अम्बिका खण्ड · अध्याय 169
देवरथकल्पन
श्लोक 1 (skanda.8.169.1)
देवा ऊचुः । ब्रह्मदत्तवरैर्देव मयाद्यैर्दानवैस्त्रिभिः । दुर्गं तत्त्रिपुरं कृत्वा बाध्यामो बलदर्पितैः
devā ūcuḥ | brahmadattavarairdeva mayādyairdānavaistribhiḥ | durgaṁ tattripuraṁ kṛtvā bādhyāmo baladarpitaiḥ
देवताओं ने कहा - हे देव! ब्रह्मा के दिये वरों से मय आदि तीन दानवों द्वारा वह दुर्ग त्रिपुर बनाकर, हम उन बलदर्पित दानवों से पीड़ित हैं।
श्लोक 2 (skanda.8.169.2)
हृता अप्सरसः सर्वा ध्वंसितानि वनानि च । सर्वान्देवान्निहन्मोद्य श्वो हन्मेति च तेब्रुवन्
hṛtā apsarasaḥ sarvā dhvaṁsitāni vanāni ca | sarvāndevānnihanmodya śvo hanmeti ca tebruvan
समस्त अप्सराएँ हर ली गयी हैं, वन नष्ट कर दिये गये हैं; 'हम आज सब देवताओं को मार डालेंगे, और कल भी मारेंगे' - ऐसा वे कहते हैं।
श्लोक 3 (skanda.8.169.3)
न तेषां निग्रहे शक्तो ब्रह्माप्येष पितामहः । विष्णुर्वापि महादेव तेन नः सुमहद् भयम्
na teṣāṁ nigrahe śakto brahmāpyeṣa pitāmahaḥ | viṣṇurvāpi mahādeva tena naḥ sumahad bhayam
उनका निग्रह करने में न तो ब्रह्मा पितामह समर्थ हैं, न विष्णु, हे महादेव! इसीलिये हमें अत्यन्त भय है।
श्लोक 4 (skanda.8.169.4)
तद् यथा त्रिपुरं नश्येत् ते च स्युर्निहता यथा । तथा कुरु सुरश्रेष्ठ वरोयन्नः प्रदीयताम्
tad yathā tripuraṁ naśyet te ca syurnihatā yathā | tathā kuru suraśreṣṭha varoyannaḥ pradīyatām
हे सुरश्रेष्ठ! जैसे वह त्रिपुर नष्ट हो और वे तीनों मारे जायें, वैसा ही कीजिये; वह वर हमें दीजिये।
श्लोक 5 (skanda.8.169.5)
इति विज्ञापितः शम्भुस्सर्वैस्तैर्हि सुरोत्तमैः । इदमाह महातेजाः सुरानाश्वासयन्निव
iti vijñāpitaḥ śambhussarvaistairhi surottamaiḥ | idamāha mahātejāḥ surānāśvāsayanniva
इस प्रकार उन सभी श्रेष्ठ देवताओं द्वारा निवेदन किये जाने पर, महातेजस्वी शम्भु ने देवताओं को मानो आश्वस्त करते हुए यह कहा -
श्लोक 6 (skanda.8.169.6)
शतमंशं सुरेशा वै गृहीत्वा मम तेजसः । रुद्रतेजोमया भूत्वा दानवान् विनिहंस्यश्च
śatamaṁśaṁ sureśā vai gṛhītvā mama tejasaḥ | rudratejomayā bhūtvā dānavān vinihaṁsyaśca
'हे सुरेश्वरो! मेरे तेज का शतांश ग्रहण करके, रुद्रतेज से युक्त होकर तुम दानवों का संहार करो।'
श्लोक 7 (skanda.8.169.7)
ततस्ते पुनरेवेशं प्राहुर्वाक्यमिदं सुराः । शक्ताः सहस्रमप्यंशमुद्वोढुं न वयं तव
tataste punareveśaṁ prāhurvākyamidaṁ surāḥ | śaktāḥ sahasramapyaṁśamudvoḍhuṁ na vayaṁ tava
तब देवताओं ने पुनः ईश्वर से यह वचन कहा - 'हम आपके तेज का सहस्रांश भी वहन करने में समर्थ नहीं हैं।
श्लोक 8 (skanda.8.169.8)
का नः शक्तिः सुरेशान तेजो माहेश्वरं परम् । द्रष्टुं धारयितुं वापि प्रसादं कुरु नः प्रभो
kā naḥ śaktiḥ sureśāna tejo māheśvaraṁ param | draṣṭuṁ dhārayituṁ vāpi prasādaṁ kuru naḥ prabho
हे सुरेश्वर! आपके परम माहेश्वर तेज को देखने या धारण करने की हममें क्या शक्ति है? हे प्रभो! हम पर कृपा कीजिये।
श्लोक 9 (skanda.8.169.9)
न कथञ्चिद्वयं शक्तास्तान्हन्तुं दानवान् बलात् । भगवन् स्वयमेव त्वं त्रिपुरं जहि शङ्कर
na kathañcidvayaṁ śaktāstānhantuṁ dānavān balāt | bhagavan svayameva tvaṁ tripuraṁ jahi śaṅkara
हम किसी भी प्रकार बलपूर्वक उन दानवों को मारने में समर्थ नहीं हैं। हे भगवन्! आप स्वयं ही, हे शंकर! त्रिपुर का वध करें।
श्लोक 10 (skanda.8.169.10)
तेभ्यः किल वरो दत्तो ब्रह्मणानेन शूलधृक् । दिव्ये वर्षसहस्रे तु समेष्यति पुरत्रयम्
tebhyaḥ kila varo datto brahmaṇānena śūladhṛk | divye varṣasahasre tu sameṣyati puratrayam
हे शूलधारी! उन्हें इस ब्रह्मा द्वारा वर दिया गया था कि दिव्य सहस्र वर्ष बीतने पर तीनों पुर एक साथ आ जायेंगे,
श्लोक 11 (skanda.8.169.11)
निमेषार्धं क्षणे तस्मिन्नेतद्वस्त्रिपुरं बली । सकृदेकमिषुं क्षिप्त्वा यः प्रधक्ष्यति दानवान्
nimeṣārdhaṁ kṣaṇe tasminnetadvastripuraṁ balī | sakṛdekamiṣuṁ kṣiptvā yaḥ pradhakṣyati dānavān
उस क्षण आधे निमेष के लिये; और जो बलवान् एक ही बाण छोड़कर उन दानवों को भस्म कर देगा,
श्लोक 12 (skanda.8.169.12)
भविष्यति स वो मृत्युर्नान्यथा मरणं हि वः । तच्च कर्तुं न शक्ताः स्मः प्रसादं तेन नः कुरु
bhaviṣyati sa vo mṛtyurnānyathā maraṇaṁ hi vaḥ | tacca kartuṁ na śaktāḥ smaḥ prasādaṁ tena naḥ kuru
वही उनकी मृत्यु होगा, अन्यथा उनकी मृत्यु नहीं हो सकती। और हम वह करने में समर्थ नहीं हैं; इसलिये हम पर कृपा कीजिये।'
