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अम्बिका खण्ड · अध्याय 65

देवी-युद्ध

अध्याय 64अध्याय-सूचीअध्याय 66

श्लोक 1 (skanda.8.65.1)

सनत्कुमार उवाच । अथ ता देवताः क्रुद्धा दैत्यानग्रेसराँस्तदा । निजघ्नुर्विविधैः शस्त्रैस्ते च ता विभिदु र्युधि

sanatkumāra uvāca | atha tā devatāḥ kruddhā daityānagresarā~stadā | nijaghnurvividhaiḥ śastraiste ca tā vibhidu ryudhi

सनत्कुमार ने कहा - तब उन क्रुद्ध देवियों ने विविध शस्त्रों से दैत्यों के अग्रगण्यों को मारा, और उन्होंने भी युद्ध में उन देवियों को घायल किया।

श्लोक 2 (skanda.8.65.2)

दैत्या नानायुधोपेता देवीर्जघ्नु स्तदा रणे । अबला बलिनो वीराः समरेमरविद्विषः

daityā nānāyudhopetā devīrjaghnu stadā raṇe | abalā balino vīrāḥ samaremaravidviṣaḥ

अनेक आयुधों से युक्त दैत्य, बलवान् वीर, अमर-शत्रु, उन देवियों को अबला समझकर उस युद्ध में मारने लगे।

श्लोक 3 (skanda.8.65.3)

तुरङ्गिणस्तुरङ्गस्थाः पदातींश्च पदातयः । रथिनो रथसंस्थाश्च गजस्था गजसादिनः

turaṅgiṇasturaṅgasthāḥ padātīṁśca padātayaḥ | rathino rathasaṁsthāśca gajasthā gajasādinaḥ

घुड़सवार घुड़सवारों से, पैदल सैनिक पैदल सैनिकों से, रथी रथियों से, और गज-सवार गज-सवारों से युद्ध करने लगे।

श्लोक 4 (skanda.8.65.4)

रथा नागास्तुरङ्गाश्च रथान् नागान् तुरङ्गमान् । पदातीः सादिनः शूराः सादिनीश्च पदातयः

rathā nāgāsturaṅgāśca rathān nāgān turaṅgamān | padātīḥ sādinaḥ śūrāḥ sādinīśca padātayaḥ

रथों ने हाथियों और घोड़ों को, हाथियों-घोड़ों ने रथों को, वीर सवारों ने पैदलों को, और पैदलों ने सवारों को चुनौती दी।

श्लोक 5 (skanda.8.65.5)

देव्योपि युधि संक्रुद्धाः पत्तिसादिरथ द्विपान् । निर्जघ्नुर्दानवेन्द्राणां प्रासशक्ति परश्वधैः

devyopi yudhi saṁkruddhāḥ pattisādiratha dvipān | nirjaghnurdānavendrāṇāṁ prāsaśakti paraśvadhaiḥ

देवियाँ भी युद्ध में क्रुद्ध होकर, दानवेंद्रों के पैदल, सवार, रथ और हाथियों को भाले, शक्ति और परशुओं से मार गिराने लगीं।

श्लोक 6 (skanda.8.65.6)

पादैश्च पिपिषुः शूरान्निपात्य भुवि दानवान् । विभिदुर्मुष्टिभिः काश्चिच्छिरांसि सुरविद्विषाम्

pādaiśca pipiṣuḥ śūrānnipātya bhuvi dānavān | vibhidurmuṣṭibhiḥ kāścicchirāṁsi suravidviṣām

उन्होंने वीर दानवों को भूमि पर गिराकर पैरों से कुचल दिया; कुछ देवियों ने देव-शत्रुओं के सिर मुक्कों से फोड़ डाले।

श्लोक 7 (skanda.8.65.7)

विदार्योरःस्थलं काश्चित् समरे दर्पशालिनाम् । पपुश्च रुधिरं देव्यः प्राणैस्सह सुरद्विषाम्

vidāryoraḥsthalaṁ kāścit samare darpaśālinām | papuśca rudhiraṁ devyaḥ prāṇaissaha suradviṣām

कुछ देवियों ने युद्ध में अभिमानी दैत्यों की छाती चीरकर, देव-शत्रुओं का रक्त उनके प्राणों सहित पी लिया।

श्लोक 8 (skanda.8.65.8)

छिन्नाँश्च खण्डशः केचिद् हेतीनुत्थाय वेगिताः । निर्जघ्नु र्देवताः क्रुद्धा मुष्टिभिर्वज्रसंहतैः

chinnā~śca khaṇḍaśaḥ kecid hetīnutthāya vegitāḥ | nirjaghnu rdevatāḥ kruddhā muṣṭibhirvajrasaṁhataiḥ

कुछ दानव, अपने अस्त्र टुकड़े-टुकड़े होने पर भी शीघ्र उठ खड़े हुए; परंतु क्रुद्ध देवियों ने उन्हें वज्र के समान कठोर मुक्कों से मार गिराया।

श्लोक 9 (skanda.8.65.9)

केचिन्मदाम्बुनिष्यन्दश्यामगण्डस्थला गजाः । पिपिषुः परमक्रुद्धाः समरे देवतारथान्

kecinmadāmbuniṣyandaśyāmagaṇḍasthalā gajāḥ | pipiṣuḥ paramakruddhāḥ samare devatārathān

कुछ हाथी, मद-जल की धाराओं से काले गंडस्थलों वाले, अत्यंत क्रुद्ध होकर, युद्ध में देवियों के रथों को कुचल डालने लगे।

श्लोक 10 (skanda.8.65.10)

कपोलभित्तिसंलीनमत्तषट्पदपंक्तयः । हतारोहा गजाः केचिन्निर्जघ्नुर्दैत्यदेवताः

kapolabhittisaṁlīnamattaṣaṭpadapaṁktayaḥ | hatārohā gajāḥ kecinnirjaghnurdaityadevatāḥ

कुछ हाथी, जिनके गंडस्थलों पर मतवाले भौंरों की पंक्तियाँ लगी थीं, अपने सवार के मारे जाने पर भी दैत्यों और देवियों दोनों को मार गिराते रहे।

श्लोक 11 (skanda.8.65.11)

वर्मिणः केचिदुद्भ्रान्तशितनिस्त्रिंशपाणयः । चिच्छिदुर्देवतानीकं देवता दानवानपि

varmiṇaḥ kecidudbhrāntaśitanistriṁśapāṇayaḥ | cicchidurdevatānīkaṁ devatā dānavānapi

कुछ कवचधारी, हाथों में तीक्ष्ण तलवारें घुमाते हुए, देवी-सेना को काटने लगे - और देवियों ने भी दानवों को काट डाला।

श्लोक 12 (skanda.8.65.12)

मत्ताः प्रतिच्छन्नमुखाँश्च केचिद् गन्धेन विज्ञाय गजान् गजेन्द्राः । घ्रात्वा तु गन्धं सहसाभिजघ्नुराधोरणैरप्यभिसंगृहीताः ५

mattāḥ praticchannamukhā~śca kecid gandhena vijñāya gajān gajendrāḥ | ghrātvā tu gandhaṁ sahasābhijaghnurādhoraṇairapyabhisaṁgṛhītāḥ 5

कुछ मदमस्त गजराज, गंध से छिपे हुए मुख वाले शत्रु-हाथियों को पहचानकर, गंध सूँघते ही महावतों द्वारा रोके जाने पर भी सहसा उन पर टूट पड़े।

श्लोक 13 (skanda.8.65.13)

