अम्बिका खण्ड · अध्याय 174
पाशुपतयोगवर्णन-प्रथम
श्लोक 1 (skanda.8.174.1)
व्यास उवाच । भगवन् यत्त्वया प्रोक्तं दक्षयज्ञवधे तदा । प्राप्य पाशुपतं योगं ब्रह्माद्यास्त्रिदिवौकसः
vyāsa uvāca | bhagavan yattvayā proktaṁ dakṣayajñavadhe tadā | prāpya pāśupataṁ yogaṁ brahmādyāstridivaukasaḥ
व्यास ने कहा - हे भगवन्! दक्षयज्ञ के विध्वंस के समय आपने जो कहा था कि ब्रह्मादि त्रिदिवौकस पाशुपत योग को प्राप्त करके,
श्लोक 2 (skanda.8.174.2)
लेभिरे परमं तत्त्वं ज्ञानेन हि महामुने । तन्मे कथय भक्ताय शिष्याय परिपृच्छते
lebhire paramaṁ tattvaṁ jñānena hi mahāmune | tanme kathaya bhaktāya śiṣyāya paripṛcchate
ज्ञान से परम तत्त्व को प्राप्त हुए, हे महामुने! वह मुझे बताइये, आपके भक्त, पूछनेवाले शिष्य को।
श्लोक 3 (skanda.8.174.3)
कीदृशं तत्परं योगं ज्ञानं पाशुपतं शुभम् । यज्ज्ञात्वा ब्राह्मणाः सिद्धाः प्राप्नुयुर्मोक्षमुत्तमम् । इति पृष्टस्तु शिष्येण प्रोवाच मुनिसत्तमः
kīdṛśaṁ tatparaṁ yogaṁ jñānaṁ pāśupataṁ śubham | yajjñātvā brāhmaṇāḥ siddhāḥ prāpnuyurmokṣamuttamam | iti pṛṣṭastu śiṣyeṇa provāca munisattamaḥ
वह परम, शुभ पाशुपत योग-ज्ञान कैसा है, जिसे जानकर ब्राह्मण सिद्ध होकर उत्तम मोक्ष को प्राप्त करते हैं? इस प्रकार शिष्य द्वारा पूछे जाने पर मुनिश्रेष्ठ ने कहा।
श्लोक 4 (skanda.8.174.4)
सनत्कुमार उवाच । साधु व्यास महाबुद्धे मुमुक्षुरसि पुत्रक । यन्मां पृच्छसि तज्ज्ञानं योगं माहेश्वरं परम्
sanatkumāra uvāca | sādhu vyāsa mahābuddhe mumukṣurasi putraka | yanmāṁ pṛcchasi tajjñānaṁ yogaṁ māheśvaraṁ param
सनत्कुमार ने कहा - साधु, हे व्यास महाबुद्धे! तुम मुमुक्षु हो, हे पुत्रक! तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, वह ज्ञान परम माहेश्वर योग है,
श्लोक 5 (skanda.8.174.5)
सर्वासां योगविद्यानां यत्तत्त्वं परिकीर्त्यते । सांख्ययोगागमोपेताः सर्वाध्यात्मविशारदाः
sarvāsāṁ yogavidyānāṁ yattattvaṁ parikīrtyate | sāṁkhyayogāgamopetāḥ sarvādhyātmaviśāradāḥ
जो समस्त योगविद्याओं का तत्त्व कहा जाता है - सांख्य-योग-आगमों से युक्त, समस्त अध्यात्म में निपुण होकर भी,
श्लोक 6 (skanda.8.174.6)
योगैश्वर्यमपि प्राप्य तत्त्वं नैवोपलेभिरे । यदबुद्ध्वा महाभाग ज्ञानं शङ्करभाषितम्
yogaiśvaryamapi prāpya tattvaṁ naivopalebhire | yadabuddhvā mahābhāga jñānaṁ śaṅkarabhāṣitam
योगैश्वर्य को भी प्राप्त करके जिस तत्त्व को नहीं जान पाये, जिसे बिना जाने, हे महाभाग! वह शंकर द्वारा कहा गया ज्ञान है।
श्लोक 7 (skanda.8.174.7)
तद्यथा कथितं तेषां त्र्यम्बकेण दिवौकसाम् । तत्तेहं संप्रवक्ष्यामि संक्षेपात्तत्त्वनिश्चयम्
tadyathā kathitaṁ teṣāṁ tryambakeṇa divaukasām | tattehaṁ saṁpravakṣyāmi saṁkṣepāttattvaniścayam
