अम्बिका खण्ड · अध्याय 176
पाशुपतयोगवर्णन-तृतीय
श्लोक 1 (skanda.8.176.1)
सनत्कुमार उवाच । उत्पद्यते यथा जन्तुर्वैराग्यं व्रजते यथा । यथा प्रबुध्यते चैव तत्ते व्यास वदाम्यहम्
sanatkumāra uvāca | utpadyate yathā janturvairāgyaṁ vrajate yathā | yathā prabudhyate caiva tatte vyāsa vadāmyaham
सनत्कुमार ने कहा - जिस प्रकार प्राणी उत्पन्न होता है, जिस प्रकार वैराग्य को प्राप्त होता है, और जिस प्रकार जागता (बोध पाता) है, वह तुम्हें, हे व्यास! मैं बताता हूँ।
श्लोक 2 (skanda.8.176.2)
आकाशः पवनस्तेजो भूमिरापस्तथैव च । एषामेकत्र संघाताच्छरीरं नाम जायते
ākāśaḥ pavanastejo bhūmirāpastathaiva ca | eṣāmekatra saṁghātāccharīraṁ nāma jāyate
आकाश, पवन, तेज, भूमि, तथा जल भी - इन सबके एक स्थान पर संघात से शरीर नामक वस्तु उत्पन्न होती है।
श्लोक 3 (skanda.8.176.3)
रसाः सोमात्मकाः सर्वे तथाहारश्चतुर्विधः । देहिनान्तु रसोत्पत्तिराहारस्य निषेवणात्
rasāḥ somātmakāḥ sarve tathāhāraścaturvidhaḥ | dehināntu rasotpattirāhārasya niṣevaṇāt
सभी रस सोमस्वरूप हैं, तथा आहार चार प्रकार का है; देहधारियों में रस की उत्पत्ति आहार के सेवन से होती है।
श्लोक 4 (skanda.8.176.4)
रसाद्रक्तसमुत्पत्तिः शोणितात् पिशितं स्मृतम् । मेद उत्पद्यते मांसात्तस्मादस्थीनि चाभवन्
rasādraktasamutpattiḥ śoṇitāt piśitaṁ smṛtam | meda utpadyate māṁsāttasmādasthīni cābhavan
रस से रक्त की उत्पत्ति होती है, रक्त से मांस उत्पन्न माना गया है; मांस से मेद उत्पन्न होता है, उससे हड्डियाँ बनीं।
श्लोक 5 (skanda.8.176.5)
मज्जा चास्थिभवा ज्ञेया ततः शुक्रसमुद्भवः । रक्तशुक्रसमायोगाद् गर्भः संभवति स्त्रियाः
majjā cāsthibhavā jñeyā tataḥ śukrasamudbhavaḥ | raktaśukrasamāyogād garbhaḥ saṁbhavati striyāḥ
अस्थि से मज्जा उत्पन्न होनेवाली जाननी चाहिये, उससे शुक्र की उत्पत्ति; रक्त और शुक्र के संयोग से स्त्री में गर्भ उत्पन्न होता है।
श्लोक 6 (skanda.8.176.6)
ऋतुयोगसमाधानाद् दैवकर्मवशादपि । स्त्रियाः पुंसश्च रत्यन्ते द्वावप्येकत्वमागतौ
ṛtuyogasamādhānād daivakarmavaśādapi | striyāḥ puṁsaśca ratyante dvāvapyekatvamāgatau
ऋतुकाल के संयोग से, तथा दैवकर्म के वश से भी, स्त्री और पुरुष के रत होने पर, दोनों एकत्व को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 7 (skanda.8.176.7)
तावेकत्वमथापन्नौ प्रेरितौ पवनेन च । कललं त्वेकरात्रेण पञ्चरात्रेण चार्बुदम्
tāvekatvamathāpannau preritau pavanena ca | kalalaṁ tvekarātreṇa pañcarātreṇa cārbudam
वे दोनों एकत्व को प्राप्त होकर, वायु द्वारा प्रेरित होकर - एक रात्रि में कलल (द्रव पिण्ड) बनता है, पाँच रात्रियों में अर्बुद (बुद्बुद जैसा);
श्लोक 8 (skanda.8.176.8)
पिशितं सप्तरात्रेण मासाच्चाङ्कुरसंभवः । ततःप्रभृति गर्भस्य विभागो भवति द्विज
piśitaṁ saptarātreṇa māsāccāṅkurasaṁbhavaḥ | tataḥprabhṛti garbhasya vibhāgo bhavati dvija
सात रात्रियों में पेशी (मांसपिण्ड) बनता है, और एक मास में अंकुर की उत्पत्ति होती है; तब से गर्भ का विभाजन होता है, हे द्विज!