विस्फार्यमाणानि महाधनूंषि महाबलैर्दानक्योधमुख्यैः । तारं विरेसुः समराजिरेषु क्रौञ्चा इव व्योम्नि शरन्निशासु

visphāryamāṇāni mahādhanūṁṣi mahābalairdānakyodhamukhyaiḥ | tāraṁ viresuḥ samarājireṣu krauñcā iva vyomni śaranniśāsu

मुख्य महाबली दानव-योद्धाओं द्वारा खींचे गए विशाल धनुष रणभूमि में ऊँचे स्वर में टंकार करने लगे, जैसे शरद्-रात्रियों में आकाश में क्रौंच पक्षी बोलते हैं।

श्लोक 14 (skanda.8.65.14)

तूर्यस्वनैर्ज्यातलसन्निपातैर्नागाश्वनादै रथनेमिघोषैः । संपूर्णकुञ्जोदर कन्दरोसौ विन्ध्यश्चचालेव तदा समग्रः

tūryasvanairjyātalasannipātairnāgāśvanādai rathanemighoṣaiḥ | saṁpūrṇakuñjodara kandarosau vindhyaścacāleva tadā samagraḥ

तुरही की ध्वनियों, प्रत्यंचा की थाप, हाथी-घोड़ों की चिंघाड़-हिनहिनाहट और रथ-चक्रों की घरघराहट से, कुंज-कंदराओं तक भरा हुआ संपूर्ण विंध्य पर्वत मानो काँप उठा।

श्लोक 15 (skanda.8.65.15)

देव्यः समुत्सार्य रणे रिपूणामुच्चैर्विनेदुः प्रसभं बलानि । नेदुश्च नादान् परिहृष्टचित्ताः प्रोत्सार्य देवीर्युधि दैत्ययोधाः

devyaḥ samutsārya raṇe ripūṇāmuccairvineduḥ prasabhaṁ balāni | neduśca nādān parihṛṣṭacittāḥ protsārya devīryudhi daityayodhāḥ

देवियाँ युद्ध में शत्रु-सेना को बलपूर्वक पीछे धकेलकर ऊँचे स्वर में गरजीं; और दैत्य-योद्धा भी अत्यंत प्रसन्न होकर, देवियों को पीछे धकेलकर गरज उठे।

श्लोक 16 (skanda.8.65.16)

बलानि किञ्चित्क्षतजोक्षितानि प्रचक्रिरे तत्र गतागतानि । महावनानीव समीरणेन समीरितान्युद्गतपल्लवानि

balāni kiñcitkṣatajokṣitāni pracakrire tatra gatāgatāni | mahāvanānīva samīraṇena samīritānyudgatapallavāni

रक्त से कुछ-कुछ सने हुए सेनाएँ वहाँ आगे-पीछे लहराने लगीं, जैसे नई कोंपलों वाले महावन वायु से हिलते हैं।

श्लोक 17 (skanda.8.65.17)

छिन्नानि वक्त्राणि पुरस्सराणां विचित्रहैमाभरणोज्ज्वलानि । देवीभिराजौ पतितानि रेजुर्निकृत्तनालानि यथाम्बुजानि

chinnāni vaktrāṇi purassarāṇāṁ vicitrahaimābharaṇojjvalāni | devībhirājau patitāni rejurnikṛttanālāni yathāmbujāni

अग्रिम पंक्ति के योद्धाओं के, विचित्र स्वर्ण-आभूषणों से चमकते, कटे हुए सिर देवियों के द्वारा युद्ध में गिराए जाकर, कटे हुए डंठल वाले कमलों के समान शोभित हुए।

श्लोक 18 (skanda.8.65.18)

प्रत्याहता विद्रुतभीतनागा सा देवताभिर्निहताश्वयोधा । दैत्येन्द्रसिंहैः प्रतिसन्निवृत्तैर्दोलायमानेव चमूर्बभूव

pratyāhatā vidrutabhītanāgā sā devatābhirnihatāśvayodhā | daityendrasiṁhaiḥ pratisannivṛttairdolāyamāneva camūrbabhūva

देवियों द्वारा खदेड़ी गई, हाथियों के भय से भागने, घोड़ों-योद्धाओं के मारे जाने, तथा सिंह-सम दैत्येंद्रों द्वारा फिर से संगठित होने के कारण वह सेना मानो झूले की तरह डोलने लगी।

श्लोक 19 (skanda.8.65.19)

हता निपेतुः समरे नदन्तो देवद्विषामञ्जनशैलकल्पाः । देवोभिराबद्धविचित्रघण्टा मर्मातिगैर्वाणवरैर्गजेन्द्राः

hatā nipetuḥ samare nadanto devadviṣāmañjanaśailakalpāḥ | devobhirābaddhavicitraghaṇṭā marmātigairvāṇavarairgajendrāḥ

देव-शत्रुओं के गजराज, अंजन-पर्वत के समान श्याम, विचित्र घंटियाँ बाँधे हुए, देवियों के मर्मभेदी श्रेष्ठ बाणों से मारे जाकर युद्ध में गरजते हुए गिर पड़े।

श्लोक 20 (skanda.8.65.20)

बलानि तेषामभिसृत्य वेगादभ्याहतान्याश्वपसेरुराजौ । महोदधिं प्राप्य विवृद्धिकाले प्रत्याहतानीव सरिज्जलानि

balāni teṣāmabhisṛtya vegādabhyāhatānyāśvapaserurājau | mahodadhiṁ prāpya vivṛddhikāle pratyāhatānīva sarijjalāni

उनकी सेनाएँ, वेग से आक्रांत होकर तथा प्रत्याहत होकर, युद्ध में तुरंत लौट पड़ीं, जैसे बाढ़ के समय महासागर में मिलकर नदी का जल पीछे लौट जाता है।

श्लोक 21 (skanda.8.65.21)

देव्यश्च दैत्याश्च महासमाजे विरेजिरेन्योन्यविसक्तवाणाः । संसक्तभासोपगमे घनानामभ्रे समूहा इव तारकाणाम्

devyaśca daityāśca mahāsamāje virejirenyonyavisaktavāṇāḥ | saṁsaktabhāsopagame ghanānāmabhre samūhā iva tārakāṇām

देवियाँ और दैत्य, उस महासमर में परस्पर बाणों से जुड़े हुए, इस प्रकार शोभित हुए जैसे संघटित प्रभा वाले मेघों के बीच तारकों के समूह हों।

श्लोक 22 (skanda.8.65.22)

उद्घुष्य नामान्यथ दानवेन्द्रा निर्जग्मुराशु स्वबलाद्रथस्थाः । क्रुद्धाः सुयत्ता रथिनां वरिष्ठा विस्फार्य चित्राणि शरासनानि

udghuṣya nāmānyatha dānavendrā nirjagmurāśu svabalādrathasthāḥ | kruddhāḥ suyattā rathināṁ variṣṭhā visphārya citrāṇi śarāsanāni

तब अपने-अपने नाम पुकारकर, दानवेंद्र, रथों पर सवार, रथियों में श्रेष्ठ, क्रुद्ध और सुसज्जित होकर, अपने विचित्र धनुष खींचते हुए, अपनी सेना से शीघ्र निकल पड़े।

श्लोक 23 (skanda.8.65.23)

देव्योपि संयत्ततरा रथस्थाः क्रुद्धा जवेनाथ तदाभिसस्रुः । मेघस्वनं प्रत्युदियाय षष्ठी कार्तस्वरं मृत्युरुदीर्णकोपा

devyopi saṁyattatarā rathasthāḥ kruddhā javenātha tadābhisasruḥ | meghasvanaṁ pratyudiyāya ṣaṣṭhī kārtasvaraṁ mṛtyurudīrṇakopā

