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अम्बिका खण्ड · अध्याय 171

क्रौञ्चदारण-मातृतन्त्रोत्पत्ति

अध्याय 170अध्याय-सूचीअध्याय 172

श्लोक 1 (skanda.8.171.1)

व्यास उवाच । श्रुतं मयैतद् भगवन् दहनं त्रिपुरस्य तु । विचित्रार्थं यथावृत्तं क एवमभिधास्यति

vyāsa uvāca | śrutaṁ mayaitad bhagavan dahanaṁ tripurasya tu | vicitrārthaṁ yathāvṛttaṁ ka evamabhidhāsyati

व्यास ने कहा - हे भगवन्! मैंने यह त्रिपुर का दहन सुना, जो अद्भुत अर्थवाला, यथावृत्त था। इसे इस प्रकार और कौन कह सकेगा?

श्लोक 2 (skanda.8.171.2)

कस्मात् क्रुद्धो नगेन्द्रं तं क्रौञ्चं दारितवान् गुहः । पक्षान् सर्वगिरीन्द्राणां कस्माच्चिच्छेद वासवः

kasmāt kruddho nagendraṁ taṁ krauñcaṁ dāritavān guhaḥ | pakṣān sarvagirīndrāṇāṁ kasmācciccheda vāsavaḥ

गुह किस कारण क्रुद्ध होकर उस पर्वतराज क्रौंच को विदीर्ण कर बैठे? और वासव ने किस कारण समस्त पर्वतराजों के पंख काट डाले?

श्लोक 3 (skanda.8.171.3)

सनत्कुमार उवाच । शृणु व्यास महाबुद्धे यन्मां त्वं परिपृच्छसि । कुमारेण यथा भिन्नो मैनाकिः क्रौञ्चपर्वतः

sanatkumāra uvāca | śṛṇu vyāsa mahābuddhe yanmāṁ tvaṁ paripṛcchasi | kumāreṇa yathā bhinno mainākiḥ krauñcaparvataḥ

सनत्कुमार ने कहा - हे महाबुद्धे व्यास! सुनो जो तुम मुझसे पूछ रहे हो - कैसे कुमार द्वारा मैनाकपुत्र क्रौंच पर्वत विदीर्ण किया गया।

श्लोक 4 (skanda.8.171.4)

गिरिराजमथाभ्येत्य मेरुं सर्वसुरालयम् । अपश्यद्वासवः स्कन्दं संघातं तेजसामिव

girirājamathābhyetya meruṁ sarvasurālayam | apaśyadvāsavaḥ skandaṁ saṁghātaṁ tejasāmiva

तब वासव ने, देवताओं के आवासस्थल पर्वतराज मेरु के पास आकर, स्कन्द को देखा, मानो तेजों का समूह हो।

श्लोक 5 (skanda.8.171.5)

शरस्तम्बवने दृष्ट्वा कुमारमनलप्रभम् । सुरराज्यमदाविष्टः शक्रः पप्रच्छ षण्मुखम्

śarastambavane dṛṣṭvā kumāramanalaprabham | surarājyamadāviṣṭaḥ śakraḥ papraccha ṣaṇmukham

शरस्तम्बवन में अग्नितुल्य तेजस्वी कुमार को देखकर, देवराज्य के मद से आविष्ट शक्र ने षण्मुख से पूछा -

श्लोक 6 (skanda.8.171.6)

कस्त्वं दिव्यवपुर्बाल मेरुपर्वतमाश्रितः । न मां पूजयसे दृष्ट्वा देवराजमिहागतम्

kastvaṁ divyavapurbāla meruparvatamāśritaḥ | na māṁ pūjayase dṛṣṭvā devarājamihāgatam

'हे दिव्यशरीर बालक! तुम कौन हो, जो मेरु पर्वत का आश्रय लिये हो? देवराज को यहाँ आया देखकर भी तुम मेरा पूजन नहीं करते।'

श्लोक 7 (skanda.8.171.7)

तमेवं वादिनं शक्रं प्राह शूलधरात्मजः । ब्रह्माद्या मां विजानन्ति सिद्धा वेदविदश्च ये

tamevaṁ vādinaṁ śakraṁ prāha śūladharātmajaḥ | brahmādyā māṁ vijānanti siddhā vedavidaśca ye

इस प्रकार कहते हुए शक्र से शूलधारी के पुत्र ने कहा - 'ब्रह्मादि, सिद्ध और वेदवेत्ता मुझे जानते हैं।

श्लोक 8 (skanda.8.171.8)

तपसा लब्धराज्येन न चिरादस्तमेष्यता । किं त्वया जानता शक्र कार्यं किं पूजितेन वा

tapasā labdharājyena na cirādastameṣyatā | kiṁ tvayā jānatā śakra kāryaṁ kiṁ pūjitena vā

तपस्या से प्राप्त राज्य शीघ्र ही अस्त हो जायेगा। हे शक्र! जानने या पूजित होने से तुम्हें क्या प्रयोजन?'

श्लोक 9 (skanda.8.171.9)

अथोवाच पुनः शक्रस्तं देवमनलात्मजम् । मत्तः परतरो नास्ति मुक्त्वा शर्वपितामहौ

athovāca punaḥ śakrastaṁ devamanalātmajam | mattaḥ parataro nāsti muktvā śarvapitāmahau

तब शक्र ने पुनः उस अग्निपुत्र देव से कहा - 'शर्व और पितामह को छोड़कर मुझसे बढ़कर कोई नहीं है।

श्लोक 10 (skanda.8.171.10)

कथमेवमवोचस्त्वं विबुधाधिपमागतम् । यदि मत्तस्त्वमात्मानं महान्तं मन्यसेनघ

kathamevamavocastvaṁ vibudhādhipamāgatam | yadi mattastvamātmānaṁ mahāntaṁ manyasenagha

तुम आये हुए विबुधाधिप से ऐसा कैसे कह रहे हो, यदि तुम, हे निष्पाप! अपने को मुझसे महान् मानते हो?'

श्लोक 11 (skanda.8.171.11)

मैनाकतनयो ह्येष क्रौञ्चसिद्धनिषेवितः । सुविस्तीर्णो महाशैलो नैकनिर्झरनिस्रवः

mainākatanayo hyeṣa krauñcasiddhaniṣevitaḥ | suvistīrṇo mahāśailo naikanirjharanisravaḥ

'यह मैनाक का पुत्र, क्रौंच-सिद्धों से सेवित, अत्यन्त विस्तीर्ण महाशैल है, अनेक झरनों से युक्त।

श्लोक 12 (skanda.8.171.12)

एह्येहि त्वं मया सार्धं कुरु शीघ्र प्रदक्षिणम् । य एनमावयोरेकः पूर्वमेव क्रमिष्यति

ehyehi tvaṁ mayā sārdhaṁ kuru śīghra pradakṣiṇam | ya enamāvayorekaḥ pūrvameva kramiṣyati

आओ, आओ, मेरे साथ शीघ्र इसकी प्रदक्षिणा करो; हम दोनों में से जो पहले इसकी परिक्रमा पूर्ण कर लेगा -

श्लोक 13 (skanda.8.171.13)

प्रभावात्तेजसा चैव स महान्नौ भविष्यति । बाढमित्येवमुक्त्वाथ कुमारः षण्मुखस्तदा । प

prabhāvāttejasā caiva sa mahānnau bhaviṣyati | bāḍhamityevamuktvātha kumāraḥ ṣaṇmukhastadā | pa

उसी के प्रभाव और तेज से वह हम दोनों में महान् होगा।' 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर तब कुमार षण्मुख ने,

श्लोक 14 (skanda.8.171.14)

शक्रेण सह संगत्य मयूरवरमास्थितः । महेन्द्रस्याग्रतो गच्छन् चक्रे क्रौञ्चं प्रदक्षिणम्

śakreṇa saha saṁgatya mayūravaramāsthitaḥ | mahendrasyāgrato gacchan cakre krauñcaṁ pradakṣiṇam

शक्र के साथ मिलकर अपने उत्तम मयूर पर आरूढ़ होकर, महेन्द्र से आगे जाते हुए क्रौंच की प्रदक्षिणा की।

श्लोक 15 (skanda.8.171.15)

अथ बुद्ध्वा महेन्द्रस्तु न्यूनमात्मानमानलात् । कुमारमभिसन्धित्सुर्मनसैव प्रदक्षिणम्

atha buddhvā mahendrastu nyūnamātmānamānalāt | kumāramabhisandhitsurmanasaiva pradakṣiṇam

तब महेन्द्र ने अपने को अग्निपुत्र से हीन जानकर, कुमार को छलने की इच्छा से, केवल मन से ही प्रदक्षिणा करके,

श्लोक 16 (skanda.8.171.16)

कृत्वा सुनिर्वृतस्तस्थौ उपविष्टः शिलातले । जवेनाथ कुमारस्तं क्रौञ्चं कृत्वा प्रदक्षिणम्

kṛtvā sunirvṛtastasthau upaviṣṭaḥ śilātale | javenātha kumārastaṁ krauñcaṁ kṛtvā pradakṣiṇam

शिलातल पर बैठकर सन्तुष्ट होकर बैठ गये। तब कुमार ने वेगपूर्वक उस क्रौंच की प्रदक्षिणा करके,

श्लोक 17 (skanda.8.171.17)

प्रोवाचेन्द्रं तदा दृष्ट्वा जेताहमिति सत्वरः । अहमेव हि जेतेति शक्रस्तमवदद् गुहम्

provācendraṁ tadā dṛṣṭvā jetāhamiti satvaraḥ | ahameva hi jeteti śakrastamavadad guham

इन्द्र को वहाँ देखकर शीघ्रता से कहा - 'मैं विजयी हूँ!' 'मैं ही विजयी हूँ' - शक्र ने गुह से कहा।

श्लोक 18 (skanda.8.171.18)