श्लोक 9 (skanda.8.176.9)
शिरः पाणिमुखस्कन्धग्रीवापृष्ठादिसंयुतः । पञ्चानामथ मासानामक्षिकर्णादिसम्भवः
śiraḥ pāṇimukhaskandhagrīvāpṛṣṭhādisaṁyutaḥ | pañcānāmatha māsānāmakṣikarṇādisambhavaḥ
सिर, हाथ, मुख, कन्धे, गर्दन, पीठ आदि से युक्त होता है; फिर पाँचवें मास में आँख-कान आदि की उत्पत्ति होती है।
श्लोक 10 (skanda.8.176.10)
सर्वसंपूर्णगात्रस्तु स्रोतोभिर्नवभिर्युतः । व्यक्तीभवति तद्गर्भो मासैरष्टभिरेव तु
sarvasaṁpūrṇagātrastu srotobhirnavabhiryutaḥ | vyaktībhavati tadgarbho māsairaṣṭabhireva tu
सभी अंगों से सम्पूर्ण, नौ स्रोतों से युक्त, वह गर्भ आठवें मास में व्यक्त हो जाता है।
श्लोक 11 (skanda.8.176.11)
संप्राप्ते नवमे मासि सर्वद्रव्यसमन्वितः । पञ्चभूतात्मकं तत्तु चेतोवदवतिष्ठति
saṁprāpte navame māsi sarvadravyasamanvitaḥ | pañcabhūtātmakaṁ tattu cetovadavatiṣṭhati
नवें मास के प्राप्त होने पर, सभी द्रव्यों से युक्त, वह पंचभूतात्मक प्राणी चेतनावान् के समान स्थित रहता है।
श्लोक 12 (skanda.8.176.12)
गर्भक्लेदेन सिक्ताङ्गः सर्वदुःखसमन्वितः । जातिं स्मरेद्वसँस्तत्र जन्तुः सर्वसमुद्भवाम्
garbhakledena siktāṅgaḥ sarvaduḥkhasamanvitaḥ | jātiṁ smaredvasa~statra jantuḥ sarvasamudbhavām
गर्भरस से भीगे अंगोंवाला, सभी दुःखों से युक्त, वहाँ रहता हुआ वह प्राणी सर्वस्रोतों से उत्पन्न अपनी जातियों (पूर्वजन्मों) का स्मरण कर सकता है -
श्लोक 13 (skanda.8.176.13)
मृतः पुनरहं जातो जातश्चैव पुनर्मृतः । इदानीं जातमात्रस्तु योगमेवाभ्यसाम्यहम्
mṛtaḥ punarahaṁ jāto jātaścaiva punarmṛtaḥ | idānīṁ jātamātrastu yogamevābhyasāmyaham
'मैं मरकर पुनः जन्मा, और जन्मकर पुनः मरा। अब, जन्म लेते ही, मैं योग का ही अभ्यास करूँगा,
श्लोक 14 (skanda.8.176.14)
न पुनर्येन संसारं प्रवेक्ष्याम्यशुभोदयम् । एवं चिन्तयतस्तस्य नवमे मासि संगते
na punaryena saṁsāraṁ pravekṣyāmyaśubhodayam | evaṁ cintayatastasya navame māsi saṁgate
जिससे मैं पुनः उस संसार में प्रवेश न करूँ, जिसका उदय अशुभ है।' इस प्रकार विचार करते हुए उसके, नवें मास के समाप्त होने पर,
श्लोक 15 (skanda.8.176.15)
स्वकर्मविनिबद्धस्य जातमात्रस्य देहिनः । दहेमाविशते वायुः स्मृतिमाक्षिप्य तामसः
svakarmavinibaddhasya jātamātrasya dehinaḥ | dahemāviśate vāyuḥ smṛtimākṣipya tāmasaḥ
अपने कर्मों से बँधे हुए, जन्ममात्र प्राप्त उस देहधारी के, दहनकारी तामसिक वायु प्रवेश करती है, उसकी स्मृति को हरकर,
श्लोक 16 (skanda.8.176.16)