देवियाँ भी, और अधिक सुसज्जित होकर, रथों पर सवार, क्रुद्ध होकर, तब वेग से आगे बढ़ीं। षष्ठी मेघस्वन के सामने गईं; अत्यंत क्रुद्ध मृत्यु कार्तस्वर के सामने गईं।

श्लोक 24 (skanda.8.65.24)

द्रुमेण लक्ष्मीरथ संयुगस्था मयेन कान्तिः सरमा मुरेण । घनेन चण्डा नियतिः खरेण प्रभावती धुन्धुमयात् सरोषा

drumeṇa lakṣmīratha saṁyugasthā mayena kāntiḥ saramā mureṇa | ghanena caṇḍā niyatiḥ khareṇa prabhāvatī dhundhumayāt saroṣā

लक्ष्मी द्रुम के सामने युद्ध में उतरीं; कांति मय के सामने; सरमा मुर के सामने; चंडा घन के सामने; नियति खर के सामने; और क्रुद्ध प्रभावती धुंधु के सामने आईं।

श्लोक 25 (skanda.8.65.25)

दैत्या युयुत्सोत्सुकमानसास्ते देवीः समायास्सभुजैस्सशस्त्रैः । अभ्याययुः शीघ्रममृष्यमाणाः ख्यातावलेपाः स्वरथैस्सुयत्ताः

daityā yuyutsotsukamānasāste devīḥ samāyāssabhujaissaśastraiḥ | abhyāyayuḥ śīghramamṛṣyamāṇāḥ khyātāvalepāḥ svarathaissuyattāḥ

युद्ध की उत्सुकता से भरे उन दैत्यों ने, भुजाओं और शस्त्रों सहित आती हुई देवियों को सहन न करते हुए, अपने प्रसिद्ध अभिमान के साथ, सुसज्जित रथों पर शीघ्र आगे बढ़े।

श्लोक 26 (skanda.8.65.26)

ज्योतिःप्रकाशान्तपनीयपुंखानाकर्णपूर्णायतचापमुक्तान् । संप्रेषयामासुरदीनसत्वा बाणप्रवेकान्युधि देवतानाम्

jyotiḥprakāśāntapanīyapuṁkhānākarṇapūrṇāyatacāpamuktān | saṁpreṣayāmāsuradīnasatvā bāṇapravekānyudhi devatānām

अदीन-चित्त उन दानवों ने कान तक खींचे हुए धनुषों से, तारों के समान चमकते स्वर्ण-पुंख वाले श्रेष्ठ बाण देवियों पर छोड़े।

श्लोक 27 (skanda.8.65.27)

देव्योथ तेषां निशितान्सुपुंखान्मर्मच्छिदो दूरगमान्सुपत्रान् । आगच्छतां दानवयूथपानां बाणाननन्तान्ससृजुस्तथैव

devyotha teṣāṁ niśitānsupuṁkhānmarmacchido dūragamānsupatrān | āgacchatāṁ dānavayūthapānāṁ bāṇānanantānsasṛjustathaiva

तब देवियों ने भी उन आते हुए दानव-सेनापतियों पर वैसे ही तीक्ष्ण, सुपंखी, मर्मभेदी, दूरगामी अनगिनत बाण छोड़े।

श्लोक 28 (skanda.8.65.28)

ते बाणमुख्या विविधा विरेजुरन्योन्यमुक्ता व्यतिषज्यमानाः । ते पूर्णमास्यां विघने दिनान्ते भासः समूढा इव चान्द्रसौराः

te bāṇamukhyā vividhā virejuranyonyamuktā vyatiṣajyamānāḥ | te pūrṇamāsyāṁ vighane dinānte bhāsaḥ samūḍhā iva cāndrasaurāḥ

एक-दूसरे पर छोड़े गए, टकराते हुए वे विविध श्रेष्ठ बाण इस प्रकार शोभित हुए जैसे पूर्णिमा की मेघरहित संध्या में चंद्र और सूर्य की मिली हुई किरणें हों।

श्लोक 29 (skanda.8.65.29)

छिन्ना निपेतुर्युधि देवताभिर्भुजाः सशस्त्रा दितिजाधिपानाम् । निरस्तभोगा निबिडा बृहन्तो निगीर्णजिह्वा इव पन्नगेन्द्राः

chinnā nipeturyudhi devatābhirbhujāḥ saśastrā ditijādhipānām | nirastabhogā nibiḍā bṛhanto nigīrṇajihvā iva pannagendrāḥ

देवियों द्वारा काटी गई दैत्येंद्रों की शस्त्रधारी भुजाएँ, मोटी और विशाल, युद्ध में इस प्रकार गिरीं जैसे फन कटे हुए, जीभ निगले हुए विशाल नागराज गिरे हों।

श्लोक 30 (skanda.8.65.30)

मेघस्वनस्याथ रणे तदानीं क्रुद्धा शरौघान्विससर्ज षष्ठी । आगच्छतस्तानभितः पृषत्कैश्चिच्छेद दैत्यः शतशोन्तरिक्षे

meghasvanasyātha raṇe tadānīṁ kruddhā śaraughānvisasarja ṣaṣṭhī | āgacchatastānabhitaḥ pṛṣatkaiściccheda daityaḥ śataśontarikṣe

तब क्रुद्ध होकर षष्ठी ने युद्ध में मेघस्वन पर बाणों की बाढ़ छोड़ी; उस दैत्य ने भी आते हुए उन बाणों को आकाश में सैकड़ों टुकड़ों में काट डाला।

श्लोक 31 (skanda.8.65.31)

बाणानथोद्वीक्ष्य तदा निकृत्तान् लघीयसोन्यान्विससर्ज तूर्णम् । दैत्योपि तानापततः पृषत्कान्व्रातैः शराणां बहुशश्चकर्त्त

bāṇānathodvīkṣya tadā nikṛttān laghīyasonyānvisasarja tūrṇam | daityopi tānāpatataḥ pṛṣatkānvrātaiḥ śarāṇāṁ bahuśaścakartta

अपने कटे हुए बाणों को देखकर उसने शीघ्र ही अन्य हल्के बाण छोड़े; दैत्य ने भी आते हुए उन बाणों को अपने बाण-समूहों से बार-बार काट डाला।

श्लोक 32 (skanda.8.65.32)

निकृत्य बाणान्दितिजः पुनस्तान् चिक्षेप षष्ठ्या दश रुक्मपुंखान् । तानाशु षष्ठी प्रतिवार्य दैत्यं विव्याध षष्ठ्या तपनीयपुंखैः

nikṛtya bāṇānditijaḥ punastān cikṣepa ṣaṣṭhyā daśa rukmapuṁkhān | tānāśu ṣaṣṭhī prativārya daityaṁ vivyādha ṣaṣṭhyā tapanīyapuṁkhaiḥ

उन बाणों को काटकर वह दितिपुत्र फिर षष्ठी पर दस स्वर्ण-पुंख वाले बाण चलाने लगा; परंतु षष्ठी ने उन्हें शीघ्र रोककर, छह स्वर्ण-पुंख वाले बाणों से उस दैत्य को बींध दिया।

श्लोक 33 (skanda.8.65.33)

