अम्बिका खण्ड · अध्याय 178
पाशुपतयोगवर्णन-पञ्चम
श्लोक 1 (skanda.8.178.1)
सनत्कुमार उवाच । द्विविधं ब्रह्म निर्दिष्टं क्षरमक्षरमेव च । विदित्वोभयमेतद्धि मुच्यते सर्वबन्धनैः
sanatkumāra uvāca | dvividhaṁ brahma nirdiṣṭaṁ kṣaramakṣarameva ca | viditvobhayametaddhi mucyate sarvabandhanaiḥ
सनत्कुमार ने कहा - ब्रह्म दो प्रकार का बताया गया है - क्षर और अक्षर; इन दोनों को जानकर मनुष्य समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.8.178.2)
पञ्चविंशतिमं तत्त्वं क्षरं तत् प्रकृतेः परम् । अक्षरं च परं ब्रह्म षड्विंशकमिति स्मृतम्
pañcaviṁśatimaṁ tattvaṁ kṣaraṁ tat prakṛteḥ param | akṣaraṁ ca paraṁ brahma ṣaḍviṁśakamiti smṛtam
पचीसवाँ तत्त्व क्षर है, जो प्रकृति से परे है; अक्षर, परम ब्रह्म, षड्विंशक कहा गया है।
श्लोक 3 (skanda.8.178.3)
मन एकगतं कृत्वा धारणाभिः पुनः पुनः । वायुनिग्रहणं कुर्यात् प्रत्याहारपुरस्सरम्
mana ekagataṁ kṛtvā dhāraṇābhiḥ punaḥ punaḥ | vāyunigrahaṇaṁ kuryāt pratyāhārapurassaram
मन को एकाग्र करके, बार-बार धारणाओं से, प्रत्याहारपूर्वक वायु का निग्रह करना चाहिये।
श्लोक 4 (skanda.8.178.4)
मुहूर्तार्धं क्षणं वापि प्रत्याहारं समाचरेत् । तलात् त्रिंशच्छतं चोर्ध्वं प्राणायामनिबन्धनम्
muhūrtārdhaṁ kṣaṇaṁ vāpi pratyāhāraṁ samācaret | talāt triṁśacchataṁ cordhvaṁ prāṇāyāmanibandhanam
आधे मुहूर्त, या एक क्षण के लिये भी, प्रत्याहार का अभ्यास करना चाहिये; तीस से लेकर एक सौ तीस तक प्राणायाम का नियम है।
श्लोक 5 (skanda.8.178.5)
अभ्यस्तमासनं यत् स्यात् स्वस्तिकादि प्रकीर्त्तितम् । तद् बद्ध्वा विजने देशे ध्यानाभ्यासं समाचरेत्
abhyastamāsanaṁ yat syāt svastikādi prakīrttitam | tad baddhvā vijane deśe dhyānābhyāsaṁ samācaret
स्वस्तिक आदि जो अभ्यस्त आसन कहे गये हैं, उन्हें बाँधकर, एकान्त स्थान में ध्यानाभ्यास करना चाहिये।
श्लोक 6 (skanda.8.178.6)
क्षुधार्त्तो वातिभुक्तो वा रुजा दुःखान्वितोपि वा । न ध्यायीत पुनर्विद्वान् य इच्छेद् ध्यानमात्मनः
kṣudhārtto vātibhukto vā rujā duḥkhānvitopi vā | na dhyāyīta punarvidvān ya icched dhyānamātmanaḥ
भूख से पीड़ित हो, या अधिक भोजन किया हो, या रोग-दुःख से युक्त भी हो, तो विद्वान् पुनः ध्यान न करे, जो आत्मध्यान की इच्छा रखता हो।
श्लोक 7 (skanda.8.178.7)
योगहस्तं ततः कृत्वा वामस्योपरि दक्षिणम् । अधोमुखो भवेत् किञ्चित् पश्यन्नासाग्रमात्मनः
yogahastaṁ tataḥ kṛtvā vāmasyopari dakṣiṇam | adhomukho bhavet kiñcit paśyannāsāgramātmanaḥ
तब योगमुद्रा बनाकर, बायें हाथ के ऊपर दायाँ हाथ रखकर, कुछ नीचे मुखवाला होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग को देखते हुए,
श्लोक 8 (skanda.8.178.8)
