अम्बिका खण्ड · अध्याय 177
पाशुपतयोगवर्णन-चतुर्थ
श्लोक 1 (skanda.8.177.1)
सनत्कुमार उवाच । अन्तरात्मा च चेतोवान्मनः संकल्पजं स्मृतम् । महाभूतप्रचाराच्च क्षोभाग्निर्जोव उच्यते
sanatkumāra uvāca | antarātmā ca cetovānmanaḥ saṁkalpajaṁ smṛtam | mahābhūtapracārācca kṣobhāgnirjova ucyate
सनत्कुमार ने कहा - चेतनायुक्त अन्तरात्मा ही मन है, संकल्प से उत्पन्न माना गया है; महाभूतों की प्रवृत्ति से क्षोभरूप अग्नि जीव कहलाती है।
श्लोक 2 (skanda.8.177.2)
न शरीरं विना चेतस्तच्चेन् नास्ति कुतश्च तत् । चेतोपि न विना जीवं स चापि न विना मनः
na śarīraṁ vinā cetastaccen nāsti kutaśca tat | cetopi na vinā jīvaṁ sa cāpi na vinā manaḥ
शरीर के बिना चेतना नहीं होती; और यदि वह (शरीर) न हो, तो वह (चेतना) कहाँ से हो? चेतना भी जीव के बिना नहीं होती, और वह भी मन के बिना नहीं होता।
श्लोक 3 (skanda.8.177.3)
प्राणो जीव इति प्रोक्तः स्पर्शादन्यत् प्रवर्तते । मनः सर्वं निबध्नाति कर्मारम्भमिति श्रुतिः
prāṇo jīva iti proktaḥ sparśādanyat pravartate | manaḥ sarvaṁ nibadhnāti karmārambhamiti śrutiḥ
प्राण को जीव कहा गया है; स्पर्श (शरीर-सम्पर्क) के अतिरिक्त वह अन्यथा प्रवृत्त होता है; मन ही सब कुछ बाँधता है, कर्म के आरम्भ में - यह श्रुति है।
श्लोक 4 (skanda.8.177.4)
सर्व एते हि संगत्य धारयन्ति शरीरिणम् । यस्य चेतोधिकन्तेषां स चेतोवान् प्रकीर्तितः
sarva ete hi saṁgatya dhārayanti śarīriṇam | yasya cetodhikanteṣāṁ sa cetovān prakīrtitaḥ
ये सभी मिलकर देहधारी को धारण करते हैं; इनमें जिसकी चेतना अधिक हो, वह 'चेतोवान्' कहलाता है।
श्लोक 5 (skanda.8.177.5)
चेतसा तु विजानाति शुभाशुभनिबन्धनम् । तन्मनश्चेतसि स्थाप्य नित्याध्यात्मरतिर्भवेत्
cetasā tu vijānāti śubhāśubhanibandhanam | tanmanaścetasi sthāpya nityādhyātmaratirbhavet
चेतना से ही शुभ-अशुभ के बन्धन को जानता है; उस मन को चेतना में स्थापित करके, नित्य अध्यात्म में रति होती है।
श्लोक 6 (skanda.8.177.6)
शब्दादिविषयातीत इन्द्रियाणि निगृह्य तु । ध्यानारम्भपरो देही स स्यात् कर्मविवर्जितः
śabdādiviṣayātīta indriyāṇi nigṛhya tu | dhyānārambhaparo dehī sa syāt karmavivarjitaḥ
शब्दादि विषयों से अतीत होकर, इन्द्रियों का निग्रह करके, ध्यान के आरम्भ में तत्पर देहधारी कर्मरहित हो जाता है।
श्लोक 7 (skanda.8.177.7)
इन्द्रियाणि न बध्नन्ति मनो देहसमास्थितम् । जीवो बन्धात्मको ज्ञेयः शुभाशुभनिबन्धनात्
indriyāṇi na badhnanti mano dehasamāsthitam | jīvo bandhātmako jñeyaḥ śubhāśubhanibandhanāt
इन्द्रियाँ शरीर में स्थित मन को नहीं बाँधतीं; जीव को बन्धनात्मक जानना चाहिये, शुभ-अशुभ के बन्धन से।
श्लोक 8 (skanda.8.177.8)
रजसस्तमसश्चैव गुणयोरशुभात्मनोः । उद्रेकाज्जायते दुःखं सौख्यं सत्वात् प्रजायते
rajasastamasaścaiva guṇayoraśubhātmanoḥ | udrekājjāyate duḥkhaṁ saukhyaṁ satvāt prajāyate
रज और तम, इन दोनों अशुभस्वरूप गुणों के उद्रेक से दुःख उत्पन्न होता है; सत्व से सुख उत्पन्न होता है।
श्लोक 9 (skanda.8.177.9)
सौख्यस्य परिणामाद्धि दुःखोत्पत्तिः शरीरिणाम् । जायते च सुखं विप्र भूयो दुःखविपर्ययात्
saukhyasya pariṇāmāddhi duḥkhotpattiḥ śarīriṇām | jāyate ca sukhaṁ vipra bhūyo duḥkhaviparyayāt
सुख के परिणाम से ही देहधारियों में दुःख की उत्पत्ति होती है; और दुःख के विपर्यय से पुनः सुख उत्पन्न होता है, हे विप्र!
