Skip to main content

अम्बिका खण्ड · अध्याय 172

पर्वतपक्षच्छेद

अध्याय 171अध्याय-सूचीअध्याय 173

श्लोक 1 (skanda.8.172.1)

सनत्कुमार उवाच । शक्रेण गिरयः पूर्वं छिन्नपक्षा यथा कृताः । तत् प्रवक्ष्यामि ते व्यास शृणु सर्वमशेषतः

sanatkumāra uvāca | śakreṇa girayaḥ pūrvaṁ chinnapakṣā yathā kṛtāḥ | tat pravakṣyāmi te vyāsa śṛṇu sarvamaśeṣataḥ

सनत्कुमार ने कहा - शक्र द्वारा पूर्वकाल में जैसे पर्वतों के पंख काटे गये, वह मैं तुम्हें बताऊँगा, हे व्यास! सम्पूर्ण रूप से सुनो।

श्लोक 2 (skanda.8.172.2)

पुरा सिंहवपुः कृत्वा विष्णुना परमौजसा । दैत्यदानवनाथे तु हिरण्यकशिपौ हते

purā siṁhavapuḥ kṛtvā viṣṇunā paramaujasā | daityadānavanāthe tu hiraṇyakaśipau hate

पूर्वकाल में विष्णु द्वारा परम तेजस्वी सिंहरूप धारण करके, जब दैत्य-दानवों के स्वामी हिरण्यकशिपु का वध हो गया,

श्लोक 3 (skanda.8.172.3)

प्रह्रादस्तत्सुतो दैत्यो विष्णुं प्रति चुकोप ह । हते पितरि स श्रीमान् महादैत्यपतीश्वरः

prahrādastatsuto daityo viṣṇuṁ prati cukopa ha | hate pitari sa śrīmān mahādaityapatīśvaraḥ

तब उसका पुत्र दैत्य प्रह्लाद विष्णु के प्रति क्रुद्ध हो गया; पिता के मारे जाने पर वह श्रीमान् महादैत्यपतीश्वर,

श्लोक 4 (skanda.8.172.4)

बहून्यब्दसहस्राणि चकारोग्रं महातपः । अथ देवश्चतुर्वक्त्रस्तुष्टस्तमसुराधिपम्

bahūnyabdasahasrāṇi cakārograṁ mahātapaḥ | atha devaścaturvaktrastuṣṭastamasurādhipam

अनेक सहस्र वर्षों तक उग्र महातप करने लगा। तब चतुर्मुख देव, उस असुराधिप से प्रसन्न होकर,

श्लोक 5 (skanda.8.172.5)

प्रोवाच स्वयमागत्य वरदोस्मीति सादरम् । प्रणम्योवाच वरदमिदं ब्रह्माणमागतम्

provāca svayamāgatya varadosmīti sādaram | praṇamyovāca varadamidaṁ brahmāṇamāgatam

स्वयं आकर आदरपूर्वक बोले - 'मैं वरदाता हूँ।' प्रणाम करके उस वरदाता, आये हुए ब्रह्मा से यह कहा -

श्लोक 6 (skanda.8.172.6)

प्रह्लादो मन्युतप्ताङ्गः पितुर्वधमनुस्मरन् । भगवन् यदि तुष्टोसि वरदश्च समागतः

prahlādo manyutaptāṅgaḥ piturvadhamanusmaran | bhagavan yadi tuṣṭosi varadaśca samāgataḥ

पिता के वध का स्मरण करते हुए, क्रोध से जलते अंगोंवाले प्रह्लाद ने - 'हे भगवन्! यदि आप प्रसन्न हैं और वरदाता होकर आये हैं,

श्लोक 7 (skanda.8.172.7)

राजानं हतवान् विष्णुः पितरं मम मायया । संग्रामे तमहं विष्णुं यथा हन्यां तथा कुरु

rājānaṁ hatavān viṣṇuḥ pitaraṁ mama māyayā | saṁgrāme tamahaṁ viṣṇuṁ yathā hanyāṁ tathā kuru

तो विष्णु ने मेरे पिता राजा को माया से मार डाला; युद्ध में मैं उस विष्णु को जैसे मार सकूँ, वैसा कीजिये।'

श्लोक 8 (skanda.8.172.8)

तमुवाच ततो ब्रह्मा प्रह्लादमसुरोत्तमम् । अजय्यः समरे विष्णुरवध्यश्च सुरासुरैः

tamuvāca tato brahmā prahlādamasurottamam | ajayyaḥ samare viṣṇuravadhyaśca surāsuraiḥ

तब ब्रह्मा ने असुरश्रेष्ठ प्रह्लाद से कहा - 'समर में विष्णु अजेय है और देवों-असुरों द्वारा अवध्य है।

श्लोक 9 (skanda.8.172.9)