जैसे उन देवताओं को त्र्यम्बक ने कहा था, वही तत्त्वनिश्चय मैं तुम्हें संक्षेप में बताऊँगा।
श्लोक 8 (skanda.8.174.8)
विस्तरेण न तच्छक्यं वक्तुं वर्षशतैरपि । तस्याहं स्थितपक्षन्तु संसारोत्पत्तिनाशनम्
vistareṇa na tacchakyaṁ vaktuṁ varṣaśatairapi | tasyāhaṁ sthitapakṣantu saṁsārotpattināśanam
विस्तार से यह सौ वर्षों में भी कहा नहीं जा सकता; मेरा वह स्थित मत, जो संसार की उत्पत्ति का नाश करनेवाला है,
श्लोक 9 (skanda.8.174.9)
मुक्तिसिद्धिप्रदं वक्ष्ये संक्षेपान्मतमुत्तमम् । नमस्कृत्य महेशानं पुरुषं भूतभावनम्
muktisiddhipradaṁ vakṣye saṁkṣepānmatamuttamam | namaskṛtya maheśānaṁ puruṣaṁ bhūtabhāvanam
मुक्तिसिद्धि प्रदान करनेवाला, मैं संक्षेप में उत्तम मत कहूँगा, महेशान को, पुरुष को, भूतभावन को नमस्कार करके,
श्लोक 10 (skanda.8.174.10)
प्रकृतेः परमं गुह्यं पुद्गलं परमेष्ठिनम् । यं सांख्याः पुरुषं प्राहुः पञ्चविंशमजं विभुम्
prakṛteḥ paramaṁ guhyaṁ pudgalaṁ parameṣṭhinam | yaṁ sāṁkhyāḥ puruṣaṁ prāhuḥ pañcaviṁśamajaṁ vibhum
प्रकृति से परे गुह्य, पुद्गल, परमेष्ठी को - जिसे सांख्यगण पुरुष, पञ्चविंशक, अजन्मा, विभु कहते हैं,
श्लोक 11 (skanda.8.174.11)
योगाश्चापि हि षड्विंशं व्यापिनं त्रिगुणात्मकम् । योसृजत् सृष्टिकाले तु देवौ सर्वजगत्सृजौ
yogāścāpi hi ṣaḍviṁśaṁ vyāpinaṁ triguṇātmakam | yosṛjat sṛṣṭikāle tu devau sarvajagatsṛjau
और योगीजन भी षड्विंशक, व्यापी, त्रिगुणात्मक कहते हैं - जिसने सृष्टिकाल में सम्पूर्ण जगत् के सृजनकर्ता दो देवताओं को,
श्लोक 12 (skanda.8.174.12)
प्रजापती महात्मानौ ध्यात्वा विष्णुपितामहौ । तं प्रणम्य महादेवं त्र्यक्षं वरदमीश्वरम्
prajāpatī mahātmānau dhyātvā viṣṇupitāmahau | taṁ praṇamya mahādevaṁ tryakṣaṁ varadamīśvaram
महात्मा प्रजापतियों विष्णु और पितामह को, ध्यान द्वारा उत्पन्न किया - उस महादेव, त्र्यक्ष, वरदाता ईश्वर को प्रणाम करके,
श्लोक 13 (skanda.8.174.13)
प्रवक्ष्यामि मतं तस्य योगसिद्धान्तनिश्चयम् । लक्षणं विद्धि योगस्य प्रोच्यमानमिदं मया
pravakṣyāmi mataṁ tasya yogasiddhāntaniścayam | lakṣaṇaṁ viddhi yogasya procyamānamidaṁ mayā
मैं उनका मत, योगसिद्धान्त का निश्चय कहूँगा; योग का यह लक्षण जानो, जो मेरे द्वारा कहा जा रहा है -
श्लोक 14 (skanda.8.174.14)
छिद्यन्ते पशुपाशानि यस्याभ्यासान्महामुने । प्रत्ययस्य बहिर्लोपो मनस्यात्मनि संस्थिते
chidyante paśupāśāni yasyābhyāsānmahāmune | pratyayasya bahirlopo manasyātmani saṁsthite
जिसके अभ्यास से, हे महामुने! पशु के पाश छिन्न हो जाते हैं - बाह्य प्रत्ययों का लोप, मन का आत्मा में स्थित होना,
श्लोक 15 (skanda.8.174.15)
अभिसन्धिः परे चैव ईश्वरस्यात्मनश्च ह । एष योग इति व्यास कीर्तितः शम्भुना पुरा
