अम्बिका खण्ड · अध्याय 180
पाशुपतव्रतवर्णन
श्लोक 1 (skanda.8.180.1)
सनत्कुमार उवाच । ब्रह्माद्या देवता व्यास दक्षयज्ञवधे पुरा । शङ्करं शरणं जग्मुर्वीरभद्रभयार्दिताः
sanatkumāra uvāca | brahmādyā devatā vyāsa dakṣayajñavadhe purā | śaṅkaraṁ śaraṇaṁ jagmurvīrabhadrabhayārditāḥ
सनत्कुमार ने कहा - ब्रह्मादि देवगण, हे व्यास! पूर्वकाल में दक्षयज्ञ के विध्वंस के समय, वीरभद्र के भय से पीड़ित होकर शंकर की शरण में गये।
श्लोक 2 (skanda.8.180.2)
गणेन्द्रेणाभियुक्तास्तु भस्मकूटानि भेजिरे । यदा भस्म प्रविष्टास्ते तेजः शाङ्करमुत्तमम्
gaṇendreṇābhiyuktāstu bhasmakūṭāni bhejire | yadā bhasma praviṣṭāste tejaḥ śāṅkaramuttamam
गणेन्द्र द्वारा आक्रान्त होकर वे भस्मकूटों में शरण लेने लगे; जब वे भस्म में प्रविष्ट हुए, उस उत्तम शांकर तेज में,
श्लोक 3 (skanda.8.180.3)
अभवंस्ते तदा रौद्राः पशवो दीक्षिता इव । भस्माभसितगात्राणां शङ्करव्रतचारिणाम्
abhavaṁste tadā raudrāḥ paśavo dīkṣitā iva | bhasmābhasitagātrāṇāṁ śaṅkaravratacāriṇām
तब वे 'रौद्र' (रुद्रसम्बन्धी) हो गये, दीक्षित पशुओं के समान - भस्म से भस्मित अंगोंवाले, शंकर के व्रतचारी।
श्लोक 4 (skanda.8.180.4)
स्वं योगं प्रददौ तेषां तदा देव उमापतिः । सर्वासां मोक्षविद्यानां यत्तत्त्वमतिरिच्यते
svaṁ yogaṁ pradadau teṣāṁ tadā deva umāpatiḥ | sarvāsāṁ mokṣavidyānāṁ yattattvamatiricyate
तब देव उमापति ने उन्हें अपना योग प्रदान किया, जो समस्त मोक्षविद्याओं के तत्त्व से भी बढ़कर है,
श्लोक 5 (skanda.8.180.5)
हिरण्यगर्भप्रमुखैर्योगिमुख्यैः प्रवर्तितः । यो योगः सकलो व्यास कृच्छ्रोपायप्रसाधनः
hiraṇyagarbhapramukhairyogimukhyaiḥ pravartitaḥ | yo yogaḥ sakalo vyāsa kṛcchropāyaprasādhanaḥ
हिरण्यगर्भ आदि योगिश्रेष्ठों द्वारा प्रवर्तित - वह सम्पूर्ण योग, हे व्यास! जो कष्टसाध्य उपायों से सिद्ध होता है,
श्लोक 6 (skanda.8.180.6)
जन्मान्तरसहस्रैस्तु तमभ्यस्य महामुने । प्राप्नुवन्ति परं ज्योतिर्योगैश्वर्यमथापि वा । योयं भगवता साक्षाद् योगो माहेश्वरः परः
janmāntarasahasraistu tamabhyasya mahāmune | prāpnuvanti paraṁ jyotiryogaiśvaryamathāpi vā | yoyaṁ bhagavatā sākṣād yogo māheśvaraḥ paraḥ
जिसका सहस्रों जन्मान्तरों तक अभ्यास करके, हे महामुने! कुछ लोग परम ज्योति को, या योगैश्वर्य को भी प्राप्त करते हैं - परन्तु यह जो साक्षात् भगवान् द्वारा कहा गया परम माहेश्वर योग है,