येन मूढो निरानन्दो नैवाध्यात्मरतिर्भवेत् । अग्नीषोमात्मकं सर्वं भूतग्रामं चतुर्विधम्
yena mūḍho nirānando naivādhyātmaratirbhavet | agnīṣomātmakaṁ sarvaṁ bhūtagrāmaṁ caturvidham
जिससे मोहग्रस्त, आनन्दरहित होकर उसे अध्यात्म में रति नहीं होती। यह सम्पूर्ण चतुर्विध भूतसमूह, अग्नि-सोम स्वरूप,
श्लोक 17 (skanda.8.176.17)
संयोगादेवमुत्पन्नमुत्पत्स्यति च सुव्रत । तत्र ये साधुसंपर्काच्छुभकर्मोदयादपि
saṁyogādevamutpannamutpatsyati ca suvrata | tatra ye sādhusaṁparkācchubhakarmodayādapi
इस प्रकार संयोग से उत्पन्न हुआ है, और उत्पन्न होता रहेगा, हे सुव्रत! उनमें जो साधुसंपर्क से, तथा शुभकर्म के उदय से भी,
श्लोक 18 (skanda.8.176.18)
आगमान्वेषणे सक्ताः पापानुष्ठानवर्जिताः । मत्वा संसारजं क्लेशं जन्ममृत्युभयार्दितम्
āgamānveṣaṇe saktāḥ pāpānuṣṭhānavarjitāḥ | matvā saṁsārajaṁ kleśaṁ janmamṛtyubhayārditam
आगमों की खोज में लगे हुए, पापकर्मों से रहित, संसार से उत्पन्न क्लेश को, जन्म-मृत्यु के भय से पीड़ित,
श्लोक 19 (skanda.8.176.19)
कामक्रोधरतिद्रोहलोभमोहसमावृतम् । वैराग्यं जन्मतः कृत्वा सर्वारम्भपरिक्षयात्
kāmakrodharatidrohalobhamohasamāvṛtam | vairāgyaṁ janmataḥ kṛtvā sarvārambhaparikṣayāt
काम-क्रोध-रति-द्रोह-लोभ-मोह से घिरे हुए जानकर, जन्म से ही वैराग्य धारण करके, समस्त आरम्भों के परिक्षय से,
श्लोक 20 (skanda.8.176.20)
अन्विषन्ति शुभार्थं हि गुह्यमध्यात्मदर्शनम् । ते योगं परमं प्राप्य ब्रह्म विन्दन्ति तत् परम्
anviṣanti śubhārthaṁ hi guhyamadhyātmadarśanam | te yogaṁ paramaṁ prāpya brahma vindanti tat param
शुभार्थ के लिये गुह्य अध्यात्मदर्शन की खोज करते हैं; वे परम योग को प्राप्त करके उस परम ब्रह्म को पा लेते हैं।
श्लोक 21 (skanda.8.176.21)
तस्य ते संप्रवक्ष्यामि ब्रह्मसंबोधकारणम् । सर्वेषां योगिनां गुह्यं सर्वयोगनिदर्शनम्
tasya te saṁpravakṣyāmi brahmasaṁbodhakāraṇam | sarveṣāṁ yogināṁ guhyaṁ sarvayoganidarśanam
उसका, ब्रह्मबोध का कारण, मैं तुम्हें बताऊँगा - समस्त योगियों का गुह्य रहस्य, समस्त योग का प्रदर्शन।
श्लोक 22 (skanda.8.176.22)
ततो माहेश्वरं योगमाख्यास्ये तत्परन्तव । तेजोग्निः कामजो वह्निः क्रोधाग्निर्वीक्षणानलः
tato māheśvaraṁ yogamākhyāsye tatparantava | tejogniḥ kāmajo vahniḥ krodhāgnirvīkṣaṇānalaḥ
तब मैं तुम्हें वह परम माहेश्वर योग बताऊँगा: तेजोग्नि, कामजनित वह्नि, क्रोधाग्नि, वीक्षणानल (क्रुद्ध दृष्टि की अग्नि),