असकृद् ब्रुवतोरेवं तयोः शक्रकुमारयोः । क्रौञ्चोभ्येत्य वचः प्राह किमेतदिति भूचरः

asakṛd bruvatorevaṁ tayoḥ śakrakumārayoḥ | krauñcobhyetya vacaḥ prāha kimetaditi bhūcaraḥ

शक्र और कुमार के बार-बार इस प्रकार कहते रहने पर, क्रौंच ने पास आकर वचन कहा - 'यह क्या है?' - वह भूचर।

श्लोक 19 (skanda.8.171.19)

ततः शक्र उवाचेदं कुमारं वचनं तदा । एष एवावयोः क्रौञ्चो जयसाक्षी महाबलः

tataḥ śakra uvācedaṁ kumāraṁ vacanaṁ tadā | eṣa evāvayoḥ krauñco jayasākṣī mahābalaḥ

तब शक्र ने कुमार से यह वचन कहा - 'यह क्रौंच ही हम दोनों की विजय का महाबली साक्षी है।

श्लोक 20 (skanda.8.171.20)

नानृतं वक्ष्यति ह्येष पौत्रो हिमगिरेर्वरः । पृच्छ्यतां शक्र को दोष इत्याह ज्वलनात्मजः

nānṛtaṁ vakṣyati hyeṣa pautro himagirervaraḥ | pṛcchyatāṁ śakra ko doṣa ityāha jvalanātmajaḥ

यह हिमगिरि का श्रेष्ठ पौत्र असत्य नहीं कहेगा।' 'शक्र से पूछा जाये, इसमें क्या दोष है' - ऐसा अग्निपुत्र ने कहा।

श्लोक 21 (skanda.8.171.21)

तं शक्रः सादरं प्राह केन त्वमचलाग्रतः । कृतप्रदक्षिणो ब्रूहि प्रमाणं हि त्वमावयोः

taṁ śakraḥ sādaraṁ prāha kena tvamacalāgrataḥ | kṛtapradakṣiṇo brūhi pramāṇaṁ hi tvamāvayoḥ

शक्र ने आदरपूर्वक उससे कहा - 'पर्वत के सामने किसने प्रदक्षिणा पहले पूर्ण की, बताओ; तुम ही हम दोनों के प्रमाण हो।'

श्लोक 22 (skanda.8.171.22)

ततः क्रौञ्चो विमूढात्मा संचिन्त्य सुचिरं नगः । अयं शचीपतिश्चक्रे मामिहाग्रे प्रदक्षिणम्

tataḥ krauñco vimūḍhātmā saṁcintya suciraṁ nagaḥ | ayaṁ śacīpatiścakre māmihāgre pradakṣiṇam

तब मोहग्रस्त मन से वह क्रौंच पर्वत, चिरकाल विचार करके, बोला - 'इस शचीपति ने ही मेरे सामने पहले प्रदक्षिणा की।'

श्लोक 23 (skanda.8.171.23)

र्यं प्रहसन् देवानित्युवाच नगाधिपः । अथैवं ब्रुवतस्तस्य सत्यहीनं तदा गिरेः

ryaṁ prahasan devānityuvāca nagādhipaḥ | athaivaṁ bruvatastasya satyahīnaṁ tadā gireḥ

[मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं] हँसते हुए देवताओं से यह कहा - ऐसा उस नगाधिप ने कहा। इस प्रकार असत्य कहते हुए उस पर्वत का,

श्लोक 24 (skanda.8.171.24)

पपात शिखरं तूर्णं कुलिशेन यथा हतम् । तत्रासन् यानि भूतानि सुराद्यानि गिरीश्वरे । तानि संत्यज्य शीघ्र तं प्रययुः सर्वतो दिशम्

papāta śikharaṁ tūrṇaṁ kuliśena yathā hatam | tatrāsan yāni bhūtāni surādyāni girīśvare | tāni saṁtyajya śīghra taṁ prayayuḥ sarvato diśam

शिखर तुरन्त वज्र से आहत के समान गिर पड़ा। उस पर्वतराज पर जो भी प्राणी थे, देवादि, वे सब शीघ्र उसे छोड़कर सब दिशाओं में भाग गये।

श्लोक 25 (skanda.8.171.25)

जहृषे वासवश्चापि मनसा पूजयन् गिरिम् । ततश्चुक्रोध रुद्रात्मा गिरेः क्रौञ्चस्य षण्मुखः

jahṛṣe vāsavaścāpi manasā pūjayan girim | tataścukrodha rudrātmā gireḥ krauñcasya ṣaṇmukhaḥ

वासव भी मन ही मन पर्वत का सम्मान करते हुए प्रसन्न हुए। तब रुद्रात्मा षण्मुख क्रौंच पर्वत पर क्रुद्ध हो गये।

श्लोक 26 (skanda.8.171.26)

गुहं द्रष्टुं संक्रुद्धं वासवस्तदा । एकस्थे तेजसी पूर्णे वह्निभास्करयोरिव

guhaṁ draṣṭuṁ saṁkruddhaṁ vāsavastadā | ekasthe tejasī pūrṇe vahnibhāskarayoriva

[मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं] क्रुद्ध गुह को देखकर वासव तब, दोनों के तेज एक साथ पूर्ण हुए, मानो अग्नि और सूर्य के।

श्लोक 27 (skanda.8.171.27)

अथ शक्तिं समुत्क्षिप्य यमानलसमप्रभाम् । चिक्षेप भगवान् स्कन्दः क्रुद्धः क्रौञ्चजिघांसया

atha śaktiṁ samutkṣipya yamānalasamaprabhām | cikṣepa bhagavān skandaḥ kruddhaḥ krauñcajighāṁsayā

तब यम की अग्नि के समान प्रभावाली शक्ति उठाकर, भगवान् स्कन्द ने क्रुद्ध होकर क्रौंच को मारने की इच्छा से उसे फेंका।

श्लोक 28 (skanda.8.171.28)

सा पपात गिरेर्मूर्ध्नि शक्तिः क्रौञ्चस्य सत्वरम् । क्षीणायुषो यथा पुंसो मृत्युपाश

sā papāta girermūrdhni śaktiḥ krauñcasya satvaram | kṣīṇāyuṣo yathā puṁso mṛtyupāśa

वह शक्ति क्रौंच पर्वत के शिखर पर वेगपूर्वक गिरी, [मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं] क्षीणायु पुरुष पर मृत्युपाश के समान।

श्लोक 29 (skanda.8.171.29)

स तया भिन्नमर्मा तु शक्त्या क्रौञ्चो नगोत्तमः । सर्वतश्छिन्नसर्वाङ्गः स्रवद्रुधिरनिर्झरः

sa tayā bhinnamarmā tu śaktyā krauñco nagottamaḥ | sarvataśchinnasarvāṅgaḥ sravadrudhiranirjharaḥ

उस शक्ति से मर्मस्थान भिन्न हुआ वह क्रौंच, पर्वतोत्तम, सर्वत्र कटे हुए सभी अंगोंवाला, रुधिर के झरने बहाता हुआ,

श्लोक 30 (skanda.8.171.30)

मूर्त्तिमानपतद् भूमौ संज्ञाप्राणविवर्जितः । पतिं विनिहतं दृष्ट्वा पत्न्यस्तस्य सुदुःखिताः

mūrttimānapatad bhūmau saṁjñāprāṇavivarjitaḥ | patiṁ vinihataṁ dṛṣṭvā patnyastasya suduḥkhitāḥ

मूर्तिमान होकर भूमि पर गिर पड़ा, संज्ञा और प्राण से रहित। अपने पति को मारा गया देखकर उसकी पत्नियाँ अत्यन्त दुःखित होकर,

श्लोक 31 (skanda.8.171.31)

विलपन्त्यस्तदा दीनं पेतुः क्रौञ्चाचलोपरि । मेरुर्हिमाचलो विन्ध्यः कैलासो गन्धमादनः

vilapantyastadā dīnaṁ petuḥ krauñcācalopari | merurhimācalo vindhyaḥ kailāso gandhamādanaḥ

विलाप करती हुई दीनतापूर्वक क्रौंचाचल पर गिर पड़ीं। मेरु, हिमाचल, विन्ध्य, कैलास, गन्धमादन,

श्लोक 32 (skanda.8.171.32)

पारियात्रश्च सह्यश्च निषधोदयवामनाः । क्रौञ्चस्य जनकश्चापि मैनाकः पर्वतोत्तमः

pāriyātraśca sahyaśca niṣadhodayavāmanāḥ | krauñcasya janakaścāpi mainākaḥ parvatottamaḥ

पारियात्र, सह्य, निषध, उदय और वामन भी, तथा क्रौंच के पिता भी, मैनाक पर्वतोत्तम,

श्लोक 33 (skanda.8.171.33)

सर्वे पर्वतराजान आजग्मुः शोकपीडिताः । परिवार्य गिरिं क्रौञ्चं रुरुदुर्दुःखिता भृशम्

sarve parvatarājāna ājagmuḥ śokapīḍitāḥ | parivārya giriṁ krauñcaṁ rurudurduḥkhitā bhṛśam

वे सभी पर्वतराज, शोकपीड़ित होकर आये, और क्रौंच पर्वत को घेरकर अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगे।

श्लोक 34 (skanda.8.171.34)

भ्रातृपुत्र हतं ज्ञात्वा देवदेवी गिरीन्द्रजा । शर्वेण सहिता क्रौञ्चमाजगाम महाव्रता

bhrātṛputra hataṁ jñātvā devadevī girīndrajā | śarveṇa sahitā krauñcamājagāma mahāvratā

अपने भ्रातृपुत्र को मारा गया जानकर, गिरिराजपुत्री देवदेवी, महाव्रता, शर्व सहित क्रौंच के पास आयीं।

श्लोक 35 (skanda.8.171.35)

