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अम्बिका खण्ड · अध्याय 66

शुंभ-निशुंभ का निपात

अध्याय 65अध्याय-सूचीअध्याय 67

श्लोक 1 (skanda.8.66.1)

सनत्कुमार उवाच । देव्योपि तेषां विदितप्रयत्ना गजोत्तमानारुरुहुः सयत्नाः । सुपुष्करानुन्नतवृत्तकुम्भान् सुबालधीनञ्चितचारुकर्णान् । सुदन्तवेष्टान् कलविङ्कनेत्रान्सुवक्षसः स्वासनपृष्ठवंशान्

sanatkumāra uvāca | devyopi teṣāṁ viditaprayatnā gajottamānāruruhuḥ sayatnāḥ | supuṣkarānunnatavṛttakumbhān subāladhīnañcitacārukarṇān | sudantaveṣṭān kalaviṅkanetrānsuvakṣasaḥ svāsanapṛṣṭhavaṁśān

सनत्कुमार ने कहा - देवियाँ भी उनकी योजना जानकर प्रयत्नपूर्वक श्रेष्ठ हाथियों पर सवार हुईं - सुंदर सूंड, ऊँचे गोल गंडस्थल, सुंदर पूँछ, घुमावदार सुंदर कान, सुसज्जित दाँत, गौरैया जैसे नेत्र, सुंदर वक्षस्थल और हौदे के लिए दृढ़ पीठ वाले हाथियों पर।

श्लोक 2 (skanda.8.66.2)

साङ्ग्रामिकानग्रजवान् वयःस्थान्सुशिक्षितानुन्नतपूर्वकायान् । आबद्धवर्मायुधचित्रघण्टान् समुच्छ्रितोरुध्वजवैजयन्तीन्

sāṅgrāmikānagrajavān vayaḥsthānsuśikṣitānunnatapūrvakāyān | ābaddhavarmāyudhacitraghaṇṭān samucchritorudhvajavaijayantīn

-युद्ध के लिए तैयार, सबसे आगे तेज़ चलने वाले, प्रौढ़ावस्था के, सुशिक्षित, ऊँचे अगले भाग वाले, कवच-आयुध बाँधे, विचित्र घंटियों से युक्त, ऊँचे विशाल ध्वज-वैजयंतियों से सुशोभित।

श्लोक 3 (skanda.8.66.3)

तासां पताकाध्वजशोभितानि विचित्रनानायुधभूषणानि । मातङ्गवृन्दानि तदा बभूवुर्वने वनानीव समागतानि

tāsāṁ patākādhvajaśobhitāni vicitranānāyudhabhūṣaṇāni | mātaṅgavṛndāni tadā babhūvurvane vanānīva samāgatāni

उन देवियों की ध्वज-पताकाओं से सुशोभित, विविध विचित्र आयुध-आभूषणों से युक्त वे गज-समूह तब वन में मानो वनों के समूह इकट्ठे हुए हों, ऐसे दिखाई दिए।

श्लोक 4 (skanda.8.66.4)

दैत्यापि ते वारणमूर्ध्नि षण्णा विस्फारयन्तो विबभुर्धनूंषि । सेन्द्रायुधाः साशनिशब्दगर्भाः शैलेषु मेघा इव सन्निलीनाः

daityāpi te vāraṇamūrdhni ṣaṇṇā visphārayanto vibabhurdhanūṁṣi | sendrāyudhāḥ sāśaniśabdagarbhāḥ śaileṣu meghā iva sannilīnāḥ

वे दैत्य भी हाथियों के सिर पर बैठकर धनुष खींचते हुए, इंद्रधनुष सहित, गर्जन-ध्वनि से भरे हुए, पर्वतों पर टिके मेघों के समान शोभित हुए।

श्लोक 5 (skanda.8.66.5)

