Skip to main content

अम्बिका खण्ड · अध्याय 179

पाशुपतयोगवर्णन-षष्ठ

अध्याय 178अध्याय-सूचीअध्याय 180

श्लोक 1 (skanda.8.179.1)

सनत्कुमार उवाच । अन्तःकरणसंसिद्धो यो महान् कथितो मया । पञ्च कर्मेन्द्रियाण्यत्र पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि च

sanatkumāra uvāca | antaḥkaraṇasaṁsiddho yo mahān kathito mayā | pañca karmendriyāṇyatra pañca buddhīndriyāṇi ca

सनत्कुमार ने कहा - अन्तःकरण में सिद्ध जो महत्तत्त्व मेरे द्वारा कहा गया, यहाँ पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच बुद्धीन्द्रियाँ हैं,

श्लोक 2 (skanda.8.179.2)

पञ्चभूतं मनश्चात्र विकाराः षोडश स्मृताः । महान् बुद्धिरहङ्कारस्तन्मात्राणि च पञ्च हि

pañcabhūtaṁ manaścātra vikārāḥ ṣoḍaśa smṛtāḥ | mahān buddhirahaṅkārastanmātrāṇi ca pañca hi

पाँच भूत और मन भी - ये सोलह विकार माने गये हैं; महत्, बुद्धि, अहंकार, और पाँच तन्मात्राएँ भी -

श्लोक 3 (skanda.8.179.3)

इमाः प्रकृतयो व्यास देहमष्टौ समाश्रिताः । तत्त्वानि तु चतुर्विशत्येतान्युक्तानि योगिभिः । देहमेभिरवष्टब्धं त्रैलोक्यव्यापिभिः स्थितम्

imāḥ prakṛtayo vyāsa dehamaṣṭau samāśritāḥ | tattvāni tu caturviśatyetānyuktāni yogibhiḥ | dehamebhiravaṣṭabdhaṁ trailokyavyāpibhiḥ sthitam

ये प्रकृतियाँ हैं, हे व्यास! जो शरीर में आठ रूप से आश्रित हैं; कुल चौबीस तत्त्व योगियों द्वारा कहे गये हैं; इन्हीं से आश्रित शरीर त्रैलोक्यव्यापी होकर स्थित है।

श्लोक 4 (skanda.8.179.4)

नाभिमध्ये तु नाडीनां शतमेकं प्रतिष्ठितम् । सर्वाङ्गेषु तु यास्त्वन्या जलान्नरसवाहिकाः

nābhimadhye tu nāḍīnāṁ śatamekaṁ pratiṣṭhitam | sarvāṅgeṣu tu yāstvanyā jalānnarasavāhikāḥ

नाभि के मध्य में एक सौ एक नाड़ियाँ प्रतिष्ठित हैं; तथा सभी अंगों में अन्य भी हैं, जो जल-अन्नरस को वहन करती हैं।

श्लोक 5 (skanda.8.179.5)

तासां त्रिंशत् सहस्राणि व्यानस्रोतसि संस्थिताः । उदानस्यापरा नाड्यो ब्रह्ममूर्ध्नि प्रतिष्ठिताः

tāsāṁ triṁśat sahasrāṇi vyānasrotasi saṁsthitāḥ | udānasyāparā nāḍyo brahmamūrdhni pratiṣṭhitāḥ

उनमें से तीस हजार व्यान के स्रोत में स्थित हैं; उदान की अन्य नाड़ियाँ ब्रह्मरन्ध्र (मस्तक) में प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 6 (skanda.8.179.6)

चक्रनाभी समाश्रित्य भूतसंघातमास्थितम् । तन्मध्ये तु गुणस्पृष्टः कर्मात्मा भूतमोहनः

cakranābhī samāśritya bhūtasaṁghātamāsthitam | tanmadhye tu guṇaspṛṣṭaḥ karmātmā bhūtamohanaḥ

चक्रनाभि का आश्रय लेकर, भूतसंघात में स्थित होकर, उसके मध्य में गुणों से स्पृष्ट, कर्मस्वरूप, भूतों को मोहित करनेवाला (तत्त्व स्थित है) -

श्लोक 7 (skanda.8.179.7)

नक्षत्रोद्योतसंकाशो ज्योत्स्ना पुञ्जनिभः प्रभः । विघातजननोन्येषां सूर्यायुतनिभः स्थितः

nakṣatrodyotasaṁkāśo jyotsnā puñjanibhaḥ prabhaḥ | vighātajananonyeṣāṁ sūryāyutanibhaḥ sthitaḥ