श्लोक 10 (skanda.8.177.10)
एवमन्योन्यसंबद्धं गुणत्रयविकारजम् । सुखदुःखात्मकं मोहं भूतान्याविश्य तिष्ठति
evamanyonyasaṁbaddhaṁ guṇatrayavikārajam | sukhaduḥkhātmakaṁ mohaṁ bhūtānyāviśya tiṣṭhati
इस प्रकार परस्पर सम्बद्ध, त्रिगुण के विकार से उत्पन्न, सुख-दुःखस्वरूप मोह, प्राणियों में प्रवेश करके स्थित रहता है।
श्लोक 11 (skanda.8.177.11)
मनश्चेतःसमाधानाद्विषयोद्विजनादपि । तस्य नाशः समाख्यातः सङ्गस्य च विवर्जनात्
manaścetaḥsamādhānādviṣayodvijanādapi | tasya nāśaḥ samākhyātaḥ saṅgasya ca vivarjanāt
मन को चेतना में स्थिर करने से, तथा विषयों से उद्विग्न (विमुख) होने से भी, उसका नाश कहा गया है, और आसक्ति के त्याग से भी।
श्लोक 12 (skanda.8.177.12)
इच्छानिग्रहणे सक्ताः क्रोधादिपरिवर्जिताः । निर्ममा निरहङ्कारा बध्यन्ते नैव कर्मभिः
icchānigrahaṇe saktāḥ krodhādiparivarjitāḥ | nirmamā nirahaṅkārā badhyante naiva karmabhiḥ
इच्छा के निग्रह में लगे हुए, क्रोधादि से रहित, ममतारहित, अहंकाररहित, कर्मों से कभी नहीं बँधते।
श्लोक 13 (skanda.8.177.13)
आत्मा सर्वगतो ह्येषः सूक्ष्मः संभोगवर्जितः । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति ध्यानाद्वायुविवर्जनात्
ātmā sarvagato hyeṣaḥ sūkṣmaḥ saṁbhogavarjitaḥ | yoginastaṁ prapaśyanti dhyānādvāyuvivarjanāt
यह आत्मा सर्वगत ही है, सूक्ष्म, भोगरहित; योगीजन उसे ध्यान से, वायु के त्याग से देखते हैं।
श्लोक 14 (skanda.8.177.14)
तावद् भ्रमति संसारे चतुर्योनिषु जन्तुषु । यावन्नात्मानमन्वेष्टि स च विन्नो न जन्म च
tāvad bhramati saṁsāre caturyoniṣu jantuṣu | yāvannātmānamanveṣṭi sa ca vinno na janma ca
जब तक आत्मा की खोज नहीं करता, तब तक वह चार योनियों के प्राणियों में संसार में भटकता रहता है; और जिसने उसे पा लिया, उसका पुनर्जन्म नहीं होता।
श्लोक 15 (skanda.8.177.15)
यद्यपि ध्यानसंसर्गादबुद्ध्वा ब्रह्म नश्यति । तथापि ब्रह्मसायुज्यान्न तु जन्म पुनर्लभेत्
yadyapi dhyānasaṁsargādabuddhvā brahma naśyati | tathāpi brahmasāyujyānna tu janma punarlabhet
यद्यपि ध्यान के सम्पर्क से, ब्रह्म को बिना जाने भी, नाश हो जाता है, फिर भी ब्रह्मसायुज्य के कारण पुनर्जन्म नहीं पाता।
श्लोक 16 (skanda.8.177.16)
अथैश्वर्यं परं ध्यानाद्योगजं प्राप्नुते मुनिः । विदित्वा परमात्मानं ततो न पुनराव्रजेत्
athaiśvaryaṁ paraṁ dhyānādyogajaṁ prāpnute muniḥ | viditvā paramātmānaṁ tato na punarāvrajet
तब मुनि ध्यान से योगजनित परम ऐश्वर्य को प्राप्त करता है; परमात्मा को जानकर, फिर वह पुनः वापस नहीं आता।
श्लोक 17 (skanda.8.177.17)
असुखान्यपि कर्माणि महापापकृतान्यपि । कृत्वा ध्यानरतो जन्तुस्तरसा नयति क्षयम्