स तैर्विभिन्नो रुधिराक्तमूर्तिः प्रविह्वलः च किंचिदवाग् बभूव । अपाकरोत्तं समरात् स्वसूतो रथेन जाम्बूनदचित्रितेन

sa tairvibhinno rudhirāktamūrtiḥ pravihvalaḥ ca kiṁcidavāg babhūva | apākarottaṁ samarāt svasūto rathena jāmbūnadacitritena

उनसे घायल होकर, रक्त से सने शरीर वाला वह कुछ विह्वल और वाणीहीन-सा हो गया; तब उसके सारथी ने स्वर्ण-जड़ित रथ द्वारा उसे युद्ध से हटा लिया।

श्लोक 34 (skanda.8.65.34)

कार्तस्वनः काञ्चनचित्रपुंखान् ससर्ज देव्याः समरे पृषत्कान् । चिच्छेद तान् मृत्युरुदारपुंखैरनागता नेव शराञ्छरौघैः

kārtasvanaḥ kāñcanacitrapuṁkhān sasarja devyāḥ samare pṛṣatkān | ciccheda tān mṛtyurudārapuṁkhairanāgatā neva śarāñcharaughaiḥ

कार्तस्वन ने युद्ध में देवी पर स्वर्ण-चित्रित पुंख वाले बाण छोड़े; मृत्यु ने अपने विशाल-पंख वाले बाणों की झड़ी से, पहुँचने से पहले ही, उन्हें काट डाला।

श्लोक 35 (skanda.8.65.35)

छित्त्वा शराँस्तस्य शरैर्विचित्रैर्विव्याध तं वक्षसि पञ्चषष्ठ्या । भिन्नः स तैराशु तथा विरेजे व्योम्न्यर्कपादैरिव वारिवाहः

chittvā śarā~stasya śarairvicitrairvivyādha taṁ vakṣasi pañcaṣaṣṭhyā | bhinnaḥ sa tairāśu tathā vireje vyomnyarkapādairiva vārivāhaḥ

उसके बाणों को अपने विचित्र बाणों से काटकर उसने उसकी छाती में पैंसठ बाण मारे; उनसे घायल होकर वह इस प्रकार शोभित हुआ जैसे आकाश में सूर्य-किरणों से बिंधा मेघ हो।

श्लोक 36 (skanda.8.65.36)

अश्वांश्च तस्याशु जघान मृत्युः पृथक् पृषत्कै स्तपनीयपुंखैः । आप्लुत्य दैत्योथ रथाद्धताश्वात्प्रगृह्य चर्मासिवरञ्च धौतम्

aśvāṁśca tasyāśu jaghāna mṛtyuḥ pṛthak pṛṣatkai stapanīyapuṁkhaiḥ | āplutya daityotha rathāddhatāśvātpragṛhya carmāsivarañca dhautam

मृत्यु ने उसके घोड़ों को भी अलग-अलग स्वर्ण-पुंख वाले बाणों से शीघ्र मार डाला; तब घोड़े मारे जाने पर वह दैत्य रथ से कूदकर, ढाल और उज्ज्वल श्रेष्ठ खड्ग लेकर,

श्लोक 37 (skanda.8.65.37)

क्रुद्धो नितान्तायतरक्तनेत्रो वेगेन देवीमभितः ससार । तच्चर्म तस्यापततः शरौघैश्चकर्त्त मृत्युः शतशश्शिताग्रैः

kruddho nitāntāyataraktanetro vegena devīmabhitaḥ sasāra | taccarma tasyāpatataḥ śaraughaiścakartta mṛtyuḥ śataśaśśitāgraiḥ

और क्रुद्ध होकर, अत्यंत विशाल लाल नेत्रों वाला वह देवी की ओर वेग से दौड़ा; परंतु मृत्यु ने उसके पास आते ही उसकी ढाल को तीक्ष्ण बाणों की झड़ी से सैकड़ों टुकड़ों में काट डाला।

श्लोक 38 (skanda.8.65.38)

स कृत्तचर्मावरणो सुरेन्द्रो निस्त्रिंशमुद्यम्य निशातधारम् । अभ्यद्रवन्मृत्युमभूत्तदानीं खे रोहिणीं मेघ इवाभिविद्युत्

sa kṛttacarmāvaraṇo surendro nistriṁśamudyamya niśātadhāram | abhyadravanmṛtyumabhūttadānīṁ khe rohiṇīṁ megha ivābhividyut

ढाल कट जाने पर, उस असुरेंद्र ने तीक्ष्ण धार वाली तलवार उठाकर मृत्यु पर आक्रमण किया, और उस समय वह मानो बिजली से चमकता मेघ रोहिणी नक्षत्र की ओर झपटता हुआ प्रतीत हुआ।

श्लोक 39 (skanda.8.65.39)

तमापतन्तं युधि कालकल्पं मृत्युः शरैरुग्रभुजङ्गकल्पैः । जघान मर्मस्वभिलक्षितेषु व्ययोजयच्चासुभिरेनमाशु

tamāpatantaṁ yudhi kālakalpaṁ mṛtyuḥ śarairugrabhujaṅgakalpaiḥ | jaghāna marmasvabhilakṣiteṣu vyayojayaccāsubhirenamāśu

युद्ध में काल के समान आक्रमण करते हुए उसे मृत्यु ने भयंकर सर्पों के समान बाणों से, मर्मस्थलों पर निशाना साधकर, आहत किया और शीघ्र ही उसके प्राण हर लिए।

श्लोक 40 (skanda.8.65.40)

लक्ष्मीर्द्रुमं बाणवरैरजय्या समाकिरद्वारणराजलीलम् । कर्णान्तमुक्तै र्निशितैरजिह्मै रणाजिरे चारुसुवर्णपुंखैः

lakṣmīrdrumaṁ bāṇavarairajayyā samākiradvāraṇarājalīlam | karṇāntamuktai rniśitairajihmai raṇājire cārusuvarṇapuṁkhaiḥ

अजेय लक्ष्मी ने, गजराज की सी लीला से चलने वाले द्रुम को, रणभूमि में श्रेष्ठ बाणों से आच्छादित कर दिया - तीक्ष्ण, सीधे जाने वाले, कान तक खींचकर छोड़े गए, सुंदर स्वर्ण-पुंख वाले।

श्लोक 41 (skanda.8.65.41)

अजिह्मगास्ते विविधाः सुपत्रिता द्रुमस्य गात्रेषु निपेतुराहवे । स तैर्विचित्रैः शुशुभे विषक्तैर्महाद्रुमः पक्षिगणरिवाश्रितैः

ajihmagāste vividhāḥ supatritā drumasya gātreṣu nipeturāhave | sa tairvicitraiḥ śuśubhe viṣaktairmahādrumaḥ pakṣigaṇarivāśritaiḥ

वे विविध सीधे जाने वाले, सुंदर पंखों वाले बाण युद्ध में द्रुम के अंगों पर गिरे; और उनसे जड़ा हुआ वह इस प्रकार शोभित हुआ जैसे विचित्र पक्षियों के झुंड से आश्रित कोई विशाल वृक्ष हो।

श्लोक 42 (skanda.8.65.42)

लक्ष्मीं ततः किंपुरुषाधिपोसौ विव्याध बाणैर्दशभिः सुपुंखैः । वक्त्रे स पूर्णेन्दुसमानवक्त्त्रां बाह्वोः पृथक् चाष्टशतेन धीरः

lakṣmīṁ tataḥ kiṁpuruṣādhiposau vivyādha bāṇairdaśabhiḥ supuṁkhaiḥ | vaktre sa pūrṇendusamānavakttrāṁ bāhvoḥ pṛthak cāṣṭaśatena dhīraḥ