नक्षत्रों की चमक के समान, ज्योत्स्ना के पुंज जैसा प्रभावाला, दूसरों को पीड़ा देनेवाला, दस हजार सूर्यों के समान स्थित,

श्लोक 8 (skanda.8.179.8)

संभूतोग्निरिवोत्पाती गिरिनीहारसन्निभः । गुणस्थो भूतयोनिस्तु पुरुषः पञ्चविंशकः

saṁbhūtognirivotpātī girinīhārasannibhaḥ | guṇastho bhūtayonistu puruṣaḥ pañcaviṁśakaḥ

अचानक उठी हुई अग्नि के समान, पर्वत के कुहरे के समान - गुणों में स्थित, भूतों का योनि, पुरुष है, पचीसवाँ।

श्लोक 9 (skanda.8.179.9)

तस्यापि परतः शुद्धो महानग्निरिवोत्थितः । अर्चिष्मान् सर्वतो दीप्तो निर्विकल्पो निरञ्जनः

tasyāpi parataḥ śuddho mahānagnirivotthitaḥ | arciṣmān sarvato dīpto nirvikalpo nirañjanaḥ

उससे भी परे, शुद्ध, महान् अग्नि के समान उठा हुआ, अर्चिष्मान्, सब ओर से दीप्त, निर्विकल्प, निरञ्जन,

श्लोक 10 (skanda.8.179.10)

निर्धूमाङ्गारसकाशो नविज्ञातागमक्रियः । षड्विंशः पुरुषः सूक्ष्म ईश्वरः परमो विभुः

nirdhūmāṅgārasakāśo navijñātāgamakriyaḥ | ṣaḍviṁśaḥ puruṣaḥ sūkṣma īśvaraḥ paramo vibhuḥ

धूमरहित अंगारे के समान, जिसकी आगति-गति अज्ञात है - षड्विंशक पुरुष, सूक्ष्म, ईश्वर, परम, विभु।

श्लोक 11 (skanda.8.179.11)

स एष कथितो व्यास परेषां परतः स्थितः । महादेवमिमं ज्ञात्वा मुच्यते तत्क्षणान्मुनिः

sa eṣa kathito vyāsa pareṣāṁ parataḥ sthitaḥ | mahādevamimaṁ jñātvā mucyate tatkṣaṇānmuniḥ

वही, हे व्यास! कहा गया है, उन परों से भी परे स्थित; इस महादेव को जानकर मुनि उसी क्षण मुक्त हो जाता है।

श्लोक 12 (skanda.8.179.12)

गुणत्रयविकारस्थः कथितःपञ्चविंशकः । भूयः संसरते तस्मादज्ञानेनैव मोहितः

guṇatrayavikārasthaḥ kathitaḥpañcaviṁśakaḥ | bhūyaḥ saṁsarate tasmādajñānenaiva mohitaḥ

त्रिगुण के विकार में स्थित पचीसवाँ कहा गया है; उससे ही प्राणी पुनः संसरण करता है, अज्ञान से ही मोहित होकर,

श्लोक 13 (skanda.8.179.13)

देवमानुषतिर्यक्षु भ्राम्यते रागमोहितः । षड्विंशकसमाधानात् सिद्धिस्तस्य विकारतः

devamānuṣatiryakṣu bhrāmyate rāgamohitaḥ | ṣaḍviṁśakasamādhānāt siddhistasya vikārataḥ

देव-मनुष्य-तिर्यक् योनियों में राग से मोहित होकर भटकता है; षड्विंशक में समाधान से ही उसकी विकार से परे सिद्धि होती है।

श्लोक 14 (skanda.8.179.14)

क्रियाकार्यविनिर्मुक्तः सर्वज्ञः सर्वसृक् प्रभुः । परमैश्वर्यसंपूर्णः कृतकृत्यो महेश्वरः

kriyākāryavinirmuktaḥ sarvajñaḥ sarvasṛk prabhuḥ | paramaiśvaryasaṁpūrṇaḥ kṛtakṛtyo maheśvaraḥ

क्रिया-कार्य से मुक्त, सर्वज्ञ, सर्वस्रष्टा प्रभु, परम ऐश्वर्य से सम्पूर्ण, कृतकृत्य महेश्वर,