श्लोक 13 (skanda.8.169.13)
ततः स भगवान्देवः प्रणतान् वृषभध्वजः । पुनराश्वासयन् प्राह समुद्विग्नान् दिवौकसः
tataḥ sa bhagavāndevaḥ praṇatān vṛṣabhadhvajaḥ | punarāśvāsayan prāha samudvignān divaukasaḥ
तब उन प्रणत, उद्विग्न देवताओं को पुनः आश्वस्त करते हुए वृषभध्वज भगवान् देव ने कहा -
श्लोक 14 (skanda.8.169.14)
यद्येवं सुरशार्दूलास्त्रिपुरं दुर्गमं महत् । इषुमेकं सकृत् क्षिप्त्वा प्रधक्ष्ये निमिषे क्षणे
yadyevaṁ suraśārdūlāstripuraṁ durgamaṁ mahat | iṣumekaṁ sakṛt kṣiptvā pradhakṣye nimiṣe kṣaṇe
'हे सुरशार्दूलो! यदि ऐसा ही है, तो उस महान् दुर्गम त्रिपुर को, एक ही बाण छोड़कर, मैं एक ही क्षण में भस्म कर दूँगा।
श्लोक 15 (skanda.8.169.15)
ब्रह्मविष्णुप्रियार्थं हि शक्रस्यानुग्रहाय च । त्रिपुरं रथमास्थाय हंस्यामि स्वयमेव तत्
brahmaviṣṇupriyārthaṁ hi śakrasyānugrahāya ca | tripuraṁ rathamāsthāya haṁsyāmi svayameva tat
ब्रह्मा-विष्णु की प्रसन्नता के लिये तथा इन्द्र के अनुग्रह के लिये, रथ पर आरूढ़ होकर, मैं स्वयं ही त्रिपुर का वध करूँगा।
श्लोक 16 (skanda.8.169.16)
क्रियतां स रथः सज्जो यमारुह्य दिवौकसः । धक्ष्यामि त्रिपुरं दुर्गमाक्रान्तं दानवैस्त्रिभिः
kriyatāṁ sa rathaḥ sajjo yamāruhya divaukasaḥ | dhakṣyāmi tripuraṁ durgamākrāntaṁ dānavaistribhiḥ
वह रथ सज्ज किया जाये, जिस पर आरूढ़ होकर, हे देवो! मैं उस तीनों दानवों से आक्रान्त दुर्गम त्रिपुर को भस्म करूँगा।
श्लोक 17 (skanda.8.169.17)
यादृशश्च हि मां वोढुं शक्तः स्यात् सुरपुङ्गवाः । बलवान् हिमवत्कल्पः कर्तव्यस्तादृशो रथः
yādṛśaśca hi māṁ voḍhuṁ śaktaḥ syāt surapuṅgavāḥ | balavān himavatkalpaḥ kartavyastādṛśo rathaḥ
और, हे सुरपुंगवो! जैसा रथ मुझे वहन करने में समर्थ हो, ऐसा बलवान्, हिमालय के समान रथ बनाया जाये।'
श्लोक 18 (skanda.8.169.18)
ततो देवाः प्रणम्येशं प्रहृष्टमनसोभवन् । रथं च सहिताः सर्वे कल्पयामासुरुत्तमम्
tato devāḥ praṇamyeśaṁ prahṛṣṭamanasobhavan | rathaṁ ca sahitāḥ sarve kalpayāmāsuruttamam
तब देवता ईश्वर को प्रणाम करके हर्षित मन हो गये, और सब मिलकर उस उत्तम रथ को तैयार करने लगे।
श्लोक 19 (skanda.8.169.19)
ततः स भगवान् ब्रह्मा तथा विष्णुहुताशनौ । सर्वदेवमयं दिव्यं चक्रुस्तं रथमुत्तमम्
tataḥ sa bhagavān brahmā tathā viṣṇuhutāśanau | sarvadevamayaṁ divyaṁ cakrustaṁ rathamuttamam
तब वे भगवान् ब्रह्मा, तथा विष्णु और अग्नि ने, वह सर्वदेवमय दिव्य उत्तम रथ बनाया -
श्लोक 20 (skanda.8.169.20)
धातारं भास्करं शक्रं पवनं धनदं यमम् । वसून् रूद्राँस्तथादित्यान् गन्धर्वानश्विनावपि
dhātāraṁ bhāskaraṁ śakraṁ pavanaṁ dhanadaṁ yamam | vasūn rūdrā~stathādityān gandharvānaśvināvapi
धाता, भास्कर, शक्र, पवन, धनद और यम को; वसुओं, रुद्रों, आदित्यों, गन्धर्वों और दोनों अश्विनीकुमारों को भी,
श्लोक 21 (skanda.8.169.21)
गरुडान् पर्वतान्नागान् गुह्यकान्समहोदधीन् । ऋषीँतु सिद्धाँस्तथा यक्षान् ग्रहाँ
garuḍān parvatānnāgān guhyakānsamahodadhīn | ṛṣī~tu siddhā~stathā yakṣān grahā~
गरुड़ों, पर्वतों, नागों, गुह्यकों को समुद्रों सहित, ऋषियों, सिद्धों, यक्षों, ग्रहों को -
श्लोक 22 (skanda.8.169.22)
सितं कालं तथा चैव वनस्पतीन् । दिवसानि मुहूर्तानि क्षणान् काष्ठालवाँस्तथा
sitaṁ kālaṁ tathā caiva vanaspatīn | divasāni muhūrtāni kṣaṇān kāṣṭhālavā~stathā
[मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं] काल को, तथा वनस्पतियों को भी,
श्लोक 23 (skanda.8.169.23)
अयने च ऋतून्मासान् पक्षान् संवत्सराँस्तथा । स्थावरं जङ्गमं यच्च नक्षत्राणि तथैव च
ayane ca ṛtūnmāsān pakṣān saṁvatsarā~stathā | sthāvaraṁ jaṅgamaṁ yacca nakṣatrāṇi tathaiva ca
दिवसों, मुहूर्तों, क्षणों, काष्ठाओं और लवों को भी, अयनों, ऋतुओं, मासों, पक्षों और संवत्सरों को भी,
श्लोक 24 (skanda.8.169.24)
अष्टौ देवनिकायाँस्तान् रथे तस्मिन्नकल्पयन् । काँश्चिच्चक्रद्वये चक्रुः प्रताप
aṣṭau devanikāyā~stān rathe tasminnakalpayan | kā~ściccakradvaye cakruḥ pratāpa
चराचर को तथा नक्षत्रों को भी - इन आठों देवनिकायों को उन्होंने उस रथ में योजित किया; कुछ को दोनों चक्रों में बनाया [मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं],
श्लोक 25 (skanda.8.169.25)
श्चिद्रथेचान्यान् युयुजुः सुरपुङ्गवान् । कृत्वाश्वाँश्चतुरो वेदान् रथे तस्मिन्न्ययोजयन्
ścidrathecānyān yuyujuḥ surapuṅgavān | kṛtvāśvā~ścaturo vedān rathe tasminnyayojayan
[मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं] और अन्यों को रथ में जोता, उन सुरश्रेष्ठों को; चारों वेदों को अश्व बनाकर उस रथ में योजित किया।
श्लोक 26 (skanda.8.169.26)
सम्वत्सरमयं चक्रं धनुर्गिरिमयं तथा । ज्याञ्चैव धनुषश्चक्रुर्देव देवीं जगत्स्थितिम्
samvatsaramayaṁ cakraṁ dhanurgirimayaṁ tathā | jyāñcaiva dhanuṣaścakrurdeva devīṁ jagatsthitim
संवत्सरमय चक्र बनाया, तथा पर्वतमय धनुष, और धनुष की प्रत्यंचा जगत्स्थिति देवी को बनाया।
श्लोक 27 (skanda.8.169.27)
ते तमेवंविधं देवा रथमग्र्यमचीकरन् । सर्वदेवमयं कृत्वा गिरिकल्पं रथोत्तमम्
te tamevaṁvidhaṁ devā rathamagryamacīkaran | sarvadevamayaṁ kṛtvā girikalpaṁ rathottamam
देवताओं ने इस प्रकार उस अग्रगण्य रथ को, सर्वदेवमय, पर्वत के समान उस उत्तम रथ को बनाया।
श्लोक 28 (skanda.8.169.28)
विष्णुः पितामहोग्निश्च प्रणम्य परमेश्वरम् । रथः सज्ज इति प्राहुर्विनाशाय सुरद्विषाम्
viṣṇuḥ pitāmahogniśca praṇamya parameśvaram | rathaḥ sajja iti prāhurvināśāya suradviṣām
विष्णु, पितामह और अग्नि ने परमेश्वर को प्रणाम करके कहा - 'रथ सज्ज है, सुरद्वेषियों के विनाश के लिये।'
श्लोक 29 (skanda.8.169.29)
ततः स भगवाञ्छम्भुः स्तूयमानः सुरैस्त्रिभिः । अवैक्षत रथं दिव्यं सर्वदेवमयं कृतम्
tataḥ sa bhagavāñchambhuḥ stūyamānaḥ suraistribhiḥ | avaikṣata rathaṁ divyaṁ sarvadevamayaṁ kṛtam
तब वे भगवान् शम्भु, तीनों देवताओं द्वारा स्तुत होते हुए, उस सर्वदेवमय दिव्य रथ को देखने लगे।
श्लोक 30 (skanda.8.169.30)
सुकृतं साध्विति प्रोच्य धनुर्जग्राह तन्महत् । तत्प्रगृह्य धनुर्दीप्तं सर्वतेजोमयं परम्
sukṛtaṁ sādhviti procya dhanurjagrāha tanmahat | tatpragṛhya dhanurdīptaṁ sarvatejomayaṁ param
'सुकृत, साधु' ऐसा कहकर उन्होंने वह महान् धनुष ग्रहण किया; उस दीप्त, सर्वतेजोमय, परम धनुष को ग्रहण करके,
श्लोक 31 (skanda.8.169.31)
अधश्चोर्ध्वञ्च संप्रेक्ष्य तुतोष भुवनेश्वरः । पितामहं ततो वीक्ष्य प्रोवाच वचसां पतिः
adhaścordhvañca saṁprekṣya tutoṣa bhuvaneśvaraḥ | pitāmahaṁ tato vīkṣya provāca vacasāṁ patiḥ
नीचे और ऊपर देखकर भुवनेश्वर संतुष्ट हुए। तब पितामह की ओर देखकर वाणी के स्वामी ने कहा -
श्लोक 32 (skanda.8.169.32)
रथ एष धनुश्चैतत् त्वया ब्रह्मन् सुकल्पितम् । दग्धव्यं त्रिपुरं येन तमिषुं शीघ्रमानय
ratha eṣa dhanuścaitat tvayā brahman sukalpitam | dagdhavyaṁ tripuraṁ yena tamiṣuṁ śīghramānaya
'यह रथ, यह धनुष - तुमने ही, हे ब्रह्मन्! सुन्दर रूप से बनाया है; जिससे त्रिपुर भस्म होना है, वह बाण शीघ्र लाओ।'
श्लोक 33 (skanda.8.169.33)
ततः प्रोवाच तं ब्रह्मा प्रणम्य वृषभध्वजम् । रथ एष कृतो देव धनुरेतच्च ते मया
tataḥ provāca taṁ brahmā praṇamya vṛṣabhadhvajam | ratha eṣa kṛto deva dhanuretacca te mayā
तब ब्रह्मा ने वृषभध्वज को प्रणाम करके उनसे कहा - 'यह रथ बनाया गया है, हे देव! और यह धनुष भी मेरे द्वारा,
श्लोक 34 (skanda.8.169.34)
तमिषुं भगवानेव तद्योग्यं कर्तुमर्हति । ततः पार्श्वस्थितौ दृष्ट्वा शम्भुविष्णुहुताशनौ
tamiṣuṁ bhagavāneva tadyogyaṁ kartumarhati | tataḥ pārśvasthitau dṛṣṭvā śambhuviṣṇuhutāśanau
वह बाण भगवान् स्वयं ही उसके योग्य बनाने में समर्थ हैं।' तब पार्श्व में स्थित शम्भु-विष्णु और अग्नि को देखकर,
श्लोक 35 (skanda.8.169.35)
दृष्टिपातेन तौ देवौ समाह्वयदरिन्दमः । तौ द्वावञ्जलिमाधाय सुरेशानमुपस्थितौ
dṛṣṭipātena tau devau samāhvayadarindamaḥ | tau dvāvañjalimādhāya sureśānamupasthitau
शत्रुदमन ने उन दोनों देवों को दृष्टिपात मात्र से बुला लिया; वे दोनों अंजलि बाँधे सुरेश्वर के समीप उपस्थित हुए।
श्लोक 36 (skanda.8.169.36)
स्वयमेव ततश्चक्रे शम्भुर्विष्णुं शरोत्तमम् । ओषधीनां पतिं सोमं पुंखे तस्य न्ययोजयत्
svayameva tataścakre śambhurviṣṇuṁ śarottamam | oṣadhīnāṁ patiṁ somaṁ puṁkhe tasya nyayojayat
तब स्वयं ही शम्भु ने विष्णु को उत्तम बाण बनाया, और ओषधियों के स्वामी सोम को उसके पुंख (पिछले सिरे) में योजित किया।
श्लोक 37 (skanda.8.169.37)
शल्यं च पावकं चक्रे ब्रह्माणं स ततोब्रवीत् । सारथिः को रथे ब्रह्मँस्त्वयेह परिकल्पितः
śalyaṁ ca pāvakaṁ cakre brahmāṇaṁ sa tatobravīt | sārathiḥ ko rathe brahma~stvayeha parikalpitaḥ
अग्नि को शल्य (नोक) बनाया, और तब ब्रह्मा से कहा - 'हे ब्रह्मन्! इस रथ में सारथी के रूप में तुमने किसे नियुक्त किया है?'