श्लोक 7 (skanda.8.180.7)
तत्त्वतः कथितस्तेषां प्रपन्नानां दिवौकसाम् । अस्य सम्यक् परिज्ञानादनेनैव तु जन्मना
tattvataḥ kathitasteṣāṁ prapannānāṁ divaukasām | asya samyak parijñānādanenaiva tu janmanā
वह उन शरणागत देवताओं को तत्त्वतः कहा गया; इसके सम्यक् परिज्ञान से, इसी जन्म में,
श्लोक 8 (skanda.8.180.8)
व्रतं पाशुपतं प्राप्य षड्मासाज् ज्ञानमाप्नुते । योगैश्वर्यं महद् व्यास यदवाप्य विमुच्यते
vrataṁ pāśupataṁ prāpya ṣaḍmāsāj jñānamāpnute | yogaiśvaryaṁ mahad vyāsa yadavāpya vimucyate
पाशुपत व्रत को प्राप्त करके छह मास में ज्ञान प्राप्त करता है; उस महान् योगैश्वर्य को, हे व्यास! जिसे पाकर मुक्त हो जाता है।
श्लोक 9 (skanda.8.180.9)
सर्वधर्मं बहिः कृत्वा निष्कलस्य प्रभावतः । दीक्षां पाशुपतीं प्राप्य तं विशन्ति महेश्वरम्
sarvadharmaṁ bahiḥ kṛtvā niṣkalasya prabhāvataḥ | dīkṣāṁ pāśupatīṁ prāpya taṁ viśanti maheśvaram
समस्त धर्म को बाहर करके, निष्कल (शिव) के प्रभाव से, पाशुपत दीक्षा को प्राप्त करके, वे उस महेश्वर में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 10 (skanda.8.180.10)
सर्वज्ञानसमायुक्तं तपोधर्मबहिष्कृतम् । भस्मसाधनमात्रं तु शिवेन कथितं व्रतम्
sarvajñānasamāyuktaṁ tapodharmabahiṣkṛtam | bhasmasādhanamātraṁ tu śivena kathitaṁ vratam
सम्पूर्ण ज्ञान से युक्त, तप-धर्म से बहिष्कृत, केवल भस्मसाधनमात्र - यह व्रत शिव द्वारा कहा गया।
श्लोक 11 (skanda.8.180.11)
पापिष्ठा धर्मवन्तो वा भक्ताः केवलमीश्वरम् । सेवनाद्यस्य मुच्यन्ते तन्निबोध महाव्रतम्
pāpiṣṭhā dharmavanto vā bhaktāḥ kevalamīśvaram | sevanādyasya mucyante tannibodha mahāvratam
चाहे पापिष्ठ हों या धर्मवान्, केवल ईश्वर के भक्त, जिसके सेवन से मुक्त हो जाते हैं, उस महाव्रत को समझो।
श्लोक 12 (skanda.8.180.12)
अधर्मं न विना धर्मो न च धर्मं विनाशुभम् । एतौ परस्परं बद्धौ त्यक्त्वा तस्मादिमावुभौ
adharmaṁ na vinā dharmo na ca dharmaṁ vināśubham | etau parasparaṁ baddhau tyaktvā tasmādimāvubhau
धर्म के बिना अधर्म नहीं, और धर्म के बिना अशुभ नहीं; ये दोनों परस्पर बद्ध हैं - इसलिये इन दोनों को त्यागकर,
श्लोक 13 (skanda.8.180.13)
धर्माधर्मपरित्यक्तश्चरेत् पाशुपतं व्रतम् । ततो योगमिमं प्राप्य महदैश्वर्यमाप्नुते
dharmādharmaparityaktaścaret pāśupataṁ vratam | tato yogamimaṁ prāpya mahadaiśvaryamāpnute