प्रसादाद्देवदेवस्य जगत्स्रष्टुरुमापतेः । नैष शक्यो मया दातुं वरस्तुभ्यं महासुर

prasādāddevadevasya jagatsraṣṭurumāpateḥ | naiṣa śakyo mayā dātuṁ varastubhyaṁ mahāsura

देवदेव जगत्स्रष्टा उमापति की कृपा से, यह वर, हे महासुर! मैं तुम्हें देने में समर्थ नहीं हूँ।

श्लोक 10 (skanda.8.172.10)

अन्यं वृणु यथेष्टं त्वं वरं यावद्ददामि ते । चिन्तयित्वा ततो भूयो महाबुद्धिर्महासुरः

anyaṁ vṛṇu yatheṣṭaṁ tvaṁ varaṁ yāvaddadāmi te | cintayitvā tato bhūyo mahābuddhirmahāsuraḥ

जब तक मैं तुम्हें देता हूँ, तुम इच्छानुसार दूसरा वर माँगो।' तब पुनः विचार करके वह महाबुद्धि महासुर,

श्लोक 11 (skanda.8.172.11)

प्रोवाच वचनं देवं कमलासनसंस्थितम् । अजय्यो यद्यवध्यश्च स विष्णुर्देवसत्तमः

provāca vacanaṁ devaṁ kamalāsanasaṁsthitam | ajayyo yadyavadhyaśca sa viṣṇurdevasattamaḥ

कमलासनस्थ देव से यह वचन बोला - 'यदि वह देवश्रेष्ठ विष्णु अजेय और अवध्य है,

श्लोक 12 (skanda.8.172.12)

तस्य विष्णोस्ततो देव शक्रस्यान्यस्य वा रिपोः । अवध्योहमजय्यश्च संभवेयं तवाज्ञया

tasya viṣṇostato deva śakrasyānyasya vā ripoḥ | avadhyohamajayyaśca saṁbhaveyaṁ tavājñayā

तो, हे देव! उस विष्णु से, या शक्र से, या किसी अन्य शत्रु से, मैं अवध्य और अजेय बन जाऊँ, आपकी आज्ञा से।'

श्लोक 13 (skanda.8.172.13)

एवस्त्विति तं ब्रह्मा प्रोच्य दानवसत्तम । दिव्यपद्मासनो देवस्तत्रैवान्तरधीयत

evastviti taṁ brahmā procya dānavasattama | divyapadmāsano devastatraivāntaradhīyata

'ऐसा ही हो' - यह कहकर, हे दानवश्रेष्ठ! वह देव, अपने दिव्य पद्मासन पर, वहीं अन्तर्धान हो गये।

श्लोक 14 (skanda.8.172.14)

प्रह्लादोपि वरं लब्ध्वा ब्रह्मणः परमाद्भुतम् । पश्चिमस्योदधेस्तीरे तस्थौ चिन्ताकुलेन्द्रियः

prahlādopi varaṁ labdhvā brahmaṇaḥ paramādbhutam | paścimasyodadhestīre tasthau cintākulendriyaḥ

प्रह्लाद भी ब्रह्मा से यह परम अद्भुत वर पाकर, पश्चिम समुद्र के तट पर, चिन्ताकुल इन्द्रियोंवाला होकर स्थित हो गया -

श्लोक 15 (skanda.8.172.15)

कथं हन्यामहं विष्णुं शक्रं चैव शतक्रतुम् । एवं चिन्तयतस्तस्य प्रह्लादस्य सुरद्विषः

kathaṁ hanyāmahaṁ viṣṇuṁ śakraṁ caiva śatakratum | evaṁ cintayatastasya prahlādasya suradviṣaḥ

'मैं विष्णु को और शतक्रतु शक्र को कैसे मारूँ?' इस प्रकार सुरद्वेषी प्रह्लाद के इस प्रकार विचार करते हुए,

श्लोक 16 (skanda.8.172.16)

सर्वशैलाधिपः श्रीमाँश्चक्रमन् हिमवान् गिरिः । द्वाभ्यामुत्पत्य पक्षाभ्यामाजगाम वियच्चरः

sarvaśailādhipaḥ śrīmā~ścakraman himavān giriḥ | dvābhyāmutpatya pakṣābhyāmājagāma viyaccaraḥ

सर्वशैलाधिप, श्रीमान् हिमवान् पर्वत, दो पंखों से उड़कर, आकाशचर होकर आये।

श्लोक 17 (skanda.8.172.17)

पुरा हि गिरयो व्यास आसन् पक्षसमन्विताः । दिव्या वियद्गमाः सर्वे सर्वलोकचरास्तथा

purā hi girayo vyāsa āsan pakṣasamanvitāḥ | divyā viyadgamāḥ sarve sarvalokacarāstathā