सैन्यानि तान्याहनने गजानामाधोरणैराश्वभिचोदितानि । अन्योन्यमापेतुरभीरितानि वातेन वृन्दानि यथा घनानाम्

sainyāni tānyāhanane gajānāmādhoraṇairāśvabhicoditāni | anyonyamāpeturabhīritāni vātena vṛndāni yathā ghanānām

वे हाथियों की सेनाएँ, महावतों द्वारा टक्कर के लिए शीघ्र प्रेरित होकर, निर्भय होकर परस्पर टकराईं, जैसे वायु से प्रेरित मेघ-समूह परस्पर टकराते हैं।

श्लोक 6 (skanda.8.66.6)

वेगेन नागानभिसृत्य नागा मदान्मदश्याममुखान्विषाणैः । लोहाभिनद्धैर्बिसकाण्डगौरैः शम्बूकदेशेष्वभिजघ्नुराजौ

vegena nāgānabhisṛtya nāgā madānmadaśyāmamukhānviṣāṇaiḥ | lohābhinaddhairbisakāṇḍagauraiḥ śambūkadeśeṣvabhijaghnurājau

मद से गंडस्थल काले हुए हाथियों ने वेगपूर्वक शत्रु-हाथियों पर टूट पड़कर, कमल-नाल के समान गौर, लोहे से मढ़े हुए दाँतों से उनके गंडस्थल-प्रदेशों पर युद्ध में प्रहार किया।

श्लोक 7 (skanda.8.66.7)

प्रसार्य हस्तानभितश्च केचिद्दानानुगन्धं द्विरदाभिसेरुः । आधोरणैरङ्कुशपाशवाग्भि रविध्यमानापि मदाभिदृप्ताः

prasārya hastānabhitaśca keciddānānugandhaṁ dviradābhiseruḥ | ādhoraṇairaṅkuśapāśavāgbhi ravidhyamānāpi madābhidṛptāḥ

कुछ हाथी सूँड फैलाकर चारों ओर मद की गंध से शत्रु-हाथियों को खोज रहे थे; और महावतों द्वारा अंकुश, रस्सी और वचनों से रोके जाने पर भी, मद से गर्वित होकर वे टूट पड़े।

श्लोक 8 (skanda.8.66.8)

छिन्नानि पेतुर्निशितैः क्षुरप्रैः समुच्छ्रितान्यातपवारणानि । चित्राः पताका विविधा ध्वजाश्च परस्परेणाहनने गजेभ्यः

chinnāni peturniśitaiḥ kṣurapraiḥ samucchritānyātapavāraṇāni | citrāḥ patākā vividhā dhvajāśca paraspareṇāhanane gajebhyaḥ

हाथियों के उस टकराव में, तीक्ष्ण क्षुरप्र बाणों से कटकर, ऊँचे छत्र, विचित्र पताकाएँ और विविध ध्वज परस्पर टकराने से गिर पड़े।

श्लोक 9 (skanda.8.66.9)

योधा निपेतुः परिनिष्टनन्तो विद्धाः शरैर्मर्मसु देवताभिः । सफेनमास्यै रुधिरं वमन्तो धनूंषि सज्जानि करैर्दधानाः

yodhā nipetuḥ pariniṣṭananto viddhāḥ śarairmarmasu devatābhiḥ | saphenamāsyai rudhiraṁ vamanto dhanūṁṣi sajjāni karairdadhānāḥ

देवियों के बाणों से मर्मस्थलों में बींधे गए योद्धा चारों ओर कराहते हुए गिर पड़े, मुँह से झागदार रक्त वमन करते हुए, हाथों में तैयार धनुष धारण किए हुए।

श्लोक 10 (skanda.8.66.10)

नागा निपेतुः परितोभिपद्य मर्मातिगैर्बाणवरैर्विभिन्नाः । देवीभिराजौ दितिजाधिपानां वाताभिनुन्ना इव गण्डशैलाः

nāgā nipetuḥ paritobhipadya marmātigairbāṇavarairvibhinnāḥ | devībhirājau ditijādhipānāṁ vātābhinunnā iva gaṇḍaśailāḥ