abhisandhiḥ pare caiva īśvarasyātmanaśca ha | eṣa yoga iti vyāsa kīrtitaḥ śambhunā purā
तथा परम ईश्वर और आत्मा के साथ अभिसन्धि (मिलन) - यही योग है, हे व्यास! जो पूर्वकाल में शम्भु द्वारा कहा गया,
श्लोक 16 (skanda.8.174.16)
भवजन्मापहः सूक्ष्मः प्रपन्नानां दिवौकसाम् । शरीरे तिष्ठतः पुंसो यदात्मनि मनः स्थितम्
bhavajanmāpahaḥ sūkṣmaḥ prapannānāṁ divaukasām | śarīre tiṣṭhataḥ puṁso yadātmani manaḥ sthitam
भव-जन्म को दूर करनेवाला, सूक्ष्म, शरणागत दिवौकसों के लिये - शरीर में स्थित पुरुष का, जब मन आत्मा में स्थित हो जाता है,
श्लोक 17 (skanda.8.174.17)
अवितर्कं बहिश्चैव सूक्ष्ममभ्यासयोजितम् । कृतानां प्रत्ययैः सूक्ष्मैः सुखदुःखादिसंज्ञिनाम्
avitarkaṁ bahiścaiva sūkṣmamabhyāsayojitam | kṛtānāṁ pratyayaiḥ sūkṣmaiḥ sukhaduḥkhādisaṁjñinām
तर्करहित, तथा बाह्य भी, अभ्यास से युक्त सूक्ष्म - किये गये सुख-दुःखादि संज्ञावाले सूक्ष्म प्रत्ययों के,
श्लोक 18 (skanda.8.174.18)
अशेषलोप इत्युक्तं साधकस्य तु युञ्जतः । परो महेश्वरो देवः सोभिसन्धिस्तु योजकः
aśeṣalopa ityuktaṁ sādhakasya tu yuñjataḥ | paro maheśvaro devaḥ sobhisandhistu yojakaḥ
पूर्ण लोप को साधक के लिये कहा गया है, जो युक्त होता है; परम महेश्वर देव ही वह अभिसन्धि है, वे ही योजक हैं।
श्लोक 19 (skanda.8.174.19)
अभिसन्धिस्तदा यस्मादीश्वरस्यात्मनश्च ह । सुखादानमथैकेन भावना योजनात्
abhisandhistadā yasmādīśvarasyātmanaśca ha | sukhādānamathaikena bhāvanā yojanāt
अभिसन्धि तब होती है जब ईश्वर और आत्मा की, एक ही से... सुख की प्राप्ति, भावना के योजन से...
श्लोक 20 (skanda.8.174.20)
प्र तिष्ठतस्सतः । साधकस्य भवेन्नित्यं ह्यद्रिः सिद्धमिदं फलम्
pra tiṣṭhatassataḥ | sādhakasya bhavennityaṁ hyadriḥ siddhamidaṁ phalam
[मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं] स्थित रहते हुए, इस प्रकार स्थित साधक के लिये यह फल सदा सिद्ध होता है।
श्लोक 21 (skanda.8.174.21)
अथाधिकरणं तत्र क्रमशः परिकीर्त्यते । प्रत्याहारमतो विद्या प्राणायामस्तथैव च । ध्यानञ्च धारणा चैव योगाभ्यास उदाहृतः
athādhikaraṇaṁ tatra kramaśaḥ parikīrtyate | pratyāhāramato vidyā prāṇāyāmastathaiva ca | dhyānañca dhāraṇā caiva yogābhyāsa udāhṛtaḥ
तब वहाँ क्रमशः साधन कहे जाते हैं - प्रत्याहार पहली विद्या है, तथा प्राणायाम भी, ध्यान और धारणा भी - यह योगाभ्यास कहा गया।
श्लोक 22 (skanda.8.174.22)
तिस्रो मृत्युमतिक्रम्य क्रिया हि चतुरात्मिकाः । वर्त्तन्ते न च वै मृत्युः प्रभवते मुने
tisro mṛtyumatikramya kriyā hi caturātmikāḥ | varttante na ca vai mṛtyuḥ prabhavate mune
तीनों मृत्युओं को लांघकर, चार प्रकार की क्रियाएँ - [मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं] - मृत्यु उस पर प्रभाव नहीं डालती, हे मुने!