क्योंकि पूर्वकाल में, हे व्यास! पर्वत पंखयुक्त होते थे, सभी दिव्य, आकाशगामी, समस्त लोकों में विचरण करनेवाले।

श्लोक 18 (skanda.8.172.18)

तमागतमथो दृष्ट्वा प्रह्रादो हिमवद्गिरिम् । प्राहेदं वचनं प्रीतः कृत्वा स्वागतमादितः

tamāgatamatho dṛṣṭvā prahrādo himavadgirim | prāhedaṁ vacanaṁ prītaḥ kṛtvā svāgatamāditaḥ

उस आये हुए हिमवान् पर्वत को देखकर प्रह्लाद, प्रसन्न होकर, पहले स्वागत करके, यह वचन बोला -

श्लोक 19 (skanda.8.172.19)

कश्यपस्य वयं पौत्रा दैत्या गिरिवराधिप । भवन्तोपि सुतास्तस्य देवा अपि महागिरे

kaśyapasya vayaṁ pautrā daityā girivarādhipa | bhavantopi sutāstasya devā api mahāgire

'हे पर्वतश्रेष्ठों के अधिप! हम दैत्य कश्यप के पौत्र हैं; आप भी उन्हीं के पुत्र हैं, हे महागिरे! देवता भी।

श्लोक 20 (skanda.8.172.20)

अस्माकं भवतां चैव एकस्मात् संभवो गिरे । देवता भ्रातरो भूत्वा अस्माकं देवताश्च हि

asmākaṁ bhavatāṁ caiva ekasmāt saṁbhavo gire | devatā bhrātaro bhūtvā asmākaṁ devatāśca hi

हम दोनों का, आपका और हमारा, एक ही स्रोत से उद्भव है, हे गिरे! देवता, भाई बनकर, हमारे ही देवता भी हैं।

श्लोक 21 (skanda.8.172.21)

अवमन्यासुरानस्मान् राज्यं कुर्वन्ति दर्पिताः । वयं यूयं च संगत्य जित्वा देवानशेषतः । त्रैलोक्यं सर्वमाक्रम्य राज्यं कुर्मो महागिरे

avamanyāsurānasmān rājyaṁ kurvanti darpitāḥ | vayaṁ yūyaṁ ca saṁgatya jitvā devānaśeṣataḥ | trailokyaṁ sarvamākramya rājyaṁ kurmo mahāgire

हमें असुर मानकर वे दर्पित होकर राज्य करते हैं। हम और आप मिलकर, देवताओं को सम्पूर्णतः जीतकर, त्रैलोक्य पर आक्रमण करके राज्य करें, हे महागिरे!

श्लोक 22 (skanda.8.172.22)

देवानां यजनं येषु हूयन्ते येषु चाग्नयः । प्रीयन्ते देवता येषु देशाँस्तानचलेश्वर

devānāṁ yajanaṁ yeṣu hūyante yeṣu cāgnayaḥ | prīyante devatā yeṣu deśā~stānacaleśvara

जिन प्रदेशों में देवताओं का यजन होता है, जहाँ अग्नियाँ प्रज्वलित की जाती हैं, जहाँ देवता प्रसन्न होते हैं, हे अचलेश्वर!

श्लोक 23 (skanda.8.172.23)

सहितः सर्वशैलैस्त्वमाक्रम्य त्वरितं जहि । इज्याहीनान् ततो देवान् सुखं हंस्याम निर्वृताः

sahitaḥ sarvaśailaistvamākramya tvaritaṁ jahi | ijyāhīnān tato devān sukhaṁ haṁsyāma nirvṛtāḥ

उन देशों पर समस्त पर्वतों सहित आक्रमण करके शीघ्र नष्ट कर दीजिये; तब यज्ञरहित हुए उन देवताओं को हम सुखपूर्वक, निर्वृत होकर मार डालेंगे।'

श्लोक 24 (skanda.8.172.24)

इत्युक्तो दैत्यराजेन हिमवानचलोत्तमः । नैतद्युक्तमिति प्राह साशङ्को दानवाधिपम्

ityukto daityarājena himavānacalottamaḥ | naitadyuktamiti prāha sāśaṅko dānavādhipam

दैत्यराज द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, अचलोत्तम हिमवान् ने आशंकित होकर दानवाधिप से कहा - 'यह उचित नहीं है।'

श्लोक 25 (skanda.8.172.25)

पुनरेव ततः प्राह हिमवन्तं महासुरः । मत्तो युक्तं परं त्वं चेद्यदि वेत्सि नगाधिप

punareva tataḥ prāha himavantaṁ mahāsuraḥ | matto yuktaṁ paraṁ tvaṁ cedyadi vetsi nagādhipa

