अम्बिका खण्ड · अध्याय 170
त्रिपुरदहन
श्लोक 1 (skanda.8.170.1)
सनत्कुमार उवाच । अथाभ्यगात् पश्चिमसागरस्य मूर्ध्नि स्थितन्तत्त्रिपुरं रथोसौ । नानापताकोज्ज्वलचित्रमौलिर्हैमोपलो मेरुरिवाद्रिराजः
sanatkumāra uvāca | athābhyagāt paścimasāgarasya mūrdhni sthitantattripuraṁ rathosau | nānāpatākojjvalacitramaulirhaimopalo merurivādrirājaḥ
सनत्कुमार ने कहा - तब वह रथ पश्चिम सागर के शिखर पर स्थित उस त्रिपुर की ओर बढ़ा, जो अनेक पताकाओं से उज्ज्वल, चित्रित शिखरवाला, स्वर्ण-पाषाणमय, पर्वतराज मेरु के समान था।
श्लोक 2 (skanda.8.170.2)
ते वीक्ष्य दुर्गं त्रिपुरं गणेशा नन्दीशचण्डीशमुखाः सुयत्ताः । नादं प्रचक्रुः सहिताः प्रवीरा युयुत्सवो दानवराजसिंहैः
te vīkṣya durgaṁ tripuraṁ gaṇeśā nandīśacaṇḍīśamukhāḥ suyattāḥ | nādaṁ pracakruḥ sahitāḥ pravīrā yuyutsavo dānavarājasiṁhaiḥ
उस दुर्गम त्रिपुर को देखकर, नन्दीश-चण्डीश आदि प्रमुख गणेश्वर, सुसज्जित होकर, दानवराज-सिंहों से युद्ध की इच्छा से वे वीर मिलकर सिंहनाद करने लगे।
श्लोक 3 (skanda.8.170.3)
चण्डेश्वरश्चण्डवपुर्महात्मा ज्वलत्प्रदीप्तोग्रकुठारपाणिः । व्यादाय वक्त्रं पुरतः स्थितोभूद् देवस्य शम्भोः प्रमथेन्द्रवीरः
caṇḍeśvaraścaṇḍavapurmahātmā jvalatpradīptograkuṭhārapāṇiḥ | vyādāya vaktraṁ purataḥ sthitobhūd devasya śambhoḥ pramathendravīraḥ
चण्डेश्वर, भीषण शरीरवाला, महात्मा, प्रज्वलित भयंकर कुठार हाथ में लिये, मुख फैलाये, देव शम्भु के सामने खड़ा हुआ, वह प्रमथेन्द्रों का वीर।
श्लोक 4 (skanda.8.170.4)
दीप्तं त्रिशूलं परिगृह्य नन्दी त्र्यक्षः प्रतस्थे हरतुल्यवर्ष्मा । पार्श्वे स्थितोभूत् स च शंकुकर्णः प्रगृह्य दीप्तं मुशलं गजेन्द्रः
dīptaṁ triśūlaṁ parigṛhya nandī tryakṣaḥ pratasthe haratulyavarṣmā | pārśve sthitobhūt sa ca śaṁkukarṇaḥ pragṛhya dīptaṁ muśalaṁ gajendraḥ
नन्दी, प्रज्वलित त्रिशूल लेकर, त्र्यक्ष, हर के समान शरीरवाला, आगे बढ़ा; और उसके पार्श्व में शंकुकर्ण गजेन्द्र, प्रज्वलित मुशल लेकर खड़ा हुआ।
श्लोक 5 (skanda.8.170.5)
भृङ्गिर्हरात्मा स च वीरभद्रस्तथा गणेन्द्राः शतशः प्रवीराः । वज्रत्रिशूलासिभुशुण्डिहस्ता युयुत्सवस्तस्थुरुपेतहर्षाः
bhṛṅgirharātmā sa ca vīrabhadrastathā gaṇendrāḥ śataśaḥ pravīrāḥ | vajratriśūlāsibhuśuṇḍihastā yuyutsavastasthurupetaharṣāḥ
हरस्वरूप भृंगी, तथा वीरभद्र भी, तथा सैकड़ों अन्य वीर गणेश्वर, वज्र-त्रिशूल-खड्ग-भुशुण्डि हाथों में लिये, युद्धेच्छुक होकर हर्षपूर्वक खड़े हुए।
श्लोक 6 (skanda.8.170.6)
समागतं तं रथमीक्ष्य दैत्या युद्धाय निर्जग्मुरुपेतमोहाः । ते तारकाक्षप्रमुखाः सुवीरा सन्नह्य नानायुधदीप्तहस्ताः
samāgataṁ taṁ rathamīkṣya daityā yuddhāya nirjagmurupetamohāḥ | te tārakākṣapramukhāḥ suvīrā sannahya nānāyudhadīptahastāḥ
उस आये हुए रथ को देखकर, मोहग्रस्त दैत्य युद्ध के लिये निकल पड़े; तारकाक्ष आदि वे सुवीर, सन्नद्ध होकर, नाना आयुधों से दीप्त हाथोंवाले,
श्लोक 7 (skanda.8.170.7)
सार्धं गणेन्द्रैः समरं प्रचक्रुर्दनोः सुताः कोपवशं प्रयाताः । देवोपि चन्द्रार्धनिकेतमौलिः शरं न चिक्षेप पुरं प्रदग्धुम्
sārdhaṁ gaṇendraiḥ samaraṁ pracakrurdanoḥ sutāḥ kopavaśaṁ prayātāḥ | devopi candrārdhaniketamauliḥ śaraṁ na cikṣepa puraṁ pradagdhum
गणेन्द्रों के साथ युद्ध करने लगे, दनु के पुत्र क्रोधवश प्रवृत्त होकर; परन्तु देव, अर्धचन्द्र-मुकुटधारी, नगर को भस्म करने के लिये अभी बाण नहीं चला रहे थे,
श्लोक 8 (skanda.8.170.8)
तस्थौ तथैवासकृदात्मना च पश्यन् रणं तद्गणदैत्यपानाम् । ततः स नन्दी गणपैः प्रवीरैरचीकरद्युद्धमदीनसत्वैः
tasthau tathaivāsakṛdātmanā ca paśyan raṇaṁ tadgaṇadaityapānām | tataḥ sa nandī gaṇapaiḥ pravīrairacīkaradyuddhamadīnasatvaiḥ
वे उसी प्रकार खड़े रहे, बार-बार स्वयं उन गणों और दैत्यपतियों के उस युद्ध को देखते हुए। तब नन्दी ने अदीनसत्त्व वीर गणपतियों के साथ युद्ध किया।
श्लोक 9 (skanda.8.170.9)
विव्याध भृङ्गिं दशभिः पृषत्कैर्विद्युत्प्रभः कोपविरक्तनेत्रः । भृङ्गिं समासाद्य शिलीमुखास्ते नाशक्नुवँस्तस्य रुजं प्रकर्तुम्