asukhānyapi karmāṇi mahāpāpakṛtānyapi | kṛtvā dhyānarato jantustarasā nayati kṣayam
असुखकर कर्मों को भी, महापापयुक्त कर्मों को भी, करके, ध्यानरत प्राणी शीघ्र ही उन्हें क्षय की ओर ले जाता है।
श्लोक 18 (skanda.8.177.18)
प्राप्य कर्मक्षयं कृत्स्नं ध्यानयुक्त्या महामुने । तिष्ठते निर्भयो योगी परमैश्वर्यसंयुतः
prāpya karmakṣayaṁ kṛtsnaṁ dhyānayuktyā mahāmune | tiṣṭhate nirbhayo yogī paramaiśvaryasaṁyutaḥ
सम्पूर्ण कर्मक्षय को ध्यानयुक्ति से प्राप्त करके, हे महामुने! योगी निर्भय होकर, परम ऐश्वर्य से युक्त होकर स्थित रहता है।
श्लोक 19 (skanda.8.177.19)
कामरोषौ तथा सङ्गो द्वेषो रागविनिश्चयः । एते क्षुद्रतरा भावा मुक्त एभिर्विमुच्यते
kāmaroṣau tathā saṅgo dveṣo rāgaviniścayaḥ | ete kṣudratarā bhāvā mukta ebhirvimucyate
काम और क्रोध, तथा आसक्ति, द्वेष, राग का निश्चय - ये क्षुद्रतर भाव हैं; इनसे मुक्त होकर मनुष्य मुक्त हो जाता है।
श्लोक 20 (skanda.8.177.20)
गर्वो दम्भो ह्यहङ्कारस्तर्को मानोथ मत्सरः । पारुष्यं क्रूरता चैव भावाः क्षत्रनिबन्धनाः
garvo dambho hyahaṅkārastarko mānotha matsaraḥ | pāruṣyaṁ krūratā caiva bhāvāḥ kṣatranibandhanāḥ
गर्व, दम्भ, अहंकार, तर्क, मान, तथा मत्सर, कठोरता और क्रूरता भी - ये क्षत्रभाव (क्षत्रियस्वभाव से बँधे भाव) हैं।
श्लोक 21 (skanda.8.177.21)
यस्यैते मोहना न स्युर्विन्दन्त्यात्मानमीश्वरम् । मोहभावान्तरातीतः समदुःखसुखस्सदा
yasyaite mohanā na syurvindantyātmānamīśvaram | mohabhāvāntarātītaḥ samaduḥkhasukhassadā
जिसके ये मोहकारी भाव न हों, वह आत्मा ईश्वर को पा लेता है; मोहभावों से परे, सदा सुख-दुःख में समान,
श्लोक 22 (skanda.8.177.22)
निर्ममत्वादिभिर्युक्तो योगीति परिपठ्यते । यज्ञकर्म समुत्सृज्य वैष्णवं मोहबन्धनम्
nirmamatvādibhiryukto yogīti paripaṭhyate | yajñakarma samutsṛjya vaiṣṇavaṁ mohabandhanam
ममतारहितादि गुणों से युक्त, वह योगी कहलाता है। यज्ञकर्म को त्यागकर, वैष्णव मोहबन्धन को भी,
श्लोक 23 (skanda.8.177.23)
अध्यात्मपरमो नित्यं मुमुक्षुर्ब्राह्मणो भवेत् । त्रिवर्गं संपरित्यज्य योपवर्गे रतिं लभेत्
adhyātmaparamo nityaṁ mumukṣurbrāhmaṇo bhavet | trivargaṁ saṁparityajya yopavarge ratiṁ labhet
त्यागकर, नित्य अध्यात्मपरायण, ब्राह्मण मुमुक्षु बन जाता है; त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) को सम्पूर्णतः त्यागकर जो अपवर्ग (मोक्ष) में रति पाता है,
श्लोक 24 (skanda.8.177.24)
दिवौकसामसौ पूज्यो विप्र इत्यभिधीयते । ध्यानेन क्षीयते कर्म पापं वा यदि वा शुभम्