तब पुनः महासुर ने हिमवान् से कहा - 'यदि तुम, हे नगाधिप! मुझसे बढ़कर किसी को जानते हो तो बताओ।

श्लोक 26 (skanda.8.172.26)

एष त्वां सहितं शैलेर्नेष्यामि निधनं समम् । अप्रमत्तस्तदा तिष्ठ यावत्त्वां हन्मि पर्वत

eṣa tvāṁ sahitaṁ śailerneṣyāmi nidhanaṁ samam | apramattastadā tiṣṭha yāvattvāṁ hanmi parvata

यह मैं तुम्हें समस्त पर्वतों सहित समान रूप से मृत्यु तक ले जाऊँगा; असावधान मत रहना, हे पर्वत! जब तक मैं तुम्हें मार न दूँ।'

श्लोक 27 (skanda.8.172.27)

दैत्यराजं ततः क्रुद्धं दृष्ट्वा पर्वतसत्तमः । करोम्येवमिति प्राह ततो दैत्यस्तुतोष सः

daityarājaṁ tataḥ kruddhaṁ dṛṣṭvā parvatasattamaḥ | karomyevamiti prāha tato daityastutoṣa saḥ

तब क्रुद्ध दैत्यराज को देखकर वह पर्वतश्रेष्ठ बोला - 'ऐसा ही करूँगा' - तब वह दैत्य सन्तुष्ट हुआ।

श्लोक 28 (skanda.8.172.28)

अथ शैलैस्तदा सार्धं हिमवानचलोत्तमः । प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा चक्रे देशोपमर्दनम्

atha śailaistadā sārdhaṁ himavānacalottamaḥ | prahlādasya vacaḥ śrutvā cakre deśopamardanam

तब हिमवान् अचलोत्तम, पर्वतों सहित, प्रह्लाद के वचन सुनकर, देशों का उपमर्दन करने लगे -

श्लोक 29 (skanda.8.172.29)

पितृदेवात्मिकाः सर्वा यज्ञहोमादिकाः क्रियाः । वर्तन्ते येषु देशेषु गिरयस्तान् समाक्रमन

pitṛdevātmikāḥ sarvā yajñahomādikāḥ kriyāḥ | vartante yeṣu deśeṣu girayastān samākramana

जिन देशों में पितृ-देवसम्बन्धी सभी यज्ञ-होम आदि क्रियाएँ होती थीं, उन्हें पर्वतों ने आक्रान्त कर दिया।

श्लोक 30 (skanda.8.172.30)

अथोत्सन्नेषु देशेषु नारदो मुनिसत्तमः । शक्रायाश्रावयत् सर्वं पर्वतानां व्यतिक्रमम्

athotsanneṣu deśeṣu nārado munisattamaḥ | śakrāyāśrāvayat sarvaṁ parvatānāṁ vyatikramam

तब उन उजड़े हुए देशों के विषय में मुनिश्रेष्ठ नारद ने शक्र को पर्वतों के इस अतिक्रमण की सारी बात सुनायी।

श्लोक 31 (skanda.8.172.31)

तच्छ्रुत्वा क्रोधसन्तप्तो देवराजः शतक्रतुः । समागम्याचलान् प्राह किमेतदिति मन्युमान्

tacchrutvā krodhasantapto devarājaḥ śatakratuḥ | samāgamyācalān prāha kimetaditi manyumān

उसे सुनकर, क्रोध से सन्तप्त होकर, देवराज शतक्रतु ने पर्वतों के पास आकर क्रोधपूर्वक कहा - 'यह क्या है?'

श्लोक 32 (skanda.8.172.32)

अथोचुर्गिरयो व्यास क्रुद्धं देवगणाधिपम् । प्रह्लादस्य भयाद्देव महादैत्यपतेर्वयम्

athocurgirayo vyāsa kruddhaṁ devagaṇādhipam | prahlādasya bhayāddeva mahādaityapatervayam

तब, हे व्यास! पर्वतों ने क्रुद्ध देवगणाधिप से कहा - 'हे देव! महादैत्यपति प्रह्लाद के भय से हम,

श्लोक 33 (skanda.8.172.33)

इमं व्यतिक्रमं प्राप्ता न दोषो नः कथञ्चन । अथ चेन्मन्यसे दोषमस्माकममराधिप

imaṁ vyatikramaṁ prāptā na doṣo naḥ kathañcana | atha cenmanyase doṣamasmākamamarādhipa

इस अतिक्रमण को प्राप्त हुए हैं; हममें कोई दोष नहीं है। और यदि आप इसे हमारा दोष मानते हैं, हे अमराधिप!