vivyādha bhṛṅgiṁ daśabhiḥ pṛṣatkairvidyutprabhaḥ kopaviraktanetraḥ | bhṛṅgiṁ samāsādya śilīmukhāste nāśaknuva~stasya rujaṁ prakartum
क्रोध से लाल नेत्रोंवाले विद्युत्प्रभ ने भृंगी को दस बाणों से बींध दिया; भृंगी तक पहुँचकर वे बाण उसे पीड़ा पहुँचाने में असमर्थ रहे।
श्लोक 10 (skanda.8.170.10)
विद्युत्प्रभं भृङ्गिरिटिस्ततोसौ शूलेन दीप्तेन जघान पृष्ठे । स तेन शूलेन हतो जुघूर्ण त्यक्त्वा च भृङ्गिं प्रयययौ भयार्त्तः
vidyutprabhaṁ bhṛṅgiriṭistatosau śūlena dīptena jaghāna pṛṣṭhe | sa tena śūlena hato jughūrṇa tyaktvā ca bhṛṅgiṁ prayayayau bhayārttaḥ
तब भृंगिरिटि ने विद्युत्प्रभ की पीठ में प्रज्वलित शूल से प्रहार किया; उस शूल से आहत होकर वह डगमगाया और भृंगी को छोड़कर भयार्त होकर भाग गया।
श्लोक 11 (skanda.8.170.11)
भग्नस्तथासौ दितिजाधिपेशो भृङ्गिं समुत्सृज्य गणेन्द्रमुख्यम् । विव्याध तीक्ष्णैर्निशितैः पृषत्कैर्विनायकं सप्तभिरंसदेशे
bhagnastathāsau ditijādhipeśo bhṛṅgiṁ samutsṛjya gaṇendramukhyam | vivyādha tīkṣṇairniśitaiḥ pṛṣatkairvināyakaṁ saptabhiraṁsadeśe
इस प्रकार भग्न हुआ वह दितिपुत्रों का अधिपति, गणेन्द्र-प्रमुख भृंगी को छोड़कर, तीक्ष्ण-तेज बाणों से विनायक को कन्धे में सात बाणों से बींध दिया।
श्लोक 12 (skanda.8.170.12)
पुनस्त्रिषष्ट्या दशभिश्च भूयो विद्युत्प्रभस्तं गजराजवक्त्रम् । जघान मर्मस्वभिलब्धलक्ष्य स्ततश्चुकोपास्य विनायकेन्द्रः
punastriṣaṣṭyā daśabhiśca bhūyo vidyutprabhastaṁ gajarājavaktram | jaghāna marmasvabhilabdhalakṣya stataścukopāsya vināyakendraḥ
पुनः त्रेसठ और दस बाणों से, विद्युत्प्रभ ने उस गजराजमुखवाले को मर्मस्थानों में लक्ष्य पाकर बींध दिया; तब उससे विनायकेन्द्र क्रुद्ध हो गया,
श्लोक 13 (skanda.8.170.13)
स पुष्कराग्रेण गजेन्द्रसिंहो ग्रीवां तदा दैत्यपतेर्विवेष्ट्य । उत्पाटयामास शिरः शरीरात पद्मं ह्रदान्नाग इव प्रमत्तः
sa puṣkarāgreṇa gajendrasiṁho grīvāṁ tadā daityapaterviveṣṭya | utpāṭayāmāsa śiraḥ śarīrāta padmaṁ hradānnāga iva pramattaḥ
और वह गजेन्द्रसिंह अपनी सूँड के अग्रभाग से दैत्यपति की गर्दन को लपेटकर उसका सिर शरीर से उखाड़ ले गया, जैसे मत्त हाथी ह्रद से कमल उखाड़ ले।
श्लोक 14 (skanda.8.170.14)
दैत्यस्य कृत्तं शुशुभे शिरस्तद्विन्ध्याचलेन्द्रप्रतिमाच्छरीरात् । सहंसचक्राह्वरुतोपगीताद् ह्रदान्नवोत्खातमिवाशु पद्मम्
daityasya kṛttaṁ śuśubhe śirastadvindhyācalendrapratimāccharīrāt | sahaṁsacakrāhvarutopagītād hradānnavotkhātamivāśu padmam
दैत्य का वह कटा हुआ सिर, विन्ध्याचल के समान उस शरीर से, हंस-चक्रवाकों की ध्वनि से युक्त, ह्रद से नवीन उखड़े हुए कमल के समान शोभित हुआ।
श्लोक 15 (skanda.8.170.15)
ततोपरौ दैत्यपती सुयत्तौ नेमिर्बलश्चान्धकतुल्यकल्पौ । क्रुद्धावुपागम्य हि शंकुकर्णं शिलीमुखैर्विव्यधतुर्गणेन्द्रम्
tatoparau daityapatī suyattau nemirbalaścāndhakatulyakalpau | kruddhāvupāgamya hi śaṁkukarṇaṁ śilīmukhairvivyadhaturgaṇendram
तब दो अन्य दैत्यपति, सुसज्जित, नेमि और बल, अन्धक के समान शक्तिशाली, क्रुद्ध होकर आकर शंकुकर्ण को बाणों से बींधने लगे।
श्लोक 16 (skanda.8.170.16)
तौ शंकुकर्णः प्रसभं निपत्य छिन्नध्वजाश्वौ विरथौ चकार । अन्यौ समारुह्य रथौ पुनुस्तौ भूयस्समागम्य गणप्रवीरम्
tau śaṁkukarṇaḥ prasabhaṁ nipatya chinnadhvajāśvau virathau cakāra | anyau samāruhya rathau punustau bhūyassamāgamya gaṇapravīram
उन दोनों पर बलपूर्वक आक्रमण कर, शंकुकर्ण ने उनके ध्वज-अश्व काटकर उन्हें रथहीन कर दिया; अन्य रथों पर चढ़कर वे दोनों पुनः उस गणवीर के पास आये,
श्लोक 17 (skanda.8.170.17)
तं जघ्नतुर्नैकविधः पृषत्कैर्वज्राभिघातप्रतिमैस्सुतीक्ष्णैः । क्रुद्धस्तदा स प्रसभं गणेन्द्रस्तौ दैत्यराजौ सुचिरं निरीक्ष्य
taṁ jaghnaturnaikavidhaḥ pṛṣatkairvajrābhighātapratimaissutīkṣṇaiḥ | kruddhastadā sa prasabhaṁ gaṇendrastau daityarājau suciraṁ nirīkṣya
और उसे नाना प्रकार से, वज्राघात के समान अत्यन्त तीक्ष्ण बाणों से बींधने लगे; तब क्रुद्ध होकर वह गणेन्द्र, उन दोनों दैत्यराजों को चिरकाल देखकर,
श्लोक 18 (skanda.8.170.18)
दीप्तेन हत्वा मुशलेन वीरौ संप्रेषयामास पुरं यमस्य । अन्ये च दैत्यास्त्रिपुराधिवासाः क्रुद्धा विनिष्क्रम्य गणेन्द्रसिंहैः