अस्पृशन् दशनैर्दन्तानोङ्कारं ब्रह्म संस्मरन् । ध्यायीत निर्ममो विद्वान प्राणायामपुरःसरम्
aspṛśan daśanairdantānoṅkāraṁ brahma saṁsmaran | dhyāyīta nirmamo vidvāna prāṇāyāmapuraḥsaram
दाँतों से दाँतों को न छूते हुए, ॐकार ब्रह्म का स्मरण करते हुए, विद्वान् ममतारहित होकर प्राणायामपूर्वक ध्यान करे।
श्लोक 9 (skanda.8.178.9)
आत्मानमात्मना योज्य सर्वाङ्गानि तु संहरेत् । निरीहः पिहिताक्षश्च निक्षिप्य हृदि धारणाम्
ātmānamātmanā yojya sarvāṅgāni tu saṁharet | nirīhaḥ pihitākṣaśca nikṣipya hṛdi dhāraṇām
आत्मा को आत्मा से युक्त करके सभी अंगों को संकुचित कर ले; निरीह, नेत्र बन्द किये हुए, हृदय में धारणा स्थापित करके,
श्लोक 10 (skanda.8.178.10)
पाषाण इव निष्पन्दो मुनिर्ध्यानं समाचरेत् । एकत्रास्पन्दसन्धानं मनसो धारणा स्मृता
pāṣāṇa iva niṣpando munirdhyānaṁ samācaret | ekatrāspandasandhānaṁ manaso dhāraṇā smṛtā
पत्थर के समान निष्पन्द होकर मुनि ध्यान का अभ्यास करे; एक स्थान पर मन का अस्पन्द संधान ही धारणा कही गयी है।
श्लोक 11 (skanda.8.178.11)
एवं प्रतिदिनं तस्य ध्यायतो योगिनो मुने । विकारा गुणजाः सर्वे नश्यन्ते विघ्नहेतवः
evaṁ pratidinaṁ tasya dhyāyato yogino mune | vikārā guṇajāḥ sarve naśyante vighnahetavaḥ
इस प्रकार प्रतिदिन ध्यान करनेवाले उस योगी के, हे मुने! गुणों से उत्पन्न सभी विकार, जो विघ्न के कारण हैं, नष्ट हो जाते हैं,
श्लोक 12 (skanda.8.178.12)
अन्वेष्टि च परं ब्रह्म स्वशरीरं समास्थितम् । कृत्वैक्यं प्राणमनसामिन्द्रियाणां विनिग्रहात्
anveṣṭi ca paraṁ brahma svaśarīraṁ samāsthitam | kṛtvaikyaṁ prāṇamanasāmindriyāṇāṁ vinigrahāt
और वह अपने ही शरीर में स्थित परम ब्रह्म की खोज करता है, इन्द्रियों के निग्रह से प्राण-मन की एकता प्राप्त करके,
श्लोक 13 (skanda.8.178.13)
सर्वभावपरित्यागान्मोक्षमाप्नोत्यसंशयम् । प्रत्याहाररतं कृत्वा सर्वमिन्द्रियगोचरम्
sarvabhāvaparityāgānmokṣamāpnotyasaṁśayam | pratyāhārarataṁ kṛtvā sarvamindriyagocaram
समस्त भावों के परित्याग से निःसंदेह मोक्ष प्राप्त करता है, इन्द्रियगोचर समस्त वस्तुओं को प्रत्याहार में लगाकर,
श्लोक 14 (skanda.8.178.14)
ततो युञ्जति निर्द्वन्द्वो मनस्सन्धानमाचरन् । सर्वं मनसि संस्थाप्य परं तत्त्वं निरूपयेत्
tato yuñjati nirdvandvo manassandhānamācaran | sarvaṁ manasi saṁsthāpya paraṁ tattvaṁ nirūpayet
तब द्वन्द्वरहित होकर वह मन के संधान का अभ्यास करते हुए योग करता है; सब कुछ मन में स्थापित करके परम तत्त्व का निरूपण करे।
श्लोक 15 (skanda.8.178.15)
अथैश्वर्यगतां सिद्धिं ध्यायन्नष्टविधां यदा । पश्यते योगसंसिद्ध्या तदा योगी प्रकीर्त्यते
athaiśvaryagatāṁ siddhiṁ dhyāyannaṣṭavidhāṁ yadā | paśyate yogasaṁsiddhyā tadā yogī prakīrtyate