श्लोक 15 (skanda.8.179.15)

अजः स्वयम्भूः षड्विंशः कूटस्थो ह्यचलो ध्रुवः । ततस्तत्त्वानि जायन्ते पुरुषश्च गुणैः सह

ajaḥ svayambhūḥ ṣaḍviṁśaḥ kūṭastho hyacalo dhruvaḥ | tatastattvāni jāyante puruṣaśca guṇaiḥ saha

अजन्मा, स्वयंभू, षड्विंशक, कूटस्थ, अचल, ध्रुव - उससे ही तत्त्व उत्पन्न होते हैं, और पुरुष भी गुणों सहित,

श्लोक 16 (skanda.8.179.16)

तस्मिन्नेव च लीयन्ते षड्विंशे तु महेश्वरे । विदित्वैनं महेशानं मुक्तिसिद्धिरवाप्यते

tasminneva ca līyante ṣaḍviṁśe tu maheśvare | viditvainaṁ maheśānaṁ muktisiddhiravāpyate

और उसी में, षड्विंशक महेश्वर में ही, वे लीन होते हैं; इस महेशान को जानकर मुक्तिसिद्धि प्राप्त होती है।

श्लोक 17 (skanda.8.179.17)

एतज्ज्ञात्वा न लिप्येत कर्मभिर्मोहबन्धनैः । यथाग्निर्निर्दहेदन्ते भूतग्राममशेषतः

etajjñātvā na lipyeta karmabhirmohabandhanaiḥ | yathāgnirnirdahedante bhūtagrāmamaśeṣataḥ

इसे जानकर मनुष्य कर्मों और मोहबन्धनों से लिप्त नहीं होता, जैसे अग्नि अन्त में सम्पूर्ण भूतसमूह को सर्वथा भस्म कर देती है,

श्लोक 18 (skanda.8.179.18)

षडविंशकपदार्थज्ञस्तथा कर्माणि निर्दहेत् । सर्वव्यापि यथाकाशं सूक्ष्मं नैव तु लिप्यते

ṣaḍaviṁśakapadārthajñastathā karmāṇi nirdahet | sarvavyāpi yathākāśaṁ sūkṣmaṁ naiva tu lipyate

वैसे ही षड्विंशक पदार्थ का ज्ञाता कर्मों को भस्म कर देता है; आकाश के समान सर्वव्यापी, सूक्ष्म, वह कभी लिप्त नहीं होता।

श्लोक 19 (skanda.8.179.19)

षड्विंशकरतो योगी तथा पापैर्न लिप्यते । षड्विंशात् परतो नास्ति तस्मात् तत्परमो भवेत्

ṣaḍviṁśakarato yogī tathā pāpairna lipyate | ṣaḍviṁśāt parato nāsti tasmāt tatparamo bhavet

षड्विंशक में रत योगी भी वैसे ही पापों से लिप्त नहीं होता; षड्विंशक से परे कुछ नहीं है, इसलिये वही परम लक्ष्य हो।

श्लोक 20 (skanda.8.179.20)

एकत्वं सह तेनैव त्यक्त्वा देहमवाप्नुते । ब्रह्मविष्ण्वादिकं सर्व भूतग्राममशेषतः

ekatvaṁ saha tenaiva tyaktvā dehamavāpnute | brahmaviṣṇvādikaṁ sarva bhūtagrāmamaśeṣataḥ

उसी के साथ एकत्व प्राप्त करके, देह त्यागकर, वह उसे प्राप्त करता है जिससे ब्रह्मा-विष्णु आदि सम्पूर्ण भूतसमूह सर्वथा,

श्लोक 21 (skanda.8.179.21)

ईश्वराज्जायते व्यास तस्मिन्नेव प्रलीयते । नास्ति तस्मात् परो ह्यन्यस्तं विद्यात् सर्वतः स्थितम्

īśvarājjāyate vyāsa tasminneva pralīyate | nāsti tasmāt paro hyanyastaṁ vidyāt sarvataḥ sthitam

ईश्वर से ही उत्पन्न होता है, हे व्यास! और उसी में लीन हो जाता है; उससे परे कोई अन्य नहीं है, उसे सर्वत्र स्थित जानना चाहिये।

श्लोक 22 (skanda.8.179.22)