dīptena hatvā muśalena vīrau saṁpreṣayāmāsa puraṁ yamasya | anye ca daityāstripurādhivāsāḥ kruddhā viniṣkramya gaṇendrasiṁhaiḥ
प्रज्वलित मुशल से उन दोनों वीरों को मारकर यमपुरी भेज दिया। और अन्य दैत्य, त्रिपुरवासी, क्रुद्ध होकर सिंहतुल्य गणेन्द्रों के विरुद्ध निकल पड़े,
श्लोक 19 (skanda.8.170.19)
नाराचचक्रासिकुठारहस्ता घोरं महद्युद्धमतीव चक्रुः । दैत्याधिपास्ते हरतुल्यकल्पैर्गणेश्वरैः प्राप्तशिवप्रसादैः
nārācacakrāsikuṭhārahastā ghoraṁ mahadyuddhamatīva cakruḥ | daityādhipāste haratulyakalpairgaṇeśvaraiḥ prāptaśivaprasādaiḥ
और नाराच, चक्र, खड्ग, कुठार हाथों में लेकर अत्यन्त घोर महायुद्ध करने लगे। वे दैत्याधिप, हरतुल्य रूपवाले, शिवप्रसाद प्राप्त गणेश्वरों द्वारा,
श्लोक 20 (skanda.8.170.20)
हता बभूवुर्हि गतासवस्तु मृगा यथा केसरिभिर्वनान्ते । प्रभ्रष्टनानायुधवस्त्रहाराश्छिन्नैर्भुजैश्शोणितमुद्वहन्तः
hatā babhūvurhi gatāsavastu mṛgā yathā kesaribhirvanānte | prabhraṣṭanānāyudhavastrahārāśchinnairbhujaiśśoṇitamudvahantaḥ
मारे जाकर प्राणहीन हो गये, जैसे वन के छोर पर सिंहों द्वारा मृग मारे जायें; नाना शस्त्र-वस्त्र-हार गिराते हुए, कटी हुई भुजाओं से रुधिर बहाते हुए,
श्लोक 21 (skanda.8.170.21)
वज्राहता पेतुः समुद्रे गिरिशृङ्गकल्पाः । श्रुत्वाथदैत्यौ बलनेमिसंज्ञौ तौ शकुकर्णेन हतौ प्रसह्य
vajrāhatā petuḥ samudre giriśṛṅgakalpāḥ | śrutvāthadaityau balanemisaṁjñau tau śakukarṇena hatau prasahya
वज्र से आहत होकर [मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं] वे पर्वतशिखरों के समान समुद्र में गिर पड़े। तब यह सुनकर कि बल और नेमि नामक वे दोनों दैत्य शंकुकर्ण द्वारा बलपूर्वक मारे गये हैं,
श्लोक 22 (skanda.8.170.22)
पुराद्विनिष्क्रम्य स तारकाक्षः क्रुद्धो गणेन्द्रं स्वयमभ्यधावत् । तं शंकुकर्णो दितिजाधिपेशं मुञ्चन्तमुग्रं शरवर्षमाशु
purādviniṣkramya sa tārakākṣaḥ kruddho gaṇendraṁ svayamabhyadhāvat | taṁ śaṁkukarṇo ditijādhipeśaṁ muñcantamugraṁ śaravarṣamāśu
तारकाक्ष नगर से निकलकर क्रुद्ध होकर स्वयं गणेन्द्र की ओर दौड़ा; उस दितिजाधिपति पर शंकुकर्ण ने शीघ्र ही उग्र बाणवर्षा छोड़ते हुए,
श्लोक 23 (skanda.8.170.23)
भल्लेन दैत्यं गिरिसन्निकाशं जघान मूर्ध्नि प्रसभं गणेशः । निपत्य किञ्चिन्निहतः स तेन भल्लेन दैत्याधिपतिर्मुमोह
bhallena daityaṁ girisannikāśaṁ jaghāna mūrdhni prasabhaṁ gaṇeśaḥ | nipatya kiñcinnihataḥ sa tena bhallena daityādhipatirmumoha
पर्वततुल्य दैत्य को भल्ल से बलपूर्वक मस्तक पर मारा, वह गणेश; उस भल्ल से आहत होकर कुछ गिरकर दैत्याधिपति मूर्च्छित हो गया।
श्लोक 24 (skanda.8.170.24)
प्रोत्थाय तूर्णं स हि तारकाक्षश्चिक्षेप तस्मै गणपाय चक्रम् । क्रुद्धस्ततोसावभवद् गणेन्द्रस्तं तारकाक्षं स हि शंकुकर्णः
protthāya tūrṇaṁ sa hi tārakākṣaścikṣepa tasmai gaṇapāya cakram | kruddhastatosāvabhavad gaṇendrastaṁ tārakākṣaṁ sa hi śaṁkukarṇaḥ
तुरन्त उठकर तारकाक्ष ने उस गणप पर चक्र फेंका; तब क्रुद्ध होकर वह गणेन्द्र शंकुकर्ण,
श्लोक 25 (skanda.8.170.25)
निपात्य मुष्ट्या प्रजघान मूर्ध्नि समाहतः सोपि जगाम कृच्छ्रम् । जुघूर्ण बभ्राम मुमोह तस्थौ पपात तत्याज वरायुधञ्च
nipātya muṣṭyā prajaghāna mūrdhni samāhataḥ sopi jagāma kṛcchram | jughūrṇa babhrāma mumoha tasthau papāta tatyāja varāyudhañca
मुष्टि से उसे गिराकर मस्तक पर प्रहार किया; आहत होकर वह भी अत्यन्त कष्ट को प्राप्त हुआ - डगमगाया, घूमा, मूर्च्छित हुआ, खड़ा रहा, गिरा, और अपना श्रेष्ठ आयुध त्याग दिया,
श्लोक 26 (skanda.8.170.26)
मुमोच रोषं विरराव तीव्रं ममार पश्चादसुविप्रमुक्तः । दृष्टवा विपन्नं दितिजाधिपेन्द्रं प्रगृह्य दैत्या भवनं मयस्य
mumoca roṣaṁ virarāva tīvraṁ mamāra paścādasuvipramuktaḥ | dṛṣṭavā vipannaṁ ditijādhipendraṁ pragṛhya daityā bhavanaṁ mayasya
तीव्र क्रोध छोड़ा, जोर से चिल्लाया, और अन्त में प्राण त्यागकर मर गया। उस दैत्याधिपति को गिरा देख, दैत्य उसे उठाकर मय के भवन को ले गये,
श्लोक 27 (skanda.8.170.27)