श्लोक 38 (skanda.8.169.38)
तमुवाच ततो ब्रह्मा प्राञ्जलिर्जगतः पतिम् । मह्यं ददासि यद्याज्ञामहमेव हि सारथिः
tamuvāca tato brahmā prāñjalirjagataḥ patim | mahyaṁ dadāsi yadyājñāmahameva hi sārathiḥ
तब ब्रह्मा ने अंजलि बाँधे जगत्पति से कहा - 'यदि आप मुझे आज्ञा दें तो मैं स्वयं ही सारथी बनूँगा।
श्लोक 39 (skanda.8.169.39)
प्राप्स्ये किमपरं देव सारथ्यादधिकं तव । सर्व शोभनमित्युक्त्वा ततो देवः पिनाकधृक्
prāpsye kimaparaṁ deva sārathyādadhikaṁ tava | sarva śobhanamityuktvā tato devaḥ pinākadhṛk
हे देव! आपके सारथ्य से अधिक और मुझे क्या प्राप्त होगा?' 'सब कुछ शोभन है' ऐसा कहकर, तब पिनाकधारी देव ने,
श्लोक 40 (skanda.8.169.40)
हस्ते प्रगृह्य देवेशमारुरोह रथोत्तमम् । रुद्रपारिषदा ये च नन्दीश्वरपुरोगमाः
haste pragṛhya deveśamāruroha rathottamam | rudrapāriṣadā ye ca nandīśvarapurogamāḥ
देवेश्वर का हाथ पकड़कर उस उत्तम रथ पर आरोहण किया। रुद्र के पार्षद, जो नन्दीश्वर को आगे किये हुए थे,
श्लोक 41 (skanda.8.169.41)
शंकुकर्णपुरोगाश्च ये च चण्डेश्वरादयः । गणेश्वरा महायोगास्त्र्यक्षाः पट्टिशपाणयः
śaṁkukarṇapurogāśca ye ca caṇḍeśvarādayaḥ | gaṇeśvarā mahāyogāstryakṣāḥ paṭṭiśapāṇayaḥ
शंकुकर्ण को आगे किये हुए तथा चण्डेश्वर आदि, महायोगी गणेश्वर, त्र्यक्ष, पट्टिशधारी,
श्लोक 42 (skanda.8.169.42)
नानाशस्त्रप्रहरणा नानायुद्धविशारदाः । नानाभरणवस्त्राश्च नानाविद्याविशारदाः
nānāśastrapraharaṇā nānāyuddhaviśāradāḥ | nānābharaṇavastrāśca nānāvidyāviśāradāḥ
नाना शस्त्र-अस्त्रधारी, नाना युद्ध में निपुण, नाना आभूषण-वस्त्रधारी, नाना विद्याओं में निपुण,
श्लोक 43 (skanda.8.169.43)
वादयन्तः समं वाद्यान् भेरीशंखस्वनान् बहून् । आजग्मुर्गणमुख्यास्ते सहस्राणि चतुर्द्दश
vādayantaḥ samaṁ vādyān bherīśaṁkhasvanān bahūn | ājagmurgaṇamukhyāste sahasrāṇi caturddaśa
साथ ही बहुत से भेरी-शंख की ध्वनि से युक्त वाद्य बजाते हुए, वे चौदह सहस्र प्रमुख गण वहाँ आये।
श्लोक 44 (skanda.8.169.44)
नानाविधानां पुष्पाणामुपरिष्टात् सहस्रशः । निपेतुर्वृष्टयो मूर्ध्नि रथस्थस्य पिनाकिनः
nānāvidhānāṁ puṣpāṇāmupariṣṭāt sahasraśaḥ | nipeturvṛṣṭayo mūrdhni rathasthasya pinākinaḥ
नाना प्रकार के फूलों की सहस्रों वर्षाएँ रथस्थ पिनाकधारी के मस्तक पर ऊपर से गिरने लगीं।
श्लोक 45 (skanda.8.169.45)
स्वयमेव च वाद्यानि विनेदुः सर्वतोदिशम् । रथे युक्ताश्च ते सर्वे देवदेवस्य शूलिनः
svayameva ca vādyāni vineduḥ sarvatodiśam | rathe yuktāśca te sarve devadevasya śūlinaḥ
वाद्य स्वयं ही सब दिशाओं में बज उठे; और रथ में जुते हुए वे सभी देवदेव शूलधारी के,
श्लोक 46 (skanda.8.169.46)
अशक्ता भारमुद्वोढुं मुमुहुर्देवता भृशम् । ततस्तान्देवदेवेशो ज्ञात्वा मूढान् दिवौकसः
aśaktā bhāramudvoḍhuṁ mumuhurdevatā bhṛśam | tatastāndevadeveśo jñātvā mūḍhān divaukasaḥ
भार वहन करने में असमर्थ होकर देवता अत्यन्त मोहित हो गये; तब देवदेवेश ने उन मोहित देवताओं को जानकर,
श्लोक 47 (skanda.8.169.47)
सहनीयं वपुश्चक्रे सुरास्ते मुमुहुस्ततः । अथास्मिन्नन्तरे व्यास नारदो भगवान्मुनिः
sahanīyaṁ vapuścakre surāste mumuhustataḥ | athāsminnantare vyāsa nārado bhagavānmuniḥ
अपने शरीर को वहन-योग्य बना दिया, और देवता तब मोहमुक्त हो गये। इसी बीच, हे व्यास! भगवान् मुनि नारद,
श्लोक 48 (skanda.8.169.48)
जगाम त्रिपुरं शीघ्रं विश्वकर्मदिदृक्षया । अथागतमृषिं दृष्ट्वा विश्वकर्मा मयस्तदा
jagāma tripuraṁ śīghraṁ viśvakarmadidṛkṣayā | athāgatamṛṣiṁ dṛṣṭvā viśvakarmā mayastadā
विश्वकर्मा को देखने की इच्छा से शीघ्र त्रिपुर गये। तब आये हुए उस ऋषि को देखकर विश्वकर्मा मय ने उस समय,
श्लोक 49 (skanda.8.169.49)
संपूज्य परया भक्त्या ननाम मुनिसत्तमम् । स दत्त्वा ह्याशिषस्तस्मै वेत्रासन उपाविशत्
saṁpūjya parayā bhaktyā nanāma munisattamam | sa dattvā hyāśiṣastasmai vetrāsana upāviśat
परम भक्ति से पूजा करके मुनिश्रेष्ठ को प्रणाम किया; उसे आशीर्वाद देकर नारद बेंत के आसन पर बैठ गये।
श्लोक 50 (skanda.8.169.50)
उपविश्यासने तस्मिन्मयमाह महामुनिः । प्रसाद्य दैवतैस्सर्वेरेष देवो वृषध्वजः
upaviśyāsane tasminmayamāha mahāmuniḥ | prasādya daivataissarvereṣa devo vṛṣadhvajaḥ
उस आसन पर बैठकर महामुनि ने मय से कहा - 'यह देव वृषभध्वज, जो समस्त देवताओं द्वारा प्रसन्न किया गया है,
श्लोक 51 (skanda.8.169.51)
आनीतस्त्रिपुरं हन्तुमत्र यत्साधु तत्कुरु । रथं देवमयं दिव्यं समारुह्य जगत्पतिः
ānītastripuraṁ hantumatra yatsādhu tatkuru | rathaṁ devamayaṁ divyaṁ samāruhya jagatpatiḥ