divaukasāmasau pūjyo vipra ityabhidhīyate | dhyānena kṣīyate karma pāpaṁ vā yadi vā śubham
वह दिवौकसों के लिये भी पूज्य, 'सच्चा विप्र' कहलाता है; ध्यान से कर्म क्षीण होता है, चाहे पाप हो या शुभ।
श्लोक 25 (skanda.8.177.25)
क्षीणकर्मा ततो योगी तत्परं ब्रह्म विन्दति । प्राप्तयोगो मुनिर्ध्यानी यद्यत् कर्तुमभीप्सते
kṣīṇakarmā tato yogī tatparaṁ brahma vindati | prāptayogo munirdhyānī yadyat kartumabhīpsate
तब कर्मक्षीण होकर योगी उस परम ब्रह्म को पा लेता है; योगप्राप्त, ध्यानी मुनि जो-जो करना चाहता है,
श्लोक 26 (skanda.8.177.26)
तत्तद् भवति तस्याशु मनसा चिन्तितेन वा । योगिनं पुरुषं दृष्ट्वा पापैर्मुच्यन्ति तत्क्षणात् । योपि संभाषते तेन सोपि सद्गतिमाप्नुते
tattad bhavati tasyāśu manasā cintitena vā | yoginaṁ puruṣaṁ dṛṣṭvā pāpairmucyanti tatkṣaṇāt | yopi saṁbhāṣate tena sopi sadgatimāpnute
वह सब उसके लिये शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है, मन से या मात्र विचार से; ऐसे योगी पुरुष को देखकर मनुष्य उसी क्षण पापों से मुक्त हो जाते हैं, और जो उससे बातचीत भी करता है, वह भी सद्गति पाता है।
श्लोक 27 (skanda.8.177.27)
योगमेव परं ज्ञात्वा सर्वाशुभविमोचनम् । सचेतसो द्विजा विप्र बभूवुर्हि मुमुक्षवः
yogameva paraṁ jñātvā sarvāśubhavimocanam | sacetaso dvijā vipra babhūvurhi mumukṣavaḥ
योग को ही परम, समस्त अशुभों से मुक्तिदायक जानकर, सचेत द्विजगण मुमुक्षु बन गये, हे विप्र!
श्लोक 28 (skanda.8.177.28)
ध्यानं ध्येयं परं चैव धातारं चैव ये विदुः । तापनात् तपनात् ताप्यान्मुक्तास्ते दुःखबन्धनात्
dhyānaṁ dhyeyaṁ paraṁ caiva dhātāraṁ caiva ye viduḥ | tāpanāt tapanāt tāpyānmuktāste duḥkhabandhanāt
जो ध्यान, ध्येय, और परम धाता को जानते हैं, वे ताप से, तपन से, ताप्य से - दुःख के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 29 (skanda.8.177.29)
सर्वारम्भपरित्यागान्ममत्वादिविवर्जनात् । सांख्ययोगागमावेकौ भेदस्तत्वविमोचने
sarvārambhaparityāgānmamatvādivivarjanāt | sāṁkhyayogāgamāvekau bhedastatvavimocane
समस्त आरम्भों के परित्याग से, ममतादि के त्याग से, सांख्य और योग आगम एक ही हैं; भेद केवल तत्त्व के विमोचन (निरूपण) में है।
श्लोक 30 (skanda.8.177.30)
निर्गुणः सांख्यमुख्यानां पुरुषः परिपठ्यते । दीपनिर्वाणवत्तेषां देहभेदे गतिः स्मृता
nirguṇaḥ sāṁkhyamukhyānāṁ puruṣaḥ paripaṭhyate | dīpanirvāṇavatteṣāṁ dehabhede gatiḥ smṛtā
सांख्यों में प्रमुखों के लिये पुरुष निर्गुण कहा गया है; उनके लिये देहभेद (देहत्याग) पर दीपनिर्वाण के समान गति मानी गयी है।
श्लोक 31 (skanda.8.177.31)