धर्म-अधर्म दोनों से मुक्त होकर पाशुपत व्रत का आचरण करे; तब इस योग को प्राप्त करके महान् ऐश्वर्य प्राप्त करता है।
श्लोक 14 (skanda.8.180.14)
भस्मग्रहणमात्रात्तु ते सर्वबन्धप्रमोचनम् । मुच्यते स्पृष्टमात्रस्तु ब्रह्मपूतेन भस्मना
bhasmagrahaṇamātrāttu te sarvabandhapramocanam | mucyate spṛṣṭamātrastu brahmapūtena bhasmanā
भस्म ग्रहण करने मात्र से समस्त बन्धनों से मुक्ति होती है; ब्रह्ममंत्रों से पवित्र भस्म से स्पर्शमात्र से ही मुक्त हो जाता है।
श्लोक 15 (skanda.8.180.15)
दहेत् सोमकृतं वह्निरीश्वरं चानलं विदुः । कृताकृत दहत्यग्निर्भूयः सोमसमागतः
dahet somakṛtaṁ vahnirīśvaraṁ cānalaṁ viduḥ | kṛtākṛta dahatyagnirbhūyaḥ somasamāgataḥ
सोम से बने को अग्नि जलाती है, ईश्वर को ही उस अग्नि के रूप में जाना जाता है; वह अग्नि, कृत हो या अकृत, पुनः सोम से मिलकर जला देती है।
श्लोक 16 (skanda.8.180.16)
भस्मना मोचिताः सर्वे ब्रह्माद्या अभिमानिनः । भस्मनस्तेजसो वीर्यं भस्म पावनमीश्वरम्
bhasmanā mocitāḥ sarve brahmādyā abhimāninaḥ | bhasmanastejaso vīryaṁ bhasma pāvanamīśvaram
भस्म से ही ब्रह्मादि समस्त अभिमानी मुक्त हुए; भस्म के तेज का वीर्य ही भस्म, पावन ईश्वर है।
श्लोक 17 (skanda.8.180.17)
आत्मानमुद्धरेद् व्यास यः स्नानं भस्मना चरेत् । भस्मना शिवयोगेन मुच्यते पाशबन्धनात्
ātmānamuddhared vyāsa yaḥ snānaṁ bhasmanā caret | bhasmanā śivayogena mucyate pāśabandhanāt
अपने को उद्धार करना चाहे, हे व्यास! जो भस्म से स्नान करता है; भस्म से, शिवयोग से, पाशबन्धन से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 18 (skanda.8.180.18)
प्रभवन्ति सुराः सोमात् पितरो वह्निसंभवाः । वह्निसोमात्मकं तस्माज्जगत्सर्वं प्रतिष्ठितम्
prabhavanti surāḥ somāt pitaro vahnisaṁbhavāḥ | vahnisomātmakaṁ tasmājjagatsarvaṁ pratiṣṭhitam
देवता सोम से शक्ति पाते हैं, पितर अग्नि से उत्पन्न होते हैं; इसीलिये अग्नि-सोमस्वरूप सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है।
श्लोक 19 (skanda.8.180.19)
ईश्वरोग्निश्च सोमश्च भस्म तत्तेज उच्यते । तेजसा तस्य संस्पृष्टो मुच्यते जन्मना द्विज
īśvarogniśca somaśca bhasma tatteja ucyate | tejasā tasya saṁspṛṣṭo mucyate janmanā dvija
ईश्वर ही अग्नि और सोम है; भस्म को उसी का तेज कहा जाता है; उसके तेज से स्पृष्ट होकर मनुष्य जन्म से मुक्त हो जाता है, हे द्विज!