यमध्यात्मविदः सिद्धाः परमात्मेत्युपासते । स एष सर्वगो देवः षड्विंशः परमेश्वरः

yamadhyātmavidaḥ siddhāḥ paramātmetyupāsate | sa eṣa sarvago devaḥ ṣaḍviṁśaḥ parameśvaraḥ

जिसे अध्यात्मवेत्ता सिद्धजन 'परमात्मा' कहकर उपासना करते हैं, वही यह सर्वगत देव, षड्विंशक, परमेश्वर है।

श्लोक 23 (skanda.8.179.23)

प्राणोपानः समानश्च उदानो व्यान एव च । ये पञ्चवायवो देहे तेषां निग्रहणं यतेत्

prāṇopānaḥ samānaśca udāno vyāna eva ca | ye pañcavāyavo dehe teṣāṁ nigrahaṇaṁ yatet

प्राण, अपान, समान, उदान, और व्यान भी - शरीर में जो ये पाँच वायु हैं, उनका निग्रह करने का प्रयत्न करे।

श्लोक 24 (skanda.8.179.24)

अपानञ्च समानञ्च कृत्वैकगतमादृतः । व्यानेन सहितं प्राणमुदाने सन्निवेशयेत्

apānañca samānañca kṛtvaikagatamādṛtaḥ | vyānena sahitaṁ prāṇamudāne sanniveśayet

अपान और समान को आदरपूर्वक एकगति करके, व्यान सहित प्राण को उदान में स्थापित करे।

श्लोक 25 (skanda.8.179.25)

नासाग्रे तु सकृत् प्राणं प्रापयेद् योगशक्तितः । भद्रां दृष्टिं समास्थाय षड्विंशं चिन्तयेत्ततः

nāsāgre tu sakṛt prāṇaṁ prāpayed yogaśaktitaḥ | bhadrāṁ dṛṣṭiṁ samāsthāya ṣaḍviṁśaṁ cintayettataḥ

नासाग्र में एक बार प्राण को योगशक्ति से पहुँचाकर, भद्र दृष्टि स्थापित करके, तब षड्विंशक का चिन्तन करे।

श्लोक 26 (skanda.8.179.26)

मात्राः पञ्चदश प्रोक्ताः प्रथमं सन्धिबन्धनम् । मात्रा विंशति विज्ञेयाः पञ्चमःसन्धिविग्रहः

mātrāḥ pañcadaśa proktāḥ prathamaṁ sandhibandhanam | mātrā viṁśati vijñeyāḥ pañcamaḥsandhivigrahaḥ

पन्द्रह मात्राएँ प्रथम संधिबन्धन कही गयी हैं; बीस मात्राएँ पाँचवें संधिविग्रह के रूप में जाननी चाहिये।

श्लोक 27 (skanda.8.179.27)

निश्शब्दे विजने देशे निरीहो विजितेन्द्रियः । स्वस्तिकं पद्मकं भद्रमथवा सिंहकच्छपौ

niśśabde vijane deśe nirīho vijitendriyaḥ | svastikaṁ padmakaṁ bhadramathavā siṁhakacchapau

निःशब्द, एकान्त स्थान में, निरीह, जितेन्द्रिय होकर, स्वस्तिक, पद्म, भद्र, अथवा सिंह और कच्छप आसनों में से,

श्लोक 28 (skanda.8.179.28)

एकमासनमास्थाय षड्विंशं समनुस्मरन् । सर्वाङ्गानि समाहृत्य निष्पन्दो ध्यानमाचरेत्

ekamāsanamāsthāya ṣaḍviṁśaṁ samanusmaran | sarvāṅgāni samāhṛtya niṣpando dhyānamācaret

किसी एक आसन को धारण करके, षड्विंशक का सतत स्मरण करते हुए, समस्त अंगों को समेटकर, निष्पन्द होकर ध्यान का अभ्यास करे।

श्लोक 29 (skanda.8.179.29)

शनैः संचारयेद्वायुं नाडीभिः स्रोतसि स्थितम् । तावत्तिष्ठेत युक्तात्मा ध्पानयोगाद् गतस्पृहः

śanaiḥ saṁcārayedvāyuṁ nāḍībhiḥ srotasi sthitam | tāvattiṣṭheta yuktātmā dhpānayogād gataspṛhaḥ

धीरे-धीरे वायु का संचार करे, जो नाड़ियों के स्रोत में स्थित है; युक्तात्मा होकर, ध्यानयोग से इच्छारहित होकर, तब तक स्थित रहे,

