठ देवताओं द्वारा,
श्लोक 165 (skanda.8.167.165)
तस्मिन् भगवतः क्षेत्रे काशिपुर्यामनेकशः । दृश्यन्तेद्यापि लिङ्गानि स्थापितानि महात्मभिः
tasmin bhagavataḥ kṣetre kāśipuryāmanekaśaḥ | dṛśyantedyāpi liṅgāni sthāpitāni mahātmabhiḥ
वहाँ उन समस्त श्रेष्ठ देवताओं द्वारा लिंग स्थापित किये गये। भगवान् के उस क्षेत्र में, काशीपुरी में, अनेक स्थानों पर,
श्लोक 166 (skanda.8.167.166)
स्मरणादविमुक्तस्य पृथिव्यन्तेपि संस्थितः । कल्मषैर्मुच्यते जन्तुर्मृतश्च लभते सुखम्
smaraṇādavimuktasya pṛthivyantepi saṁsthitaḥ | kalmaṣairmucyate janturmṛtaśca labhate sukham
महात्माओं द्वारा स्थापित लिंग आज भी दिखायी देते हैं। अविमुक्त के स्मरण मात्र से, पृथ्वी के अन्त में भी स्थित रहकर,
श्लोक 167 (skanda.8.167.167)
ब्राह्मणास्तत्र मुञ्चन्ति वेदतत्त्वार्थवेदिनः । सिद्धाः पाशुपता ये च भवबन्धमुमुक्षवः
brāhmaṇāstatra muñcanti vedatattvārthavedinaḥ | siddhāḥ pāśupatā ye ca bhavabandhamumukṣavaḥ
प्राणी कल्मषों से मुक्त हो जाता है, और मृत्यु होने पर भी सुख पाता है। वहाँ के ब्राह्मण, वेदतत्त्वार्थ के ज्ञाता,
श्लोक 168 (skanda.8.167.168)
प्राप्य वाराणसीं पुण्यां सिद्धिक्षेत्रमनुत्तमम् । पुनर्निष्क्रान्तुमन्यत्र कस्य जन्तोर्मतिर्भवेत्
prāpya vārāṇasīṁ puṇyāṁ siddhikṣetramanuttamam | punarniṣkrāntumanyatra kasya jantormatirbhavet
सिद्ध, तथा भवबन्धन से मुक्ति चाहनेवाले पाशुपत, पुण्य वाराणसी, उस अनुपम सिद्धिक्षेत्र को पाकर,
श्लोक 169 (skanda.8.167.169)
वेदेषु गीयते व्यास तत् क्षेत्रं शशिमौलिनः । देहिनस्त्यजतः प्राणान् मोक्षसिद्धिगतिप्रदम् । त
vedeṣu gīyate vyāsa tat kṣetraṁ śaśimaulinaḥ | dehinastyajataḥ prāṇān mokṣasiddhigatipradam | ta
पापादि छोड़ते हैं; पुनः अन्यत्र जाने की इच्छा किस प्राणी को होगी? वह शशिमौलि का क्षेत्र वेदों में गाया गया है, हे व्यास!
श्लोक 170 (skanda.8.167.170)
येविमुक्ते वसन्ति स्म नरा रुद्रपरायणाः । रुद्रस्य भवने व्यास ते वसन्ति न संशयः
yevimukte vasanti sma narā rudraparāyaṇāḥ | rudrasya bhavane vyāsa te vasanti na saṁśayaḥ
यह देहधारी को प्राणत्याग के समय सिद्धि और मोक्षगति प्रदान करता है। जो मनुष्य रुद्रपरायण होकर अविमुक्त में निवास करते हैं,
श्लोक 171 (skanda.8.167.171)
तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् भुञ्जन् कर्म कुर्वन् हसन्नपि । योविमुक्तं स्मरेद्देही तस्य जन्मभयं कुतः
tiṣṭhan gacchan svapan bhuñjan karma kurvan hasannapi | yovimuktaṁ smareddehī tasya janmabhayaṁ kutaḥ
वे निःसन्देह, हे व्यास! रुद्र के भवन में निवास करते हैं। खड़े रहते, चलते, सोते, भोजन करते, कर्म करते, हँसते हुए भी,
श्लोक 172 (skanda.8.167.172)
नाविमुक्तात् परं क्षेत्रं नाविमुक्तात्परं पदम । नाविमुक्तात्परं पुण्यं नाविमुक्तात्परा गतिः