श्लोक 20 (skanda.8.180.20)
सांख्यं विद्यास्तपश्चैव त्यक्त्वा धर्मांश्च वैदिकान् । केवलं भस्मसंस्नानात् पूतो गच्छति तत्पदम्
sāṁkhyaṁ vidyāstapaścaiva tyaktvā dharmāṁśca vaidikān | kevalaṁ bhasmasaṁsnānāt pūto gacchati tatpadam
सांख्य, विद्याएँ, तप, तथा वैदिक धर्मों को भी त्यागकर, केवल भस्मस्नान से पवित्र होकर, वह उस पद को प्राप्त करता है।
श्लोक 21 (skanda.8.180.21)
विषयानपि संसेव्य बह्वधर्मरतोपि सन् । पश्चाद् भक्तिपरः शम्भोर्भस्मनैव हि शुद्ध्यति
viṣayānapi saṁsevya bahvadharmaratopi san | paścād bhaktiparaḥ śambhorbhasmanaiva hi śuddhyati
विषयों का सेवन करते हुए भी, बहुत अधर्म में रत रहते हुए भी, बाद में शम्भु के भक्तिपरायण होकर, भस्म से ही शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 22 (skanda.8.180.22)
आत्मानं यः पशुं कृत्वा महादेवं हुताशनम् । दीक्षितो ब्रह्मभस्मभ्यां शिवयाजी मुनिर्भवेत
ātmānaṁ yaḥ paśuṁ kṛtvā mahādevaṁ hutāśanam | dīkṣito brahmabhasmabhyāṁ śivayājī munirbhaveta
जो अपने को पशु बनाकर, महादेव को हुताशन (अग्नि) मानकर, ब्रह्ममंत्र और भस्म से दीक्षित होकर शिवयाजी मुनि बन जाता है,
श्लोक 23 (skanda.8.180.23)
शीघ्रमेव परं योगं प्राप्य मुच्येत बन्धनात् । एवं व्रतमनुप्राप्य भूत्वा पाशुपतो मुनिः
śīghrameva paraṁ yogaṁ prāpya mucyeta bandhanāt | evaṁ vratamanuprāpya bhūtvā pāśupato muniḥ
वह शीघ्र ही परम योग को प्राप्त करके बन्धन से मुक्त हो जाता है; इस प्रकार व्रत को प्राप्त करके, पाशुपत मुनि बनकर,
श्लोक 24 (skanda.8.180.24)
इदं माहेश्वरं ज्ञानं गुह्यं परममभ्यसेत् । ज्ञेयं ज्ञानं तथा ज्ञाता त्रयं देहे यथा स्थितम्
idaṁ māheśvaraṁ jñānaṁ guhyaṁ paramamabhyaset | jñeyaṁ jñānaṁ tathā jñātā trayaṁ dehe yathā sthitam
इस माहेश्वर, गुह्य, परम ज्ञान का अभ्यास करे; ज्ञेय, ज्ञान, तथा ज्ञाता - यह त्रय, जैसे शरीर में स्थित है,
श्लोक 25 (skanda.8.180.25)
आत्मा यश्च यथा चासौ स्थानत्रयसमास्थितः । नाडीषु च यथा ह्यात्मा आत्मन्येवानुतिष्ठति
ātmā yaśca yathā cāsau sthānatrayasamāsthitaḥ | nāḍīṣu ca yathā hyātmā ātmanyevānutiṣṭhati
तथा आत्मा जो और जैसा है, तीन स्थानों में स्थित है, और नाड़ियों में जैसे आत्मा, आत्मा में ही अनुष्ठित रहता है,
श्लोक 26 (skanda.8.180.26)
सर्वतः सर्वभूतेषु निगूढस्तिष्ठते यथा । पयसीव घृतं व्यास यं विदित्वा विमुच्यते
sarvataḥ sarvabhūteṣu nigūḍhastiṣṭhate yathā | payasīva ghṛtaṁ vyāsa yaṁ viditvā vimucyate
जैसे वह सर्वत्र, सभी भूतों में, गुप्त रूप से स्थित रहता है - दूध में घृत के समान, हे व्यास! जिसे जानकर मनुष्य मुक्त हो जाता है।
श्लोक 27 (skanda.8.180.27)
न स वेत्तुं विना ज्ञानं शक्य आत्मा कथञ्चन । रूपशब्दरसातीतं कस्तं वेत्ति महेश्वरम्
na sa vettuṁ vinā jñānaṁ śakya ātmā kathañcana | rūpaśabdarasātītaṁ kastaṁ vetti maheśvaram
ज्ञान के बिना उस आत्मा को किसी भी प्रकार जानना सम्भव नहीं है; रूप-शब्द-रस से अतीत उस महेश्वर को कौन जान सकता है?