गत्वा निवेद्यासुरराजभर्त्रे नादान् प्रचक्रुर्विविधैर्विलापैः । ततो मयस्तान् रुदतो सुरेशानाश्वासयन् प्राह वचोसुरेशः
gatvā nivedyāsurarājabhartre nādān pracakrurvividhairvilāpaiḥ | tato mayastān rudato sureśānāśvāsayan prāha vacosureśaḥ
और वहाँ जाकर असुरराज के स्वामी को निवेदन करके नाना प्रकार के विलापों से आर्तनाद करने लगे। तब मय ने रोते हुए उन देवेश्वरों को आश्वस्त करते हुए, वह असुरेश्वर, यह वचन कहा -
श्लोक 28 (skanda.8.170.28)
सृष्टं मया वोमृतमेतदास्ते तेनैनमुत्थापयताशु दैत्याः । ततो गृहीत्वामृतमुत्तमं तद् दैत्याधिपं दैत्यवृषाः प्रहृष्टाः
sṛṣṭaṁ mayā vomṛtametadāste tenainamutthāpayatāśu daityāḥ | tato gṛhītvāmṛtamuttamaṁ tad daityādhipaṁ daityavṛṣāḥ prahṛṣṭāḥ
'यह अमृत जो यहाँ है, मेरे द्वारा उत्पन्न है; इससे इसे शीघ्र उठाओ, हे दैत्यो!' तब उस उत्तम अमृत को लेकर, प्रसन्न होकर वे दैत्यश्रेष्ठ,
श्लोक 29 (skanda.8.170.29)
चक्रुः सजीवं हि यथा पुराणं मयं प्रणेमुश्च मुहुः शिरोभिः । स तारकाक्षस्तत आशु भूयो युयुत्सया युद्धपथं जगाम
cakruḥ sajīvaṁ hi yathā purāṇaṁ mayaṁ praṇemuśca muhuḥ śirobhiḥ | sa tārakākṣastata āśu bhūyo yuyutsayā yuddhapathaṁ jagāma
दैत्याधिपति को पूर्ववत् सजीव कर दिया, और मय को बार-बार सिर झुकाकर प्रणाम किया। तब तारकाक्ष तुरन्त ही पुनः युयुत्सा से युद्धमार्ग को गया।
श्लोक 30 (skanda.8.170.30)
आयान्तमालक्ष्य पितामहस्तं पूर्वं मृतं जीवितमाशु भूयः । प्रोवाच वाक्यं स सुरासुरेशं निवेदयन् वामकरेण दैत्यम्
āyāntamālakṣya pitāmahastaṁ pūrvaṁ mṛtaṁ jīvitamāśu bhūyaḥ | provāca vākyaṁ sa surāsureśaṁ nivedayan vāmakareṇa daityam
आते हुए उस दैत्य को, जो पहले मरा हुआ था अब पुनः जीवित, देखकर पितामह ने बायें हाथ से उस दैत्य को दिखाते हुए सुरासुरेश्वर से यह वचन कहा -
श्लोक 31 (skanda.8.170.31)
हतोप्ययं शङ्कर तारकाक्षः कृतो मयेनाशु सजीव एव । तस्यास्ति देवामृतमुत्तमं हि तेनासुरान् जीवयतेसुरेन्द्रः
hatopyayaṁ śaṅkara tārakākṣaḥ kṛto mayenāśu sajīva eva | tasyāsti devāmṛtamuttamaṁ hi tenāsurān jīvayatesurendraḥ
'हे शंकर! यद्यपि यह तारकाक्ष मारा गया था, फिर भी मय द्वारा शीघ्र ही सजीव कर दिया गया है; उसके पास उत्तम देवामृत है, हे सुरेन्द्र! उसी से वह असुरों को जीवित करता है।
श्लोक 32 (skanda.8.170.32)
दोषो महानेष सुरेन्द्रहेतोर्मतान्मृतान् जीवयते यदाजौ । ततोमृतं तन्मयसंस्थमाशु प्रध्यानमात्रेण जहार शम्भुः
doṣo mahāneṣa surendrahetormatānmṛtān jīvayate yadājau | tatomṛtaṁ tanmayasaṁsthamāśu pradhyānamātreṇa jahāra śambhuḥ
यह महान् दोष है, हे देवताओं के हेतु! कि युद्ध में मरे हुओं को पुनः जीवित कर दिया जाये।' तब मय में स्थित उस अमृत को शम्भु ने शीघ्र ही मात्र संकल्प से हर लिया।
श्लोक 33 (skanda.8.170.33)
पितामहस्तं पुनरेव हृष्टः पिनाकिनं प्राह वचः प्रणम्य । दृष्टं मया युद्धमिदं गणानां दैत्याधिपैः सार्धमहीनसत्वैः
pitāmahastaṁ punareva hṛṣṭaḥ pinākinaṁ prāha vacaḥ praṇamya | dṛṣṭaṁ mayā yuddhamidaṁ gaṇānāṁ daityādhipaiḥ sārdhamahīnasatvaiḥ
पितामह ने पुनः प्रसन्न होकर, प्रणाम करके, पिनाकधारी से यह वचन कहा - 'मैंने अदीनसत्त्व दैत्याधिपतियों के साथ गणों का यह युद्ध देख लिया;
श्लोक 34 (skanda.8.170.34)
दिव्यं सहस्रं विगतं समानां क्षयं न चैतत् त्रिपुरं जगाम । क्षिपस्व दीप्तं तमिषुं सुरेश प्रयान्तु नाशं सुरविद्विषस्ते
divyaṁ sahasraṁ vigataṁ samānāṁ kṣayaṁ na caitat tripuraṁ jagāma | kṣipasva dīptaṁ tamiṣuṁ sureśa prayāntu nāśaṁ suravidviṣaste
पूरे एक सहस्र वर्ष बीत गये, फिर भी यह त्रिपुर नष्ट नहीं हुआ। हे सुरेश! उस प्रज्वलित बाण को छोड़िये; ये सुरद्वेषी नाश को प्राप्त हों।'
श्लोक 35 (skanda.8.170.35)
पूर्णे सहस्रे त्रिपुरं समेत्य पुनर्विपर्यस्तमभूत् सुरेश । क्षिप्तस्त्वयेषुर्न च देवदेव योगेन किं वा तव देवनाथ
pūrṇe sahasre tripuraṁ sametya punarviparyastamabhūt sureśa | kṣiptastvayeṣurna ca devadeva yogena kiṁ vā tava devanātha
'पूर्ण सहस्र वर्ष होने पर त्रिपुर एकत्र होकर पुनः विलग हो गया, हे सुरेश! और बाण आपके द्वारा छोड़ा नहीं गया, न ही योग से - क्यों, हे देवनाथ?'