कुमारेण हतं दृष्ट्वा क्रौञ्चं बान्धवमात्मनः । पीडिताभूत्तदा देवी दृष्ट्वा पितरमर्दितम्

kumāreṇa hataṁ dṛṣṭvā krauñcaṁ bāndhavamātmanaḥ | pīḍitābhūttadā devī dṛṣṭvā pitaramarditam

अपने बान्धव क्रौंच को कुमार द्वारा मारा गया देखकर, देवी तब पीड़ित हुईं, अपने पिता को व्यथित देखकर,

श्लोक 36 (skanda.8.171.36)

हिमवन्तं महाशैलं वधात् पौत्रस्य दुःखितम् । शुशोच गिरिजा दृष्ट्वा मुहुर्वीक्ष्य सुरेश्वरम्

himavantaṁ mahāśailaṁ vadhāt pautrasya duḥkhitam | śuśoca girijā dṛṣṭvā muhurvīkṣya sureśvaram

और गिरिजा ने महाशैल हिमवान् को अपने पौत्र के वध से दुःखित देखकर शोक किया, तथा बार-बार सुरेश्वर की ओर देखा।

श्लोक 37 (skanda.8.171.37)

भगवन्तमथायातं देव्या सह पिनाकिनम् । शोकेनापि सुसन्तप्ता नमश्चक्रुर्महाबलाः

bhagavantamathāyātaṁ devyā saha pinākinam | śokenāpi susantaptā namaścakrurmahābalāḥ

तब देवी सहित पिनाकधारी भगवान् के आने पर, शोक से अत्यन्त सन्तप्त होते हुए भी, वे महाबली प्रणाम करने लगे।

श्लोक 38 (skanda.8.171.38)

अथ प्रणम्य देवेशं हिमवानचलोत्तमः । व्यज्ञापयत दीनात्मा दुःखशोकपरिप्लुतः

atha praṇamya deveśaṁ himavānacalottamaḥ | vyajñāpayata dīnātmā duḥkhaśokapariplutaḥ

तब देवेश्वर को प्रणाम करके, अचलोत्तम हिमवान्, दीनात्मा, दुःख-शोक में डूबे हुए, यह निवेदन करने लगे -

श्लोक 39 (skanda.8.171.39)

शक्रेणानेन भगवन्नात्मानं बहुमन्यता । निधनं नायितः पौत्रो ममायं क्रौञ्चपर्वतः

śakreṇānena bhagavannātmānaṁ bahumanyatā | nidhanaṁ nāyitaḥ pautro mamāyaṁ krauñcaparvataḥ

'हे भगवन्! इस शक्र द्वारा अपने को बहुत माननेवाले के कारण, मेरा यह पौत्र क्रौंच पर्वत मृत्यु को प्राप्त कराया गया।

श्लोक 40 (skanda.8.171.40)

स्पर्धा कास्य कुमारेण तव देव सुतेन हि । नान्तरं वेद यो दर्पात् कुमारस्यात्मनश्च ह

spardhā kāsya kumāreṇa tava deva sutena hi | nāntaraṁ veda yo darpāt kumārasyātmanaśca ha

आपके पुत्र कुमार से इसकी क्या स्पर्धा, हे देव! जो दर्प से कुमार और अपने में अन्तर नहीं जानता?

श्लोक 41 (skanda.8.171.41)

स्पर्धां कृत्वा कुमारेण हते पौत्रे ममाधुना । निर्वृतो गतदर्पोयं सुखं तिष्ठतु वासवः

spardhāṁ kṛtvā kumāreṇa hate pautre mamādhunā | nirvṛto gatadarpoyaṁ sukhaṁ tiṣṭhatu vāsavaḥ

कुमार से स्पर्धा करके अब मेरा पौत्र मारा गया; वासव, दर्परहित होकर, सुखपूर्वक निर्वृत होकर रहें।

श्लोक 42 (skanda.8.171.42)

हते पौत्रे महादेव निमग्नः शोकसागरे । न जीवितुमहं शक्तो यास्ये पौत्रगतिं त्वहम्

hate pautre mahādeva nimagnaḥ śokasāgare | na jīvitumahaṁ śakto yāsye pautragatiṁ tvaham

पौत्र के मारे जाने पर, हे महादेव! मैं शोकसागर में डूब गया हूँ; मैं जीवित रहने में समर्थ नहीं हूँ, मैं भी पौत्र की गति को प्राप्त होऊँगा।'

श्लोक 43 (skanda.8.171.43)

एवं विलपतस्तस्य मेरुविन्ध्यपुरोगमाः । विनेदुर्दुःखसंतप्ता बान्धवाभावपीडिताः

evaṁ vilapatastasya meruvindhyapurogamāḥ | vinedurduḥkhasaṁtaptā bāndhavābhāvapīḍitāḥ

इस प्रकार विलाप करते हुए उनके, मेरु-विन्ध्य आदि पर्वत भी दुःख से सन्तप्त होकर, बान्धव के अभाव से पीड़ित होकर, चीख उठे।

श्लोक 44 (skanda.8.171.44)

पितरं दुःखितं दृष्ट्वा तथान्यान् बान्धवान् गिरीन् । अभवच्छोकसन्तप्ता गिरिजापि जगद्धरा

pitaraṁ duḥkhitaṁ dṛṣṭvā tathānyān bāndhavān girīn | abhavacchokasantaptā girijāpi jagaddharā

पिता को दुःखित तथा अन्य बान्धव पर्वतों को भी देखकर, गिरिजा भी, जगत्धारिणी, शोकसन्तप्त हो गयीं।

श्लोक 45 (skanda.8.171.45)

अथ तान् दुःखितान् दृष्ट्वा सर्वान् गोवृषवाहनः । मा कार्ष्ट शोकमित्युक्त्वा तनयं प्राह षण्मुखम्

atha tān duḥkhitān dṛṣṭvā sarvān govṛṣavāhanaḥ | mā kārṣṭa śokamityuktvā tanayaṁ prāha ṣaṇmukham

तब उन सबको दुःखित देखकर, गोवृषवाहन देव ने 'शोक मत करो' ऐसा कहकर अपने पुत्र षण्मुख से कहा -

श्लोक 46 (skanda.8.171.46)

महान्तस्त्वद्विधाः पुत्र सापराधेपि बान्धवे । नाशुभं कुर्वते कस्मात् क्रौञ्चं निहतवानसि

mahāntastvadvidhāḥ putra sāparādhepi bāndhave | nāśubhaṁ kurvate kasmāt krauñcaṁ nihatavānasi

'हे पुत्र! तुम्हारे समान महान् पुरुष अपराधी बान्धव के प्रति भी अशुभ नहीं करते; क्यों तुमने क्रौंच को मार डाला?

श्लोक 47 (skanda.8.171.47)

भ्रातृसूनुर्भवन्मातुरेष क्रौञ्चो महागिरिः । कथं भ्रातरमेनं स्वं हतवानसि षण्मुख

bhrātṛsūnurbhavanmātureṣa krauñco mahāgiriḥ | kathaṁ bhrātaramenaṁ svaṁ hatavānasi ṣaṇmukha

यह महागिरि क्रौंच तुम्हारी माता का भ्राता-पुत्र है; हे षण्मुख! अपने इस भाई को कैसे मार डाला?

श्लोक 48 (skanda.8.171.48)

सदृशं कर्म नैतत्ते मन्मयस्य सुतस्य ते । ब्रूहि वा साम्प्रतं कर्म किमत्र बहु मन्यसे

sadṛśaṁ karma naitatte manmayasya sutasya te | brūhi vā sāmprataṁ karma kimatra bahu manyase

यह कर्म तुम्हारे योग्य नहीं है, मेरे पुत्र; अब बताओ - इस कर्म में तुम क्या महत्त्व मानते हो?'

श्लोक 49 (skanda.8.171.49)

तमेवं वादिनं देवं षण्मुखः पितरं तदा । इदं प्रोवाच सव्रीडं वचनं परमाद्भुतम्

tamevaṁ vādinaṁ devaṁ ṣaṇmukhaḥ pitaraṁ tadā | idaṁ provāca savrīḍaṁ vacanaṁ paramādbhutam

इस प्रकार कहते हुए देव पिता से षण्मुख ने तब यह अत्यन्त अद्भुत वचन लज्जापूर्वक कहा -

श्लोक 50 (skanda.8.171.50)

शक्रस्यापनयाद्देव क्रौञ्च एष हतो मया । असन्मन्त्रितवान् यस्माद् विज्ञप्तिमपरां शृणु

śakrasyāpanayāddeva krauñca eṣa hato mayā | asanmantritavān yasmād vijñaptimaparāṁ śṛṇu

'हे देव! शक्र के अनुचित आचरण से यह क्रौंच मेरे द्वारा मारा गया, क्योंकि उसने असत्य कहा; मेरी और एक विनती सुनिये -

श्लोक 51 (skanda.8.171.51)

त्वत्प्रसादादहं क्रौञ्चं जीवयामि नगोत्तमम् । दुष्करं नहि मे चिञ्चित् तव देव सुतस्य हि

tvatprasādādahaṁ krauñcaṁ jīvayāmi nagottamam | duṣkaraṁ nahi me ciñcit tava deva sutasya hi

आपकी कृपा से मैं इस क्रौंच पर्वतोत्तम को जीवित करता हूँ; आपके पुत्र के लिये, हे देव! कुछ भी दुष्कर नहीं है।'

श्लोक 52 (skanda.8.171.52)

उत्तिष्ठेति ततः क्रौञ्चं भ्रातरं प्राह षण्मुखः । स बिभ्रत् पूर्ववद्देहं क्रौञ्चो नगपतिः क्षणात्

uttiṣṭheti tataḥ krauñcaṁ bhrātaraṁ prāha ṣaṇmukhaḥ | sa bibhrat pūrvavaddehaṁ krauñco nagapatiḥ kṣaṇāt