श्लोक 28 (skanda.8.180.28)
तथा ह्यहं महाभाग प्रसादात् त्र्यम्बकस्य तु । आत्मज्ञानषरोपायं कथयामि तवानघ
tathā hyahaṁ mahābhāga prasādāt tryambakasya tu | ātmajñānaṣaropāyaṁ kathayāmi tavānagha
उसी प्रकार मैं भी, हे महाभाग! त्र्यम्बक की कृपा से, आत्मज्ञान का श्रेष्ठ उपाय तुम्हें बताता हूँ, हे निष्पाप!
श्लोक 29 (skanda.8.180.29)
सर्वमेव तमः पूर्वमिदमासीज्जगत् किल । न देवा नानिलो न द्यौर्न सूर्यश्चन्द्रमा न च
sarvameva tamaḥ pūrvamidamāsījjagat kila | na devā nānilo na dyaurna sūryaścandramā na ca
यह सम्पूर्ण जगत् पहले सर्वथा अन्धकारमय था; न देवता थे, न वायु, न आकाश, न सूर्य, और न चन्द्रमा भी;
श्लोक 30 (skanda.8.180.30)
न किञ्चित् सर्वथा भूतं दृश्यते जगति स्थितम । शुद्धं विमलमाभाति अक्षरं परमैश्वरम्
na kiñcit sarvathā bhūtaṁ dṛśyate jagati sthitama | śuddhaṁ vimalamābhāti akṣaraṁ paramaiśvaram
जगत् में स्थित कुछ भी सर्वथा भूत दिखायी नहीं देता था; शुद्ध, विमल, अक्षर, परम ऐश्वर्यशाली ही प्रकाशित हो रहा था,
श्लोक 31 (skanda.8.180.31)
सर्वभावगुणातीतं निर्विकल्पं निरञ्जनम् । बहिरन्तश्चरं दीप्तमविनाशि वरं ध्रुवम् । यथा तदक्षरं ब्रह्म प्रोच्यमानं तथा शृणु
sarvabhāvaguṇātītaṁ nirvikalpaṁ nirañjanam | bahirantaścaraṁ dīptamavināśi varaṁ dhruvam | yathā tadakṣaraṁ brahma procyamānaṁ tathā śṛṇu
समस्त भावों और गुणों से अतीत, निर्विकल्प, निरञ्जन, बाहर-भीतर विचरण करनेवाला, दीप्त, अविनाशी, श्रेष्ठ, ध्रुव - जैसे वह अक्षर ब्रह्म कहा जाता है, वैसे सुनो।
श्लोक 32 (skanda.8.180.32)
ओमित्येकाक्षरं पूर्वं क्षरं तस्माद्विनिर्गतम् । व्यक्षरश्च त्रिमात्रश्च ओङ्कारो ब्रह्म शब्द्यते
omityekākṣaraṁ pūrvaṁ kṣaraṁ tasmādvinirgatam | vyakṣaraśca trimātraśca oṅkāro brahma śabdyate
'ॐ' यह एक अक्षर पहले था, उससे क्षर उत्पन्न हुआ; तीन अक्षरों और तीन मात्राओंवाला ॐकार 'ब्रह्म' कहा जाता है।
श्लोक 33 (skanda.8.180.33)
अकारे तत्र विष्णुस्तु उकारे तु पितामहः । मकारे भगवानीशो मात्रायां प्रकृतिः स्मृता
akāre tatra viṣṇustu ukāre tu pitāmahaḥ | makāre bhagavānīśo mātrāyāṁ prakṛtiḥ smṛtā
उसमें अकार में विष्णु, उकार में पितामह, मकार में भगवान् ईश, और मात्रा (बिन्दु) में प्रकृति मानी गयी है।
श्लोक 34 (skanda.8.180.34)
ब्रह्मविष्णू स्मृतौ यौ तौ देवावीश्वरनिर्गतौ । प्रकृतिस्त्रीत्वमास्थाय नित्यन्तावीशपार्श्वगौ
brahmaviṣṇū smṛtau yau tau devāvīśvaranirgatau | prakṛtistrītvamāsthāya nityantāvīśapārśvagau