nāvimuktāt paraṁ kṣetraṁ nāvimuktātparaṁ padama | nāvimuktātparaṁ puṇyaṁ nāvimuktātparā gatiḥ
जो देहधारी अविमुक्त का स्मरण करता है, उसे जन्म का भय कहाँ से होगा? अविमुक्त से बढ़कर कोई क्षेत्र नहीं, कोई पद नहीं,
श्लोक 173 (skanda.8.167.173)
या गतिर्ध्यायतो नित्यं परे ब्रह्मणि लीयत । सैव संत्यजतः प्राणानविमुक्ते स्मृता गतिः
yā gatirdhyāyato nityaṁ pare brahmaṇi līyata | saiva saṁtyajataḥ prāṇānavimukte smṛtā gatiḥ
कोई पुण्य अविमुक्त से बढ़कर नहीं, कोई गति अविमुक्त से बढ़कर नहीं। जो गति नित्य ध्यान करते हुए परब्रह्म में लीन होने से मिलती है -
श्लोक 174 (skanda.8.167.174)
पुण्यमुमापतेः सुरवृषैर्जुष्टं सदा सिद्धये बह्माद्यैरविमुक्तमेतदिति यत् संसेवितं शान्तये । ये सेवन्ति तदीशभक्तिपरमा मर्त्याः शमप्राप्तये मुक्तास्ते भवसंभवप्रतिभयाद् गच्छन्ति मोक्षं परम्
puṇyamumāpateḥ suravṛṣairjuṣṭaṁ sadā siddhaye bahmādyairavimuktametaditi yat saṁsevitaṁ śāntaye | ye sevanti tadīśabhaktiparamā martyāḥ śamaprāptaye muktāste bhavasaṁbhavapratibhayād gacchanti mokṣaṁ param
वही गति अविमुक्त में प्राणत्याग करनेवाले की मानी गयी है। 'उमापति का यह पुण्य क्षेत्र, सिद्धि के लिये देवों और श्रेष्ठों से सदा सेवित, यह अविमुक्त, शान्ति के लिये ब्रह्मादि द्वारा सेवित - जो मर्त्य ईश-भक्तिपरायण होकर शान्ति-प्राप्ति के लिये इसकी सेवा करते हैं, वे संसार-भय से मुक्त होकर परम मोक्ष को प्राप्त होते हैं।'
श्लोक 175 (skanda.8.167.175)
प्रयागे च तपःक्षेत्रे देवस्यायतनं महत् । तद् दृष्ट्वा मनुजः सम्यगिष्टां गतिमवाप्नुयात्
prayāge ca tapaḥkṣetre devasyāyatanaṁ mahat | tad dṛṣṭvā manujaḥ samyagiṣṭāṁ gatimavāpnuyāt
प्रयाग में, तपःक्षेत्र में, देव का एक महान् आयतन है। उसे देखकर मनुष्य सम्यक् अभीष्ट गति को प्राप्त करता है।
श्लोक 176 (skanda.8.167.176)
नैमिशे देवदेवस्य रुद्रस्यायतनं महत् । दृष्ट्वा पापविनिर्मुक्तः स्वर्गलोकमवाप्नुयात्
naimiśe devadevasya rudrasyāyatanaṁ mahat | dṛṣṭvā pāpavinirmuktaḥ svargalokamavāpnuyāt
नैमिष में देवदेव रुद्र का एक महान् आयतन है। उसे देखकर, पापमुक्त होकर, मनुष्य स्वर्गलोक को प्राप्त करता है।
श्लोक 177 (skanda.8.167.177)
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे स्थानं योगेश्वरं महत् । तेन दृष्टेन विप्रेन्द्र गाणपत्यमवाप्नुयात्
dharmakṣetre kurukṣetre sthānaṁ yogeśvaraṁ mahat | tena dṛṣṭena viprendra gāṇapatyamavāpnuyāt
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में योगेश्वर का एक महान् स्थान है; उसे देखने से, हे विप्रेन्द्र! गणपद की प्राप्ति होती है,
श्लोक 178 (skanda.8.167.178)
रुद्रलोकं मृतश्चासौ प्राप्नुयात् सर्वकामिकम् । गयायामन्यदीशस्य स्थानं भगवतः शुभम्
rudralokaṁ mṛtaścāsau prāpnuyāt sarvakāmikam | gayāyāmanyadīśasya sthānaṁ bhagavataḥ śubham