त्रिपुर का वध करने के लिये यहाँ लाया गया है; जो उचित हो वह करो। सर्वदेवमय दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर जगत्पति,
श्लोक 52 (skanda.8.169.52)
ब्रह्माणं सारथिं कृत्वा स्वयमायाति शङ्करः । नारदस्य वचः श्रुत्वा स तदा दानवाधिपः
brahmāṇaṁ sārathiṁ kṛtvā svayamāyāti śaṅkaraḥ | nāradasya vacaḥ śrutvā sa tadā dānavādhipaḥ
ब्रह्मा को सारथी बनाकर स्वयं आ रहे हैं शंकर।' नारद के वचन सुनकर, दानवाधिप ने तब,
श्लोक 53 (skanda.8.169.53)
तारकाक्षं समाहूय विद्युन्मालिनमेव च । तथान्यानसुरान् भ्रातॄन् बाणनेमिपुरस्सरान्
tārakākṣaṁ samāhūya vidyunmālinameva ca | tathānyānasurān bhrātṝn bāṇanemipurassarān
तारकाक्ष और विद्युन्माली को बुलाकर, तथा अन्य असुर भाइयों को, बाण और नेमि आदि को आगे करके,
श्लोक 54 (skanda.8.169.54)
नारदेन यदाख्यातं सर्वमश्रावयत्तदा । तच्छ्रुत्वा दैत्यराजस्तु तारकाक्षोब्रवीदिदम्
nāradena yadākhyātaṁ sarvamaśrāvayattadā | tacchrutvā daityarājastu tārakākṣobravīdidam
नारद ने जो कुछ कहा था, वह सब सुनाया। उसे सुनकर दैत्यराज तारकाक्ष ने यह कहा -
श्लोक 55 (skanda.8.169.55)
न तवास्ति समः कश्चित् त्रैलोक्ये सुरपुङ्गव । योधयेन्निर्भयो यस्त्वां चिन्तां त्वं मय मा कृथाः
na tavāsti samaḥ kaścit trailokye surapuṅgava | yodhayennirbhayo yastvāṁ cintāṁ tvaṁ maya mā kṛthāḥ
'हे सुरपुंगव! त्रैलोक्य में तुम्हारे समान कोई नहीं है; जो तुमसे लड़े वह निर्भय होकर लड़े। तुम मय, चिन्ता मत करो।
श्लोक 56 (skanda.8.169.56)
किमत्र चिन्त्यते राजन् सर्वेवध्या यदा वयम् । कस्य तत्त्रिपुरं हन्तुं शक्तिर्विद्येत दानव
kimatra cintyate rājan sarvevadhyā yadā vayam | kasya tattripuraṁ hantuṁ śaktirvidyeta dānava
हे राजन्! यहाँ चिन्ता किस बात की, जब हम सब अवध्य हैं? हे दानव! उस त्रिपुर को नष्ट करने की शक्ति किसमें है?
श्लोक 57 (skanda.8.169.57)
संगत्य दैवतास्सर्वे यदि योद्धुमिहागताः । पश्य तान्निहतानद्य मयैवैकेन दैत्यप
saṁgatya daivatāssarve yadi yoddhumihāgatāḥ | paśya tānnihatānadya mayaivaikena daityapa
यदि सब देवता मिलकर यहाँ युद्ध करने आयें भी, तो देखो, हे दैत्यप! उन्हें आज मैं अकेला ही मार डालूँगा।
श्लोक 58 (skanda.8.169.58)
दुर्बलः कुरुते भेदं दानं सान्त्वमथापि वा । प्रणामं ज्यायसः शत्रोर्वयन्तु बलिनः सदा
durbalaḥ kurute bhedaṁ dānaṁ sāntvamathāpi vā | praṇāmaṁ jyāyasaḥ śatrorvayantu balinaḥ sadā
दुर्बल ही भेद, दान, साम अथवा प्रबल शत्रु के प्रति प्रणाम करता है; परन्तु हम सदा बलवान् ही हैं।
श्लोक 59 (skanda.8.169.59)
दुर्बलस्य रिपोर्दण्डो बलिना विजिगीषता । कर्तव्यो विक्रमैणेति प्राह शुक्रस्तदा गुरुः
durbalasya ripordaṇḍo balinā vijigīṣatā | kartavyo vikramaiṇeti prāha śukrastadā guruḥ
दुर्बल शत्रु का दण्ड विजय चाहनेवाले बलवान् द्वारा पराक्रम से ही किया जाना चाहिये' - ऐसा हमारे गुरु शुक्र ने पहले कहा था।
श्लोक 60 (skanda.8.169.60)
तद्वयं बलिनो दैत्या हीनाश्च त्रिदिवौकसः । हत्वा दण्डेन तान् सर्वान् स्थास्यामो निर्वृताः सुखम्
tadvayaṁ balino daityā hīnāśca tridivaukasaḥ | hatvā daṇḍena tān sarvān sthāsyāmo nirvṛtāḥ sukham
इसलिये हम बलवान् दैत्य, दण्ड से उन क्षीण त्रिदिवौकसों को मारकर सुखपूर्वक निर्भय होकर रहेंगे।'
श्लोक 61 (skanda.8.169.61)
तारकाक्षवचः श्रुत्वा विद्युन्माली वचोब्रवीत् । ममाप्येतदतीवेष्टं राज्ञोस्य वचनं शुभम्
tārakākṣavacaḥ śrutvā vidyunmālī vacobravīt | mamāpyetadatīveṣṭaṁ rājñosya vacanaṁ śubham
तारकाक्ष के वचन सुनकर विद्युन्माली ने यह वचन कहा - 'मुझे भी यह अत्यन्त प्रिय है - हमारे राजा का यह शुभ वचन।
श्लोक 62 (skanda.8.169.62)
न शक्ता योद्धुमस्माभिर्देवता बलवर्जिताः । ते चेद्योत्स्यन्ति संमूढाः प्रयास्यन्ति ततः क्षयम्
na śaktā yoddhumasmābhirdevatā balavarjitāḥ | te cedyotsyanti saṁmūḍhāḥ prayāsyanti tataḥ kṣayam
बल से रहित देवता हमसे युद्ध करने में समर्थ नहीं हैं; यदि वे मूढ़ होकर युद्ध करेंगे भी, तो वे नाश को प्राप्त होंगे।
श्लोक 63 (skanda.8.169.63)
अन्योन्यन्तु वयं युद्धादुपायं तेषु युञ्ज्महे । युद्धे नैव सदा दैत्याः प्राप्नुवन्ति जयं परम्
anyonyantu vayaṁ yuddhādupāyaṁ teṣu yuñjmahe | yuddhe naiva sadā daityāḥ prāpnuvanti jayaṁ param
अपितु हम आपस में उनके प्रति युद्ध का उपाय सोचें; क्योंकि दैत्य सदा युद्ध में ही परम विजय प्राप्त नहीं करते।
श्लोक 64 (skanda.8.169.64)
अद्य हत्वा सुरान्सर्वान् कुरु राज्यं त्रिविष्टपे । त्रैलोक्यं निर्वृतो भुंक्ष्व त्वमिन्द्रो भव विश्वकृत्
adya hatvā surānsarvān kuru rājyaṁ triviṣṭape | trailokyaṁ nirvṛto bhuṁkṣva tvamindro bhava viśvakṛt