श्लोक 23 (skanda.8.176.23)
जठराग्निश्च भूतात्मा पञ्चैते देहवह्नयः । प्राणापानः समानश्च उदानो व्यान एव च
jaṭharāgniśca bhūtātmā pañcaite dehavahnayaḥ | prāṇāpānaḥ samānaśca udāno vyāna eva ca
और भूतात्मक जठराग्नि - ये पाँच देहाग्नियाँ हैं। प्राण, अपान, समान,
श्लोक 24 (skanda.8.176.24)
पञ्चैते वायवो नित्या देहिनो देहसंभवाः । आकाशप्रभवा ह्येते शरीरं चैषु तिष्ठति
pañcaite vāyavo nityā dehino dehasaṁbhavāḥ | ākāśaprabhavā hyete śarīraṁ caiṣu tiṣṭhati
उदान, और व्यान भी - ये पाँच नित्य वायु हैं, देहधारी के शरीर में उत्पन्न; ये आकाश से उत्पन्न हैं, और शरीर इन्हीं में स्थित रहता है।
श्लोक 25 (skanda.8.176.25)
मांसरक्तसमाकीर्णं स्नायुमेदोस्थिसंचयम् । त्वचावनद्धं दुर्गन्धं शकृन्मूत्रसमावृतम्
māṁsaraktasamākīrṇaṁ snāyumedosthisaṁcayam | tvacāvanaddhaṁ durgandhaṁ śakṛnmūtrasamāvṛtam
मांस-रक्त से भरा हुआ, स्नायु-मेद-अस्थि का संचय, त्वचा से आवृत, दुर्गन्धयुक्त, मल-मूत्र से घिरा हुआ,
श्लोक 26 (skanda.8.176.26)
तडिदभ्रागमानित्यं मृत्पात्रापातसन्निभम् । सर्वानर्थसमायुक्तं नचिरान्नाशगामि च
taḍidabhrāgamānityaṁ mṛtpātrāpātasannibham | sarvānarthasamāyuktaṁ nacirānnāśagāmi ca
बिजली या बादल के समान अनित्य, कच्चे मिट्टी के पात्र के गिरने जैसा, सभी अनर्थों से युक्त, और शीघ्र ही नाशगामी,
श्लोक 27 (skanda.8.176.27)
एकरूपं नवद्वारं त्रिस्थूणं पञ्चदेवतम् । विषयेन्द्रियसंकीर्णं नैकव्याधिसमार्दितम्
ekarūpaṁ navadvāraṁ tristhūṇaṁ pañcadevatam | viṣayendriyasaṁkīrṇaṁ naikavyādhisamārditam
एकरूप, नौ द्वारोंवाला, तीन स्तम्भोंवाला, पाँच देवताओं से युक्त, विषय-इन्द्रियों से भरा, अनेक व्याधियों से पीड़ित -
श्लोक 28 (skanda.8.176.28)
प्राणादिभिरवष्टब्धं शरीरं यन्त्रवत् स्थितम् । विमुक्तमसकृत् तैस्तु वायुभिर्जीवसंहतैः
prāṇādibhiravaṣṭabdhaṁ śarīraṁ yantravat sthitam | vimuktamasakṛt taistu vāyubhirjīvasaṁhataiḥ
प्राणादि से आश्रित शरीर यन्त्र के समान स्थित रहता है; और उन्हीं जीवसंहत वायुओं द्वारा बार-बार मुक्त होकर,
श्लोक 29 (skanda.8.176.29)
आमपात्रमिवापाताच्छीर्यते कालपर्ययात् । पञ्चभूतानि भूतानि देहान्निष्क्रम्य सर्वशः
āmapātramivāpātācchīryate kālaparyayāt | pañcabhūtāni bhūtāni dehānniṣkramya sarvaśaḥ
कच्चे पात्र के समान समय बीतने से विशीर्ण हो जाता है। पंचभूत, शरीर से सर्वथा निकलकर,
श्लोक 30 (skanda.8.176.30)