श्लोक 23 (skanda.8.174.23)
वश्या हि धातवस्तस्माद् भवन्त्यस्य न संशयः । ततोसौ पवमृत्युश्च साधको भवति
vaśyā hi dhātavastasmād bhavantyasya na saṁśayaḥ | tatosau pavamṛtyuśca sādhako bhavati
तब उसके अधीन धातुएँ हो जाती हैं, इसमें सन्देह नहीं; इससे वह मृत्युविजयी साधक बन जाता है [मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं]।
श्लोक 24 (skanda.8.174.24)
इमास्तर्क्कक्रिया व्यास मस्तके हृदि चैव हि । अन्तरिक्षे च सर्वास्तु कीर्तिता हि न संशयः
imāstarkkakriyā vyāsa mastake hṛdi caiva hi | antarikṣe ca sarvāstu kīrtitā hi na saṁśayaḥ
ये तर्क-क्रियाएँ, हे व्यास! मस्तक में, हृदय में, तथा अन्तरिक्ष (भ्रूमध्य) में भी - सभी कही गयी हैं, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 25 (skanda.8.174.25)
स्थानत्रयनिबद्धास्तु चतुर्लक्षणसंस्थिताः । क्रियाः प्रमादिना नैताः शक्याः साधयितुं क्वचित्
sthānatrayanibaddhāstu caturlakṣaṇasaṁsthitāḥ | kriyāḥ pramādinā naitāḥ śakyāḥ sādhayituṁ kvacit
तीनों स्थानों में निबद्ध, चार लक्षणों में स्थित, ये क्रियाएँ प्रमादी के द्वारा कहीं भी सिद्ध नहीं की जा सकतीं।
श्लोक 26 (skanda.8.174.26)
तिस्र एताः सदा मृत्युं प्रवृत्ता मोहलक्षणाः । वियोगो न भवेत्तासु क्रियास्वेकैक
tisra etāḥ sadā mṛtyuṁ pravṛttā mohalakṣaṇāḥ | viyogo na bhavettāsu kriyāsvekaika
ये तीनों सदा मृत्यु की ओर प्रवृत्त, मोहलक्षणवाली हैं; इनमें, प्रत्येक क्रिया में, वियोग नहीं होना चाहिये [मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं]।
श्लोक 27 (skanda.8.174.27)
अज्ञानं कम्पते तासु बहिरन्तश्चरास्वपि । क्रियासु साधको युक्तस्तथा मध्यगतासु च
ajñānaṁ kampate tāsu bahirantaścarāsvapi | kriyāsu sādhako yuktastathā madhyagatāsu ca
अज्ञान उनमें काँपता है, बाहर और भीतर चलनेवाली क्रियाओं में भी; साधक इन क्रियाओं में, तथा मध्यवर्ती क्रियाओं में भी युक्त रहता है,
श्लोक 28 (skanda.8.174.28)
भूतेन्द्रियमनःकालदिङ्निवृत्तिः प्रभावतः । दशैवाशास्त्रयः काला भूतानीन्द्रियविस्तरः
bhūtendriyamanaḥkāladiṅnivṛttiḥ prabhāvataḥ | daśaivāśāstrayaḥ kālā bhūtānīndriyavistaraḥ
भूत, इन्द्रिय, मन, काल और दिशा से निवृत्ति के प्रभाव से - ये दस ही हैं: तीन काल, भूत, और इन्द्रियों का विस्तार।
श्लोक 29 (skanda.8.174.29)
मनःप्रचारसंयुक्तो विषयाभावलक्षणः । प्रत्याहार इति प्रोक्तः पुरा भगवता स्वयम्
manaḥpracārasaṁyukto viṣayābhāvalakṣaṇaḥ | pratyāhāra iti proktaḥ purā bhagavatā svayam
मन के प्रचार से युक्त, विषयों के अभाव से लक्षित, यह प्रत्याहार कहा गया है, पूर्वकाल में स्वयं भगवान् द्वारा।
श्लोक 30 (skanda.8.174.30)
दिगन्तरगमाभावात् मनस्यविचलस्थितौ । प्रत्याहारसमुत्पत्तिर्योगोत्पत्तौ सकृद् भवेत्
digantaragamābhāvāt manasyavicalasthitau | pratyāhārasamutpattiryogotpattau sakṛd bhavet
दिशान्तर में गमन के अभाव से, मन की अविचल स्थिति में, प्रत्याहार की उत्पत्ति योग की उत्पत्ति में एक साथ होती है।
श्लोक 31 (skanda.8.174.31)
