अम्बिका खण्ड · अध्याय 168
त्रिपुरवधोपक्रम
श्लोक 1 (skanda.8.168.1)
सूत उवाच । श्रुत्वा कथामायतनानुबद्धां चन्द्रार्धबिम्बा स्थितमौलिनस्तु । व्यासो मुनिस्तं वचनं बभाषे ब्रह्मात्मजं ब्रह्मविदं मुनीन्द्रम्
sūta uvāca | śrutvā kathāmāyatanānubaddhāṁ candrārdhabimbā sthitamaulinastu | vyāso munistaṁ vacanaṁ babhāṣe brahmātmajaṁ brahmavidaṁ munīndram
सूत ने कहा - अर्धचन्द्रमौलि के आयतनों से बद्ध इस कथा को सुनकर, व्यास मुनि ने ब्रह्मपुत्र, ब्रह्मवेत्ता, मुनीन्द्र से यह वचन कहा।
श्लोक 2 (skanda.8.168.2)
धर्म्या सुपुण्या भगवन् त्वयैषा गुह्या कथा मे विधिवत् प्रदिष्टा । स्थानानि शम्भोर्दयितानि कोन्य एवं परिज्ञातुमृषिः समर्थः
dharmyā supuṇyā bhagavan tvayaiṣā guhyā kathā me vidhivat pradiṣṭā | sthānāni śambhordayitāni konya evaṁ parijñātumṛṣiḥ samarthaḥ
हे भगवन्! आपने मुझे यह धर्मयुक्त, अत्यन्त पवित्र, गुह्य कथा विधिवत् बतायी है; शम्भु के इन प्रिय स्थानों को इस प्रकार जानने में और कौन ऋषि समर्थ होगा?
श्लोक 3 (skanda.8.168.3)
इच्छामि वेत्तुं त्रिपुरं प्रदग्धमेकेषुणा दिव्यपिनाकधर्त्रा । यथा पुरा भक्तवरप्रदेन तन्मे मुने ब्रूहि यथाप्रवृत्तम्
icchāmi vettuṁ tripuraṁ pradagdhamekeṣuṇā divyapinākadhartrā | yathā purā bhaktavarapradena tanme mune brūhi yathāpravṛttam
मैं जानना चाहता हूँ कि दिव्य पिनाकधारी, भक्तों को श्रेष्ठ वर देनेवाले ने पूर्वकाल में जैसे एक ही बाण से त्रिपुर को भस्म किया था - वह मुझे वैसे ही बताइये, हे मुने!
श्लोक 4 (skanda.8.168.4)
पृष्टस्तथैवं मुनिना मुनीन्द्रः प्रश्नं यथावत् कथयञ्चकार । दग्धं यथा तत् त्रिपुरं तथा त्वं शृणुष्व पुत्रेति वचो ब्रुवाणः
pṛṣṭastathaivaṁ muninā munīndraḥ praśnaṁ yathāvat kathayañcakāra | dagdhaṁ yathā tat tripuraṁ tathā tvaṁ śṛṇuṣva putreti vaco bruvāṇaḥ
मुनि द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, मुनीन्द्र ने प्रश्न को यथावत् कहना आरम्भ किया - 'सुनो पुत्र', यह वचन कहते हुए, 'जैसे वह त्रिपुर भस्म हुआ था।'
श्लोक 5 (skanda.8.168.5)
तस्मिन् हते दैत्यवृषेन्द्रसिंहे पुरा हिरण्याक्षसुते प्रवीरे । भग्नेषु दैत्येषु सदानवेषु मयो बभूवाधृतिदुःखतप्तः
tasmin hate daityavṛṣendrasiṁhe purā hiraṇyākṣasute pravīre | bhagneṣu daityeṣu sadānaveṣu mayo babhūvādhṛtiduḥkhataptaḥ
जब पूर्वकाल में दानववृषभों के सिंह, हिरण्याक्ष के वीर पुत्र का वध हो गया, और दैत्य दानवों सहित छिन्न-भिन्न हो गये, तब मय अधीरता और दुःख से संतप्त हो गया।
श्लोक 6 (skanda.8.168.6)
स विश्वकृद्दानवराजलक्ष्म्या रत्येव हीनो मकरध्वजोभूत् । आदाय दैत्यं स हि तारकाक्षं विद्युत्प्रभं चेन्द्रसमप्रभावम्
sa viśvakṛddānavarājalakṣmyā ratyeva hīno makaradhvajobhūt | ādāya daityaṁ sa hi tārakākṣaṁ vidyutprabhaṁ cendrasamaprabhāvam
वह विश्वकर्ता, दानवराज की लक्ष्मी से हीन होकर, रति से रहित कामदेव के समान हो गया; उसने दैत्य तारकाक्ष को साथ लिया,
श्लोक 7 (skanda.8.168.7)
तपश्चचारोग्रमहीनकर्मा दैत्यौ च तावन्धकतुल्यवीर्यौ । ते शीतकाले हिमपर्वतस्था ग्रीष्मे च पञ्चज्वलनाभितप्ताः