श्लोक 36 (skanda.8.170.36)
संकल्पमात्रादिदमेति नाशं दैत्याधिवासं त्रिपुरं तवेश । यदि त्वहं मानयितव्य ईश विमुञ्च शीघ्रं त्रिपुरे शरं तम्
saṁkalpamātrādidameti nāśaṁ daityādhivāsaṁ tripuraṁ taveśa | yadi tvahaṁ mānayitavya īśa vimuñca śīghraṁ tripure śaraṁ tam
'हे ईश! मात्र आपके संकल्प से ही यह दैत्यों का निवास त्रिपुर नाश को प्राप्त हो सकता है; यदि मैं आपके द्वारा सम्मानित होने योग्य हूँ, तो शीघ्र ही त्रिपुर पर वह बाण छोड़िये।'
श्लोक 37 (skanda.8.170.37)
विज्ञप्त एवं चतुराननेन प्रतीपमालीढमनङ्गहन्ता । कृत्वा धनुस्तद्बलवद्विकृष्य युयोज दीप्तं तमिषुं पिनाके
vijñapta evaṁ caturānanena pratīpamālīḍhamanaṅgahantā | kṛtvā dhanustadbalavadvikṛṣya yuyoja dīptaṁ tamiṣuṁ pināke
इस प्रकार चतुर्मुख ब्रह्मा द्वारा प्रार्थना किये जाने पर, कामदेव के नाशक ने तिरछी दृष्टि से देखते हुए, उस बलवान् धनुष को बलपूर्वक खींचकर, प्रज्वलित उस बाण को पिनाक पर योजित किया।
श्लोक 38 (skanda.8.170.38)
संकल्पमात्रेण तदा स तानि पुराणि देवस्सहितानि त्रीणि । चक्रे जगत्सृष्टिविनाशकर्ता जगच्च निष्पन्दमभूत्तदाशु
saṁkalpamātreṇa tadā sa tāni purāṇi devassahitāni trīṇi | cakre jagatsṛṣṭivināśakartā jagacca niṣpandamabhūttadāśu
तब मात्र संकल्प से ही, सृष्टि के रचयिता और संहर्ता उस देव ने उन तीनों पुरों को एक साथ मिला दिया; और जगत् तत्क्षण निष्पन्द हो गया।
श्लोक 39 (skanda.8.170.39)
विष्ण्वात्मकं पावकसोमपुंखं त्रैलोक्यसंहार इव प्रदीप्तम् । चिक्षेप देवस्तमिषुं तदोग्रं क्षिप्त्वा च कष्टं धिगितीति चाह
viṣṇvātmakaṁ pāvakasomapuṁkhaṁ trailokyasaṁhāra iva pradīptam | cikṣepa devastamiṣuṁ tadograṁ kṣiptvā ca kaṣṭaṁ dhigitīti cāha
तब देव ने विष्णुस्वरूप, अग्नि-सोम पुंखवाला, त्रैलोक्य के संहार के समान प्रज्वलित वह उग्र बाण छोड़ा; और छोड़कर 'हाय, हाय!' ऐसा कहा।
श्लोक 40 (skanda.8.170.40)
नन्दी समागम्य ततो महेशं प्रोवाच वाक्यं किमिति प्रणम्य । नन्दीश्वरं तं भगवानुवाच मयस्य भक्तस्य शुभं चिकीर्षुः
nandī samāgamya tato maheśaṁ provāca vākyaṁ kimiti praṇamya | nandīśvaraṁ taṁ bhagavānuvāca mayasya bhaktasya śubhaṁ cikīrṣuḥ
तब नन्दी महेश के पास आकर प्रणाम करके बोला - 'क्या हुआ?' और भगवान् ने अपने भक्त मय का शुभ चाहते हुए उस नन्दीश्वर से कहा -
श्लोक 41 (skanda.8.170.41)
नन्दीश भक्तो मम विश्वकर्मा दहेत् पुरं तस्य यथा न वह्निः । तथानलं सोमहरी च देवौ ममाज्ञया गच्छ निवारयस्व
nandīśa bhakto mama viśvakarmā dahet puraṁ tasya yathā na vahniḥ | tathānalaṁ somaharī ca devau mamājñayā gaccha nivārayasva
'हे नन्दीश! मेरा भक्त विश्वकर्मा मय है, उसके पुर को अग्नि न जलाये! उसी प्रकार अग्नि और सोमहारी (राहु) उन दोनों देवों को, मेरी आज्ञा से जाकर रोको।'
श्लोक 42 (skanda.8.170.42)
नन्दी प्रगृह्याथ सुरेश्वराज्ञां तूर्णं ययौ विश्वकृतः पुरं तत् । तुल्यवेगो ज्योतिष्मतः पूर्वतरं जगाम
nandī pragṛhyātha sureśvarājñāṁ tūrṇaṁ yayau viśvakṛtaḥ puraṁ tat | tulyavego jyotiṣmataḥ pūrvataraṁ jagāma
नन्दी सुरेश्वर की आज्ञा लेकर तुरन्त विश्वकर्मा के उस पुर की ओर गये, [मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं] प्रकाशमान के समान वेगवाले होकर आगे-आगे चले गये।
श्लोक 43 (skanda.8.170.43)
दृष्ट्वा मयं तत्र स दानवेशं मूर्ध्ना नताङ्गं वृषभध्वजस्य । मृत्योर्भयार्त्तं शरणार्थिनं च नन्दी समाश्वासयदीशभक्तम्
dṛṣṭvā mayaṁ tatra sa dānaveśaṁ mūrdhnā natāṅgaṁ vṛṣabhadhvajasya | mṛtyorbhayārttaṁ śaraṇārthinaṁ ca nandī samāśvāsayadīśabhaktam
वहाँ वृषभध्वज के सामने मस्तक झुकाये, नत अंगोंवाले, मृत्यु के भय से पीड़ित, शरणार्थी उस दानवेश्वर मय को देखकर, नन्दी ने उस ईशभक्त को आश्वस्त किया।
श्लोक 44 (skanda.8.170.44)
भयं कृथा मा मय रक्षितस्त्वं भक्त्या भवेनेति वचोभ्युवाच । नन्दीश्वरं दानवराट् स दृष्ट्वा श्रुत्वा प्रियं तच्छिवसंप्रसादम्