देवियों के मर्मभेदी श्रेष्ठ बाणों से विदीर्ण दैत्येंद्रों के हाथी चारों ओर युद्ध में इस प्रकार गिरे जैसे वायु से हिलाए गए विशाल शिलाखंड गिरते हैं।

श्लोक 11 (skanda.8.66.11)

मातङ्गमुख्यान्पतितान् परासून् रणाजिरे नीलगिरीन्द्रकल्पान् । गन्धेन नागाः समदाः परीत्य विनम्य केचिद् वदनैर्विनेदुः

mātaṅgamukhyānpatitān parāsūn raṇājire nīlagirīndrakalpān | gandhena nāgāḥ samadāḥ parītya vinamya kecid vadanairvineduḥ

कुछ मदमस्त हाथी, नीले पर्वतों के समान विशाल, रणभूमि में गिरे हुए प्राणहीन श्रेष्ठ हाथियों के पास घूमकर, उनकी गंध से, झुककर मुख से करुण स्वर में चिंघाड़ने लगे।

श्लोक 12 (skanda.8.66.12)

छिन्नानि वक्त्राणि सकुण्डलानि भुजास्सशस्त्राश्च सुचन्दनाक्ताः । पेतुर्गजेभ्योसुरयूथपानां देवीभिराजौ निशितैः क्षुरप्रै

chinnāni vaktrāṇi sakuṇḍalāni bhujāssaśastrāśca sucandanāktāḥ | peturgajebhyosurayūthapānāṁ devībhirājau niśitaiḥ kṣuraprai

कुंडलों सहित कटे हुए सिर, और शस्त्रों सहित चंदन-लिप्त भुजाएँ, देवियों के तीक्ष्ण क्षुरप्र बाणों से कटकर असुर-सेनापतियों के हाथियों से युद्ध में गिर पड़ीं।

श्लोक 13 (skanda.8.66.13)

चुकूजुरुच्चैः परितो धनूंषि विनेदुराहत्य सुरारिमुख्याः । विपुस्फुरुर्ज्याः परिकृष्य मुक्ताः शराभिविद्धाश्च गजा निषेदुः

cukūjuruccaiḥ parito dhanūṁṣi vinedurāhatya surārimukhyāḥ | vipusphururjyāḥ parikṛṣya muktāḥ śarābhividdhāśca gajā niṣeduḥ

चारों ओर धनुष ऊँचे स्वर में टंकार करने लगे; देव-शत्रुओं के मुख्य योद्धा प्रहार करते हुए गरजे; खींचकर छोड़ी गई प्रत्यंचाएँ तीव्र स्वर में गूँजीं; और बाणों से बिंधे हाथी बैठ गए।

श्लोक 14 (skanda.8.66.14)

नागैः पतद्भिर्विशिखाभिविद्धैः समुच्छ्रितोरुध्वजचारुपृष्ठैः । आस्तीर्यते भूरनिलप्रनुन्नैः सतालवृक्षैरिव शैलपादैः

nāgaiḥ patadbhirviśikhābhividdhaiḥ samucchritorudhvajacārupṛṣṭhaiḥ | āstīryate bhūranilapranunnaiḥ satālavṛkṣairiva śailapādaiḥ

बाणों से बिंधे हुए, अपनी विशाल ऊँची ध्वज और सुंदर पीठ सहित गिरते हुए हाथियों से भूमि इस प्रकार पट गई जैसे वायु से गिरे ताड़-वृक्षों से पर्वत की तलहटी पट जाती है।

श्लोक 15 (skanda.8.66.15)