श्लोक 34 (skanda.8.172.34)

प्रह्रादान्तिक्रमागच्छ प्रयाम सहिता द्रुतम् । तेनेदं कारितं सर्वं यज्ञदेशोपमर्दनम् । दैत्यराजेन बलिना युष्मदप्रियलिप्सया

prahrādāntikramāgaccha prayāma sahitā drutam | tenedaṁ kāritaṁ sarvaṁ yajñadeśopamardanam | daityarājena balinā yuṣmadapriyalipsayā

तो प्रह्लाद के पास हमारे साथ शीघ्र चलिये; यह सब, यज्ञभूमियों का उपमर्दन,

श्लोक 35 (skanda.8.172.35)

नापराधोयमस्माकं तथा त्वं विद्धि देवप । तानेव ब्रुवतः शक्रः सुतरां मन्युमान् गिरीन्

nāparādhoyamasmākaṁ tathā tvaṁ viddhi devapa | tāneva bruvataḥ śakraḥ sutarāṁ manyumān girīn

उस बलवान् दैत्यराज द्वारा, आपको अप्रिय करने की इच्छा से करवाया गया है; यह हमारा अपराध नहीं है - ऐसा जानिये, हे देवरक्षक!' - पर्वतों के इस प्रकार कहने पर, शक्र अधिक क्रुद्ध होकर,

श्लोक 36 (skanda.8.172.36)

पक्षहीनान् तदा चक्रे क्षिप्त्वा वज्रं पुनःपुनः । हीनपक्षास्ततस्ते तु सर्व एवाचलेश्वराः

pakṣahīnān tadā cakre kṣiptvā vajraṁ punaḥpunaḥ | hīnapakṣāstataste tu sarva evācaleśvarāḥ

उन्हें तब पंखरहित कर दिया, बार-बार वज्र फेंककर। तब पंखरहित होकर वे सभी पर्वतेश्वर,

श्लोक 37 (skanda.8.172.37)

पेतुर्महीतले व्यास छिन्नपक्षाः खगा इव । अथ दैत्यपतिः श्रुत्वा प्रह्रादोसुरपुङ्गवः

peturmahītale vyāsa chinnapakṣāḥ khagā iva | atha daityapatiḥ śrutvā prahrādosurapuṅgavaḥ

पृथ्वी पर गिर पड़े, हे व्यास! जैसे कटे पंखोंवाले पक्षी। तब यह सुनकर दैत्यपति प्रह्लाद, असुरपुंगव,

श्लोक 38 (skanda.8.172.38)

पक्षच्छेदं नगेन्द्राणां भृशं चुक्रोध पीडितः । किङ्करोमीति संचिन्त्य चिरं दैत्यगणाधिपः

pakṣacchedaṁ nagendrāṇāṁ bhṛśaṁ cukrodha pīḍitaḥ | kiṅkaromīti saṁcintya ciraṁ daityagaṇādhipaḥ

पर्वतों के पंख काटे जाने से पीड़ित होकर अत्यन्त क्रुद्ध हो गया; बहुत देर तक क्या करूँ यह सोचकर, वह दैत्यगणाधिप,

श्लोक 39 (skanda.8.172.39)

वदर्याश्रममागत्य ददर्श विष्णुमास्थितम् । तस्यासीत् सुमहद्युद्धं विष्णुना सार्धमद्भुतम्

vadaryāśramamāgatya dadarśa viṣṇumāsthitam | tasyāsīt sumahadyuddhaṁ viṣṇunā sārdhamadbhutam

बदरी आश्रम में जाकर वहाँ स्थित विष्णु को देखा; उनके साथ विष्णु का अत्यन्त महान् अद्भुत युद्ध हुआ।

श्लोक 40 (skanda.8.172.40)

न शशाक च तं विष्णुर्जेतुं प्रह्लादमोजसा । तयोर्युद्धमभूद् घोरं दिव्यमब्दशतं पुरा

na śaśāka ca taṁ viṣṇurjetuṁ prahlādamojasā | tayoryuddhamabhūd ghoraṁ divyamabdaśataṁ purā

और विष्णु अपने बल से प्रह्लाद को जीतने में समर्थ नहीं हुए; उन दोनों का एक बार सौ दिव्य वर्षों तक घोर युद्ध हुआ।

श्लोक 41 (skanda.8.172.41)

आत्मानं वेद हीनं च विष्णुः प्रह्लाददानवात् । सोभियुक्तस्तदा युद्धे विष्णुः परमधर्मवित्

ātmānaṁ veda hīnaṁ ca viṣṇuḥ prahlādadānavāt | sobhiyuktastadā yuddhe viṣṇuḥ paramadharmavit

विष्णु ने अपने को प्रह्लाद दानव से हीन जाना; तब युद्ध में लगे हुए विष्णु, परमधर्मवेत्ता,

श्लोक 42 (skanda.8.172.42)