bhayaṁ kṛthā mā maya rakṣitastvaṁ bhaktyā bhaveneti vacobhyuvāca | nandīśvaraṁ dānavarāṭ sa dṛṣṭvā śrutvā priyaṁ tacchivasaṁprasādam
'भय मत करो, मय! तुम भव की भक्ति से रक्षित हो' - ऐसा वचन कहा। नन्दीश्वर को देखकर और शिव की वह प्रिय कृपा सुनकर, दानवराज ने,
श्लोक 45 (skanda.8.170.45)
यथैव रुद्राय ननाम मूर्ध्ना चक्रे प्रणामं स तथैव तस्य । अथाग्निरागात् त्रिपुरं दिधक्षन् प्रदीपयित्वा सकलं समन्तात्
yathaiva rudrāya nanāma mūrdhnā cakre praṇāmaṁ sa tathaiva tasya | athāgnirāgāt tripuraṁ didhakṣan pradīpayitvā sakalaṁ samantāt
जैसे रुद्र को प्रणाम करता, वैसे ही उसे भी मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। तब अग्नि त्रिपुर को दग्ध करने के लिये आया, सब ओर से उसे प्रज्वलित करके,
श्लोक 46 (skanda.8.170.46)
संवर्त्तवह्निप्रतिमो युगान्ते जगत् प्रसंहर्त्तुमिव प्रदीप्तः । तमागतं विश्वकृतो निवासं विष्ण्विन्दुयुक्तं ज्वलनं स नन्दी । दग्धव्यमेतन्न हुताशनेति वचोभ्युवाचाशु विभोर्नियोगात्
saṁvarttavahnipratimo yugānte jagat prasaṁharttumiva pradīptaḥ | tamāgataṁ viśvakṛto nivāsaṁ viṣṇvinduyuktaṁ jvalanaṁ sa nandī | dagdhavyametanna hutāśaneti vacobhyuvācāśu vibhorniyogāt
युगान्त के संवर्तक अग्नि के समान, मानो जगत् को संहार करने के लिये प्रज्वलित; उस आये हुए, विष्णु-सोम से युक्त अग्नि को विश्वकर्मा का निवास आते देख, नन्दी ने, तुरन्त विभु की आज्ञा से यह वचन कहा - 'यह हुताशन से भस्म होने योग्य नहीं है।'
श्लोक 47 (skanda.8.170.47)
ततः स वह्निस्तमुवाच देवं कस्मान्न दग्धव्यमिदं मयेति । नन्दी हुताशं स ततोभ्युवाच मयोत्र तिष्ठत्यमरेशभक्तः
tataḥ sa vahnistamuvāca devaṁ kasmānna dagdhavyamidaṁ mayeti | nandī hutāśaṁ sa tatobhyuvāca mayotra tiṣṭhatyamareśabhaktaḥ
तब उस अग्नि ने देव से कहा - 'मुझसे यह क्यों न जलाया जाये?' नन्दी ने तब हुताशन से कहा - 'मय, अमरेश्वर का भक्त, यहाँ स्थित है।'
श्लोक 48 (skanda.8.170.48)
तं वह्निराहासुरराजमाशु तूर्णं विनिर्गच्छ मयेति वाक्यम् । हैमं गृहीत्वा स महेशलिङ्गं पुराद्विनिष्क्रम्य मयोसुरेन्द्रः
taṁ vahnirāhāsurarājamāśu tūrṇaṁ vinirgaccha mayeti vākyam | haimaṁ gṛhītvā sa maheśaliṅgaṁ purādviniṣkramya mayosurendraḥ
अग्नि ने उससे कहा - 'तो असुरराज तुरन्त शीघ्र बाहर निकले' - ऐसा वचन। हैम शिवलिंग को लेकर, असुरेन्द्र मय पुर से निकलकर,
श्लोक 49 (skanda.8.170.49)
पातालमाशु प्रविवेश हृष्टः कुर्वन्नमस्कारमुमाप्रियस्य । नन्दीश्वरः सोपि सुरेशपार्श्वमागम्य चाख्याय च संस्थितोभूत्
pātālamāśu praviveśa hṛṣṭaḥ kurvannamaskāramumāpriyasya | nandīśvaraḥ sopi sureśapārśvamāgamya cākhyāya ca saṁsthitobhūt
उमाप्रिय को नमस्कार करते हुए हर्षित होकर तुरन्त पाताल में प्रवेश कर गया। नन्दीश्वर भी सुरेश्वर के पार्श्व में आकर सब निवेदन करके स्थित हो गया।
श्लोक 50 (skanda.8.170.50)
ततः प्रदीप्तं त्रिपुरं बभूव विश्लिष्टयन्त्रार्गलनष्टवेश्म । नैकासुरामुक्तमहोग्रनादं वित्रस्तदैत्येन्द्रवधूजनाढ्यम्
tataḥ pradīptaṁ tripuraṁ babhūva viśliṣṭayantrārgalanaṣṭaveśma | naikāsurāmuktamahogranādaṁ vitrastadaityendravadhūjanāḍhyam
तब प्रज्वलित त्रिपुर हो गया, उसके यन्त्र-अर्गल टूट गये, भवन नष्ट हो गये, अनेक असुरों के भयंकर आर्तनाद से युक्त, त्रस्त दैत्येन्द्र-वधुओं से भरा हुआ -
श्लोक 51 (skanda.8.170.51)
वातायने हर्म्यविमानसंस्थाश्चन्द्राननाः पीनपयोधराढ्याः । पर्यङ्कसुप्ता मदविह्वलाक्ष्यो मार्गं प्रियाणां मुहुरीक्षमाणाः
vātāyane harmyavimānasaṁsthāścandrānanāḥ pīnapayodharāḍhyāḥ | paryaṅkasuptā madavihvalākṣyo mārgaṁ priyāṇāṁ muhurīkṣamāṇāḥ
झरोखों में, भवनों-विमानों में स्थित, चन्द्रमुखी, स्थूल स्तनोंवाली, पर्यंक पर सोयी हुई, मदविह्वल नेत्रोंवाली, बार-बार अपने प्रियों का मार्ग देखती हुई,
श्लोक 52 (skanda.8.170.52)
विलोचनैस्ताम्रनिभाङ्गरागैः श्यामावदाता जघनैर्विशालैः । दैत्याङ्गनाः स्वं ददृशुः प्रदीप्तमालिङ्ग्यमानाः शरपावकेन