त्रिकालविषयं ज्ञानमैश्वर्योदग्रमेव च । चले मनसि नाभूतां भवेतां संस्थिते समम्
trikālaviṣayaṁ jñānamaiśvaryodagrameva ca | cale manasi nābhūtāṁ bhavetāṁ saṁsthite samam
त्रिकालविषयक ज्ञान, तथा ऐश्वर्य की उदग्रता भी, चंचल मन में नहीं होती; समान रूप से स्थित होने पर ही होती है।
श्लोक 32 (skanda.8.174.32)
मनः सर्वमिदं यस्मात् साधनं योगकर्मणः । एकतो मनसः स्थाने तस्माद् यत्नं समाचरेत्
manaḥ sarvamidaṁ yasmāt sādhanaṁ yogakarmaṇaḥ | ekato manasaḥ sthāne tasmād yatnaṁ samācaret
चूँकि यह मन ही योगकर्म का सम्पूर्ण साधन है, इसलिये मन को एक स्थान में स्थिर करने का प्रयत्न करना चाहिये।
श्लोक 33 (skanda.8.174.33)
प्राणनिग्रहणे ध्यानं प्राणायाममिति स्मृतम् । प्राण एव हि वायूनां सारथ्ये वर्तते सदा
prāṇanigrahaṇe dhyānaṁ prāṇāyāmamiti smṛtam | prāṇa eva hi vāyūnāṁ sārathye vartate sadā
प्राण के निग्रह में ध्यान को प्राणायाम कहा गया है; प्राण ही सदा वायुओं के सारथ्य में रहता है।
श्लोक 34 (skanda.8.174.34)
प्राणनिग्रहणे योगी नित्यमभ्यासमाचरेत् । उत्तरोत्तरसंसिद्ध्या वायु गोचरे
prāṇanigrahaṇe yogī nityamabhyāsamācaret | uttarottarasaṁsiddhyā vāyu gocare
प्राणनिग्रह में योगी को नित्य अभ्यास करना चाहिये; उत्तरोत्तर सिद्धि से, वायु के [मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं] विषय में,
श्लोक 35 (skanda.8.174.35)
ज्योतिः प्रवर्तनं विद्यान्नित्यमभ्यासयोजितम् । द्विरपाने सकृत्प्राणे समाने च
jyotiḥ pravartanaṁ vidyānnityamabhyāsayojitam | dvirapāne sakṛtprāṇe samāne ca
ज्योति के प्रवर्तन को जानना चाहिये, नित्य अभ्यास से युक्त - अपान में दो बार, प्राण में एक बार, समान में भी... [मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं]
श्लोक 36 (skanda.8.174.36)
कुम्भ एष तृतीयस्तु योगवह्निप्रदीपकः
kumbha eṣa tṛtīyastu yogavahnipradīpakaḥ
[इस श्लोक का पूर्वार्ध मूलपाठ में लुप्त है] ...यह तीसरा कुम्भक योगाग्नि का प्रदीपक है।
श्लोक 37 (skanda.8.174.37)
एभिर्ध्यानगतिः सूक्ष्मा वायुसंरोधकारिता । प्रवर्तते यया योगी परमं वेष्टि पुद्गलम्
ebhirdhyānagatiḥ sūkṣmā vāyusaṁrodhakāritā | pravartate yayā yogī paramaṁ veṣṭi pudgalam
इनसे ध्यान की सूक्ष्म गति, प्राणसंरोध द्वारा की गयी, प्रवृत्त होती है, जिससे योगी परम पुद्गल को घेर लेता है।
श्लोक 38 (skanda.8.174.38)
सकृदेव समाहारादसकृत्परिमोक्षणात् । कुम्भकं चैतदुद्दिष्टं प्राणायामादिधारणात्
sakṛdeva samāhārādasakṛtparimokṣaṇāt | kumbhakaṁ caitaduddiṣṭaṁ prāṇāyāmādidhāraṇāt
एक ही बार समाहार से और अनेक बार बिना रुके छोड़ने से, यह कुम्भक कहा गया है, प्राणायाम आदि की धारणा से।
श्लोक 39 (skanda.8.174.39)
प्राणो वायुरसावात्मा शरीरे जीव । विद्याद् रूपद्वयं तस्य स्थूलं सूक्ष्मं च सर्वतः
prāṇo vāyurasāvātmā śarīre jīva | vidyād rūpadvayaṁ tasya sthūlaṁ sūkṣmaṁ ca sarvataḥ
प्राण ही वायु है, वही आत्मा है; शरीर में जीव [मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं]; उसका दो रूप जानना चाहिये - स्थूल और सूक्ष्म, सर्वत्र।