अशक्तो दानवं जेतुं मन्युमानभवत् प्रभुः । अथ ध्यात्वा महादेवं प्रणम्य च पुनः पुनः

aśakto dānavaṁ jetuṁ manyumānabhavat prabhuḥ | atha dhyātvā mahādevaṁ praṇamya ca punaḥ punaḥ

दानव को जीतने में असमर्थ, क्रोधयुक्त हो गये, वे प्रभु। तब महादेव का ध्यान करके, बार-बार प्रणाम करके,

श्लोक 43 (skanda.8.172.43)

सस्मार पर । पिनाकिनः

sasmāra para | pinākinaḥ

उन्होंने शूलधारी के उस [मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं] का स्मरण किया।

श्लोक 44 (skanda.8.172.44)

अवध्यत्वमजय्यत्वं सर्वलोकनिवासिभिः । प्रसादं तमनुस्मृत्य शैवं विष्णुः सुरोत्तमः

avadhyatvamajayyatvaṁ sarvalokanivāsibhiḥ | prasādaṁ tamanusmṛtya śaivaṁ viṣṇuḥ surottamaḥ

समस्त लोकनिवासियों द्वारा अवध्यत्व और अजेयत्व की उस शैव कृपा का स्मरण करके, विष्णु, सुरश्रेष्ठ,

श्लोक 45 (skanda.8.172.45)

महासत्वबलो भूत्वा दैत्यमभ्यद्रवद् बली । हीयमानमथात्मानं हिण्यकशिपोः सुतः

mahāsatvabalo bhūtvā daityamabhyadravad balī | hīyamānamathātmānaṁ hiṇyakaśipoḥ sutaḥ

महान् सत्त्व-बलयुक्त होकर, वे बलवान् दैत्य पर आक्रमण करने लगे; तब हिरण्यकशिपु का वह पुत्र,

श्लोक 46 (skanda.8.172.46)

ज्ञात्वा च बलिनं विष्णुं युद्धदेशादपाक्रमत् । अजितं विष्णुनात्मानं शिवतेजोविमोहितः

jñātvā ca balinaṁ viṣṇuṁ yuddhadeśādapākramat | ajitaṁ viṣṇunātmānaṁ śivatejovimohitaḥ

विष्णु को बलवान् जानकर युद्धभूमि से हट गया; शिवतेज से मोहित होकर, विष्णु द्वारा अजित अपने को,

श्लोक 47 (skanda.8.172.47)

प्रह्रादो जितमात्मानं बुबुधे दानवेश्वरः । ब्रह्मणोपि वरं लब्ध्वा अजयय्यत्वमथात्मनः

prahrādo jitamātmānaṁ bubudhe dānaveśvaraḥ | brahmaṇopi varaṁ labdhvā ajayayyatvamathātmanaḥ

दानवेश्वर प्रह्लाद ने विजित समझा; ब्रह्मा से भी अपने अजेयत्व का वर पाकर,

श्लोक 48 (skanda.8.172.48)

जितमेव तदात्मानममन्यत महासुरः । प्रह्रादासुरसंग्रामं घोरं देवभयंकरम्

jitameva tadātmānamamanyata mahāsuraḥ | prahrādāsurasaṁgrāmaṁ ghoraṁ devabhayaṁkaram

वह महासुर अपने को वस्तुतः विजित हुआ ही मानता रहा। प्रह्लाद-असुर का वह घोर, देवभयंकर युद्ध,

श्लोक 49 (skanda.8.172.49)

अभूदब्दशतं दिव्यं विष्णुना सार्धमद्भुतम् । न श्रुतेन न वीर्येण न शौर्येण न तेजसा

abhūdabdaśataṁ divyaṁ viṣṇunā sārdhamadbhutam | na śrutena na vīryeṇa na śauryeṇa na tejasā

विष्णु के साथ अद्भुत रूप से सौ दिव्य वर्षों तक चला। न श्रुति से, न वीर्य से, न शौर्य से, न तेज से,

श्लोक 50 (skanda.8.172.50)

न बुद्ध्या न च धर्मेण प्रह्रादसदृशोसुरः । हिरण्यकशिपुर्नासीद्राजा तत्सदृशो महान्

na buddhyā na ca dharmeṇa prahrādasadṛśosuraḥ | hiraṇyakaśipurnāsīdrājā tatsadṛśo mahān

न बुद्धि से, न धर्म से भी प्रह्लाद के समान कोई असुर था; हिरण्यकशिपु भी उसके समान महान् राजा नहीं था।

श्लोक 51 (skanda.8.172.51)

नान्धको न हिरण्याक्षः प्रह्लादसदृशो बले । भृगुशापात् किलायातो दैत्यत्वं विष्णुरेव सः

nāndhako na hiraṇyākṣaḥ prahlādasadṛśo bale | bhṛguśāpāt kilāyāto daityatvaṁ viṣṇureva saḥ