vilocanaistāmranibhāṅgarāgaiḥ śyāmāvadātā jaghanairviśālaiḥ | daityāṅganāḥ svaṁ dadṛśuḥ pradīptamāliṅgyamānāḥ śarapāvakena
रक्तवर्ण नेत्रोंवाली, श्याम-गौर अंगरागवाली, विशाल जघनोंवाली, दैत्याङ्गनाओं ने अपने को प्रज्वलित बाण-अग्नि से आलिंगित देखा।
श्लोक 53 (skanda.8.170.53)
प्रासादसंस्थाः प्रययुर्भयार्त्तास्त्रासेन किन्नर्य इवाचलस्थाः । प्रियानथोद्वीक्ष्य समागताँस्तान् मोहं समालिङ्ग्य भृशं विजग्मुः
prāsādasaṁsthāḥ prayayurbhayārttāstrāsena kinnarya ivācalasthāḥ | priyānathodvīkṣya samāgatā~stān mohaṁ samāliṅgya bhṛśaṁ vijagmuḥ
भयार्त होकर वे भवनों से भागीं, त्रास से मानो पर्वतस्थ किन्नरियाँ हों; तब अपने प्रियों को आते देखकर, मोहवश उन्हें आलिंगन करके, वे सब नष्ट हो गयीं।
श्लोक 54 (skanda.8.170.54)
प्रिया गृहीत्वा दितिजास्ततस्ते प्रनष्टकामास्तरसाभिजग्मुः । निष्क्रान्तमात्राश्शिवशक्तिमूढाः पेतुः समुद्रे बलविप्रयुक्ताः
priyā gṛhītvā ditijāstataste pranaṣṭakāmāstarasābhijagmuḥ | niṣkrāntamātrāśśivaśaktimūḍhāḥ petuḥ samudre balaviprayuktāḥ
तब दैत्यांगनाएँ अपने प्रियों को पकड़कर, कामरहित होकर वेगपूर्वक उनके साथ चल पड़ीं; निकलते ही शिवशक्ति से मोहित होकर, बलहीन होकर, समुद्र में गिर पड़ीं।
श्लोक 55 (skanda.8.170.55)
दैत्यान् समुद्रे पतिताँस्ततस्तान् मत्स्या महान्तो गिरिसन्निकाशाः । तीव्राश्च नक्रा मकराश्च घोराः संजग्रसुर्नष्टबलान् विमूढान्
daityān samudre patitā~statastān matsyā mahānto girisannikāśāḥ | tīvrāśca nakrā makarāśca ghorāḥ saṁjagrasurnaṣṭabalān vimūḍhān
समुद्र में गिरे हुए उन दैत्यों को, पर्वत के समान विशाल मत्स्यों ने, तथा भयंकर नक्रों और मकरों ने, बलहीन मोहित हुओं को निगल लिया।
श्लोक 56 (skanda.8.170.56)
जलेचरेन्द्रास्त्वपरे महान्तस्संछिन्नहाराः पतिताः स्त्रियस्ताः । हीनाः प्रियैर्भक्षयितुं प्रवृत्ताः करालदंष्ट्रा विवृताननाश्च
jalecarendrāstvapare mahāntassaṁchinnahārāḥ patitāḥ striyastāḥ | hīnāḥ priyairbhakṣayituṁ pravṛttāḥ karāladaṁṣṭrā vivṛtānanāśca
और अन्य महान् जलचरराजों ने, उन गिरी हुई स्त्रियों के, जिनके हार टूट गये थे, अपने प्रियों से रहित हुई उन्हें, विकराल दाढ़ों और खुले मुखोंवाले होकर, खाना आरम्भ किया।
श्लोक 57 (skanda.8.170.57)
ता भक्ष्यमाणाः पतितास्तरुण्य प्रियान्सरोषं बहुशो निरीक्ष्य । रुजा महत्या परिखिद्यमानाः संचुक्रुशुर्दीनतरं युवत्यः
tā bhakṣyamāṇāḥ patitāstaruṇya priyānsaroṣaṁ bahuśo nirīkṣya | rujā mahatyā parikhidyamānāḥ saṁcukruśurdīnataraṁ yuvatyaḥ
वे भक्षित होती हुई, गिरी हुई तरुणियाँ, अपने प्रियों को बार-बार क्रोधपूर्वक देखती हुईं, महान् पीड़ा से क्षुब्ध होकर, अत्यन्त दीनतापूर्वक चीखने लगीं।
श्लोक 58 (skanda.8.170.58)
तासां तदा दैत्यविलासिनीनां रेजे भृशं क्रोधनिरीक्षितं तत् । रतावसाने परिखेदितानां प्रियैरिवान्यामभिगन्तुकामैः
tāsāṁ tadā daityavilāsinīnāṁ reje bhṛśaṁ krodhanirīkṣitaṁ tat | ratāvasāne parikheditānāṁ priyairivānyāmabhigantukāmaiḥ
उन दैत्यविलासिनियों की उस समय वह क्रोधपूर्ण दृष्टि अत्यन्त शोभित हो रही थी, मानो रतिक्रीड़ा के अन्त में थकी हुई स्त्रियाँ अपने प्रियों को, जो किसी अन्य के पास जाने की इच्छा रखते हों, देख रही हों।
श्लोक 59 (skanda.8.170.59)
सर्वे ततो दैत्यवृषाः सभार्याः प्रदह्यमानास्त्रिपुरानलेन । मग्नाः समुद्रे मकरैर्विभिन्ना गतासवो मृत्युवशं प्रजग्मुः
sarve tato daityavṛṣāḥ sabhāryāḥ pradahyamānāstripurānalena | magnāḥ samudre makarairvibhinnā gatāsavo mṛtyuvaśaṁ prajagmuḥ
तब वे सभी दैत्यवृषभ, अपनी पत्नियों सहित, त्रिपुर की उस अग्नि से जलते हुए, समुद्र में डूब गये, मकरों द्वारा विदीर्ण होकर, प्राणहीन होकर मृत्यु के वश को प्राप्त हो गये।
श्लोक 60 (skanda.8.170.60)
शरश्च सोग्नीन्दुजनार्दनात्मा प्रदह्य कृत्स्नं त्रिपुरं पुरं तत् । क्षिप्त्वा समुद्रे स्म शमं प्रयातं शशाम शम्भोश्च करं जगाम