आज समस्त देवताओं को मारकर स्वर्ग में राज्य करो; निर्भय होकर त्रैलोक्य को भोगो, तुम स्वयं इन्द्र बनो, विश्वकर्ता।
श्लोक 65 (skanda.8.169.65)
सप्तलोकेश्वरं त्वद्य पश्यामस्त्वां पुरन्दरम् । हिरण्यकशिपुं स्मृत्वा हिरण्याक्षं च दैत्यप
saptalokeśvaraṁ tvadya paśyāmastvāṁ purandaram | hiraṇyakaśipuṁ smṛtvā hiraṇyākṣaṁ ca daityapa
हम आज तुम्हें सप्तलोकों के स्वामी पुरन्दर के रूप में देखेंगे। हे दैत्यप! हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष का स्मरण करके,
श्लोक 66 (skanda.8.169.66)
भोक्तारौ जगतो राज्यं त्वं प्रयाहि तयोर्गतिम् । ततः श्रुत्वा मयो व्यास विद्युन्मालिविभाषितम्
bhoktārau jagato rājyaṁ tvaṁ prayāhi tayorgatim | tataḥ śrutvā mayo vyāsa vidyunmālivibhāṣitam
जगत् के राज्य के दोनों भोक्ता बनो - उन्हीं की गति को प्राप्त करो।' तब, हे व्यास! विद्युन्माली के इस कथन को सुनकर मय ने,
श्लोक 67 (skanda.8.169.67)
नैतदेवमिति प्राह कम्पयन्नसकृच्छिरः । यस्तुल्यः स्वबले शत्रुर्हीनो वा दैत्यपुङ्गवाः
naitadevamiti prāha kampayannasakṛcchiraḥ | yastulyaḥ svabale śatrurhīno vā daityapuṅgavāḥ
बार-बार सिर हिलाते हुए कहा - 'यह ऐसा नहीं है। जो शत्रु अपने बल के समान हो, या हीन हो, हे दैत्यपुंगवो!
श्लोक 68 (skanda.8.169.68)
बले वा यो भवेज्ज्यायानेकजातिवपुर्धराः । बुधास्तस्मिन् प्रयुञ्जन्ति तदुपायचतुष्टयम्
bale vā yo bhavejjyāyānekajātivapurdharāḥ | budhāstasmin prayuñjanti tadupāyacatuṣṭayam
अथवा जो बल में अधिक हो - एकजाति (मानवादि) शरीरधारी बुद्धिमान् लोग उसके प्रति चतुर्विध उपाय का प्रयोग करते हैं।
श्लोक 69 (skanda.8.169.69)
समा दिवौकसोस्माकं बलेनासुरपुङ्गवाः । तैर्देवैः सार्धमस्माकं युक्तं सामादियोजनम्
samā divaukasosmākaṁ balenāsurapuṅgavāḥ | tairdevaiḥ sārdhamasmākaṁ yuktaṁ sāmādiyojanam
हे असुरपुंगवो! देवगण बल में हमारे समान हैं; उन देवताओं के साथ हमें साम-सन्धि करना ही युक्त है।
श्लोक 70 (skanda.8.169.70)
य एष भगवानीशः सर्वभूतेश्वरेश्वरः । अस्माकं देवतानाञ्च स्रष्टा हर्ता च स प्रभुः
ya eṣa bhagavānīśaḥ sarvabhūteśvareśvaraḥ | asmākaṁ devatānāñca sraṣṭā hartā ca sa prabhuḥ
परन्तु यह जो भगवान् ईश हैं, वे सर्वभूतेश्वरों के भी ईश्वर हैं; हमारे और देवताओं के, दोनों के ही, वे स्रष्टा और संहर्ता, वे प्रभु हैं।
श्लोक 71 (skanda.8.169.71)
स हन्तुं स्वयमायाति उपायस्तस्य कीदृशः । प्रणामः संश्रयश्चैव गुणोपायौ कपर्दिनः
sa hantuṁ svayamāyāti upāyastasya kīdṛśaḥ | praṇāmaḥ saṁśrayaścaiva guṇopāyau kapardinaḥ
वे स्वयं ही हमें मारने आ रहे हैं, उनके प्रति कैसा उपाय हो सकता है? प्रणाम और शरणागति ही कपर्दी के दो साधन हैं -
श्लोक 72 (skanda.8.169.72)
द्वाविमौ साधने तस्य प्रयोज्याविति मे मतिः । यदि कार्कश्यमास्थाय योधयामः पिनाकिनम्
dvāvimau sādhane tasya prayojyāviti me matiḥ | yadi kārkaśyamāsthāya yodhayāmaḥ pinākinam
यही दोनों, मेरी सम्मति में, उन्हें साधने के लिये प्रयुक्त करने चाहिये। यदि हम कठोरता का आश्रय लेकर पिनाकधारी से युद्ध करेंगे,
श्लोक 73 (skanda.8.169.73)
तस्य जिह्मेक्षितेनैव निहताः स्म ततोसुराः । ब्रह्माद्याः शरणं शम्भुमर्दिता यान्ति शान्तये
tasya jihmekṣitenaiva nihatāḥ sma tatosurāḥ | brahmādyāḥ śaraṇaṁ śambhumarditā yānti śāntaye
तो उनकी तिरछी दृष्टि मात्र से ही हम असुर मारे जायेंगे; ब्रह्मादि भी पीड़ित होने पर शान्ति के लिये शम्भु की ही शरण जाते हैं।
श्लोक 74 (skanda.8.169.74)
योभियुक्तः स्वयं तेन शरणं तस्य को भवेत् । यस्य सर्वमिदं दैत्या ब्रह्मादि प्रथितं जगत्
yobhiyuktaḥ svayaṁ tena śaraṇaṁ tasya ko bhavet | yasya sarvamidaṁ daityā brahmādi prathitaṁ jagat
जो स्वयं उन्हीं के द्वारा आक्रान्त हो, उसकी शरण कौन हो सकता है? हे दैत्यो! जिनका यह सब कुछ है, ब्रह्मादि से विख्यात यह सारा जगत्,
श्लोक 75 (skanda.8.169.75)
अभिध्यानात् क्षणेनैव प्रणश्येत भवेदपि । यो हेतुरपवर्गस्य कारणं जगतश्च यः
abhidhyānāt kṣaṇenaiva praṇaśyeta bhavedapi | yo heturapavargasya kāraṇaṁ jagataśca yaḥ
वह उनके मात्र संकल्प से क्षणमात्र में नष्ट हो सकता है। जो मोक्ष के हेतु हैं, और जो जगत् के भी कारण हैं,
श्लोक 76 (skanda.8.169.76)
कीदृशं तेन युद्धं नो देवदेवेन शम्भुना । किन्न वेत्थ शिशुप्रज्ञा लोष्टुगिर्योर्यदन्तरम्
kīdṛśaṁ tena yuddhaṁ no devadevena śambhunā | kinna vettha śiśuprajñā loṣṭugiryoryadantaram
उन देवदेव शम्भु के साथ हमारा कैसा युद्ध हो सकता है? क्या तुम शिशु-बुद्धि से भी नहीं जानते कि ढेले और पर्वत में कितना अन्तर है?