tapaścacārogramahīnakarmā daityau ca tāvandhakatulyavīryau | te śītakāle himaparvatasthā grīṣme ca pañcajvalanābhitaptāḥ
और इन्द्रतुल्य प्रभावाले विद्युत्प्रभ को - वे उग्र, निर्दोष तप करने लगे - और वे दोनों दैत्य अन्धक के समान वीर्यवान् थे - शीतकाल में वे हिमपर्वत पर खड़े रहे, और ग्रीष्म में पंचाग्नि से संतप्त, मेघरहित, जलप्लावित भूभाग पर,
श्लोक 8 (skanda.8.168.8)
व्यभ्रे पयःप्लावितभूमिभागे चेरुस्तपः प्रावृषि च प्रयत्ताः । तेषामगाद्दिव्यसमासहस्स्रं तथा सुतीव्रे तपसि स्थितानाम्
vyabhre payaḥplāvitabhūmibhāge cerustapaḥ prāvṛṣi ca prayattāḥ | teṣāmagāddivyasamāsahassraṁ tathā sutīvre tapasi sthitānām
और वर्षा में भी तत्पर होकर तप करते रहे। उन अत्यन्त तीव्र तप में स्थित दोनों के लिये एक सहस्र दिव्य वर्ष बीत गये।
श्लोक 9 (skanda.8.168.9)
चर्मास्थिशेषा ज्वलनप्रभावास्तपो विशेषाद् दितिपुत्रसिंहाः । आदित्यतेजःप्रतिमानवीरा बभूवुरादित्यवपुःप्रकाशाः
carmāsthiśeṣā jvalanaprabhāvāstapo viśeṣād ditiputrasiṁhāḥ | ādityatejaḥpratimānavīrā babhūvurādityavapuḥprakāśāḥ
तपोविशेष से दीप्तिमान, केवल चर्म और अस्थि शेष रह गये वे दितिपुत्र सिंह, सूर्यतेज के समान वीर, सूर्य के समान प्रकाशमान हो गये।
श्लोक 10 (skanda.8.168.10)
पितामहस्तानभिगम्य सर्वान् प्रियं बहूक्त्वा वचनं बभाषे । तप्तं तपो वो विगतप्रमोहा वरं त्विदानीं वृणुतेति हृष्टाः
pitāmahastānabhigamya sarvān priyaṁ bahūktvā vacanaṁ babhāṣe | taptaṁ tapo vo vigatapramohā varaṁ tvidānīṁ vṛṇuteti hṛṣṭāḥ
पितामह ने उन सबके पास जाकर, बहुत से प्रिय वचन कहकर बोला - 'तुम्हारा तप सफल हुआ, अब मोहरहित होकर वर माँगो' - वे हर्षित हुए।
श्लोक 11 (skanda.8.168.11)
तं प्राञ्जलिर्भूमिनिविष्टजानुर्मयः सुरेशं प्रणतोभ्युवाच । अवध्यतामप्रतिमं बलञ्च ज्ञानं च दिव्यं परमं सुखं च
taṁ prāñjalirbhūminiviṣṭajānurmayaḥ sureśaṁ praṇatobhyuvāca | avadhyatāmapratimaṁ balañca jñānaṁ ca divyaṁ paramaṁ sukhaṁ ca
अंजलि बाँधे, भूमि पर घुटना टेके हुए मय ने प्रणत होकर देवेश्वर से कहा - 'अद्वितीय अवध्यता, बल, दिव्य ज्ञान, और परम सुख,
श्लोक 12 (skanda.8.168.12)
मृत्युर्यथा नो न भवेच्च देव वरं प्रयच्छैनमभीप्सितं नः । करोम्यहं यच्च सुरेश दुर्गं त्रिभिः पुरैर्दिव्यविमानकल्पैः
mṛtyuryathā no na bhavecca deva varaṁ prayacchainamabhīpsitaṁ naḥ | karomyahaṁ yacca sureśa durgaṁ tribhiḥ purairdivyavimānakalpaiḥ
और हे देव! हमारी मृत्यु न हो, यह अभीष्ट वर हमें दीजिये। और हे सुरेश! मैं जो दिव्य विमानों के समान तीन पुरों से दुर्ग बनाऊँगा,
श्लोक 13 (skanda.8.168.13)
तन्मे भवेत् सर्वसुरैरगम्यं स्वच्छन्दसंस्थानगतिप्रचारम् । इत्येवमुक्तो दनुजाधिपेन ब्रह्मा वचस्तं मयमाबभाषे
tanme bhavet sarvasurairagamyaṁ svacchandasaṁsthānagatipracāram | ityevamukto danujādhipena brahmā vacastaṁ mayamābabhāṣe
वह समस्त देवताओं के लिये अगम्य हो, स्वच्छन्दतापूर्वक अपनी इच्छानुसार गति-संचार करनेवाला हो।' दानवाधिप द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, ब्रह्मा ने मय से यह वचन कहा -
श्लोक 14 (skanda.8.168.14)
दातुं न शक्यो वर एष तुभ्यं तस्मात् परं सान्तरमेव चान्यम् । त्वं पुत्र याचस्व ततः प्रदास्ये चिन्ता च ते मा दनुजान्यथाभूत्