'उठो' - ऐसा तब षण्मुख ने भाई क्रौंच से कहा; पूर्ववत् देह धारण करके वह क्रौंच पर्वतपति क्षणमात्र में,

श्लोक 53 (skanda.8.171.53)

उत्तस्थौ नीरुजो व्यास आश्चर्यं तदभूत्तदा । जीवितेनाचलेनैवं षण्मुखो वह्निसप्रभः

uttasthau nīrujo vyāsa āścaryaṁ tadabhūttadā | jīvitenācalenaivaṁ ṣaṇmukho vahnisaprabhaḥ

निरोग होकर उठ खड़ा हुआ, हे व्यास! वह उस समय आश्चर्य हुआ - पर्वत का इस प्रकार जीवित होना। तब अग्नितुल्य प्रभावाला षण्मुख,

श्लोक 54 (skanda.8.171.54)

स्मरन् रुद्रादधिक्षेपं कोपसंरक्तलोचनः । समक्षं सर्वदेवानां शक्रस्य च महाबलः

smaran rudrādadhikṣepaṁ kopasaṁraktalocanaḥ | samakṣaṁ sarvadevānāṁ śakrasya ca mahābalaḥ

रुद्र के उस आक्षेप का स्मरण करते हुए, क्रोध से लाल नेत्रोंवाला, समस्त देवताओं और महाबली शक्र के समक्ष,

श्लोक 55 (skanda.8.171.55)

वायुविष्णुयमानां च ब्रह्मणश्च महात्मनः । देवदेवं प्रणम्येशं पितरं ह्युमया सह

vāyuviṣṇuyamānāṁ ca brahmaṇaśca mahātmanaḥ | devadevaṁ praṇamyeśaṁ pitaraṁ hyumayā saha

तथा वायु, विष्णु, यम और महात्मा ब्रह्मा के समक्ष, देवदेव ईश्वर पिता को उमा सहित प्रणाम करके,

श्लोक 56 (skanda.8.171.56)

बभाषे वचनं देवः कुमारवररूपधृक् । शक्रेणानेन देवेन्द्रा मत्समक्षं प्रभाषितम्

babhāṣe vacanaṁ devaḥ kumāravararūpadhṛk | śakreṇānena devendrā matsamakṣaṁ prabhāṣitam

वह देव, कुमार के उत्तम रूपधारी, यह वचन बोला - 'इस शक्र द्वारा, हे देवेन्द्रो! मेरे समक्ष यह कहा गया कि,

श्लोक 57 (skanda.8.171.57)

महांस्त्वत्तोहमित्येव तत्र मां मन्युराविशत् । तन्मयैषा महाशक्तिर्निखाता वसुधातले

mahāṁstvattohamityeva tatra māṁ manyurāviśat | tanmayaiṣā mahāśaktirnikhātā vasudhātale

मैं तुमसे महान् हूँ' - इससे मुझमें क्रोध प्रविष्ट हो गया। इसलिये मैंने यह अपनी महाशक्ति भूतल में गाड़ दी है।

श्लोक 58 (skanda.8.171.58)

उद्धर्त्तुं योमरः शक्तो मुक्त्वा देवं पिनाकिनम् । उत्पाटयतु स ह्येतां महान्मत्तस्ततो हि सः

uddharttuṁ yomaraḥ śakto muktvā devaṁ pinākinam | utpāṭayatu sa hyetāṁ mahānmattastato hi saḥ

इसे उखाड़ने में जो भी अमर समर्थ हो, शूलधारी देव को छोड़कर, वह इसे उखाड़ ले; वही मुझसे महान् होगा।'

श्लोक 59 (skanda.8.171.59)

एवमुक्त्वा ततो देवो बालार्कसदृशप्रभः । तूष्णीं बभूव हृष्टात्मा तस्थौ च पितृपार्श्वतः

evamuktvā tato devo bālārkasadṛśaprabhaḥ | tūṣṇīṁ babhūva hṛṣṭātmā tasthau ca pitṛpārśvataḥ

ऐसा कहकर तब वह देव, बालसूर्य के समान प्रभावाला, प्रसन्नचित्त होकर मौन हो गये और पिता के पास खड़े हो गये।

श्लोक 60 (skanda.8.171.60)

अथेन्द्रो देवतामध्ये राज्यदर्पान्वितोमरः । उत्पाटयितुमुत्सेहे तां शक्तिं वसुधां गताम्

athendro devatāmadhye rājyadarpānvitomaraḥ | utpāṭayitumutsehe tāṁ śaktiṁ vasudhāṁ gatām

तब इन्द्र, देवताओं के मध्य, राज्यदर्प से युक्त वह अमर, पृथ्वी में गड़ी उस शक्ति को उखाड़ने का प्रयत्न करने लगा,

श्लोक 61 (skanda.8.171.61)

न च चालयितुं शक्तो यत्नादपि सुराधिपः । अथ लज्जान्वितोत्यर्थं तस्माद्देशादपाक्रमत्

na ca cālayituṁ śakto yatnādapi surādhipaḥ | atha lajjānvitotyarthaṁ tasmāddeśādapākramat

परन्तु प्रयत्न करने पर भी सुराधिप उसे हिला नहीं सका; तब अत्यन्त लज्जित होकर वह उस स्थान से हट गया।

श्लोक 62 (skanda.8.171.62)

ततोन्ये दैवतश्रेष्ठा ये यमानिलपुरस्सराः । मतिं चक्रुः समुद्धर्तुं यत्नं शक्त्याश्च दंशिताः

tatonye daivataśreṣṭhā ye yamānilapurassarāḥ | matiṁ cakruḥ samuddhartuṁ yatnaṁ śaktyāśca daṁśitāḥ

तब अन्य श्रेष्ठ देवता, यम-वायु आदि, उसे उखाड़ने का विचार करके, कवचयुक्त होकर प्रयत्न करने लगे,

श्लोक 63 (skanda.8.171.63)

न च चालयितुं शेकुस्तां शक्तिममरोत्तमाः । ततो विष्णुरमेयात्मा देवान् दृष्ट्वा हतौजसः

na ca cālayituṁ śekustāṁ śaktimamarottamāḥ | tato viṣṇurameyātmā devān dṛṣṭvā hataujasaḥ

परन्तु वे अमरश्रेष्ठ भी उस शक्ति को हिला न सके। तब विष्णु, अमेयात्मा, देवताओं को तेजहीन देखकर,

श्लोक 64 (skanda.8.171.64)

शक्तिमुद्धर्तुमुत्सेहे समक्षं त्रिदिवौकसाम् । तेनासौ चाल्यमानापि यस्माच्छक्तिर्धरातले

śaktimuddhartumutsehe samakṣaṁ tridivaukasām | tenāsau cālyamānāpi yasmācchaktirdharātale

त्रिदिवौकसों के समक्ष उस शक्ति को उखाड़ने का प्रयत्न करने लगे; और उनके द्वारा हिलाये जाने पर भी वह शक्ति, धरातल पर,

श्लोक 65 (skanda.8.171.65)

न चचाल महावीर्या स्कन्दतेजोबलान्विता । ततो विष्णुरमेयात्मा ज्ञात्वा तत्त्वार्थमादृतः

na cacāla mahāvīryā skandatejobalānvitā | tato viṣṇurameyātmā jñātvā tattvārthamādṛtaḥ

स्कन्द के तेज-बल से युक्त, महावीर्यावाली, नहीं हिली। तब विष्णु, अमेयात्मा, तत्त्वार्थ को जानकर, आदरपूर्वक,

श्लोक 66 (skanda.8.171.66)

कुमारं पूजयन् भक्त्या शक्त्युत्क्षेपान्न्यवर्तत । अथ सर्वेमरा व्यास विष्णुश्च सुरसत्तमः

kumāraṁ pūjayan bhaktyā śaktyutkṣepānnyavartata | atha sarvemarā vyāsa viṣṇuśca surasattamaḥ

भक्ति से कुमार का पूजन करते हुए, शक्ति उखाड़ने से निवृत्त हो गये। तब, हे व्यास! समस्त अमर, और सुरश्रेष्ठ विष्णु,

श्लोक 67 (skanda.8.171.67)

संस्तुत्य षड्मुख देवमिदमाहुर्महौजसः । देवानां महादेवसुतःप्रभुः

saṁstutya ṣaḍmukha devamidamāhurmahaujasaḥ | devānāṁ mahādevasutaḥprabhuḥ

षण्मुख महातेजस्वी देव की स्तुति करके यह कहने लगे - [मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं] देवताओं के, महादेव के महाबली पुत्र प्रभु,

श्लोक 68 (skanda.8.171.68)

नाथः पालयिता स्रष्टा आर्तिघ्नः प्रवरो महान् । त्वया नाथेन देवेश वयं सर्वे सुनिर्वृताः

nāthaḥ pālayitā sraṣṭā ārtighnaḥ pravaro mahān | tvayā nāthena deveśa vayaṁ sarve sunirvṛtāḥ

नाथ, पालक, स्रष्टा, पीड़ाहर, श्रेष्ठ, महान् - आप जैसे नाथ से, हे देवेश! हम सब सुखी हैं।

श्लोक 69 (skanda.8.171.69)

तिष्ठामः सहिताः सर्वे त्वमस्मान् पाहि सर्वतः । शक्रव्यतिक्रमं चैव बालिश्यान्मोहकारितम्

tiṣṭhāmaḥ sahitāḥ sarve tvamasmān pāhi sarvataḥ | śakravyatikramaṁ caiva bāliśyānmohakāritam

हम सब मिलकर यहीं रहते हैं; आप हमें सब ओर से रक्षा करें। शक्र का यह अपराध, जो बालिशता और मोह से किया गया,

श्लोक 70 (skanda.8.171.70)