नागा गजानाहननेभिजघ्नुर्दैत्याश्च देवीर्दितिजाँश्च देव्यः । दैत्यान् गजेन्द्रा द्विरदांश्च दैत्याः क्रुद्धाः सरोषानभिसृत्य तत्र

nāgā gajānāhananebhijaghnurdaityāśca devīrditijā~śca devyaḥ | daityān gajendrā dviradāṁśca daityāḥ kruddhāḥ saroṣānabhisṛtya tatra

वहाँ हाथियों ने हाथियों पर, दैत्यों ने देवियों पर, और देवियों ने दैत्यों पर प्रहार किया; गजराजों ने दैत्यों पर और क्रुद्ध दैत्यों ने रोषपूर्वक हाथियों पर टूटकर प्रहार किया।

श्लोक 16 (skanda.8.66.16)

शस्त्राभितप्तैः पतितैस्समन्तान्मातङ्गवृन्दैर्गिरिसानुकल्पैः । सञ्चारयोग्या न बभूव भूमिरायोघने दैवतदानवानाम

śastrābhitaptaiḥ patitaissamantānmātaṅgavṛndairgirisānukalpaiḥ | sañcārayogyā na babhūva bhūmirāyoghane daivatadānavānāma

शस्त्रों से आहत होकर चारों ओर गिरे हुए, पर्वत-श्रृंग के समान विशाल हाथियों के झुंडों से देव-दानवों की वह रणभूमि चलने योग्य न रही।

श्लोक 17 (skanda.8.66.17)

अभ्यदितानि स्वबलानि दृष्ट्वा देवीभिराजौ निहतद्विपानि । शुम्भो निशुम्भश्च समाजभूमिमाजग्मतुर्दैत्यपती रथस्थौ

abhyaditāni svabalāni dṛṣṭvā devībhirājau nihatadvipāni | śumbho niśumbhaśca samājabhūmimājagmaturdaityapatī rathasthau

अपनी सेनाओं को युद्ध में पीड़ित, देवियों द्वारा हाथी मारे गए देखकर, दैत्यपति शुंभ और निशुंभ, रथों पर सवार होकर, उस युद्धस्थल में आ पहुँचे।

श्लोक 18 (skanda.8.66.18)

अग्रेसरैः पत्तितुरङ्गनागैर्व्रातैश्च देवद्विषतामुपेतौ । विस्फारयन्तौ धनुषी विचित्रे युद्धाय यत्तौ परिघोरुबाहू

agresaraiḥ pattituraṅganāgairvrātaiśca devadviṣatāmupetau | visphārayantau dhanuṣī vicitre yuddhāya yattau parighorubāhū

आगे-आगे चलते देव-शत्रुओं के पैदल, घोड़े और हाथियों के समूहों से घिरे हुए, अपने विचित्र धनुष खींचते हुए, गदा जैसी विशाल भुजाओं वाले वे दोनों युद्ध के लिए सुसज्जित हुए।

श्लोक 19 (skanda.8.66.19)

ज्ञात्वा तयोरागमनं तदानीं देवी चलत्पिङ्गलकेशराढ्यान् । सञ्चोदयामास रथस्य सिंहान् विस्फारयन्ती समरे धनूंषि

jñātvā tayorāgamanaṁ tadānīṁ devī calatpiṅgalakeśarāḍhyān | sañcodayāmāsa rathasya siṁhān visphārayantī samare dhanūṁṣi

उन दोनों के आगमन को जानकर, देवी ने अपने रथ के, लहराते पिंगल केशर वाले सिंहों को प्रेरित किया, और युद्ध में अपना धनुष खींचा।

श्लोक 20 (skanda.8.66.20)

ज्यानिं जवस्याथ तुरङ्गमाणां मदप्रमोषञ्च महाद्विपानाम् । चेतोविमोहं सुरविद्विषां च चापस्वनेनैव चकार देवी

jyāniṁ javasyātha turaṅgamāṇāṁ madapramoṣañca mahādvipānām | cetovimohaṁ suravidviṣāṁ ca cāpasvanenaiva cakāra devī