तब जब वह ध्यान करते हुए ऐश्वर्य से युक्त अष्टविध सिद्धि को योगसिद्धि से देखता है, तब वह 'योगी' कहलाता है।
श्लोक 16 (skanda.8.178.16)
ब्रह्मसोमादिकान् देवान् यदा युक्तः प्रपश्यति । योगिभिः कथ्यते ह्येषा सिद्धिर्योगविकारजा
brahmasomādikān devān yadā yuktaḥ prapaśyati | yogibhiḥ kathyate hyeṣā siddhiryogavikārajā
जब वह युक्त होकर ब्रह्मा-सोम आदि देवताओं को देखता है, तब यह योगियों द्वारा योगविकार से उत्पन्न सिद्धि कही जाती है।
श्लोक 17 (skanda.8.178.17)
मनसा योगिनां सिद्धिः साख्यास्तत्त्वविनिश्चयात् । न विशेषोस्ति योगानां मुक्त्वा माहेश्वरं विधिम्
manasā yogināṁ siddhiḥ sākhyāstattvaviniścayāt | na viśeṣosti yogānāṁ muktvā māheśvaraṁ vidhim
मन से योगियों की सिद्धि, और सांख्यों की तत्त्वनिश्चय से सिद्धि - इन दोनों योगों में, माहेश्वर विधि को छोड़कर, कोई विशेष भेद नहीं है।
श्लोक 18 (skanda.8.178.18)
योगिनो ध्यानसंसिद्धिं सांख्यास्तत्त्वविनिश्चयम् । अविभिन्नावुभावेतौ ध्यानतत्त्वार्थनिश्चयौ
yogino dhyānasaṁsiddhiṁ sāṁkhyāstattvaviniścayam | avibhinnāvubhāvetau dhyānatattvārthaniścayau
योगियों की ध्यानसिद्धि, और सांख्यों का तत्त्वनिश्चय - ये दोनों, ध्यान के तत्त्वार्थनिश्चय, अभिन्न ही हैं।
श्लोक 19 (skanda.8.178.19)
सर्वबन्धपरिभ्रष्टः सङ्गदोषविवर्जितः । रागमोहादिसंत्यक्तो मुक्त इत्यभिधीयते
sarvabandhaparibhraṣṭaḥ saṅgadoṣavivarjitaḥ | rāgamohādisaṁtyakto mukta ityabhidhīyate
समस्त बन्धनों से मुक्त, आसक्ति के दोष से रहित, राग-मोहादि से त्यक्त - वह 'मुक्त' कहलाता है।
श्लोक 20 (skanda.8.178.20)
शब्दादीन् विषयान् युक्तो न ध्यायन्वेत्ति वै यदा । असकृद् योगसंसिद्ध्या तदा पश्यति तत्परम्
śabdādīn viṣayān yukto na dhyāyanvetti vai yadā | asakṛd yogasaṁsiddhyā tadā paśyati tatparam
जब युक्त पुरुष शब्दादि विषयों को ध्यान किये बिना भी नहीं जानता, तब बार-बार योगसिद्धि से वह उस परम को देखता है।
श्लोक 21 (skanda.8.178.21)
मृत्युजन्मभयोद्विग्नः सङ्गदोषविवर्जितः । अरण्ये मौनमाधाय ध्यायेदोङ्कारमक्षरम्
mṛtyujanmabhayodvignaḥ saṅgadoṣavivarjitaḥ | araṇye maunamādhāya dhyāyedoṅkāramakṣaram
मृत्यु-जन्म के भय से उद्विग्न, आसक्ति के दोष से रहित, वन में मौन धारण करके, अक्षर ॐकार का ध्यान करे,
श्लोक 22 (skanda.8.178.22)
वेदादौ यः स्वरः प्रोक्तो वेदान्ते च प्रतिष्ठितः तस्य प्रकृतिलीनस्य यः परः स महान् स्मृतः
vedādau yaḥ svaraḥ prokto vedānte ca pratiṣṭhitaḥ tasya prakṛtilīnasya yaḥ paraḥ sa mahān smṛtaḥ
जो वेद के आरम्भ में स्वर कहा गया है, और वेदान्त में भी प्रतिष्ठित है; उस प्रकृति में लीन उसके, जो परम है, वह महान् (महत्तत्त्व) माना गया है।
श्लोक 23 (skanda.8.178.23)