न अन्धक, न हिरण्याक्ष बल में प्रह्लाद के समान थे; भृगु के शाप से ही विष्णु स्वयं दैत्यत्व को प्राप्त हुए थे।

श्लोक 52 (skanda.8.172.52)

शौर्येण स्पृहयन्ति स्म श्रुतेन विनयेन च । दिवौकसोपि संसिद्धाः प्रह्रादस्य महात्मनः

śauryeṇa spṛhayanti sma śrutena vinayena ca | divaukasopi saṁsiddhāḥ prahrādasya mahātmanaḥ

शौर्य से, श्रुति से और विनय से भी, स्वयं सिद्ध दिवौकस भी, महात्मा प्रह्लाद की स्पृहा करते थे।

श्लोक 53 (skanda.8.172.53)

नाभवंस्तस्य राज्ये तु दुःखशोकान्विताः प्रजाः । एवं स दानवश्रेष्ठः कृत्वा युद्धं तु विष्णुना

nābhavaṁstasya rājye tu duḥkhaśokānvitāḥ prajāḥ | evaṁ sa dānavaśreṣṭhaḥ kṛtvā yuddhaṁ tu viṣṇunā

उसके राज्य में प्रजाएँ दुःख-शोक से युक्त नहीं थीं। इस प्रकार वह दानवश्रेष्ठ, विष्णु के साथ युद्ध करके,

श्लोक 54 (skanda.8.172.54)

पश्चात्तापोपतप्ताङ्गो विषयेभ्यो गतस्पृहः । वरदानमनित्यं तज् ज्ञात्वा च तपसः फलम्

paścāttāpopataptāṅgo viṣayebhyo gataspṛhaḥ | varadānamanityaṁ taj jñātvā ca tapasaḥ phalam

पश्चात्ताप से जलते अंगोंवाला, विषयों से स्पृहारहित हो गया; वरदान की अनित्यता और तप के फल को भी जानकर,

श्लोक 55 (skanda.8.172.55)

निःस्पृहः सर्वकार्येषु विषयेप्साविवर्जितः । सर्वसन्न्यस्तकर्मा तु ध्यानाभ्यासपरायणः

niḥspṛhaḥ sarvakāryeṣu viṣayepsāvivarjitaḥ | sarvasannyastakarmā tu dhyānābhyāsaparāyaṇaḥ

सब कार्यों में निःस्पृह, विषयों की इच्छा से रहित, समस्त कर्मों का सन्न्यास करके,

श्लोक 56 (skanda.8.172.56)

प्रवव्राज महादैत्यः शमेप्सुर्मोक्षसिद्धये । पुनरावर्तकं जन्म बुद्ध्वा चानित्यता पराम्

pravavrāja mahādaityaḥ śamepsurmokṣasiddhaye | punarāvartakaṁ janma buddhvā cānityatā parām

वह महादैत्य, ध्यानाभ्यास में परायण, शान्ति की इच्छा से, मोक्षसिद्धि के लिये, बार-बार लौटनेवाले जन्म की अनित्यता को जानकर, प्रव्रज्या को प्राप्त हुआ।

श्लोक 57 (skanda.8.172.57)

कष्टं राज्यमिति ज्ञात्वा प्रह्रादः परमार्थवित् । अभिषिच्य सुतं राज्ये दितिजानां विरोचनम्

kaṣṭaṁ rājyamiti jñātvā prahrādaḥ paramārthavit | abhiṣicya sutaṁ rājye ditijānāṁ virocanam

राज्य को कष्टप्रद जानकर, परमार्थवेत्ता प्रह्लाद ने अपने पुत्र विरोचन को दितिजों के राज्य पर अभिषिक्त करके,

श्लोक 58 (skanda.8.172.58)

दैत्यदानवराजानं कृत्वा तमसुरेश्वरम् । मोक्षसिद्धिं परामिच्छन् प्रव्रज्याकृतनिश्चयः

daityadānavarājānaṁ kṛtvā tamasureśvaram | mokṣasiddhiṁ parāmicchan pravrajyākṛtaniścayaḥ

उसे दैत्य-दानवों का राजा, असुरेश्वर बनाकर, परम मोक्षसिद्धि की इच्छा से, प्रव्रज्या का निश्चय करके,

श्लोक 59 (skanda.8.172.59)

वरं तत्त्वमथान्वेष्टुं गुणातीतमजं शिवम् । साक्षाद् भगवतः शिष्यं कपिलस्यासुरिं मुनिम्

varaṁ tattvamathānveṣṭuṁ guṇātītamajaṁ śivam | sākṣād bhagavataḥ śiṣyaṁ kapilasyāsuriṁ munim

गुणातीत, अजन्मा, शिव, श्रेष्ठ तत्त्व की खोज के लिये - साक्षात् भगवान् कपिल के शिष्य आसुरि मुनि के पास,