dātuṁ na śakyo vara eṣa tubhyaṁ tasmāt paraṁ sāntarameva cānyam | tvaṁ putra yācasva tataḥ pradāsye cintā ca te mā danujānyathābhūt
'यह वर तुम्हें इस रूप में नहीं दिया जा सकता; इसके स्थान पर, कुछ अन्तर के साथ, दूसरा वर माँगो, हे पुत्र! मैं वह दूँगा; तुम दानवों को कोई चिन्ता न रहे।'
श्लोक 15 (skanda.8.168.15)
ततो मयः प्राह वचो विमूढो वरो यथा मार्गित एव नोस्तु । ब्रवीमि यच्चान्यदहं सुरेश तन्मेर्हसि त्वं प्रददातु मद्य
tato mayaḥ prāha vaco vimūḍho varo yathā mārgita eva nostu | bravīmi yaccānyadahaṁ sureśa tanmerhasi tvaṁ pradadātu madya
तब मूढ़ मय ने कहा - 'वर वैसा ही हो जैसा माँगा गया है; परन्तु हे सुरेश! मैं जो और कहता हूँ, वह भी आप मुझे आज दें -
श्लोक 16 (skanda.8.168.16)
पूर्णे सहस्रे त्रिपुरं समानां समेष्यते ह्यर्धनिमेषमात्रम्। तस्मिन्क्षणे यस्त्रिषु संगतेषु पुरेषु दिव्येषु सुरप्रवीर
pūrṇe sahasre tripuraṁ samānāṁ sameṣyate hyardhanimeṣamātram| tasminkṣaṇe yastriṣu saṁgateṣu pureṣu divyeṣu surapravīra
पूर्ण सहस्र वर्ष बीत जाने पर, त्रिपुर आधे निमेष मात्र के लिये एक साथ आ जायेगा; उस क्षण में जब तीनों दिव्य पुर संगत हों, हे सुरश्रेष्ठ!
श्लोक 17 (skanda.8.168.17)
एकेषुणा तत् त्रिपुरं दहेत स नो विनाशी त्रिपुरस्य भूयात् । श्रुत्वा ततस्तद्वचनं मयस्य ब्रह्मा वरं तं हृषितान्तरात्मा । प्रादादभीष्टं दनुजाधिपाय दत्त्वा च तूर्णं स्वपुरे जगाम
ekeṣuṇā tat tripuraṁ daheta sa no vināśī tripurasya bhūyāt | śrutvā tatastadvacanaṁ mayasya brahmā varaṁ taṁ hṛṣitāntarātmā | prādādabhīṣṭaṁ danujādhipāya dattvā ca tūrṇaṁ svapure jagāma
जो एक ही बाण से उस त्रिपुर को भस्म कर दे, वही त्रिपुर का विनाशी हो।' मय के इस वचन को सुनकर, ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर दानवाधिप को वह अभीष्ट वर दिया, और देकर शीघ्र अपने पुर को चले गये।
श्लोक 18 (skanda.8.168.18)
ततो मयस्तत्त्रिपुरं ससर्ज जगद्विधातेव पुरादिकल्पे । अयोमयं तत्प्रथमं चकार ततोपरं राजतमद्रिकल्पम्
tato mayastattripuraṁ sasarja jagadvidhāteva purādikalpe | ayomayaṁ tatprathamaṁ cakāra tatoparaṁ rājatamadrikalpam
तब मय ने, मानो जगत्कर्ता ने सृष्टि के आरम्भ में पुर बनाये हों, वैसे उस त्रिपुर की रचना की; पहले उसने लौह का पुर बनाया, फिर रजतमय पर्वत के समान दूसरा,
श्लोक 19 (skanda.8.168.19)
तृतीयमन्यत्पुरमाशु हैमं ससर्ज मेरोरिव शृङ्गमुच्चम् । सृष्टं ततस्तत्त्रिपुरं मयेन स्वर्गस्य रूपं प्रजहार दिव्यम्
tṛtīyamanyatpuramāśu haimaṁ sasarja meroriva śṛṅgamuccam | sṛṣṭaṁ tatastattripuraṁ mayena svargasya rūpaṁ prajahāra divyam
और तीसरा शीघ्र स्वर्णमय पुर बनाया, मेरु के उन्नत शिखर के समान। इस प्रकार मय द्वारा रचा गया वह त्रिपुर स्वर्ग की दिव्य शोभा को भी हर लेता था,
श्लोक 20 (skanda.8.168.20)
द्वारैर्मनोज्ञैर्वडभीगवाक्षैर्बीथ्यङ्गणैर्हेममयैः सुयुक्तम् । चन्द्रांशुसंसृष्टतलैश्च हर्म्यैः शीतानिलाह्लादसुखप्रवेशैः
dvārairmanojñairvaḍabhīgavākṣairbīthyaṅgaṇairhemamayaiḥ suyuktam | candrāṁśusaṁsṛṣṭatalaiśca harmyaiḥ śītānilāhlādasukhapraveśaiḥ