प्रणयाद्याचितोस्माभिः क्षन्तुमर्हसि सर्वदा । एवं स भगवान् सर्वैः कुमारः संस्तुतोमरैः

praṇayādyācitosmābhiḥ kṣantumarhasi sarvadā | evaṁ sa bhagavān sarvaiḥ kumāraḥ saṁstutomaraiḥ

प्रेमवश हमारे द्वारा याचित होकर, सदा क्षमा करने योग्य है।' इस प्रकार वे भगवान् कुमार समस्त अमरों द्वारा स्तुत होकर,

श्लोक 71 (skanda.8.171.71)

क्रोधं तत्याज शक्रे तु तुतोष च दिवौकसाम् । ततस्ते गिरयः सर्वे देवी च हिमवत्सुता

krodhaṁ tatyāja śakre tu tutoṣa ca divaukasām | tataste girayaḥ sarve devī ca himavatsutā

शक्र के प्रति क्रोध त्याग दिये, और दिवौकसों से सन्तुष्ट हुए। तब वे सभी पर्वत, तथा देवी हिमवत्सुता,

श्लोक 72 (skanda.8.171.72)

देवराजस्तथा शक्रो हृष्टा गुहमपूजयन् । भगवानपि संतुष्टस्तनयाय वरान् ददौ

devarājastathā śakro hṛṣṭā guhamapūjayan | bhagavānapi saṁtuṣṭastanayāya varān dadau

और देवराज शक्र भी, प्रसन्न होकर गुह की पूजा करने लगे; भगवान् भी सन्तुष्ट होकर पुत्र को वरदान दिये।

श्लोक 73 (skanda.8.171.73)

ययौ चापि गिरेः शृङ्गं दिव्यं हिमवतः शुभम् । सार्धं गुहेन देव्या च मातॄणां गणनायकः

yayau cāpi gireḥ śṛṅgaṁ divyaṁ himavataḥ śubham | sārdhaṁ guhena devyā ca mātṝṇāṁ gaṇanāyakaḥ

और गणनायक गुह के साथ, देवी सहित, हिमालय के दिव्य, शुभ शिखर को गये।

श्लोक 74 (skanda.8.171.74)

क्रौञ्चेन सहिताश्चापि मेरुविन्ध्यादयोचलाः । शक्रश्च सुरराट् देवः स्वानि सद्मानि भेजिरे

krauñcena sahitāścāpi meruvindhyādayocalāḥ | śakraśca surarāṭ devaḥ svāni sadmāni bhejire

क्रौंच सहित मेरु-विन्ध्य आदि पर्वत भी, और सुरराज देव शक्र भी, अपने-अपने भवनों को गये।

श्लोक 75 (skanda.8.171.75)

एवमेतद्यथा क्रौञ्चः क्रौञ्चसारसवासिनः । गुहेन दारितः शक्त्या पश्चाच्चैव कृतोमरः

evametadyathā krauñcaḥ krauñcasārasavāsinaḥ | guhena dāritaḥ śaktyā paścāccaiva kṛtomaraḥ

इस प्रकार यह हुआ कि क्रौंच-सारस पक्षियों के निवासस्थान क्रौंच, गुह द्वारा शक्ति से विदीर्ण किया गया, और पश्चात् जीवित भी किया गया;

श्लोक 76 (skanda.8.171.76)

दृश्यते चापि तत् क्रौञ्चे क्षतं शक्त्याचलोत्तमे । नैकदैवतसंवासं यदभूद्विस्तृतं महत्

dṛśyate cāpi tat krauñce kṣataṁ śaktyācalottame | naikadaivatasaṁvāsaṁ yadabhūdvistṛtaṁ mahat

और आज भी उस पर्वतोत्तम क्रौंच पर वह शक्ति का घाव दिखायी देता है, जो अनेक देवताओं का विस्तृत महान् निवासस्थान बन गया।

श्लोक 77 (skanda.8.171.77)

एतत्ते कथितं सर्वं क्रौञ्चदारणमद्भुतम् । य इमं शृणुयान्मर्त्त्यः सर्वपापैः स मुच्यते

etatte kathitaṁ sarvaṁ krauñcadāraṇamadbhutam | ya imaṁ śṛṇuyānmarttyaḥ sarvapāpaiḥ sa mucyate

यह तुम्हें क्रौंच के विदीर्ण होने का सम्पूर्ण अद्भुत वृत्तान्त कहा गया; जो मनुष्य इसे सुनता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 78 (skanda.8.171.78)

व्यास उवाच । भगवन् परमेशानो मातॄणां नायकः कथम् । का एता मातरश्चापि शंसैतत् पृच्छतो मम

vyāsa uvāca | bhagavan parameśāno mātṝṇāṁ nāyakaḥ katham | kā etā mātaraścāpi śaṁsaitat pṛcchato mama

व्यास ने कहा - हे भगवन्! परमेश्वर मातृगणों के नायक कैसे हैं? ये मातृगण कौन हैं? मुझ पूछनेवाले को यह बताइये।

श्लोक 79 (skanda.8.171.79)

कथं मातृगणा जाताः किन्निमित्तमथापि च । किंवीर्या किंप्रभावाश्च संभूतास्ते गणाः प्रभो

kathaṁ mātṛgaṇā jātāḥ kinnimittamathāpi ca | kiṁvīryā kiṁprabhāvāśca saṁbhūtāste gaṇāḥ prabho

मातृगण कैसे उत्पन्न हुए, और किस निमित्त से? हे प्रभो! वे गण कितने वीर्यवान् और कितने प्रभावशाली उत्पन्न हुए?

श्लोक 80 (skanda.8.171.80)

कश्चासामाश्रयो येन वर्तन्ते तद्गणाः शुभाः । केन मृष्टाः स्वयं वापि एतदिच्छामि वेदितुम्

kaścāsāmāśrayo yena vartante tadgaṇāḥ śubhāḥ | kena mṛṣṭāḥ svayaṁ vāpi etadicchāmi veditum

उनका आश्रय क्या है, जिससे वे शुभ गण स्थित रहते हैं? किसके द्वारा वे पूजित होते हैं, अथवा स्वयं ही - यह मैं जानना चाहता हूँ।

श्लोक 81 (skanda.8.171.81)

सनत्कुमार उवाच । अत्र ते वर्त्तयिष्यामि मातॄणामुद्भवं शुभम् । पुरा हि भगवान् ब्रह्मा सृष्ट्वेमा विविधाः प्रजाः

sanatkumāra uvāca | atra te varttayiṣyāmi mātṝṇāmudbhavaṁ śubham | purā hi bhagavān brahmā sṛṣṭvemā vividhāḥ prajāḥ

सनत्कुमार ने कहा - यहाँ मैं तुम्हें मातृगणों की शुभ उत्पत्ति बताऊँगा। पूर्वकाल में भगवान् ब्रह्मा ने इन विविध प्रजाओं को उत्पन्न करके,

श्लोक 82 (skanda.8.171.82)

अवेक्षमाणः कालेय चचार विबुधेश्वरः । स कदाचित् प्रजाध्यक्षः संध्याकाल उपागते

avekṣamāṇaḥ kāleya cacāra vibudheśvaraḥ | sa kadācit prajādhyakṣaḥ saṁdhyākāla upāgate

काल का अवलोकन करते हुए विचरण किया, वे विबुधेश्वर। एक बार वे प्रजाध्यक्ष, सन्ध्याकाल के आने पर,

श्लोक 83 (skanda.8.171.83)

देशं रम्यं समासाद्य तीरे पूर्वमहोदधेः । रम्ये चकार संध्यां हि वर्षकोटिमतन्द्रितः

deśaṁ ramyaṁ samāsādya tīre pūrvamahodadheḥ | ramye cakāra saṁdhyāṁ hi varṣakoṭimatandritaḥ

पूर्व समुद्र के तट पर एक रमणीय प्रदेश को पाकर, उस रमणीय स्थान में अथक होकर एक करोड़ वर्ष तक सन्ध्या की।

श्लोक 84 (skanda.8.171.84)

कृतसंध्यस्ततो देवः कमलासनसंस्थितः । चिन्तयामास रम्योयं देशो दृष्टिमनोहरः

kṛtasaṁdhyastato devaḥ kamalāsanasaṁsthitaḥ | cintayāmāsa ramyoyaṁ deśo dṛṣṭimanoharaḥ

सन्ध्या करके तब वह देव, कमलासन पर स्थित, विचार करने लगे - 'यह प्रदेश रमणीय है, दृष्टि को मनोहर लगनेवाला -

श्लोक 85 (skanda.8.171.85)

करोम्यत्र पुरं रम्यं सर्वकामसमन्वितम् । इति संचिन्त्य स व्यास भगवान् सर्वसृक् प्रभुः

karomyatra puraṁ ramyaṁ sarvakāmasamanvitam | iti saṁcintya sa vyāsa bhagavān sarvasṛk prabhuḥ

मैं यहाँ सर्वकाम-युक्त एक रमणीय नगर बनाऊँ।' ऐसा विचार करके, हे व्यास! वे भगवान् सर्वस्रष्टा प्रभु,

श्लोक 86 (skanda.8.171.86)

तस्मिन् रम्ये प्रदेशे तु चक्रे पुरमनुत्तमम् । लोहितासितसौवर्णैः प्रस्तरैश्चामितप्रभम्

tasmin ramye pradeśe tu cakre puramanuttamam | lohitāsitasauvarṇaiḥ prastaraiścāmitaprabham

उस रमणीय प्रदेश में एक अनुपम नगर बनाया, लाल, काले और सुवर्ण के पत्थरों से अमित प्रभावाला,

श्लोक 87 (skanda.8.171.87)

अट्टाट्टहासकैश्चैव खातकैश्च समन्वितम् । शृङ्गाटकचतुष्केण चतुष्पादमिव स्थितम्

aṭṭāṭṭahāsakaiścaiva khātakaiśca samanvitam | śṛṅgāṭakacatuṣkeṇa catuṣpādamiva sthitam