श्लोक 30 (skanda.8.179.30)

सोममण्डलसंकाशं यावत् पश्येद्धृदि स्थितम् । ज्योतिर्देहाश्रितं दृष्ट्वा योगैश्वर्यं प्रवर्तते

somamaṇḍalasaṁkāśaṁ yāvat paśyeddhṛdi sthitam | jyotirdehāśritaṁ dṛṣṭvā yogaiśvaryaṁ pravartate

जब तक हृदय में स्थित, सोममण्डल के समान उस ज्योति को न देख ले; शरीर में स्थित उस ज्योति को देखकर योगैश्वर्य प्रवृत्त होता है।

श्लोक 31 (skanda.8.179.31)

तत एवं सदाभ्यासाद् योगसिद्धिप्रवर्तनात् । त्रिकालविषयं ज्ञानं प्रत्यक्षं योगिनो भवेद्

tata evaṁ sadābhyāsād yogasiddhipravartanāt | trikālaviṣayaṁ jñānaṁ pratyakṣaṁ yogino bhaved

तब इस प्रकार निरन्तर अभ्यास से, योगसिद्धि की प्रवृत्ति से, योगी को त्रिकालविषयक ज्ञान प्रत्यक्ष हो जाता है।

श्लोक 32 (skanda.8.179.32)

व्याधयो नाविशन्त्येनं न च दुःखान्वितो भवेत् । स्वदेहस्य च सौगन्ध्यं वपुर्दिव्यं च जायते

vyādhayo nāviśantyenaṁ na ca duḥkhānvito bhavet | svadehasya ca saugandhyaṁ vapurdivyaṁ ca jāyate

व्याधियाँ उसमें प्रवेश नहीं करतीं, न ही वह दुःखयुक्त होता है; उसके अपने शरीर में सुगन्ध और दिव्य रूप उत्पन्न होता है।

श्लोक 33 (skanda.8.179.33)

अमोघञ्च वचस्तस्य शापानुग्रहकारितम् । प्रत्यवायो न चैवास्य भवेत् कर्मनिबन्धनः

amoghañca vacastasya śāpānugrahakāritam | pratyavāyo na caivāsya bhavet karmanibandhanaḥ

उसका वचन भी अमोघ हो जाता है, शाप और अनुग्रह करनेवाला; और उसके लिये कर्मबद्ध कोई प्रत्यवाय (बाधा) नहीं होती।

श्लोक 34 (skanda.8.179.34)

सर्वविद्याविदां व्यास यतीनां व्रतचारिणाम् । तपस्विनां च विप्राणां योगी श्रेष्ठ उदाहृतः

sarvavidyāvidāṁ vyāsa yatīnāṁ vratacāriṇām | tapasvināṁ ca viprāṇāṁ yogī śreṣṭha udāhṛtaḥ

समस्त विद्याओं के ज्ञाताओं में, हे व्यास! व्रतचारी यतियों में, तथा तपस्वियों और विप्रों में भी, योगी श्रेष्ठ कहा गया है।

श्लोक 35 (skanda.8.179.35)

नान्यथा मुच्यते जन्तुः संसारात् तमसः परात् । षड्विंशकपरिज्ञानं मुक्त्वा योगनिबन्धनम्

nānyathā mucyate jantuḥ saṁsārāt tamasaḥ parāt | ṣaḍviṁśakaparijñānaṁ muktvā yoganibandhanam

अन्यथा प्राणी उस तमोमय संसार से मुक्त नहीं होता - षड्विंशक के पूर्ण ज्ञान को, योग की साधना को छोड़कर,

श्लोक 36 (skanda.8.179.36)

षडङ्गेन तु योगेन तथा पञ्चविधेन च । जित्वा ह्यष्टप्रकारन्तु आसनानां निबन्धनम्

ṣaḍaṅgena tu yogena tathā pañcavidhena ca | jitvā hyaṣṭaprakārantu āsanānāṁ nibandhanam

षडंग योग से, तथा पंचविध योग से भी, आसनों के अष्टविध बन्धन को जीतकर,

श्लोक 37 (skanda.8.179.37)

मात्रोत्कर्षेण जित्वा च प्राणायामं चतुर्विधम् । तन्मात्राणीन्द्रियैर्जित्त्वा विषयैरिन्द्रियाणि च

mātrotkarṣeṇa jitvā ca prāṇāyāmaṁ caturvidham | tanmātrāṇīndriyairjittvā viṣayairindriyāṇi ca