मनोहर द्वारों, झरोखों और गवाक्षों से, स्वर्णमय गलियों और आँगनों से युक्त, चन्द्रकिरणों से मिश्रित फर्शवाले भवनों से, शीतल पवन के सुखद प्रवेश से युक्त,
श्लोक 21 (skanda.8.168.21)
मुक्ताप्रवालैर्मणिखण्डचित्रै रालम्बितैश्चित्रतडित्प्रकाशैः । ध्वजैर्विचित्रैः पवनावधूतैश्चलत्पताकाभिरतीव रेजे
muktāpravālairmaṇikhaṇḍacitrai rālambitaiścitrataḍitprakāśaiḥ | dhvajairvicitraiḥ pavanāvadhūtaiścalatpatākābhiratīva reje
मुक्ता और प्रवाल की मालाओं से, मणिखण्डों से चित्रित, विद्युत्प्रभ आभावाले लटकते हुए विचित्र ध्वजों से, पवन में हिलती पताकाओं से वह अत्यन्त शोभित हो रहा था।
श्लोक 22 (skanda.8.168.22)
प्रासादपंक्तिस्थितरत्नखण्डै र्महामणीन्दुद्युतिसन्निकाशैः । सतोरणाभ्युच्छ्रितहर्म्यपृष्ठैरलकृतं तत् त्रिपुरं रराज
prāsādapaṁktisthitaratnakhaṇḍai rmahāmaṇīndudyutisannikāśaiḥ | satoraṇābhyucchritaharmyapṛṣṭhairalakṛtaṁ tat tripuraṁ rarāja
प्रासादपंक्तियों में जड़े महामणि-चन्द्रकान्ति सदृश रत्नखण्डों से, तोरणों सहित ऊँचे भवनशिखरों से अलंकृत होकर वह त्रिपुर सुशोभित हुआ।
श्लोक 23 (skanda.8.168.23)
सर्वर्तुपुष्पैः फलितैर्मनोज्ञैर्वृतं समन्तात्तरुभिर्महोच्चैः । रम्यस्तथोद्यानशतैरुपेतं प्रभ्रान्तषट्पादमयूरहंसैः
sarvartupuṣpaiḥ phalitairmanojñairvṛtaṁ samantāttarubhirmahoccaiḥ | ramyastathodyānaśatairupetaṁ prabhrāntaṣaṭpādamayūrahaṁsaiḥ
सर्व ऋतुओं के मनोहर फूलों-फलों से युक्त, चारों ओर विशाल वृक्षों से घिरा, सैकड़ों रमणीय उद्यानों से युक्त, भ्रमरों-मयूरों-हंसों से युक्त,
श्लोक 24 (skanda.8.168.24)
वापीभिराक्रान्तविहङ्गमाभिः प्रफुल्लनीलोत्पलसंवृताभिः । दैत्यालयं तच्छुशुभे तथैव प्रनृत्तकेकाविहगैस्सरोभिः
vāpībhirākrāntavihaṅgamābhiḥ praphullanīlotpalasaṁvṛtābhiḥ | daityālayaṁ tacchuśubhe tathaiva pranṛttakekāvihagaissarobhiḥ
जलपक्षियों से आक्रान्त, खिले हुए नीलकमलों से भरी हुई वापियों से, नृत्य करते मोरों के शब्दों से युक्त सरोवरों से, वह दैत्यालय भी शोभित हुआ।
श्लोक 25 (skanda.8.168.25)
तथा नखोद्भिन्नपयोधराभिराकर्णरक्तान्तविलोचनाभिः । सव्रीडमीषच्चपलेक्षिताभिर्योषिद्भिराकीर्णमतीव रेजे
tathā nakhodbhinnapayodharābhirākarṇaraktāntavilocanābhiḥ | savrīḍamīṣaccapalekṣitābhiryoṣidbhirākīrṇamatīva reje
तथा नखचिह्नित स्तनोंवाली, कर्णान्त तक रक्तवर्ण नेत्रोंवाली, लज्जायुक्त कुछ चंचल कटाक्षोंवाली स्त्रियों से वह अत्यन्त भरा हुआ शोभित हुआ।
श्लोक 26 (skanda.8.168.26)
लौहं पुरं यत्तदधश्चकार तत्तारकाक्षाय मयः प्रदत्वा । पुर द्वितीयं रजतामयं यद्विद्युत्प्रभायासुरराजभर्त्रे
lauhaṁ puraṁ yattadadhaścakāra tattārakākṣāya mayaḥ pradatvā | pura dvitīyaṁ rajatāmayaṁ yadvidyutprabhāyāsurarājabhartre
वह निचला लौह पुर मय ने तारकाक्ष को दिया; दूसरा रजतमय पुर, विद्युत्प्रभ के समान कान्तिवाला, असुरराज के स्वामी को दिया गया,
श्लोक 27 (skanda.8.168.27)
हैमं तृतीयं स्वयमेव दिव्यं जग्राह राजा मय आत्मनोर्थे । अधिष्ठितं तत्त्रिपुरं तदाभूत्समं त्रिभिस्तैर्दनुराजसिंहैः
haimaṁ tṛtīyaṁ svayameva divyaṁ jagrāha rājā maya ātmanorthe | adhiṣṭhitaṁ tattripuraṁ tadābhūtsamaṁ tribhistairdanurājasiṁhaiḥ