श्लोक 77 (skanda.8.169.77)
भवन्तो लोष्टवो भूत्वा गिरिकल्पमुमापतिम् । ईप्सध्वे मोहिता युद्धे कालपाशेन यन्त्रिताः
bhavanto loṣṭavo bhūtvā girikalpamumāpatim | īpsadhve mohitā yuddhe kālapāśena yantritāḥ
तुम मोहित होकर, ढेले बनकर, पर्वततुल्य उमापति से युद्ध की इच्छा करते हो - मानो कालपाश से बँधे हुए हो।
श्लोक 78 (skanda.8.169.78)
अहं भक्तो महादेवं जाने तस्य बलान्तरम् । स प्रणाममुपस्थास्ये न योत्स्ये शम्भुना सह
ahaṁ bhakto mahādevaṁ jāne tasya balāntaram | sa praṇāmamupasthāsye na yotsye śambhunā saha
मैं महादेव का भक्त हूँ, उनके बल के अन्तर को जानता हूँ। मैं उनके सामने प्रणाम करने जाऊँगा, शम्भु से युद्ध नहीं करूँगा।
श्लोक 79 (skanda.8.169.79)
यदि यूयमपि प्राज्ञा मम शुश्रूषवो यदि । मा कृढ्वं शम्भुना युद्धं गच्छध्वं शरणं शिवम्
yadi yūyamapi prājñā mama śuśrūṣavo yadi | mā kṛḍhvaṁ śambhunā yuddhaṁ gacchadhvaṁ śaraṇaṁ śivam
यदि तुम भी प्राज्ञ हो, यदि मेरी बात सुनना चाहते हो, तो शम्भु से युद्ध मत करो, शिव की शरण में जाओ।'
श्लोक 80 (skanda.8.169.80)
तमेवं वादिनं श्रुत्वा विश्वकर्माणमूर्जितम् । नारदो भगवान् प्राह दानवान्तकरं वचः
tamevaṁ vādinaṁ śrutvā viśvakarmāṇamūrjitam | nārado bhagavān prāha dānavāntakaraṁ vacaḥ
इस प्रकार कहते हुए उस प्रबल विश्वकर्मा को सुनकर, भगवान् नारद ने दानवों का अन्त करनेवाला यह वचन कहा -
श्लोक 81 (skanda.8.169.81)
विश्वकर्मन् यत्त्वयेद मुक्त विस्तरशोर्थवत् । सर्वं युक्तमिदं किन्तु कालोयं नास्य वर्तते
viśvakarman yattvayeda mukta vistaraśorthavat | sarvaṁ yuktamidaṁ kintu kāloyaṁ nāsya vartate
'हे विश्वकर्मन्! तुमने जो विस्तार से और यथार्थ रूप से कहा, वह सब युक्तियुक्त है, परन्तु अब इसका समय नहीं है।
श्लोक 82 (skanda.8.169.82)
भवतां तत्तपः क्षीणमैश्वर्यं भुक्तमेव च । क्लीबतामपि कुर्वन्तो यूयं नक्ष्यथ दानवाः
bhavatāṁ tattapaḥ kṣīṇamaiśvaryaṁ bhuktameva ca | klībatāmapi kurvanto yūyaṁ nakṣyatha dānavāḥ
तुम्हारा वह तप क्षीण हो गया है, और ऐश्वर्य भी भोगा जा चुका है; कायरता करते हुए भी तुम दानव नष्ट ही होगे।
श्लोक 83 (skanda.8.169.83)
वृतः सर्वामरैः शम्भुर्वधार्थं भवतामिह । प्रणतानप्यसौ युष्माँस्तत्प्रियार्थं निहंस्यति
vṛtaḥ sarvāmaraiḥ śambhurvadhārthaṁ bhavatāmiha | praṇatānapyasau yuṣmā~statpriyārthaṁ nihaṁsyati
समस्त अमरों से घिरे हुए शम्भु यहाँ तुम्हारे वध के लिये ही आये हैं; प्रणत होने पर भी वे तुम्हें उनकी (देवताओं की) प्रसन्नता के लिये मार डालेंगे।
श्लोक 84 (skanda.8.169.84)
कथं दनुसुता भूत्वा राजानो बलदर्पिताः । भीता मृत्युं जिगीषध्वं कृपणा इव दानवाः
kathaṁ danusutā bhūtvā rājāno baladarpitāḥ | bhītā mṛtyuṁ jigīṣadhvaṁ kṛpaṇā iva dānavāḥ
दनु के पुत्र, बलदर्पित राजा होकर, तुम भयभीत होकर कृपण दानवों की भाँति मृत्यु से बचना क्यों चाहते हो?