मात्राओं की उत्कर्षता से चतुर्विध प्राणायाम को जीतकर, तन्मात्राओं को इन्द्रियों से, और इन्द्रियों को विषयों से जीतकर,

श्लोक 38 (skanda.8.179.38)

अहङ्कारभयायासक्रोधलोभविवर्जितः । विमत्सरोथ निःसङ्गो निःस्नेहो निःस्पृहस्तथा

ahaṅkārabhayāyāsakrodhalobhavivarjitaḥ | vimatsarotha niḥsaṅgo niḥsneho niḥspṛhastathā

अहंकार, भय, आयास, क्रोध, लोभ से रहित, ईर्ष्यारहित, असंग, स्नेहरहित, तथा स्पृहारहित होकर,

श्लोक 39 (skanda.8.179.39)

योगास्पदं समाधाय पूर्वोक्तं गुणवर्जितम् । ध्यायीत हृदि तं देवं विश्वं विश्वेश्वरं विभुम्

yogāspadaṁ samādhāya pūrvoktaṁ guṇavarjitam | dhyāyīta hṛdi taṁ devaṁ viśvaṁ viśveśvaraṁ vibhum

पूर्वोक्त, गुणरहित योगस्थान में स्थित होकर, हृदय में उस विश्वदेव, विश्वेश्वर, विभु का ध्यान करे,

श्लोक 40 (skanda.8.179.40)

अनादिनिधनं शान्तं त्रैगुण्यपरिवर्जितम् । तालौ जिह्वां समाधाय दन्तैर्दन्तान् न च स्पृशन्

anādinidhanaṁ śāntaṁ traiguṇyaparivarjitam | tālau jihvāṁ samādhāya dantairdantān na ca spṛśan

अनादि-अनन्त, शान्त, त्रिगुणरहित - तालु में जिह्वा को स्थापित करके, दाँतों से दाँतों को न छूते हुए,

श्लोक 41 (skanda.8.179.41)

इन्द्रियाणि मनश्चैव परमात्मनि योजयेत् । कृत्वा मनसि तत्सर्वं प्राणापानौ निरुद्ध्य च

indriyāṇi manaścaiva paramātmani yojayet | kṛtvā manasi tatsarvaṁ prāṇāpānau niruddhya ca

इन्द्रियों और मन को परमात्मा में योजित करे; उन सबको मन में समेटकर, प्राण-अपान को निरुद्ध करके,

श्लोक 42 (skanda.8.179.42)

ओङ्कारं त्वसकृद् ध्यायन् संहृत्याङ्गानि कूर्मवत् । शरीरं सर्वमापूर्य विक्षिपेत् सर्वमात्मनि

oṅkāraṁ tvasakṛd dhyāyan saṁhṛtyāṅgāni kūrmavat | śarīraṁ sarvamāpūrya vikṣipet sarvamātmani

बार-बार ॐकार का ध्यान करते हुए, कच्छप के समान अंगों को समेटकर, सम्पूर्ण शरीर को भरकर, सब कुछ आत्मा में विक्षिप्त कर दे;

श्लोक 43 (skanda.8.179.43)

तत्संहृत्य मुनिर्भूयो व्यापि भूतं प्रविस्तृतम् । नाडीवायुप्रचारेण भूयोभूयस्तथारभेत्

tatsaṁhṛtya munirbhūyo vyāpi bhūtaṁ pravistṛtam | nāḍīvāyupracāreṇa bhūyobhūyastathārabhet

उसे पुनः समेटकर, मुनि व्यापी, विस्तृत भूततत्त्व को (देखे); नाड़ी में वायु के संचार से, बार-बार इसी प्रकार आरम्भ करे।

श्लोक 44 (skanda.8.179.44)

स पूर्वापररात्रे तु सात्विकं चेत उच्यते । मध्याह्ने चापराह्णे च कृष्णं ध्यायीत तामसम्

sa pūrvāpararātre tu sātvikaṁ ceta ucyate | madhyāhne cāparāhṇe ca kṛṣṇaṁ dhyāyīta tāmasam

रात्रि के पूर्व और अन्तिम भाग में सात्विक चित्त कहा जाता है; मध्याह्न और अपराह्न में कृष्ण, तामसिक ध्यान करे।