तब उस किंपुरुषाधिप ने पूर्णचंद्र-सम मुख वाली लक्ष्मी के मुख पर दस सुंदर पंख वाले बाण मारे, और धैर्यपूर्वक उसकी दोनों भुजाओं में पृथक्-पृथक् आठ सौ बाण मारे।

श्लोक 43 (skanda.8.65.43)

अचिन्तयन्तीषु वरान्वरास्या मुखेस्य तीक्ष्णान्निचखान बाणान् । अन्यानसख्याँश्च पृथक् शरीरे सुपत्रितान् हाटकमृष्टपुंखान्

acintayantīṣu varānvarāsyā mukhesya tīkṣṇānnicakhāna bāṇān | anyānasakhyā~śca pṛthak śarīre supatritān hāṭakamṛṣṭapuṁkhān

श्रेष्ठ बाणों की परवाह न करते हुए सुंदर मुख वाली लक्ष्मी ने उसके मुख में तीक्ष्ण बाण गाड़ दिए, और उसके शरीर पर अन्य असंख्य सुपंखी, स्वर्ण-मार्जित पुंख वाले बाण अलग-अलग गाड़ दिए।

श्लोक 44 (skanda.8.65.44)

लक्ष्म्यास्ततो दैत्यपतिः शितेन भल्लेन चिच्छेद रथे ध्वजाग्रम् । अश्वांश्च तस्याश्चतुरश्चतुर्भिः सूतं च विव्याध शरेण तूर्णम्

lakṣmyāstato daityapatiḥ śitena bhallena ciccheda rathe dhvajāgram | aśvāṁśca tasyāścaturaścaturbhiḥ sūtaṁ ca vivyādha śareṇa tūrṇam

तब दैत्यपति ने लक्ष्मी के रथ पर लगे ध्वज का अग्रभाग तीक्ष्ण भल्ल से काट डाला, उसके चारों घोड़ों को चार-चार बाणों से मारा, और सारथी को शीघ्र एक बाण से बींध दिया।

श्लोक 45 (skanda.8.65.45)

नाराचमादाय ततोस्य लक्ष्मीर्जघान सूतं युधि देवशत्रोः । विव्याध वाहाँश्च पृथक्पृषत्कैध्वजञ्च चिच्छेद रथस्य तूर्णम्

nārācamādāya tatosya lakṣmīrjaghāna sūtaṁ yudhi devaśatroḥ | vivyādha vāhā~śca pṛthakpṛṣatkaidhvajañca ciccheda rathasya tūrṇam

तब लोहे का बाण लेकर लक्ष्मी ने युद्ध में उस देव-शत्रु के सारथी को मार डाला, उसके घोड़ों को अलग-अलग बाणों से बींधा, और उसके रथ का ध्वज शीघ्र काट डाला।

श्लोक 46 (skanda.8.65.46)

यन्त्रा विना तस्य रथं तदानीं ते सायकैरप्रतिमैः प्रतप्ताः । संग्रामभूमेरपनिन्युरश्वाः प्राणानिव स्वान् परिरक्षमाणाः

yantrā vinā tasya rathaṁ tadānīṁ te sāyakairapratimaiḥ prataptāḥ | saṁgrāmabhūmerapaninyuraśvāḥ prāṇāniva svān parirakṣamāṇāḥ

उसका रथ तब बिना नियंत्रण के रह गया, और वे अनुपम बाणों से पीड़ित घोड़े, मानो अपने प्राणों की रक्षा करते हुए, उसे रणभूमि से दूर ले गए।

श्लोक 47 (skanda.8.65.47)

कान्तिर्मयं बाणशतैरवाकिरन्मयश्च कान्तिं निशितैः शरौघैः । नीहारपातैरिव सान्धकारं तदा तयोरन्तरमास तत्र

kāntirmayaṁ bāṇaśatairavākiranmayaśca kāntiṁ niśitaiḥ śaraughaiḥ | nīhārapātairiva sāndhakāraṁ tadā tayorantaramāsa tatra

कांति ने मय पर सैकड़ों बाणों की वर्षा की, और मय ने कांति पर तीक्ष्ण बाण-समूहों की; उन दोनों के बीच का स्थान तब मानो कोहरे और अंधकार से घिर गया।

श्लोक 48 (skanda.8.65.48)

आदानसन्धानविकर्षणेषु स्थानक्रमप्रग्रहतेजनेषु । शिक्षागुणैस्तावपरस्परेण विशेषयामासतुराजिमध्ये

ādānasandhānavikarṣaṇeṣu sthānakramapragrahatejaneṣu | śikṣāguṇaistāvaparaspareṇa viśeṣayāmāsaturājimadhye

बाण उठाने, संधान करने, खींचने में, पैरों की चाल में, रास संभालने में और निशाना साधने में, वे दोनों युद्ध के बीच अपने-अपने अभ्यासजन्य कौशल से एक-दूसरे से आगे निकलने का प्रयत्न करते रहे।

श्लोक 49 (skanda.8.65.49)

कान्तिर्मयास्तान्निचकर्त बाणान्मयश्च कान्त्या विशिखान्विमृष्टान् । छिद्रं समासेदतुरप्रधृष्यौ किञ्चिन्न तौ यत्र परस्परस्य

kāntirmayāstānnicakarta bāṇānmayaśca kāntyā viśikhānvimṛṣṭān | chidraṁ samāsedaturapradhṛṣyau kiñcinna tau yatra parasparasya

कांति ने मय के बाणों को काटा, और मय ने कांति के सुधारे हुए बाणों को काटा; वे दोनों अजेय एक-दूसरे में कोई भी छिद्र नहीं पा सके।

श्लोक 50 (skanda.8.65.50)

अश्वेषु सूते सरथे ध्वजे च सर्वेषु गात्रावयवेषु चास्य । अजिह्मगान् हाटकमृष्टपुंखान् मयस्य कान्तिर्निचखान बाणान्

aśveṣu sūte sarathe dhvaje ca sarveṣu gātrāvayaveṣu cāsya | ajihmagān hāṭakamṛṣṭapuṁkhān mayasya kāntirnicakhāna bāṇān

कांति ने मय के घोड़ों, सारथी, रथ, ध्वज और शरीर के सभी अंगों में सीधे जाने वाले, स्वर्ण-मार्जित पुंख वाले बाण गाड़ दिए।

श्लोक 51 (skanda.8.65.51)

मयश्च कान्तिं सरथा ७ ससूतां सचारुचित्रध्वजवाजिमुख्याम् । संछादयामास शितैः पृषत्कैर्वनस्थलीं मेघ इवाम्बुवर्षैः

mayaśca kāntiṁ sarathā 7 sasūtāṁ sacārucitradhvajavājimukhyām | saṁchādayāmāsa śitaiḥ pṛṣatkairvanasthalīṁ megha ivāmbuvarṣaiḥ

और मय ने कांति को, उसके रथ, सारथी, सुंदर विचित्र ध्वज और श्रेष्ठ घोड़ों सहित, तीक्ष्ण बाणों से इस प्रकार ढक दिया जैसे मेघ वनस्थली को जलधाराओं से ढक देता है।

श्लोक 52 (skanda.8.65.52)

क्रुद्धाथ कान्तिः समरे मयस्य नाराचमुख्येन सुपत्रितेन । सूतं जघानाशु रिपोस्तदानीमष्टाभिरष्टौ तुरगाँश्च बाणैः

kruddhātha kāntiḥ samare mayasya nārācamukhyena supatritena | sūtaṁ jaghānāśu ripostadānīmaṣṭābhiraṣṭau turagā~śca bāṇaiḥ