और तीसरा स्वर्णमय दिव्य पुर राजा मय ने स्वयं अपने लिये लिया। इस प्रकार अधिष्ठित वह त्रिपुर उन तीनों दनुराज-सिंहों के समान अधिकार में हो गया।
श्लोक 28 (skanda.8.168.28)
ते सर्वतः स्वः प्रभवान् विजित्य प्रियासहायाः सहमित्रभृत्यैः । सुखानि तस्मिन् विविधान्यवापु स्त्रैलोक्यचिन्तामविचिन्तयन्तः
te sarvataḥ svaḥ prabhavān vijitya priyāsahāyāḥ sahamitrabhṛtyaiḥ | sukhāni tasmin vividhānyavāpu strailokyacintāmavicintayantaḥ
वे सर्वत्र देवताओं के लोकों को जीतकर, प्रिय सहायकों, मित्रों और सेवकों सहित, त्रैलोक्य की चिन्ता न करते हुए उसमें विविध सुखों को भोगने लगे।
श्लोक 29 (skanda.8.168.29)
ते दर्पमोहप्रतिबद्धरागा न्यूनानमन्यन्त बलेन देवान् । मत्वा च तेषां प्रसभं निपत्य नानाविधाश्चक्रुरतीव पीडाः
te darpamohapratibaddharāgā nyūnānamanyanta balena devān | matvā ca teṣāṁ prasabhaṁ nipatya nānāvidhāścakruratīva pīḍāḥ
वे दर्प और मोह से बद्ध राग होकर देवताओं को बल में हीन मानने लगे; और उन्हें ऐसा मानकर, बलपूर्वक आक्रमण कर, उन्होंने अनेक प्रकार की अत्यधिक पीड़ाएँ दीं।
श्लोक 30 (skanda.8.168.30)
वनानि वैभ्राजपुरस्सराणि संछिन्नवीरुत्कुसुमानि चक्रुः । वापीः प्रचक्रुः कमलैर्विहीना जह्रुश्च रम्भादिपुरस्सरास्ताः
vanāni vaibhrājapurassarāṇi saṁchinnavīrutkusumāni cakruḥ | vāpīḥ pracakruḥ kamalairvihīnā jahruśca rambhādipurassarāstāḥ
उन्होंने वैभ्राज आदि वनों को - लताओं और फूलों को काट डाला; वापियों को कमलरहित कर डाला, और रम्भा आदि अप्सराओं को हर लिया,
श्लोक 31 (skanda.8.168.31)
सन्त्रस्तगात्रीः सुरयोषितस्तैरन्याश्च चक्रुर्महतीः प्रपीडाः । तेषामतीतः सुमहानथैवं प्रकुर्वतां देवविनाशनानि
santrastagātrīḥ surayoṣitastairanyāśca cakrurmahatīḥ prapīḍāḥ | teṣāmatītaḥ sumahānathaivaṁ prakurvatāṁ devavināśanāni
देवांगनाओं के शरीरों को त्रस्त किया और अन्य भी महान् पीड़ाएँ दीं। इस प्रकार देवताओं का विनाश करते हुए उनका बहुत बड़ा समय बीत गया।
श्लोक 32 (skanda.8.168.32)
कालो मयं प्रत्यथ जातकोपाः संगत्य सर्वे त्रिदिवौकसेशाः । वृत्तं यथा सर्वमशेषतस्तन्न्यवेदयन्नाशु पितामहाय
kālo mayaṁ pratyatha jātakopāḥ saṁgatya sarve tridivaukaseśāḥ | vṛttaṁ yathā sarvamaśeṣatastannyavedayannāśu pitāmahāya
तब काल मय के प्रति क्रुद्ध हुआ, और समस्त त्रिदिवौकसों के स्वामी एकत्र होकर जो कुछ भी घटित हुआ था, वह सब शीघ्र पितामह को निवेदित किया।
श्लोक 33 (skanda.8.168.33)
तानाह देवः कमलासनस्थः सर्वान्सुरेशान्परिसान्त्वयित्वा । महाबलास्ते त्रिपुरासुरेन्द्रा हन्तुं न शक्या हि बलाद्भवद्भिः
tānāha devaḥ kamalāsanasthaḥ sarvānsureśānparisāntvayitvā | mahābalāste tripurāsurendrā hantuṁ na śakyā hi balādbhavadbhiḥ
कमलासन पर स्थित देव ने उन सभी सुरेश्वरों को सान्त्वना देकर कहा - 'ये महाबली त्रिपुरासुरेन्द्र तुमसे बल द्वारा नहीं मारे जा सकते।
श्लोक 34 (skanda.8.168.34)
तस्मादयं विष्णुरहञ्च युष्मान् प्रगृह्य शम्भुं शरणं प्रयाम । गतिः सदा नः शशिभृत् सुरेशाः स तान् बलाद्धंस्यति शूलपाणिः