श्लोक 40 (skanda.8.174.40)
अव्यक्तं सूक्ष्मरूपं तु स्थूलमाकारलक्षणम् । स्थूलादारभ्य सूक्ष्मं तु ध्यानाभ्यासान्निरूपयेत्
avyaktaṁ sūkṣmarūpaṁ tu sthūlamākāralakṣaṇam | sthūlādārabhya sūkṣmaṁ tu dhyānābhyāsānnirūpayet
अव्यक्त सूक्ष्मरूप है, स्थूल आकारलक्षणवाला है; स्थूल से आरम्भ करके सूक्ष्म का ध्यानाभ्यास से निरूपण करे।
श्लोक 41 (skanda.8.174.41)
सूक्ष्मसंरोपणाज्ज्योतिः प्रकाशो जायते मुने । ध्यायतः स्थूललक्ष्यं तु सर्वदिक्षु सृतं मनः । यदा दीप्तिमदुत्पद्येत् तदाशु स्थापयेत् पुनः
sūkṣmasaṁropaṇājjyotiḥ prakāśo jāyate mune | dhyāyataḥ sthūlalakṣyaṁ tu sarvadikṣu sṛtaṁ manaḥ | yadā dīptimadutpadyet tadāśu sthāpayet punaḥ
सूक्ष्म पर स्थिर होने से ज्योति, प्रकाश, उत्पन्न होता है, हे मुने! स्थूल लक्ष्य का ध्यान करते हुए, जब सब दिशाओं में भटका हुआ मन उस ज्योति को उत्पन्न कर दे, तब उसे शीघ्र पुनः स्थिर कर देना चाहिये।
श्लोक 42 (skanda.8.174.42)
गिरौ वृक्षे मरुत्पृष्ठे श्वभ्रे प्रासादपंक्तिषु । समुद्रे वसुधायां वा मनःसंयोगमाचरेत्
girau vṛkṣe marutpṛṣṭhe śvabhre prāsādapaṁktiṣu | samudre vasudhāyāṁ vā manaḥsaṁyogamācaret
पर्वत पर, वृक्ष पर, वायु की सतह पर, गड्ढे में, भवनपंक्तियों में, समुद्र में, या पृथ्वी पर - मन का संयोग करना चाहिये।
श्लोक 43 (skanda.8.174.43)
स्थापितं तन्मनस्तत्र पुनः संहारमाव्रजेत् । अचैतन्यं दिशेन्मोहाद् वायुर्दृष्टमतोन्यथा
sthāpitaṁ tanmanastatra punaḥ saṁhāramāvrajet | acaitanyaṁ diśenmohād vāyurdṛṣṭamatonyathā
वहाँ स्थापित उस मन को पुनः संहार की ओर ले जाना चाहिये; अचेतना मोह का सूचक है, वायु (श्वास) ठीक से देखे जाने पर अन्यथा प्रतीत होती है।
श्लोक 44 (skanda.8.174.44)
संहृत्य च ततो व्यापि भूयो ध्यानगतिं चरेत् । ध्यायतो नित्यमभ्यासान्मनो वायु
saṁhṛtya ca tato vyāpi bhūyo dhyānagatiṁ caret | dhyāyato nityamabhyāsānmano vāyu
संहार करके, फिर व्यापी होकर, पुनः ध्यान की गति में चले; नित्य अभ्यास से ध्यान करते हुए, मन और वायु [मूलपाठ में यहाँ कुछ अक्षर लुप्त हैं]।
श्लोक 45 (skanda.8.174.45)
प्रवृत्तज्ञानयोगस्य विषयासंगसंक्षये । प्रातिभानि हि विघ्नानि सत्वादिगुणजानि तु । विघ्नभूतानि योगस्य प्रोद्भवन्ति हि युञ्जतः
pravṛttajñānayogasya viṣayāsaṁgasaṁkṣaye | prātibhāni hi vighnāni satvādiguṇajāni tu | vighnabhūtāni yogasya prodbhavanti hi yuñjataḥ
ज्ञानयोग के प्रवृत्त होने पर, विषयासंग के क्षीण होने पर, सत्वादि गुणों से उत्पन्न प्रातिभ (सहज दिव्य-बोध रूप) विघ्न - ये योग के विघ्नस्वरूप, योग करनेवाले के लिये उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 46 (skanda.8.174.46)
तानि विद्वान् प्रयत्नेन विषयेच्छाविवर्जितः । जित्वा निर्वाणमार्गस्थो भवेत् त्रैगुण्यवर्जितः
tāni vidvān prayatnena viṣayecchāvivarjitaḥ | jitvā nirvāṇamārgastho bhavet traiguṇyavarjitaḥ
उन्हें विद्वान् प्रयत्नपूर्वक, विषयेच्छा से रहित होकर, जीतकर, निर्वाणमार्ग पर स्थित होकर त्रिगुणरहित हो जाता है।
श्लोक 47 (skanda.8.174.47)