अट्टालिकाओं और खातों से युक्त, चौराहों से युक्त होकर मानो चार पैरोंवाला खड़ा हो,

श्लोक 88 (skanda.8.171.88)

वप्रखातकसंयुक्तैर्गृहैश्चापि महाधनैः । मध्ये मन्दाकिनी वापी सरिद्दिव्या मनोहरा

vaprakhātakasaṁyuktairgṛhaiścāpi mahādhanaiḥ | madhye mandākinī vāpī sariddivyā manoharā

प्राचीरों-खातों से युक्त तथा अत्यन्त धनवान् भवनों से युक्त; उसके मध्य में मन्दाकिनी नामक दिव्य, मनोहर सरिता-वापी,

श्लोक 89 (skanda.8.171.89)

नलिनीवनसंछन्ना प्रहृष्टखगनादिता । तत् सृष्ट्वा तु पुरं ब्रह्मा सौवर्णं मणिभूषितम्

nalinīvanasaṁchannā prahṛṣṭakhaganāditā | tat sṛṣṭvā tu puraṁ brahmā sauvarṇaṁ maṇibhūṣitam

कमलवनों से आच्छादित, प्रसन्न पक्षियों की ध्वनि से युक्त। उस नगर को बनाकर ब्रह्मा, सुवर्णमय, मणिभूषित,

श्लोक 90 (skanda.8.171.90)

प्रोवाच वचनं व्यास परमाद्भुतमर्थवत् । रम्ये पुरवरे येस्मिन् वत्स्यन्ति सुकृताशिनः

provāca vacanaṁ vyāsa paramādbhutamarthavat | ramye puravare yesmin vatsyanti sukṛtāśinaḥ

हे व्यास! एक अत्यन्त अद्भुत, अर्थयुक्त वचन कहा - 'इस रमणीय श्रेष्ठ नगर में जो सुकृत भोगनेवाले निवास करेंगे,

श्लोक 91 (skanda.8.171.91)

अवध्यास्ते जराहीनास्तेजोबलसमन्विताः । भविष्यन्ति महाभागा मत्प्रसादान्न संशयः

avadhyāste jarāhīnāstejobalasamanvitāḥ | bhaviṣyanti mahābhāgā matprasādānna saṁśayaḥ

वे अवध्य, जरारहित, तेज-बल से युक्त होंगे; मेरी कृपा से महाभाग होंगे, इसमें सन्देह नहीं।'

श्लोक 92 (skanda.8.171.92)

ततः स भगवान्देव उवाच पुनरेव ह । अस्मिन सदैव कामानामिष्टानां सुरसत्तमः । । देवो वर्षति कोटिं वै तेनास्मिन् सुखिनो जनाः

tataḥ sa bhagavāndeva uvāca punareva ha | asmina sadaiva kāmānāmiṣṭānāṁ surasattamaḥ | | devo varṣati koṭiṁ vai tenāsmin sukhino janāḥ

तब वह भगवान् देव पुनः बोले - 'इस स्थान में सदा इच्छित कामनाओं का यह श्रेष्ठ देव करोड़ों वर्षा करेगा, जिससे यहाँ के लोग सुखी होंगे।'

श्लोक 93 (skanda.8.171.93)

एवं स भगवानुक्त्वा ब्रह्मा लोकपितामहः । अगच्छत् स्वसभां दिव्यां नैकसिद्धनिषेविताम्

evaṁ sa bhagavānuktvā brahmā lokapitāmahaḥ | agacchat svasabhāṁ divyāṁ naikasiddhaniṣevitām

ऐसा कहकर, वे भगवान् ब्रह्मा, लोकपितामह, अनेक सिद्धों से सेवित अपनी दिव्य सभा को चले गये।

श्लोक 94 (skanda.8.171.94)

तस्मिन् गते ततो व्यास असुरैर्दैत्यभाषितैः । अधिष्ठितं पुरं तद्वै सर्वैर्ब्राह्मणकंटकैः

tasmin gate tato vyāsa asurairdaityabhāṣitaiḥ | adhiṣṭhitaṁ puraṁ tadvai sarvairbrāhmaṇakaṁṭakaiḥ

उनके जाने पर, हे व्यास! दैत्यभाषी असुरों द्वारा वह नगर अधिष्ठित हो गया, वे सभी ब्राह्मणकंटक,

श्लोक 95 (skanda.8.171.95)

येषां पतिरसुक्रोधः सर्वशस्त्रभृतां वरः । ब्रह्महा यज्ञहा विप्र देवान्तकसुरान्तकः

yeṣāṁ patirasukrodhaḥ sarvaśastrabhṛtāṁ varaḥ | brahmahā yajñahā vipra devāntakasurāntakaḥ

जिनका स्वामी दुष्टक्रोधी, समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, ब्रह्महा, यज्ञहा, विप्रद्वेषी, देवान्तक-असुरान्तक था -

श्लोक 96 (skanda.8.171.96)

सिंहनादो भीमनादो मद इत्येवमादयः । अथ दैत्याः समागम्य हैमकुण्डपुरस्सराः । तस्मिन्पुरवरे स्थित्वा पीडां चक्रुरनेकशः

siṁhanādo bhīmanādo mada ityevamādayaḥ | atha daityāḥ samāgamya haimakuṇḍapurassarāḥ | tasminpuravare sthitvā pīḍāṁ cakruranekaśaḥ

सिंहनाद, भीमनाद, मद आदि; तब दैत्य मिलकर, हैमकुण्ड को आगे किये हुए, उस श्रेष्ठ नगर में स्थित होकर, अनेक प्रकार से पीड़ा देने लगे।

श्लोक 97 (skanda.8.171.97)

द्वेष्टारो जगतस्ते हि जघ्नुर्विप्रान् सहस्रशः । यज्ञहोमादिकाश्छिन्नाः क्रियास्तैरसुराधमैः

dveṣṭāro jagataste hi jaghnurviprān sahasraśaḥ | yajñahomādikāśchinnāḥ kriyāstairasurādhamaiḥ

जगत् के द्वेषी वे हजारों विप्रों को मार डालते थे; यज्ञ-होम आदि क्रियाएँ उन नीच असुरों द्वारा छिन्न कर दी गयीं।

श्लोक 98 (skanda.8.171.98)

तानेवंकारिणो ज्ञात्वा सर्व एव दिवौकसः । ब्रह्मलोकमथाभ्येत्य सर्वमश्रावयन् विभोः

tānevaṁkāriṇo jñātvā sarva eva divaukasaḥ | brahmalokamathābhyetya sarvamaśrāvayan vibhoḥ

इस प्रकार करते हुए उन्हें जानकर, समस्त देवगण ब्रह्मलोक जाकर सब कुछ प्रभु को सुनाने लगे।

श्लोक 99 (skanda.8.171.99)

वचो दिवौकसां श्रुत्वा ज्ञात्वा दैत्यविचेष्टितम् । नैतच्छक्यं मयेत्युक्त्वा ब्रह्मा सार्धं सुरोत्तमैः

vaco divaukasāṁ śrutvā jñātvā daityaviceṣṭitam | naitacchakyaṁ mayetyuktvā brahmā sārdhaṁ surottamaiḥ

देवताओं का वचन सुनकर, दैत्यों के आचरण को जानकर, 'यह मुझसे सम्भव नहीं' ऐसा कहकर ब्रह्मा सुरश्रेष्ठों सहित,

श्लोक 100 (skanda.8.171.100)

आजगाम भवं द्रष्टुं रम्यं हिमगिरेर्वनम् । यत्र गौरी तपस्तेपे भर्तुं देहार्धधारिणी

ājagāma bhavaṁ draṣṭuṁ ramyaṁ himagirervanam | yatra gaurī tapastepe bhartuṁ dehārdhadhāriṇī

भव के दर्शन के लिये, हिमगिरि के रमणीय वन में आये, जहाँ गौरी अपने पति की देहार्धधारिणी होकर तप कर रही थीं।

श्लोक 101 (skanda.8.171.101)

प्रविष्टास्तत्र ते देवा ब्रह्माद्याः सर्व एव हि । स्त्रिय एवाभवन् तूर्णं पार्वत्यास्तपसो बलात्

praviṣṭāstatra te devā brahmādyāḥ sarva eva hi | striya evābhavan tūrṇaṁ pārvatyāstapaso balāt

वहाँ प्रवेश करते ही वे देव, ब्रह्मादि सभी, पार्वती के तप के बल से तुरन्त स्त्री बन गये।

श्लोक 102 (skanda.8.171.102)

ततस्तान् देवदेवेशः स्त्रीभूतान् हि सुरोत्तमान् । किमर्थमागता यूयमिति पप्रच्छ शूलधृक्

tatastān devadeveśaḥ strībhūtān hi surottamān | kimarthamāgatā yūyamiti papraccha śūladhṛk

तब उन स्त्रीरूप हुए श्रेष्ठ देवताओं से देवदेवेश्वर शूलधारी ने पूछा - 'तुम किसलिये आये हो?'