ईश्वरः सर्वनिर्मुक्तः क्षेत्रज्ञो योगिनां मतः । परमैश्वर्यसंयुक्तास्तं विशन्ति हि योगिनः
īśvaraḥ sarvanirmuktaḥ kṣetrajño yogināṁ mataḥ | paramaiśvaryasaṁyuktāstaṁ viśanti hi yoginaḥ
सर्वमुक्त ईश्वर को योगियों के मत में क्षेत्रज्ञ माना गया है; परम ऐश्वर्य से युक्त होकर योगीजन उसी में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 32 (skanda.8.177.32)
धारणाभिः समं ताभिः प्राणायामैस्तथैव च । आत्मानं योजयेद्यस्तु स यागं लभते परम्
dhāraṇābhiḥ samaṁ tābhiḥ prāṇāyāmaistathaiva ca | ātmānaṁ yojayedyastu sa yāgaṁ labhate param
उन धारणाओं के साथ, तथा प्राणायामों के साथ भी, जो आत्मा को योजित करता है, वह परम यज्ञ को प्राप्त करता है।
श्लोक 33 (skanda.8.177.33)
अहिंसादिसमायुक्तो योगी विगतमत्सरः । ध्यानमभ्यसते यस्तु स जयेन्मृत्युजन्मनी
ahiṁsādisamāyukto yogī vigatamatsaraḥ | dhyānamabhyasate yastu sa jayenmṛtyujanmanī
अहिंसादि से युक्त, ईर्ष्यारहित योगी जो ध्यान का अभ्यास करता है, वह मृत्यु और जन्म दोनों को जीत लेता है।
श्लोक 34 (skanda.8.177.34)
निर्गुणो निरहङ्कारो जितद्वन्द्वोनवग्रहः । भिक्षोपात्तरसाहारो मुमुक्षुरिति शब्द्यते
nirguṇo nirahaṅkāro jitadvandvonavagrahaḥ | bhikṣopāttarasāhāro mumukṣuriti śabdyate
निर्गुण, निरहंकार, द्वन्द्वविजयी, नवग्रहरहित, भिक्षा से प्राप्त रसाहारवाला - वह 'मुमुक्षु' कहलाता है।
श्लोक 35 (skanda.8.177.35)
सर्वारम्भसमावस्थः सर्वाश्रयविवर्जितः । कर्ममार्गादतिक्रान्तो ध्यानीति परिकीर्त्यते
sarvārambhasamāvasthaḥ sarvāśrayavivarjitaḥ | karmamārgādatikrānto dhyānīti parikīrtyate
समस्त आरम्भों में समान स्थित, सर्वाश्रय से रहित, कर्ममार्ग से अतिक्रान्त - वह 'ध्यानी' कहा जाता है।
श्लोक 36 (skanda.8.177.36)
यस्य नोद्विजते चेतो दुःखापत्तौ महामुने । न हष्यति सुखे चैव ध्यानीति स विशब्दितः
yasya nodvijate ceto duḥkhāpattau mahāmune | na haṣyati sukhe caiva dhyānīti sa viśabditaḥ
जिसका चित्त दुःख की प्राप्ति में उद्विग्न नहीं होता, हे महामुने! और सुख में भी हर्षित नहीं होता, वह 'ध्यानी' कहा जाता है।
श्लोक 37 (skanda.8.177.37)
मोक्षसिद्धिप्रदः पन्थास्त्रिविधः परिकीर्तितः । पूर्वः संकेतनः प्रोक्तः पश्चात् संकथनः स्मृतः
mokṣasiddhipradaḥ panthāstrividhaḥ parikīrtitaḥ | pūrvaḥ saṁketanaḥ proktaḥ paścāt saṁkathanaḥ smṛtaḥ
मोक्षसिद्धि प्रदान करनेवाला मार्ग त्रिविध कहा गया है - पहला 'संकेतन' कहा गया है, दूसरा 'संकथन' माना गया है,
श्लोक 38 (skanda.8.177.38)
संसक्तश्च तृतीयस्तु तेषां भेदमिमं शृणु । प्रतिरूपं विभोः कृत्वा दशभिर्नियमैर्युतः
saṁsaktaśca tṛtīyastu teṣāṁ bhedamimaṁ śṛṇu | pratirūpaṁ vibhoḥ kṛtvā daśabhirniyamairyutaḥ