ब्रह्मा और विष्णु, जो दोनों देव माने गये हैं, ईश्वर से निर्गत हुए; प्रकृति, त्रीत्व (त्रिविध रूप) धारण करके, नित्य ईश के पार्श्व में रहती है।
श्लोक 35 (skanda.8.180.35)
पत्नीरूपेण सा शम्भुं भजते प्रकृतिस्सदा । क्षरन्तु प्रकृतिः ख्याताक्षरस्तु स्वयमीश्वरः
patnīrūpeṇa sā śambhuṁ bhajate prakṛtissadā | kṣarantu prakṛtiḥ khyātākṣarastu svayamīśvaraḥ
पत्नीरूप में वह प्रकृति सदा शम्भु की सेवा करती है; प्रकृति क्षर कही गयी है, और ईश्वर स्वयं अक्षर है।
श्लोक 36 (skanda.8.180.36)
ईश्वरान्निर्गता सा हि प्रकृतिर्गुणबन्धना । तस्याः स्रष्टा महादेवो यतो विष्णुपितामहौ
īśvarānnirgatā sā hi prakṛtirguṇabandhanā | tasyāḥ sraṣṭā mahādevo yato viṣṇupitāmahau
ईश्वर से निर्गत वह प्रकृति गुणों से बद्ध है; उसकी स्रष्टा महादेव हैं, जिनसे विष्णु और पितामह,
श्लोक 37 (skanda.8.180.37)
प्रजापती समुत्पन्नौ गुणत्रयनिबन्धनौ । तावाक्रम्य महेशस्तु प्रकृतिस्थौ गुणात्मकौ
prajāpatī samutpannau guṇatrayanibandhanau | tāvākramya maheśastu prakṛtisthau guṇātmakau
वे दोनों प्रजापति उत्पन्न हुए, त्रिगुण से बद्ध। उन दोनों गुणस्वरूप, प्रकृति में स्थित को अभिभूत करके महेश,
श्लोक 38 (skanda.8.180.38)
मकारस्थो विभुर्भूत्वा भुंक्ते संचरते च हि । गुह्यमेतत् परं ज्ञात्वा मयोक्तं तत्त्वमक्षरम्
makārastho vibhurbhūtvā bhuṁkte saṁcarate ca hi | guhyametat paraṁ jñātvā mayoktaṁ tattvamakṣaram
मकार में स्थित होकर विभु बनकर भोग करते हैं और विचरण भी करते हैं। इस परम गुह्य को जानकर, मेरे द्वारा कहे गये उस अक्षर तत्त्व को,
श्लोक 39 (skanda.8.180.39)
येनैव घ्यानिना व्यास ईश्वरोसौ विकल्पितः । स तमाविश्य मुक्तात्मा कृतार्थो जायते मुनिः
yenaiva ghyāninā vyāsa īśvarosau vikalpitaḥ | sa tamāviśya muktātmā kṛtārtho jāyate muniḥ
जिस ध्यानी द्वारा भी, हे व्यास! यह ईश्वर इस प्रकार कल्पित किया जाता है, वह उसमें प्रवेश करके मुक्तात्मा, कृतार्थ मुनि बन जाता है।
श्लोक 40 (skanda.8.180.40)
नैनं जानन्त्यमार्गस्थास्तर्कहेतुपरायणाः । भोक्तारं प्रकृतेरीशं परं षड्विंशसंज्ञितम्
nainaṁ jānantyamārgasthāstarkahetuparāyaṇāḥ | bhoktāraṁ prakṛterīśaṁ paraṁ ṣaḍviṁśasaṁjñitam
जो मार्ग से बाहर हैं, तर्क-हेतु में परायण, वे इसे नहीं जानते - प्रकृति के भोक्ता, ईश्वर, परम, षड्विंशक नामवाले को।
श्लोक 41 (skanda.8.180.41)
ओङ्कारः प्रकृतिर्नित्यं तन्मध्ये चेश्वरः स्थितः । पयोमध्ये यथा व्यास सर्पिरन्तर्गतं स्थितम्
oṅkāraḥ prakṛtirnityaṁ tanmadhye ceśvaraḥ sthitaḥ | payomadhye yathā vyāsa sarpirantargataṁ sthitam