श्लोक 45 (skanda.8.179.45)

सन्ध्ययोरुभयोर्नित्यं राजसं ध्यानमाचरेत् । तैजसं सर्वतश्चापि ध्यानादेव जयेद् गुणान्

sandhyayorubhayornityaṁ rājasaṁ dhyānamācaret | taijasaṁ sarvataścāpi dhyānādeva jayed guṇān

दोनों संध्याओं में सदा राजस ध्यान का अभ्यास करे; तैजस को सब प्रकार से ध्यान से ही, गुणों को जीत ले।

श्लोक 46 (skanda.8.179.46)

सदैवं ध्ययतो व्यास तदैश्वर्यं प्रवर्तते । येन षड्विंशकं बुद्ध्वा हृदयस्थं महेश्वरम्

sadaivaṁ dhyayato vyāsa tadaiśvaryaṁ pravartate | yena ṣaḍviṁśakaṁ buddhvā hṛdayasthaṁ maheśvaram

इस प्रकार सदा ध्यान करते हुए, हे व्यास! तब ऐश्वर्य प्रवृत्त होता है, जिससे षड्विंशक को जानकर, हृदयस्थ महेश्वर को,

श्लोक 47 (skanda.8.179.47)

स्वेच्छया स्वतनुं त्यक्त्वा तस्मिन्नेव प्रलीयते । परमात्मा परं ब्रह्म कारणं पुरुषो महान्

svecchayā svatanuṁ tyaktvā tasminneva pralīyate | paramātmā paraṁ brahma kāraṇaṁ puruṣo mahān

अपनी इच्छा से अपना शरीर त्यागकर, उसी में लीन हो जाता है - परमात्मा, परम ब्रह्म, कारण, महान् पुरुष,

श्लोक 48 (skanda.8.179.48)

ईश्वरो निर्गुणो भोक्ता षड्विंशः समुदाहतः । यच्चा सत् सदसच्चैव भूतिभूतो विभुः परः

īśvaro nirguṇo bhoktā ṣaḍviṁśaḥ samudāhataḥ | yaccā sat sadasaccaiva bhūtibhūto vibhuḥ paraḥ

निर्गुण ईश्वर, भोक्ता, षड्विंशक कहा गया है; जो सत् और असत् दोनों है, सम्पूर्ण अस्तित्व का स्वरूप, विभु, परम,

श्लोक 49 (skanda.8.179.49)

जागर्त्ति स्वपते भुंक्ते सन्तिष्ठति ददाति च । स स्रष्टा स च संहर्ता गुणातीतो महेश्वरः

jāgartti svapate bhuṁkte santiṣṭhati dadāti ca | sa sraṣṭā sa ca saṁhartā guṇātīto maheśvaraḥ

जो जागता है, सोता है, भोगता है, स्थित रहता है, और देता है; वही स्रष्टा है, वही संहर्ता भी है, गुणातीत महेश्वर।

श्लोक 50 (skanda.8.179.50)

इत्येतत् कथितं सर्वं सर्वयोगनिदर्शनम् । योगं पाशुपतं तुभ्य माद्यं मोक्षगतिप्रदम्

ityetat kathitaṁ sarvaṁ sarvayoganidarśanam | yogaṁ pāśupataṁ tubhya mādyaṁ mokṣagatipradam

इस प्रकार यह सब कहा गया - समस्त योग का प्रदर्शन, यह आद्य पाशुपत योग, मोक्षगति प्रदान करनेवाला।

श्लोक 51 (skanda.8.179.51)

सर्वप्रसङ्गरहितं हरवक्त्रविनिःसृतम् । सूक्ष्मं तत्परमं ज्ञानं प्रवक्ष्यामि तवानघ । यस्य सम्यक् परिज्ञानाद् विज्ञेयं नापरं भवेत्

sarvaprasaṅgarahitaṁ haravaktraviniḥsṛtam | sūkṣmaṁ tatparamaṁ jñānaṁ pravakṣyāmi tavānagha | yasya samyak parijñānād vijñeyaṁ nāparaṁ bhavet

समस्त प्रसंगों से रहित, हर के मुख से निःसृत, वह सूक्ष्म परम ज्ञान मैं तुम्हें आगे बताऊँगा, हे निष्पाप! जिसके सम्यक् परिज्ञान से फिर कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता।

अध्याय 178अध्याय-सूचीअध्याय 180