आविशन्ति तथात्मानमात्मा च विशते द्रुतम् । भूतेषु पवनः श्रेष्ठो जीवस्तद्विनिबन्धनः
āviśanti tathātmānamātmā ca viśate drutam | bhūteṣu pavanaḥ śreṣṭho jīvastadvinibandhanaḥ
अपने-अपने स्वरूप में प्रवेश करते हैं, और आत्मा भी शीघ्र निकल जाती है। भूतों में वायु श्रेष्ठ है, जीव उससे बँधा हुआ है।
श्लोक 31 (skanda.8.176.31)
वाय्वग्नी सहितौ जीवो न जीवः प्राणिनां पृथक् । मूर्तिरन्या न जीवस्य मृत्यौ दृश्यति देहिनः
vāyvagnī sahitau jīvo na jīvaḥ prāṇināṁ pṛthak | mūrtiranyā na jīvasya mṛtyau dṛśyati dehinaḥ
वायु और अग्नि दोनों मिलकर जीव हैं; इनके अतिरिक्त प्राणियों का अलग जीव नहीं है; मृत्यु में देहधारी का जीव का कोई अन्य रूप नहीं दिखायी देता।
श्लोक 32 (skanda.8.176.32)
पञ्चरूपात्परो देवः सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरो मतः । नासौ पश्यति न घ्राति न शृणोति न जल्पति
pañcarūpātparo devaḥ sūkṣmāt sūkṣmataro mataḥ | nāsau paśyati na ghrāti na śṛṇoti na jalpati
पाँच रूपों से परे वह देव है, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर माना गया है; वह न देखता है, न सूँघता है, न सुनता है, न बोलता है,
श्लोक 33 (skanda.8.176.33)
न जानाति न च स्पर्शेज्जीवः प्राणसमावृतः । प्राणो नाम महावायुर्जीवं धारयते द्विज
na jānāti na ca sparśejjīvaḥ prāṇasamāvṛtaḥ | prāṇo nāma mahāvāyurjīvaṁ dhārayate dvija
न जानता है, न स्पर्श करता है - वह जीव, प्राण से आवृत। प्राण नामक महावायु ही जीव को धारण करता है, हे द्विज!
श्लोक 34 (skanda.8.176.34)
भासते श्वसते चैव सर्वेष्वपि हि देहिषु । स प्राणो धारयत्यग्निं स च जीव इति स्मृतः
bhāsate śvasate caiva sarveṣvapi hi dehiṣu | sa prāṇo dhārayatyagniṁ sa ca jīva iti smṛtaḥ
वह सभी देहधारियों में समान रूप से प्रकाशित होता है और श्वास लेता है; वह प्राण अग्नि को धारण करता है, और वही जीव कहा गया है।
श्लोक 35 (skanda.8.176.35)
वायुसन्धारणो ह्यग्निः क्रियासु परिवर्तते । यो वह्निमानसौ देहे स जीव इति शब्द्यते
vāyusandhāraṇo hyagniḥ kriyāsu parivartate | yo vahnimānasau dehe sa jīva iti śabdyate
वायु द्वारा धारित अग्नि ही क्रियाओं में परिवर्तित होती है; जो अग्नि शरीर में स्थित है, वही जीव कहलाता है -
श्लोक 36 (skanda.8.176.36)
अन्तर्गतो हि भूतानां कर्मारम्भनिबन्धनः । एवमेतच्छरीरन्तु पञ्चभूतगुणात्मकम्
antargato hi bhūtānāṁ karmārambhanibandhanaḥ | evametaccharīrantu pañcabhūtaguṇātmakam
भूतों के भीतर स्थित, कर्म के आरम्भ का कारण। इस प्रकार यह शरीर पंचभूत-गुणस्वरूप है;