श्लोक 60 (skanda.8.172.60)

शिष्यत्वेनोपसंगम्य मोक्षविद्यामवाप्तवान् । प्रकृतीनां परं तत्त्वं विकाराणां परं तथा

śiṣyatvenopasaṁgamya mokṣavidyāmavāptavān | prakṛtīnāṁ paraṁ tattvaṁ vikārāṇāṁ paraṁ tathā

शिष्य बनकर उनके समीप जाकर मोक्षविद्या प्राप्त की - प्रकृतियों का परम तत्त्व, तथा विकारों का परम तत्त्व भी,

श्लोक 61 (skanda.8.172.61)

क्षेत्रज्ञं पुरुषं ज्ञात्वा भोक्तारं भोक्तृवर्जितम् । मोक्षविद्यापरार्थज्ञः सांख्यसिद्धान्तपारगः

kṣetrajñaṁ puruṣaṁ jñātvā bhoktāraṁ bhoktṛvarjitam | mokṣavidyāparārthajñaḥ sāṁkhyasiddhāntapāragaḥ

क्षेत्रज्ञ पुरुष को, भोक्ता को भोगरहित जानकर; मोक्षविद्या के परम अर्थ को जाननेवाला, सांख्यसिद्धान्त में पारंगत,

श्लोक 62 (skanda.8.172.62)

सिद्धः पञ्चशिखो नाम्ना सोभवन्मुनिसत्तम । स योगं परमं लब्ध्वा सांख्याचार्यो महामुनिः । दुःखत्रयविनिर्मुक्तः प्राप्तवान् पदमव्ययम्

siddhaḥ pañcaśikho nāmnā sobhavanmunisattama | sa yogaṁ paramaṁ labdhvā sāṁkhyācāryo mahāmuniḥ | duḥkhatrayavinirmuktaḥ prāptavān padamavyayam

'पंचशिख' नाम से सिद्ध हुआ, वह मुनिश्रेष्ठ; परम योग पाकर वह सांख्याचार्य महामुनि, तीनों दुःखों से मुक्त होकर अव्यय पद को प्राप्त हुआ।

श्लोक 63 (skanda.8.172.63)

श्रीमानेवं त्रिभुवनरिपुर्दैत्यराजो महात्मा कृत्वा वैरं विबुधगुरुणा विष्णुना दीर्घकालम् । सिद्धः पश्चाज्जगदभयदः प्राप्तयोगश्च भूत्वा मुक्तः पश्चात् स पदममृतं ब्रह्म चाद्यं ह्यवाप

śrīmānevaṁ tribhuvanaripurdaityarājo mahātmā kṛtvā vairaṁ vibudhaguruṇā viṣṇunā dīrghakālam | siddhaḥ paścājjagadabhayadaḥ prāptayogaśca bhūtvā muktaḥ paścāt sa padamamṛtaṁ brahma cādyaṁ hyavāpa

इस प्रकार वह श्रीमान्, त्रिभुवन का शत्रु, महात्मा दैत्यराज, विबुधगुरु विष्णु के साथ दीर्घकाल तक वैर करके, पश्चात् सिद्ध होकर, जगत् को अभय देनेवाला, योग को प्राप्त होकर, अन्त में मुक्त होकर, आद्य अमृत ब्रह्मपद को प्राप्त हुआ।

श्लोक 64 (skanda.8.172.64)

क्षेत्रज्ञबोद्धा गुणविप्रयुक्तो दुःखैर्विहीनो भवपाशबन्धैः । तामिस्रमोहप्रतिबन्धमुक्तो योगोश्वरोसौ दितिजाधिपोभूत्

kṣetrajñaboddhā guṇaviprayukto duḥkhairvihīno bhavapāśabandhaiḥ | tāmisramohapratibandhamukto yogośvarosau ditijādhipobhūt

क्षेत्रज्ञ का ज्ञाता, गुणों से रहित, संसार-पाश के बन्धनों के दुःखों से मुक्त, तिमिर-मोह के प्रतिबन्ध से मुक्त, वह दितिजाधिप योगेश्वर बन गया।

श्लोक 65 (skanda.8.172.65)

एवं ताँश्छिन्नपक्षाँस्तु गिरीन् सर्वान् पुरन्दरः । प्रचकार मुनिश्रेष्ठ प्राक् पृष्टो यदहं त्वया

evaṁ tā~śchinnapakṣā~stu girīn sarvān purandaraḥ | pracakāra muniśreṣṭha prāk pṛṣṭo yadahaṁ tvayā

इस प्रकार पुरन्दर ने उन सभी पर्वतों को पंखरहित किया, हे मुनिश्रेष्ठ! जो तुमने मुझसे पहले पूछा था।

अध्याय 171अध्याय-सूचीअध्याय 173