और वहाँ मृत्यु होने पर मनुष्य सर्वकामद रुद्रलोक को प्राप्त करता है। गया में भगवान् का एक और शुभ स्थान है,
श्लोक 179 (skanda.8.167.179)
गध्रकूटेश्वरं नाम्ना सर्वपापविमोचनम । न तं दृष्ट्वा विमुह्यन्ति मृत्युकाले नरोत्तमाः
gadhrakūṭeśvaraṁ nāmnā sarvapāpavimocanama | na taṁ dṛṣṭvā vimuhyanti mṛtyukāle narottamāḥ
'गृध्रकूटेश्वर' नाम से, सर्वपापविमोचक; उसे देखकर श्रेष्ठ पुरुष मृत्युकाल में मोहग्रस्त नहीं होते।
श्लोक 180 (skanda.8.167.180)
तत्र भस्म समालभ्य सर्वपापैः प्रमुच्यते । द्वादशाब्दवतस्यापि द्विजः फलमवाप्नुयात्
tatra bhasma samālabhya sarvapāpaiḥ pramucyate | dvādaśābdavatasyāpi dvijaḥ phalamavāpnuyāt
वहाँ भस्म लगाकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है; द्विज बारह वर्षों के व्रत का भी फल प्राप्त करता है।
श्लोक 181 (skanda.8.167.181)
अन्यदायतनं पुण्यं मगधामु पिनाकिनः । नगरे पाटलीपुत्रे नाम्ना प्रहसितेश्वरम्
anyadāyatanaṁ puṇyaṁ magadhāmu pinākinaḥ | nagare pāṭalīputre nāmnā prahasiteśvaram
मगध में, पाटलिपुत्र नगर में, शूलधारी का एक और पुण्य आयतन है, जो 'प्रहसितेश्वर' नाम से है।
श्लोक 182 (skanda.8.167.182)
वाजिमेधमवाप्नोति अभिगम्य तमीश्वरम् । मगधासु स्मृतान्यष्टौ स्थानानि शशिमौलिनः
vājimedhamavāpnoti abhigamya tamīśvaram | magadhāsu smṛtānyaṣṭau sthānāni śaśimaulinaḥ
उस ईश्वर के पास जाकर मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है। मगध में शशिमौलि के आठ स्थान स्मरण किये गये हैं,
श्लोक 183 (skanda.8.167.183)
शिष्यैः परिवृतो यानि बभ्राम नकुलीश्वरः । यानि दृष्टवा भवेत्सद्यः पुमान् पापविवर्जितः
śiṣyaiḥ parivṛto yāni babhrāma nakulīśvaraḥ | yāni dṛṣṭavā bhavetsadyaḥ pumān pāpavivarjitaḥ
जहाँ नकुलीश्वर शिष्यों से घिरे हुए विचरण करते थे; उन्हें देखकर मनुष्य तत्काल पापरहित हो जाता है।
श्लोक 184 (skanda.8.167.184)
यवनेषु स्मृतं स्थानं पुण्यमन्यदुमापतेः । त्रिपिष्टपमवाप्नोति तन्दृष्ट्वा मानवः प्रभुम्
yavaneṣu smṛtaṁ sthānaṁ puṇyamanyadumāpateḥ | tripiṣṭapamavāpnoti tandṛṣṭvā mānavaḥ prabhum
यवनों में उमापति का एक और पुण्य स्थान स्मरण किया गया है; उस प्रभु को देखकर मनुष्य त्रिपिष्टप (स्वर्ग) को प्राप्त करता है।
श्लोक 185 (skanda.8.167.185)
अङ्गदेशे परं पुण्यं स्थानं प्रोक्तं पिनाकिनः । हेमचूडेश्वरं नाम्ना तं दृष्ट्वा न विमुह्यति
aṅgadeśe paraṁ puṇyaṁ sthānaṁ proktaṁ pinākinaḥ | hemacūḍeśvaraṁ nāmnā taṁ dṛṣṭvā na vimuhyati
अंगदेश में शूलधारी का परम पुण्य स्थान कहा गया है, 'हेमचूडेश्वर' नाम से; उसे देखकर मनुष्य मोहग्रस्त नहीं होता।
श्लोक 186 (skanda.8.167.186)
भागीरथ्यास्ततो व्यास सागरस्य च संगमे । ब्रह्मणा स्थापितं लिङ्गं पुण्यं तत्र पिनाकिनः