tasmādayaṁ viṣṇurahañca yuṣmān pragṛhya śambhuṁ śaraṇaṁ prayāma | gatiḥ sadā naḥ śaśibhṛt sureśāḥ sa tān balāddhaṁsyati śūlapāṇiḥ
अतः यह विष्णु और मैं, तुम सबको लेकर, शम्भु की शरण में जायेंगे; वे चन्द्रधारी सदा हमारी गति हैं, हे सुरेश्वरो! वे शूलपाणि बलपूर्वक उनका वध करेंगे।'
श्लोक 35 (skanda.8.168.35)
तथेति तेपि प्रणिपत्य देवा ब्रह्मार्कशक्रानिलपावकाद्याः । कैलासमागम्य सुरेश्वरेशं दृष्टवा हरं तुष्टुवुरादृतार्थाः
tatheti tepi praṇipatya devā brahmārkaśakrānilapāvakādyāḥ | kailāsamāgamya sureśvareśaṁ dṛṣṭavā haraṁ tuṣṭuvurādṛtārthāḥ
'ऐसा ही हो' - यह कहकर वे देवता भी, ब्रह्मा-सूर्य-इन्द्र-वायु-अग्नि आदि, प्रणाम करके, कैलास पर आकर, देवेश्वरों के ईश्वर हर का दर्शन कर, आदरपूर्वक उनकी स्तुति करने लगे -
श्लोक 36 (skanda.8.168.36)
नमस्त्रिलोकेश्वरवन्दिताय प्रियाधरायामितविक्रमाय । नमोस्तु चन्द्रार्धजटाकलापकान्ति प्रभोद्योतितशेखराय
namastrilokeśvaravanditāya priyādharāyāmitavikramāya | namostu candrārdhajaṭākalāpakānti prabhodyotitaśekharāya
'त्रिलोकेश्वर से वन्दित, प्रिया के प्रिय, अमित पराक्रमी को नमस्कार है; अर्धचन्द्रयुक्त जटाकलाप की कान्ति से प्रकाशित शिखरवाले को नमस्कार है।
श्लोक 37 (skanda.8.168.37)
त्रैलोक्यदेवाय नमोस्तु नित्यं पिनाकचापाय नमस्तथैव । नमः प्रदीप्तासिपरश्वधाय त्रिशूलहस्ताय नमोस्तु नित्यम्
trailokyadevāya namostu nityaṁ pinākacāpāya namastathaiva | namaḥ pradīptāsiparaśvadhāya triśūlahastāya namostu nityam
त्रैलोक्य के देव को नित्य नमस्कार है, पिनाकधनुर्धारी को भी नमस्कार है; प्रज्वलित खड्ग-परशुधारी को नमस्कार है, त्रिशूलपाणि को नित्य नमस्कार है।
श्लोक 38 (skanda.8.168.38)
नमो नमो नन्दिवरप्रदाय जगच्छरण्याय सुरेश्वराय । नमः सदा भक्तवरप्रदाय नमोस्तु यक्षेशवरप्रदाय
namo namo nandivarapradāya jagaccharaṇyāya sureśvarāya | namaḥ sadā bhaktavarapradāya namostu yakṣeśavarapradāya
नन्दी को श्रेष्ठ वर देनेवाले, जगत् के शरण्य, सुरेश्वर को नमस्कार-नमस्कार है; भक्तों को श्रेष्ठ वर देनेवाले को सदा नमस्कार है, यक्षेश्वर को वर देनेवाले को नमस्कार है।
श्लोक 39 (skanda.8.168.39)
स्थिताय नित्यं हिमवद्गिरीन्द्रे कैलासवासाय नमस्सदैव । नमो विमुक्ते शनिकेतनाय स्थिताय सर्वत्र च ते नमोस्तु
sthitāya nityaṁ himavadgirīndre kailāsavāsāya namassadaiva | namo vimukte śaniketanāya sthitāya sarvatra ca te namostu
हिमवत् पर्वतराज पर नित्य स्थित, कैलासवासी को सदा नमस्कार है; विमुक्त (अविमुक्त) में सन्निहित को नमस्कार है, सर्वत्र स्थित आपको नमस्कार है।
श्लोक 40 (skanda.8.168.40)
भस्माङ्गलिप्ताय कपर्दिने च नमोस्तु नित्यं वृषभस्थिताय । दिग्वाससे श्वेतवरप्रदाय सर्वर्द्धियुक्ताय जगद्विधात्रे
bhasmāṅgaliptāya kapardine ca namostu nityaṁ vṛṣabhasthitāya | digvāsase śvetavarapradāya sarvarddhiyuktāya jagadvidhātre
भस्म से लिप्त अंगोंवाले, कपर्दी को नमस्कार है, नित्य वृषभ पर स्थित को नमस्कार है; दिशाओं को वस्त्ररूप धारण करनेवाले, श्वेत को वर देनेवाले, सर्वऐश्वर्ययुक्त, जगत्विधाता को नमस्कार है।
श्लोक 41 (skanda.8.168.41)
हर्यर्कशक्राग्निपितामहानां स्रष्ट्रे नमो देव राय । सूक्ष्माय नित्यं परमेश्वराय नित्यं नमः सर्वगताय धात्रे