अपने धनुष की टंकार-मात्र से ही देवी ने घोड़ों के वेग को हर लिया, महागजों के मद को छीन लिया, और देव-शत्रुओं के चित्त को मोहित कर दिया।

श्लोक 21 (skanda.8.66.21)

आजौ समास्थाय परं प्रयत्नं शराः सुराणां रिपुभिः समस्ताः । अप्राप्य देवीं पतिताः पृथिव्यां पराजयं प्राहुरिवासुराणाम्

ājau samāsthāya paraṁ prayatnaṁ śarāḥ surāṇāṁ ripubhiḥ samastāḥ | aprāpya devīṁ patitāḥ pṛthivyāṁ parājayaṁ prāhurivāsurāṇām

देवताओं के शत्रुओं द्वारा युद्ध में अत्यंत प्रयत्न से छोड़े गए समस्त बाण देवी तक पहुँचे बिना ही पृथ्वी पर गिर पड़े - मानो असुरों की पराजय की घोषणा करते हुए।

श्लोक 22 (skanda.8.66.22)

गभस्तिभिः स्थावरजङ्गमानि व्याप्नोति यद्वत् सविता दिनेषु । तद्वच्छरौघैर्दितिजाधिपानां रणाजिरे व्याप बलानि देवी

gabhastibhiḥ sthāvarajaṅgamāni vyāpnoti yadvat savitā dineṣu | tadvaccharaughairditijādhipānāṁ raṇājire vyāpa balāni devī

जैसे सूर्य दिन में अपनी किरणों से चराचर को व्याप्त कर लेता है, वैसे ही देवी ने रणभूमि में बाणों की बाढ़ से दैत्येंद्रों की सेनाओं को व्याप्त कर लिया।

श्लोक 23 (skanda.8.66.23)

निपेतुराशु व्यसवस्तुरङ्गमा विचस्खलुर्मत्तगजाः क्षरन्मदाः । चकम्पिरे योधवराः सुरद्विषां समं समस्ताः समरे शराहताः

nipeturāśu vyasavasturaṅgamā vicaskhalurmattagajāḥ kṣaranmadāḥ | cakampire yodhavarāḥ suradviṣāṁ samaṁ samastāḥ samare śarāhatāḥ

घोड़े शीघ्र प्राणहीन होकर गिर पड़े; मद बहाते हुए मदमस्त हाथी लड़खड़ा गए; और देव-शत्रुओं के श्रेष्ठ योद्धा, बाणों से आहत होकर, सब एक साथ युद्ध में काँप उठे।

श्लोक 24 (skanda.8.66.24)

अर्च्चिर्भिरिद्धैर्ज्वलितो यथानलः कक्षाणि शुष्काणि दहत्यवारितः । दीप्तैः शरोघैः समरेमरद्विषां सैन्यानि तद्वत् प्रददाह कौशिकी

arccirbhiriddhairjvalito yathānalaḥ kakṣāṇi śuṣkāṇi dahatyavāritaḥ | dīptaiḥ śaroghaiḥ samaremaradviṣāṁ sainyāni tadvat pradadāha kauśikī

जैसे प्रज्वलित लपटों से जलती हुई अग्नि सूखी घास को अबाध जला डालती है, वैसे ही कौशिकी ने अपने दीप्त बाण-समूहों से युद्ध में देव-शत्रुओं की सेनाओं को जला डाला।

श्लोक 25 (skanda.8.66.25)

छायां यथा स्थावरजंगमानां मध्यन्दिनेल्पां कुरुते विवस्वान् । देवी तथा तां ध्वजिनीं रिपूणामल्पावशिष्टां समरे चकार

chāyāṁ yathā sthāvarajaṁgamānāṁ madhyandinelpāṁ kurute vivasvān | devī tathā tāṁ dhvajinīṁ ripūṇāmalpāvaśiṣṭāṁ samare cakāra