bhāgīrathyāstato vyāsa sāgarasya ca saṁgame | brahmaṇā sthāpitaṁ liṅgaṁ puṇyaṁ tatra pinākinaḥ
फिर, हे व्यास! भागीरथी और सागर के संगम पर, ब्रह्मा द्वारा शूलधारी का एक पुण्य लिंग स्थापित किया गया।
श्लोक 187 (skanda.8.167.187)
तस्याभिगमनादेव सर्वपापैः प्रमुच्यते । दशानामश्वमेधानां तं दृष्ट्वा प्राप्नुते फलम्
tasyābhigamanādeva sarvapāpaiḥ pramucyate | daśānāmaśvamedhānāṁ taṁ dṛṣṭvā prāpnute phalam
उसके पास जाने मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है; उसे देखकर दस अश्वमेधों का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 188 (skanda.8.167.188)
प्रभासे शूलिनं दृष्ट्वा देहभेदे गणो भवेत् । पुष्करे शङ्करं दृष्ट्वा न शोचेन्मृत्युजन्मनी
prabhāse śūlinaṁ dṛṣṭvā dehabhede gaṇo bhavet | puṣkare śaṅkaraṁ dṛṣṭvā na śocenmṛtyujanmanī
प्रभास में शूलधारी को देखकर मनुष्य देहत्याग पर गण बन जाता है; पुष्कर में शंकर को देखकर मनुष्य मृत्यु-जन्म का शोक नहीं करता।
श्लोक 189 (skanda.8.167.189)
महेन्द्रे च नगश्रेष्ठे रुद्रस्यायतनं शुभम् । अभिगम्य नरो विद्वानश्वमेधफलं लभेत्
mahendre ca nagaśreṣṭhe rudrasyāyatanaṁ śubham | abhigamya naro vidvānaśvamedhaphalaṁ labhet
महेन्द्र नामक श्रेष्ठ पर्वत पर रुद्र का शुभ आयतन है; उसके पास जाकर विद्वान् पुरुष अश्वमेध का फल पाता है।
श्लोक 190 (skanda.8.167.190)
महाकालेश्वरं देवमुज्जयिन्यां महाव्रतः । अभिगम्याप्नुयाद्विद्वान् गणत्वं त्रिपुरद्विषः
mahākāleśvaraṁ devamujjayinyāṁ mahāvrataḥ | abhigamyāpnuyādvidvān gaṇatvaṁ tripuradviṣaḥ
उज्जयिनी में महाव्रती पुरुष महाकालेश्वर देव के पास जाकर त्रिपुरद्विषी के गणत्व को प्राप्त करता है।
श्लोक 191 (skanda.8.167.191)
द्रिमिचण्डेश्वरं देवं दृष्ट्वा त्रायति मानवः । कुलान्युभयतः सप्त सर्वयज्ञानि चाप्नुते
drimicaṇḍeśvaraṁ devaṁ dṛṣṭvā trāyati mānavaḥ | kulānyubhayataḥ sapta sarvayajñāni cāpnute
द्रिमिचण्डेश्वर देव को देखकर मनुष्य दोनों ओर की सात-सात पीढ़ियों का उद्धार करता है, और सभी यज्ञों के फल पाता है।
श्लोक 192 (skanda.8.167.192)
शंकुकर्णेश्वरं दृष्ट्वा न शोचेन्मरणं नरः । तथा हिमगिरेः शृङ्गे सिद्धकिन्नरसेविते
śaṁkukarṇeśvaraṁ dṛṣṭvā na śocenmaraṇaṁ naraḥ | tathā himagireḥ śṛṅge siddhakinnarasevite
शंकुकर्णेश्वर को देखकर मनुष्य मृत्यु का शोक नहीं करता; उसी प्रकार हिमगिरि के, सिद्ध-किन्नरसेवित शिखर पर,
श्लोक 193 (skanda.8.167.193)
डिङ्गेश्वरमिति ख्यातं रुद्रस्यायतनं महत् । अभिगम्य च दृष्टवा च तं देवं जगतः प्रभुम्
ḍiṅgeśvaramiti khyātaṁ rudrasyāyatanaṁ mahat | abhigamya ca dṛṣṭavā ca taṁ devaṁ jagataḥ prabhum
'डिंगेश्वर' नाम से रुद्र का एक महान् आयतन है। उस देव जगत्प्रभु का दर्शन करके,
श्लोक 194 (skanda.8.167.194)