श्लोक 103 (skanda.8.171.103)

ततस्ते सहिताः सर्वे पूर्वं दैत्यविमर्दनम् । निवेद्य शम्भवे पश्चात् कृच्छ्रं स्त्रीभावमात्मनः

tataste sahitāḥ sarve pūrvaṁ daityavimardanam | nivedya śambhave paścāt kṛcchraṁ strībhāvamātmanaḥ

तब वे सभी मिलकर पहले दैत्यों द्वारा किये गये विध्वंस को, और फिर अपनी स्त्रीभाव की कठिनाई को शम्भु से निवेदन करके,

श्लोक 104 (skanda.8.171.104)

यथैवं पुरुषाः पूर्व भवाम इति तेब्रुवन् । तानुवाचाथ देवेशः सुरान् स्त्रीभावमागतान

yathaivaṁ puruṣāḥ pūrva bhavāma iti tebruvan | tānuvācātha deveśaḥ surān strībhāvamāgatāna

बोले - 'हम पूर्ववत् पुरुष कैसे बनें?' तब देवेश्वर ने स्त्रीभाव को प्राप्त उन देवताओं से यह कहा -

श्लोक 105 (skanda.8.171.105)

यात यूयं सुराः सर्वे स्त्रियो भूत्वासुरान्तिकम् । स्त्रीणामेव हि ते वध्या दानवा बलदर्पिताः

yāta yūyaṁ surāḥ sarve striyo bhūtvāsurāntikam | strīṇāmeva hi te vadhyā dānavā baladarpitāḥ

'तुम सब देवता स्त्री होकर असुरों के समीप जाओ; क्योंकि वे बलदर्पित दानव स्त्रियों द्वारा ही वध्य हैं।

श्लोक 106 (skanda.8.171.106)

तनूर्मूर्त्तिमतीः कृत्वा परतो मातरः शुभाः । यै य एव यथा पूर्वं भविष्यथ सुरोत्तमाः

tanūrmūrttimatīḥ kṛtvā parato mātaraḥ śubhāḥ | yai ya eva yathā pūrvaṁ bhaviṣyatha surottamāḥ

शरीर धारण करके, हे शुभ मातरो! फिर पूर्ववत्, प्रत्येक अपने-अपने रूप में, हे सुरश्रेष्ठो! तुम बन जाओगे।'

श्लोक 107 (skanda.8.171.107)

अथ भूयः प्रणम्येशं देवता इदमब्रुवन् । आत्मनोपि तनुं देव कुरु मूर्त्तिमतीं स्त्रियम्

atha bhūyaḥ praṇamyeśaṁ devatā idamabruvan | ātmanopi tanuṁ deva kuru mūrttimatīṁ striyam

तब पुनः ईश्वर को प्रणाम करके देवताओं ने यह कहा - 'हे देव! अपनी भी एक मूर्तिमती स्त्री देह बनाइये,

श्लोक 108 (skanda.8.171.108)

यया सार्धं बलाद् दैत्यान् हंस्यामः परमेश्वर । ततो देवोसृजद्देवीं रूद्राणीं मातरं शुभाम्

yayā sārdhaṁ balād daityān haṁsyāmaḥ parameśvara | tato devosṛjaddevīṁ rūdrāṇīṁ mātaraṁ śubhām

जिसके साथ हम बलपूर्वक दैत्यों को मार सकें, हे परमेश्वर!' तब देव ने शुभ देवी रुद्राणी मातृ को उत्पन्न किया,

श्लोक 109 (skanda.8.171.109)

विकृतं रूपमास्थाय द्वितीयामपि मातरम् । नाम्ना तु बहुमांसान्तां जगत्संहाररूपिणीम्

vikṛtaṁ rūpamāsthāya dvitīyāmapi mātaram | nāmnā tu bahumāṁsāntāṁ jagatsaṁhārarūpiṇīm

और विकृत रूप धारण करके दूसरी मातृ भी, 'बहुमांसा' नाम से जगत्संहाररूपिणी।

श्लोक 110 (skanda.8.171.110)

नियोगाद् देवदेवस्य ततो विष्णुरपि प्रभुः । मातरावसृजद् द्वे तु वाराहीं वैष्णवीमपि । अभूत् पितामहाद् ब्राह्मी शर्वाणी शङ्करादपि

niyogād devadevasya tato viṣṇurapi prabhuḥ | mātarāvasṛjad dve tu vārāhīṁ vaiṣṇavīmapi | abhūt pitāmahād brāhmī śarvāṇī śaṅkarādapi

देवदेव की आज्ञा से तब विष्णु, प्रभु, ने दो मातृ उत्पन्न कीं, वाराही और वैष्णवी; पितामह से ब्राह्मी, तथा शंकर से शर्वाणी हुईं।

श्लोक 111 (skanda.8.171.111)

कौमारी षड्मुखाच्चापि विष्णोरपि च वैष्णवी । वाराही माधवाद् देवी माहेन्द्री च पुरन्दरात्

kaumārī ṣaḍmukhāccāpi viṣṇorapi ca vaiṣṇavī | vārāhī mādhavād devī māhendrī ca purandarāt

षण्मुख से भी कौमारी, विष्णु से भी वैष्णवी; माधव से देवी वाराही, और पुरन्दर से माहेन्द्री।

श्लोक 112 (skanda.8.171.112)

सर्वतेजोमयो देवी मातॄणां प्रवरा शुभा । बहुमांसा महाविद्या बभूव वृषभध्वजात्

sarvatejomayo devī mātṝṇāṁ pravarā śubhā | bahumāṁsā mahāvidyā babhūva vṛṣabhadhvajāt

सर्वतेजोमयी देवी, मातृगणों में श्रेष्ठ शुभ, बहुमांसा, महाविद्या, वृषभध्वज से उत्पन्न हुईं।

श्लोक 113 (skanda.8.171.113)

सर्वासां देवतानां च देहेभ्यो मातरः शुभाः । स्वरूपबलधारिण्यो निर्जग्मुर्दैत्यनाशनाः । रो

sarvāsāṁ devatānāṁ ca dehebhyo mātaraḥ śubhāḥ | svarūpabaladhāriṇyo nirjagmurdaityanāśanāḥ | ro

समस्त देवताओं के शरीरों से भी, शुभ मातरें, स्वरूप-बल धारण करती हुई, दैत्यनाशिनी होकर निकलीं -

श्लोक 114 (skanda.8.171.114)

वायव्या वारुणी याम्या कौबेरी च महाबलाः । महाकाली तथाग्नेयी अन्याश्चैव सहस्रशः

vāyavyā vāruṇī yāmyā kauberī ca mahābalāḥ | mahākālī tathāgneyī anyāścaiva sahasraśaḥ

वायव्या, वारुणी, याम्या और कौबेरी, महाबली, महाकाली तथा आग्नेयी भी, और अन्य सहस्रों भी।

श्लोक 115 (skanda.8.171.115)

ता गत्वा तत्पुरं रम्यं दैत्यान् भीमपराक्रमान् । जघ्नुर्बहुविधं देव्यो घोरनादैर्विभीषणैः

tā gatvā tatpuraṁ ramyaṁ daityān bhīmaparākramān | jaghnurbahuvidhaṁ devyo ghoranādairvibhīṣaṇaiḥ

वे जाकर उस रमणीय नगर में, भीमपराक्रमी दैत्यों को, अनेक प्रकार से, घोर भयंकर नादों से, मारने लगीं, वे देवियाँ।

श्लोक 116 (skanda.8.171.116)

दैत्यहीनं च तच्चक्रुः पुराग्र्यं हेमभूषितम् । अथ दैत्यैर्हतैस्सवैर्देवदेव उमापतिः

daityahīnaṁ ca taccakruḥ purāgryaṁ hemabhūṣitam | atha daityairhataissavairdevadeva umāpatiḥ

और उस श्रेष्ठ, स्वर्णभूषित नगर को दैत्यरहित कर दिया। तब समस्त दैत्यों के मारे जाने पर, देवदेव उमापति,

श्लोक 117 (skanda.8.171.117)

आजगाम प्रदेशं तं मातॄणां वरदित्सया । तान् दृष्टवा निहतान्सर्वान् दैत्यानमरविद्विषः

ājagāma pradeśaṁ taṁ mātṝṇāṁ varaditsayā | tān dṛṣṭavā nihatānsarvān daityānamaravidviṣaḥ

उस प्रदेश में मातृओं को वर देने की इच्छा से आये; उन सब मारे गये अमरद्वेषी दैत्यों को देखकर,

श्लोक 118 (skanda.8.171.118)

परितुष्टस्तदा तासां वरान्प्रादाद् वृषध्वजः । जगतो मातरो यूयं मातृभूता भविष्यथः

parituṣṭastadā tāsāṁ varānprādād vṛṣadhvajaḥ | jagato mātaro yūyaṁ mātṛbhūtā bhaviṣyathaḥ

तब सन्तुष्ट होकर वृषभध्वज ने उन्हें वर दिये - 'तुम जगत् की माताएँ बनोगी, मातृस्वरूप होकर।

श्लोक 119 (skanda.8.171.119)

युष्माकं ये भविष्यन्ति भक्ताः पुरुषपुंगवाः । स्त्रियौ वापि महाभागा न तान् हिंसन्ति हिंसकाः

yuṣmākaṁ ye bhaviṣyanti bhaktāḥ puruṣapuṁgavāḥ | striyau vāpi mahābhāgā na tān hiṁsanti hiṁsakāḥ

तुम्हारे जो भक्त पुरुषश्रेष्ठ होंगे, अथवा महाभाग स्त्रियाँ भी, उन्हें हिंसक जीव नहीं मार पायेंगे।

श्लोक 120 (skanda.8.171.120)

मृता मम गणाश्चापि भविष्यन्त्यजरामराः । भवतीनामिदं स्थानं कोटीवर्षमिति श्रुतम्

mṛtā mama gaṇāścāpi bhaviṣyantyajarāmarāḥ | bhavatīnāmidaṁ sthānaṁ koṭīvarṣamiti śrutam

मेरे गण भी मरकर अजर-अमर होंगे। तुम्हारा यह स्थान, कोटीवर्ष नाम से प्रसिद्ध,

श्लोक 121 (skanda.8.171.121)

भविष्यति जगत्ख्यातं सर्वपापप्रमोचनम् । अहं हेतुर्हि युष्माकं यस्मात् सृष्टा मयैव च

bhaviṣyati jagatkhyātaṁ sarvapāpapramocanam | ahaṁ heturhi yuṣmākaṁ yasmāt sṛṣṭā mayaiva ca