haryarkaśakrāgnipitāmahānāṁ sraṣṭre namo deva rāya | sūkṣmāya nityaṁ parameśvarāya nityaṁ namaḥ sarvagatāya dhātre
हरि, सूर्य, इन्द्र, अग्नि और पितामह के स्रष्टा, [मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं] देव को नमस्कार है; नित्य सूक्ष्म परमेश्वर को नमस्कार है, नित्य सर्वगत धाता को नमस्कार है।
श्लोक 42 (skanda.8.168.42)
नमः परायातिपरे पुमांसे पुराय षड्विंशकसंज्ञिताय । नमोस्तु शर्वाय धनुर्धराय सर्वाय सर्वप्रभवाय नित्यम्
namaḥ parāyātipare pumāṁse purāya ṣaḍviṁśakasaṁjñitāya | namostu śarvāya dhanurdharāya sarvāya sarvaprabhavāya nityam
परात्पर पुरुष को, षड्विंशक नामवाले पुराण पुरुष को नमस्कार है; धनुर्धारी शर्व को, सर्वस्वरूप, सर्वप्रभव को नित्य नमस्कार है।
श्लोक 43 (skanda.8.168.43)
सोमानिलार्कज्वलनाम्बुभूमिव्योमात्मकायादिसृजे नमोस्तु । पूष्णो नमो दन्तविनाशनाय कामाङ्गनाशाय नमोस्तु नित्यम्
somānilārkajvalanāmbubhūmivyomātmakāyādisṛje namostu | pūṣṇo namo dantavināśanāya kāmāṅganāśāya namostu nityam
सोम, वायु, सूर्य, अग्नि, जल, पृथ्वी और आकाशस्वरूप आदि के स्रष्टा को नमस्कार है; पूषा के दाँत नष्ट करनेवाले को, कामदेव के अंग का नाश करनेवाले को नित्य नमस्कार है।
श्लोक 44 (skanda.8.168.44)
नमः प्रधानाय पराय पुंसे योगाधिगम्याय सदा नमोस्तु । रौद्राय सौम्याय वपुष्मते च नमो नमः सर्वजगत्सृजे च
namaḥ pradhānāya parāya puṁse yogādhigamyāya sadā namostu | raudrāya saumyāya vapuṣmate ca namo namaḥ sarvajagatsṛje ca
प्रधान, पर पुरुष, योग से ही प्राप्य को सदा नमस्कार है; रौद्र और सौम्य, देहधारी को नमस्कार है, सम्पूर्ण जगत् के स्रष्टा को नमस्कार-नमस्कार है।
श्लोक 45 (skanda.8.168.45)
विद्यासृजे धर्मसृजे नमोस्तु स्रष्ट्रे नमो यज्ञसुरासुराणाम् । नमस्तृतीयेक्षणधारिणे च नमो नमो नीलशिखण्डिने च
vidyāsṛje dharmasṛje namostu sraṣṭre namo yajñasurāsurāṇām | namastṛtīyekṣaṇadhāriṇe ca namo namo nīlaśikhaṇḍine ca
विद्या के स्रष्टा, धर्म के स्रष्टा को नमस्कार है, देवों-असुरों के यज्ञ के स्रष्टा को नमस्कार है; तृतीय नेत्रधारी को नमस्कार है, नीलशिखण्डी को नमस्कार-नमस्कार है।
श्लोक 46 (skanda.8.168.46)
नमोस्तु नित्यं पुरुषोत्तमाय श्मशानवासाय नमः सदैव । नमोस्तु दैत्यान्धकनाशनाय नमः सदा मोहविनाशनाय
namostu nityaṁ puruṣottamāya śmaśānavāsāya namaḥ sadaiva | namostu daityāndhakanāśanāya namaḥ sadā mohavināśanāya
पुरुषोत्तम को नित्य नमस्कार है, श्मशानवासी को सदा नमस्कार है; दैत्य अन्धक के नाशक को नमस्कार है, मोह के नाशक को सदा नमस्कार है।
श्लोक 47 (skanda.8.168.47)
तमोविनाशाय नमोस्तु नित्यमज्ञाननाशाय नमोस्तु नित्यम । नमः सदा मोक्षवरप्रदाय नमः सदायामृतसंस्थिताय
tamovināśāya namostu nityamajñānanāśāya namostu nityama | namaḥ sadā mokṣavarapradāya namaḥ sadāyāmṛtasaṁsthitāya
तम के नाशक को नित्य नमस्कार है, अज्ञान के नाशक को नित्य नमस्कार है; मोक्ष का वर देनेवाले को सदा नमस्कार है, अमृत में स्थित को सदा नमस्कार है।
श्लोक 48 (skanda.8.168.48)