तब क्रुद्ध होकर कांति ने युद्ध में शत्रु मय के सारथी को एक श्रेष्ठ, सुपंखी लौह-बाण से शीघ्र मार डाला, और उसके आठ घोड़ों को आठ बाणों से मारा।

श्लोक 53 (skanda.8.65.53)

हताश्वसूतो विरथो मयोथ निस्त्रिंशमादाय निशातधारम् । ज्ञात्वैव कान्त्या समरे प्रभावं विहाय युद्धं वियदुत्पपात

hatāśvasūto viratho mayotha nistriṁśamādāya niśātadhāram | jñātvaiva kāntyā samare prabhāvaṁ vihāya yuddhaṁ viyadutpapāta

घोड़े-सारथी मारे जाने पर, रथहीन मय ने तब तीक्ष्ण धार वाली तलवार उठाई; परंतु युद्ध में कांति का प्रभाव जानकर उसने युद्ध त्यागकर आकाश में छलांग लगा दी।

श्लोक 54 (skanda.8.65.54)

विव्याध तीक्ष्णैः सरमा रणाजिरे बाणैर्मुरं दानवदैत्ययूथपम् । दैत्योपि बाणैः सरमामजिह्मगैरभ्याहनद् गृध्रमयूरपत्रिभिः

vivyādha tīkṣṇaiḥ saramā raṇājire bāṇairmuraṁ dānavadaityayūthapam | daityopi bāṇaiḥ saramāmajihmagairabhyāhanad gṛdhramayūrapatribhiḥ

सरमा ने रणभूमि में दानव-दैत्य-सेनापति मुर को तीक्ष्ण बाणों से बींधा; उस दैत्य ने भी गिद्ध और मयूर के पंखों वाले सीधे बाणों से सरमा पर प्रहार किया।

श्लोक 55 (skanda.8.65.55)

क्रुद्धाथ देवी निशितेन तस्य चिच्छेद भल्लेन धनुर्विचित्रम् । ते विह्वलाः शोणितमुद्वमन्तो दैत्येन्द्रबाणाभिहतास्तुरङ्गाः । भूमौ निपेतुः समरे श्वसन्तः प्राणाञ्जहुश्चाशु समं समस्ताः

kruddhātha devī niśitena tasya ciccheda bhallena dhanurvicitram | te vihvalāḥ śoṇitamudvamanto daityendrabāṇābhihatāsturaṅgāḥ | bhūmau nipetuḥ samare śvasantaḥ prāṇāñjahuścāśu samaṁ samastāḥ

तब क्रुद्ध देवी ने तीक्ष्ण भल्ल से उसका विचित्र धनुष काट डाला; और दैत्येंद्र के ही बाणों से आहत उसके घोड़े, रक्त वमन करते, हाँफते हुए भूमि पर गिरकर, सब एक साथ शीघ्र प्राण त्याग बैठे।

श्लोक 56 (skanda.8.65.56)

क्रुद्धाथ देवी सरमासुरस्य निस्त्रिंशमुद्यम्य सुपीतधारम् । उत्पत्य खं तस्य तदा जघान यन्तारमश्वाँश्च महाप्रमाणान्

kruddhātha devī saramāsurasya nistriṁśamudyamya supītadhāram | utpatya khaṁ tasya tadā jaghāna yantāramaśvā~śca mahāpramāṇān

तब क्रुद्ध होकर सरमा देवी ने चमकदार तलवार उठाकर, आकाश में उछलकर, उस असुर के सारथी और उसके विशालकाय घोड़ों को मार डाला।

श्लोक 57 (skanda.8.65.57)

मुरोथ वेगेन तदान्तरिक्षमुत्पत्य कोपान्निहताश्वसूतः । विव्याध देवीं दशभिःसुतीक्ष्णैः शरैरुरस्युग्रभुजङ्गकल्पैः

murotha vegena tadāntarikṣamutpatya kopānnihatāśvasūtaḥ | vivyādha devīṁ daśabhiḥsutīkṣṇaiḥ śarairurasyugrabhujaṅgakalpaiḥ

तब घोड़े-सारथी मारे जाने पर मुर क्रोध से वेगपूर्वक आकाश में कूद गया, और सर्पों के समान भयंकर दस अत्यंत तीक्ष्ण बाणों से देवी की छाती बींध दी।

श्लोक 58 (skanda.8.65.58)

अचिन्तयित्वा सरमा शराँस्तान् धनुर्विचिच्छेद तदा मुरस्य । स कृत्तधन्वा वियतीन्द्रशत्रुरन्तर्दधे संयुगमाशु हित्वा

acintayitvā saramā śarā~stān dhanurviciccheda tadā murasya | sa kṛttadhanvā viyatīndraśatrurantardadhe saṁyugamāśu hitvā

उन बाणों की परवाह न करते हुए सरमा ने तब मुर का धनुष काट डाला; धनुष कट जाने पर वह इंद्र-शत्रु आकाश में युद्ध छोड़कर शीघ्र अंतर्धान हो गया।

श्लोक 59 (skanda.8.65.59)

विव्याध चण्डा घनमापतन्तं शरैः शिताग्रैर्युधि रुक्मपुंखैः । विद्धः स तैर्दैत्यपतिर्बभासे करैरिवेन्दोरसितः पयोदः

vivyādha caṇḍā ghanamāpatantaṁ śaraiḥ śitāgrairyudhi rukmapuṁkhaiḥ | viddhaḥ sa tairdaityapatirbabhāse karairivendorasitaḥ payodaḥ

चंडा ने आक्रमण करते हुए घन को युद्ध में तीक्ष्ण, स्वर्ण-पुंख वाले बाणों से बींधा; उनसे घायल वह दैत्यपति इस प्रकार शोभित हुआ जैसे चंद्रमा की किरणों से स्पर्शित काला मेघ हो।

श्लोक 60 (skanda.8.65.60)

अभ्यद्रवत्तानविचिन्त्य वाणाँश्चण्डां घनः सायकजालवर्षी । आगच्छतस्तस्य शरैस्सुपत्रैर्विव्याध चण्डा रथवाजिमुख्यान्

abhyadravattānavicintya vāṇā~ścaṇḍāṁ ghanaḥ sāyakajālavarṣī | āgacchatastasya śaraissupatrairvivyādha caṇḍā rathavājimukhyān

उन बाणों की परवाह न करते हुए, बाण-जाल की वर्षा करता हुआ घन चंडा पर टूट पड़ा; और उसके आते ही चंडा ने उसके रथ और श्रेष्ठ घोड़ों को सुपंखी बाणों से बींध दिया।

श्लोक 61 (skanda.8.65.61)

चिच्छेद दैत्योपि समुच्छ्रिताग्रं ध्वजं तुरङ्गाँश्च जघान देव्याः । हित्वा रथौ ताववतीर्य भूमौ गृहीतचर्मासिवरौ प्रयत्तौ

ciccheda daityopi samucchritāgraṁ dhvajaṁ turaṅgā~śca jaghāna devyāḥ | hitvā rathau tāvavatīrya bhūmau gṛhītacarmāsivarau prayattau

उस दैत्य ने भी देवी के ऊँचे ध्वज को काट डाला और उसके घोड़ों को मार डाला; तब दोनों अपने-अपने रथ छोड़कर, ढाल और श्रेष्ठ खड्ग लेकर, सुसज्जित होकर भूमि पर उतर आए,