जगत् में विख्यात होगा, सर्वपापप्रमोचक। मैं ही तुम सबका हेतु हूँ, क्योंकि मैंने ही तुम्हें उत्पन्न किया है;

श्लोक 122 (skanda.8.171.122)

हेतुकेश्वरनाम्नाहं स्थास्याम्यत्र वरप्रदः । युष्माभिः सह वत्स्यामि नायकत्वं व्यवस्थितः

hetukeśvaranāmnāhaṁ sthāsyāmyatra varapradaḥ | yuṣmābhiḥ saha vatsyāmi nāyakatvaṁ vyavasthitaḥ

'हेतुकेश्वर' नाम से मैं यहाँ वरदाता होकर स्थित रहूँगा। तुम्हारे साथ नायकत्व में स्थित होकर निवास करूँगा।

श्लोक 123 (skanda.8.171.123)

यस्तु युष्मान्मया सार्धं विधिवत् पूजयिष्यति । सर्वपापविमुक्तात्मा स परां गतिमाप्स्यति

yastu yuṣmānmayā sārdhaṁ vidhivat pūjayiṣyati | sarvapāpavimuktātmā sa parāṁ gatimāpsyati

जो कोई मेरे साथ तुम्हारा विधिपूर्वक पूजन करेगा, वह सर्वपापविमुक्त होकर परम गति को प्राप्त होगा।

श्लोक 124 (skanda.8.171.124)

दानवा निहता यस्माच्छूलेन बहुमांसया । शूलकुण्डमिदं नाम्ना ख्यातं तीर्थं भविष्यति

dānavā nihatā yasmācchūlena bahumāṁsayā | śūlakuṇḍamidaṁ nāmnā khyātaṁ tīrthaṁ bhaviṣyati

चूँकि दानव यहाँ शूल से, बहुमांसा द्वारा मारे गये, इसलिये यह 'शूलकुण्ड' नाम से विख्यात तीर्थ होगा।

श्लोक 125 (skanda.8.171.125)

इह शूलोदकं पीत्वा बहुमांसां प्रणम्य च । अधृष्यः सर्वहिंस्राणां भविष्यति नरोत्तमः

iha śūlodakaṁ pītvā bahumāṁsāṁ praṇamya ca | adhṛṣyaḥ sarvahiṁsrāṇāṁ bhaviṣyati narottamaḥ

यहाँ शूलोदक पीकर और बहुमांसा को प्रणाम करके, उत्तम पुरुष सभी हिंसकों के लिये अजेय हो जायेगा।

श्लोक 126 (skanda.8.171.126)

प्रतिकूलेति विख्याता रम्या मन्दाकिनी नदी । रुधिरौघवती सेह भवतीनां भविष्यति

pratikūleti vikhyātā ramyā mandākinī nadī | rudhiraughavatī seha bhavatīnāṁ bhaviṣyati

'प्रतिकूला' नाम से विख्यात यह रमणीय मन्दाकिनी नदी, तुम्हारे लिये यहाँ रुधिर-प्रवाहवाली हो जायेगी।

श्लोक 127 (skanda.8.171.127)

अहं ब्रह्मा च विष्णुश्च ऋषयश्च तपोधनाः । मातृतन्त्राणि दिव्यानि मातृयज्ञविधिं परम्

ahaṁ brahmā ca viṣṇuśca ṛṣayaśca tapodhanāḥ | mātṛtantrāṇi divyāni mātṛyajñavidhiṁ param

मैं, ब्रह्मा, विष्णु और तपोधन ऋषिगण, दिव्य मातृतन्त्रों और परम मातृयज्ञविधि को,

श्लोक 128 (skanda.8.171.128)

पुण्यानि प्रकरिष्यामो यजनं यैरवाप्स्यथ । ब्राह्मं स्वायंभुवं चैव कौमारं यामलं तथा

puṇyāni prakariṣyāmo yajanaṁ yairavāpsyatha | brāhmaṁ svāyaṁbhuvaṁ caiva kaumāraṁ yāmalaṁ tathā

पुण्यमय बनायेंगे, जिनसे तुम्हारा यजन प्राप्त होगा - ब्राह्म, स्वायंभुव, कौमार, यामल भी,

श्लोक 129 (skanda.8.171.129)

सारस्वतं स गान्धारमैशानं नन्दियामलम् । तन्त्राण्येतानि युष्माकं तथान्यानि सहस्रशः

sārasvataṁ sa gāndhāramaiśānaṁ nandiyāmalam | tantrāṇyetāni yuṣmākaṁ tathānyāni sahasraśaḥ

सारस्वत, गान्धार, ऐशान, नन्दियामल - ये तन्त्र तुम्हारे होंगे, तथा अन्य सहस्रों भी।

श्लोक 130 (skanda.8.171.130)

भविष्यन्ति नरा यैस्तु युष्मान् यक्ष्यन्ति भक्तितः । नराणां यजमानानां वरान् यूयं प्रदास्यथ

bhaviṣyanti narā yaistu yuṣmān yakṣyanti bhaktitaḥ | narāṇāṁ yajamānānāṁ varān yūyaṁ pradāsyatha

मनुष्य उत्पन्न होंगे जो भक्तिपूर्वक इनसे तुम्हारा यजन करेंगे; उन यजमान मनुष्यों को तुम वर प्रदान करोगी।

श्लोक 131 (skanda.8.171.131)

दिव्यसिद्धिप्रदा देव्यो दिव्ययोगा भविष्यथ । याश्च नार्यः सदा युष्मान् यक्ष्यन्ते सरहस्यतः

divyasiddhipradā devyo divyayogā bhaviṣyatha | yāśca nāryaḥ sadā yuṣmān yakṣyante sarahasyataḥ

तुम दिव्यसिद्धिप्रदा, दिव्ययोगावाली देवियाँ बनोगी; और जो स्त्रियाँ सदा रहस्यपूर्वक तुम्हारा यजन करेंगी -

श्लोक 132 (skanda.8.171.132)

योगेश्वर्यो भविष्यन्ति रामा दिव्यपराक्रमाः । छगलः कुम्भकर्णश्च मदीयौ गणनायकौ

yogeśvaryo bhaviṣyanti rāmā divyaparākramāḥ | chagalaḥ kumbhakarṇaśca madīyau gaṇanāyakau

वे योगेश्वरी, दिव्यपराक्रमी सुन्दरियाँ बनेंगी। छगल और कुम्भकर्ण, मेरे दो गणनायक,

श्लोक 133 (skanda.8.171.133)

युष्माकं द्वारपालत्वे स्थास्यतस्तौ ममाज्ञया । कोटीवर्षमिदं स्थानं मातॄणां प्रियमुत्तमम्

yuṣmākaṁ dvārapālatve sthāsyatastau mamājñayā | koṭīvarṣamidaṁ sthānaṁ mātṝṇāṁ priyamuttamam

तुम्हारे द्वारपाल के रूप में मेरी आज्ञा से स्थित रहेंगे। यह कोटीवर्ष स्थान, मातृओं का प्रिय उत्तम,

श्लोक 134 (skanda.8.171.134)

श्मशानं प्रवरं दिव्यं भविष्यति सुखप्रदम् । वरानेवं हि ताँल्लब्ध्वा मातरो लोकमातरः

śmaśānaṁ pravaraṁ divyaṁ bhaviṣyati sukhapradam | varānevaṁ hi tā~llabdhvā mātaro lokamātaraḥ

एक श्रेष्ठ, दिव्य, सुखप्रद श्मशान होगा।' इस प्रकार ये वर पाकर, वे मातरें, लोकमाताएँ,

श्लोक 135 (skanda.8.171.135)

भक्त्या प्रणम्य देवेशं मुमुदुर्भृशमर्द्दिताः । ततःप्रभृति ताः सर्वाः सहिताः शशिमौलिना

bhaktyā praṇamya deveśaṁ mumudurbhṛśamardditāḥ | tataḥprabhṛti tāḥ sarvāḥ sahitāḥ śaśimaulinā

अत्यन्त पीड़ित होते हुए भी, भक्तिपूर्वक देवेश्वर को प्रणाम करके अत्यन्त हर्षित हुईं। तब से वे सभी, शशिमौलि के साथ,

श्लोक 136 (skanda.8.171.136)

कोटीवर्षे वसन्ति स्म सर्वलोकाभयप्रदाः । एवं स भगवान् देवो मातॄणां गणनायकः । अभवच्छङ्करो व्यास यन्मां त्वं पृष्टवानसि

koṭīvarṣe vasanti sma sarvalokābhayapradāḥ | evaṁ sa bhagavān devo mātṝṇāṁ gaṇanāyakaḥ | abhavacchaṅkaro vyāsa yanmāṁ tvaṁ pṛṣṭavānasi

कोटीवर्ष में निवास करने लगीं, समस्त लोकों को अभयदान देती हुई। इस प्रकार वे भगवान् देव, मातृगणों के नायक, शंकर हुए, हे व्यास! जो तुमने मुझसे पूछा था।

श्लोक 137 (skanda.8.171.137)

उत्पत्तिमेतां जगतीश्वरीणां ब्रह्मेन्द्रशक्रानिलवन्दितानाम् । पठेन्मनुष्यः शृणुयाच्च नित्यं यः स्वर्गलोकं स मृतो लभेत

utpattimetāṁ jagatīśvarīṇāṁ brahmendraśakrānilavanditānām | paṭhenmanuṣyaḥ śṛṇuyācca nityaṁ yaḥ svargalokaṁ sa mṛto labheta

जो मनुष्य इन जगदीश्वरियों की, ब्रह्मा-इन्द्र-शक्र-वायु द्वारा वन्दित इस उत्पत्ति को पढ़ता है या नित्य सुनता है, वह मृत्यु के पश्चात् स्वर्गलोक को प्राप्त करता है।

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