भर्त्रे नमो भूमिधरेन्द्रपुत्र्याः पित्रे कुमारस्य नमोस्तु नित्यम् । नमोस्तु वित्तेशवरप्रदाय नमः सदा शुक्रवरप्रदाय
bhartre namo bhūmidharendraputryāḥ pitre kumārasya namostu nityam | namostu vitteśavarapradāya namaḥ sadā śukravarapradāya
पर्वतराजपुत्री के पति को नमस्कार है, कुमार के पिता को नित्य नमस्कार है; धनेश्वर को वर देनेवाले को नमस्कार है, शुक्र को वर देनेवाले को सदा नमस्कार है।
श्लोक 49 (skanda.8.168.49)
ब्रह्मात्मने ब्रह्मसृजे नमोस्तु नमो नमो देवसृजे विधात्रे । नमोस्तु दक्षामरयज्ञहन्त्रे नमोस्तु चण्डेशवरप्रद्राय
brahmātmane brahmasṛje namostu namo namo devasṛje vidhātre | namostu dakṣāmarayajñahantre namostu caṇḍeśavarapradrāya
ब्रह्म के आत्मा, ब्रह्मा के स्रष्टा को नमस्कार है, देवों के स्रष्टा विधाता को नमस्कार-नमस्कार है; दक्ष के देवयज्ञ के नाशक को नमस्कार है, चण्डेश को वर देनेवाले को नमस्कार है।
श्लोक 50 (skanda.8.168.50)
योगेश्वरायामरसंस्तुताय नमोस्तु रुद्राय पराय धाम्ने । हराथ शर्वाय शिवाय गोप्त्रे नमोस्तु भीमाय च शम्भवे च
yogeśvarāyāmarasaṁstutāya namostu rudrāya parāya dhāmne | harātha śarvāya śivāya goptre namostu bhīmāya ca śambhave ca
अमरों से संस्तुत योगेश्वर को नमस्कार है, परम धाम रुद्र को नमस्कार है; हर, शर्व, शिव, रक्षक को, भीम और शम्भु को नमस्कार है।
श्लोक 51 (skanda.8.168.51)
गुणैर्विहीनाय गुणोत्कटाय गुणेष्वतीताय गुणास्थिताय । गीताय सांख्ये पुरुषाय नित्यं नमोस्तु योगोपनिषत्स्थिताय
guṇairvihīnāya guṇotkaṭāya guṇeṣvatītāya guṇāsthitāya | gītāya sāṁkhye puruṣāya nityaṁ namostu yogopaniṣatsthitāya
गुणों से रहित, गुणों में उत्कट, गुणों से परे, गुणों में स्थित को नमस्कार है; सांख्य में पुरुष कहे गये, योगोपनिषदों में स्थित को नित्य नमस्कार है।
श्लोक 52 (skanda.8.168.52)
महापुराणाय परात्पराय स्थूलाय सूक्ष्माय नमस्सदैव । प्रसाद्यमानः कुरु नः प्रसादं तुष्टः परेशान वरं प्रयच्छ । शम्भुस्तथैवं स्तुवतां सुराणां ब्रह्मेन्द्रविष्ण्वर्कपुरःसराणाम्
mahāpurāṇāya parātparāya sthūlāya sūkṣmāya namassadaiva | prasādyamānaḥ kuru naḥ prasādaṁ tuṣṭaḥ pareśāna varaṁ prayaccha | śambhustathaivaṁ stuvatāṁ surāṇāṁ brahmendraviṣṇvarkapuraḥsarāṇām
महापुराण-स्वरूप, परात्पर, स्थूल और सूक्ष्म को सदा नमस्कार है। प्रसन्न होते हुए हम पर कृपा करें, तुष्ट होकर, हे परमेश्वर! वर प्रदान करें।' इस प्रकार ब्रह्मा-इन्द्र-विष्णु-सूर्य आदि देवताओं द्वारा शम्भु की स्तुति की गयी।
श्लोक 53 (skanda.8.168.53)
प्रीतस्तया स्तोत्रविशेषभक्त्या जगाद वाक्यं परमाद्भुतार्थम । तुष्टोस्मि देवा शृणुताद्य शीघ्रं समीहितं वो यदि किञ्चिदस्ति । दातास्मि सर्वं तदशेषतोद्य किञ्चिन्न युष्मभ्यमदेयमस्ति
prītastayā stotraviśeṣabhaktyā jagāda vākyaṁ paramādbhutārthama | tuṣṭosmi devā śṛṇutādya śīghraṁ samīhitaṁ vo yadi kiñcidasti | dātāsmi sarvaṁ tadaśeṣatodya kiñcinna yuṣmabhyamadeyamasti
उस विशेष स्तोत्र-भक्ति से प्रसन्न होकर, उन्होंने परम अद्भुत अर्थवाला वचन कहा - 'हे देवो! मैं संतुष्ट हूँ, शीघ्र सुनो, यदि तुम्हारा कोई अभीष्ट है तो, मैं आज उसे सम्पूर्ण रूप से दूँगा; तुम्हें कुछ भी अदेय नहीं है।'