शिवभक्तिपरो व्यास सर्वकामानवाप्नुयात् । मृतस्य च गतिः प्रोक्ता गाणपत्यं महात्मनः
śivabhaktiparo vyāsa sarvakāmānavāpnuyāt | mṛtasya ca gatiḥ proktā gāṇapatyaṁ mahātmanaḥ
शिवभक्तिपरायण हो, हे व्यास! मनुष्य समस्त कामनाएँ प्राप्त करता है; और वहाँ मरनेवाले के लिये महात्मा का गणपद कहा गया है।
श्लोक 195 (skanda.8.167.195)
सुवर्णाक्षे परं स्थानं देवदेवस्य संस्मृतम् । तद् दृष्टवा मनुजो व्यास राजसूयफलं लभेत्
suvarṇākṣe paraṁ sthānaṁ devadevasya saṁsmṛtam | tad dṛṣṭavā manujo vyāsa rājasūyaphalaṁ labhet
सुवर्णाक्ष में देवदेव का एक परम स्थान सुविख्यात है; उसे देखकर, हे व्यास! मनुष्य राजसूय का फल पाता है।
श्लोक 196 (skanda.8.167.196)
सप्तगोदावरे स्थानं दृष्ट्वा पुण्यं कपर्दिनः । अश्वमेधफलं प्राप्य स्वर्गलोके वसेन्नरः
saptagodāvare sthānaṁ dṛṣṭvā puṇyaṁ kapardinaḥ | aśvamedhaphalaṁ prāpya svargaloke vasennaraḥ
सप्तगोदावर में कपर्दी के पुण्य स्थान को देखकर, अश्वमेध का फल पाकर मनुष्य स्वर्गलोक में निवास करता है।
श्लोक 197 (skanda.8.167.197)
स्थानं पुण्यतमं चान्यच्छ्रेष्टं जगति कीर्तितम् । नाम्ना भद्रेश्वरं ख्यातं देवगन्धर्वसेवितम्
sthānaṁ puṇyatamaṁ cānyacchreṣṭaṁ jagati kīrtitam | nāmnā bhadreśvaraṁ khyātaṁ devagandharvasevitam
एक और परम पुण्य, श्रेष्ठ, जगत् में कीर्तित स्थान है, 'भद्रेश्वर' नाम से विख्यात, देवों-गन्धर्वों से सेवित।
श्लोक 198 (skanda.8.167.198)
तं वीक्ष्य मानवो व्यास सर्वयज्ञफलं लभेत् । जन्मप्रभृति यत्किञ्चित् कृतं कर्माशुभं महत्
taṁ vīkṣya mānavo vyāsa sarvayajñaphalaṁ labhet | janmaprabhṛti yatkiñcit kṛtaṁ karmāśubhaṁ mahat
उसे देखकर, हे व्यास! मनुष्य समस्त यज्ञों का फल पाता है; जन्म से लेकर जो भी महान् अशुभ कर्म किया गया हो,
श्लोक 199 (skanda.8.167.199)
तत्क्षणान्नश्यते सर्वं दृष्ट्वा भद्रेश्वरं हरम् । यत्र तत्र मृतश्चापि गाणपत्यं लभेन्नरः
tatkṣaṇānnaśyate sarvaṁ dṛṣṭvā bhadreśvaraṁ haram | yatra tatra mṛtaścāpi gāṇapatyaṁ labhennaraḥ
वह सब भद्रेश्वर हर का दर्शन करते ही तत्क्षण नष्ट हो जाता है; और कहीं भी मृत्यु होने पर मनुष्य गणपद को प्राप्त करता है।
श्लोक 200 (skanda.8.167.200)
धन्यास्ते मानवा व्यास रुद्रभक्ता महौजसः । ये प्रपश्यन्ति भद्रेशं जन्ममृत्युभयापहम्
dhanyāste mānavā vyāsa rudrabhaktā mahaujasaḥ | ye prapaśyanti bhadreśaṁ janmamṛtyubhayāpaham
धन्य हैं वे मनुष्य, हे व्यास! महान् ओजवाले, रुद्रभक्त, जो जन्म-मृत्यु के भय को दूर करनेवाले भद्रेश का दर्शन करते हैं।
श्लोक 201 (skanda.8.167.201)
एकाम्रे च विभोः स्थानं दृष्ट्वा स्वर्गमवाप्नुयात् । विरजायां हरं दृष्ट्वा वाजिमेधमवाप्नुयात्
ekāmre ca vibhoḥ sthānaṁ dṛṣṭvā svargamavāpnuyāt | virajāyāṁ haraṁ dṛṣṭvā vājimedhamavāpnuyāt