आकाशगमनं दिव्यमप्सरोगणसंगजम् । अभिषेकश्च देवेभ्यश्चित्रकाव्यप्रवर्तनम्
ākāśagamanaṁ divyamapsarogaṇasaṁgajam | abhiṣekaśca devebhyaścitrakāvyapravartanam
आकाशगमन, दिव्य, अप्सरागणों का संग, देवताओं द्वारा अभिषेक, अद्भुत काव्य की रचना,
श्लोक 48 (skanda.8.174.48)
ऐश्वर्यसुखसंसक्तिर्हेमरत्नागमं बहु । सत्वादेतानि विघ्नानि प्रातिभानि तु लक्षयेत्
aiśvaryasukhasaṁsaktirhemaratnāgamaṁ bahu | satvādetāni vighnāni prātibhāni tu lakṣayet
ऐश्वर्य-सुख में आसक्ति, स्वर्ण-रत्नों का बहुत आगमन - इन्हें सत्वगुण से उत्पन्न प्रातिभ विघ्न मानना चाहिये।
श्लोक 49 (skanda.8.174.49)
उत्पत्तिमदयुक्तानि भिन्नाचारक्रमाणि तु । रजोविघ्नानि संविद्यात् प्रातिभानि न संशयः
utpattimadayuktāni bhinnācārakramāṇi tu | rajovighnāni saṁvidyāt prātibhāni na saṁśayaḥ
उत्पत्तिमद (आवेगपूर्ण उत्पन्न होनेवाले), भिन्न-आचारक्रमवाले - इन्हें रजोगुण से उत्पन्न प्रातिभ विघ्न जानना चाहिये, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 50 (skanda.8.174.50)
क्षयशूलज्वरोन्मादकुष्टसर्पग्रहाणि तु । यातनोद्गमपूर्वाणि तामसानि विनिर्दिशेत्
kṣayaśūlajvaronmādakuṣṭasarpagrahāṇi tu | yātanodgamapūrvāṇi tāmasāni vinirdiśet
क्षय (क्षयरोग), शूल, ज्वर, उन्माद, कुष्ठ, सर्प-ग्रह-पीड़ा, यातना के उद्गमपूर्वक - इन्हें तमोगुण से उत्पन्न बताना चाहिये।
श्लोक 51 (skanda.8.174.51)
गुणत्रयसमुत्थानि प्रातिभानि सदा मुनिः । युञ्जन् संलक्षयेच्छीघ्रं चिकित्सेदाशु चैव हि
guṇatrayasamutthāni prātibhāni sadā muniḥ | yuñjan saṁlakṣayecchīghraṁ cikitsedāśu caiva hi
त्रिगुण से उत्पन्न इन प्रातिभ विघ्नों को योग करनेवाला मुनि सदा शीघ्र पहचान ले, और शीघ्र ही उनका उपचार करे।
श्लोक 52 (skanda.8.174.52)
प्राणाद्यानभिसन्धाय मनः संहृत्य चैव हि । प्राणायामेन कुम्भेन हन्याद्विघ्नानि सर्वतः
prāṇādyānabhisandhāya manaḥ saṁhṛtya caiva hi | prāṇāyāmena kumbhena hanyādvighnāni sarvataḥ
प्राण आदि पर मन को केन्द्रित करके, तथा संहृत करके, प्राणायाम के कुम्भक से सर्वत्र विघ्नों का नाश करे।
श्लोक 53 (skanda.8.174.53)
रजः सत्वं तमश्चैव प्रधानस्य गुणास्त्रयः । तस्यैव हि महेशस्य प्रजासंसर्गहेतवः
rajaḥ satvaṁ tamaścaiva pradhānasya guṇāstrayaḥ | tasyaiva hi maheśasya prajāsaṁsargahetavaḥ
रज, सत्व और तम - ये प्रधान (प्रकृति) के तीन गुण हैं; वे ही उस महेश की प्रजाओं के साथ सम्पर्क के हेतु हैं।
श्लोक 54 (skanda.8.174.54)
योगमोहाद् भवन्त्येते साभिमानस्य युञ्जतः । निरीहो निर्वृतो योगी सचेता घटते यदा
yogamohād bhavantyete sābhimānasya yuñjataḥ | nirīho nirvṛto yogī sacetā ghaṭate yadā
ये योगमोह से उत्पन्न होते हैं, अभिमानपूर्वक योग करनेवाले के लिये; जब निरीह, निर्वृत योगी सचेत होकर स्थिर हो जाता है,
श्लोक 55 (skanda.8.174.55)
प्रातिभानि तदा यान्ति विघ्नानि हि समं क्षयम् । प्रादुर्भावस्ततस्तेषां गुणानां मोहकारणम्
prātibhāni tadā yānti vighnāni hi samaṁ kṣayam | prādurbhāvastatasteṣāṁ guṇānāṁ mohakāraṇam