जैसे सूर्य मध्याह्न में चराचर की छाया को क्षीण कर देता है, वैसे ही देवी ने युद्ध में शत्रुओं की उस सेना को अत्यल्प अवशेष कर डाला।

श्लोक 26 (skanda.8.66.26)

आहूय देवीमथ दानवाधिपौ विस्फार्य चापे महती भिसेरतुः । तीक्ष्णैः सुपत्रैर्विशिखैश्च कौशिकीं संछादयामासतुराहवाजिरे

āhūya devīmatha dānavādhipau visphārya cāpe mahatī bhiseratuḥ | tīkṣṇaiḥ supatrairviśikhaiśca kauśikīṁ saṁchādayāmāsaturāhavājire

तब देवी को ललकारकर उन दोनों दानवाधिपों ने अपने दो विशाल धनुष खींचे, और युद्धभूमि में तीक्ष्ण, सुपंखी बाणों से कौशिकी को आच्छादित कर दिया।

श्लोक 27 (skanda.8.66.27)

चापेषु यत्तौ हरिषु ध्वजेषु महाभुजौ क्रोधपरीतचित्तौ । दैत्येश्वरौ संयति देवताया निचख्नतुर्वाणवरान्सुपत्रान्

cāpeṣu yattau hariṣu dhvajeṣu mahābhujau krodhaparītacittau | daityeśvarau saṁyati devatāyā nicakhnaturvāṇavarānsupatrān

क्रोध से आविष्ट-चित्त, अपने धनुषों, सिंहों और ध्वजों पर एकाग्र वे दोनों महाबाहु दैत्येश्वर, उस युद्ध में देवी के शरीर में श्रेष्ठ सुपंखी बाण गाड़ने लगे।

श्लोक 28 (skanda.8.66.28)

दैतेश्वरास्तानथ सायकौघानचिन्तयित्वा रिपुदर्पहन्त्री । विव्याध दैत्यौ युधि रुक्मपुंखैस्सुपर्वभिर्वाणवरैस्तुपत्रैः

daiteśvarāstānatha sāyakaughānacintayitvā ripudarpahantrī | vivyādha daityau yudhi rukmapuṁkhaissuparvabhirvāṇavaraistupatraiḥ

परंतु शत्रु के गर्व का नाश करने वाली उस देवी ने दानवाधिपों के उस बाण-प्रवाह की परवाह न करते हुए, युद्ध में उन दोनों दैत्यों को स्वर्ण-पुंख वाले, सुसंधि, सुपंखी श्रेष्ठ बाणों से बींध दिया।

श्लोक 29 (skanda.8.66.29)

दैत्यावपीषूनविचिन्त्य शूरौ गदे प्रगृह्योज्ज्वलचारुघण्टे । उद्भ्राम्य यत्नातिशयेन देव्या रणाजिरे चिक्षिपतुर्बृहत्यौ

daityāvapīṣūnavicintya śūrau gade pragṛhyojjvalacārughaṇṭe | udbhrāmya yatnātiśayena devyā raṇājire cikṣipaturbṛhatyau

उन दोनों वीर दैत्यों ने भी बाणों की परवाह न करते हुए अपनी उज्ज्वल, सुंदर घंटियों वाली दो गदाएँ उठाईं, अत्यंत प्रयत्न से घुमाकर, रणभूमि में देवी पर उन दोनों विशाल गदाओं को फेंक दिया।

श्लोक 30 (skanda.8.66.30)

ते व्योम्नि बाणैश्शतशो निकृत्य सुपर्वभिर्हाटकचारुपुंखैः । विच्छेद देवी कवचे विचित्रे तयोः क्षुरप्रैरपरैः शिताग्रैः

te vyomni bāṇaiśśataśo nikṛtya suparvabhirhāṭakacārupuṁkhaiḥ | viccheda devī kavace vicitre tayoḥ kṣuraprairaparaiḥ śitāgraiḥ