श्लोक 85 (skanda.8.169.85)
प्राप्स्यथाधिकमैश्वर्यं त्यक्ष्यथासून् रणे यदि । विना युद्धं विपन्नानामशुभा वो गतिर्भवेत्
prāpsyathādhikamaiśvaryaṁ tyakṣyathāsūn raṇe yadi | vinā yuddhaṁ vipannānāmaśubhā vo gatirbhavet
यदि रणभूमि में प्राण त्यागोगे तो अधिक ऐश्वर्य प्राप्त करोगे; परन्तु बिना युद्ध किये मरनेवालों की गति अशुभ होती है।
श्लोक 86 (skanda.8.169.86)
अपि चेद्यदि हन्येध्वं देवदेवेन शूलिना । प्रमथेन्द्रास्ततो यूयं भविष्यथ न संशयः
api cedyadi hanyedhvaṁ devadevena śūlinā | pramathendrāstato yūyaṁ bhaviṣyatha na saṁśayaḥ
और यदि तुम देवदेव शूलधारी द्वारा मारे भी जाओगे, तो निःसन्देह प्रमथेन्द्र बनोगे।
श्लोक 87 (skanda.8.169.87)
गुणं सन्धिगतं नास्ति युष्माकं देवतैस्सह । विग्रहे वो मतिर्युक्ता सा च व्यक्ता वयं च वः
guṇaṁ sandhigataṁ nāsti yuṣmākaṁ devataissaha | vigrahe vo matiryuktā sā ca vyaktā vayaṁ ca vaḥ
देवताओं के साथ सन्धि में तुम्हारे लिये कोई लाभ नहीं है; तुम्हारे लिये विग्रह (युद्ध) ही उचित मति है - यह स्पष्ट है, और हम भी तुम्हारे साथ हैं।
श्लोक 88 (skanda.8.169.88)
शौर्येण भवतां प्रीतः कदाचिद् वृषभध्वजः । भवेद्वरप्रदो दैत्याः श्रेयान् वस्तेन विक्रमः
śauryeṇa bhavatāṁ prītaḥ kadācid vṛṣabhadhvajaḥ | bhavedvaraprado daityāḥ śreyān vastena vikramaḥ
शौर्य से प्रसन्न होकर कदाचित् वृषभध्वज तुम्हें वरदाता भी हो सकते हैं, हे दैत्यो! तुम्हारे लिये पराक्रम ही श्रेयस्कर है।
श्लोक 89 (skanda.8.169.89)
करिष्यामि च वो रक्षां शस्त्राघातनिषेधनीम् । उत्तिष्ठत दनोः पुत्रा विजयाय युयुत्सया
kariṣyāmi ca vo rakṣāṁ śastrāghātaniṣedhanīm | uttiṣṭhata danoḥ putrā vijayāya yuyutsayā
और मैं शस्त्राघात को रोकनेवाली रक्षा भी तुम्हारे लिये करूँगा। हे दनु के पुत्रो! विजय के लिये युयुत्सा से उठो!'
श्लोक 90 (skanda.8.169.90)
नारदस्य वचः श्रुत्वा तारकाक्षो महाबलः । विद्युन्माली च दैत्येन्द्रा बाणाद्याश्च महासुराः
nāradasya vacaḥ śrutvā tārakākṣo mahābalaḥ | vidyunmālī ca daityendrā bāṇādyāśca mahāsurāḥ
नारद के वचन सुनकर, महाबली तारकाक्ष, विद्युन्माली और अन्य दैत्येन्द्र, तथा बाण आदि महासुर,
श्लोक 91 (skanda.8.169.91)
कालपाशार्दिता मूढाः क्षीणपुण्या गतायुषः । साध्वेतच्छोभनं प्रोक्तं नारदेनेति तेब्रुवन्
kālapāśārditā mūḍhāḥ kṣīṇapuṇyā gatāyuṣaḥ | sādhvetacchobhanaṁ proktaṁ nāradeneti tebruvan
कालपाश से पीड़ित, मोहित, क्षीणपुण्य, आयुहीन होकर बोले - 'यह अच्छा और शोभन है जो नारद ने कहा।'
श्लोक 92 (skanda.8.169.92)
मयोपि तद्वचो बुदध्वा ज्ञात्वा नाशमुपस्थितम् । शोभनं नारदेनोक्तमिति वाक्यमुवाच ह
mayopi tadvaco budadhvā jñātvā nāśamupasthitam | śobhanaṁ nāradenoktamiti vākyamuvāca ha
मय ने भी उस वचन को समझकर, विनाश निकट जानकर, 'नारद ने शोभन कहा है' - ऐसा वाक्य कहा।
श्लोक 93 (skanda.8.169.93)
नारदोपि ततो हृष्टो रक्षां बद्ध्वा तु मायया । युयुत्सूनसुरान् कृत्वा ययौ शर्वरथं प्रति
nāradopi tato hṛṣṭo rakṣāṁ baddhvā tu māyayā | yuyutsūnasurān kṛtvā yayau śarvarathaṁ prati
नारद भी तब हर्षित होकर, माया से रक्षा बाँधकर, असुरों को युयुत्सु बनाकर, शर्व के रथ की ओर चले गये।
श्लोक 94 (skanda.8.169.94)
ततस्ते दानवाः सर्वे युद्धाय कृतनिश्चयाः । नानाप्रहरणोपेता बभूवुर्युद्धलिप्सवः
tataste dānavāḥ sarve yuddhāya kṛtaniścayāḥ | nānāpraharaṇopetā babhūvuryuddhalipsavaḥ
तब वे सभी दानव युद्ध के लिये निश्चय करके, नाना प्रहरणों से युक्त होकर युद्धेच्छुक हो गये।
श्लोक 95 (skanda.8.169.95)
तरकाक्षो बलो बाणो विद्युन्माली च दानवः । सन्नह्य सहिताः सर्वे राजानस्तस्थुरग्रतः
tarakākṣo balo bāṇo vidyunmālī ca dānavaḥ | sannahya sahitāḥ sarve rājānastasthuragrataḥ
तारकाक्ष, बल, बाण और दानव विद्युन्माली, सब सन्नद्ध होकर, वे राजा आगे खड़े हुए।
श्लोक 96 (skanda.8.169.96)
अवाद्यन्त ततः शंखास्तूर्याणि च सहस्रशः । दानवानां बले घोरे कातराणां भयप्रदे
avādyanta tataḥ śaṁkhāstūryāṇi ca sahasraśaḥ | dānavānāṁ bale ghore kātarāṇāṁ bhayaprade
तब दानवों की उस भयंकर सेना में, कातरों को भय देनेवाले सहस्रों शंख और तूर्य बज उठे।
श्लोक 97 (skanda.8.169.97)
सरथोयमिहायाति असावन्यः प्रदृश्यते । कथमागत इत्येवं वचांस्यूचुः परस्परम्
sarathoyamihāyāti asāvanyaḥ pradṛśyate | kathamāgata ityevaṁ vacāṁsyūcuḥ parasparam
'यह रथ सहित यहाँ आ रहा है, यह दूसरा दिखायी देता है - यह कैसे आया?' - इस प्रकार वे परस्पर वचन कहने लगे।
श्लोक 98 (skanda.8.169.98)
विगतभयविषादास्त्रैपुरा दैत्यसंघाः प्रकुपितवदनास्ते युद्धसज्जा बभूवुः । प्रहरणवरहस्तास्तं रथं वीक्षमाणाः पशव इव मखाग्नेरन्वगच्छन् समीपम्
vigatabhayaviṣādāstraipurā daityasaṁghāḥ prakupitavadanāste yuddhasajjā babhūvuḥ | praharaṇavarahastāstaṁ rathaṁ vīkṣamāṇāḥ paśava iva makhāgneranvagacchan samīpam
भय और विषाद से रहित त्रिपुर के दैत्यसंघ, क्रुद्ध मुखवाले, युद्ध के लिये सज्ज हो गये; श्रेष्ठ शस्त्र हाथों में लिये, उस रथ को देखते हुए, वे यज्ञाग्नि के समीप पशुओं के समान उसके निकट चले गये।