तब वे प्रातिभ विघ्न समान रूप से क्षय को प्राप्त होते हैं; उन गुणों का प्रादुर्भाव ही तब मोह का कारण होता है।
श्लोक 56 (skanda.8.174.56)
तमो रौद्रं विजानीयात् सत्वं ब्रह्मणि संस्थितम् । रजस्तु बैष्णवं विद्यात्तेषां हन्ता महेश्वरः
tamo raudraṁ vijānīyāt satvaṁ brahmaṇi saṁsthitam | rajastu baiṣṇavaṁ vidyātteṣāṁ hantā maheśvaraḥ
तम को रुद्रसम्बन्धी जानना चाहिये, सत्व को ब्रह्मा में स्थित; रज को विष्णुसम्बन्धी जानना चाहिये; इन तीनों का नाशक महेश्वर है।
श्लोक 57 (skanda.8.174.57)
महादेवं परं ज्ञात्वा योगाभ्यासरतो द्विजः । गुणत्रयविनिर्मुक्तः शङ्करे लयमाप्नुयात्
mahādevaṁ paraṁ jñātvā yogābhyāsarato dvijaḥ | guṇatrayavinirmuktaḥ śaṅkare layamāpnuyāt
महादेव को परम जानकर, योगाभ्यास में रत द्विज, त्रिगुण से मुक्त होकर शंकर में लय को प्राप्त होता है।
श्लोक 58 (skanda.8.174.58)
यमैः सनियमैः पूर्वं शोधयेदात्मनस्तनुम् । ततः शास्त्रप्रणीतेन धर्माधर्मविवर्जितः
yamaiḥ saniyamaiḥ pūrvaṁ śodhayedātmanastanum | tataḥ śāstrapraṇītena dharmādharmavivarjitaḥ
पहले यम-नियमों से अपने शरीर को शुद्ध करे; फिर शास्त्रविहित विधि से, धर्म-अधर्म से रहित होकर,
श्लोक 59 (skanda.8.174.59)
क्रमेण सोपदेशेन ध्यानाभ्यासं समाचरेत् । शब्दादीन् विषयान् जित्वा श्रोत्रादीन्द्रियगोचरान्
krameṇa sopadeśena dhyānābhyāsaṁ samācaret | śabdādīn viṣayān jitvā śrotrādīndriyagocarān
क्रमशः उपदेशपूर्वक ध्यानाभ्यास करे, शब्दादि विषयों को, श्रोत्रादि इन्द्रियों के विषयों को जीतकर,
श्लोक 60 (skanda.8.174.60)
समो दैवततिर्यक्षु निर्ममः सर्ववस्तुषु । सर्वारम्भविनिर्मुक्तः पुण्यपापविवर्जितः
samo daivatatiryakṣu nirmamaḥ sarvavastuṣu | sarvārambhavinirmuktaḥ puṇyapāpavivarjitaḥ
देव-तिर्यक् में समान, समस्त वस्तुओं में ममतारहित, सभी आरम्भों से मुक्त, पुण्य-पाप से रहित,
श्लोक 61 (skanda.8.174.61)
निर्द्वन्द्वो निर्जने ईशे योगाभ्यासं समाचरेत् । साभिमानं सनियमं त्यक्त्वा सांख्यविनिश्चयम्
nirdvandvo nirjane īśe yogābhyāsaṁ samācaret | sābhimānaṁ saniyamaṁ tyaktvā sāṁkhyaviniścayam
द्वन्द्वरहित, एकान्त में, ईश्वर के समक्ष योगाभ्यास करे, अभिमान और नियम को, तथा सांख्यनिश्चय को त्यागकर,
श्लोक 62 (skanda.8.174.62)
परे माहेश्वरे योगे नित्यमभ्यासमाचरेत् । अष्टौ प्रकृतयो नित्या विकाराश्चैव षोडश
pare māheśvare yoge nityamabhyāsamācaret | aṣṭau prakṛtayo nityā vikārāścaiva ṣoḍaśa
परम माहेश्वर योग में नित्य अभ्यास करे। आठ नित्य प्रकृतियाँ, और सोलह विकार,
श्लोक 63 (skanda.8.174.63)
पुरुषः पञ्चविंशश्च सांख्यसिद्धान्तगोचरः । एतदेव परं गुह्यं द्वये सांख्यानां तत्त्वनिश्चये । प्रकृतेरन्तरं ज्ञात्वा पुरुषस्य च मुच्यते
puruṣaḥ pañcaviṁśaśca sāṁkhyasiddhāntagocaraḥ | etadeva paraṁ guhyaṁ dvaye sāṁkhyānāṁ tattvaniścaye | prakṛterantaraṁ jñātvā puruṣasya ca mucyate
तथा पचीसवाँ पुरुष - यह सांख्यसिद्धान्त का विषय है; यही परम गुह्य है, इन दोनों (प्रकृति-विकार और पुरुष) के सांख्यों के तत्त्वनिश्चय में; प्रकृति और पुरुष के भेद को जानकर मुक्त हो जाता है।