त्रिसंस्थानं त्रिमात्रं च त्रिब्रह्म त्र्यक्षरं तथा । मात्राहीनं समात्रं च यो विद्यात् स विमुच्यते
trisaṁsthānaṁ trimātraṁ ca tribrahma tryakṣaraṁ tathā | mātrāhīnaṁ samātraṁ ca yo vidyāt sa vimucyate
तीन स्थानोंवाला, तीन मात्राओं वाला, त्रिब्रह्मस्वरूप, तथा त्र्यक्षर भी, मात्रारहित और मात्रासहित भी - जो इसे जानता है, वह मुक्त हो जाता है।
श्लोक 24 (skanda.8.178.24)
नाग्निस्तत्र न वायुश्च न सोमो न दिवाकरः । प्रभवन्ति महेशाने ईश्वरे त्रिविकल्पिते
nāgnistatra na vāyuśca na somo na divākaraḥ | prabhavanti maheśāne īśvare trivikalpite
वहाँ न अग्नि, न वायु, न सोम, न सूर्य ही, महेशान में, त्रिविध रूप से कल्पित ईश्वर में, प्रभावी हो सकते हैं।
श्लोक 25 (skanda.8.178.25)
ओङ्कारः परमं तत्त्वमात्मा ब्रह्म च कीर्त्यते । क्षेत्रज्ञैरात्मसंबोधाद्योगिभिः सूक्ष्मदर्शनात्
oṅkāraḥ paramaṁ tattvamātmā brahma ca kīrtyate | kṣetrajñairātmasaṁbodhādyogibhiḥ sūkṣmadarśanāt
ॐकार परम तत्त्व है, आत्मा और ब्रह्म दोनों कहा जाता है, क्षेत्रज्ञों द्वारा आत्मबोध से, और योगियों द्वारा सूक्ष्मदर्शन से।
श्लोक 26 (skanda.8.178.26)
एवमेव सदा ध्यायन् मन आत्मनि योजयेत् । ईश्वरं प्राप्नुते योगी यमवाप्य विमुच्यते
evameva sadā dhyāyan mana ātmani yojayet | īśvaraṁ prāpnute yogī yamavāpya vimucyate
इस प्रकार सदा ध्यान करते हुए मन को आत्मा में योजित करे; योगी ईश्वर को प्राप्त करता है, जिसे पाकर वह मुक्त हो जाता है।
श्लोक 27 (skanda.8.178.27)
इन्द्रियाणि तु सर्वाणि शब्दरूपादिनिग्रहात् । विदित्वा कर्मजान् हन्ति योगी दोषानशेषतः
indriyāṇi tu sarvāṇi śabdarūpādinigrahāt | viditvā karmajān hanti yogī doṣānaśeṣataḥ
शब्द-रूपादि के निग्रह से समस्त इन्द्रियों को जानकर, योगी कर्मजनित दोषों को सम्पूर्णतः नष्ट कर देता है,
श्लोक 28 (skanda.8.178.28)
ध्यानशक्त्या ततः शुद्धः सर्वजिन्मोक्षमाप्नुते । युञ्जन् प्रतिदिनं व्यास षड्मासाद् योगमाप्नुते
dhyānaśaktyā tataḥ śuddhaḥ sarvajinmokṣamāpnute | yuñjan pratidinaṁ vyāsa ṣaḍmāsād yogamāpnute
तब ध्यानशक्ति से शुद्ध होकर सर्वमुक्ति (सम्पूर्ण मोक्ष) प्राप्त करता है; प्रतिदिन अभ्यास करते हुए, हे व्यास! छह मास में योग प्राप्त करता है,
श्लोक 29 (skanda.8.178.29)
पश्यते च परं ब्रह्म येन मुच्येत बन्धनात् । तमात्मानं परं ज्ञात्वा योगशक्त्या महामुनिः । परमैश्वर्यसंयुक्त अमृतं पदमाप्नुयात्
paśyate ca paraṁ brahma yena mucyeta bandhanāt | tamātmānaṁ paraṁ jñātvā yogaśaktyā mahāmuniḥ | paramaiśvaryasaṁyukta amṛtaṁ padamāpnuyāt
और परम ब्रह्म को देखता है, जिससे वह बन्धन से मुक्त हो जाता है; उस परम आत्मा को जानकर, योगशक्ति से वह महामुनि, परम ऐश्वर्य से युक्त होकर अमृतपद को प्राप्त करता है।