एकाम्र में प्रभु के स्थान को देखकर मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त करता है; विरजा में हर को देखकर अश्वमेध का फल पाता है।
श्लोक 202 (skanda.8.167.202)
नेपालेषु च देवेशं दृष्ट्वा पशुपतिं प्रभुम् । दशाश्वमेधानाप्नोति रुद्रलोकं च गच्छति
nepāleṣu ca deveśaṁ dṛṣṭvā paśupatiṁ prabhum | daśāśvamedhānāpnoti rudralokaṁ ca gacchati
नेपाल में देवेश्वर पशुपति प्रभु को देखकर मनुष्य दस अश्वमेधों का फल पाता है और रुद्रलोक को जाता है।
श्लोक 203 (skanda.8.167.203)
देहभेदं च संप्राप्य पशुत्वाद्विप्रमुच्यते । अन्यद्धिमगिरौ स्थानं नैकतुङ्गाधिपेश्वरम्
dehabhedaṁ ca saṁprāpya paśutvādvipramucyate | anyaddhimagirau sthānaṁ naikatuṅgādhipeśvaram
देहत्याग को प्राप्त होकर मनुष्य पशुत्व से मुक्त हो जाता है। हिमगिरि पर एक और स्थान है, 'नैकतुंगाधिपेश्वर' नाम से,
श्लोक 204 (skanda.8.167.204)
दृष्ट्वा तन्न पुनर्मर्त्त्यो जायते मुनिसत्तम । भक्तानां प्रणतानाञ्च सर्वकामप्रदं स्मृतम्
dṛṣṭvā tanna punarmarttyo jāyate munisattama | bhaktānāṁ praṇatānāñca sarvakāmapradaṁ smṛtam
उसे देखकर मनुष्य पुनः मर्त्य जन्म नहीं लेता, हे मुनिश्रेष्ठ! वह भक्तों और प्रणत जनों को सर्वकामप्रद माना गया है।
श्लोक 205 (skanda.8.167.205)
एवमेतानि पुण्यानि रुद्रस्यायतनानि ते । कथितानि मया व्यास यैर्गतिः प्राप्यते शुभा
evametāni puṇyāni rudrasyāyatanāni te | kathitāni mayā vyāsa yairgatiḥ prāpyate śubhā
इस प्रकार रुद्र के ये पुण्य आयतन मैंने तुम्हें बताये, हे व्यास! जिनसे शुभ गति प्राप्त होती है।
श्लोक 206 (skanda.8.167.206)
य एतानि पठेद्विप्रः प्रयतात्मा दिने दिने । तस्य सायुज्यतां देवो ददाति वृषभध्वजः
ya etāni paṭhedvipraḥ prayatātmā dine dine | tasya sāyujyatāṁ devo dadāti vṛṣabhadhvajaḥ
जो विप्र संयतात्मा होकर इन्हें प्रतिदिन पढ़ता है, उसे वृषभध्वज देव अपना सायुज्य प्रदान करते हैं।
श्लोक 207 (skanda.8.167.207)
मङ्गल्यं परमं पुण्यं मेध्यं सर्वभयापहम् । स्थानानां कीर्तनं शम्भोर्नित्यं कुर्याच्छुचिर्नरः
maṅgalyaṁ paramaṁ puṇyaṁ medhyaṁ sarvabhayāpaham | sthānānāṁ kīrtanaṁ śambhornityaṁ kuryācchucirnaraḥ
शुद्ध मनुष्य को शम्भु के स्थानों का कीर्तन सदा करना चाहिये - जो परम मंगलकारी, पवित्र, पुण्य और सर्वभयनाशक है।
श्लोक 208 (skanda.8.167.208)
इति गिरिवरपुत्रीविष्णुगङ्गाधरस्य जगति वसतिरेषा सर्वकामप्रदा ते । मुनिवरसुतशिष्टा पापसंशुद्धिकर्त्री वद किमपरमन्यद् व्यास तुभ्यं वदानि
iti girivaraputrīviṣṇugaṅgādharasya jagati vasatireṣā sarvakāmapradā te | munivarasutaśiṣṭā pāpasaṁśuddhikartrī vada kimaparamanyad vyāsa tubhyaṁ vadāni
'इस प्रकार गिरिराजपुत्री और गंगाधारी के इस लोक-निवास का यह वर्णन, जो तुम्हें सर्वकामप्रद है, मुनिवरपुत्र सनत्कुमार द्वारा उपदिष्ट, पापशुद्धिकारी है - हे व्यास! और क्या कहूँ तुम्हें?'