श्लोक 62 (skanda.8.65.62)

विचेरतुर्मण्डलमाजिमध्ये भूमिं तदाग्राङ्गुलिभिः स्पृशन्तौ । ताँस्ताँश्च मार्गान् लघुपादचारौ छिद्रं न चान्योन्यमवापतुस्तौ

viceraturmaṇḍalamājimadhye bhūmiṁ tadāgrāṅgulibhiḥ spṛśantau | tā~stā~śca mārgān laghupādacārau chidraṁ na cānyonyamavāpatustau

और युद्धभूमि के बीच पैरों के अग्रभाग से भूमि छूते हुए मंडलाकार घूमने लगे, फुर्ती से इधर-उधर चलते हुए, फिर भी दोनों में से कोई एक-दूसरे में छिद्र न पा सका।

श्लोक 63 (skanda.8.65.63)

अभिप्लुतोच्चप्लुतसिंहपातान् निवृत्तकाक्रीडितकोर्ध्वबाहून् । खगापयाताभिहतापयातान् निषण्णकाविद्धशिरोभिघातान्

abhiplutoccaplutasiṁhapātān nivṛttakākrīḍitakordhvabāhūn | khagāpayātābhihatāpayātān niṣaṇṇakāviddhaśirobhighātān

वे झपटकर आगे बढ़ने, ऊँची सिंह-छलांग लगाने, अचानक मुड़ने, हाथ ऊपर उठाकर लीलापूर्वक चालें दिखाने, पक्षी की तरह हटकर वार करने, और झुककर सिर पर आघात करने की चालें चलने लगे।

श्लोक 64 (skanda.8.65.64)

उत्प्लुत्य वेगेन तदाथ तस्य शिरोधरामाशु चकर्त चण्डा । स कृत्तमूर्धा निपपात तस्यां संग्रामभूमावुरसाशु दैत्यः

utplutya vegena tadātha tasya śirodharāmāśu cakarta caṇḍā | sa kṛttamūrdhā nipapāta tasyāṁ saṁgrāmabhūmāvurasāśu daityaḥ

तब वेग से उछलकर चंडा ने शीघ्र उसकी गर्दन काट डाली; सिर कटने पर वह दैत्य उस रणभूमि में तुरंत छाती के बल गिर पड़ा।

श्लोक 65 (skanda.8.65.65)

स शोणितादिग्धवपुस्तदानीं घनः परासुः पतितो धरण्याम् । रराज सन्ध्याच्छुरितोरुमूर्त्तिर्वियद्गतो नील इवाम्बुवाहः

sa śoṇitādigdhavapustadānīṁ ghanaḥ parāsuḥ patito dharaṇyām | rarāja sandhyācchuritorumūrttirviyadgato nīla ivāmbuvāhaḥ

रक्त से लिप्त शरीर वाला वह प्राणहीन घन भूमि पर गिरा हुआ, संध्या की लालिमा से रंगे मेघ के समान, आकाश में गए हुए नील मेघ की भाँति शोभित हुआ।

श्लोक 66 (skanda.8.65.66)

विव्याध तीक्ष्णैर्निर्यतिः सुपत्रैः खरं शरैर्वक्षसि हेमपुंखैः । आयोधने संमुखमापतन्तं भल्लेन चास्य ध्वजमुच्चकर्त

vivyādha tīkṣṇairniryatiḥ supatraiḥ kharaṁ śarairvakṣasi hemapuṁkhaiḥ | āyodhane saṁmukhamāpatantaṁ bhallena cāsya dhvajamuccakarta

नियति ने युद्ध में सामने आक्रमण करते हुए खर की छाती को तीक्ष्ण, सुपंखी, स्वर्ण-पुंख वाले बाणों से बींधा, और भल्ल से उसका ध्वज काट डाला।

श्लोक 67 (skanda.8.65.67)

विद्धः स तैरभ्यपतन्सरोषो देवीं जिघांसुः समरेरिहन्ता । गुर्वी गदां चाशु तदा गृहीत्वा चिक्षेप देव्या रुधिराक्तमूर्त्तिः

viddhaḥ sa tairabhyapatansaroṣo devīṁ jighāṁsuḥ samarerihantā | gurvī gadāṁ cāśu tadā gṛhītvā cikṣepa devyā rudhirāktamūrttiḥ

उनसे घायल होकर वह समर-संहारक क्रोधपूर्वक देवी को मारने की इच्छा से टूट पड़ा; तब रक्त-सने शरीर वाला वह एक भारी गदा उठाकर देवी पर फेंकने लगा।

श्लोक 68 (skanda.8.65.68)

सा दानवाग्र्येण गदा प्रमुक्ता विचित्रहेमोज्ज्वलचारुघण्टा । संचूर्णयामास रथं नियत्याः सूतं ध्वजं चाशु समुच्छ्रिताग्रम्

sā dānavāgryeṇa gadā pramuktā vicitrahemojjvalacārughaṇṭā | saṁcūrṇayāmāsa rathaṁ niyatyāḥ sūtaṁ dhvajaṁ cāśu samucchritāgram

उस श्रेष्ठ दानव द्वारा फेंकी गई, विचित्र स्वर्ण-घंटियों से सुशोभित उस गदा ने नियति के रथ, सारथी और उसके ऊँचे ध्वज को शीघ्र चूर-चूर कर डाला।

श्लोक 69 (skanda.8.65.69)

उत्पत्य तूर्णं नियतिः स्ववाहात् क्रोधेन संरक्तविलोलनेत्रा । अभ्येत्य तं दानवयोधमुख्यं खड्गेन मध्येस्य शिरः पफाल

utpatya tūrṇaṁ niyatiḥ svavāhāt krodhena saṁraktavilolanetrā | abhyetya taṁ dānavayodhamukhyaṁ khaḍgena madhyesya śiraḥ paphāla

अपने वाहन से तुरंत छलांग लगाकर, क्रोध से चंचल लाल नेत्रों वाली नियति ने उस श्रेष्ठ दानव-योद्धा के पास पहुँचकर खड्ग से उसका सिर बीच से चीर डाला।

श्लोक 70 (skanda.8.65.70)

स दानवो विस्फुटितोत्तमाङ्गः क्षितौ विरेजे स्रुतरक्तधारः । वज्रेण भिन्नः शिखराग्रदेशे गिरिर्यथा धातुरसप्रवाही

sa dānavo visphuṭitottamāṅgaḥ kṣitau vireje srutaraktadhāraḥ | vajreṇa bhinnaḥ śikharāgradeśe giriryathā dhāturasapravāhī

सिर फटा हुआ, रक्त की धाराएँ बहाता हुआ वह दानव भूमि पर इस प्रकार शोभित हुआ जैसे वज्र से चोटी पर विदीर्ण पर्वत धातु-रस बहा रहा हो।

श्लोक 71 (skanda.8.65.71)

प्रभावती धुन्धुमजिह्मयातैः शिलीमुखैरभ्यहनत्सुपत्रैः । उरस्युदारा दशभिः शिताग्रैर्घनाघनव्रातसमानवर्णैः

prabhāvatī dhundhumajihmayātaiḥ śilīmukhairabhyahanatsupatraiḥ | urasyudārā daśabhiḥ śitāgrairghanāghanavrātasamānavarṇaiḥ

श्रेष्ठ प्रभावती ने धुंधु की छाती पर, सीधे जाने वाले, सुपंखी, तीक्ष्ण अग्रभाग वाले, घने मेघ-समूह के समान वर्ण वाले दस बाण मारे।