śaraśca sognīndujanārdanātmā pradahya kṛtsnaṁ tripuraṁ puraṁ tat | kṣiptvā samudre sma śamaṁ prayātaṁ śaśāma śambhośca karaṁ jagāma
और वह बाण, अग्नि-सोम-विष्णुस्वरूप, उस सम्पूर्ण त्रिपुर को दग्ध करके, समुद्र में डालकर शान्त होकर, अपना कार्य पूर्ण कर, शम्भु के हाथ में वापस चला गया।
श्लोक 61 (skanda.8.170.61)
दैत्यैर्हतैस्तैस्त्रिपुरे च दग्धे देवान् रथस्थान् पुनरेव देवः । पूर्वं यथा दिव्यशरीरयुक्तान् चकार सृष्टिप्रलयादिहेतुः
daityairhataistaistripure ca dagdhe devān rathasthān punareva devaḥ | pūrvaṁ yathā divyaśarīrayuktān cakāra sṛṣṭipralayādihetuḥ
उन दैत्यों के मारे जाने और त्रिपुर के दग्ध होने पर, रथस्थ देवताओं को पुनः, सृष्टि-प्रलय आदि के हेतु उस देव ने, पूर्ववत् दिव्य शरीरधारी बना दिया।
श्लोक 62 (skanda.8.170.62)
ब्रह्मादयस्ते त्रिदिवौकसेशा नेमुर्वचश्चेदमथोचुरीशम् । कृतं त्वयेदं भगवन्नशक्यं शुभं महद्रौद्रतरं च कर्म
brahmādayaste tridivaukaseśā nemurvacaścedamathocurīśam | kṛtaṁ tvayedaṁ bhagavannaśakyaṁ śubhaṁ mahadraudrataraṁ ca karma
ब्रह्मादि उन त्रिदिवौकसों के स्वामियों ने प्रणाम करके ईश्वर से यह वचन कहा - 'हे भगवन्! आपने यह असम्भव, शुभ, अत्यन्त रौद्र कर्म किया है।
श्लोक 63 (skanda.8.170.63)
दैत्या हतास्तत्त्रिपुरं प्रदग्धं शान्तिः कृता नः स्म सुरासुरेश । नमोस्तु सर्वत्र सदा स्थिताय स्रष्ट्रे सुराणां परमेश तुभ्यम् । नित्यं नविज्ञातगमक्रियाय नमो नमः सर्वगताय तुभ्यम्
daityā hatāstattripuraṁ pradagdhaṁ śāntiḥ kṛtā naḥ sma surāsureśa | namostu sarvatra sadā sthitāya sraṣṭre surāṇāṁ parameśa tubhyam | nityaṁ navijñātagamakriyāya namo namaḥ sarvagatāya tubhyam
दैत्य मारे गये, वह त्रिपुर दग्ध हो गया, हमारे लिये शान्ति हो गयी, हे सुरासुरेश! सर्वत्र सदा स्थित, देवताओं के स्रष्टा, हे परमेश! आपको नमस्कार है। नित्य अज्ञातगति-क्रियावाले, सर्वगत आपको नमस्कार, नमस्कार है।'
श्लोक 64 (skanda.8.170.64)
तानाह देवः स तदा सुरेन्द्रान् ब्रह्मार्कविष्ण्विन्द्रधनेश्वराद्यान् । सदैव यूयं प्रतिपालनीया रक्ष्याश्च देवाः सुतवन्मयैव
tānāha devaḥ sa tadā surendrān brahmārkaviṣṇvindradhaneśvarādyān | sadaiva yūyaṁ pratipālanīyā rakṣyāśca devāḥ sutavanmayaiva
तब उस देव ने उन सुरेन्द्रों - ब्रह्मा, सूर्य, विष्णु, इन्द्र, धनेश्वर आदि से कहा - 'तुम सदा मेरे द्वारा पुत्रवत् पालनीय और रक्षणीय हो।
श्लोक 65 (skanda.8.170.65)
पूर्णाभिलाषा हतविद्विषश्च प्रयात हृष्टाः स्वनिवेशनानि । देवास्ततो देववरं प्रणम्य जग्मुः स्वकीयानि निवेशनानि
pūrṇābhilāṣā hatavidviṣaśca prayāta hṛṣṭāḥ svaniveśanāni | devāstato devavaraṁ praṇamya jagmuḥ svakīyāni niveśanāni
समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण करके, शत्रुओं का नाश करके, प्रसन्न होकर अपने-अपने निवासों को जाओ।' तब देवगण उस देवश्रेष्ठ को प्रणाम करके अपने-अपने निवासों को गये।
श्लोक 66 (skanda.8.170.66)
देवोपि सिद्धैरभिवन्द्यमानः कैलासशृङ्गं सहितो गणेन्द्रैः । चण्डेशनन्दीश्वरवीरभद्रैर्जगाम कर्ता जगतस्त्रिनेत्रः
devopi siddhairabhivandyamānaḥ kailāsaśṛṅgaṁ sahito gaṇendraiḥ | caṇḍeśanandīśvaravīrabhadrairjagāma kartā jagatastrinetraḥ
देव भी, सिद्धों द्वारा अभिवन्दित होकर, गणेन्द्रों सहित, चण्डेश-नन्दीश्वर-वीरभद्र के साथ, वे त्रिनेत्र जगत्कर्ता, कैलासशिखर को गये।
श्लोक 67 (skanda.8.170.67)
इति कथितमसह्यं देवदेवस्य कर्म त्रिपुरदहनसंज्ञं व्यास तुभ्यं मयैतत् । मनुज इदमधीते यः शुचिः शर्वभक्तः स भवति गतपापः स्वर्गभाग् देवजन्मा
iti kathitamasahyaṁ devadevasya karma tripuradahanasaṁjñaṁ vyāsa tubhyaṁ mayaitat | manuja idamadhīte yaḥ śuciḥ śarvabhaktaḥ sa bhavati gatapāpaḥ svargabhāg devajanmā
इस प्रकार देवदेव का यह असह्य, त्रिपुरदहन नामक कर्म मैंने तुम्हें कहा, हे व्यास! जो मनुष्य शुचि, शर्वभक्त होकर इसे पढ़ता है, वह पापरहित होकर स्वर्गभागी और दिव्यजन्मा होता है।