और तीसरा 'संसक्त' है; इनका यह भेद सुनो। ईश्वर का प्रतिरूप बनाकर, दस नियमों से युक्त,
श्लोक 39 (skanda.8.177.39)
उपास्ते यो मुनिर्ध्यायन् स संकेतन उच्यते । वेदादृतसुखासङ्गः सत्वकर्मा त्वबान्धवान्
upāste yo munirdhyāyan sa saṁketana ucyate | vedādṛtasukhāsaṅgaḥ satvakarmā tvabāndhavān
जो मुनि ध्यान करते हुए उपासना करता है, वह 'संकेतन' कहलाता है - वेद से बाहर सुखासक्ति, सत्वकर्मी किन्तु बन्धुरहित,
श्लोक 40 (skanda.8.177.40)
परित्यज्येश्वरं ध्यायेत् तत्संकथनमुच्यते । सर्वारम्भपरित्यागात् कपिलादिनिषेवितः
parityajyeśvaraṁ dhyāyet tatsaṁkathanamucyate | sarvārambhaparityāgāt kapilādiniṣevitaḥ
इन सबको त्यागकर ईश्वर का ध्यान करे, वह 'संकथन' कहलाता है। समस्त आरम्भों के परित्याग से, कपिल आदि द्वारा सेवित,
श्लोक 41 (skanda.8.177.41)
स्मृतः संकथनः पन्था योगाग्निपरिदीपकः । निर्विकल्पस्तु यत्सर्वं ब्रह्म एवेति पश्यति
smṛtaḥ saṁkathanaḥ panthā yogāgniparidīpakaḥ | nirvikalpastu yatsarvaṁ brahma eveti paśyati
'संकथन' मार्ग योगाग्नि का प्रदीपक माना गया है। निर्विकल्प होकर जो सब कुछ ब्रह्म ही है ऐसा देखता है,
श्लोक 42 (skanda.8.177.42)
भिन्नसर्वक्रियाचारो ध्यानी संसक्त उच्यते । त्रिविधस्यापि मार्गस्य नियमानियमानि च
bhinnasarvakriyācāro dhyānī saṁsakta ucyate | trividhasyāpi mārgasya niyamāniyamāni ca
भिन्न-भिन्न समस्त क्रियाचारवाला वह ध्यानी 'संसक्त' कहलाता है। त्रिविध मार्ग के भी नियम और अनियम,
श्लोक 43 (skanda.8.177.43)
तान्येव परिकीर्त्यन्ते चर्याभेदा स्त्वनेकधा । त्रयोपि हेतवो मुक्तेरिमे ध्यानपथा मुने
tānyeva parikīrtyante caryābhedā stvanekadhā | trayopi hetavo mukterime dhyānapathā mune
वे ही कहे जाते हैं, आचरण के भेद अनेक प्रकार के हैं; तीनों ही मुक्ति के हेतु हैं, ये ध्यानमार्ग, हे मुने!
श्लोक 44 (skanda.8.177.44)
सम्यगेतान्मुनिर्ज्ञात्वा निर्ममोन्यतमं श्रितः । तदाप्नोति परं ध्यानं येन विन्दति तत्परम्
samyagetānmunirjñātvā nirmamonyatamaṁ śritaḥ | tadāpnoti paraṁ dhyānaṁ yena vindati tatparam
इन्हें सम्यक् रूप से जानकर, ममतारहित होकर, इनमें से किसी एक का आश्रय लेनेवाला मुनि, तब परम ध्यान को प्राप्त करता है, जिससे वह उस परम को पा लेता है।
श्लोक 45 (skanda.8.177.45)
सर्वान्ध्यानविधीँस्त्वेतानुच्यमानानिमान्मया । शृणु व्यास महाबुद्धे योगैश्वर्यफलप्रदान्
sarvāndhyānavidhī~stvetānucyamānānimānmayā | śṛṇu vyāsa mahābuddhe yogaiśvaryaphalapradān
मेरे द्वारा कहे जा रहे इन समस्त ध्यानविधियों को, हे व्यास महाबुद्धे! सुनो, जो योगैश्वर्य का फल देनेवाली हैं।