श्लोक 72 (skanda.8.65.72)

जघान सा षोडश देवतारेस्तुरङ्गमान् षोडशभिः पृषत्कैः । निहत्य चैकेन रथेस्य सूतमेकेन चास्य ध्वजमुच्चकर्त

jaghāna sā ṣoḍaśa devatāresturaṅgamān ṣoḍaśabhiḥ pṛṣatkaiḥ | nihatya caikena rathesya sūtamekena cāsya dhvajamuccakarta

उसने उस देव-शत्रु के सोलह घोड़ों को सोलह बाणों से मार डाला, एक बाण से उसके रथ के सारथी को मारा, और एक बाण से उसका ध्वज काट डाला।

श्लोक 73 (skanda.8.65.73)

धुन्धुर्गदां भारसहस्रगुर्वी चिक्षेप कार्तस्वरचारुघण्टाम् । तामापतन्तीं शतशश्चकर्त्त प्रभावती दैत्यपतिप्रमुक्ताम्

dhundhurgadāṁ bhārasahasragurvī cikṣepa kārtasvaracārughaṇṭām | tāmāpatantīṁ śataśaścakartta prabhāvatī daityapatipramuktām

धुंधु ने सहस्र भार के समान भारी, सुंदर स्वर्ण-घंटियों वाली गदा फेंकी; प्रभावती ने उस दैत्यपति द्वारा फेंकी गई, आती हुई गदा को सैकड़ों टुकड़ों में काट डाला।

श्लोक 74 (skanda.8.65.74)

आदाय दैत्यः परिघं महान्तमाप्लुत्य वाहादभितः ससार । देवीमसावञ्जनशैलनीलो रणाजिरे काल इवात्तदण्डः

ādāya daityaḥ parighaṁ mahāntamāplutya vāhādabhitaḥ sasāra | devīmasāvañjanaśailanīlo raṇājire kāla ivāttadaṇḍaḥ

उस दैत्य ने विशाल लौह-गदा उठाकर अपने वाहन से कूदकर देवी की ओर सीधे दौड़ लगाई, अंजन-पर्वत के समान श्याम, मानो रणभूमि में दंड उठाए साक्षात् काल हो।

श्लोक 75 (skanda.8.65.75)

अभ्यापतन्तं युधि दानवेन्द्रं देवी शरैरभ्यहनत् सुपत्रैः । देव्या समस्तानविचिन्त्य बाणानभ्येत्य तामाहवमूर्ध्नि रोषात्

abhyāpatantaṁ yudhi dānavendraṁ devī śarairabhyahanat supatraiḥ | devyā samastānavicintya bāṇānabhyetya tāmāhavamūrdhni roṣāt

युद्ध में आक्रमण करते हुए उस दानवेंद्र को देवी ने सुपंखी बाणों से मारा; देवी के समस्त बाणों की परवाह न करते हुए वह क्रोधवश युद्ध के शिखर पर उसके पास पहुँचा,

श्लोक 76 (skanda.8.65.76)

उद्भ्राम्य वैवस्वतदण्डकल्पं लौहं प्रयस्तं परिघोरुबाहुः । न्यपातयत्तं परिघं रथेस्या गिरेर्नितम्बे कुलिशं यथेन्द्रः

udbhrāmya vaivasvatadaṇḍakalpaṁ lauhaṁ prayastaṁ parighorubāhuḥ | nyapātayattaṁ parighaṁ rathesyā girernitambe kuliśaṁ yathendraḥ

और उस महाबाहु ने यम-दंड के समान अपनी विशाल लौह-गदा घुमाकर उसे देवी के रथ पर इस प्रकार गिराया जैसे इंद्र पर्वत की तलहटी पर वज्र गिराते हैं।

श्लोक 77 (skanda.8.65.77)

अचूर्णयत्तं रथमाशु देव्याः साश्वं ससूतध्वजहेमचक्रम् । कालायसोसौ परिघोसुरास्तो वेगेन तत्रापससार देवी

acūrṇayattaṁ rathamāśu devyāḥ sāśvaṁ sasūtadhvajahemacakram | kālāyasosau parighosurāsto vegena tatrāpasasāra devī

उस असुर द्वारा फेंकी गई काली लौह-गदा ने देवी के रथ को उसके घोड़ों, सारथी, ध्वज और स्वर्ण-चक्रों सहित चूर-चूर कर डाला; देवी वहाँ से वेगपूर्वक हट गईं।

श्लोक 78 (skanda.8.65.78)

दृष्टा स तां तत्र तदापयातां तमेव लौहं परिघं गृहीत्वा । अभ्यद्रवद् दानवयोधमुख्यो दिवीव चित्रामसितः पयोदः

dṛṣṭā sa tāṁ tatra tadāpayātāṁ tameva lauhaṁ parighaṁ gṛhītvā | abhyadravad dānavayodhamukhyo divīva citrāmasitaḥ payodaḥ

उसे वहाँ से हटी हुई देखकर, उस श्रेष्ठ दानव-योद्धा ने उसी लौह-गदा को फिर उठाकर उस पर आक्रमण किया, मानो आकाश में एक श्याम मेघ किसी रंगीन मेघ पर झपटा हो।

श्लोक 79 (skanda.8.65.79)

उत्पत्य सा दिव्यवरास्त्रमुक्तैः क्षुरप्रमुख्यैः परिघञ्चकर्त । उद्यम्य मुष्टिं निबिडं ततोस्या भूयोथ दैत्यो वियदुत्पपात

utpatya sā divyavarāstramuktaiḥ kṣurapramukhyaiḥ parighañcakarta | udyamya muṣṭiṁ nibiḍaṁ tatosyā bhūyotha daityo viyadutpapāta

आकाश में उछलकर देवी ने दिव्य श्रेष्ठ अस्त्रों से, विशेषतः क्षुरप्र बाणों से, उस गदा को काट डाला; तब उस दैत्य ने उसके विरुद्ध मुट्ठी कसकर पुनः आकाश में छलांग लगाई।

श्लोक 80 (skanda.8.65.80)

तं मर्मगैर्मर्मसु बाणमुख्यैः संताडयद्दानवमाशु देवी । भिन्नः स तैर्मर्मगमैः सुपुंखैरन्तर्दधे दानवयोधमुख्यः

taṁ marmagairmarmasu bāṇamukhyaiḥ saṁtāḍayaddānavamāśu devī | bhinnaḥ sa tairmarmagamaiḥ supuṁkhairantardadhe dānavayodhamukhyaḥ

देवी ने उस दानव के मर्मस्थलों पर मर्मभेदी श्रेष्ठ बाणों से शीघ्र प्रहार किया; उन मर्मभेदी, सुपंखी बाणों से घायल होकर वह श्रेष्ठ दानव-योद्धा अदृश्य हो गया।

श्लोक 81 (skanda.8.65.81)

अथ समरमपास्य योधमुख्यै र्विहतपराक्रमपौरुषैरपेतैः । सुरपतिरिपवो विनद्य नादान् । द्विरदवरानधितस्थुरात्तशस्त्राः

atha samaramapāsya yodhamukhyai rvihataparākramapauruṣairapetaiḥ | surapatiripavo vinadya nādān | dviradavarānadhitasthurāttaśastrāḥ

तब अपने श्रेष्ठ योद्धाओं के पराक्रम-पुरुषार्थ कुचले जाकर हट जाने पर, इंद्र-शत्रु गरजते हुए, शस्त्र थामे, अपने श्रेष्ठ हाथियों पर सवार हो गए।

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