ॐकार नित्य प्रकृति है, उसके मध्य में ईश्वर स्थित है, जैसे, हे व्यास! दूध के मध्य में घृत अन्तर्गत स्थित रहता है।
श्लोक 42 (skanda.8.180.42)
ओङ्कारं ध्यायता येन अतीत्य प्रकृतिं मुने । ईश्वरोसौ महान् विन्नः स मुक्तः पशुबन्धनैः
oṅkāraṁ dhyāyatā yena atītya prakṛtiṁ mune | īśvarosau mahān vinnaḥ sa muktaḥ paśubandhanaiḥ
जो ॐकार का ध्यान करते हुए प्रकृति को अतिक्रम कर जाता है, हे मुने! वह महान् ईश्वर जान लिया जाता है, वह पशुबन्धनों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 43 (skanda.8.180.43)
ईश्वरी प्रकृतिः ख्याता गुणबन्धाद्विमोहनी । ब्रह्मत्वाद् बृंहणी ह्ये षा विष्णुत्वाद्विभवाश्रिता
īśvarī prakṛtiḥ khyātā guṇabandhādvimohanī | brahmatvād bṛṁhaṇī hye ṣā viṣṇutvādvibhavāśritā
प्रकृति 'ईश्वरी' कही गयी है, गुणों के बन्धन से मोहित करनेवाली; ब्रह्मत्व से वह बृंहणी (वर्धिका) है, विष्णुत्व से वह वैभव का आश्रय है।
श्लोक 44 (skanda.8.180.44)
प्रसादादीश्वरस्यैषा प्रकृतिस्त्रिगुणात्मिका । साभिमाना भवस्रष्ट्री भोक्ता तस्या महेश्वरः
prasādādīśvarasyaiṣā prakṛtistriguṇātmikā | sābhimānā bhavasraṣṭrī bhoktā tasyā maheśvaraḥ
ईश्वर की कृपा से यह प्रकृति, त्रिगुणात्मिका, अभिमानयुक्त, संसार की स्रष्टा है; उसका भोक्ता महेश्वर है।
श्लोक 45 (skanda.8.180.45)
अष्टबाहुस्त्रिपादा च पञ्चदेहमुखी तथो । द्विनेत्रा पंचकर्मस्था सप्तवाजिरथोपगा
aṣṭabāhustripādā ca pañcadehamukhī tatho | dvinetrā paṁcakarmasthā saptavājirathopagā
अष्टभुजा, त्रिपाद, पञ्चदेहमुखी, द्विनेत्रा, पञ्चकर्मस्था, सप्त अश्वोंवाले रथ पर आरूढ़,
श्लोक 46 (skanda.8.180.46)
जगन्माता स्मृता ह्येषा गुणत्रयविकारजा । उभे शुभाशुभे तस्यान् विद्याविद्ये तथा ह्युभे
jaganmātā smṛtā hyeṣā guṇatrayavikārajā | ubhe śubhāśubhe tasyān vidyāvidye tathā hyubhe
वह जगन्माता मानी गयी है, त्रिगुण के विकार से उत्पन्न; शुभ और अशुभ दोनों उसी के हैं, तथा विद्या-अविद्या दोनों भी।
श्लोक 47 (skanda.8.180.47)
उद्भवोथ प्रणाशश्च क्रियानुष्ठानमेव च । निमित्तं चाभवद्योनिर्भावाः संक्षेपतस्त्वमी
udbhavotha praṇāśaśca kriyānuṣṭhānameva ca | nimittaṁ cābhavadyonirbhāvāḥ saṁkṣepatastvamī
उत्पत्ति, विनाश, क्रिया का अनुष्ठान, तथा उत्पन्न होने का निमित्त और योनि - संक्षेप में ये भाव उसी के हैं।
श्लोक 48 (skanda.8.180.48)
ईश्वराज्जात ओङ्कारः स च तस्मिन् प्रतिष्ठितः । ओङ्कारात् सर्वमुत्पन्नमाब्रह्मभवनं जगत्
īśvarājjāta oṅkāraḥ sa ca tasmin pratiṣṭhitaḥ | oṅkārāt sarvamutpannamābrahmabhavanaṁ jagat