श्लोक 37 (skanda.8.176.37)
तद्विकारे प्रनष्टे तु मृत इत्यभिधीयते । भूतेन्द्रियमनोजीवविषया रागबन्धने
tadvikāre pranaṣṭe tu mṛta ityabhidhīyate | bhūtendriyamanojīvaviṣayā rāgabandhane
उसका विकार नष्ट होने पर 'मृत' कहा जाता है। भूत, इन्द्रिय, मन, जीव और विषय, राग के बन्धन में,
श्लोक 38 (skanda.8.176.38)
हृदये कर्णिकायां तु मध्यस्थस्तेजसां निधिः । आत्मा सर्वगतो नित्यं वर्जितो विषयादिभिः
hṛdaye karṇikāyāṁ tu madhyasthastejasāṁ nidhiḥ | ātmā sarvagato nityaṁ varjito viṣayādibhiḥ
हृदय की कर्णिका के मध्य में, तेजों का निधि, वह आत्मा, सर्वगत, नित्य, विषयादि से रहित,
श्लोक 39 (skanda.8.176.39)
तिष्ठते स विभुस्तत्र यं विदित्वा विमुच्यते । स येन योगसंसिद्ध्या ध्यानकर्मक्रियाविदा
tiṣṭhate sa vibhustatra yaṁ viditvā vimucyate | sa yena yogasaṁsiddhyā dhyānakarmakriyāvidā
वहाँ स्थित रहता है, वह विभु, जिसे जानकर मनुष्य मुक्त हो जाता है - जो योगसिद्धि से, ध्यान-कर्म-क्रिया के ज्ञाता द्वारा,
श्लोक 40 (skanda.8.176.40)
नाडीकर्मसमाधानात् सतताभ्यासयोगतः । भाभिः प्रकाशितो दृष्टो विकारैर्विप्रमोचितः
nāḍīkarmasamādhānāt satatābhyāsayogataḥ | bhābhiḥ prakāśito dṛṣṭo vikārairvipramocitaḥ
नाड़ीकर्म के समाधान से, निरन्तर अभ्यासयोग से, ज्योतियों से प्रकाशित होकर दृष्ट, विकारों से मुक्त होकर,
श्लोक 41 (skanda.8.176.41)
दृष्टो भवति विप्रेन्द्र मुक्तिश्चैव ततः स्मृता । षड्विंशकपरिज्ञानाल्लयमाधाय तत्र हि
dṛṣṭo bhavati viprendra muktiścaiva tataḥ smṛtā | ṣaḍviṁśakaparijñānāllayamādhāya tatra hi
दृष्ट हो जाता है, हे विप्रेन्द्र! और तब मुक्ति ही मानी जाती है। षड्विंशक तत्त्व के पूर्ण ज्ञान से, वहाँ लय प्राप्त करके,
श्लोक 42 (skanda.8.176.42)
सर्वप्राणिगतं सूक्ष्ममात्मदेहे च संस्थितम् । यं प्रपश्यन्ति संसिद्धा योगिनो गतबन्धनाः
sarvaprāṇigataṁ sūkṣmamātmadehe ca saṁsthitam | yaṁ prapaśyanti saṁsiddhā yogino gatabandhanāḥ
सर्वप्राणियों में स्थित, आत्मदेह में स्थित, उस सूक्ष्म तत्त्व को, जिसे बन्धनरहित सिद्ध योगीजन देखते हैं,
श्लोक 43 (skanda.8.176.43)
योभ्युपायः परस्तस्य विज्ञानादीश्वरस्य तु । योगाभ्यासं परं तं ते प्रवक्ष्यामि द्विजोत्तम
yobhyupāyaḥ parastasya vijñānādīśvarasya tu | yogābhyāsaṁ paraṁ taṁ te pravakṣyāmi dvijottama
उस ईश्वर के विज्ञान का जो परम उपाय है, वह परम योगाभ्यास मैं तुम्हें बताऊँगा, हे द्विजोत्तम!