देवी ने आकाश में सुसंधि, सुंदर स्वर्ण-पुंख वाले बाणों से उन दोनों गदाओं को सैकड़ों टुकड़ों में काट डाला; और अन्य तीक्ष्ण अग्रभाग वाले क्षुरप्र बाणों से उनके विचित्र कवचों को भी काट डाला।

श्लोक 31 (skanda.8.66.31)

जघान चाश्वानथ सारथी च ध्वजौ च चित्रौ रथयोश्चकर्त्त । चखान चान्यानपि सत्पृषत्कान् सुरद्विषो र्मर्मसु हेमपुंखान्

jaghāna cāśvānatha sārathī ca dhvajau ca citrau rathayoścakartta | cakhāna cānyānapi satpṛṣatkān suradviṣo rmarmasu hemapuṁkhān

उसने उनके घोड़ों और सारथियों को मार डाला, और उनके रथों के दो सुंदर ध्वज काट डाले; तथा देव-शत्रुओं के मर्मस्थलों में अन्य श्रेष्ठ स्वर्ण-पुंख वाले बाण भी गाड़ दिए।

श्लोक 32 (skanda.8.66.32)

शुंभो निशुंभश्च रथावपास्य दैत्येश्वरौ बाणवराभितप्तौ । आदाय निस्त्रिंशवरौ तदानीमुत्पेततुर्व्योम शितासिनीलम्

śuṁbho niśuṁbhaśca rathāvapāsya daityeśvarau bāṇavarābhitaptau | ādāya nistriṁśavarau tadānīmutpetaturvyoma śitāsinīlam

शुंभ और निशुंभ, वे दोनों दैत्येश्वर, श्रेष्ठ बाणों से पीड़ित होकर, तब अपने रथ त्यागकर, श्रेष्ठ तलवारें लेकर, तीक्ष्ण खड्गों की नीली चमक से युक्त आकाश में उछल पड़े।

श्लोक 33 (skanda.8.66.33)

अथ नभसि विमेघे धौतनिश्त्रिंशनीले । द्रुततरमभिसृत्य ग्रीवयोः संप्रगृह्य । दितितनयपती तौ निष्पिपेषाशु देवी । विगतभयविषादैः स्तूयमाना मुनीन्द्रैः

atha nabhasi vimeghe dhautaniśtriṁśanīle | drutataramabhisṛtya grīvayoḥ saṁpragṛhya | dititanayapatī tau niṣpipeṣāśu devī | vigatabhayaviṣādaiḥ stūyamānā munīndraiḥ

तब पॉलिश की हुई तलवारों से नीले हुए, मेघरहित आकाश में, भय-विषाद से मुक्त हुए महर्षियों द्वारा स्तुति की जाती देवी ने अत्यंत वेग से झपटकर, दितिपुत्रों के उन दोनों स्वामियों को गर्दन से पकड़कर तुरंत मसल डाला।

श्लोक 34 (skanda.8.66.34)

असृगथ वदनाभ्यामुद्वमन्तौ सफेनं । सपदि विहतवीर्यौ पिष्टसर्वाङ्गसन्धी । असुभिरपगतैस्तौ रक्तपर्यन्तनेत्रौ । क्षितितलमभितस्तौ पेततुर्दैत्यसिंहौ

asṛgatha vadanābhyāmudvamantau saphenaṁ | sapadi vihatavīryau piṣṭasarvāṅgasandhī | asubhirapagataistau raktaparyantanetrau | kṣititalamabhitastau petaturdaityasiṁhau

मुख से झागदार रक्त वमन करते हुए, तत्क्षण बल-रहित, समस्त अंग-संधियाँ चूर्ण हुई, नेत्रों के किनारे रक्त-रंजित, प्राण निकल जाने पर, वे दोनों दैत्य-सिंह एक साथ पृथ्वी पर गिर पड़े।

अध्याय 65अध्याय-सूचीअध्याय 67