ईश्वर से ॐकार उत्पन्न हुआ, और वह उसी में प्रतिष्ठित है; ॐकार से ही ब्रह्मलोक तक का सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है।
श्लोक 49 (skanda.8.180.49)
अतः कृत्वा महाभाग योगिनः कपिलादयः । ओङ्कारं परमं ब्रह्म निर्विकल्पमुपासते
ataḥ kṛtvā mahābhāga yoginaḥ kapilādayaḥ | oṅkāraṁ paramaṁ brahma nirvikalpamupāsate
इसलिये, हे महाभाग! कपिल आदि योगीजन ॐकार को ही परम, निर्विकल्प ब्रह्म मानकर उपासना करते हैं।
श्लोक 50 (skanda.8.180.50)
स एव सर्वगो ह्यात्मा कारणं च स एव तु । एवं प्रकृतिभूतौ तावोङ्कारप्रभवौ स्थितौ
sa eva sarvago hyātmā kāraṇaṁ ca sa eva tu | evaṁ prakṛtibhūtau tāvoṅkāraprabhavau sthitau
वही सर्वगत आत्मा है, और वही कारण भी है; इस प्रकार वे दोनों प्रकृतिस्वरूप, ॐकार से उत्पन्न होकर स्थित हैं -
श्लोक 51 (skanda.8.180.51)
ईशभोज्यौ गुणात्मानौ ज्ञात्त्वा विष्णुपितामहौ । तत्सृष्टौ वेदयज्ञाख्यौ मुक्त्वा धर्मनिबन्धनौ
īśabhojyau guṇātmānau jñāttvā viṣṇupitāmahau | tatsṛṣṭau vedayajñākhyau muktvā dharmanibandhanau
ईश्वर द्वारा भोगे जानेवाले, गुणस्वरूप, विष्णु और पितामह के रूप में ज्ञात; उनकी सृष्टि में, वेद और यज्ञ नामवाले, धर्मबन्धन से मुक्त होकर,
श्लोक 52 (skanda.8.180.52)
महामोहौ तमोनिष्ठौ विषयासङ्गसंयुतौ । सत्वपूर्वौ रजोमध्यौ सुखदुःखान्वितौ सदा
mahāmohau tamoniṣṭhau viṣayāsaṅgasaṁyutau | satvapūrvau rajomadhyau sukhaduḥkhānvitau sadā
महामोहयुक्त, तम में स्थित, विषयासंग से युक्त, सत्वप्रधान, रजोमध्यम, सदा सुख-दुःख से युक्त,
श्लोक 53 (skanda.8.180.53)
संसारभ्रमणौ मूढौ सर्वानित्यसमायुतौ । ईश्वरेप्सुर्भवेद्विद्वान् ध्यायोगपरायणः
saṁsārabhramaṇau mūḍhau sarvānityasamāyutau | īśvarepsurbhavedvidvān dhyāyogaparāyaṇaḥ
संसार में भ्रमण करनेवाले, मोहग्रस्त, समस्त अनित्य से युक्त - विद्वान् को ईश्वर की इच्छा रखनेवाला, ध्यानयोग में परायण होना चाहिये।
श्लोक 54 (skanda.8.180.54)
तस्मात् प्रकृतिरुत्पन्ना तस्मिन्नेव प्रणश्यति । येनासावीश्वरो विन्नो योगेनात्मनि संस्थितः । प्रकृतिस्तं न बध्नाति मुच्यते च भवार्णवात्
tasmāt prakṛtirutpannā tasminneva praṇaśyati | yenāsāvīśvaro vinno yogenātmani saṁsthitaḥ | prakṛtistaṁ na badhnāti mucyate ca bhavārṇavāt
उसी से प्रकृति उत्पन्न हुई, और उसी में नष्ट हो जाती है; जिसके द्वारा वह ईश्वर इस प्रकार जान लिया जाता है, योग से आत्मा में स्थित - उसे प्रकृति नहीं बाँधती, और वह भवसागर से मुक्त हो जाता है।